19-09-2026, 01:02 PM
बाबाजी के मन में एक शैतानी प्लान आया। उन्होंने धोती को पूरी तरह एक तरफ सरका दिया और अपना मोटा, आधा-खड़ा लंड बाहर निकालकर रख दिया। फिर लेट गए, आँखें बंद कर लीं और सोने का बहाना करने लगे। दिल में एक उत्तेजक प्रत्याशा थी - मयूरी कब आएगी और क्या करेगी।
थोड़ी देर बाद दरवाजे पर हल्की खटखट हुई। कोई जवाब न मिलने पर मयूरी ने धीरे से दरवाजा खोला और अंदर आ गई। कमरे में घुप्प अंधेरा था। सिर्फ एक छोटी-सी दीपक की रोशनी कोने में जल रही थी।
मयूरी ने देखा कि बाबाजी बेड पर लेटे हुए हैं। वह कुछ पल खड़ी रही, फिर आगे बढ़ी और धीमी आवाज में पुकारा,
“बाबाजी जी… उठिए…”
कोई जवाब नहीं मिला। वह और पास आई और बेड के किनारे बैठ गई। बाबाजी जी का कंधा पकड़कर हल्का-हल्का हिलाया।
तभी उसका हाथ अचानक रुक गया। उसकी नजर बाबाजी के खुले लंड पर पड़ गई।
मयूरी के गर्म हाथ पल भर में बर्फ जैसे ठंडे हो गए। उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं। नाखून बाबाजी के कंधे में गड़ गए। उसकी साँसें भारी और तेज हो गईं। कल की यादें - बाबाजी के मुँह में उसके स्तन, शहद-दूध की चिपचिपाहट, उनकी उँगलियों का दबाव - सब कुछ एक साथ लौट आया। निर्मात्री मैत्री पटेल।
बाबाजी ने मयूरी के नाखूनों की चुभन महसूस की तो धीरे-धीरे आँखें खोल दीं।
मयूरी अभी भी उनके कंधे को पकड़े हुए, उनकी आँखों में देखते हुए उनके मोटे, नसों वाले लंड को घूर रही थी। वह सामने आधा खडा लंड की टोपी उसे आमंत्रित कर रही हो।
बाबाजी ने नाटकीय आश्चर्य से कहा,
“अरे मयूरी… तुम… कब आई?”
मयूरी ने झटके से हाथ छोड़ा और उठ खड़ी हुई। बाबाजी ने आराम से अपना लंड ढका, तकिये का सहारा लिया और आधे लेटे हुए मुस्कुराए।
आज मयूरी पीले रंग का स्लीवलेस सूट पहने थी। ऊपर का टॉप उसके भारी स्तनों को कसकर दबाए हुए था और नीचे तंग पायजामा उसके मोटे कूल्हों और जाँघों की आकृति साफ़ उभार रहा था। जैसे ही वह उठी, उसकी चुन्नी सरककर नीचे गिर गई। उसने उसे उठाने की कोई कोशिश नहीं की। अब छुपाने को क्या रह गया था? कल इन्हीं बाबाजी ने उसके स्तनों को चूसा-चबाया था।
बाबाजी ने उसका ठंडा, काँपता हाथ पकड़ लिया और उसे फिर से बेड पर बिठा दिया।
“आओ… बैठो ना। अब मेरे साथ डरने की क्या बात है?” फिर बिना किसी भूमिका के सीधा सवाल कर दिया,
“अब बताओ… कल रात क्या हुआ?”
मयूरी इस अचानक सवाल की बिल्कुल उम्मीद नहीं कर रही थी। उसका चेहरा एकदम लाल हो गया। वह शर्मा कर सिर झुका लेती है। उसे ऐसा था की बाबाजी उसका हाल-चाल पूछेंगे और धीरे-धीरे वह मुद्दे पे आयेंगे।
बाबाजी ने नरम लेकिन जिज्ञासु स्वर में कहा,
“कल रात मैंने गोपाल को बहुत अच्छे से समझा दिया था। मुझे पूरा विश्वास है कि उसने कोई गलती नहीं की होगी।” बाबाजी ने मयूरी को विशवास दिलाते हुए कहा।
मयूरी का चेहरा और गहरा लाल होता जा रहा था। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।
बाबाजी ने और पास खिसककर, उसके हाथ को थामते हुए पूछा,
“अब जल्दी से बताओ… उसने क्या किया? मेरे समझाने का कोई असर हुआ या नहीं?”
