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Adultery अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़
अध्याय -21
 
अम्मी ने अपनी गर्दन हल्की सी पीछे की, उनकी आँखें हवस और बेबसी में पूरी तरह डूबने लगी थीं। उन्होंने बेहद उखड़ी और कांपती सांसों के साथ फुसफुसाते हुए पूछा, "तो अब क्या?"
 
"तो अब यह..."
 
विशाल ने अपने हाथों को उनके नाज़ुक बाज़ू से हटाकर सीधे उनकी पतली, मखमली कमर पर कस दिया और एक ज़ोरदार झटके के साथ अपनी लोअर बॉडी से चिपका लिया।
 
अम्मी के मुँह से एक कामुक और तेज़ 'आह्ह...' निकली, जब उनके नाज़ुक पेट और जांघों के ऊपरी हिस्से ने विशाल के पजामे के पीछे उस सख्त, गर्म लोहे जैसे 10 इंच के लंड की चुभन को महसूस किया।
 
उनके जिस्म में वासना का एक भयंकर करंट दौड़ गया।
 
"यह लिपस्टिक..." विशाल ने अपने चेहरे को उनके गुलाबी होठों के बिल्कुल करीब लाकर कहा। उसकी हवस से भरी सांसें अम्मी के चेहरे को झुलसा रही थीं।
 
"कल रात से इसके जायके का पागलपन सवार है मेरे सिर पर... इसका असली स्वाद तो मुझे अभी, इसी वक़्त चखना है।"
 
और अगले ही पल, विशाल ने अम्मी के उन म्यूटेड बेरी लिपस्टिक से सजे रसीले होठों पर किसी भूखे की तरह धावा बोल दिया।
 
यह कोई शराफत भरा चुंबन नहीं था—यह हवस, नग्न अधिकार और एक गैर औरत के जिस्म को सरेआम रौंदने की ज़हरीली प्यास का एक नंगा मेल था।
 
विशाल ने अम्मी के दोनों होठों को बुरी तरह अपने मुँह के अंदर दबोच लिया। वह उनके निचले रसीले होंठ को अपने दांतों से बेरहमी से काटते हुए, उनके मुँह के रस को किसी प्यासे जानवर की तरह घट-घट चूसने लगा।
 
अम्मी ने शुरुआत के चंद सेकंडों के लिए प्रतिरोध दिखाया। उनके कांपते गोरे हाथ विशाल के चौड़े, फौलादी सीने पर उसे पीछे धकेलने के लिए उठे, लेकिन जैसे ही विशाल के लंड की अकड़ उनके पेट पर और गहरे दबाव के साथ धंसी, उनका सारा विरोध पल भर में पिघलकर पानी-पानी हो गया।
 
वासना के उस तीखे स्वाद और ज़िल्लत के सुख ने अम्मी की रूह को गुलाम बना लिया। उन्होंने एक हल्की सुबकी के साथ अपना मुँह पूरा खोल दिया। उनकी गीली, गरम और कसमसाती हुई ज़बान खुद-ब-खुद विशाल के मुँह की गहराइयों में सरकती चली गई और उसकी ज़बान के साथ लिपटकर एक नग्न, बेशरम जंग लड़ने लगी।
 
उन्होंने अपनी बाहें विशाल की गर्दन के गिर्द कस के लपेट लीं, और अपने भरे हुए जिस्म को उसके सख्त जिस्म पर ज़ोर-ज़ोर से रगड़ना शुरू कर दिया।
 
मेरे कानों में उनकी गंदी, गीली और कामुक आवाज़ें गूँजने लगीं। श्लक... मम्मह... थप्प... सलाइवा और ज़बानों की इस जंग की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि मुझे लकड़ी के भारी दरवाज़े के बाहर तक साफ़ सुनाई दे रही थी।
 
विशाल ने किस को तोड़ते हुए, अम्मी के निचले रसीले होंठ को अपने तीखे दांतों में फँसाया और पूरी ताकत से ज़ोर से खींचा, जैसे वो उन्हें वहीं कच्चा चबा जाना चाहता हो। जब उसने अपने दांतों की पकड़ छोड़ी, तो अम्मी के सूजे हुए लाल होठों और विशाल के मुँह के बीच थूक और लार की एक लंबी, चमकती हुई रेशमी तार खिंच गई।
 
