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Misc. Erotica Kahani mere ghar ki
सुबह की ताज़ा धूप खिड़की से अंदर आ रही थी, लेकिन मेरे अंदर एक अजीब सा अंधेरा छाया हुआ था। नहाने के बाद भी मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं खुद को साफ़ नहीं कर पाया हूँ। वो पिछली ररात... वो सब कुछ... मेरे दिमाग में किसी डरावनी फिल्म की तरह बार बार चल रहा था।

जैसे ही मैं तैयार होकर किचन की तरफ बढ़ा, मम्मी की आवाज़ सुनाई दी। वो पूजा करने के बाद नाश्ता बना रही थीं। उनकी सादगी, उनका वो शांत चेहरा और उनके माथे पर लगा तिलक सब कुछ इतना पवित्र लग रहा था कि मुझे अपनी ही त्वचा में खुजली होने लगी।

"गुड मॉर्निंग मम्मी," मैंने बहुत ही धीमी और लड़खड़ाती हुई आवाज़ में कहा। मेरी नज़रें फर्श पर टिकी थीं। मैं चाहकर भी अपनी आँखें ऊपर नहीं उठा पा रहा था।

जैसे ही मैंने ये कहा, मुझे महसूस हुआ कि मम्मी की नज़रें मुझ पर हैं। मुझे ऐसा लगा जैसे उनकी आँखें मेरे अंदर झाँक रही हों, जैसे वो मेरे चेहरे के पीछे छिपे उस 'हवसी' को देख रही हों जो कल रात उनके कान में वो सारी गंदी और अश्लील बातें बोल रहा था। वो शब्द... वो 'अपवित्र' शब्द जो मैंने उनके शरीर और उनकी मर्यादा के बारे में कहे थे... वो मेरे अंतर्मन में किसी ज़हर की तरह गूँज रहे थेे।

मम्मी ने कुछ कहा नहीं, बस उनकी चूड़ियों की खनक सुनाई दी। वो खनक मुझे और भी ज़्यादा बेचैन कर रही थी। मुझे लग रहा था कि वो जानती हैं। उन्हें पता है कि मेरा ये सिर झुका होना सिर्फ शर्म नहीं, बल्कि उस 'गंदगी' का बोझ है जो मैंने कल रात उनके साथ बाँटा था। मैं उनके सामने खड़ा तो था, लेकिन मेरा मन उस अपराधबोध (guilt) की आग में जल रहा था।
किचन में सन्नाटा इतना गहरा था कि मुझे अपनी ही धड़कनें सुनाई दे रही थीं। मैं बस फर्श को घूर रहा था, जैसे वहाँ कोई खजाना छुपा हो। मम्मी की मौजूदगी मेरे इतनी करीब थी कि मैं उनकी साड़ी की हल्की सी महक और उनके शरीर की गर्मी महसूस कर सकता था, लेकिन मेरा कलेजा जैसे पत्थर का हो गया था।

तभी मम्मी की आवाज़ आई। "रवि... क्या बात है? आज नाश्ता भी नहीं कर रहे हो? और ये क्या हाल बना रखा है अपना? नज़रें क्यों चुरा रहे हो मुझसे?""** बहुत ही शांत और सौम्य थी, लेकिन उस शांति के पीछे एक अजीब सी गहराई थी।उनकी आवाज़ सुनकर मेरे गले में एक गोला सा फंस गया। मैंने हिम्मत जुटाकर बहुत ही धीरे से कहा, "कुछ नहीं मम्मी... बस, रात को देर से सोया था तो थोड़ी थकान है।"

मैंने सोचा कि शायद वो मान जाएँगी, लेकिन मम्मी ने एक हल्की सी आह भरी। मुझे लगा जैसे उन्होंने मेरी झूठ को पकड़ लिया हो।"थकान?" उन्होंने दोहराया, और उनके लहजे में एक शरारती सी खनक थी जो मुझे और भी डरा गई। "थकान तो शरीर की होती है रवि... लेकिन तुम्हारी आँखों में जो ये बेचैनी है, ये जो ये भारीपन है... ये थकान नहीं लग रहा। ऐसा लग रहा है जैसे तुम्हारे मन में कोई बोझ है। कोई ऐसी बात जो तुम मुझसे कहना चाहते हो, पर कह नहीं पा रहे?"

