राजिया बिस्तर पर पेट के बल पड़ी हुई थी।
शरीर में दर्द हो रहा था। चूत और गाँड दोनों सूजी हुई थीं। जाँघों के अंदर अभी भी उस अजनबी का पानी चिपचिपा लगा हुआ था। कमरा अँधेरा था। बाहर हल्की हवा आ रही थी। लेकिन राजिया की आँखें खुली हुई थीं।
वह सोच रही थी।
“क्या रात थी… क्या आदमी था वह…”
उसने आँखें बंद कीं। फिर से पूरा रात आँखों के सामने घूमने लगा। मंकी कैप पहने वह आदमी। उसकी चुप्पी। उसका तरीका। उसकी जीभ। उसका मोटा और लंबा लंड। जिसने उसकी चूत और गाँड दोनों को फाड़कर रख दिया था।
“आज तक कोई मुझे इतना संतुष्ट नहीं कर पाया… कोई नहीं…”
राजिया ने धीरे से कराहते हुए करवट बदली। दर्द तेज हो गया। लेकिन दर्द के साथ एक गहरी संतुष्टि भी थी। शरीर थका हुआ था, लेकिन मन में एक अजीब सी भूख बाकी थी।
“उसने मुझे पता नहीं कितनी बार पानी निकाल दिया… छह… सात… मैंने गिनना छोड़ दिया था… शरीर काँप-काँप जाता था… और वह रुकता ही नहीं था…”
उसने अपना हाथ धीरे से अपनी चूत पर रखा। हल्की सूजन महसूस हुई। उंगलियों पर अभी भी गीलापन था।
“कौन था वह… आवाज अलग थी… तरीका अलग था… ताकत अलग थी… वह तीसरा वाला तो बिल्कुल नहीं था… वह तो कभी इतना कुछ नहीं कर पाता…”
राजिया की आँखों में एक जिद सी आ गई।
“पता लगाके रहूँगी… कौन है वह… कहाँ रहता है… कैसे आया… मैं उसे ढूँढूँगी… और…”
उसने होंठ दबाए। मन में एक ख्याल आया जो पहले कभी नहीं आया था।
“उसे अपना बनाके रहूँगी… या फिर उसकी रंडी बन जाऊँगी… अगर वह कहे तो… बस मुझे वही चाहिए… वही आदमी… वही लंड… वही तरीका…”
सोचते-सोचते उसकी पलकें भारी होने लगीं। शरीर दर्द से भरा हुआ था, लेकिन थकान अब नींद में बदल रही थी। उसने धीरे से अपने आप से कहा,
“इतना दर्द हो रहा है… मजे के बाद… अब तो दो दिन कॉलेज भी नहीं जा पाऊँगी…”
आखिरी ख्याल उसी अजनबी का था—मंकी कैप, चुपचाप चोदता हुआ, और आखिर में उसकी गाँड में पानी छोड़कर गायब हो जाना।
राजिया की आँखें बंद हो गईं।
वह सो गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ उसकी भारी साँसें बाकी रह गईं।
अमन घर पहुँचा तो रात काफी बीत चुकी थी।
पिछवाड़े वाले रास्ते से चुपके से अंदर घुसा। मंकी कैप और काले कपड़े अभी भी उस पर थे। शरीर में थकान थी, लेकिन एक अजीब सी शक्ति भी थी। पहली बार उसने किसी लड़की के साथ पूरी रात बिताई थी। जो कुछ रेणु ने सिखाया था, लगभग सब इस्तेमाल कर लिया था। राजिया की सिसकारियाँ, उसके शरीर का काँपना, और आखिर में उसकी गाँड में पानी छोड़ना—सब अभी भी दिमाग में ताजा था।
उसने कपड़े बदले। हाथ-मुँह धोया। फिर अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर बैठ गया। दिल अभी भी जोर से धड़क रहा था।
थोड़ी देर बाद दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई। रेणु थी। लालटेन लेकर अंदर आई। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसने अमन के चेहरे को ध्यान से देखा।
“हो गया?” उसने सीधे पूछा।
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ।”
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। “सब बताओ। कुछ मत छुपाओ।”
अमन ने शुरू से अंत तक सब बता दिया। कैसे उसने उस लड़के को डराकर भगाया, कैसे मंकी कैप पहनकर राजिया के कमरे में घुसा, कैसे पहले प्यार से शुरू किया, फिर जीभ से उसे पागल किया, कैसे अलग-अलग पोजीशन में उसे चोदा, कैसे उसके छह बार पानी निकाले, और आखिर में उसकी गाँड में अपना पानी छोड़कर चला आया।
रेणु अंत तक चुपचाप सुनती रही। जब अमन खत्म हुआ तो उसने धीरे से पूछा,
“चेहरा नहीं देखा उसने?”
“नहीं। टोपी नहीं उतारी मैंने। आवाज भी बदली हुई रखी।”
रेणु ने गहरी साँस ली। “अच्छा किया। लेकिन याद रखना—ऐसी रातें दोबारा उतनी आसानी से नहीं मिलतीं। और राजिया अब तुम्हें ढूँढने की कोशिश करेगी। गाँव छोटा है। सावधान रहना।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“तुमने जो किया, वह सिर्फ शरीर का खेल नहीं था। तुमने नियंत्रण रखा। चेहरा नहीं दिखाया। जल्दी वापस आ गए। यह अच्छी बात है। लेकिन घमंड में मत आना। एक रात ने तुम्हें उस्ताद नहीं बना दिया।”
अमन ने सिर हिलाया।
रेणु थोड़ा करीब आई। “शरीर कैसा महसूस कर रहा है?”
“थकान है… लेकिन हल्का भी लग रहा है।”
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। “सो जाओ। कल बात करेंगे। और हाँ—राधा के बारे में मत भूलना। जो कुछ तुमने राजिया के साथ किया, वह शरीर की भूख थी। राधा के साथ दिल का रिश्ता है। दोनों को मिलाकर मत बैठना।”
अमन ने फिर सिर हिलाया।
रेणु उठ खड़ी हुई। दरवाजे तक जाकर बोली,
“तुम सीख रहे हो। लेकिन रास्ता अभी लंबा है। रात अच्छी रही तुम्हारी… अब आराम करो।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। कमरे में अँधेरा था। आँखें बंद कीं तो राजिया की सिसकारियाँ और रेणु की सलाह दोनों एक साथ घूमने लगीं। साथ ही राधा का चेहरा भी आँखों के सामने आ गया—मेले वाला चुंबन, उसके आँसू, उसका हल्का सा गाल पर किया गया चुंबन।
आज पहली बार उसने किसी लड़की को पूरी तरह से जिया था।
लेकिन मन में यह भी था कि यह खेल खतरनाक था।
वह लेट गया। थकान ने धीरे-धीरे उसे अपनी चपेट में ले लिया।
नींद आ गई।
मंगलवार की सुबह अमन अभी गहरी नींद में था।
कमला चाची चुपके से कमरे में आईं। उन्होंने दरवाजा धीरे से बंद किया और बिस्तर के पास आ गईं। चाँदनी फीकी पड़ चुकी थी, सुबह की हल्की रोशनी खिड़की से आ रही थी। उन्होंने धीरे से चादर हटाई। अमन का लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त था।
कमला ने अपने नरम हाथों से उसे पकड़ लिया। उंगलियाँ बहुत हल्की और अनुभवी थीं। उन्होंने धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया—जड़ से लेकर सिर तक। लंड उनके हाथ में और सख्त होता गया। उनकी साँसें तेज हो रही थीं। आँखें लंड पर टिकी हुई थीं।
तभी अमन की साँसें थोड़ी बदलीं। वह करवट लेने वाला था। कमला चाची तुरंत समझ गईं कि वह जागने वाला है। उन्होंने फौरन चादर वापस डाल दी, हाथ छुड़ाया और चुपके से कमरे से बाहर निकल गईं। दरवाजा हल्के से बंद किया।
अमन की आँख खुली। कमरा खाली था। लेकिन चादर के नीचे उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था और हल्की सी गर्माहट बाकी थी जैसे कोई हाथ अभी-अभी लगा हो। उसने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। मन में अजीब सा ख्याल आया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
उठकर नहाया-धोया और कॉलेज के लिए निकल पड़ा।
कॉलेज में राधा पहले से बैठी थी। ब्रेक में दोनों टंकी के पास मिले। इस बार राधा थोड़ी और करीब खड़ी हुई। अमन ने हल्के से उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम आज और प्यारी लग रही हो,” उसने धीमे स्वर में कहा।
राधा का चेहरा लाल हो गया। “बातें बनाने लगे हो अब।” लेकिन उसने हाथ नहीं छुड़ाया। दोनों की नजदीकी थोड़ी और बढ़ी।
downstream में अमन ने देखा कि वह तीसरा लड़का राजिया के भाई के साथ खड़ा गंभीर बातें कर रहा था। दोनों की सूरतें तनाव में लग रही थीं। अमन ने दूर से नजर रखी। मन में ख्याल आया—कहीं उस रात वाली बात तो नहीं खुल रही। उसने अपना चेहरा सामान्य रखा।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता और मीना दोनों बैठी थीं। कविता ने सिर उठाकर कहा, “आज थके लग रहे हो।”
मीना ने हँसते हुए जोड़ा, “कॉलेज में पढ़ाई ज्यादा हुई या कुछ और?”
अमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “पढ़ाई ही हुई दीदी।” दोनों बहनें हल्की मुस्कान के साथ उसे देखती रहीं। उनकी निगाहों में हल्की जिज्ञासा थी। अमन अंदर चला गया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“दिन कैसा रहा?” उसने पूछा।
अमन ने सब बता दिया—सुबह की अजीब सी गर्माहट (उसने कमला का नाम नहीं लिया, सिर्फ अहसास बताया), राधा के साथ बढ़ती नजदीकी, तीसरे लड़के का राजिया के भाई से बात करना, और बहनों की हल्की बातें।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “तीसरे लड़के वाली बात पर नजर रखना। राजिया अब भी तुम्हें ढूँढ रही होगी। और घर के अंदर भी आँखें खुली रखना।”
फिर वह थोड़ा करीब आई। “आज थक गए हो, लेकिन शिक्षा जारी रखनी है।”
रेणु ने अमन को चूमा। गहराई से। फिर उसकी पैंट खोली और लंड निकालकर मुँह में ले लिया। धीरे-धीरे, नियंत्रण के साथ चूसने लगी। अमन की उंगलियाँ उसके बालों में फँस गईं। कुछ देर बाद रेणु ने खुद उसे बिस्तर पर लिटाया, सलवार हटाई और अमन की जीभ अपनी चूत पर रख दी।
“जैसा सिखाया है वैसा करो,” उसने फुसफुसाकर कहा।
अमन ने जीभ से चाटा, चूसा, अंदर तक डाला। रेणु की सिसकारियाँ धीमी लेकिन तेज होती गईं। थोड़ी देर में उसका पानी अमन के मुँह पर छूट गया। रेणु काँपती रही। फिर उसने अमन को अपनी तरफ खींचकर कहा,
“अच्छा किया। नियंत्रण रखना सीख रहे हो। अब सो जाओ।”
रेणु कपड़े ठीक करके चली गई।
अमन अकेला रह गया। सुबह की रहस्यमयी गर्माहट, राधा की मुस्कान, तीसरे लड़के की बातचीत और रेणु की शिक्षा—सब एक साथ दिमाग में घूम रहे थे।
रात गहरी होती गई।
बुधवार की सुबह अभी अँधेरा पूरी तरह नहीं छटा था।
अमन गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे में हल्की ठंडक थी। खिड़की से बाहर मुर्गे की आवाज दूर से आ रही थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। इस बार उन्होंने दरवाजा पूरी तरह बंद किया और सिटकिनी तक लगा दी। उनके कदम बिलकुल आवाज नहीं कर रहे थे।
वे बिस्तर के पास आकर रुकीं। अमन की साँसें नियमित थीं। चादर कमर तक थी। कमला ने धीरे से चादर हटाई। फिर उसकी पैंट और कच्छे का नाड़ा खोला। अमन का लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त बाहर निकल आया। कमला की आँखों में भूख साफ झलक रही थी।
उन्होंने दोनों नरम हाथों से लंड को पकड़ लिया। इस बार सिर्फ सहलाना नहीं था। वे उसे अच्छी तरह मलने लगीं। एक हाथ से जड़ को कसकर पकड़े हुए ऊपर-नीचे कर रही थीं, दूसरे हाथ से सिर को गोलाकार सहला रही थीं। कभी हल्के, कभी थोड़ा जोर से। लंड उनके हाथों में तेजी से सख्त और गर्म होता जा रहा था। नसें फूल गई थीं। कमला की साँसें तेज हो रही थीं। उनके होंठ हल्के से खुले हुए थे। कभी-कभी वे लंड के सिर पर अपने अंगूठे से गोला बना रही थीं।
अमन की साँसों में हल्का बदलाव आया। उसकी पलकें फड़कने लगीं। कमला तुरंत समझ गईं। उन्होंने फौरन लंड को कच्छे में वापस रखा, नाड़ा बाँधा, चादर डाल दी और चुपके से सिटकिनी खोली। दरवाजा हल्के से बंद करके वे गलियारे में गायब हो गईं।
अमन की आँख खुली। कमरा खाली था। लेकिन कच्छे के अंदर उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था और हल्की सी गीली गर्माहट बाकी थी। उसने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। मन में एक अजीब सा ख्याल घूम गया—फिर वही अहसास। उसने गहरी साँस ली और उठकर बैठ गया।
नहा-धोकर कॉलेज के लिए निकला।
कॉलेज में राधा पहले से बैठी थी। अमन के जाते ही उसने मुस्कुरा दिया। ब्रेक में दोनों टंकी के पास मिले। इस बार राधा और करीब खड़ी हुई। अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम रोज़ और प्यारी लगने लगती हो,” उसने धीमे स्वर में कहा।
राधा का चेहरा लाल हो गया। उसने नजरें झुकाईं लेकिन हाथ नहीं छुड़ाया। “अब बहुत बातें बनाने लगे हो तुम।”
अमन ने हल्के से उसकी उंगलियाँ दबाईं। “सच कह रहा हूँ।” दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। नजदीकी साफ बढ़ रही थी।
राजिया आज भी कॉलेज नहीं आई थी। अमन ने उसकी खाली जगह की तरफ देखा। मन में उस रात की सिसकारियाँ घूम गईं।
दोपहर में घर लौटा तो आँगन में कविता और मीना दोनों कपड़े सुखा रही थीं। कविता ने सिर उठाकर कहा, “आज चेहरा थोड़ा लाल लग रहा है। कॉलेज में गर्मी ज्यादा थी क्या?”
मीना ने हँसते हुए जोड़ा, “या किसी ने गाल पर कुछ कर दिया?” दोनों बहनें एक-दूसरे की तरफ देखकर हँसीं। अमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “पढ़ाई की गर्मी थी दीदी।” वह अंदर चला गया। दोनों बहनों की निगाहें उसकी पीठ पर थोड़ी देर और रहीं।
आँगन के दूसरे कोने में कमला चाची बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आओ।”
अमन पास गया। कमला ने उसका हाथ पकड़ा। उंगलियाँ उसकी कलाई पर घूमने लगीं।
“सुबह जल्दी उठ गए लगते हो,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। आँखों में हल्की चमक थी। “नींद पूरी नहीं हुई होगी।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। इस बार उसने पीछे नहीं हटा। “नींद तो पूरी थी चाची… लेकिन किसी ने शायद सपना अच्छा दिखा दिया।”
कमला चाची एक पल के लिए ठिठक गईं। फिर धीरे से मुस्कुराईं। उनके हाथ ने अमन की कलाई थोड़ा और दबाया। “सपने में भी सीमा रखनी चाहिए।” आवाज में नाराजगी नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी चुनौती थी। अमन ने भी हल्की मुस्कान दी और अंदर चला गया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके सिटकिनी लगाई और बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“दिन भर की बात बताओ,” उसने कहा।
अमन ने सब कुछ विस्तार से बताया—सुबह की अजीब गर्माहट और कच्छे के अंदर का अहसास, राधा के साथ बढ़ती नजदीकी, राजिया की अनुपस्थिति, बहनों की हल्की चिढ़ाने वाली बातें, और कमला चाची के साथ आँगन वाली फ्लर्टिंग।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “कमला चाची अब स्पष्ट इशारे कर रही हैं। तुम भी जवाब दे रहे हो। यह खतरनाक खेल है। घर के अंदर की आग बाहर की आग से ज्यादा जलती है। सावधान रहना।”
फिर वह थोड़ा करीब आई। आँखों में वह चमक थी। “आज शिक्षा में एक नया कदम रखेंगे।”
रेणु ने अमन को गहराई से चूमा। जीभ अंदर तक गई। दोनों की साँसें तेज हो गईं। उसने अमन की पैंट खोली और लंड निकालकर कुछ देर सहलाया। फिर खुद बिस्तर पर लेट गई और सलवार नीचे सरका दी।
“आज उंगलियों से करो,” उसने फुसफुसाकर कहा। “मैं बताती रहूँगी।”
अमन उसके पास लेट गया। एक हाथ से उसके स्तन सहलाते हुए दूसरे हाथ की मध्यमा उंगली धीरे से उसकी चूत पर फेरने लगा। रेणु की कमर हिलने लगी। अमन ने उंगली अंदर डाली। पहले एक, फिर धीरे से दूसरी। रेणु की सिसकारी निकली।
“हाँ… ऐसे… अंदर तक… मोड़ो थोड़ा… ऊपर वाली जगह पर जोर से…”
अमन ने वैसा ही किया। उंगलियाँ अंदर-बाहर हो रही थीं। कभी तेज, कभी धीमी। रेणु की साँसें तेज होती गईं। उसने अमन का हाथ पकड़कर और गहराई तक दबाने लगी। थोड़ी देर में उसका शरीर अकड़ गया। पानी अमन की उंगलियों पर छूट गया। रेणु काँपती रही।
अमन ने उंगलियाँ निकालीं। रेणु ने आँखें खोलीं। चेहरे पर संतुष्टि थी। उसने अमन को अपनी तरफ खींचकर माथे पर चुंबन दिया।
