14-09-2026, 04:58 AM
रविवार की सुबह थी। छुट्टी का दिन।
अमन अभी गहरी नींद में था। कमरे में हल्की ठंडक फैली हुई थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। इस बार उन्होंने सिटकिनी लगा दी। बिस्तर के पास आकर उन्होंने चादर हटाई और अमन की पैंट व कच्छा दोनों नीचे सरका दिए। लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त बाहर आ गया।
कमला ने दोनों हाथों से उसे पकड़ा और बिना किसी हिचकिचाहट के मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ सिर चूसा, फिर धीरे-धीरे और गहराई तक ले गई। जीभ घुमाती रहीं। अमन की साँसें तेज होने लगीं। उसकी पलकें फड़कने लगीं। अचानक उसकी आँखें खुल गईं।
कमला चाची उसके लंड को मुँह में लिए हुए थीं।
अमन ने एक पल में स्थिति समझ ली। उसने तेजी से कमला का सिर पकड़ा और उन्हें ऊपर खींच लिया। दोनों की आँखें मिलीं। कमला की आँखों में हैरानी और उत्तेजना दोनों थी। अमन ने उनके होंठों पर जोर से अपने होंठ रख दिए। गहरा चुंबन। जीभ अंदर तक चली गई। कमला पहले सहम गईं, फिर जवाब देने लगीं।
अमन ने उनका ब्लाउज ऊपर किया। भारी स्तन बाहर आ गए। उसने दोनों निप्पलों को बारी-बारी से मुँह में लिया और जोर से चूसने लगा। कमला की सिसकारी निकली। उनके हाथ अमन के बालों में फँस गए।
“अमन… धीरे…” वे फुसफुसाईं।
तभी बाहर से आवाज आई।
“कमला! कहाँ हो? बाबा तुम्हें बुला रहे हैं!”
कमला की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने तेजी से ब्लाउज ठीक किया, अमन को धक्का दिया और कमरे से भाग निकलीं। दरवाजा खुला छोड़ गईं।
अमन बिस्तर पर बैठा रह गया। लंड अभी भी तना हुआ था। साँसें तेज चल रही थीं। कमला चाची का स्वाद अभी भी होंठों पर बाकी था।
थोड़ी देर बाद उसने कपड़े पहने और घर से निकल पड़ा। छुट्टी का दिन था। मन बेचैन था। वह गाँव की तरफ घूमने निकल गया। खेतों के बीच वाली पगडंडी पर चलते हुए उसकी नजर रुक्साना पर पड़ी। वह एक मेड़ पर बैठी हुई थीं। साड़ी का पल्लू हल्का खिसका हुआ था। गदराया हुआ बदन सुबह की धूप में चमक रहा था।
अमन पास गया।
“काकी, कैसे हैं?” उसने पूछा।
रुक्साना ने सिर उठाया। आँखों में हल्की मुस्कान थी। “बाबूजी के बेटे? इतनी सुबह यहाँ?”
अमन ने उनके बगल में खड़े होकर कहा, “घूमने निकला था। काकी, आम तो अब मीठे आ गए होंगे खेत में?”
रुक्साना ने उसकी तरफ देखा। “हाँ… बगीचे में अंदर आम पक गए हैं।”
अमन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप मुझे दिखा देंगी? अगर मैं आऊँ तो… आपके वाले आम।” आवाज में हल्की शरारत थी।
रुक्साना की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने धीरे से जवाब दिया, “बिल्कुल… पके आम तो खाने के लिए ही होते हैं।”
दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। तभी पीछे से आवाज आई।
“माँ!”
