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Misc. Erotica सम्मान और बदला: Hindi Version Of Honor and Vengeance
नया मोड़ —5

 
जैसे ही शेर किसी काम से बाहर गया और चंदन बाबा को मौका मिला, उन्होंने तुरंत बेसिन का नल खोलकर बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। बहते पानी की सरसराहट के बीच, कांपते हाथों और उखड़ी हुई साँसों के साथ उन्होंने जेब से फोन निकालकर सरताज का नंबर मिलाया।
 
दूसरी तरफ जैसे ही सरताज ने कॉल उठाई, चंदन बाबा की आवाज़ कांप रही थी।
 
चंदन बाबा (कांपती आवाज़ में): "सरताज... बेटा, मैं बहुत बड़े धर्मसंकट में फँस गया हूँ! मेरा मन निरंतर बेचैन हो रहा है। यह शेर जितना हम सोच रहे थे, उससे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक इंसान है।"
 
सरताज की रीढ़ में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई।
 
सरताज (अत्यंत गंभीरता और चिंता के साथ): "बाबा, पहले आप खुद को संभालिए। शांत होकर बताइए, आख़िर ऐसा क्या हुआ?"
 
चंदन बाबा ने भारी झिझक, घबराहट और आत्म-ग्लानि के साथ अपनी ज़ुबान खोली।
 
उनका गला पूरी तरह सूख रहा था और छाती में सांसें अटक रही थीं। अपनी ही बहू-बेटी समान मीरा के प्रति कहे गए उन घिनौने शब्दों को दोहराना—वह भी सरताज के सामने, जो उसका पति है—उनके लिए एक अत्यंत कठिन काम था।
 
चंदन बाबा (अत्यंत संकोच और हकलाते हुए): "सरताज... वह... वह नीच, अधर्मी शेर मीरा बिटिया से सिर्फ़ आकर्षित नहीं है, उसके दिल में मीरा के लिए अंधी नफ़रत भरी पड़ी है। वह... वह बेझिझक कह रहा था कि वह मीरा को पूरी तरह अपनी रखैल बनाकर छोड़ेगा। उसकी हवस की कोई सीमा नहीं है बेटा... इतना ही नहीं..."
 
चंदन बाबा की आवाज़ में एक अजीब-सा सन्नाटा छा गया। वे ज़ोर-ज़ोर से हांफने लगे।
 
सरताज (उतावलेपन और बढ़ती घबराहट में): "बाबा! रुकिए मत, साफ़-साफ़ बताइए और क्या कहा उस दंभी ने? वह मीरा के साथ और क्या साज़िश रच रहा है?"
 
चंदन बाबा (आँखों से बहते आँसुओं को पोंछते हुए, घुटती हुई आवाज़ में): "बेटा... वह हैवान कह रहा था कि वह सिर्फ़ मीरा की देह का सुख नहीं छीनेगा।"
 
सरताज फोन को कसकर भींचे खामोश रहा, उसकी सांसों की गर्माहट फोन के स्पीकर पर साफ़ सुनाई दे रही थी।
 
चंदन बाबा (आगे बोले): "वह उसके स्वाभिमान और चरित्र को पूरी तरह तार-तार करके रख देना चाहता है।"
 
सरताज (दाँत पीसते हुए, भारी आवाज़ में): "और क्या कह रहा था वह, बाबा?"
 
चंदन बाबा (कांपते हुए): "वह... वह कह रहा था कि वह मीरा के जिस्म पर अपनी मुहर लगाएगा। ऐसी मुहर, कि वह दुनिया के सामने कभी अपना सर न उठा सके।"
 
सरताज की आँखों में खून उतर आया, लेकिन उसने खुद पर काबू रखते हुए कहा, "हूँ... आप बोलते रहिए बाबा, मैं सुन रहा हूँ।"
 
चंदन बाबा (सिसकते हुए): "उसका मक़सद सिर्फ़ उसकी देह को पाना नहीं है बेटा... वह तो उसके पूरे वजूद को मटियामेट कर देना चाहता है!"
 