मेरा दिल ज़ोर से धड़का। मुझे लगा जैसे वो सीधे मेरे सीने के पार देख रही हैं। "नहीं मम्मी... ऐसा कुछ नहीं है। मैं ठीक हूँ।" मैंने फिर से नज़रें झुका लीं।

तभी मैंने महसूस किया कि वो मेरे और करीब आईं। उनकी चूड़ियों की खनक मेरे कानों के पास गूँजी। उन्होंने बहुत ही कोमल स्वर में पूछा, "सच में? क्योंकि मुझे तो लग रहा है कि तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो। क्या रात को कुछ ऐसा हुआ था... या तुमने कुछ ऐसा कहा था... जो तुम्हें अभी भी परेशान कर रहा है?"उनके शब्दों ने मेरे अंदर जैसे बिजली दौड़ा दी। "क्या... क्या कहा था मैंने?" मैंने लड़खड़ाते हुए पूछा। मेरा गला सूख रहा था।

मम्मी ने एक लंबी सांस ली और बहुत ही धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा, "वही... जो तुमने रात के अंधेरे में मेरे कान में कहा था। वो शब्द जो इतने 'गंदे' थे कि शायद तुम्हें लग रहा है कि तुम अब मेरे सामने खड़े होने के काबिल नहीं।"


मम्मी के उन शब्दों ने मेरे अंदर जैसे सब कुछ तहस नहस कर दिया। उनके मुँह से उन 'गंदे' शब्दों का ज़िक्र होते ही मेरा सिर शर्म से झुक गया। मुझे लगा जैसे मैं ज़मीन के अंदर धँस जाऊँ। मेरा गला रुँध गया और आँखों में आँसू भर आए। वो जो रात का जुनून था, वो सुबह की इस पवित्रता के सामने एक बहुत बड़ा गुनाह लग रहा था।

"मम्मी... मुझे माफ़ कर दीजिए... मैं बहुत बुरा हूँ," मेरी आवाज़ काँप रही थी। मैं फूट फूट कर रो पड़ा। "कल रात मैं... मैं अपने आप पर काबू नहीं रख पाया। मैंने आपसे जो कुछ भी कहा, जो कुछ भी किया... वो बहुत ही गलत था। मैं आपको ठेस पहुँचाना नहीं चाहता था, पर मेरी जुबान से निकले वो शब्द... वो बहुत ही घटिया थे। मैं खुद को माफ़ नहीं कर पा रहा हूँ।"

मैं वहीं किचन के फर्श पर बैठ गया, मेरा सिर झुका हुआ था और कंधे सिसकियों से काँप रहे थे। मुझे लग रहा था कि मम्मी शायद मुझे डाँटेंगी या फिर मुझसे बात करना छोड़ देंगी।तभी मुझे महसूस हुआ कि कोई मेरे पास आया। मम्मी ने धीरे से घुटनों के बल बैठकर मुझे अपने करीब कर लिया। उनके हाथों की वो जानी पहचानी गर्माहट जब मेरे बालों में और मेरी पीठ पर महसूस हुई, तो मेरा रोना और बढ़ गया।

"बस... बस मेरे बच्चे, चुप हो जाओ," मम्मी ने बहुत ही कोमल और ममता भरी आवाज़ में कहा। उन्होंने मुझे अपने सीने से लगा लिया। उनकी साड़ी की खुशबू और उनके शरीर की वो सोंधी महक मेरे चेहरे पर लग रही थी। वो मुझे बिल्कुल वैसे ही पुचकार रही थीं जैसे कोई माँ अपने छोटे से बच्चे को तब संभालती है जब वो बहुत ज़्यादा डर गया हो या रो रहा हो।

"शह्ह्ह... रोते नहीं। देखो मेरी तरफ," उन्होंने मेरे गालों पर हाथ फेरते हुए कहा। "तुम बुरे नहीं हो रवि,वो जो हुआ, मुझे बुरा नहीं लगा, मुझे तो बस तुम्हारी ये बेचैनी देख कर दुख हो रहा है।"उन्होंने मेरे सिर को चूम लिया और मुझे और भी कसकर गले लगा लिया। "मेरा बच्चा इतना परेशान क्यों होता है? तुम मेरे हो, और मैं तुम्हारी हूँ। इसमें कोई गुनाह नहीं है।"उनकी उस बात ने मेरे दिमाग के सारे तार झकझोर कर रख दिए।उन्होंने मेरे माथे पर एक कोमल सी चुंबन दी, मुझे लगा जैसे मेरे शरीर में बिजली का एक हल्का सा करंट दौड़ गया हो।