“अच्छा किया। उंगलियों का इस्तेमाल भी जरूरी है। कभी-कभी लंड से पहले यह ज्यादा असर करता है।”
रेणु ने कपड़े ठीक किए। दरवाजे तक जाकर बोली,
“कमला चाची और राधा… दोनों अलग-अलग खेल हैं। मिला मत देना। और राजिया वाली बात पर नजर रखना।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। उंगलियों पर रेणु की नमी बाकी थी। दिमाग में सुबह कमला चाची के हाथों का अहसास, राधा की मुस्कान और रेणु की शिक्षा एक साथ घूम रहे थे।
रात गहरी होती गई। शरीर में एक नई बेचैनी थी।
गुरुवार की सुबह अभी पूरी तरह अँधेरा नहीं छटा था।
अमन गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे में हल्की ठंडक फैली हुई थी। खिड़की से बाहर मुर्गे की पहली आवाज दूर से आ रही थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। उन्होंने इस बार दरवाजा बंद करके सिटकिनी भी लगा दी। उनके कदम फर्श पर कोई आवाज नहीं कर रहे थे।
वे बिस्तर के पास आकर रुकीं। अमन की साँसें नियमित थीं। चादर कमर तक खिसकी हुई थी। कमला ने धीरे से चादर हटाई। फिर उसकी पैंट और कच्छे का नाड़ा खोला। अमन का लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त बाहर निकल आया। कमला की आँखों में वही भूखी चमक थी।
उन्होंने दोनों नरम हाथों से लंड को पकड़ लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगीं। इस बार उनका हाथ और अनुभवी था। जड़ से सिर तक पूरा मल रही थीं। थोड़ी देर में लंड पूरी तरह खड़ा हो गया। नसें फूल गईं। कमला की साँसें तेज हो रही थीं। तभी लंड के सिर पर हल्का सा सफेद द्रव दिखाई दिया—थोड़ा सा वीर्य।
कमला ने झुककर अपनी जीभ निकाली और उस वीर्य को चाट लिया। स्वाद लेते हुए उन्होंने आँखें बंद कीं। फिर बिना किसी हिचकिचाहट के लंड के सिर को मुँह में ले लिया और चूसने लगीं। हल्के-हल्के, गोल-गोल जीभ घुमाते हुए। कभी सिर को पूरा मुँह में लेकर चूसतीं, कभी सिर्फ जीभ से चाटतीं। अमन की साँसों में हल्का बदलाव आने लगा। उसकी पलकें फड़कने लगीं।
कमला तुरंत समझ गईं कि वह जागने वाला है। उन्होंने फौरन लंड को मुँह से निकाला, कच्छे में वापस रखा, नाड़ा बाँधा, चादर डाल दी और चुपके से सिटकिनी खोली। दरवाजा हल्के से बंद करके वे गलियारे में गायब हो गईं।
अमन की आँख खुली। कमरा खाली था। लेकिन कच्छे के अंदर उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था और सिर पर हल्की गीली गर्माहट बाकी थी—जैसे कोई मुँह अभी-अभी लगा हो। उसने गहरी साँस ली। मन में एक अजीब सा एहसास घूम गया।
नहा-धोकर कॉलेज के लिए निकला।
कॉलेज पहुँचते ही उसकी नजर राधा पर गई। राधा ने मुस्कुराकर उसका स्वागत किया। ब्रेक में अमन ने राधा का हाथ पकड़ा और उसे कॉलेज के पीछे वाले शांत कोने में ले गया। वहाँ दीवार के पीछे दोनों खड़े हो गए।
अमन ने दोनों हाथों से राधा का चेहरा पकड़ा और धीरे से उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। चुंबन नरम था, लेकिन इस बार थोड़ा और गहरा। राधा पहले सहम गई, फिर धीरे-धीरे जवाब देने लगी। अमन की जीभ उसके होंठों पर फिसली। राधा की साँसें तेज हो गईं। अमन ने उसके निचले होंठ को हल्के से काटा।
“अमन…” राधा ने फुसफुसाकर कहा। गाल लाल थे।
अमन ने उसके कान के पास धीमे स्वर में कहा, “तुम रोज़ और सुंदर लगती हो। अब तो तुम्हें देखकर दिल नहीं भरता।”
राधा शर्मा गई। उसने अमन की कमीज का कोना पकड़ लिया। “यहाँ कोई देख लेगा…”
अमन ने फिर से उसके होंठ चूम लिए। छोटा सा लेकिन प्यार भरा चुंबन। राधा की उंगलियाँ उसकी कमीज में और कस गईं। दोनों कुछ पल और उसी कोने में खड़े रहे।
वे दोनों इतने में व्यस्त थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि थोड़ी दूर, पेड़ों की छाँव में वही अज्ञात व्यक्ति फिर से खड़ा उन्हें देख रहा था। उसकी निगाहें दोनों पर टिकी हुई थीं।
कक्षा में लौटते समय अमन ने देखा कि राजिया आज कॉलेज आई थी। वह अपनी जगह पर बैठी थी। चलने में हल्की तकलीफ साफ दिख रही थी। चेहरा थोड़ा थका हुआ था। अमन ने जानबूझकर उसकी तरफ ज्यादा नहीं देखा।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता कपड़े सुखा रही थी। अमन उसके पास से गुजरा तो कविता ने सिर उठाया।
“आज देर से आए हो,” उसने कहा। आवाज में हल्की शरारत थी। “कॉलेज में कोई खास बात हो गई क्या?”
अमन ने रुककर उसकी तरफ देखा। कविता की साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था। गले की हड्डियाँ साफ दिख रही थीं। अमन ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “खास तो नहीं… लेकिन दिन अच्छा जरूर रहा।”
कविता ने उसकी आँखों में देखा। थोड़ी देर निगाहें मिली रहीं। फिर उसने धीरे से मुस्कुरा दिया। “अच्छा रहा तो ठीक है।” अमन अंदर चला गया। कविता की निगाहें उसकी पीठ पर थोड़ी देर और रहीं।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की सारी बातें बता दीं—सुबह की अजीब गर्माहट और गीला अहसास, राधा के साथ कोने वाला चुंबन और फ्लर्टिंग, राजिया का कॉलेज आना, और कविता के साथ हल्की बात।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “कमला चाची अब और आगे बढ़ रही हैं। कविता भी इशारे समझने लगी है। घर के अंदर आग धीरे-धीरे फैल रही है। सावधान रहना। और राजिया… वह अब तुम्हें ढूँढने की कोशिश करेगी। उसकी नजरों से बचके रहना।”
रेणु ने और ज्यादा शारीरिक शिक्षा नहीं दी। बस अमन का हाथ पकड़कर बोली, “आज बस इतना। तुम बहुत सारी चीजें एक साथ संभाल रहे हो। थोड़ा ठहरो। नियंत्रण रखना।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। सुबह की गीली गर्माहट, राधा के होंठों का स्वाद, कविता की निगाहें और रेणु की चेतावनी—सब एक साथ दिमाग में घूम रहे थे।
रात गहरी होती गई।
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शुक्रवार की शाम का समय था।
अमन कॉलेज से लौटकर अभी कपड़े भी नहीं बदल पाया था कि पिता सुरेश ने आँगन से आवाज लगाई,
“अमन! इधर आ। खेत में एक काम है। जल्दी चल।”
अमन ने जल्दी से चप्पल पहनी और पिता के साथ निकल पड़ा। सूरज ढलने लगा था। आसमान में नारंगी और बैंगनी रंग फैल रहे थे। रास्ते में धूल उड़ रही थी। दोनों चुपचाप चल रहे थे। पिताजी ने सिर्फ इतना कहा,
“हल की मरम्मत करवानी थी। देख लेना कि काम हो गया या नहीं। मजदूरों से पूछ लेना।”
खेत तक पहुँचने में लगभग बीस मिनट लगे। खेत के किनारे वाली मिट्टी की मेड़ पर कुछ औजार पड़े थे। थोड़ी दूर पर एक औरत झुकी हुई हल की फाल साफ कर रही थी। उसकी पीठ अमन की तरफ थी। साड़ी का पल्लू कमर में तना हुआ था। कमर पतली और गोल थी। जब वह सीधी हुई तो अमन की नजरें एक पल के लिए रुक गईं।
वह औरत रुक्साना थी—राजिया की माँ।
उम्र करीब अड़तीस-चालीस के आसपास होगी। गोरा-सा रंग। चेहरा अभी भी जवान लग रहा था। आँखें तेज थीं। सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहा था उसका बदन। साड़ी के नीचे 34D के भारी स्तन साफ उभर रहे थे। कमर पतली (34) और फिर नीचे चौड़ी गाँड (36) के साथ गदराया हुआ बदन। साड़ी का पल्लू बार-बार खिसक रहा था और उसकी गोल कमर और नाभि की झलक मिल रही थी।
अमन ने मन ही मन सोचा, “क्या मस्त फिगर है… इसे तो पटा के जरूर चोदूँगा एक दिन।”
रुक्साना ने अमन को देखा। थोड़ी देर निगाहें मिलीं। फिर उसने पल्लू संभालते हुए कहा,
“अरे बाबूजी के बेटे हो न? क्या बात है?”
