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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
शेर का भरोसा जीतने के लिए उन्होंने अपनी आँखें फाड़ लीं और मुँह खोलकर खड़े हो गए, ताकि शेर को यही लगे कि वे पूरी तरह इस दृश्य के नशे में डूब चुके हैं।

 
इसके साथ ही, उनके दिमाग के एक कोने में सरताज का ख्याल कौंधा।"मुझे सरताज का साथ निभाना है... मुझे इस नीच की हर चाल नाकाम करनी है," उन्होंने खुद को याद दिलाने की कोशिश की।
 
लेकिन इन दोनों मुखौटों के पीछे उनका असली, भटकता और वासना से भरा मन इस कदर हावी हो चुका था कि वे चाहकर भी अपनी आँखें उस दृश्य से हटा नहीं पा रहे थे।
 
"हे भगवान... क्या रूप है इसका!" उनका भटकता मन अंदर ही अंदर चीख उठा और उनकी निगाहें मीरा के भीगे जिस्म पर पूरी तरह जम गईं।
 
नसों में दौड़ती वियाग्रा, रात की नीली फ़िल्मों की अश्लीलता और सामने बिखरे इस नंगे जिस्म के हुस्न ने 60 साल के उस 'साधु' के ईमान को पूरी तरह राख कर दिया था।
 
उनकी धोती के अंदर का लंड लोहे की छड़ की तरह ऐसा अकड़ा कि उनकी साँसें उखड़ गईं, और वे खुद को वासना के उस बहकते हुए दलदल में उतरने से रोक नहीं पाए।
चंदन (अपनी राल टपकाते हुए, आँखें फाड़े मन ही मन हांफकर बुदबुदाया): "उफ़्फ़... हे राम! शेर बिल्कुल सही कहता है... मीरा बिटिया तो सचमुच पूरी माल है! साला, बॉलीवुड की सारी हीरोइनें इसके सामने पानी भरेंगी! कल रात जो नीली फ़िल्मों में औरतें देखी थीं, वो तो इस बदन के आगे कुछ भी नहीं हैं... क्या उफान है इसके मम्मों में!"
 
चंदन बाबा के मुँह से 'बिटिया' शब्द निकला तो ज़रूर, पर अब उसमें कोई बाप वाला प्यार नहीं, बल्कि सिर्फ हवस की गंदी बू आ रही थी।
 
उधर दूर खड़ा शेर, चंदन के इस बदले हुए रूप और उनकी धोती के उभार को ताड़कर हँसी हँस रहा था। उसे समझ आ गया था कि बुड्ढा अब पूरी तरह से उसके रंग में रंग चुका है।
 
शेर (ज्योति की तरफ देखकर चिल्लाया): "ज्योति बेटी! पकड़ो अपनी मम्मा को... देखो भाग रही हैं!"
 
ज्योति बेफिक्री में हँसते हुए मीरा की तरफ झपटी। इसी बीच शेर ने पाइप का प्रेशर और तेज़ कर दिया और धार सीधे मीरा के भीगे हुए जिस्म पर मार दी। मीरा पानी से बचने के लिए तेज़ी से पीछे हटने लगी, पर ज्योति ने दौड़कर पीछे से उसका भीगा हुआ रोब कसकर पकड़ लिया।
 
खींचाताणी में भीगे कपड़े का दबाव बढ़ा और रोब पूरी तरह मीरा की बाँहों से छूटकर नीचे ज़मीन पर गिर गया। अब मीरा के बदन पर सिर्फ़ पानी से तर-बतर, पारदर्शी जैसी पतली सफेद स्लिप बची थी, जो उसके गोरे जिस्म से ऐसे चिपकी थी जैसे उसके ऊपर कोई कपड़ा ही न हो।
 
पानी की तेज़ बौछार से बदहवास होकर मीरा बिना देखे बागीचे के दूसरी तरफ भागी—जहाँ चंदन बाबा  खड़े थे। पानी के बहाव और गीली घास पर फिसलने की वजह से मीरा का संतुलन बिगड़ गया और वह सीधे जाकर चंदन बाबा से ज़ोरदार तरीके से टकरा गई!
 