राजिया आ रही थी। रुक्साना ने तुरंत पल्लू ठीक किया। अमन ने भी सामान्य मुस्कान बना ली। राजिया ने दोनों को एक साथ देखकर थोड़ी देर घूरा। फिर रुक्साना ने कहा, “चल बेटी, घर चलते हैं।”
तीनों अपने-अपने रास्ते निकल गए। अमन के मन में रुक्साना की आँखों वाली चमक रह गई।
घर लौटकर अमन ने हाथ-मुँह धोया। आँगन में कमला चाची अकेली थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आ।”
अमन पास गया। कमला ने धीमी आवाज में कहा, “तू बहुत शैतान हो गया है।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। “चाची, शुरुआत तो आपने ही की थी। साँप की बिल में हाथ डालोगे तो साँप तो डसेगा ही ना।”
कमला चाची कुछ कहने वाली थीं कि अमन ने अचानक आगे बढ़कर उनके गाल पर जोर से एक चुंबन कर लिया। फिर तेजी से मुड़कर अंदर भाग गया। कमला चाची स्तब्ध खड़ी रह गईं। गाल पर अमन के होंठों की गर्माहट बाकी थी।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की बातें बताईं—सुबह कमला चाची वाला पूरा घटनाक्रम (चूसना, उसका जाग जाना, चुंबन और स्तन चूसना, फिर बाधित होना), घर आकर कमला से बात और अचानक किया गया चुंबन। रुक्साना वाली मुलाकात उसने जानबूझकर नहीं बताई।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “कमला चाची के साथ अब तुमने सीमा पार कर दी। यह घर के अंदर की आग है। बहुत सावधानी से चलना। एक गलती और सब खुल सकता है।”
रेणु ने इस बार ज्यादा कुछ नहीं किया। बस अमन के बालों में हाथ फेरा और चली गई।
रात गहरी हो चुकी थी। अमन को प्यास लगी। वह पानी पीने के लिए उठा। गलियारे से गुजरते हुए पीछे की तरफ से हल्की आवाजें आ रही थीं—सिसकारियाँ और बिस्तर की हल्की चरमराहट। अमन ने धीरे से आवाज की दिशा में कदम बढ़ाए।
बाबा रामप्रसाद के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। अंदर हल्की दीये की रोशनी थी। अमन ने दरार से अंदर झाँका।
आँखें फटी की फटी रह गईं।
बिस्तर पर बाबा रामप्रसाद अपनी माँ सुशीला के ऊपर थे। सुशीला की साड़ी कमर तक उठी हुई थी। बाबा उनके बीच में थे और जोर-जोर से धक्के लगा रहे थे। सुशीला के मुँह से दबी हुई सिसकारियाँ निकल रही थीं।
“आह्ह… बाबा… धीरे…” सुशीला की आवाज काँप रही थी।
बाबा ने जवाब में और जोर से धक्का मारा। “आज पूरी लूँगा तुझे…”
अमन पत्थर की तरह खड़ा रह गया। साँसें अटक गई थीं। माँ और दादा…
दृश्य अभी शुरू ही हुआ था।
अमन दरवाजे की दरार से अंदर देखता रह गया। साँसें अटक गई थीं। दिमाग समझ नहीं पा रहा था कि वह क्या देख रहा है।
कमरे में हल्की दीये की रोशनी थी। बिस्तर पर बाबा रामप्रसाद अपनी बहू सुशीला के ऊपर थे। सुशीला की साड़ी कमर तक उठी हुई थी। उनकी दोनों टाँगें बाबा की कमर के आसपास लिपटी हुई थीं। बाबा धीरे-धीरे लेकिन गहराई से धक्के लगा रहे थे। हर धक्के के साथ सुशीला की हल्की सिसकारी निकल रही थी।
बाबा ने सुशीला का चेहरा दोनों हाथों में लिया। आँखों में आँखें डालकर बोले,
“बहू… आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो।”
सुशीला की आँखें नम थीं। उन्होंने बाबा की दाढ़ी में उंगलियाँ फेरते हुए धीरे से कहा,
“बाबा… आप मुझे इस उम्र में भी ऐसी नजरों से देखते हो…”
बाबा ने उनके होंठों पर बहुत नर्म चुंबन किया। जीभ नहीं थी, सिर्फ होंठों का धीमा स्पर्श। फिर उन्होंने सुशीला के गले, ठुड्डी और गालों पर हल्के-हल्के चुंबन दिए। सुशीला की साँसें तेज हो गईं। उन्होंने बाबा को और करीब खींच लिया।