सरताज के हाथ में पकड़ा हुआ फोन कसता चला गया, उसकी उँगलियों के जोड़ सफ़ेद पड़ गए और आँखों में लाल डोरे उतर आए। उसकी धमनियों में ख़ून उबलने लगा।
 
सरताज (दाँत पीसते हुए, बेहद कठोर आवाज़ में): "उस नीच दरिंदे की यह दुस्साहस! बाबा, आप बस एक बात का ध्यान रखिए—क्या उसे ज़रा भी भनक लगी है कि आप मुझसे संपर्क में हैं? या फिर उसने यह सब बातें आपके सामने महज़ अपना ख़ौफ़ और धौंस जमाने के लिए कही हैं?"
 
चंदन बाबा (डर से कांपते हुए बाथरूम के दरवाज़े की तरफ़ देखते हुए): "नहीं बेटा, उसे मुझ पर पूरा भरोसा है कि मैं उसका वफ़ादार बन चुका हूँ। लेकिन उसकी बातें सुनकर मेरी रूह कांप उठी है।"
 
चंदन बाबा की आवाज़ शर्म और आत्म-ग्लानि से दब गई, पर उन्होंने खुद को सँभालते हुए आगे बताना शुरू किया।
 
चंदन बाबा (सिसकते हुए): "बेटा... उसने मुझे अपनी तरफ़ करने के लिए मीरा की सोई हुई हालत की कुछ बेहद बेपर्दा तस्वीरें दिखाईं..."
 
सरताज के सीने में मानो आग सी जल उठी, उसने अपनी मुट्ठियाँ भींचते हुए कहा, "बेपर्दा तस्वीरें?
 
चंदन बाबा (हकलाते हुए, गला रूँध जाता है): "और... और मुझसे कहा कि वह मुझे भी उसके साथ... उस घिनौने काम में शामिल करेगा..."
 
सरताज (अत्यंत कठोर और ठंडे स्वर में): "और?"
 
चंदन बाबा (कांपती आवाज़ में): "उसकी शर्त है कि जब यह सब हो... तो मैं उसे 'मीरा बिटिया' कहकर ही पुकारूँ। सरताज... उसके दिमाग में कोई भयंकर इंतकाम की आग जल रही है!"
 
सरताज फोन की दूसरी तरफ बिल्कुल शांत रहा, लेकिन  आँखें गुस्से से लाल हो गईं। उसकी धमनियों में खून खौल रहा था। अगर इस वक्त शेर उसके सामने आ जाता, तो सरताज बिना एक पल गँवाए अपने नंगे हाथों से उसके जिस्म के हज़ार टुकड़े कर देता।
सरताज (अत्यंत शांत लेकिन गहरे लहज़े में): "बाबा, आपने बहुत हिम्मत का काम किया है जो यह सब सहकर भी उससे इतनी बातें निकलवा लीं।"
 
चंदन बाबा (फोन पर हल्की राहत की साँस लेते हुए): "बस बेटा... जैसे-तैसे खुद को संभाले हुए हूँ।"
 
सरताज (गंभीरता से): "हमें सबसे पहले यह जानना होगा कि आख़िर वह मीरा से इतनी अंधी नफ़रत क्यों करता है।"
 
चंदन बाबा (सहमते हुए): "हाँ बेटा, उसकी नफ़रत के पीछे कोई बहुत पुरानी वजह लगती है।"
 
सरताज (आगे हिदायत देते हुए): "अगली बार जब वह आपसे बात करे, तो यह पता करने की कोशिश कीजिएगा कि क्या वह मुझसे भी उतनी ही नफ़रत करता है... या मुझसे उसकी दुश्मनी उससे भी ज़्यादा है।"
 
चंदन बाबा (कांपती आवाज़ में): "ठीक है बेटा... मैं पूरी कोशिश करूँगा।"
 
सरताज (धीमे पर बेहद सधे हुए स्वर में): "आप बस उसके सामने अपना नाटक जारी रखिए और खुद को बिल्कुल टूटने मत दीजिए। मैं बहुत जल्द उस नीच की पूरी कुंडली निकालकर सब कुछ पता लगाता हूँ।"
 
सरताज ने फिर कुछ क्षण सोचते हुए कहा, "बाबा, क्या आप मुझे मीरा की वे तस्वीरें भेज सकते हैं?"
 