अम्मी की आँखें बेसुध होकर बंद थीं, उनका गोरा चेहरा पसीने की बूंदों और बेशर्म लाली से दहक रहा था। वो म्यूटेड बेरी  लिपस्टिक अब बुरी तरह फैलकर उनकी ठुड्डी और गालों तक बिखर चुकी थी। उस पल वो मेरी शराफ़त की मूरत 'अम्मी' बिल्कुल नहीं लग रही थीं, बल्कि हवस से तड़पती हुई कोई बेकाबू औरत नज़र आ रही थीं।
 
"उफ़्फ़..." आयशा बुरी तरह हांफ रही थीं। उनके गहरे गले से उनके भारी मम्मों का उभार इतनी तेज़ी से ऊपर-नीचे हिल रहा था कि कमीज़ का हर एक धागा तना जा रहा था।
 
आयशा ने  अपनी थरथराती उंगली से अपने कटे और सूजे हुए होंठों को छुआ, "तुमने... तुमने मेरी पूरी लिपस्टिक खराब कर दी, जानवर... अब मैं बाहर सब के सामने कैसे जाऊँगी? लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे?"
 
विशाल ने एक घटिया, शरारती मुस्कान के साथ अपनी उंगली अम्मी के गीले, फैले हुए लाल होठों पर फेरी और फिर उसी उंगली को अपने मुँह में डालकर बड़े मजे से चूस लिया।
 
"सोचेंगे कि दुल्हन से ज़्यादा सुहागरात का असली मज़ा तो आयशा जी ले रही हैं," विशाल ने अम्मी की आँखों में आँखें डालकर हवस भरी आवाज़ में फुसफुसाया, "और अभी तो सिर्फ लिपस्टिक खराब की है आयशा... अभी तो तुम्हारा पूरा हुलिया बिगाड़ना और तुम्हें पूरी तरह बिस्तरे पर रौंदना बाकी है।"
 
 
 
अम्मी ने थोड़ा पीछे हटते हुए, अपने चेहरे पर एक बेहद कातिल मुस्कुराहट बिखेरी। उन्होंने जान-बूझकर अपने कंधे पीछे की ओर खींचे, ताकि उनकी कमीज़ के नीचे दबे भारी सीने का उभार और ज़्यादा साफ और नुमाया होकर विशाल के सामने आ जाए।
 
"बातें कम करो ... सिर्फ 2 मिनट हैं तुम्हारे पास। जो करना है जल्दी करो, वरना मैं चली... मैं यहाँ 2 मिनट से ज़्यादा रुक ही नहीं सकती," अम्मी ने अपनी नशीली आँखों से उसे ताकते हुए उकसाया।
 
"2 मिनट में तो मैं तुम्हें वो याद दिला दूँगा जो तुम्हारे शौहर ने सालों में नहीं किया," विशाल  गुर्राया।
 
उसका भारी  हाथ अम्मी की नाज़ुक कमर पर रेंगता हुआ ऊपर की तरफ उठा... और सीधा उनके भरे हुए, कसे हुए मम्मे पर जा टिका।
 
उसने अपने पूरे पंजे की ताकत से उनके दाहिने मम्मे को बुरी तरह दबोच लिया। यद्यपि यह सब कपड़े के ऊपर से हो रहा था, पर उसकी पकड़ इतनी सख्त, नंगी और बेरहम थी कि अम्मी का पूरा जिस्म झटके से अकड़ गया। विशाल की चौड़ी उंगलियाँ उनके मखमली माँस के अंदर गहराई तक धँसती चली गईं।
 
अम्मी के सूजे हुए होठों से एक तेज़, दबी हुई कामुक चीख फूटी—"आआाह्ह्ह!"
 
उनकी आँखें एक पल के लिए खौफ और बेपनाह मजे के अहसास से फटी की फटी रह गईं, जैसे पूरे बदन में बिजली का भयंकर करंट दौड़ गया हो। उनकी सांसें गले में ही अटक कर रह गईं।
 
उनके घुटने इतने कमज़ोर पड़ गए कि अगर विशाल ने अपनी ताकत से उन्हें अपनी ओर न खींचा होता, तो वो वहीं फर्श पर गिर पड़तीं।
 
उन्होंने फौरन कांपते हाथों से विशाल की कलाई को पकड़ लिया। मुझे लगा कि वो अब अपनी बची-कुची गैरत दिखाएंगी, उसके हाथ को झटककर हटाएंगी और उस कमीने को एक ज़ोरदार थप्पड़ रसीद करेंगी।
 