बाबा ने धीरे से लंड बाहर निकाला। सुशीला कराह उठीं। फिर बाबा उनके बगल में लेट गए और सुशीला को अपनी तरफ मोड़ लिया। दोनों आमने-सामने थे। बाबा ने सुशीला की एक टाँग अपनी कमर पर चढ़ाई और फिर से अंदर प्रवेश किया। इस बार गति और भी धीमी और गहरी थी।
“बहू… तुम्हारी यह गर्माहट… सालों से वैसी की वैसी है,” बाबा ने फुसफुसाकर कहा।
सुशीला ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ बाबा के होंठों से जा लगे। चुंबन लंबा और भावुक था। दोनों एक-दूसरे को सहला रहे थे। बाबा का एक हाथ सुशीला की पीठ पर था, दूसरा उनके घने बालों में। सुशीला के नाखून बाबा की पीठ पर हल्के-हल्के घूम रहे थे।
थोड़ी देर बाद बाबा उठे। उन्होंने सुशीला को गोद में उठा लिया। सुशीला ने दोनों हाथ उनके गले में डाल दिए। बाबा खड़े-खड़े उन्हें सहारा देते हुए अंदर तक चले गए। सुशीला का वजन उनके हाथों में था। हर बार जब बाबा ऊपर उठाते, सुशीला की सिसकारी निकलती।
“बाबा… इतना उठाकर… आप थक जाओगे…” सुशीला ने काँपती आवाज में कहा।
बाबा ने उनके माथे पर चुंबन करते हुए जवाब दिया, “बहू को गोद में लेकर प्यार करना थकान नहीं देता।”
वे कुछ देर तक खड़े-खड़े ही धीमे-धीमे हिलते रहे। फिर बाबा सुशीला को फिर से बिस्तर पर लिटा दिए। इस बार उन्होंने सुशीला के दोनों पैर अपने कंधों पर रख लिए। पूरा शरीर करीब था। बाबा झुके और सुशीला के स्तनों को बारी-बारी से चूमने लगे। निप्पल को मुँह में लेकर हल्के से चूसा। सुशीला की कमर उठ गई।
“आह्ह… बाबा… वहाँ…”
बाबा ने मुस्कान के साथ फिर से गहराई से धक्के लगाने शुरू कर दिए। हर धक्का प्यार से भरा हुआ था। कोई जल्दबाजी नहीं थी। सिर्फ दो शरीर एक-दूसरे में समा रहे थे।
सुशीला ने बाबा का चेहरा पकड़कर अपनी तरफ खींचा। दोनों की साँसें एक-दूसरे से मिल रही थीं। आँखों में आँखें थीं।
“बाबा… आप मुझे कभी बहू की तरह नहीं… पत्नी की तरह चाहते हो,” सुशीला ने बहुत धीमी आवाज में कहा।
बाबा ने उनके होंठों पर फिर से चुंबन किया। “बहू हो तुम… लेकिन मेरे दिल में पत्नी की जगह भी रखती हो।”
कमरे में सिर्फ सिसकारियाँ और धीमी चरमराहट की आवाजें थीं। दीये की लौ काँप रही थी। दीवार पर दोनों की छायाएँ हिल रही थीं।
अमन दरवाजे के बाहर पत्थर की तरह खड़ा था। आँखें फटी हुई थीं। साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। माँ और दादा… इतने प्यार से…
दीये की लौ अभी भी काँप रही थी। कमरे में पसीने और हल्की सुगंध की मिली-जुली खुशबू फैली हुई थी। बाबा रामप्रसाद ने सुशीला को धीरे से पलटा। सुशीला अब घुटनों और हाथों के बल बिस्तर पर थी। उनकी साड़ी पूरी तरह कमर के ऊपर उठ चुकी थी। गोल और कोमल गाँड दीये की रोशनी में चमक रही थी।
बाबा ने पीछे से दोनों हाथों से उनकी कमर पकड़ी। बहुत धीरे से अपने लंड को उनकी चूत पर लगाया और अंदर तक चला गया। सुशीला की लंबी, काँपती सिसकारी निकली।
“बाबा… इतना गहरा…”
बाबा ने झुककर उनकी पीठ पर चुंबन किए। कंधे की हड्डी से लेकर कमर तक। हर चुंबन के साथ वे धीरे-धीरे अंदर-बाहर हो रहे थे। कोई जल्दबाजी नहीं थी। सिर्फ गहराई और प्यार।
“बहू… तुम्हारा यह शरीर… आज भी वैसा ही लगता है जैसे पहली बार छुआ था,” बाबा ने फुसफुसाकर कहा। उनकी आवाज में एक अजीब सी गर्माहट और यादें दोनों थीं।