चंदन बाबा ने कांपते हाथों से व्हाट्सएप के ज़रिए वे तस्वीरें सरताज को भेज दीं। फिर कुछ देर गहरा विचार करने के बाद, उन्होंने भारी मन से सरताज से कहा।
 
चंदन बाबा (फोन पर भारी ग्लानि और संकोच से भरी आवाज़ में): "सरताज बेटा, एक और ज़रूरी बात है..."
सरताज (धीमी आवाज़ में): "बोलिए बाबा, मैं सुन रहा हूँ।"
 
चंदन बाबा (झिझकते हुए): "उस दरिंदे का विश्वास पूरी तरह जीतने के लिए... मुझे उसका साथ निभाते वक्त मीरा बिटिया के लिए बहुत गलत और ओछे शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।"
 
सरताज फोन के दूसरी तरफ बिल्कुल खामोश रहा, पर चंदन बाबा ने अपनी बात जारी रखी।
 
चंदन बाबा (कांपती आवाज़ में): "तभी वह मुझे पूरी तरह अपना समझेगा, और मैं उन तस्वीरों के बहाने उसके और राज़ उगलवा पाऊँगा।"
 
चंदन बाबा (गला रूँधते हुए): "आज भी उसने मुझे वे तस्वीरें दिखाते हुए कहा कि वह मीरा बिटिया के साथ क्या-क्या करेगा... और बेटा, मुझे उस वक्त अपना रोल निभाने के लिए... खुद अपने मुँह से बहुत ही गंदे और घिनौने शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ा।"
 
सरताज (गहरी साँस लेते हुए): "आप पर क्या बीत रही है, मैं समझ सकता हूँ बाबा..."
 
बाबा थोड़ा रुके, अपनी शर्म और ग्लानि के घूँट को पीते हुए आगे बोले।
 
चंदन बाबा: "एक और बात मैंने गौर की है सरताज... वह तेरे नाम से ज़रा भी नहीं डरता।"
 
सरताज (चौंकते हुए): "मेरे नाम से भी नहीं? यानी उसे सिक्युरिटी का या मेरा कोई ख़ौफ़ नहीं है?"
 
चंदन बाबा (गंभीरता से): "बिलकुल नहीं! इसका सीधा मतलब यही है कि उसके पास मीरा की इन तस्वीरों के अलावा भी कोई बहुत बड़ा 'लीवरेज' है, जिसके दम पर वह इतना बेखौफ़ घूम रहा है।"
 
सरताज (दाँत पीसते हुए): "हुँह... बात तो आपकी सही है बाबा। उस नीच के पास यकीनन कोई और बड़ा मोहरा है।"
चंदन बाबा (कांपती और शर्मिंदा आवाज़ में): "पर बेटा... उस दरिंदे को झांसा देने के लिए, शायद मुझे अपनी मर्यादा की हर सीमा को लांघना पड़े। अनचाहे ही सही, पर मेरे मुँह से मीरा बिटिया के लिए बहुत घिनौने शब्द निकलेंगे।"
 
सरताज (शांत रहते हुए): "आप घबराइए मत बाबा, आप आगे बोलिए..."
 
चंदन बाबा (अत्यंत घबराए और गिड़गिड़ाते हुए स्वर में): "सरताज... बात सिर्फ़ शब्दों तक रहे तो ठीक है, पर हो सकता है कि वह हैवान मेरा इम्तिहान लेने या अपना विश्वास पक्का करने के लिए... मुझे मीरा बिटिया को ग़लत तरीक़े से छूने के लिए भी कहे! अब तू ही बता बेटा, तेरा यह बाबा क्या करे?"
 
सरताज ने फोन हाथ में थामे कुछ पलों के लिए गहरी ख़ामोशी साधे रखी। उसका तेज़ तर्रार आईपीएस दिमाग़ तेज़ी से हर पहलू, ख़तरे और चाल का आकलन कर रहा था।
 
वह अच्छी तरह समझ गया था कि अगर शेर का भरोसा पूरी तरह जीतना है, तो चंदन बाबा को इस घिनौने खेल में पूरी तरह डूबने का नाटक करना ही पड़ेगा।
 
शेर के पास तस्वीरों से भी बढ़कर कोई बहुत बड़ा 'लीवरेज' था, और उस आख़िरी और सबसे बड़े राज़ तक पहुँचने का इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
 
