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Thriller बेटे के दोस्त ने आंटी को सम्मोहित(hypnotize) किया....फिर क्या हुआ?
#45
कमरे के भीतर का सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी किसी हथौड़े की तरह गूंज रही थी। तभी, अचानक सन्नाटे को चीरते हुए दरवाजे की घंटी बजी—'टिंग टोंग'। उस एक आवाज ने कमरे के वातावरण को जैसे स्थिर कर दिया। विवेक और हरीश, जो अपनी ही दुनिया में खोए हुए थे, अचानक बिजली के झटके की तरह चौंक गए। दोनों लड़के अपनी जगह पर बिल्कुल पत्थर की तरह जम गए, उनकी सांसें जैसे रुक सी गईं।

विवेक के चेहरे पर घबराहट साफ झलक रही थी। उसने अपनी गर्दन धीरे से घुमाई और धीमी, कांपती हुई आवाज में पूछा, "कौन हो सकता है इस वक्त? क्या किसी ने हमें देख लिया?" उसकी आँखों में डर था कि कहीं उनकी इस गुप्त गतिविधि का खुलासा न हो जाए।

हरीश ने विवेक की घबराहट देखी और एक लंबी, गहरी चैन की साँस ली। उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आई। उसने लापरवाही से कंधे उचकाते हुए कहा, "अरे यार, इतना रिलैक्स हो जा, तू फालतू में तनाव ले रहा है। मैंने आधे घंटे पहले पिज्जा ऑर्डर किया था, वही होगा।"

जैसे ही विवेक को यह पता चला कि बाहर कोई अजनबी नहीं बल्कि एक डिलीवरी बॉय है, उसके दिमाग में एक शरारत कौंधी। उसकी घबराहट अचानक एक कुटिल मुस्कान में बदल गई। उसने हरीश की ओर देखा और धीमी आवाज में फुसफुसाया, "भाई, एक जबरदस्त आइडिया आया है। क्यों न हम इस रंडी को ही पिज्जा लेने भेजें? देखने में भी मजा आएगा और काम भी हो जाएगा।"

हरीश थोड़ा हैरान हुआ, उसने अपनी भौंहें सिकोड़ी और पूछा, "पर कैसे? वह इस हालत में बाहर कैसे जाएगी?"

विवेक की आँखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने चालाकी से सुझाव दिया, "सिर्फ उस नीली कमीज में। नीचे कुछ नहीं... बिल्कुल खाली। बस एक पतला सा कपड़ा।"

हरीश को यह विचार न केवल पसंद आया, बल्कि वह इस खेल में पूरी तरह उतर गया। उसने चैताली की ओर देखा, जो अब तक चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी। उसने एक अधिकारपूर्ण लहजे में उसे आदेश दिया, "चैताली, उठो। जाओ, दरवाजा खोलो और पिज्जा लेकर आओ। लेकिन मेरी एक शर्त है—तुम सिर्फ अपनी वह नीला कमीज पहनोगी, उसके नीचे या ऊपर एक धागा भी नहीं होना चाहिए।"

चैताली, जो उनकी इच्छाओं के सामने बेबस थी, धीरे से उठी। उसने पास पड़ी अपनी पारदर्शी नीली कमीज उठाई और उसे अपने बदन पर डाल लिया। वह कपड़ा इतना महीन और पतला था कि वह शरीर को ढकने के बजाय उसे और अधिक उजागर कर रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी छातियाँ उस नाजुक कपड़े के नीचे साफ झलक रही थीं, और हर सांस के साथ वह कपड़ा उसकी त्वचा से चिपक रहा था। जब वह दरवाजे की ओर चलने लगी, तो उसके भारी और सुडौल कूल्हे बिना किसी कपड़े के अवरोध के लयबद्ध तरीके से हिल रहे थे, जिससे कमरे में एक अजीब सी उत्तेजना भर गई।

उसने धीरे से दरवाजा खोला और बाहर की ठंडी हवा के संपर्क में आई। बाहर एक युवा डिलीवरी बॉय खड़ा था। जैसे ही उसने दरवाजा खुलते देखा और चैताली को सामने पाया, उसकी आँखों की पुतलियाँ फैल गईं और वह हक्का-बक्का रह गया। उसने अपनी पूरी जिंदगी में ऐसा नजारा नहीं देखा था—एक खूबसूरत महिला, जिसने सिर्फ एक पतली, पारदर्शी कमीज पहनी थी। डिलीवरी बॉय की नजरें चैताली के शरीर पर जम गईं, उसने देखा कि कैसे उसके निप्पल उस पतले कपड़े को बाहर की ओर धकेल रहे थे, जैसे वे दुनिया को अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे हों। वह लड़का पूरी तरह सम्मोहित हो गया, उसके हाथ में मौजूद पिज्जा का बॉक्स लगभग फिसलने ही वाला था।

चैताली के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उसने बिना किसी हिचकिचाहट या शर्म के, एक यांत्रिक तरीके से पिज्जा लिया और बिना एक शब्द बोले वापस लिविंग रूम की ओर मुड़ गई। जैसे ही दरवाजा बंद हुआ और वह वापस अंदर आई, उसने बिना देर किए वह नीली कमीज भी उतार फेंकी और फिर से पूरी तरह नंगी हो गई, जैसे कि वह वस्त्र उसके लिए एक बोझ था।

तीनों ने मिलकर उस गरमा-गरम पिज्जा का आनंद लिया। हंसी-मजाक और बातों के बीच पिज्जा तो खत्म हो गया, लेकिन उस छोटे से खेल ने उनकी भूख को शांत करने के बजाय और अधिक बढ़ा दिया था। अब कमरे का माहौल और भी ज्यादा भारी और उत्तेजक हो चुका था।

हरीश ने अपनी नजरें चैताली के बदन पर टिकाते हुए एक गहरी सांस ली और धीमी, भारी आवाज में कहा, "चलो, अब मेरी बारी है।"
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RE: बेटे के दोस्त ने आंटी को सम्मोहित(hypnotize) किया....फिर क्या हुआ? - by MohdIqbal - 16-09-2026, 11:06 PM



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