21-09-2026, 06:02 PM
बेंगलुरु की चकाचौंध भरी सुबह ने अभी पूरी तरह अंगड़ाई नहीं ली थी। दास परिवार के घर में एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। मौशुमी दास, अपनी 30 के दशक के अंत में, एक भरी हुई बंगाली शरीर वाली, अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए रसोई में खड़ी थी। उसकी सांवली त्वचा पर सुबह की सूरज की हल्की किरणें पड़ रही थीं, जिससे उसकी मांग में सिंदूर और हाथों में शाखा-पोला चमक रहे थे। उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी, जो उसके शांत, संस्कारी चेहरे पर शायद ही कभी दिखती थी।
कौशिक, 18 साल का लंबा, गठीला, टी-शर्ट और जींस में सामने वाले कमरे में खड़ा था, फोन पर कुछ देख रहा था। उसके चेहरे पर एक किशोर सुस्ती थी, लेकिन उसकी निगाहें बार-बार रसोई की ओर जा रही थीं, जहाँ उसकी माँ खड़ी थी। उनके बीच कुछ अनकहा, अनुभूत था, एक तनाव जो हवा में तैर रहा था, उनकी हर मुलाकात को एक अजीब सी उत्सुकता से भर देता था।
" मेरी गाड़ी तो वर्कशॉप में है," आलोक दास, मौशुमी का पति, जो चार्टर्ड अकाउंटेंट था, अपने लैपटॉप पर कुछ देखते हुए बोला। "आज मुझे तुम्हारी कार लेनी पड़ेगी, मौशुमी। देर हो रही है।"
मौशुमी ने एक गहरी साँस ली। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक सिहरन दौड़ गई। यह तो उसने सोचा ही नहीं था। "ठीक है," वह धीमी आवाज में बोली, जैसे उसके गले में कुछ अटक गया हो। "मैं कौशिक को कॉलेज छोड़ कर ऑफिस चली जाऊँगी। ऑटो कर लेंगे।"
कौशिक ने अपना फोन नीचे रखा। उसने मौशुमी की ओर देखा, एक पल के लिए दोनों की निगाहें मिलीं। उस पल में, एक पूरी कहानी छिपी थी – अधूरी इच्छाओं की, चोरी की मुलाकातों की, और एक ऐसे रिश्ते की जो समाज की हर मर्यादा को तोड़ता था।
आलोक ने अपनी फाइलें समेटीं, मौशुमी के गाल पर एक हल्की थपकी दी, और चाबियाँ लेकर निकल गया। "मिलते हैं शाम को," उसने कहा, और दरवाज़ा बंद हो गया।
घर में फिर से खामोशी छा गई, लेकिन इस बार यह खामोशी उम्मीदों से भरी थी। मौशुमी ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और कसा। उसके दिल की धड़कन बढ़ गई थी। कौशिक उसके पास आया, उसकी आँखों में वही बेचैनी थी जो मौशुमी की आँखों में थी।
"चले?" कौशिक की आवाज़ में एक हल्की सी थरथराहट थी।
मौशुमी ने सिर हिलाया। वे दोनों घर से बाहर निकले। बेंगलुरु की सुबह की भीड़ सड़कों पर उमड़ने लगी थी। एक ऑटो रिक्शा उनकी तरफ आया। कौशिक ने हाथ दिया, और वे दोनों अंदर बैठ गए।
ऑटो चालक ने अपनी रेडियो पर कन्नड़ गाने चला रखे थे। सड़क पर ट्रैफिक की धीमी रफ्तार थी, और ऑटो धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। मौशुमी और कौशिक एक-दूसरे से सटे बैठे थे। उनकी जाँघें एक-दूसरे को छू रही थीं, और एक गरमाहट दोनों के शरीर में फैल रही थी।
कौशिक ने धीरे से अपना हाथ मौशुमी की साड़ी के ऊपर से उसकी कमर पर रखा। मौशुमी चौंकी नहीं। उसने बस एक हल्की सी साँस ली, उसकी नज़रें सड़क पर टिकी थीं, लेकिन उसका पूरा ध्यान कौशिक के स्पर्श पर था। उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे उसकी कमर को सहला रही थीं, साड़ी के मुलायम कपड़े के नीचे उसकी त्वचा पर एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थीं।
ऑटो चालक ने शीशे से उनकी तरफ देखा, उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी। उसे पता था कि कुछ तो चल रहा है। वह बेंगलुरु की सड़कों पर रोज ऐसे न जाने कितने किस्से देखता था।