लेकिन... ऐसा कुछ नहीं हुआ।
 
उन्होंने विशाल के हाथ को हटाया तक नहीं! बल्कि इसके उल्टे, उन्होंने अपने सीने को और आगे करके विशाल की सख्त हथेली पर दबा दिया, मानो उस पल वो पूरी तरह अपना आपा खो चुकी हों।
 
अम्मी ने अपनी सुराहीदार गर्दन पीछे की तरफ फेंक दी, उनकी आँखें बेसुध होकर मुँध गईं और उनके लाल होते चेहरे पर एक ऐसी राहत तैर गई, जैसे वो बरसों से इसी स्पर्श की तड़प में जल रही थीं।
 
"विशाल... ओ गॉड..." अम्मी बुरी तरह हांफते हुए फुसफुसाने लगीं, "तुमने... तुमने तो सच में दाबोच ही लिया..."
 
"हाँ जी आयशा जी, दबोच लिया!" विशाल ने उनके भारी उभार को अपनी पूरी हथेली में भरते हुए, उसे नीचे से ऊपर तक किसी बहुमूल्य चीज़ की तरह तोलते हुए कहा, "और क्या कमाल की चीज़ पकड़ी है मैंने यार... तेरे मम्मे कितने सॉफ्ट हैं आयशा! यह तो मेरे बड़े से हाथ में भी पूरे समा नहीं पा रहे हैं। कल रात भी जब इन्हें कसकर दबाया था, तभी से मेरे हाथ तरस रहे थे इन्हें दोबारा मसलने के लिए!"
 
अम्मी ने नशा-भरी आँखें खोलकर विशाल को देखा। उनका दिमाग चीख-चीखकर कह रहा था कि दूर हट जाएँ, भाग जाएँ यहाँ से...
 
लेकिन उनका बदन, उनका सुलगता हुआ रोंम-रोंम कुछ और ही चाह रहा था। बरसों की दबी हुई प्यास ने उनके होश-ओ-हवास पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था। उनके सूजे, रसीले होठों से अचानक ही बेहद बेशरम सवाल निकल गया।
 
"बड़े हैं?" अम्मी ने नशीली, हस्की आवाज़ में पूछा, और अपनी पतली कमर को आगे धकेलकर अपने मखमली सीने को विशाल की सख्त हथेली में और ज़्यादा ठूँस दिया।
 
"अरे बड़े क्या आयशा जी... पूरे दशहरी आम की तरह भारी और रसीले लग रहे हैं!" विशाल ने अपनी उंगलियों को उनके मम्मे के गोश्त में और गहराई तक गाड़ते हुए कहा। "कितने नरम हैं... और अंदर तक कितने भरे हुए। लग रहा है जैसे अभी इस कमीज़ की सिलाई फाड़कर बाहर निकल पड़ेंगे। देखो तो सही, मेरे ज़रा से छूने भर से कैसे अकड़ गए हैं!"
 
अम्मी ने हवस और बेबसी की मस्ती में अपना निचला कटे जैसा होंठ दांतों तले दबा लिया, "आआाह्ह्ह्ह्ह... विशाल... मत बोलो ऐसा..."
 
यह सुनते ही विशाल ने कपड़े के नीचे पत्थर की तरह सख्त हो चुके उनके निप्पल को अपने अंगूठे और पहली उंगली के बीच चुटकी में दबोचा और बुरी तरह मरोड़ दिया।
 
"स्स्सससीईई... आआाह्ह्ह!" अम्मी तड़पकर मचल उठीं।
 
उनका पूरा भरा हुआ जिस्म किसी तनी हुई कमान की तरह मुड़ गया। दर्द और बेपनाह सुख के इस भयंकर अहसास में उन्होंने विशाल के चौड़े कंधे पर अपने तीखे नाखुन गाड़ दिए। "वहाँ... उफ़्फ़ विशाल... वहाँ तो सीधे कलेजे में करंट लग रहा है..."
 
"सच-सच बताना आयशा... क्या पहली बार किसी मर्द ने तुम्हें इस तरह यहाँ छुआ है?" विशाल ने कमीनी शरारत से पूछा, जबकि उसका हाथ बिना रुके लगातार उनके मम्मे को कपड़े के ऊपर से मसल रहा था।
 
"हाँ... उफ़्फ़ हाँ..." अम्मी ने अपनी आँखें बंद करके सच उगल दिया। उनकी आवाज़ में एक बेशरम और गंदी ईमानदारी थी, "बरसों से... बरसों से मेरे यह उभार प्यासे तड़प रहे थे विशाल... तुम्हारे इन निर्दयी हाथों ने आज इन्हें फिर से ज़िंदा कर दिया..."
 