अमन ने सामान्य स्वर में जवाब दिया, “काकी, पिताजी ने भेजा है। हल की मरम्मत हो गई क्या? मजदूरों ने कहा था आज तक हो जाएगी।”
रुक्साना ने हल की तरफ इशारा किया। “हो गई है। अभी अभी साफ करके रखी हूँ। तुम चेक कर लो।”
अमन पास गया। रुक्साना भी उसके बगल में खड़ी हो गई। दोनों की दूरी बहुत कम थी। रुक्साना के शरीर से हल्की मिट्टी और पसीने की खुशबू आ रही थी। अमन ने जानबूझकर हल को ध्यान से देखा, लेकिन उसकी नजरें बार-बार रुक्साना के स्तनों और कमर पर चली जा रही थीं। साड़ी का पल्लू फिर खिसका। भारी स्तनों की गोलाई और भी साफ दिखने लगी।
रुक्साना ने पल्लू ठीक करते हुए हल्की मुस्कान दी। “बाबूजी के बेटे हो, इसलिए काकी कह रहे हो। वरना उम्र में ज्यादा फर्क नहीं है।” आवाज में हल्की शरारत थी।
अमन ने सिर उठाकर उसकी आँखों में देखा। “काकी ही सही। आप तो घर की जैसी लगती हो।”
रुक्साना की आँखों में एक पल के लिए चमक आई। उसने अमन को सिर से पाँव तक एक बार घूरा। फिर धीरे से बोली, “बातें बनाना सीख गए हो लगते हो। जाओ, बाबूजी से कह देना काम हो गया है।”
अमन ने सिर हिलाया। “ठीक है काकी।”
वह लौटने लगा। कुछ कदम चलकर पीछे मुड़ा। रुक्साना अभी भी खड़ी उसे देख रही थी। साया हवा में उड़ रहा था। गदराया हुआ बदन धूप की आखिरी किरणों में चमक रहा था। अमन ने मन में फिर से वही बात दोहराई—“एक दिन जरूर…”
घर लौटकर उसने पिताजी को बता दिया कि काम हो गया है। पिताजी ने सिर हिला दिया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की बातें बतानी शुरू कीं। जब रुक्साना वाली बात पर आया तो रेणु की आँखें थोड़ी तेज हो गईं।
“राजिया की माँ?” उसने पूछा।
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ। खेत में मिलीं। फिगर… बहुत गदराया हुआ है।”
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। “तुमने सिर्फ बात की न?”
“हाँ। बस हल के बारे में पूछा। काकी कहा।”
रेणु ने गहरी साँस ली। “अच्छा किया जो अभी कुछ नहीं किया। लेकिन याद रखना—राजिया की माँ है। अगर उसके साथ कुछ उलझा तो राजिया वाली रात भी खुल सकती है। घर की औरतों में पहले से ही आग लगी है। बाहर की आग में हाथ मत डालो अभी।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“आज बस इतना। तुम बहुत सारी चीजें एक साथ देख रहे हो। थोड़ा ठहरो। नियंत्रण रखना।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। आँखें बंद कीं तो रुक्साना का गदराया हुआ बदन, उसके भारी स्तन और पतली कमर आँखों के सामने घूमने लगे। साथ में कमला चाची के हाथ, राधा के होंठ और रेणु की चेतावनी भी।
रात गहरी होती गई। मन बेचैन था।
शनिवार की सुबह अमन की नींद हल्की थी।
रात भर रुक्साना का गदराया हुआ बदन बार-बार आँखों के सामने घूमता रहा था। भारी स्तन, पतली कमर, गोल गाँड—सब कुछ साफ याद था। सुबह जब आँख खुली तो कमरा अभी भी धुँधला था। उसने करवट बदली। तभी दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई।
कमला चाची अंदर आईं। इस बार उन्होंने सिटकिनी नहीं लगाई। बस दरवाजा बंद करके बिस्तर के पास आ गईं। अमन ने आँखें बंद रखीं। कमला ने चादर नहीं हटाई। सिर्फ उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए धीरे से बोलीं,
“आज जल्दी उठ जाओ। चाय ठंडी हो जाएगी।”
अमन ने आँखें खोलीं। कमला चाची उसके बहुत करीब थीं। उनकी साड़ी का पल्लू आगे की तरफ झुका हुआ था। भारी स्तनों की गोलाई साफ दिख रही थी। अमन की निगाह वहीं रुक गई। कमला ने भी उसकी निगाह को पकड़ लिया। दोनों की आँखें एक पल के लिए मिलीं। कमला ने हल्की मुस्कान दी और बालों से हाथ हटा लिया।
“देखते मत रहो… उठो,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। आवाज में नाराजगी नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी शरारत थी। फिर वे कमरे से बाहर चली गईं।
अमन उठकर बैठ गया। दिल की धड़कन तेज हो रही थी। कमला चाची अब छूने के बजाय निगाहों से खेलने लगी थीं। यह और खतरनाक था।
नहा-धोकर कॉलेज निकल पड़ा।
कॉलेज में राधा पहले से बैठी थी। अमन के जाते ही उसने मुस्कुरा दिया। ब्रेक में दोनों फिर पीछे वाले कोने में मिले। इस बार अमन ने राधा का हाथ पकड़कर उसे दीवार से सटा दिया। दोनों की साँसें करीब थीं।
“तुम रोज़ मेरे दिमाग में रहती हो,” अमन ने धीमे स्वर में कहा।
राधा का चेहरा लाल हो गया। उसने अमन की कमीज का कोना पकड़ लिया। “यहाँ कोई आ जाएगा…”
अमन ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और हल्के से होंठों पर चुंबन कर दिया। छोटा सा, लेकिन गहरा। राधा की पलकें बंद हो गईं। चुंबन टूटने के बाद उसने धीरे से कहा, “अब बहुत हिम्मत हो गई है तुम्हारी।”
अमन मुस्कुराया। “तुम्हारी वजह से।” दोनों कुछ पल और उसी कोने में खड़े रहे। हाथ पकड़े हुए।
कक्षा में लौटते समय अमन की नजर राजिया पर गई। राजिया आज भी कॉलेज में थी। वह अपनी जगह पर बैठी थी, लेकिन उसकी निगाहें अमन पर बार-बार जा रही थीं। जब अमन ने उसकी तरफ देखा तो राजिया ने नजरें नहीं फेरीं। बल्कि कुछ पल तक घूरती रही। उसकी आँखों में एक अजीब सा सवाल और जिद दोनों थे। अमन ने सामान्य व्यवहार बनाए रखा, लेकिन मन में ख्याल आया—वह संदेह करने लगी है।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता अकेली बैठी थी। साड़ी का पल्लू एक तरफ गिरा हुआ था। अमन उसके पास से गुजरा तो कविता ने सिर उठाया।
“आज जल्दी आ गए,” उसने कहा। आवाज में हल्की गर्माहट थी। “बैठ जाओ थोड़ी देर।”
अमन ने उसके पास चौकी पर बैठ गया। कविता ने पानी का गिलास दिया। उंगलियाँ अमन की उंगलियों से छू गईं। दोनों ने कुछ नहीं कहा। कविता ने धीरे से पूछा, “तुम अब बहुत बदल गए हो लगते हो। पहले इतने चुप नहीं रहते थे।”
अमन ने उसकी आँखों में देखा। “बदलना तो समय के साथ लगता है दीदी।”
कविता ने हल्की मुस्कान दी। उसकी निगाह अमन के चेहरे पर थोड़ी देर और टिकी रही। फिर उसने पल्लू संभाला और उठ गई। “चाय पी लो।”
अमन अंदर जा ही रहा था कि कमला चाची आँगन के दूसरे कोने से निकलकर आईं। उन्होंने अमन का हाथ पकड़ लिया।
“शाम हो गई… चेहरा थका लग रहा है,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। उंगलियाँ उसकी कलाई पर घूमने लगीं। “नींद पूरी नहीं होती होगी इन दिनों।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। “नींद तो आती है चाची… लेकिन सपने बहुत ज्यादा आने लगे हैं।”
कमला चाची की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने अमन की कलाई थोड़ा और दबाई। “सपने में भी हद रखनी चाहिए।” फिर उन्होंने हाथ छुड़ाया और अंदर चली गईं। अमन खड़ा रह गया। कमला चाची की उंगलियों की गर्माहट अभी भी कलाई पर बाकी थी।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की हर बात विस्तार से बताई—सुबह कमला चाची की निगाहें और बालों में उंगलियाँ, राधा के साथ कोने वाला चुंबन, राजिया की घूरने वाली निगाहें, कविता के साथ आँगन वाली बात, और फिर कमला चाची की कलाई वाली फ्लर्टिंग। आखिर में रुक्साना का ख्याल भी बता दिया जो अभी भी दिमाग में था।
रेणु ने अंत तक चुपचाप सुना। चेहरा गंभीर हो गया।
“तुम एक साथ बहुत सारी आग लगा रहे हो,” उसने धीमे लेकिन सख्त स्वर में कहा। “कमला चाची अब निगाहों से खेल रही हैं। कविता भी इशारे समझने लगी है। राजिया तुम्हें संदेह की नजर से देख रही है। और रुक्साना… वह तो खतरे की जड़ है। राजिया की माँ है। अगर उसके साथ कुछ उलझा तो वह रात भी खुल जाएगी जो तुमने राजिया के साथ बिताई थी।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“मैं तुम्हें शरीर सिखा रही हूँ, दिल समझा रही हूँ। लेकिन नियंत्रण तुम्हें खुद रखना होगा। एक साथ सब कुछ मत चाहो। राधा के साथ जो बन रहा है उसे संभालो। बाकी चीजों में जल्दबाजी मत करो।”