धक्के का प्रभाव इतना तेज़ था कि चंदन बाबा खुद को संभाल नहीं पाए और पीठ के बल घास पर गिर पड़े, और मीरा सीधे उनके ऊपर आ गिरी।
 
नज़ारा पूरी तरह अश्लील हो चुका था।
 
मीरा का पानी में भीगा हुआ बदन पूरी तरह चंदन बाबा के सीने से चिपका हुआ था। पतली स्लिप के पार से उसके ठंडे पानी से अकड़े हुए, सख्त मम्मे सीधे चंदन बाबा की छाती पर बुरी तरह पिस रहे थे।
 
गिरते वक्त खुद को और मीरा को संभालने के चक्कर में चंदन बाबा के दोनों हाथ अपने आप मीरा के भीगे हुए शरीर पर चले गए—और उनकी चौड़ी हथेलियाँ सीधे मीरा की नंगी जैसी पानी से चिपकी गांड पर जाकर कस गईं!
 
चंदन बाबा के नथुने मीरा के भीगे हुए बालों और उसके गर्म-ठंडे जिस्म की महक से भर गए। उनके नीचे दबे कड़क अंग पर मीरा की जाँघों की रगड़ साफ़ महसूस हो रही थी। साठ साल के इस शरीफ़ और नेक इंसान का सारा संयम, सारे संस्कार उस एक सेकंड में डगमगाने लगे।
 
एक तरफ तो उनका मन इस पवित्र रिश्ते को बचाने की दुहाई दे रहा था, पर दूसरी तरफ एक ढलती उम्र के मर्द की दबी हुई हवस और वैद की दवा की आँच मीरा की कयामत जैसी सुंदरता के सामने घुटने टेक रही थी। वे चाहकर भी अपने हाथों को पीछे नहीं खींच पाए और उंगलियों का दबाव अपने आप बढ़ता चला गया।
 
उधर थोड़ी दूरी पर खड़ा शेर पाइप थामे ज़हरीली हँसी हँस रहा था। उसका बिछाया जाल पूरी तरह कामयाब हो चुका था—अब चंदन बाबा इस खेल के सीधे हिस्सेदार बनते दिख रहे थे।
 
मीरा के अकड़े हुए मम्मे जब उनकी छाती से बुरी तरह पिसे, तो वियाग्रा और नीली फ़िल्मों की भड़की हुई आग ने चंदन के दिमाग पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया। गिरते वक्त चंदन के हाथ बेखयाली में मीरा की गांड पर तो गए थे, लेकिन जैसे ही उनकी उंगलियों ने उस भीगी हुई सफेद पैंटी के पार से मीरा की सुडौल, भरी हुई गांड का मांसल कसाव महसूस किया, उनकी हथेलियों की पकड़ अनजाने में कसती चली गई।
 
चंदन बाबा ने मीरा की गांड को अपनी बड़ी हथेलियों से दबोच लिया। वे खुद को कोसते हुए भी उस अनचाहे, मादक सुख के रस में खिंचते चले जा रहे थे।
 
उधर दूर खड़ा शेर अपनी कामयाबी पर मन ही मन अट्टहास कर रहा था। उसने इस अश्लील पल को और भड़काने के लिए पाइप की तेज़ धार सीधी उन दोनों पर मार दी। अब ठंडा पानी चंदन बाबा और मीरा दोनों को बुरी तरह भिगो रहा था।
 
पानी के तेज़ बहाव और ज़मीन पर फिसलने की वजह से चंदन बाबा की सफेद धोती कमर से पूरी तरह खुल चुकी थी। उनकी काली, गठीली और बालों से भरी जाँघें पूरी तरह नंगी हो गई थीं और वे मीरा की गोरी, भीगी हुई नंगी चिकनी जाँघों के ठीक बीच में कसकर फँस चुकी थीं!
 