सुशीला ने सिर घुमाकर पीछे देखा। आँखें नम थीं। “बाबा… आप मुझे हमेशा इतना संभालकर रखते हो… जैसे मैं आपके सिवा किसी की नहीं।”
बाबा ने उनकी कमर और कसकर पकड़ी। धक्के थोड़े गहरे हो गए, लेकिन फिर भी कोमल। हर बार जब वे अंदर जाते, सुशीला की सिसकारी निकलती और वे उनकी पीठ पर अपना माथा टिका देते।
थोड़ी देर बाद बाबा रुके। उन्होंने सुशीला को फिर से अपनी तरफ मोड़ा। दोनों आमने-सामने हो गए। बाबा ने सुशीला को गोद में उठा लिया। सुशीला ने दोनों टाँगें उनकी कमर पर लपेट लीं। बाबा खड़े-खड़े उन्हें सहारा देते हुए फिर से अंदर तक चले गए।
सुशीला का वजन पूरी तरह उनके हाथों में था। बाबा उन्हें हल्के-हल्के ऊपर-नीचे कर रहे थे। हर बार जब सुशीला नीचे आतीं, उनका सीना बाबा के सीने से चिपक जाता। दोनों के दिल की धड़कनें एक-दूसरे से मिल रही थीं।
“बाबा… मुझे पकड़कर… आप थक तो नहीं रहे?” सुशीला ने काँपती आवाज में पूछा।
बाबा ने उनके माथे से बाल हटाते हुए जवाब दिया, “बहू को इस तरह पास रखना… थकान नहीं, सुकून देता है।”
वे कुछ देर तक खड़े-खड़े ही धीमे-धीमे हिलते रहे। फिर बाबा सुशीला को संभालते हुए बिस्तर पर ले आए। इस बार उन्होंने सुशीला को अपने ऊपर बैठा लिया। सुशीला की दोनों टाँगें उनकी कमर के दोनों तरफ थीं। बाबा ने नीचे से धीरे-धीरे धक्के लगाए। सुशीला ने दोनों हाथ उनके सीने पर रख दिए।
दोनों की आँखें मिली हुई थीं। बाबा ने सुशीला के स्तनों को दोनों हाथों से सहलाया। फिर उठकर बैठ गए। अब दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब थे। बाबा ने सुशीला के होंठों को पकड़ लिया। चुंबन गहरा और लंबा था। जीभ धीरे-धीरे एक-दूसरे के मुँह में घूम रही थी।
सुशीला की सिसकारियाँ चुंबन के बीच में दबी हुई निकल रही थीं। बाबा का एक हाथ उनकी पीठ पर था, दूसरा उनके बालों में। सुशीला की उंगलियाँ बाबा की सफेद दाढ़ी में फँसी हुई थीं।
“बहू… आज तुम और भी ज्यादा प्यार कर रही हो,” बाबा ने होंठ अलग करते हुए कहा।
सुशीला ने उनकी आँखों में देखा। “क्योंकि आज आप मुझे सिर्फ बहू नहीं… अपनी स्त्री की तरह चाह रहे हो।”
बाबा ने उन्हें फिर से अपनी छाती से लगा लिया। धक्के अब थोड़े तेज हो गए थे, लेकिन फिर भी उनमें प्यार की गर्माहट बाकी थी। सुशीला की साँसें तेज होने लगीं। उनकी कमर अपने आप हिलने लगी। बाबा ने उनकी कमर पकड़कर उन्हें और करीब खींच लिया।
“आह्ह… बाबा… मैं… आ रही हूँ…” सुशीला की आवाज टूट रही थी।
बाबा ने उनके गले में मुँह रखकर कहा, “आ जाओ बहू… मेरे साथ…”
सुशीला का शरीर अकड़ गया। उन्होंने बाबा को जोर से जकड़ लिया। लंबी सिसकारी निकलते हुए उनका पानी निकल गया। बाबा ने भी कुछ गहरे धक्कों के बाद उन्हें कसकर पकड़ लिया। गरम पानी की धार उन्होंने सुशीला के अंदर छोड़ दी। दोनों एक-दूसरे से चिपके हुए काँपते रहे।
बहुत देर तक कोई नहीं बोला। सिर्फ साँसें चल रही थीं। बाबा ने सुशीला के बालों में हाथ फेरा। सुशीला ने उनका माथा अपने होठों से छू लिया।
“बाबा…” उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा।
“हाँ बहू।”
“आप मुझे हमेशा ऐसे ही रखना… छुपकर ही सही।”
बाबा ने उनके माथे पर लंबा चुंबन किया। “जब तक साँस है… रखूँगा।”
दोनों उसी हालत में लेटे रहे। दीये की लौ धीरे-धीरे छोटी होती जा रही थी। कमरे में एक अजीब सी शांति छा गई थी—पाप की नहीं, बल्कि एक गहरे, छुपे हुए प्यार की शांति।