मेरे कानों में खून दौड़ने लगा। मेरी माँ... अपनी ज़बान से मान रही थीं कि वह मेरे बाप के साथ कभी खुश नहीं रहीं... और उन्हें इस कमीने विशाल के हाथों में वो सब मिल रहा था, जिसकी हवस में वो सदियों से जल रही थीं।
 
"तो फिर अब से ये दोनों मेरे हैं," विशाल ने पूरी ठसक और नंगे हक से कहा, और अपने दूसरे खाली हाथ को उठाकर अम्मी के बाएं मम्मे पर भी जमा दिया।
 
अब उनके दोनों भारी, रसीले उभार विशाल के भूखे पंजों के कब्ज़े में थे। "सुन लिया आयशा? ये दोनों अब सिर्फ और सिर्फ मेरे खिलौने हैं!"
 
अम्मी ने एक गहरा, कामुक और तृप्त सांस खींचा। उन्होंने अपनी सुराहीदार गर्दन झुकाकर अपना सिर विशाल के सीने पर टिका दिया।
"हाँ विशाल... तुम्हारे हैं... तरसाओ मत मुझे... जो करना है करो इनके साथ... " अम्मी अब पूरी तरह अपनी आबरू भूलकर उसके सामने मिन्नतें कर रही थीं।
 
विशाल ने अम्मी के दोनों भरे हुए, मखमली उभारों को अपने बड़े-बड़े पंजों में कसकर जकड़ रखा था। उसने दोनों हाथों को अंदर की तरफ दबाते हुए अम्मी के मम्मों को आपस में चिपका दिया, जिससे उनके सीने की क्लीवेज एक गहरी  घाटी की तरह और गहरी हो गई।
 
कुर्ती के गहरे गले के ऊपर से उनका गोरा, माखन जैसा मांस उबलकर बाहर की तरफ आ गया था, मानो उस टाइट कपड़े की बंदिशों को तोड़कर अभी विशाल के हाथों में बिखर जाना चाहता हो।
 
"आह... विशाल... धीरे..." अम्मी की गर्दन पीछे लुढ़क गयी, उनके बाल हवा में झूल गए। "दर्द हो रहा है..."
 
"होने दो," विशाल ने गुर्राते हुए कहा, और अपना चेहरा उनके दोनों उभारों के बीच बनी उस गहरी लकीर में रगड़ दिया। "मैं चाहता हूँ कि ये बाहर आ जाएँ। मेरा मन कर रहा है कि मैं यह महंगी कमीज़ अभी फाड़ दूँ और इन दूध जैसे गोलों को नंगा कर दूँ।"
 
अम्मी ने मस्ती में अपनी उंगलियां विशाल के बालों में फँसा लीं और उसका सर अपने सीने पर दबा दिया। "आआाह्ह्ह्ह्ह्ह….अभी नहीं विशाल…..."
 
मेरी सांसें अटक गयीं। विशाल ने अपना सर उठाया, उसकी आँखें हवस से लाल थीं। "हाँ….अभी नहीं... अभी अगर फाड़ दिया तो बाहर तमाशा हो जाएगा। लेकिन ... जब हम अकेले होंगे... तब मैं तुम्हारे जिस्म पर धागा भी नहीं रहने दूँगा।"
 
उसने अपने हाथ वहाँ से हटाए नहीं, बल्कि उन्हें और ज़ोर से मसलते हुए, अपना निचला हिस्सा  अम्मी की तरफ धकेला।
 
विशाल ने  अपना सख्त लुंड-जो उसके कुर्ते के नीचे एक साफ़, कठोर उभार  बन चुका था ,सीधा अम्मी के पेट और उनकी जांघों के बीच वाले हिस्से  पर रगड़ दिया।
 
"ओह्ह..." अम्मी की आँखें पलट गयीं। उनका पूरा वजूद कांप उठा।
 
"महसूस कर रही हो?" विशाल फुसफुसाया। उसने अपने हिप्स को गोल घुमाते हुए , अपनी सख्ती को अम्मी की सबसे सेंसिटिव जगह पर रगड़ा। "यह सिर्फ तुम्हारे लिए तैयार हुआ है, आयशा। बताओ, कैसा लग रहा है?"
 