पानी की ठंडक और मीरा की सुडौल जाँघों के सीधे स्पर्श से चंदन बाबा के बदन में बिजली सी दौड़ गई। उनकी खुली हुई धोती के नीचे से उनका कड़क लंड मीरा के पानी से भीगे कपड़ों के पार उसकी जाँघों के बीच तेज़ी से रगड़ खाने लगा।
 
मीरा पानी की धार और अचानक हुए इस हादसे से इतनी बदहवास थी कि वह समझ ही नहीं पा रही थी कि नीचे उसके बाबा तुल्य चंदन के हाथ उसकी पैंटी को किस तरह दबोच रहे हैं, और उनकी गठीली जाँघें उसकी टांगों के बीच क्या महसूस कर रही हैं।
 
भीगे हुए पानी की बौछार के बीच जैसे ही चंदन बाबा ने नज़र उठाई, उनकी आँखें सीधे शेर से जा मिलीं। शेर चेहरे पर एक शैतानी, कमीनी मुस्कान लिए खड़ा था। उसने चंदन बाबा की तरफ देखा और आँख मारते हुए उंगलियों के इशारे से कहा— "और कस ले बाबा! दबा के मज़ा ले इस मौके का... अपने हाथ ऊपर खिसका और थोड़ा और सीने से सटा ले इस मालकिन को!"
 
शेर के इस उकसावे ने चंदन बाबा के भीतर सरताज के लिए जारी नाटक को असली हवस में बदल दिया। वे शेर को यह दिखाने के लिए भी आतुर थे कि वे उसके खेल में शामिल हैं, और साथ ही मीरा की नशीली देह के मोज़े ने उनकी शरीफ़ियत की बची-खुची डोर भी तोड़ दी।
 
चंदन बाबा की चौड़ी हथेलियाँ मीरा की भीगी पैंटी से सरकती हुई ऊपर की तरफ बढ़ीं। हाथों के इस बहाव के साथ मीरा की पतली, भीगी हुई सिल्क की स्लिप भी ऊपर खिंचने लगी, जिससे चंदन बाबा के हाथ सीधे उसकी नंगी, गोरी पीठ पर जा टिके।
 
चंदन बाबा (मन ही मन कामुकता में बेकाबू होते हुए): "अहह... क्या मखमली चमड़ी है! मीरा का यह जिस्म... आज तो भगवान ने खुद मेरे हाथों में सौंप दिया है।"
 
सामने का मंज़र बेहद कामुक हो चुका था—मीरा के सुडौल, पानी से नहाए मम्मे स्लिप के कपड़े से बाहर निकलकर बेपर्दा होने की कगार पर थे, और उनका कड़ाव सीधे चंदन बाबा की छाती पर पिस रहा था।
 
चंदन बाबा (मन ही मन हैवानियत भरी मुस्कान के साथ): "छू ले चंदन... आज कोई रोकने वाला नहीं है। सरताज तो समझेगा कि तू फर्ज़ निभा रहा है, और यह बेचारी समझ रही है कि यह सिर्फ़ एक हादसा है! क्या बेवकूफ़ बनाया है दोनों को!"
 
उधर यह सब देख रहे शेर के होठों पर एक दरिंदगी भरी मुस्कान फैल गई।
 
शेर (मन ही मन ढिठाई से हंसते हुए): "वाह बाबा वाह! बाहर से बड़ा साधु बनता है और अंदर बहती गंगा में हाथ धो रहा है! इस बूढ़े को तो वियाग्रा और हवस ने पूरी तरह अंधा कर दिया है।"
 
शेर (मन ही मन चटकाने वाले अंदाज़ में): "दबा बाबा, कसकर दबा! ते। अब तो तू मेरी उँगलियों पर नाचेगा!"
 
चंदन बाबा की गठीली जाँघ पूरी तरह मीरा की भीगी, गोरी और चिकनी जाँघों के बीच फँसी हुई थी।
 
मीरा ने घबराकर उठने की कोशिश की, "अरे... बाबा! मुझे उठने दीजिए..."
 