सरताज ने एक गहरी साँस छोड़ी और बेहद गंभीर आवाज़ में बोला, "बाबा... आप जो कह रहे हैं, मैं सब समझ रहा हूँ। यह राह बेहद कठिन है और आपकी मर्यादा, चरित्र तथा आत्मबल की सबसे बड़ी परीक्षा लेगी, लेकिन इस वक्त हमारे पास और कोई चारा नहीं है। मेरी तरफ से आपको इस नाटक को आगे बढ़ाने की पूरी इजाज़त है।"
 
फोन की दूसरी तरफ चंदन बाबा ने राहत की एक मिली-जुली साँस ली।
 
सरताज (हिदायत देते हुए, सधी आवाज़ में): "बाबा, आप शेर के सामने वही बनिए जो वह आपको देखना चाहता है।"
चंदन बाबा (फोन पर भारी मन से सुनत हुए): "हाँ बेटा..."
 
सरताज: "अगर उसके सामने मीरा के लिए ग़लत शब्द भी बोलने पड़ें, तो बिल्कुल मत झिझकिए।"
 
चंदन बाबा (हिचकिचाते हुए): "पर बेटा, मेरी ज़ुबान..."
 
सरताज (टोकते हुए, गंभीर स्वर में): "आपको यह कड़वा घूँट पीना ही होगा बाबा। हमें हर हाल में यह जानना है कि इन तस्वीरों के अलावा उस नीच के हाथ में ऐसा कौन सा ब्लैकमेलिंग का हथियार है, जिसके दम पर वह इतना बेखौफ़ घूम रहा है।"
 
चंदन बाबा (कांपती सांस छोड़ते हुए): "समझ गया बेटा।"
 
सरताज (ताकीद करते हुए): "बस अपने मन पर काबू रखिएगा, अपनी नीयत को किसी भी हाल में डगमगाने मत दीजिएगा... और शेर की हर छोटी-बड़ी हरकत की ख़बर मुझ तक पहुँचाते रहिएगा।"
 
चंदन बाबा ने कांपते हाथों से कॉल काटी और फोन बंद कर लिया।
 
सरताज की तरफ से हरी झंडी तो मिल चुकी थी, लेकिन अब उनके सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट खड़ा था—कि इस ख़तरनाक नाटक को निभाते-निभाते, कहीं उनका अपना भटकता हुआ मन सचमुच पाप की उस दलदल में पूरी तरह न डूब जाए।
 
 
 
कॉल कटने के बाद, सरताज ने अपने फोन की स्क्रीन पर उभरी उन तस्वीरों को ध्यान से देखना शुरू किया।
 
पहली नज़र में तो सिर्फ़ इतना ही दिख रहा था कि मीरा बेखबर सो रही है। लेकिन जब सरताज ने ज़ूम करके बैकग्राउंड को करीब से देखा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। तस्वीरों में नज़र आ रही दीवारें, पर्दों की सलवटें और नाइटस्टैंड—सब कुछ उसी के अपने बेडरूम का था!
 
उसकी निगाहें अब मीरा के कपड़ों पर टिक गईं। एक गहरा झटका उसके ज़हन में लगा—यह वही नाइटी थी जो मीरा ने ठीक दो रात पहले पहनी थी! वही रात, जब आधी रात को अचानक इमरजेंसी ड्यूटी की वजह से उसे घर छोड़कर जाना पड़ा था।
 
इसका सीधा मतलब यह था कि सरताज के घर से निकलते ही, आधी रात के सन्नाटे में शेर उसके बेडरूम में दाखिल हुआ था।
 
सरताज का माथा भिनभिना उठा।
 
कई ज़हरीले सवाल एक साथ उसके दिमाग में कौंधने लगे—क्या उस दरिंदे ने सिर्फ़ तस्वीरें खींचकर ही दम लिया? क्या उसके पास इससे भी ज़्यादा आपत्तिजनक और बेपर्दा तस्वीरें हैं?
 
 या फिर... उसने सोई हुई मीरा के साथ तस्वीरों से भी ज़्यादा कुछ खौफनाक और घिनौना किया था?
 
लेकिन मीरा... मीरा तो पिछले दो दिनों से बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रही थी। क्या इसका मतलब यह था कि वह इस पूरी वारदात से पूरी तरह बेखबर थी? क्या उसे भनक तक नहीं लगी कि कोई उसकी आबरू पर डाका डालकर चला गया?
 