अम्मी ने बुरी तरह हांफते हुए, अपने दोनों हाथ विशाल की कमर पर डाल दिए। उनका पूरा जिस्म आग की तरह तप रहा था।
 
उसकी सांसें उखड़ी हुई थीं।
 
"फक, आयशा..." विशाल ने अम्मी के माथे पर अपना माथा टिकाते हुए कहा। "मुझ से अब रहा नहीं जा रहा... तुम्हारा यह जिस्म... यह खुशबू... मुझसे अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा।"
 
उसने अचानक अम्मी की कमीज़ के दामन को पकड़ लिया और उसे ऊपर उठाने की कोशिश की। "मैं अभी... इसी वक्त तुम्हारे अंदर जाना चाहता हूँ। यहाँ कोई नहीं आएगा।"
 
अम्मी ने एकदम से उसका हाथ पकड़ लिया और उसे ज़ोर से नीचे धकेल दिया। "नहीं... विशाल, नहीं। रुको।"
 
"क्यों रुकूँ?" विशाल गुर्राया, उसने अपने क्रॉच को उनके पेट पर रगड़ा, ज़िद करते हुए।
 
"क्यों तड़पा रही हो? देखो मेरा क्या हाल है। बस शलवार नीचे करो और मुझे एंटर होने दो। दो मिनट लगेंगे।"
 
"पागल मत बनो," अम्मी ने उसे हल्का सा धक्का दिया, हालाँकि उनकी आँखों में भी वही भूख थी, पर डर और होश भी था।
 
"यहाँ? इस धूल और मिट्टी में?"
 
"तो क्या फर्क पड़ता है?" विशाल ने उनकी गर्दन पर पागलों की तरह किस करते हुए मनाने की कोशिश की, उसका हाथ उनके नाड़े की तरफ बढ़ा। "हमें बस एक दूसरे से मतलब है। मिट्टी हो या बिस्तर... मैं बस तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ। अभी।"
 
"मुझे फर्क पड़ता है!" अम्मी ने झटके से उसका हाथ अपने सीने से हटा दिया।
 
उन्होंने हड़बड़ाकर अपनी बिखरी हुई कमीज़ संभाली और अपनी उखड़ती सांसों पर काबू पाने की नाकाम कोशिश करने लगीं।
 
शायद उनके अंदर की सोई हुई औरत को अपनी मर्यादा, परिवार और इस जगह का ख्याल आ गया था, इसलिए वह बदहवास होकर विशाल से दूर हटने की कोशिश कर रही थीं।
 
विशाल ने पूरी तरह फ्रस्ट्रेट होकर एक गहरी सांस ली और पास की दीवार पर ज़ोर से मुक्का मारा।
"तुम तड़पाने में बेहद माहिर हो आयशा... तो अब क्या करूँ मैं इसका?" उसने गुस्से, हवस और बेताबी से पैंट के ऊपर तने हुए अपने विशालकाय, उभरे हुए लंड की तरफ इशारा किया। "क्या इसे ऐसे ही तड़पता हुआ छोड़ दूँ?"
 
अम्मी ने शर्म और झिझक से फौरन अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लिया।
 
लेकिन विशाल एक कदम आगे बढ़ा, उसने अम्मी की कलाई पकड़ी और उनके कांपते हुए हाथ को कपड़े के ऊपर से ही सीधे अपने सख्त और गर्म लंड पर ले जाकर दबा दिया। अम्मी की हथेली के नीचे विशाल की नसों का फड़कना साफ महसूस हो रहा था।
 
"सब्र करो..." अम्मी ने अपना हाथ वहाँ से छुड़ाने की हल्की सी नाकाम कोशिश करते हुए विशाल की आँखों में देखा और नशीली फुसफुसाहट में कहा, "सब्र का फल... बहुत मीठा होता है।"
 
आयशा (मन में): "हे अल्लाह! यह मैं क्या करने जा रही थी? मैं तो यहाँ सायमा को इस दरिंदे से बचाने आई थी... लेकिन जब भी मैं इस विशाल के पास होती हूँ, तो मेरे जिस्म और दिमाग को आखिर हो क्या जाता है? मुझे हर हाल में इससे दूर जाना होगा... मुझे खुद को संभालने और सोचने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए।"
 
"कब तक?" विशाल ने चिढ़कर पूछा। "और इंतज़ार नहीं होता मुझसे, आयशा!"
 