उनकी उस ममता भरी पुचकार और उनके सीने की धड़कन को महसूस करते हुए, मेरा वो भारीपन धीरे धीरे कम होने लगा। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरे अंदर का वो सारा तूफान, वो सारी बेचैनी और वो सारा अपराधबोध, उनकी ममता की लहरों में धीरे धीरे बहकर शांत हो रहा है।
जैसे किसी जलते हुए इंसान को ठंडे पानी की फुहार मिल गई । उनकी बाहों में सिमटकर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं फिर से वही छोटा बच्चा बन गया हूँ, जिसे दुनिया की किसी बात का डर नहीं है, जिसे बस अपनी माँ की गोद में सबसे ज़्यादा सुरक्षा महसूस होती है।

लेकिन उस सुरक्षा के साथ साथ, एक और अजीब सी भावना मेरे भीतर उठ रही थी। उनकी छाती से मेरा चेहरा सटा हुआ था, और उनके शरीर की वो गर्माहट, उनकी साँसों की लय और उनकी साड़ी का वो अहसास ये सब मिलकर मेरे भीतर एक बहुत ही जटिल (complex) हलचल पैदा कर रहे थे। एक तरफ मैं उनके सामने अपनी 'गलतियों' के लिए शर्मिंदा था, और दूसरी तरफ, उनकी इसी ममता और इस करीबियत ने मेरे अंदर दबे हुए उस 'जुनून' को फिर से धीरे से सहला दिया था।

मुझे लग रहा था जैसे मेरा शरीर दो हिस्सों में बँट गया है एक हिस्सा जो उनकी गोद में सुकून पाकर शांत होना चाहता है, और दूसरा हिस्सा जो कल रात की तरह ही फिर से उन 'गंदी' बातों और उस 'पाप' की ओर खिंच रहा है। उनकी पुचकार मुझे शांत तो कर रही थी, लेकिन उनके शरीर की वो खुशबू और उनकी कोमलता मुझे फिर से उसी कामुकता के रास्ते की तरफ धकेल रही थी। मैं बस उनके सीने पर सिर रखे उनकी धड़कनें सुन रहा था, और मन ही मन सोच रहा था *क्या ये ममता मुझे बचा रही है, या ये मुझे और भी गहरे दलदल में धकेल रही है?

उसके तुरंत बाद जो हुआ, उसने मेरी साँसें ही रोक दीं।मम्मी ने मेरे चेहरे से अपने हाथ हटाए और मेरी आँखों में देखते हुए एक ऐसी गहरी, अर्थपूर्ण मुस्कान दी जिसे देखकर मेरा कलेजा मुँह को आ गया। उस मुस्कान में सिर्फ ममता नहीं थी, बल्कि एक ऐसी शरारत और एक ऐसी चुनौती थी जो सीधे मेरे जिस्म को झकझोर रही थी।

"अब अच्छे बच्चों की तरह जल्दी से नाश्ता कर लो," उन्होंने बड़े ही प्यार भरे लेकिन अधिकारपूर्ण लहजे में कहा। "देखो, मैंने तुम्हारी मनपसंद स्वीट डिश बनाई है मूंग का हलवा। ये तुम्हारे शरीर को भी खूब एनर्जी देगा..." और फिर, उनकी आवाज़ अचानक थोड़ी धीमी और भारी हो गई, "क्योंकि... आज रात तुमने काफी मेहनत की थी ना?"

इतना कहते ही उन्होंने बहुत ही खूबसूरती से अपनी एक आँख झपकाई जिसे हमारे पंजाब में आँख मारना कहते हैं। वो पल ऐसा था जैसे वक्त थम गया हो। उनके उस एक इशारे और उन शब्दों ने मेरे कानों में किसी नशीले संगीत की तरह काम किया। 'मेहनत'... वो शब्द मेरे दिमाग में बार बार गूँजने लगा। वो इशारा साफ़ कह रहा था कि वो सब जानती हैं, वो सब समझती हैं और वो उस रात की हर एक हरकत को याद कर रही हैं।