तस्वीरों को और ध्यान से देखते हुए, सरताज को अब चंदन बाबा के धर्मसंकट की गहराई का पूरी तरह अहसास हुआ। इस उम्र में बाबा को अपनी ही बहू-बेटी समान मीरा की ऐसी बेपर्दा और आपत्तिजनक तस्वीरें देखने पर मजबूर किया जा रहा था, और ऊपर से उस दरिंदे द्वारा उनसे पूछा जा रहा था कि वे उसके साथ क्या-क्या करना चाहेंगे!
 
क्या शेर बाबा के मन को पूरी तरह भ्रष्ट करने की साज़िश रच रहा था?
या फिर उसे बाबा पर शक था और वह इसे एक इम्तिहान की तरह इस्तेमाल कर रहा था?
 
यह सब सोचते-सोचते सरताज का दिमाग फटने लगा था।
 
"वह मेरे आईपीएस के रुतबे से भी नहीं डरता... उसके पास यकीनन कुछ ऐसा ठोस 'लीवरेज' है, जिसके दम पर वह इतना बेखौफ़ होकर मेरे ही घर में सेंध लगा रहा है!" सरताज ने दाँत पीसते हुए खुद से कहा।
 
कुछ पल गहरा विचार करने के बाद, उसने तुरंत अपना फोन उठाया और अपने खास मुखबिरों को शेर की पूरी बैकग्राउंड जाँच करने का हुक्म दिया।
 
साथ ही, उसने शेर के फोन कॉल्स को सर्विलांस पर डालने के निर्देश दिए।
 
इसके तुरंत बाद, उसने साइबर क्राइम यूनिट में तैनात अपने एक बेहद भरोसेमंद दोस्त को कॉल मिलाया। उसने शेर का फोन हैक करके उसके अंदर का सारा प्राइवेट डेटा, तस्वीरें और चैट निकालने को कहा। सरताज ने साफ़ ताकीद की कि यह काम पूरी तरह अनऑफिशियल होना चाहिए—वह खुद उस सारे डेटा की जाँच करना चाहता था।
 
सरताज चाहता तो एक आईपीएस अफसर होने के नाते शेर को चुटकी बजाते ही उठवा सकता था और इस ज़मीन से हमेशा-हमेशा के लिए गायब करवा सकता था।
 
लेकिन उसका हाथ एक खौफनाक डर ने रोक रखा था। अगर शेर के पीछे कोई पूरा गिरोह काम कर रहा हुआ? अगर उसके साथियों के पास मीरा की इससे भी ज़्यादा आपत्तिजनक तस्वीरें या वीडियो हुए और शेर के गायब होते ही उन्होंने उसे इंटरनेट पर अपलोड कर दिया तो?
 
मीरा और उसकी मासूम ज्योति की ज़िंदगी तो जीते-जी तबाह हो जाएगी! वह अपनी साख और मीरा की इज़्ज़त के साथ ऐसा कोई रिस्क नहीं ले सकता था।
 
कोई भी अंतिम कदम उठाने से पहले, उसे इस पूरी साज़िश की तह तक पहुँचना ही होगा।
 
 
कॉल कटने के बाद चंदन बाबा के मन को क्षणभर के लिए राहत तो मिली।
 
उनके हाथ में फोन था और स्क्रीन पर मीरा की वे तस्वीरें जस की तस खुली हुई थीं।
 
वे खुद को रोक नहीं पाए। नज़रों को फेरने की तमाम नाकाम कोशिशों के बावजूद, उनकी आँखें वापस फोन की स्क्रीन पर जा टिकीं।
 
वॉयग्रा की तेज़ दवा का असर उनके ख़ून में पहले से ही उफान मार रहा था। जैसे ही उनकी निगाहें सोई हुई मीरा की बेपर्दा तस्वीरों पर पड़ीं, उनके शरीर के भीतर वासना की एक भयंकर लहर दौड़ गई। उनका लंड पल भर में फिर से पत्थर की तरह सख्त और बेकाबू हो गया।
 
चंदन बाबा की नीयत पूरी तरह डगमगाने लगी। उनके अधरों से एक हल्की, कामुक आह निकली।
 
"हाय... कितनी ख़ूबसूरत है मीरा बिटिया..." उन्होंने तस्वीरों पर उँगलियाँ फेरते हुए मन ही मन कहा।
 