लेकिन चंदन बाबा ने अपने हाथ उसकी नंगी पीठ पर और कस दिए और ढोंग रचते हुए उसे वापस अपनी छाती पर खींच लिया।
 
चंदन (दिखावे के लिए चिंताजनक आवाज़ में बोला, पर हाथ उसकी पीठ पर कसता रहा): "अरे-अरे मीरा बिटिया! आराम से... संभल के! कहीं चोट तो नहीं आई न तुम्हें? कहीं फिसल न जाओ... रुक जाओ, मैं तुम्हें पकड़े हुए हूँ!"
 
शेर (दूर खड़ा होकर, पाइप की धार तेज़ करते हुए, मन ही मन अट्टहास करने लगा): "वाह रे मेरे साठ साल के भगत बुड्ढे! साला मुझसे भी बड़ा हवसी निकला! कैसे हाथों को नंगी पीठ पर फिरा रहा है और 'बिटिया-बिटिया' चिल्लाकर मम्मे अपनी छाती में पेले जा रहा है। अब आया न ऊँट पहाड़ के नीचे!"
 
मीरा बेबस होकर चंदन के ऊपर फँसी हुई थी, यह समझे बिना कि उसके बाबा का नकाब उतर चुका है और उनकी रगड़ खाती हुई जाँघें और नंगी पीठ पर सरकते हाथ किसी पिता के नहीं, बल्कि हुस्न के जाल में उलझे एक कामुक मर्द के हैं।
 
जैसे ही मीरा को अपनी हालत अंदाज़ा हुआ, उसके बदन में सिहरन दौड़ गई।
 
उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर चंदन बाबा के सीने पर हाथ रखा और धक्का देते हुए बोली, "चंदन बाबा, छोड़िए मुझे!"
 
चंदन बाबा का दिल तो नहीं मान रहा था और वे उसे अपनी छाती से ही चिपकाए रखना चाहते थे, पर बात बिगड़ते देख उन्हें ना चाहते हुए भी अपनी पकड़ ढीली करनी पड़ी।
 
जैसे ही मीरा झटके से चंदन बाबा के ऊपर से उठी, उसकी स्लिप ऊपर की तरफ खिसक गई। चंदन बाबा की हवस भरी आँखों के ठीक सामने मीरा के लगभग 75% नंगे, सुडौल और ठंडे पानी से अकड़े हुए मम्मे पूरी तरह बेपर्दा हो गए। हवा की ठंडक से उसके गुलाबी निप्पल साफ़ झलक रहे थे।
 
चंदन बाबा अभी इस नज़ारे को अपनी प्यासी आँखों से पी ही रहे थे कि तभी ज्योति खेल-खेल में मीरा के ऊपर आ गिरी। मीरा अपना संतुलन संभाल नहीं पाई और झटके से वापस नीचे गिरी, लेकिन इस बार चंदन बाबा के हाथ अनजाने में आगे फैले हुए थे।
 
जैसे ही मीरा उनके ऊपर गिरी, चंदन बाबा की हथेलियों में मीरा के वे दोनों लगभग नंगे मम्मे पूरी तरह भींच गए।
 
मीरा ने ज्योति पर चिल्लाते हुए कहा, "क्या कर रही हो बेटा, मुझे चोट लग जाएगी! ऊपर से उठो तुरंत!"
 
इधर चंदन बाबा, जिनके हाथों में मीरा के कसाब भरे मम्मे पहले ही दबे हुए थे, वे इस सुनहरे मौके को गंवाने वाले कहाँ थे। उन्होंने तुरंत इस मौके का पूरा फायदा उठाया। ज्योति का भार मीरा पर होने की आड़ में, चंदन बाबा ने अपनी हथेलियों में फँसे मीरा के उन गर्म और सुडौल मम्मों की नरमाई को पूरी शिद्दत से महसूस किया।
 
वासना से अंधे होकर उन्होंने अपनी पकड़ और मजबूत की और एक झटके में मीरा के दोनों मम्मों को कसकर ज़ोर से दबा दिया।
 
मीरा को अपने मम्मों पर चंदन बाबा के हाथों का दबाव साफ़ महसूस हुआ। जैसे ही उसने विरोध करने के लिए अपना मुँह खोला, चंदन बाबा ने फौरन कहा, "माफ़ करना मीरा बेटी... तुम खुद अचानक मेरे ऊपर आ गिरी हो!"
 