"अब नाश्ता करो और जाओ कॉलेज। मैं दोपहर में तुम्हारा इंतज़ार करूँगी... मेरे सोना बच्चा।" उन्होंने मेरे गाल को हल्के से सहलाया और एक ऐसी नज़र डाली जिसने मुझे ये अहसास करा दिया कि दोपहर का इंतज़ार सिर्फ मेरे लिए नहीं, बल्कि उस 'एनर्जी' के दोबारा इस्तेमाल के लिए भी होगा।

मैं हक्का बक्का सा वहीं बैठा रह गया। मेरा शरीर पसीने से तर बतर हो रहा था और मेरा मन अब नाश्ते पर नहीं, बल्कि उस 'मूंग के हलवे' में और उस 'दोपहर' के इंतज़ार में डूब चुका था। मुझे समझ आ गया था कि मम्मी सिर्फ मुझे सांत्वना नहीं दे रही थीं, बल्कि वो मुझे उस खेल के लिए फिर से तैयार कर रही थीं।
मैंने नाश्ता किया और इस उमंग के साथ कॉलेज पहुंच के आज दोपहर रेस्ट के समय फिर से मम्मी के जिस्म के साथ खेलने का मौका मिलने वाला है।
कॉलेज की घंटी बज चुकी थी, लेकिन मेरे लिए समय जैसे थम सा गया था। क्लास में टीचर ब्लैकबोर्ड पर कुछ लिख रहे थे और उनकी आवाज़ एक बैकग्राउंड शोर की तरह मेरे कानों में गूँज रही थी, पर मेरा ध्यान कहीं और ही था।

मेरा पूरा शरीर एक अजीब सी बेचैनी से भरा हुआ था। जैसे ही मैं अपनी डेस्क पर बैठता, मुझे मम्मी के उस स्पर्श की याद आती। उनकी वो कोमल सी चुंबन और फिर वो गहरी, अर्थपूर्ण मुस्कान... वो मुस्कान मेरे दिमाग से निकल ही नहीं रही थी। "आज रात तुमने काफी मेहनत की थी ना?" उनके वो शब्द मेरे कानों में किसी नशीली फुसफुसाहट की तरह बार बार गूँज रहे थे।

मैं अपनी किताब खोलकर बैठा था, पर पन्ने पलटने का कोई मतलब नहीं था। मेरी नज़रें बार बार खिड़की से बाहर देख रही थीं, जैसे मैं उस दोपहर का इंतज़ार कर रहा हूँ जो अभी बहुत दूर है। मेरा शरीर अंदर ही अंदर उबल रहा था। जब भी मैं आँखें मूँदता, मुझे मम्मी का वो आँख मारना (wink करना) साफ़ दिखाई देता। उस एक पल ने मेरे भीतर एक ऐसी आग लगा दी थी जिसे बुझाना नामुमकिन लग रहा था।

पसीने की एक हल्की सी बूंद मेरी कनपटी से होकर नीचे गिर रही थी। क्लास के बाकी बच्चे अपने दोस्तों से बातें कर रहे थे, हँस रहे थे, लेकिन मैं एक अलग ही दुनिया में था। मुझे महसूस हो रहा था कि मेरी पैंट के अंदर मेरा शरीर खुद ब खुद प्रतिक्रिया दे रहा है। रात की 'मेहनत' की यादें मेरे जिस्म में एक सिहरन पैदा कर रही थीं। मेरा मन बार बार बस एक ही बात कह रहा था *'जल्दी घर जाना है... जल्दी मम्मी के पास जाना है।'*

हर बीतता मिनट मुझे और भी बेचैन कर रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अब और इंतज़ार नहीं कर पाएगा। मैं बस उस घड़ी के काँटों को तेज़ी से घूमते देखना चाहता था ताकि मैं उस घर की दहलीज पर कदम रख सकूँ जहाँ मम्मी मेरा इंतज़ार कर रही थीं। मेरा ध्यान पढ़ाई पर नहीं, बल्कि उस 'मूंग के हलवे' की ताकत और उस 'दोपहर' के उस रहस्यमयी वादे पर था।

***


दूसरी तरफ, घर के शांत और सुहावने माहौल में मम्मी रसोई में खड़ी थीं। बाहर की धूप खिड़की से छनकर आ रही थी, लेकिन रसोई के अंदर का माहौल कुछ अलग ही था। मम्मी ने आज एक हल्की और आरामदायक सूती साड़ी पहनी थी, जो उनके शरीर की बनावट को बहुत ही खूबसूरती से उभार रही थी।उनकी आँखों के सामने रवि का वह चेहरा आ जाता वह चेहरा जो कल रात 'मेहनत' करते समय पूरी तरह से समर्पित और बेकाबू हो गया था।