उनकी निगाहें मीरा के सुडौल जिस्म, उसकी खुली हुई गोरी जाँघों और नाईटी के ढीले गले से झांकते हुए  वक्षस्थल पर जाकर अटक गईं। "क्या जाँघें हैं... क्या उभार हैं... जिस्म का एक-एक अंग।"
 
अब तक जो डर और संकोच उनके मन में धर्मसंकट बनकर बैठा था, वह सरताज की ज़ुबानी 'हरी झंडी' मिलते ही एक ख़तरनाक लालच में बदलने लगा। उनके भीतर छिपे वासना के भेड़िया ने अचानक से अपने पंजे फैला लिए।
 
"अब तो सरताज ने खुद मुझे छूट दे दी है..." चंदन बाबा की आँखों में एक चमक तैरने लगी।
उनकी नज़रें फोन की स्क्रीन पर चिपकी मीरा की तस्वीर पर गड़ गईं, जहाँ उनका हाथ बेकाबू होकर फिर से चलने लगा।
 
"अब तो मैं मीरा बिटिया को बेझिझक छू भी सकता हूँ..." उन्होंने एक गहरी, वासनाभरी साँस खींचते हुए खुद से कहा। "...उसके इस मखमली जिस्म का मज़ा ले सकता हूँ!"
 
वे अपने ही दिमाग में बुने जा रहे इस नापाक जाल की बारीकियों को सोचकर मन ही मन मुस्कुराने लगे।
 
"और अगर... अगर मीरा को कभी ज़रा भी शक हुआ भी," उनके अधरों पर एक मुस्कान उभरी, "या उसने रो-धोकर सरताज से मेरी शिकायत भी कर दी..."
 
उन्होंने एक पल का विराम लिया, और उनकी आँखों में एक चालाक और विकृत ऐंठन आ गई।
 
"...तो भी सरताज यही समझेगा कि यह सब तो मैंने सिर्फ़ शेर का भरोसा जीतने और उसके राज़ उगलवाने के लिए किया है!"
 
चंदन बाबा ने एक संतोषभरी, कुटिल साँस छोड़ी।
 
"सरताज कभी मुझ पर शक नहीं करेगा... वह तो उल्टे मेरी इस नीचता को मेरा त्याग समझेगा!"
 
इस विचार के दिमाग में आते ही चंदन बाबा के चेहरे पर एक मुस्कान फैल गई। मर्यादा और पाप के बीच की बारीक लकीर उनके लिए हमेशा-हमेशा के लिए मिट चुकी थी।
 
शेर के सामने नाटक करने का जो बहाना उन्हें मिला था, वह अब उनकी अपनी हवस को पूरा करने का सबसे बड़ा और महफ़ूज़ ढाल बन चुका था।
 
तस्वीर में दिख रहे मीरा के मखमली जिस्म को टकटकी लगाए देखते हुए चंदन बाबा का हाथ बेकाबू होकर अपनी लँगोट के भीतर चला गया।
 
हवस और वॉयग्रा के मिले-जुले असर में अंधे होकर वे तेज़ी से अपना हाथ चलाने लगे। कमरे में नल के बहते पानी की सरसराहट के बीच उनकी उखड़ी हुई सांसें और भी भारी होती चली गईं।
 
"मीरा बिटिया... अहा, मीरा बिटिया..."
 
ज़ुबान से घिनौने रसीले बोल निकालते हुए, अपनी ही बहू-बेटी समान मीरा का नाम ले-लेकर उन्होंने खुद को शांत किया। वासना का वह अंधा उफान जैसे ही चरम पर पहुँचकर ठंडा पड़ा, उनका शरीर ढीला पड़ गया और वे हाँफते हुए बाथरूम की दीवार से टिक गए।
 
लेकिन अगली ही छण, जैसे ही दिमागी धुंध छँटी, चंदन बाबा पर अपराधबोध का एक पहाड़ टूट पड़ा। अपने ही हाथों पर लगे उस पाप के चिपचिपे अहसास को देखकर उनकी रूह कांप उठी।
 
"हे भगवान! यह मैंने क्या कर दिया? मैं किस नीचता पर उतर आया हूँ?" उन्होंने कांपते हाथों से तुरंत अपना चेहरा धोया, मानो पानी उनके भीतर के पाप को बहा देगा।
 
उनका मन भारी आत्म-ग्लानि और शर्म से भर गया। वे घुटनों के बल बैठकर अपनी ही हथेली को धिक्कारने लगे।
 
किस मुसीबत में फँस गए हैं वे? एक तरफ शेर उन्हें अपनी उँगलियों पर नचा रहा था, और दूसरी तरफ उनकी अपनी ही सोई हुई वासना उन्हें जानवर बना रही थी। क्या से क्या बनते जा रहे थे वे? एक बुजुर्ग बाबा से गिरकर एक बदनीयत इंसान?
 