आयशा ने जल्दी से अपना दिमाग चलाते हुए कहा। "रात के करीब 10 बजे... जब सायमा की डोली रुखसत हो जाएगी।"
 
आयशा मन ही मन सोच रही थीं कि इस बहाने उन्हें सोचने और खुद को संभालने का थोड़ा वक्त मिल जाएगा।
 
पर विशाल ने फौरन इनकार में सिर हिला दिया, "नहीं! मुझे तुमसे रुखसती से पहले मिलना है। हर हाल में।"
 
"रुखसती से पहले? लेकिन हम मिलेंगे कहाँ?" आयशा ने घबराकर पूछा।
 
विशाल ने अम्मी की आँखों में देखते हुए बड़ी बेबाकी से कहा, "तुम्हारे कमरे में मिलेंगे।"
 
"मेरे कमरे में?" अम्मी ने साफ़ ना में सिर हिलाया। "सवाल ही पैदा नहीं होता! मेरे कमरे को तो इन लोगों ने औरतों का मुख्य विश्राम कक्ष बना रखा है। वहाँ माँ जी का सारा सामान फैला पड़ा है और आधी से ज़्यादा औरतें वहीं अपना रूप-श्रृंगार सँवार रही हैं। वहाँ तो चैन से सांस लेने तक की जगह नहीं है, मिलना तो दूर की बात है।"
 
विशाल ने पूरी तरह से फ्रस्ट्रेट होकर कहा, "तो फिर कहाँ? हवेली का हर एक कमरा मेहमानों से ठसाठस भरा हुआ है।"
 
आयशा ने मन ही मन राहत की सांस ली और सोचा, 'शुक्र है अल्लाह का, बची... कम से कम अभी के लिए तो पीछा छूटा।'
 
विशाल ने कुछ देर गहरे विचार में डूबकर सोचा, और फिर अचानक उसके चेहरे पर वही कमीनी मुस्कुराहट तैर गई।
 
"एक जगह खाली है," विशाल ने आँखों में चमक लाते हुए कहा।
 
अम्मी ने अचरज से पूछा, "कौन सी जगह?"
 
"हवेली के पीछे एनेक्सी का कमरा नंबर 3!" विशाल ने जवाब दिया।
 
"गेस्ट विंग?" अम्मी ने चौंककर कहा, "वहाँ तो सारे बाराती ठहरे हुए होंगे!"
 
"नहीं होंगे," विशाल ने अम्मी को समझाते हुए कहा, "सारे बाराती अभी मेन हॉल में खाना खाने में बिजी हैं, और खाना खाते ही वो सीधा मेन गेट पर जाएँगे रुखसती के इंतज़ाम के लिए। वो सारे कमरे अभी बिल्कुल सुनसान और खाली पड़े हैं... मुझे अच्छी तरह पता है क्योंकि हम सब वहीं तो ठहरे हुए हैं।"
 
"लेकिन मैं इतनी भीड़ और रिश्तेदारों के बीच में से अकेले कैसे निकलूँगी?" आयशा ने झिझकते हुए सवाल किया।
 
आयशा दरअसल मन ही मन बहाने बना रही थीं ताकि विशाल की इस योजना को कुछ देर के लिए और टाला जा सके और उन्हें सोचने का मौका मिल जाए।
 
"बहाना बिल्कुल आसान है," विशाल ने उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा। "तुम अपनी माँ से कह देना कि तुम्हारे कमरे में बहुत शोर और भीड़भड़ाका है, जिसकी वजह से तुम्हारे सिर में तेज़ माइग्रेन का दर्द उठ रहा है। तुम्हें आधे घंटे के लिए बिल्कुल शांति और खामोशी चाहिए ताकि तुम थोड़ा लेट सको। इसीलिए तुम आराम करने के लिए खाली गेस्ट विंग की तरफ जा रही हो जहाँ बिल्कुल शोर न हो।"
 
आयशा विशाल का यह शातिर दिमाग और फुलप्रूफ प्लान सुनकर भौचक्की रह गईं। उनके दिमाग में एक ही ख्याल आया—'हे अल्लाह, कितना चालाक और कमीना है यह लड़का! हर बात का कोई न कोई घटिया रास्ता ढूँढ ही लेता है।'
 
आयशा ने मन ही मन यह सब सोचा, पर विशाल की तरफ देखते हुए अपनी उखड़ती सांसों के साथ फुसफुसाकर बोलीं, "हर बात का काट और जवाब तैयार रहता है न तुम्हारे पास?"
 