मुँह से तो वे माफ़ी माँग रहे थे, लेकिन उनके हाथ कुछ और ही कर रहे थे।
 
उन्होंने बेहद चालाकी भरे तरीक़े से मीरा की स्लिप को थोड़ा और किनारे खिसकाया और अपनी उँगलियों से उसके अकड़े हुए निप्पल को कसकर रगड़ दिया।
 
उस अचानक लगे तीखे स्पर्श और सिहरन से मीरा के मुँह से बेसाख्ता एक सिसकारी निकल गई, "आह!"
 
ज्योति ने इस एक मज़ेदार खेल समझा और मीरा की बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया। वह हंसती हुई मीरा के ऊपर ही जमी रही, जिससे मीरा नीचे पूरी तरह असहाय होकर दबी रह गई।
 
मीरा के लिए इस वक्त हिले बिना हटना लगभग नामुमकिन हो चुका था। ऊपर से ज्योति का वज़न था और नीचे चंदन बाबा का शरीर, जिनकी नियत फिर चुकी थी।
 
चंदन बाबा ने ज्योति के ऊपर बैठे रहने का पूरा फ़ायदा उठाया। उन्होंने अपनी उँगलियों की पकड़ मीरा की छाती पर और गहरी कर दी।
 
"बेटी ज्योति, ज़रा संभलो... मीरा बिटिया को चोट लग जाएगी," चंदन बाबा ने मुँह से तो ज्योति को हटाने का ढोंग किया, लेकिन नीचे उनके हाथ मीरा के दोनों मम्मों को अपनी हथेलियों में पूरी तरह सहला रहे थे।
 
वे यह सब इतने चालाक अंदाज़ से कर रहे थे ताकि मीरा को यही लगे कि यह सब सिर्फ़ अनजाने में और संतुलन खोने की वजह से हो रहा है।
 
मीरा (मन ही मन घबराते हुए, चेहरे पर शर्म और बेबसी के रंग लिए): "हे भगवान... यह क्या हो रहा है!"
 
उसका चेहरा लाल पड़ चुका था। वह अब तक यही समझ रही थी कि बाबा का यह स्पर्श महज़ अनजाने में हुआ एक हादसा है।
 
मीरा (खुद को तसल्ली देते हुए, झिझकती साँसों में): "नहीं... बाबा ऐसा नहीं कर सकते। मैं ही तो उनके ऊपर आ गिरी हूँ..."
 
हालांकि उनकी उँगलियों का हर दबाव, निप्पल पर उनके अँगूठे की हल्की मालिश और अपनी छाती से टकराता हुआ उनका अकड़ा हुआ लंड—सब कुछ उसे महसूस हो रहा था, लेकिन वह खुद को यही समझा रही थी कि यह सब इस विकट परिस्थिति का ही एक हिस्सा है, क्योंकि आख़िरकार वही तो संतुलन खोकर बाबा के ऊपर गिरी थी।
 
मीरा (धीमी, कांपती फुसफुसाहट में): "बाबा... ज़रा हटिए ना..."
 
लेकिन चंदन बाबा पर तो वियाग्रा और हवस का भूत पूरी तरह सवार था। वे अपनी उँगलियों को मीरा की स्लिप के अंदर सरकाते हुए उसके नंगे, गर्म वक्षस्थल की त्वचा को सीधे सहलाने लगे।
 
ज्योति के ऊपर होने का बहाना बनाकर वे खुद को थोड़ा और ऊपर खिसकाते गए, जिससे उनका कड़क लंड मीरा की भीगी नाभि से रगड़ खाता हुआ सीधा उसकी पेट की निचली त्वचा पर दबाव बनाने लगा।
 
चंदन बाबा (मासूमियत का नाटक करते हुए): "मीरा बेटी... मैं कैसे हटूँ? मेरे ऊपर तो तुम और ज्योति दोनों चढ़ी हुई हो! जब तुम ऊपर से हटोगी, तभी तो मैं भी उठ पाऊँगा..."
 