सरताज और मीरा का चेहरा उनकी बंद आँखों के सामने घूमने लगा। सरताज ने उन्हें अपने पिता जैसा मान दिया था, अपने घर में शरण दी थी, और मीरा बिटिया... जिसने हमेशा एक बेटी की तरह उनकी सेवा की, उनके खाने-पीने का ध्यान रखा, कभी कोई कमी नहीं होने दी। उन दोनों के कितने अहसान थे उन पर! और वे क्या सोच रहे थे? सरताज के दिए भरोसे का इस्तेमाल वे अपनी हवस मिटाने के लिए करने की बात सोच रहे थे?
 
"छिः! रे चंदन... तू तो शेर से भी बड़ा दरिंदा निकला!" चंदन बाबा ने खुद के गाल पर एक थप्पड़ जड़ा।
 
उनकी आँखों से पछतावे के आँसू बह निकले। वे समझ गए थे कि अगर उन्होंने अपने मन के इस शैतान पर तुरंत काबू नहीं पाया, तो शेर का शिकार बनने से पहले वे खुद अपनी ही नज़रों में पूरी तरह तबाह हो जाएँगे।
 
 
आज ज्योति की कॉलेज की छुट्टी थी। नाश्ता करने के बाद वह और मीरा कोठी के बागीचे के पास टहल रही थीं।
 
मीरा ने सफेद रंग का सिल्क रोब पहन रखा था, जिसके नीचे हल्की सफेद स्लिप झलक रही थी। जैसे-जैसे मीरा बेफिक्र होकर कदम बढ़ा रही थी, रोब के अंदर उसके सुडौल मम्मों की चाल और उभार में एक अजीब सा लचीलापन था।
 
दूर खड़े शेर ने अपनी पारखी निगाहों से देखते ही अंदाज़ा लगा लिया।
 
शेर (मन ही मन बड़बड़ाया): "उफ़्फ़ मादरचोद... आज तो मालकिन बिना ब्रा के ही घूम रही हैं! रोब के नीचे मम्मे कैसे आज़ाद होकर उछल रहे हैं। और अंदर की पैंटी... ज़रूर या तो काली होगी या फिर सफ़ेद! क्या माल लग रही है साली सुबह-सुबह!"
 
इसी बीच, शेर ने बड़ी चालाकी से सुबह की चाय में वैद की वियाग्रा की आधी खुराक और घोलकर चंदन बाबा को पिला दी थी।
 
दवा की नई खुराक पेट में जाते ही और हनुमान चालीसा का असर खत्म होते ही, चंदन बाबा की आँखें भटकने लगीं। वे बागीचे के दूसरे कोने में झाड़ियों के पास खड़े होकर मीरा की तरफ देखने लगे।
 
शेर ने जब चंदन बाबा की तरफ देखा, तो उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फैल गई।
 
चंदन बाबा की निगाहें अब मीरा के उस सफेद रोब में झूलते हुए मम्मों और उसकी कमर के मटकाव पर टिकने लगीं।
 
तभी उनके भीतर एक साथ अलग-अलग सोच की परतें टकराने लगीं—एक तरफ उन्हें शेर को झांसे में लेने के लिए कामुकता का नाटक करना था, दूसरी तरफ चंदन के भीतर दवा के नशे में सुलगता हुआ  भटकता हुआ कामुक मन था, जो मीरा के इस रूप को देखकर बेकाबू हो रहा था।
 
शेर समझ गया कि उसकी चाल कामयाब हो रही है—60 साल का यह साधु अब उसकी बिछाई हवस के जाल में फँसता दिख रहा है।
 
तभी शेर के दिमाग में एक विचार आया। उसने तुरंत ज्योति को पास बुलाया और उसके कान में कुछ फुसफुसा दिया। ज्योति तो बच्ची थी, वह खेल के मूड में खुश हो गई।
 
ज्योति ने बागीचे में लगी पानी की पाइप उठाई और उसका मुँह सीधे मीरा की तरफ करके पानी चालू कर दिया।
 
मीरा (हँसते और बचते हुए चिल्लाई): "अरे ज्योति बेटा... मत करो, मैं पूरी भीग रही हूँ!"
 