*"रवि कितना छोटा है ना..."* उन्होंने मन ही मन सोचा और एक गहरी साँस ली। *"इतना छोटा, पर उसकी चाहत और उसकी ताकत... कितनी बेबाक है।"*

तभी उनके मन में एक चिंता की लहर उठी। उन्होंने चूल्हे की आंच धीमी की और सोचने लगीं, *"पर क्या यह सही होगा? बेचारा बच्चा है... कल रात भी उसने इतनी मेहनत की कि उसे ढंग से नींद भी नहीं आई होगी। अगर मैं आज दोपहर में फिर से उसे काम पर लगा दूँगी, तो कहीं वह बीमार न पड़ जाए। उसका शरीर अभी बढ़ रहा है, उसे आराम की भी ज़रूरत है।"*

मम्मी का हाथ एक पल के लिए रुक गया। वह खिड़की के बाहर देखने लगीं। उनके मन में द्वंद्व चल रहा था। एक तरफ ममता थी जो उसके स्वास्थ्य की चिंता कर रही थी, और दूसरी तरफ वह 'इच्छा' थी जो रवि की उन नशीली आँखों और उसकी तड़प को देखकर जाग उठती थी।

*"लेकिन अगर मैंने मना कर दिया तो?"* उन्होंने खुद से सवाल किया। *"रवि तो बहुत जल्दी नाराज़ हो जाता है। वह मुझसे उम्मीद लगाए बैठा होगा। अगर मैंने उसे आज टाल दिया, तो शायद वह उदास हो जाए या फिर वह मुझसे दूर होने लगे।"*

मम्मी के चेहरे पर एक शरारती और गहरी सोच वाली मुस्कान फैल गई। उन्होंने अपनी आँखें थोड़ी झुका लीं और एक मास्टरप्लान बनाने लगीं।

*"नहीं... मैं उसे मना नहीं करूँगी। मैं उसे मना भी नहीं करूँगी और उसे थकाऊ भी नहीं होने दूँगी।"* उन्होंने मन ही मन तय कर लिया। *"मैं कुछ ऐसा बनाऊँगी जिससे वह गहरी नींद सो जाए, ताकि उसका शरीर पूरी तरह से रिलैक्स हो जाए। और जब वह जागेगा... तो वह पहले से भी ज्यादा ऊर्जावान और फुर्तीला महसूस करेगा। उसका शरीर पूरी तरह से तरोताजा हो चुका होगा और उसकी सारी थकान मिट चुकी होगी। फिर वह रात के काम के लिए पूरी तरह से तैयार होगा एकदम ताज़ा और जोश से भरा हुआ।"

मम्मी ने मन ही मन मुस्कुराते हुए अपनी योजना को अंतिम रूप दिया। उन्होंने रसोई के मसालों और जड़ी बूटियों के डिब्बों को एक बार फिर से देखा। अब उन्हें पता था कि उन्हें क्या करना है। वह रवि की सेहत के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहती थीं, बल्कि वह चाहती थीं कि उनका 'छोटा सा बच्चा' जब उनके पास आए, तो वह थका हुआ नहीं बल्कि एक शेर की तरह ऊर्जा से लबरेज हो।

। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी एक ऐसी चमक जिसमें ममता भी थी और एक गहरा, नशीला आकर्षण भी।

***उनके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो किसी गहरी साजिश और ममता के मेल से बनी थी। उन्होंने धीरे से चूल्हे की आंच को धीमा किया और अपनी आँखों में एक चमक लिए उन मसालों की ओर देखा जो अब उनके हाथ में थे।

"मेरा बच्चा..." उन्होंने मन ही मन बुदबुदाया, "आज उसे वो सब मिलेगा जिसकी उसे तलाश है, पर मेरे तरीके से।"