रेणु ने इस बार ज्यादा शारीरिक शिक्षा नहीं दी। बस अमन के बालों में हाथ फेरा और बोली, “आज बस इतना। सो जाओ। कल फिर बात करेंगे।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। कमरे में अँधेरा था। आँखें बंद कीं तो एक साथ कई चेहरे घूमने लगे—राधा के होंठ, कमला चाची की निगाहें, कविता की मुस्कान, राजिया की संदेह भरी आँखें और रुक्साना का गदराया हुआ बदन।
सब कुछ एक साथ उलझता जा रहा था।
रात गहरी होती गई। नींद देर से आई।
शरीर में दर्द हो रहा था। चूत और गाँड दोनों सूजी हुई थीं। जाँघों के अंदर अभी भी उस अजनबी का पानी चिपचिपा लगा हुआ था। कमरा अँधेरा था। बाहर हल्की हवा आ रही थी। लेकिन राजिया की आँखें खुली हुई थीं।
वह सोच रही थी।
“क्या रात थी… क्या आदमी था वह…”
उसने आँखें बंद कीं। फिर से पूरा रात आँखों के सामने घूमने लगा। मंकी कैप पहने वह आदमी। उसकी चुप्पी। उसका तरीका। उसकी जीभ। उसका मोटा और लंबा लंड। जिसने उसकी चूत और गाँड दोनों को फाड़कर रख दिया था।
“आज तक कोई मुझे इतना संतुष्ट नहीं कर पाया… कोई नहीं…”
राजिया ने धीरे से कराहते हुए करवट बदली। दर्द तेज हो गया। लेकिन दर्द के साथ एक गहरी संतुष्टि भी थी। शरीर थका हुआ था, लेकिन मन में एक अजीब सी भूख बाकी थी।
“उसने मुझे पता नहीं कितनी बार पानी निकाल दिया… छह… सात… मैंने गिनना छोड़ दिया था… शरीर काँप-काँप जाता था… और वह रुकता ही नहीं था…”
उसने अपना हाथ धीरे से अपनी चूत पर रखा। हल्की सूजन महसूस हुई। उंगलियों पर अभी भी गीलापन था।
“कौन था वह… आवाज अलग थी… तरीका अलग था… ताकत अलग थी… वह तीसरा वाला तो बिल्कुल नहीं था… वह तो कभी इतना कुछ नहीं कर पाता…”
राजिया की आँखों में एक जिद सी आ गई।
“पता लगाके रहूँगी… कौन है वह… कहाँ रहता है… कैसे आया… मैं उसे ढूँढूँगी… और…”
उसने होंठ दबाए। मन में एक ख्याल आया जो पहले कभी नहीं आया था।
“उसे अपना बनाके रहूँगी… या फिर उसकी रंडी बन जाऊँगी… अगर वह कहे तो… बस मुझे वही चाहिए… वही आदमी… वही लंड… वही तरीका…”
सोचते-सोचते उसकी पलकें भारी होने लगीं। शरीर दर्द से भरा हुआ था, लेकिन थकान अब नींद में बदल रही थी। उसने धीरे से अपने आप से कहा,
“इतना दर्द हो रहा है… मजे के बाद… अब तो दो दिन कॉलेज भी नहीं जा पाऊँगी…”
आखिरी ख्याल उसी अजनबी का था—मंकी कैप, चुपचाप चोदता हुआ, और आखिर में उसकी गाँड में पानी छोड़कर गायब हो जाना।
राजिया की आँखें बंद हो गईं।
वह सो गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ उसकी भारी साँसें बाकी रह गईं।
अमन घर पहुँचा तो रात काफी बीत चुकी थी।
पिछवाड़े वाले रास्ते से चुपके से अंदर घुसा। मंकी कैप और काले कपड़े अभी भी उस पर थे। शरीर में थकान थी, लेकिन एक अजीब सी शक्ति भी थी। पहली बार उसने किसी लड़की के साथ पूरी रात बिताई थी। जो कुछ रेणु ने सिखाया था, लगभग सब इस्तेमाल कर लिया था। राजिया की सिसकारियाँ, उसके शरीर का काँपना, और आखिर में उसकी गाँड में पानी छोड़ना—सब अभी भी दिमाग में ताजा था।
उसने कपड़े बदले। हाथ-मुँह धोया। फिर अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर बैठ गया। दिल अभी भी जोर से धड़क रहा था।
थोड़ी देर बाद दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई। रेणु थी। लालटेन लेकर अंदर आई। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसने अमन के चेहरे को ध्यान से देखा।
“हो गया?” उसने सीधे पूछा।
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ।”
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। “सब बताओ। कुछ मत छुपाओ।”
अमन ने शुरू से अंत तक सब बता दिया। कैसे उसने उस लड़के को डराकर भगाया, कैसे मंकी कैप पहनकर राजिया के कमरे में घुसा, कैसे पहले प्यार से शुरू किया, फिर जीभ से उसे पागल किया, कैसे अलग-अलग पोजीशन में उसे चोदा, कैसे उसके छह बार पानी निकाले, और आखिर में उसकी गाँड में अपना पानी छोड़कर चला आया।
रेणु अंत तक चुपचाप सुनती रही। जब अमन खत्म हुआ तो उसने धीरे से पूछा,
“चेहरा नहीं देखा उसने?”
“नहीं। टोपी नहीं उतारी मैंने। आवाज भी बदली हुई रखी।”
रेणु ने गहरी साँस ली। “अच्छा किया। लेकिन याद रखना—ऐसी रातें दोबारा उतनी आसानी से नहीं मिलतीं। और राजिया अब तुम्हें ढूँढने की कोशिश करेगी। गाँव छोटा है। सावधान रहना।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“तुमने जो किया, वह सिर्फ शरीर का खेल नहीं था। तुमने नियंत्रण रखा। चेहरा नहीं दिखाया। जल्दी वापस आ गए। यह अच्छी बात है। लेकिन घमंड में मत आना। एक रात ने तुम्हें उस्ताद नहीं बना दिया।”
अमन ने सिर हिलाया।
रेणु थोड़ा करीब आई। “शरीर कैसा महसूस कर रहा है?”
“थकान है… लेकिन हल्का भी लग रहा है।”
रेणु ने उसके बालों में हाथ फेरा। “सो जाओ। कल बात करेंगे। और हाँ—राधा के बारे में मत भूलना। जो कुछ तुमने राजिया के साथ किया, वह शरीर की भूख थी। राधा के साथ दिल का रिश्ता है। दोनों को मिलाकर मत बैठना।”
अमन ने फिर सिर हिलाया।
रेणु उठ खड़ी हुई। दरवाजे तक जाकर बोली,
“तुम सीख रहे हो। लेकिन रास्ता अभी लंबा है। रात अच्छी रही तुम्हारी… अब आराम करो।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। कमरे में अँधेरा था। आँखें बंद कीं तो राजिया की सिसकारियाँ और रेणु की सलाह दोनों एक साथ घूमने लगीं। साथ ही राधा का चेहरा भी आँखों के सामने आ गया—मेले वाला चुंबन, उसके आँसू, उसका हल्का सा गाल पर किया गया चुंबन।
आज पहली बार उसने किसी लड़की को पूरी तरह से जिया था।
लेकिन मन में यह भी था कि यह खेल खतरनाक था।
वह लेट गया। थकान ने धीरे-धीरे उसे अपनी चपेट में ले लिया।
नींद आ गई।
मंगलवार की सुबह अमन अभी गहरी नींद में था।
कमला चाची चुपके से कमरे में आईं। उन्होंने दरवाजा धीरे से बंद किया और बिस्तर के पास आ गईं। चाँदनी फीकी पड़ चुकी थी, सुबह की हल्की रोशनी खिड़की से आ रही थी। उन्होंने धीरे से चादर हटाई। अमन का लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त था।
कमला ने अपने नरम हाथों से उसे पकड़ लिया। उंगलियाँ बहुत हल्की और अनुभवी थीं। उन्होंने धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया—जड़ से लेकर सिर तक। लंड उनके हाथ में और सख्त होता गया। उनकी साँसें तेज हो रही थीं। आँखें लंड पर टिकी हुई थीं।
तभी अमन की साँसें थोड़ी बदलीं। वह करवट लेने वाला था। कमला चाची तुरंत समझ गईं कि वह जागने वाला है। उन्होंने फौरन चादर वापस डाल दी, हाथ छुड़ाया और चुपके से कमरे से बाहर निकल गईं। दरवाजा हल्के से बंद किया।
अमन की आँख खुली। कमरा खाली था। लेकिन चादर के नीचे उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था और हल्की सी गर्माहट बाकी थी जैसे कोई हाथ अभी-अभी लगा हो। उसने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। मन में अजीब सा ख्याल आया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
उठकर नहाया-धोया और कॉलेज के लिए निकल पड़ा।
कॉलेज में राधा पहले से बैठी थी। ब्रेक में दोनों टंकी के पास मिले। इस बार राधा थोड़ी और करीब खड़ी हुई। अमन ने हल्के से उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम आज और प्यारी लग रही हो,” उसने धीमे स्वर में कहा।
राधा का चेहरा लाल हो गया। “बातें बनाने लगे हो अब।” लेकिन उसने हाथ नहीं छुड़ाया। दोनों की नजदीकी थोड़ी और बढ़ी।
downstream में अमन ने देखा कि वह तीसरा लड़का राजिया के भाई के साथ खड़ा गंभीर बातें कर रहा था। दोनों की सूरतें तनाव में लग रही थीं। अमन ने दूर से नजर रखी। मन में ख्याल आया—कहीं उस रात वाली बात तो नहीं खुल रही। उसने अपना चेहरा सामान्य रखा।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता और मीना दोनों बैठी थीं। कविता ने सिर उठाकर कहा, “आज थके लग रहे हो।”
मीना ने हँसते हुए जोड़ा, “कॉलेज में पढ़ाई ज्यादा हुई या कुछ और?”
अमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “पढ़ाई ही हुई दीदी।” दोनों बहनें हल्की मुस्कान के साथ उसे देखती रहीं। उनकी निगाहों में हल्की जिज्ञासा थी। अमन अंदर चला गया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“दिन कैसा रहा?” उसने पूछा।
अमन ने सब बता दिया—सुबह की अजीब सी गर्माहट (उसने कमला का नाम नहीं लिया, सिर्फ अहसास बताया), राधा के साथ बढ़ती नजदीकी, तीसरे लड़के का राजिया के भाई से बात करना, और बहनों की हल्की बातें।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “तीसरे लड़के वाली बात पर नजर रखना। राजिया अब भी तुम्हें ढूँढ रही होगी। और घर के अंदर भी आँखें खुली रखना।”
फिर वह थोड़ा करीब आई। “आज थक गए हो, लेकिन शिक्षा जारी रखनी है।”
रेणु ने अमन को चूमा। गहराई से। फिर उसकी पैंट खोली और लंड निकालकर मुँह में ले लिया। धीरे-धीरे, नियंत्रण के साथ चूसने लगी। अमन की उंगलियाँ उसके बालों में फँस गईं। कुछ देर बाद रेणु ने खुद उसे बिस्तर पर लिटाया, सलवार हटाई और अमन की जीभ अपनी चूत पर रख दी।
“जैसा सिखाया है वैसा करो,” उसने फुसफुसाकर कहा।
अमन ने जीभ से चाटा, चूसा, अंदर तक डाला। रेणु की सिसकारियाँ धीमी लेकिन तेज होती गईं। थोड़ी देर में उसका पानी अमन के मुँह पर छूट गया। रेणु काँपती रही। फिर उसने अमन को अपनी तरफ खींचकर कहा,
“अच्छा किया। नियंत्रण रखना सीख रहे हो। अब सो जाओ।”
रेणु कपड़े ठीक करके चली गई।
अमन अकेला रह गया। सुबह की रहस्यमयी गर्माहट, राधा की मुस्कान, तीसरे लड़के की बातचीत और रेणु की शिक्षा—सब एक साथ दिमाग में घूम रहे थे।
रात गहरी होती गई।
बुधवार की सुबह अभी अँधेरा पूरी तरह नहीं छटा था।
अमन गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे में हल्की ठंडक थी। खिड़की से बाहर मुर्गे की आवाज दूर से आ रही थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। इस बार उन्होंने दरवाजा पूरी तरह बंद किया और सिटकिनी तक लगा दी। उनके कदम बिलकुल आवाज नहीं कर रहे थे।
वे बिस्तर के पास आकर रुकीं। अमन की साँसें नियमित थीं। चादर कमर तक थी। कमला ने धीरे से चादर हटाई। फिर उसकी पैंट और कच्छे का नाड़ा खोला। अमन का लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त बाहर निकल आया। कमला की आँखों में भूख साफ झलक रही थी।
उन्होंने दोनों नरम हाथों से लंड को पकड़ लिया। इस बार सिर्फ सहलाना नहीं था। वे उसे अच्छी तरह मलने लगीं। एक हाथ से जड़ को कसकर पकड़े हुए ऊपर-नीचे कर रही थीं, दूसरे हाथ से सिर को गोलाकार सहला रही थीं। कभी हल्के, कभी थोड़ा जोर से। लंड उनके हाथों में तेजी से सख्त और गर्म होता जा रहा था। नसें फूल गई थीं। कमला की साँसें तेज हो रही थीं। उनके होंठ हल्के से खुले हुए थे। कभी-कभी वे लंड के सिर पर अपने अंगूठे से गोला बना रही थीं।
अमन की साँसों में हल्का बदलाव आया। उसकी पलकें फड़कने लगीं। कमला तुरंत समझ गईं। उन्होंने फौरन लंड को कच्छे में वापस रखा, नाड़ा बाँधा, चादर डाल दी और चुपके से सिटकिनी खोली। दरवाजा हल्के से बंद करके वे गलियारे में गायब हो गईं।
अमन की आँख खुली। कमरा खाली था। लेकिन कच्छे के अंदर उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था और हल्की सी गीली गर्माहट बाकी थी। उसने इधर-उधर देखा। कोई नहीं था। मन में एक अजीब सा ख्याल घूम गया—फिर वही अहसास। उसने गहरी साँस ली और उठकर बैठ गया।
नहा-धोकर कॉलेज के लिए निकला।
कॉलेज में राधा पहले से बैठी थी। अमन के जाते ही उसने मुस्कुरा दिया। ब्रेक में दोनों टंकी के पास मिले। इस बार राधा और करीब खड़ी हुई। अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम रोज़ और प्यारी लगने लगती हो,” उसने धीमे स्वर में कहा।
राधा का चेहरा लाल हो गया। उसने नजरें झुकाईं लेकिन हाथ नहीं छुड़ाया। “अब बहुत बातें बनाने लगे हो तुम।”
अमन ने हल्के से उसकी उंगलियाँ दबाईं। “सच कह रहा हूँ।” दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। नजदीकी साफ बढ़ रही थी।
राजिया आज भी कॉलेज नहीं आई थी। अमन ने उसकी खाली जगह की तरफ देखा। मन में उस रात की सिसकारियाँ घूम गईं।
दोपहर में घर लौटा तो आँगन में कविता और मीना दोनों कपड़े सुखा रही थीं। कविता ने सिर उठाकर कहा, “आज चेहरा थोड़ा लाल लग रहा है। कॉलेज में गर्मी ज्यादा थी क्या?”
मीना ने हँसते हुए जोड़ा, “या किसी ने गाल पर कुछ कर दिया?” दोनों बहनें एक-दूसरे की तरफ देखकर हँसीं। अमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “पढ़ाई की गर्मी थी दीदी।” वह अंदर चला गया। दोनों बहनों की निगाहें उसकी पीठ पर थोड़ी देर और रहीं।
आँगन के दूसरे कोने में कमला चाची बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आओ।”
अमन पास गया। कमला ने उसका हाथ पकड़ा। उंगलियाँ उसकी कलाई पर घूमने लगीं।
“सुबह जल्दी उठ गए लगते हो,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। आँखों में हल्की चमक थी। “नींद पूरी नहीं हुई होगी।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। इस बार उसने पीछे नहीं हटा। “नींद तो पूरी थी चाची… लेकिन किसी ने शायद सपना अच्छा दिखा दिया।”
कमला चाची एक पल के लिए ठिठक गईं। फिर धीरे से मुस्कुराईं। उनके हाथ ने अमन की कलाई थोड़ा और दबाया। “सपने में भी सीमा रखनी चाहिए।” आवाज में नाराजगी नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी चुनौती थी। अमन ने भी हल्की मुस्कान दी और अंदर चला गया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके सिटकिनी लगाई और बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“दिन भर की बात बताओ,” उसने कहा।
अमन ने सब कुछ विस्तार से बताया—सुबह की अजीब गर्माहट और कच्छे के अंदर का अहसास, राधा के साथ बढ़ती नजदीकी, राजिया की अनुपस्थिति, बहनों की हल्की चिढ़ाने वाली बातें, और कमला चाची के साथ आँगन वाली फ्लर्टिंग।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “कमला चाची अब स्पष्ट इशारे कर रही हैं। तुम भी जवाब दे रहे हो। यह खतरनाक खेल है। घर के अंदर की आग बाहर की आग से ज्यादा जलती है। सावधान रहना।”
फिर वह थोड़ा करीब आई। आँखों में वह चमक थी। “आज शिक्षा में एक नया कदम रखेंगे।”
रेणु ने अमन को गहराई से चूमा। जीभ अंदर तक गई। दोनों की साँसें तेज हो गईं। उसने अमन की पैंट खोली और लंड निकालकर कुछ देर सहलाया। फिर खुद बिस्तर पर लेट गई और सलवार नीचे सरका दी।
“आज उंगलियों से करो,” उसने फुसफुसाकर कहा। “मैं बताती रहूँगी।”
अमन उसके पास लेट गया। एक हाथ से उसके स्तन सहलाते हुए दूसरे हाथ की मध्यमा उंगली धीरे से उसकी चूत पर फेरने लगा। रेणु की कमर हिलने लगी। अमन ने उंगली अंदर डाली। पहले एक, फिर धीरे से दूसरी। रेणु की सिसकारी निकली।
“हाँ… ऐसे… अंदर तक… मोड़ो थोड़ा… ऊपर वाली जगह पर जोर से…”
अमन ने वैसा ही किया। उंगलियाँ अंदर-बाहर हो रही थीं। कभी तेज, कभी धीमी। रेणु की साँसें तेज होती गईं। उसने अमन का हाथ पकड़कर और गहराई तक दबाने लगी। थोड़ी देर में उसका शरीर अकड़ गया। पानी अमन की उंगलियों पर छूट गया। रेणु काँपती रही।
अमन ने उंगलियाँ निकालीं। रेणु ने आँखें खोलीं। चेहरे पर संतुष्टि थी। उसने अमन को अपनी तरफ खींचकर माथे पर चुंबन दिया।