मयूरी ने बहुत देर तक नीचे देखा। फिर धीरे-धीरे, फुसफुसाती हुई आवाज़ में बोली,
“जी बाबाजी जी… आपके समझाने का असर हुआ था… उस पर भी… और मुझ पर भी। आपकी बात मानकर… मैंने कल रात गोपाल को बिना किसी आपत्ति के मेरे पास आने दिया…”
******************************************.
Maitri Patel की प्रस्तुति।
थोड़ी देर बाद दरवाजे पर हल्की खटखट हुई। कोई जवाब न मिलने पर मयूरी ने धीरे से दरवाजा खोला और अंदर आ गई। कमरे में घुप्प अंधेरा था। सिर्फ एक छोटी-सी दीपक की रोशनी कोने में जल रही थी।
मयूरी ने देखा कि बाबाजी बेड पर लेटे हुए हैं। वह कुछ पल खड़ी रही, फिर आगे बढ़ी और धीमी आवाज में पुकारा,
“बाबाजी जी… उठिए…”
कोई जवाब नहीं मिला। वह और पास आई और बेड के किनारे बैठ गई। बाबाजी जी का कंधा पकड़कर हल्का-हल्का हिलाया।
तभी उसका हाथ अचानक रुक गया। उसकी नजर बाबाजी के खुले लंड पर पड़ गई।
मयूरी के गर्म हाथ पल भर में बर्फ जैसे ठंडे हो गए। उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं। नाखून बाबाजी के कंधे में गड़ गए। उसकी साँसें भारी और तेज हो गईं। कल की यादें - बाबाजी के मुँह में उसके स्तन, शहद-दूध की चिपचिपाहट, उनकी उँगलियों का दबाव - सब कुछ एक साथ लौट आया। निर्मात्री मैत्री पटेल।
बाबाजी ने मयूरी के नाखूनों की चुभन महसूस की तो धीरे-धीरे आँखें खोल दीं।
मयूरी अभी भी उनके कंधे को पकड़े हुए, उनकी आँखों में देखते हुए उनके मोटे, नसों वाले लंड को घूर रही थी। वह सामने आधा खडा लंड की टोपी उसे आमंत्रित कर रही हो।
बाबाजी ने नाटकीय आश्चर्य से कहा,
“अरे मयूरी… तुम… कब आई?”
मयूरी ने झटके से हाथ छोड़ा और उठ खड़ी हुई। बाबाजी ने आराम से अपना लंड ढका, तकिये का सहारा लिया और आधे लेटे हुए मुस्कुराए।
आज मयूरी पीले रंग का स्लीवलेस सूट पहने थी। ऊपर का टॉप उसके भारी स्तनों को कसकर दबाए हुए था और नीचे तंग पायजामा उसके मोटे कूल्हों और जाँघों की आकृति साफ़ उभार रहा था। जैसे ही वह उठी, उसकी चुन्नी सरककर नीचे गिर गई। उसने उसे उठाने की कोई कोशिश नहीं की। अब छुपाने को क्या रह गया था? कल इन्हीं बाबाजी ने उसके स्तनों को चूसा-चबाया था।
बाबाजी ने उसका ठंडा, काँपता हाथ पकड़ लिया और उसे फिर से बेड पर बिठा दिया।
“आओ… बैठो ना। अब मेरे साथ डरने की क्या बात है?” फिर बिना किसी भूमिका के सीधा सवाल कर दिया,
“अब बताओ… कल रात क्या हुआ?”
मयूरी इस अचानक सवाल की बिल्कुल उम्मीद नहीं कर रही थी। उसका चेहरा एकदम लाल हो गया। वह शर्मा कर सिर झुका लेती है। उसे ऐसा था की बाबाजी उसका हाल-चाल पूछेंगे और धीरे-धीरे वह मुद्दे पे आयेंगे।
बाबाजी ने नरम लेकिन जिज्ञासु स्वर में कहा,
“कल रात मैंने गोपाल को बहुत अच्छे से समझा दिया था। मुझे पूरा विश्वास है कि उसने कोई गलती नहीं की होगी।” बाबाजी ने मयूरी को विशवास दिलाते हुए कहा।
मयूरी का चेहरा और गहरा लाल होता जा रहा था। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।
बाबाजी ने और पास खिसककर, उसके हाथ को थामते हुए पूछा,
“अब जल्दी से बताओ… उसने क्या किया? मेरे समझाने का कोई असर हुआ या नहीं?”
मयूरी ने बहुत देर तक नीचे देखा। फिर धीरे-धीरे, फुसफुसाती हुई आवाज़ में बोली,
“जी बाबाजी जी… आपके समझाने का असर हुआ था… उस पर भी… और मुझ पर भी। आपकी बात मानकर… मैंने कल रात गोपाल को बिना किसी आपत्ति के मेरे पास आने दिया…”
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Maitri Patel की प्रस्तुति।



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