उन्होंने एक पीतल के बर्तन में गाढ़ा, मलाईदार दूध उबलने के लिए रखा। जैसे ही दूध में उबाल आने लगा, उन्होंने उसमें केसर के बारीक रेशे डाले। केसर का वह सुनहरा रंग दूध में घुलते ही पूरे रसोई में एक भीनी भीनी, नशीली खुशबू फैलने लगी। पर मम्मी का असली इरादा तो कुछ और ही था। उन्होंने एक छोटी सी कटोरी में जायफल को रगड़कर उसका महीन पाउडर तैयार किया। उस पाउडर की तीखी और मदहोश कर देने वाली महक ने उनके अपने ही दिमाग को एक पल के लिए सुन्न कर दिया।

उन्होंने चुटकी भरा जायफल का पाउडर और थोड़ा सा अश्वगंधा उस उबलते हुए केसरिया दूध में मिला दिया। दूध अब सिर्फ एक पेय नहीं रह गया था; वह एक 'अमृत' बन चुका था एक ऐसा नशा जो रवि के शरीर की सारी थकान को सोख लेगा और उसे एक ऐसी गहरी, बेखबर नींद में सुला देगा जहाँ उसे सिर्फ मीठे और मदहोश करने वाले सपने आएंगे।

मम्मी ने उसमें एक चम्मच शुद्ध शहद भी मिला दिया ताकि वह स्वाद में इतना मीठा और मखमली हो जाए कि रवि उसे एक ही बार में पी जाए। उनका मकसद साफ था वह चाहती थीं कि रवि दोपहर में इस दूध को पीकर एक ऐसी गहरी नींद में चला जाए जिससे उसकी मांसपेशियों का एक एक रेशा पूरी तरह से रिलैक्स हो जाए। वह चाहती थीं कि जब वह सोकर उठे, तो उसकी आँखों में वही पुरानी प्यास हो, लेकिन उसके शरीर में एक नई, अदम्य शक्ति और फुर्ती हो।

वह उसे थकाकर तोड़ना नहीं चाहती थीं, बल्कि वह उसे उस तरह से तैयार करना चाहती थीं कि जब रात का अंधेरा गहराए और वह 'काम' शुरू हो, तो रवि एक थके हुए लड़के की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे योद्धा की तरह उनके सामने हो जो अपनी हर इच्छा को पूरी ताकत के साथ पूरा करने के लिए बेताब हो।

मम्मी ने उस गर्म प्याले को अपने हाथों में लिया और खिड़की के बाहर देखने लगीं। उन्हें पता था कि रवि बस आने ही वाला है।
"...वह बस उस पल का इंतज़ार कर रही थीं जब रवि की आहट सुनाई देगी।उनके हाथ थोड़े कांप रहे थे डर से नहीं, बल्कि उस उत्तेजना से जो इस आने वाले खेल को सोचकर उनके भीतर उठ रही थी।


आखिरकार कॉलेज की छुट्टी की घंटी बजी और जैसे ही वह आवाज़ सुनाई दी, मेरे दिल की धड़कनें और तेज़ हो गईं। पूरे दिन मेरा ध्यान पढ़ाई में नहीं, बल्कि सुबह मम्मी द्वारा दिए गए उन इशारों में था। मेरे दिमाग में बस एक ही बातp घूम रही थी कि आज मम्मी के साथ खूब मस्ती करूंगा दोपहर में,ये सब सोचते हुए मैं बस घर पहुँचने के लिए तड़प रहा था। मेरा पूरा शरीर उस रोमांच और भूख से भरा हुआ था। मैं बस यही सोच रहा था कि खाना खाने के बाद हम सीधे बेडरूम में जाएँगे और जो भी बातें अधूरी रह गई थीं, उन्हें पूरा करेंगे। मैं उनके शरीर को करीब से महसूस करने के लिए बेताब था।

लेकिन भूख और प्यास की वजह से मेरा शरीर थोड़ा सुस्त महसूस कर रहा था। मम्मी ने घर में घुसते ही सबसे पहले मुझे नींबू पानी पिलाया। उसके बाद उन्होंने मेरे लिए दाल, सब्जी, रोटी और चावल का पूरा भरपेट लंच तैयार किया । खाना खाते वक्त भी मेरा ध्यान बार बार मम्मी की उन कोमल हरकतों पर जा रहा था।

तभी मम्मी मेरे पास वो जादुई दूध का प्याला लेकर आईं। उन्होंने बहुत ही प्यार से कहा, **"ये ले बेटा, ये ताकतवर्धक दूध पी ले। देखते ही देखते तेरी सारी थकान और सुस्ती छू मंतर हो जाएगी और ये तेरे बदन में गजब का जोश भर देगा।"**

मैं मन ही मन मुस्कुरा रहा था और सोच रहा था कि जैसे ही इस दूध से मेरी थकान मिटेगी, मैं मम्मी को जी भर कर प्यार करूँगा। मैं उस दूध को एक 'एनर्जी ड्रिंक' समझ रहा था जो मुझे मम्मी के साथ बिताए जाने वाले उस खास वक्त के लिए ताकत देगा ,मुझे लगा था कि यह मुझे जोश देगा, पर पता नहीं क्यों, दूध खत्म होते ही मेरी आँखें भारी होने लगीं और नींद से बोझिल होने लगीं...