दरवाजे के बाहर अमन अभी भी खड़ा था। शरीर काँप रहा था। आँखों में जो कुछ देखा था, वह दिमाग में बार-बार दोहराया जा रहा था। माँ की सिसकारियाँ… दादा के प्यार भरे शब्द… दोनों का एक-दूसरे में खो जाना…
वह धीरे से पीछे हटा। गलियारे में अँधेरा था। पैर काँप रहे थे। उसने पानी पीना तो दूर, कमरे तक पहुँचने में भी मुश्किल महसूस की।
बिस्तर पर लेटते समय उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। छत की तरफ देखता रहा।
आज घर के सबसे बड़े राज़ ने उसके सामने अपना चेहरा खोल दिया था।
अमन अभी गहरी नींद में था। कमरे में हल्की ठंडक फैली हुई थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। इस बार उन्होंने सिटकिनी लगा दी। बिस्तर के पास आकर उन्होंने चादर हटाई और अमन की पैंट व कच्छा दोनों नीचे सरका दिए। लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त बाहर आ गया।
कमला ने दोनों हाथों से उसे पकड़ा और बिना किसी हिचकिचाहट के मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ सिर चूसा, फिर धीरे-धीरे और गहराई तक ले गई। जीभ घुमाती रहीं। अमन की साँसें तेज होने लगीं। उसकी पलकें फड़कने लगीं। अचानक उसकी आँखें खुल गईं।
कमला चाची उसके लंड को मुँह में लिए हुए थीं।
अमन ने एक पल में स्थिति समझ ली। उसने तेजी से कमला का सिर पकड़ा और उन्हें ऊपर खींच लिया। दोनों की आँखें मिलीं। कमला की आँखों में हैरानी और उत्तेजना दोनों थी। अमन ने उनके होंठों पर जोर से अपने होंठ रख दिए। गहरा चुंबन। जीभ अंदर तक चली गई। कमला पहले सहम गईं, फिर जवाब देने लगीं।
अमन ने उनका ब्लाउज ऊपर किया। भारी स्तन बाहर आ गए। उसने दोनों निप्पलों को बारी-बारी से मुँह में लिया और जोर से चूसने लगा। कमला की सिसकारी निकली। उनके हाथ अमन के बालों में फँस गए।
“अमन… धीरे…” वे फुसफुसाईं।
तभी बाहर से आवाज आई।
“कमला! कहाँ हो? बाबा तुम्हें बुला रहे हैं!”
कमला की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने तेजी से ब्लाउज ठीक किया, अमन को धक्का दिया और कमरे से भाग निकलीं। दरवाजा खुला छोड़ गईं।
अमन बिस्तर पर बैठा रह गया। लंड अभी भी तना हुआ था। साँसें तेज चल रही थीं। कमला चाची का स्वाद अभी भी होंठों पर बाकी था।
थोड़ी देर बाद उसने कपड़े पहने और घर से निकल पड़ा। छुट्टी का दिन था। मन बेचैन था। वह गाँव की तरफ घूमने निकल गया। खेतों के बीच वाली पगडंडी पर चलते हुए उसकी नजर रुक्साना पर पड़ी। वह एक मेड़ पर बैठी हुई थीं। साड़ी का पल्लू हल्का खिसका हुआ था। गदराया हुआ बदन सुबह की धूप में चमक रहा था।
अमन पास गया।
“काकी, कैसे हैं?” उसने पूछा।
रुक्साना ने सिर उठाया। आँखों में हल्की मुस्कान थी। “बाबूजी के बेटे? इतनी सुबह यहाँ?”
अमन ने उनके बगल में खड़े होकर कहा, “घूमने निकला था। काकी, आम तो अब मीठे आ गए होंगे खेत में?”
रुक्साना ने उसकी तरफ देखा। “हाँ… बगीचे में अंदर आम पक गए हैं।”
अमन ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप मुझे दिखा देंगी? अगर मैं आऊँ तो… आपके वाले आम।” आवाज में हल्की शरारत थी।
रुक्साना की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने धीरे से जवाब दिया, “बिल्कुल… पके आम तो खाने के लिए ही होते हैं।”
दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। तभी पीछे से आवाज आई।
“माँ!”