कौशिक ने और हिम्मत जुटाई। उसका हाथ धीरे-धीरे मौशुमी के पेट की ओर बढ़ा, उसकी साड़ी के नीचे से, उसके मुलायम पेट की त्वचा को छूते हुए। मौशुमी का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, उस स्पर्श का आनंद ले रही थी, जो उसे हर बार एक नए रोमांच में डुबो देता था।
" मौशुमी”, कौशिक फुसफुसाया, उसकी आवाज़ में एक गहरी इच्छा थी।
मौशुमी ने अपनी आँखें खोलीं, उसकी नज़रें कौशिक की आँखों से मिलीं। उसकी आँखों में एक आग थी, एक ऐसी आग जो मौशुमी को हर बार पिघला देती थी। कौशिक ने धीरे से अपना चेहरा उसकी ओर झुकाया। मौशुमी ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, और कौशिक के होंठ उसके होंठों पर आ टिके।
यह कोई सामान्य चुंबन नहीं था। यह एक भूखा, प्यासा चुंबन था, जिसमें अतृप्त इच्छाएँ घुली हुई थीं। कौशिक के होंठों ने मौशुमी के होंठों को कसकर पकड़ा, उसकी जीभ धीरे से उसके मुँह में दाखिल हुई, जैसे किसी लंबे सफर के बाद घर लौटी हो। मौशुमी की जीभ भी उसका स्वागत करने के लिए तैयार थी, और दोनों की जीभें एक-दूसरे से गुँथ गईं, एक उत्तेजक नृत्य में।
ऑटो की धीमी गति और सड़क का शोर उनके चुंबन की तीव्रता को कम नहीं कर पा रहा था। कौशिक ने अपना एक हाथ मौशुमी के गाल पर रखा, उसके सिर को थोड़ा झुकाते हुए, ताकि चुंबन और गहरा हो सके। मौशुमी ने अपने हाथ उसके बालों में फँसा लिए, अपनी उँगलियों से उसके नरम बालों को सहलाते हुए। उनके मुँह से हल्की सी आवाज़ें निकल रही थीं, एक-दूसरे की लार का स्वाद लेते हुए, एक-दूसरे की साँसों को महसूस करते हुए।
कौशिक का दूसरा हाथ अब मौशुमी की साड़ी के नीचे था, उसकी जाँघों को सहला रहा था। मौशुमी ने अपनी जाँघों को थोड़ा और खोला, उसे और पहुँच देने के लिए। कौशिक की उँगलियाँ उसकी जाँघों पर ऊपर-नीचे हो रही थीं, उसकी त्वचा पर एक अजीब सी गुदगुदी पैदा कर रही थीं। उसकी साड़ी और पेटीकोट के नीचे, उसकी त्वचा गर्म और संवेदनशील हो रही थी।
ऑटो चालक ने फिर से शीशे से देखा, उसके चेहरे पर अब एक बड़ी, मुस्कान थी। उसने अपनी गति धीमी कर दी, जैसे उन्हें और समय देना चाहता हो।
कौशिक का हाथ अब मौशुमी की जाँघों से ऊपर चढ़ रहा था, उसके पेटीकोट के अंदर, उसकी पैंटी की ओर। मौशुमी का शरीर काँप रहा था। उसे पता था कि यह गलत है, लेकिन इस पल में, वह किसी और चीज़ के बारे में सोच नहीं पा रही थी। उसकी पैंटी गीली हो चुकी थी, और कौशिक की उँगलियाँ उसकी नमी को महसूस कर रही थीं।
कौशिक ने अपने होंठ मौशुमी के होंठों से हटाए, उसके गालों पर, फिर उसकी गर्दन पर चुंबन करते हुए। मौशुमी ने अपना सिर पीछे कर लिया, उसकी गर्दन को उजागर करते हुए। कौशिक ने उसकी त्वचा को चूसा, एक हल्की सी आह उसकी गर्दन से निकल गई।
"और नहीं," मौशुमी ने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ काँप रही थी। "हम पकड़े जाएँगे।"
कौशिक ने उसकी बात सुनी, लेकिन उसके चेहरे पर एक अतृप्त इच्छा थी। उसने अपना हाथ उसकी पैंटी से हटा लिया, लेकिन उसकी उँगलियाँ अभी भी उसकी जाँघों पर टिकी थीं।
ऑटो कॉलेज के गेट पर रुक गया। कौशिक ने एक गहरी साँस ली, अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने की कोशिश करते हुए। मौशुमी ने अपनी साड़ी ठीक की, अपने होंठों को हल्के से पोंछा।
"आज कॉलेज के बाद तुम्हारे ऑफिस आऊँगा।" कौशिक ने कहा, उसकी आँखों में एक शरारत थी।
मौशुमी ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में एक चेतावनी थी, लेकिन उसके दिल में एक उम्मीद की किरण जगमगा उठी थी। "नहीं," वह बोली, लेकिन उसकी आवाज़ में कोई दृढ़ता नहीं थी। "काम है आज।"
"देखता हूँ," कौशिक ने एक शरारती मुस्कान दी, और ऑटो से उतर गया।


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