"दोस्तों, कहानी अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ रवि की अगली हरकत पूरी रात का मिजाज तय करेगी। अब आप तय कीजिये कि रवि के साथ क्या होना चाहिए:"

**विकल्प 1: चिड़चिड़ापन और वेहसिपन (The Frustrated Madness)**
रवि दोपहर के 4 बजे उठता है। उसका शरीर पूरी तरह सेक्स के लिए तड़प रहा है, उसका लंड बुरी तरह चुदाई मांग रहा है, लेकिन जैसे ही उसकी आँख खुलती है, उसे अहसास होता है कि मौका हाथ से निकल चुका ह। वह भारी मन और चिड़चिड़ेपन के साथ दुकान पर जाता है, लेकिन पूरा दिन उसका दिमाग बस एक ही बात पर घूमता रहता है कि उसका शरीर उसे इस वक्त साथ नहीं दे पा रहा। यह चिड़चिड़ापन और यह अधूरी प्यास रात को एक भयानक रूप ले लेगी। रात को जब वह मम्मी के पास जाएगा, तो वह प्यार से नहीं बल्कि अपनी पूरी **'चिढ़'** और **'वेहसिपन'** के साथ मम्मी को चुदाई देगा। वह अपनी सारी भड़ास मम्मी के शरीर पर निकालेगा।

**विकल्प 2: असीमित जोश और ताकत (The Beastly Stamina)**
रवि अपनी नींद पूरी करता है और शाम के करीब 7 बजे उठता है। इस वक्त तक उसका शरीर पूरी तरह तरोताजा हो चुका है। ऊपर से मम्मी के दूध का जो असर उसके शरीर पर हुआ है, उसकी वजह से उसके अंदर एक अलग ही किस्म का **'जोश'** और **'जुनून'** भरा हुआ है। उसके पास कोई चिड़चिड़ापन नहीं है, बल्कि एक असीमित ऊर्जा है। वह पूरी रात मम्मी को बिना रुके, बिना थके, एक जंगली जानवर की तरह लगातार **चोदेगा**। यह रात सिर्फ और सिर्फ बेतहाशा सेक्स और चरम सुख के नाम होगी।

**अब आप बताइए, रवि किस रास्ते पर चले? कमेंट्स में अपना वोट दें!**
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Messages In This Thread
Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 08-08-2026, 11:20 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 10-08-2026, 01:11 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 10-08-2026, 02:12 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 10-08-2026, 06:16 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 11-08-2026, 09:40 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 11-08-2026, 10:19 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 11-08-2026, 10:21 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 11-08-2026, 10:33 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 11-08-2026, 01:46 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 11-08-2026, 03:31 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 11-08-2026, 08:41 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 11-08-2026, 10:18 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 01:49 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Ella - 12-08-2026, 02:21 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 02:31 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Renuka Shahane - 12-08-2026, 02:34 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 04:10 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Nomita - 12-08-2026, 04:17 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 05:13 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Suhana. - 12-08-2026, 07:15 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 10:09 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by shalini - 12-08-2026, 07:35 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 10:11 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 13-08-2026, 09:39 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 13-08-2026, 12:08 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 13-08-2026, 12:19 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 13-08-2026, 12:21 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Sara Khan - 13-08-2026, 02:05 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 14-08-2026, 08:17 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 13-08-2026, 03:48 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 14-08-2026, 12:30 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 14-08-2026, 01:31 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 14-08-2026, 01:32 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 14-08-2026, 03:38 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Fanfunda - 14-08-2026, 04:58 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 15-08-2026, 04:58 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 15-08-2026, 05:19 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 15-08-2026, 05:24 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 15-08-2026, 05:35 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 15-08-2026, 05:43 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 15-08-2026, 09:39 PM
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