मुँह से तो वे अपनी बेबसी जता रहे थे, लेकिन नीचे उनके हाथ मीरा के नंगे मम्मों को मरोड़ने में लगे थे और उनकी कमर का हल्का दबाव मीरा की पेट की निचली त्वचा पर उनके कड़क लंड की मौजूदगी को साफ़ बयाँ कर रहा था।
 
मीरा की सहनशक्ति की अब इंतहा हो चुकी थी।
 
मीरा (ग़ुस्से में तमतमाते चेहरे के साथ, ज्योति पर चिल्लाते हुए): "बेटा! आपको सुनाई नहीं देता मैं इतनी देर से क्या कह रही हूँ?! इस वक्त मेरे ऊपर से हटो, तुरंत!"
 
ज्योति अपनी माँ की ऐसी कड़क, तीखी और ग़ुस्से से भरी आवाज़ सुनकर बुरी तरह डर गई। उसकी हंसी हवा में ही गायब हो गई।
 
ज्योति (सहमी हुई आवाज़ में): "म... मम्मी... सॉरी..."
 
ज्योति डर के मारे झटके से मीरा के ऊपर से नीचे उतर गई और एक तरफ हटकर खड़ी हो गई।
 
रास्ता साफ होते ही, मीरा ने अपनी पूरी ताकत लगाई और चंदन बाबा की छाती पर हाथ रखकर खुद को उनके ऊपर से झटके से उठाया। पर उस अचानक लगे झटके की वजह से मीरा की खिसकी हुई स्लिप और नीचे सरक गई, और उसके दोनों सुडौल मम्मे छलककर स्लिप के बाहर बेपर्दा हो गए।
 
मीरा (हाफ़ते हुए, बेबसी और घबराहट में अपने भीगे कपड़ों को संभालने की कोशिश करते हुए): "हे भगवान..."
 
चंदन बाबा के हाथों से मीरा के गर्म मम्मे भले ही छूट गए थे, लेकिन उनकी भूखी आँखें लगातार इस कामुक नज़ारे को पी रही थीं।
 
चंदन बाबा (नज़रें चुराने का नाटक करते हुए, पर आँखें मीरा के मम्मों पर ही टिकाए हकलाकर बोले): "अरे... अरे मीरा बिटिया! अपने... अपने कपड़े ठीक करो! कहीं... कहीं किसी की नज़र न पड़ जाए..."
 
यह सुनते ही मीरा का चेहरा शर्म और अपमान से लाल-सुर्ख हो गया।
 
मीरा (झटके से अपने दोनों हाथों से सीने को ढकते हुए, सहमी और शर्मिंदा आवाज़ में): "अहह... जी... जी बाबा..."
 
उसने तुरंत स्लिप को ऊपर खींचने की नाकाम कोशिश की, लेकिन भीगी हुई पतली सिल्क की स्लिप तो अब बस नाम की ही बची थी—उसका पारदर्शी कपड़ा और उभरे हुए गुलाबी निप्पल उसकी देह का हर राज़ साफ़ बयाँ कर रहे थे।
 
वह एक पल भी वहाँ रुकना बर्दाश्त नहीं कर सकी और घबराकर, बिना पीछे मुड़े, भागते हुए कोठी के मुख्य दरवाज़े की तरफ चली गई।
 
यह सब देख रहे शेर ने तुरंत मौका ताड़ा। उसने दूर से ही चंदन बाबा की तरफ देखा, एक कमीनी आँख मारी और हाथ से इशारे में जताया कि 'क्या काम किया है बाबा!'
 
शेर (चंदन से फुसफुसाकर बोला): "बाबा, आप ज्योति बेटी को संभालो और इसके साथ खेलो... मैं जरा मालकिन को तौलिया देने अंदर जाता हूँ!"
 
इतना कहकर शेर ने पाइप को ज़मीन पर फेंका और दबे पाँव, भीगी मीरा के पीछे-पीछे मुख्य कोठी के अंदर भाग गया।
Deepak Kapoor
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RE: सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance - by Deepak.kapoor - 18-09-2026, 05:15 AM



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