राजिया आ रही थी। रुक्साना ने तुरंत पल्लू ठीक किया। अमन ने भी सामान्य मुस्कान बना ली। राजिया ने दोनों को एक साथ देखकर थोड़ी देर घूरा। फिर रुक्साना ने कहा, “चल बेटी, घर चलते हैं।”
तीनों अपने-अपने रास्ते निकल गए। अमन के मन में रुक्साना की आँखों वाली चमक रह गई।
घर लौटकर अमन ने हाथ-मुँह धोया। आँगन में कमला चाची अकेली थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आ।”
अमन पास गया। कमला ने धीमी आवाज में कहा, “तू बहुत शैतान हो गया है।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। “चाची, शुरुआत तो आपने ही की थी। साँप की बिल में हाथ डालोगे तो साँप तो डसेगा ही ना।”
कमला चाची कुछ कहने वाली थीं कि अमन ने अचानक आगे बढ़कर उनके गाल पर जोर से एक चुंबन कर लिया। फिर तेजी से मुड़कर अंदर भाग गया। कमला चाची स्तब्ध खड़ी रह गईं। गाल पर अमन के होंठों की गर्माहट बाकी थी।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की बातें बताईं—सुबह कमला चाची वाला पूरा घटनाक्रम (चूसना, उसका जाग जाना, चुंबन और स्तन चूसना, फिर बाधित होना), घर आकर कमला से बात और अचानक किया गया चुंबन। रुक्साना वाली मुलाकात उसने जानबूझकर नहीं बताई।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “कमला चाची के साथ अब तुमने सीमा पार कर दी। यह घर के अंदर की आग है। बहुत सावधानी से चलना। एक गलती और सब खुल सकता है।”
रेणु ने इस बार ज्यादा कुछ नहीं किया। बस अमन के बालों में हाथ फेरा और चली गई।
रात गहरी हो चुकी थी। अमन को प्यास लगी। वह पानी पीने के लिए उठा। गलियारे से गुजरते हुए पीछे की तरफ से हल्की आवाजें आ रही थीं—सिसकारियाँ और बिस्तर की हल्की चरमराहट। अमन ने धीरे से आवाज की दिशा में कदम बढ़ाए।
बाबा रामप्रसाद के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। अंदर हल्की दीये की रोशनी थी। अमन ने दरार से अंदर झाँका।
आँखें फटी की फटी रह गईं।
बिस्तर पर बाबा रामप्रसाद अपनी माँ सुशीला के ऊपर थे। सुशीला की साड़ी कमर तक उठी हुई थी। बाबा उनके बीच में थे और जोर-जोर से धक्के लगा रहे थे। सुशीला के मुँह से दबी हुई सिसकारियाँ निकल रही थीं।
“आह्ह… बाबा… धीरे…” सुशीला की आवाज काँप रही थी।
बाबा ने जवाब में और जोर से धक्का मारा। “आज पूरी लूँगा तुझे…”
अमन पत्थर की तरह खड़ा रह गया। साँसें अटक गई थीं। माँ और दादा…
दृश्य अभी शुरू ही हुआ था।
अमन दरवाजे की दरार से अंदर देखता रह गया। साँसें अटक गई थीं। दिमाग समझ नहीं पा रहा था कि वह क्या देख रहा है।
कमरे में हल्की दीये की रोशनी थी। बिस्तर पर बाबा रामप्रसाद अपनी बहू सुशीला के ऊपर थे। सुशीला की साड़ी कमर तक उठी हुई थी। उनकी दोनों टाँगें बाबा की कमर के आसपास लिपटी हुई थीं। बाबा धीरे-धीरे लेकिन गहराई से धक्के लगा रहे थे। हर धक्के के साथ सुशीला की हल्की सिसकारी निकल रही थी।
बाबा ने सुशीला का चेहरा दोनों हाथों में लिया। आँखों में आँखें डालकर बोले,
“बहू… आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो।”
सुशीला की आँखें नम थीं। उन्होंने बाबा की दाढ़ी में उंगलियाँ फेरते हुए धीरे से कहा,
“बाबा… आप मुझे इस उम्र में भी ऐसी नजरों से देखते हो…”
बाबा ने उनके होंठों पर बहुत नर्म चुंबन किया। जीभ नहीं थी, सिर्फ होंठों का धीमा स्पर्श। फिर उन्होंने सुशीला के गले, ठुड्डी और गालों पर हल्के-हल्के चुंबन दिए। सुशीला की साँसें तेज हो गईं। उन्होंने बाबा को और करीब खींच लिया।