लेकिन ज्योति को मस्ती सूझ रही थी, वह खिलखिलाते हुए मीरा पर पानी की धार मारती रही। देखते ही देखते कुछ ही मिनटों में मीरा सिर से पाँव तक पूरी भीग गई।
 
उसका सफेद सिल्क रोब और नीचे की स्लिप पानी से सराबोर होकर उसके गोरे जिस्म से एकदम चिपक गए, जिससे उसके शरीर के सारे सुडौल उतार-चढ़ाव साफ उभर आए।
 
सफेद कपड़ा भीगते ही लगभग पारदर्शी हो गया—उसके उभरे हुए मम्मे, मम्मों की ढाल और रानों का कसाव साफ़ झलकने लगा।
 
बागीचे के दूसरे कोने में खड़े चंदन बाबा और पास खड़े शेर—दोनों की आँखें हैरत और हवस के मारे फटी की फटी रह गईं!
 
तभी ज्योति दौड़कर आई और पानी की पाइप शेर के हाथ में थमाते हुए बोली, "शेर भैया, अब मेरे ऊपर भी पानी डालो!"
 
शेर (कमीनी मुस्कान छिपाकर बोला): "हाँ-हाँ ज्योति बेटी, अभी डालता हूँ!"
 
शेर ने पाइप हाथ में ली और ज्योति पर पानी डालते-डालते अपनी असली चाल चल दी। उसने जानबूझकर पाइप का मुँह मीरा की तरफ घुमा दिया। अब पानी की तेज़ धार सीधे मीरा के भीगे हुए रोब पर गिर रही थी—कभी उसके आज़ाद झूलते मम्मों पर, तो कभी उसकी दोनों जाँघों के बिल्कुल बीच में!
 
पानी के दबाव और बहाव से मीरा के रोब की डोरी ढीली होकर खुल गई। भीगा हुआ सफेद रोब कंधों से सरककर साइड हो गया, और अंदर की पतली स्लिप में मीरा का सुडौल, पानी से नहाया हुआ बदन पूरी तरह बेपर्दा होने लगा।
 
मीरा पानी से बचने के लिए अपने हाथों से सीने को ढकने की कोशिश कर रही थी, पर शेर की पाइप की तेज़ धार बार-बार उसके जिस्म के सबसे कामुक हिस्सों को निशाना बना रही थी।
 
जैसे ही मीरा पानी की सीधी धार से बचने के लिए झटके से पीछे घूमी, शेर की आँखें उसकी भीगी हुई पीठ और पानी से चिपके रोब के अंदर झांकती उसकी उभरी हुई गांड पर गड़ गईं।
 
लेकिन मीरा के घूमते ही, बागीचे के दूसरे कोने में खड़े चंदन बाबा को सामने का पूरा नज़ारा साफ़-साफ़ दिख गया।
 
मीरा के भीगे रोब की डोरी पूरी तरह खुल चुकी थी। अंदर पहनी पतली सफेद सिल्क की स्लिप ठंडे पानी से भीगकर उसके गोरे बदन पर चिपक गई थी। ठंडे पानी के झोंकों से उसके दोनों सुडौल मम्मे एकदम अकड़कर सख्त हो चुके थे, और पतले कपड़े के पार से उसके गुलाबी निप्पल बाहर की तरफ साफ़ उभरकर झांक रहे थे। नीचे रानों के पास से पानी में भीगी हुई उसकी पैंटी की झलक अलग ही कामुक लग रही थी।
 
यह नज़ारा देखते ही चंदन बाबा के भीतर तीनों विचार एक भयंकर मानसिक युद्ध में उलझ गए।
 
"मुझे शेर को दिखाना होगा कि मैं भी उसकी तरह हवस में अंधा हो चुका हूँ..." उन्होंने मन ही मन सोचा।
Deepak Kapoor
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