“अच्छा किया। उंगलियों का इस्तेमाल भी जरूरी है। कभी-कभी लंड से पहले यह ज्यादा असर करता है।”
रेणु ने कपड़े ठीक किए। दरवाजे तक जाकर बोली,
“कमला चाची और राधा… दोनों अलग-अलग खेल हैं। मिला मत देना। और राजिया वाली बात पर नजर रखना।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। उंगलियों पर रेणु की नमी बाकी थी। दिमाग में सुबह कमला चाची के हाथों का अहसास, राधा की मुस्कान और रेणु की शिक्षा एक साथ घूम रहे थे।
रात गहरी होती गई। शरीर में एक नई बेचैनी थी।
गुरुवार की सुबह अभी पूरी तरह अँधेरा नहीं छटा था।
अमन गहरी नींद में सोया हुआ था। कमरे में हल्की ठंडक फैली हुई थी। खिड़की से बाहर मुर्गे की पहली आवाज दूर से आ रही थी। तभी दरवाजा बहुत धीरे से खुला। कमला चाची अंदर आईं। उन्होंने इस बार दरवाजा बंद करके सिटकिनी भी लगा दी। उनके कदम फर्श पर कोई आवाज नहीं कर रहे थे।
वे बिस्तर के पास आकर रुकीं। अमन की साँसें नियमित थीं। चादर कमर तक खिसकी हुई थी। कमला ने धीरे से चादर हटाई। फिर उसकी पैंट और कच्छे का नाड़ा खोला। अमन का लंड सुबह की अवस्था में आधा सख्त बाहर निकल आया। कमला की आँखों में वही भूखी चमक थी।
उन्होंने दोनों नरम हाथों से लंड को पकड़ लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगीं। इस बार उनका हाथ और अनुभवी था। जड़ से सिर तक पूरा मल रही थीं। थोड़ी देर में लंड पूरी तरह खड़ा हो गया। नसें फूल गईं। कमला की साँसें तेज हो रही थीं। तभी लंड के सिर पर हल्का सा सफेद द्रव दिखाई दिया—थोड़ा सा वीर्य।
कमला ने झुककर अपनी जीभ निकाली और उस वीर्य को चाट लिया। स्वाद लेते हुए उन्होंने आँखें बंद कीं। फिर बिना किसी हिचकिचाहट के लंड के सिर को मुँह में ले लिया और चूसने लगीं। हल्के-हल्के, गोल-गोल जीभ घुमाते हुए। कभी सिर को पूरा मुँह में लेकर चूसतीं, कभी सिर्फ जीभ से चाटतीं। अमन की साँसों में हल्का बदलाव आने लगा। उसकी पलकें फड़कने लगीं।
कमला तुरंत समझ गईं कि वह जागने वाला है। उन्होंने फौरन लंड को मुँह से निकाला, कच्छे में वापस रखा, नाड़ा बाँधा, चादर डाल दी और चुपके से सिटकिनी खोली। दरवाजा हल्के से बंद करके वे गलियारे में गायब हो गईं।
अमन की आँख खुली। कमरा खाली था। लेकिन कच्छे के अंदर उसका लंड पूरी तरह तना हुआ था और सिर पर हल्की गीली गर्माहट बाकी थी—जैसे कोई मुँह अभी-अभी लगा हो। उसने गहरी साँस ली। मन में एक अजीब सा एहसास घूम गया।
नहा-धोकर कॉलेज के लिए निकला।
कॉलेज पहुँचते ही उसकी नजर राधा पर गई। राधा ने मुस्कुराकर उसका स्वागत किया। ब्रेक में अमन ने राधा का हाथ पकड़ा और उसे कॉलेज के पीछे वाले शांत कोने में ले गया। वहाँ दीवार के पीछे दोनों खड़े हो गए।
अमन ने दोनों हाथों से राधा का चेहरा पकड़ा और धीरे से उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। चुंबन नरम था, लेकिन इस बार थोड़ा और गहरा। राधा पहले सहम गई, फिर धीरे-धीरे जवाब देने लगी। अमन की जीभ उसके होंठों पर फिसली। राधा की साँसें तेज हो गईं। अमन ने उसके निचले होंठ को हल्के से काटा।
“अमन…” राधा ने फुसफुसाकर कहा। गाल लाल थे।
अमन ने उसके कान के पास धीमे स्वर में कहा, “तुम रोज़ और सुंदर लगती हो। अब तो तुम्हें देखकर दिल नहीं भरता।”
राधा शर्मा गई। उसने अमन की कमीज का कोना पकड़ लिया। “यहाँ कोई देख लेगा…”
अमन ने फिर से उसके होंठ चूम लिए। छोटा सा लेकिन प्यार भरा चुंबन। राधा की उंगलियाँ उसकी कमीज में और कस गईं। दोनों कुछ पल और उसी कोने में खड़े रहे।
वे दोनों इतने में व्यस्त थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि थोड़ी दूर, पेड़ों की छाँव में वही अज्ञात व्यक्ति फिर से खड़ा उन्हें देख रहा था। उसकी निगाहें दोनों पर टिकी हुई थीं।
कक्षा में लौटते समय अमन ने देखा कि राजिया आज कॉलेज आई थी। वह अपनी जगह पर बैठी थी। चलने में हल्की तकलीफ साफ दिख रही थी। चेहरा थोड़ा थका हुआ था। अमन ने जानबूझकर उसकी तरफ ज्यादा नहीं देखा।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता कपड़े सुखा रही थी। अमन उसके पास से गुजरा तो कविता ने सिर उठाया।
“आज देर से आए हो,” उसने कहा। आवाज में हल्की शरारत थी। “कॉलेज में कोई खास बात हो गई क्या?”
अमन ने रुककर उसकी तरफ देखा। कविता की साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था। गले की हड्डियाँ साफ दिख रही थीं। अमन ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “खास तो नहीं… लेकिन दिन अच्छा जरूर रहा।”
कविता ने उसकी आँखों में देखा। थोड़ी देर निगाहें मिली रहीं। फिर उसने धीरे से मुस्कुरा दिया। “अच्छा रहा तो ठीक है।” अमन अंदर चला गया। कविता की निगाहें उसकी पीठ पर थोड़ी देर और रहीं।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की सारी बातें बता दीं—सुबह की अजीब गर्माहट और गीला अहसास, राधा के साथ कोने वाला चुंबन और फ्लर्टिंग, राजिया का कॉलेज आना, और कविता के साथ हल्की बात।
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “कमला चाची अब और आगे बढ़ रही हैं। कविता भी इशारे समझने लगी है। घर के अंदर आग धीरे-धीरे फैल रही है। सावधान रहना। और राजिया… वह अब तुम्हें ढूँढने की कोशिश करेगी। उसकी नजरों से बचके रहना।”
रेणु ने और ज्यादा शारीरिक शिक्षा नहीं दी। बस अमन का हाथ पकड़कर बोली, “आज बस इतना। तुम बहुत सारी चीजें एक साथ संभाल रहे हो। थोड़ा ठहरो। नियंत्रण रखना।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। सुबह की गीली गर्माहट, राधा के होंठों का स्वाद, कविता की निगाहें और रेणु की चेतावनी—सब एक साथ दिमाग में घूम रहे थे।
रात गहरी होती गई।
RUKSANA
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[/img]शुक्रवार की शाम का समय था।
अमन कॉलेज से लौटकर अभी कपड़े भी नहीं बदल पाया था कि पिता सुरेश ने आँगन से आवाज लगाई,
“अमन! इधर आ। खेत में एक काम है। जल्दी चल।”
अमन ने जल्दी से चप्पल पहनी और पिता के साथ निकल पड़ा। सूरज ढलने लगा था। आसमान में नारंगी और बैंगनी रंग फैल रहे थे। रास्ते में धूल उड़ रही थी। दोनों चुपचाप चल रहे थे। पिताजी ने सिर्फ इतना कहा,
“हल की मरम्मत करवानी थी। देख लेना कि काम हो गया या नहीं। मजदूरों से पूछ लेना।”
खेत तक पहुँचने में लगभग बीस मिनट लगे। खेत के किनारे वाली मिट्टी की मेड़ पर कुछ औजार पड़े थे। थोड़ी दूर पर एक औरत झुकी हुई हल की फाल साफ कर रही थी। उसकी पीठ अमन की तरफ थी। साड़ी का पल्लू कमर में तना हुआ था। कमर पतली और गोल थी। जब वह सीधी हुई तो अमन की नजरें एक पल के लिए रुक गईं।
वह औरत रुक्साना थी—राजिया की माँ।
उम्र करीब अड़तीस-चालीस के आसपास होगी। गोरा-सा रंग। चेहरा अभी भी जवान लग रहा था। आँखें तेज थीं। सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहा था उसका बदन। साड़ी के नीचे 34D के भारी स्तन साफ उभर रहे थे। कमर पतली (34) और फिर नीचे चौड़ी गाँड (36) के साथ गदराया हुआ बदन। साड़ी का पल्लू बार-बार खिसक रहा था और उसकी गोल कमर और नाभि की झलक मिल रही थी।
अमन ने मन ही मन सोचा, “क्या मस्त फिगर है… इसे तो पटा के जरूर चोदूँगा एक दिन।”
रुक्साना ने अमन को देखा। थोड़ी देर निगाहें मिलीं। फिर उसने पल्लू संभालते हुए कहा,
“अरे बाबूजी के बेटे हो न? क्या बात है?”