बाबा ने धीरे से लंड बाहर निकाला। सुशीला कराह उठीं। फिर बाबा उनके बगल में लेट गए और सुशीला को अपनी तरफ मोड़ लिया। दोनों आमने-सामने थे। बाबा ने सुशीला की एक टाँग अपनी कमर पर चढ़ाई और फिर से अंदर प्रवेश किया। इस बार गति और भी धीमी और गहरी थी।
“बहू… तुम्हारी यह गर्माहट… सालों से वैसी की वैसी है,” बाबा ने फुसफुसाकर कहा।
सुशीला ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ बाबा के होंठों से जा लगे। चुंबन लंबा और भावुक था। दोनों एक-दूसरे को सहला रहे थे। बाबा का एक हाथ सुशीला की पीठ पर था, दूसरा उनके घने बालों में। सुशीला के नाखून बाबा की पीठ पर हल्के-हल्के घूम रहे थे।
थोड़ी देर बाद बाबा उठे। उन्होंने सुशीला को गोद में उठा लिया। सुशीला ने दोनों हाथ उनके गले में डाल दिए। बाबा खड़े-खड़े उन्हें सहारा देते हुए अंदर तक चले गए। सुशीला का वजन उनके हाथों में था। हर बार जब बाबा ऊपर उठाते, सुशीला की सिसकारी निकलती।
“बाबा… इतना उठाकर… आप थक जाओगे…” सुशीला ने काँपती आवाज में कहा।
बाबा ने उनके माथे पर चुंबन करते हुए जवाब दिया, “बहू को गोद में लेकर प्यार करना थकान नहीं देता।”
वे कुछ देर तक खड़े-खड़े ही धीमे-धीमे हिलते रहे। फिर बाबा सुशीला को फिर से बिस्तर पर लिटा दिए। इस बार उन्होंने सुशीला के दोनों पैर अपने कंधों पर रख लिए। पूरा शरीर करीब था। बाबा झुके और सुशीला के स्तनों को बारी-बारी से चूमने लगे। निप्पल को मुँह में लेकर हल्के से चूसा। सुशीला की कमर उठ गई।
“आह्ह… बाबा… वहाँ…”
बाबा ने मुस्कान के साथ फिर से गहराई से धक्के लगाने शुरू कर दिए। हर धक्का प्यार से भरा हुआ था। कोई जल्दबाजी नहीं थी। सिर्फ दो शरीर एक-दूसरे में समा रहे थे।
सुशीला ने बाबा का चेहरा पकड़कर अपनी तरफ खींचा। दोनों की साँसें एक-दूसरे से मिल रही थीं। आँखों में आँखें थीं।
“बाबा… आप मुझे कभी बहू की तरह नहीं… पत्नी की तरह चाहते हो,” सुशीला ने बहुत धीमी आवाज में कहा।
बाबा ने उनके होंठों पर फिर से चुंबन किया। “बहू हो तुम… लेकिन मेरे दिल में पत्नी की जगह भी रखती हो।”
कमरे में सिर्फ सिसकारियाँ और धीमी चरमराहट की आवाजें थीं। दीये की लौ काँप रही थी। दीवार पर दोनों की छायाएँ हिल रही थीं।
अमन दरवाजे के बाहर पत्थर की तरह खड़ा था। आँखें फटी हुई थीं। साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। माँ और दादा… इतने प्यार से…
दीये की लौ अभी भी काँप रही थी। कमरे में पसीने और हल्की सुगंध की मिली-जुली खुशबू फैली हुई थी। बाबा रामप्रसाद ने सुशीला को धीरे से पलटा। सुशीला अब घुटनों और हाथों के बल बिस्तर पर थी। उनकी साड़ी पूरी तरह कमर के ऊपर उठ चुकी थी। गोल और कोमल गाँड दीये की रोशनी में चमक रही थी।
बाबा ने पीछे से दोनों हाथों से उनकी कमर पकड़ी। बहुत धीरे से अपने लंड को उनकी चूत पर लगाया और अंदर तक चला गया। सुशीला की लंबी, काँपती सिसकारी निकली।
“बाबा… इतना गहरा…”
बाबा ने झुककर उनकी पीठ पर चुंबन किए। कंधे की हड्डी से लेकर कमर तक। हर चुंबन के साथ वे धीरे-धीरे अंदर-बाहर हो रहे थे। कोई जल्दबाजी नहीं थी। सिर्फ गहराई और प्यार।
“बहू… तुम्हारा यह शरीर… आज भी वैसा ही लगता है जैसे पहली बार छुआ था,” बाबा ने फुसफुसाकर कहा। उनकी आवाज में एक अजीब सी गर्माहट और यादें दोनों थीं।
सुशीला ने सिर घुमाकर पीछे देखा। आँखें नम थीं। “बाबा… आप मुझे हमेशा इतना संभालकर रखते हो… जैसे मैं आपके सिवा किसी की नहीं।”
बाबा ने उनकी कमर और कसकर पकड़ी। धक्के थोड़े गहरे हो गए, लेकिन फिर भी कोमल। हर बार जब वे अंदर जाते, सुशीला की सिसकारी निकलती और वे उनकी पीठ पर अपना माथा टिका देते।