विशाल: "बिल्कुल! रूम नंबर 3... वहाँ खिड़कियों के भारी पर्दे गिरे होंगे। तुम्हें आना ही होगा आयशा, मुझे कोई बहाना या इनकार नहीं चाहिए।"
 
विशाल अचानक आयशा की तरफ एक कदम और बढ़ा और उसने बिना किसी चेतावनी के दोबारा अपने दोनों हाथों में अम्मी के भारी, सुडौल मम्मों को भर लिया।
 
अम्मी: "अरे! यह... यह क्या कर रहे हो विशाल?"
 
विशाल: "अरे, अभी थोड़ी देर पहले तुमने ही तो कहा था कि यह अब सिर्फ मेरे हैं... तो बस, अपने ही खिलौनों से प्यार कर रहा हूँ आयशा!"
 
"दरवाज़ा तुम्हें खुला ही मिलेगा," विशाल ने उनके मम्मों को अपनी हथेलियों में सहलाते हुए बड़े बेबाक अंदाज़ में कहा। फिर उसके चेहरे पर धीरे-धीरे एक शरारती और घटिया मुस्कुराहट तैर गई, "एनेक्सी के कमरा नंबर 3 में तुम्हें बहुत अच्छे से प्यार करूँगा। बिल्कुल पूरा नंगा करके! उस वक्त तुम्हारा कोई बहाना नहीं चलेगा आयशा।"
 
"वही तो मैं भी चाहती हूँ..." अम्मी ने अपनी बिखरी हुई जुल्फों को सँवारते हुए नशीली आवाज़ में कहा। "मैं भी उतनी ही प्यासी हूँ विशाल, जितने तुम हो... शाम को एनेक्सी में पूरा हिसाब-किताब बराबर करेंगे।"
 
(पर आयशा के मन में कुछ और ही उथल-पुथल मच रही थी—'हे अल्लाह! अब कुछ नहीं हो सकता... मेरी आबरू तो वैसे भी तेल लेने गई। बड़ी तीस मार खाँ बन रही थी, पर इसके आगे सब हार गई।')
 
"ठीक है," विशाल ने उनकी बात मानते हुए कहा। "अब यहाँ से जाओ, इससे पहले कि मेरा इरादा बदल जाए और मैं तुम्हें यहीं ज़मीन पर पटक दूँ!"
 
"जा रही हूँ..." अम्मी ने फुसफुसाकर कहा और दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ा दिए।
 
"अरे रुको!" विशाल ने पीछे से टोकते हुए चुटकी ली, "बाहर जाने से पहले अपनी लिपस्टिक तो ठीक कर लो। चेहरा देखकर ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने तुम्हारा मुँह बुरी तरह नोच डाला हो!"
 
"तुम चुप ही रहो!" अम्मी ने झेंपते और शर्माते हुए कहा। उन्होंने जल्दी से ज़मीन पर गिरे अपने दुपट्टे को उठाया, उसे झाड़ा और सलीके से सिर पर ओढ़ लिया।
 
फिर उन्होंने पास के लकड़ी के संदूक पर रखे अपने क्लच और मोबाइल को उठाया। क्लच की ज़िप खोलकर एक वेट टिश्यू निकाला और शीशे में देखे बिना ही अपने होठों और ठुड्डी पर फैली लिपस्टिक को अच्छी तरह साफ़ किया। इस्तेमाल किए हुए उस लाल टिश्यू को वहीं संदूक के पास फेंककर वे बाहर निकलने के लिए दरवाज़े की ओर बढ़ गईं।
 
दरवाज़े के पीछे छिपा मेरा वजूद थर-थर कांप रहा था, मेरी सांसें जैसे सीने में ही अटक कर रह गई थीं। वो बाहर आ रही थीं!
 
मैंने बिना एक पल की देरी किए, तुरंत वहाँ से पीछे हटने का फैसला किया। मेरा सिर खौल रहा था, लेकिन अब मेरे पास उनकी इस घटिया मुलाकात का पूरा प्लान था।
Deepak Kapoor
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RE: अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़ - by Deepak.kapoor - 14-09-2026, 05:49 AM



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