अमन ने सामान्य स्वर में जवाब दिया, “काकी, पिताजी ने भेजा है। हल की मरम्मत हो गई क्या? मजदूरों ने कहा था आज तक हो जाएगी।”
रुक्साना ने हल की तरफ इशारा किया। “हो गई है। अभी अभी साफ करके रखी हूँ। तुम चेक कर लो।”
अमन पास गया। रुक्साना भी उसके बगल में खड़ी हो गई। दोनों की दूरी बहुत कम थी। रुक्साना के शरीर से हल्की मिट्टी और पसीने की खुशबू आ रही थी। अमन ने जानबूझकर हल को ध्यान से देखा, लेकिन उसकी नजरें बार-बार रुक्साना के स्तनों और कमर पर चली जा रही थीं। साड़ी का पल्लू फिर खिसका। भारी स्तनों की गोलाई और भी साफ दिखने लगी।
रुक्साना ने पल्लू ठीक करते हुए हल्की मुस्कान दी। “बाबूजी के बेटे हो, इसलिए काकी कह रहे हो। वरना उम्र में ज्यादा फर्क नहीं है।” आवाज में हल्की शरारत थी।
अमन ने सिर उठाकर उसकी आँखों में देखा। “काकी ही सही। आप तो घर की जैसी लगती हो।”
रुक्साना की आँखों में एक पल के लिए चमक आई। उसने अमन को सिर से पाँव तक एक बार घूरा। फिर धीरे से बोली, “बातें बनाना सीख गए हो लगते हो। जाओ, बाबूजी से कह देना काम हो गया है।”
अमन ने सिर हिलाया। “ठीक है काकी।”
वह लौटने लगा। कुछ कदम चलकर पीछे मुड़ा। रुक्साना अभी भी खड़ी उसे देख रही थी। साया हवा में उड़ रहा था। गदराया हुआ बदन धूप की आखिरी किरणों में चमक रहा था। अमन ने मन में फिर से वही बात दोहराई—“एक दिन जरूर…”
घर लौटकर उसने पिताजी को बता दिया कि काम हो गया है। पिताजी ने सिर हिला दिया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की बातें बतानी शुरू कीं। जब रुक्साना वाली बात पर आया तो रेणु की आँखें थोड़ी तेज हो गईं।
“राजिया की माँ?” उसने पूछा।
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ। खेत में मिलीं। फिगर… बहुत गदराया हुआ है।”
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। “तुमने सिर्फ बात की न?”
“हाँ। बस हल के बारे में पूछा। काकी कहा।”
रेणु ने गहरी साँस ली। “अच्छा किया जो अभी कुछ नहीं किया। लेकिन याद रखना—राजिया की माँ है। अगर उसके साथ कुछ उलझा तो राजिया वाली रात भी खुल सकती है। घर की औरतों में पहले से ही आग लगी है। बाहर की आग में हाथ मत डालो अभी।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“आज बस इतना। तुम बहुत सारी चीजें एक साथ देख रहे हो। थोड़ा ठहरो। नियंत्रण रखना।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। आँखें बंद कीं तो रुक्साना का गदराया हुआ बदन, उसके भारी स्तन और पतली कमर आँखों के सामने घूमने लगे। साथ में कमला चाची के हाथ, राधा के होंठ और रेणु की चेतावनी भी।
रात गहरी होती गई। मन बेचैन था।
शनिवार की सुबह अमन की नींद हल्की थी।
रात भर रुक्साना का गदराया हुआ बदन बार-बार आँखों के सामने घूमता रहा था। भारी स्तन, पतली कमर, गोल गाँड—सब कुछ साफ याद था। सुबह जब आँख खुली तो कमरा अभी भी धुँधला था। उसने करवट बदली। तभी दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई।
कमला चाची अंदर आईं। इस बार उन्होंने सिटकिनी नहीं लगाई। बस दरवाजा बंद करके बिस्तर के पास आ गईं। अमन ने आँखें बंद रखीं। कमला ने चादर नहीं हटाई। सिर्फ उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए धीरे से बोलीं,
“आज जल्दी उठ जाओ। चाय ठंडी हो जाएगी।”
अमन ने आँखें खोलीं। कमला चाची उसके बहुत करीब थीं। उनकी साड़ी का पल्लू आगे की तरफ झुका हुआ था। भारी स्तनों की गोलाई साफ दिख रही थी। अमन की निगाह वहीं रुक गई। कमला ने भी उसकी निगाह को पकड़ लिया। दोनों की आँखें एक पल के लिए मिलीं। कमला ने हल्की मुस्कान दी और बालों से हाथ हटा लिया।
“देखते मत रहो… उठो,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। आवाज में नाराजगी नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी शरारत थी। फिर वे कमरे से बाहर चली गईं।
अमन उठकर बैठ गया। दिल की धड़कन तेज हो रही थी। कमला चाची अब छूने के बजाय निगाहों से खेलने लगी थीं। यह और खतरनाक था।
नहा-धोकर कॉलेज निकल पड़ा।
कॉलेज में राधा पहले से बैठी थी। अमन के जाते ही उसने मुस्कुरा दिया। ब्रेक में दोनों फिर पीछे वाले कोने में मिले। इस बार अमन ने राधा का हाथ पकड़कर उसे दीवार से सटा दिया। दोनों की साँसें करीब थीं।
“तुम रोज़ मेरे दिमाग में रहती हो,” अमन ने धीमे स्वर में कहा।
राधा का चेहरा लाल हो गया। उसने अमन की कमीज का कोना पकड़ लिया। “यहाँ कोई आ जाएगा…”
अमन ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और हल्के से होंठों पर चुंबन कर दिया। छोटा सा, लेकिन गहरा। राधा की पलकें बंद हो गईं। चुंबन टूटने के बाद उसने धीरे से कहा, “अब बहुत हिम्मत हो गई है तुम्हारी।”
अमन मुस्कुराया। “तुम्हारी वजह से।” दोनों कुछ पल और उसी कोने में खड़े रहे। हाथ पकड़े हुए।
कक्षा में लौटते समय अमन की नजर राजिया पर गई। राजिया आज भी कॉलेज में थी। वह अपनी जगह पर बैठी थी, लेकिन उसकी निगाहें अमन पर बार-बार जा रही थीं। जब अमन ने उसकी तरफ देखा तो राजिया ने नजरें नहीं फेरीं। बल्कि कुछ पल तक घूरती रही। उसकी आँखों में एक अजीब सा सवाल और जिद दोनों थे। अमन ने सामान्य व्यवहार बनाए रखा, लेकिन मन में ख्याल आया—वह संदेह करने लगी है।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता अकेली बैठी थी। साड़ी का पल्लू एक तरफ गिरा हुआ था। अमन उसके पास से गुजरा तो कविता ने सिर उठाया।
“आज जल्दी आ गए,” उसने कहा। आवाज में हल्की गर्माहट थी। “बैठ जाओ थोड़ी देर।”
अमन ने उसके पास चौकी पर बैठ गया। कविता ने पानी का गिलास दिया। उंगलियाँ अमन की उंगलियों से छू गईं। दोनों ने कुछ नहीं कहा। कविता ने धीरे से पूछा, “तुम अब बहुत बदल गए हो लगते हो। पहले इतने चुप नहीं रहते थे।”
अमन ने उसकी आँखों में देखा। “बदलना तो समय के साथ लगता है दीदी।”
कविता ने हल्की मुस्कान दी। उसकी निगाह अमन के चेहरे पर थोड़ी देर और टिकी रही। फिर उसने पल्लू संभाला और उठ गई। “चाय पी लो।”
अमन अंदर जा ही रहा था कि कमला चाची आँगन के दूसरे कोने से निकलकर आईं। उन्होंने अमन का हाथ पकड़ लिया।
“शाम हो गई… चेहरा थका लग रहा है,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। उंगलियाँ उसकी कलाई पर घूमने लगीं। “नींद पूरी नहीं होती होगी इन दिनों।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। “नींद तो आती है चाची… लेकिन सपने बहुत ज्यादा आने लगे हैं।”
कमला चाची की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने अमन की कलाई थोड़ा और दबाई। “सपने में भी हद रखनी चाहिए।” फिर उन्होंने हाथ छुड़ाया और अंदर चली गईं। अमन खड़ा रह गया। कमला चाची की उंगलियों की गर्माहट अभी भी कलाई पर बाकी थी।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने दिन की हर बात विस्तार से बताई—सुबह कमला चाची की निगाहें और बालों में उंगलियाँ, राधा के साथ कोने वाला चुंबन, राजिया की घूरने वाली निगाहें, कविता के साथ आँगन वाली बात, और फिर कमला चाची की कलाई वाली फ्लर्टिंग। आखिर में रुक्साना का ख्याल भी बता दिया जो अभी भी दिमाग में था।
रेणु ने अंत तक चुपचाप सुना। चेहरा गंभीर हो गया।
“तुम एक साथ बहुत सारी आग लगा रहे हो,” उसने धीमे लेकिन सख्त स्वर में कहा। “कमला चाची अब निगाहों से खेल रही हैं। कविता भी इशारे समझने लगी है। राजिया तुम्हें संदेह की नजर से देख रही है। और रुक्साना… वह तो खतरे की जड़ है। राजिया की माँ है। अगर उसके साथ कुछ उलझा तो वह रात भी खुल जाएगी जो तुमने राजिया के साथ बिताई थी।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“मैं तुम्हें शरीर सिखा रही हूँ, दिल समझा रही हूँ। लेकिन नियंत्रण तुम्हें खुद रखना होगा। एक साथ सब कुछ मत चाहो। राधा के साथ जो बन रहा है उसे संभालो। बाकी चीजों में जल्दबाजी मत करो।”
रेणु ने इस बार ज्यादा शारीरिक शिक्षा नहीं दी। बस अमन के बालों में हाथ फेरा और बोली, “आज बस इतना। सो जाओ। कल फिर बात करेंगे।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। कमरे में अँधेरा था। आँखें बंद कीं तो एक साथ कई चेहरे घूमने लगे—राधा के होंठ, कमला चाची की निगाहें, कविता की मुस्कान, राजिया की संदेह भरी आँखें और रुक्साना का गदराया हुआ बदन।
सब कुछ एक साथ उलझता जा रहा था।
रात गहरी होती गई। नींद देर से आई।
Fuckuguy
albertprince547;
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