थोड़ी देर बाद बाबा रुके। उन्होंने सुशीला को फिर से अपनी तरफ मोड़ा। दोनों आमने-सामने हो गए। बाबा ने सुशीला को गोद में उठा लिया। सुशीला ने दोनों टाँगें उनकी कमर पर लपेट लीं। बाबा खड़े-खड़े उन्हें सहारा देते हुए फिर से अंदर तक चले गए।
सुशीला का वजन पूरी तरह उनके हाथों में था। बाबा उन्हें हल्के-हल्के ऊपर-नीचे कर रहे थे। हर बार जब सुशीला नीचे आतीं, उनका सीना बाबा के सीने से चिपक जाता। दोनों के दिल की धड़कनें एक-दूसरे से मिल रही थीं।
“बाबा… मुझे पकड़कर… आप थक तो नहीं रहे?” सुशीला ने काँपती आवाज में पूछा।
बाबा ने उनके माथे से बाल हटाते हुए जवाब दिया, “बहू को इस तरह पास रखना… थकान नहीं, सुकून देता है।”
वे कुछ देर तक खड़े-खड़े ही धीमे-धीमे हिलते रहे। फिर बाबा सुशीला को संभालते हुए बिस्तर पर ले आए। इस बार उन्होंने सुशीला को अपने ऊपर बैठा लिया। सुशीला की दोनों टाँगें उनकी कमर के दोनों तरफ थीं। बाबा ने नीचे से धीरे-धीरे धक्के लगाए। सुशीला ने दोनों हाथ उनके सीने पर रख दिए।
दोनों की आँखें मिली हुई थीं। बाबा ने सुशीला के स्तनों को दोनों हाथों से सहलाया। फिर उठकर बैठ गए। अब दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब थे। बाबा ने सुशीला के होंठों को पकड़ लिया। चुंबन गहरा और लंबा था। जीभ धीरे-धीरे एक-दूसरे के मुँह में घूम रही थी।
सुशीला की सिसकारियाँ चुंबन के बीच में दबी हुई निकल रही थीं। बाबा का एक हाथ उनकी पीठ पर था, दूसरा उनके बालों में। सुशीला की उंगलियाँ बाबा की सफेद दाढ़ी में फँसी हुई थीं।
“बहू… आज तुम और भी ज्यादा प्यार कर रही हो,” बाबा ने होंठ अलग करते हुए कहा।
सुशीला ने उनकी आँखों में देखा। “क्योंकि आज आप मुझे सिर्फ बहू नहीं… अपनी स्त्री की तरह चाह रहे हो।”
बाबा ने उन्हें फिर से अपनी छाती से लगा लिया। धक्के अब थोड़े तेज हो गए थे, लेकिन फिर भी उनमें प्यार की गर्माहट बाकी थी। सुशीला की साँसें तेज होने लगीं। उनकी कमर अपने आप हिलने लगी। बाबा ने उनकी कमर पकड़कर उन्हें और करीब खींच लिया।
“आह्ह… बाबा… मैं… आ रही हूँ…” सुशीला की आवाज टूट रही थी।
बाबा ने उनके गले में मुँह रखकर कहा, “आ जाओ बहू… मेरे साथ…”
सुशीला का शरीर अकड़ गया। उन्होंने बाबा को जोर से जकड़ लिया। लंबी सिसकारी निकलते हुए उनका पानी निकल गया। बाबा ने भी कुछ गहरे धक्कों के बाद उन्हें कसकर पकड़ लिया। गरम पानी की धार उन्होंने सुशीला के अंदर छोड़ दी। दोनों एक-दूसरे से चिपके हुए काँपते रहे।
बहुत देर तक कोई नहीं बोला। सिर्फ साँसें चल रही थीं। बाबा ने सुशीला के बालों में हाथ फेरा। सुशीला ने उनका माथा अपने होठों से छू लिया।
“बाबा…” उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा।
“हाँ बहू।”
“आप मुझे हमेशा ऐसे ही रखना… छुपकर ही सही।”
बाबा ने उनके माथे पर लंबा चुंबन किया। “जब तक साँस है… रखूँगा।”
दोनों उसी हालत में लेटे रहे। दीये की लौ धीरे-धीरे छोटी होती जा रही थी। कमरे में एक अजीब सी शांति छा गई थी—पाप की नहीं, बल्कि एक गहरे, छुपे हुए प्यार की शांति।
दरवाजे के बाहर अमन अभी भी खड़ा था। शरीर काँप रहा था। आँखों में जो कुछ देखा था, वह दिमाग में बार-बार दोहराया जा रहा था। माँ की सिसकारियाँ… दादा के प्यार भरे शब्द… दोनों का एक-दूसरे में खो जाना…
वह धीरे से पीछे हटा। गलियारे में अँधेरा था। पैर काँप रहे थे। उसने पानी पीना तो दूर, कमरे तक पहुँचने में भी मुश्किल महसूस की।
बिस्तर पर लेटते समय उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। छत की तरफ देखता रहा।
आज घर के सबसे बड़े राज़ ने उसके सामने अपना चेहरा खोल दिया था।
Fuckuguy
albertprince547;
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