12-09-2026, 11:14 AM
रविवार की सुबह अमन आठ बजे से थोड़ा पहले ही गाँव के बाहर वाली सड़क पर पहुँच गया।
थोड़ी देर बाद राधा भी आ गई। हल्के गुलाबी रंग की सलवार-सूट में थी। बालों में दो छोटी लटें बाँधी हुई थीं। चेहरे पर हल्की सिंदूरी चमक और आँखों में उत्साह साफ दिख रहा था। अमन ने उसे देखते ही मुस्कुरा दिया।
“तैयार हो?” उसने पूछा।
राधा ने सिर हिलाया। “हाँ। चलो।”
दोनों पास वाली बस स्टैंड तक पैदल गए। छोटी सी बस आई। भीड़ कम थी। दोनों ने टिकट लिया और खिड़की वाली सीट पर बैठ गए। रास्ता लगभग आधे घंटे का था। खिड़की से हरे-भरे खेत, छोटे-छोटे तालाब और दूर तक फैली धूल भरी सड़क दिख रही थी। दोनों ज्यादा बात नहीं कर रहे थे, लेकिन सन्नाटा असहज नहीं लग रहा था।
मेला जिस मैदान में लगा था, वह गाँव के किनारे एक बड़ा खुला मैदान था। दूर से ही रंग-बिरंगे झंडे, गुब्बारे और लाउडस्पीकर की आवाजें सुनाई देने लगीं। जैसे-जैसे बस पास पहुँची, नजारा और साफ होता गया।
मेला सच में बहुत बड़ा था।
एक तरफ ऊँचे-ऊँचे झूले लगे थे—कुछ लोहे के बड़े वाले, कुछ लकड़ी के पारंपरिक। दूसरी तरफ खाने की लंबी कतारें थीं। तंदूरी चना, जलेबी की कड़ाहियाँ, गोलगप्पे, चाट, कुल्फी, मकई भुनी हुई… हर तरफ खुशबू फैली हुई थी। बीच में एक छोटा सा सर्कस का तंबू लगा था। जादूगर की दुकान पर बच्चे जमा थे। आगे की तरफ मिट्टी के बर्तन, खिलौने, चूड़ियाँ, बिंदियाँ और सस्ते गहने बेचने वाले दुकानदार चिल्ला-चिल्लाकर ग्राहक बुला रहे थे। धूल हवा में उड़ रही थी, लेकिन धूप अभी नरम थी। बच्चों की चीखें, हँसने की आवाजें और लाउडस्पीकर पर बजता पुराना गाना—सब मिलकर एक जीवंत माहौल बना रहे थे।
अमन और राधा बस से उतरे। दोनों एक पल के लिए रुककर पूरा नजारा देखते रहे।
“बड़ा है,” राधा ने धीमे स्वर में कहा। आँखें चमक रही थीं।
अमन ने सिर हिलाया। “पहले झूले चलें?”
राधा ने तुरंत हाँ कह दी।
वे भीड़ के बीच से होते हुए झूलों की तरफ बढ़े। ऊँचा वाला लोहे का झूला देखकर राधा थोड़ी हिचकिचाई। अमन ने कहा, “छोटा वाला पहले बैठते हैं। फिर चाहो तो ऊँचे वाले पर।”
दोनों ने छोटे झूले पर जगह बनाई। झूला आगे-पीछे होने लगा। राधा पहले थोड़ी सख्ती से बैठी हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे वह हँसने लगी। बाल हवा में उड़ रहे थे। अमन उसके बगल में बैठा उसे देख रहा था। राधा की हँसी साफ और बेफिक्र थी—जैसी वह कॉलेज में कभी नहीं हँसी थी।
झूला रोकने के बाद राधा ने कहा, “अब जलेबी खाते हैं।”
वे जलेबी वाली दुकान पर गए। गरम-गरम जलेबी की कड़ाही में तेल खौल रहा था। अमन ने दो प्लेट लीं। दोनों ने एक साथ जलेबी तोड़ी। राधा के होंठों पर मीठा चिपक गया। उसने हँसते हुए कहा, “बहुत गरम है।” अमन ने भी हँसी में सिर हिलाया। दोनों ने खड़े-खड़े जलेबी खाई। आसपास भीड़ थी, धूल थी, शोर था, लेकिन उन दोनों को जैसे अपना एक छोटा सा संसार मिल गया हो।
जलेबी के बाद राधा ने चाट की तरफ इशारा किया। “अब वह भी खाते हैं।”
चाट वाले ने दो प्लेट में भरकर दी—पूरी, आलू, चना, दही, चटनी और सेव। दोनों ने एक साथ खाया। राधा की आँखें तीखे स्वाद से भर आईं। उसने पानी माँगा। अमन ने हँसते हुए पानी का गिलास पकड़ा दिया।
“बहुत तीखा कर दिया साले ने,” राधा ने कहा और हँसी।
अमन ने भी हँसी में जवाब दिया, “तुम्हारे चेहरे से लग रहा है।”
दोनों फिर हँसे।
खाना खाने के बाद वे धीरे-धीरे मेले में घूमने लगे। कभी गुब्बारे वाली दुकान के पास रुके, कभी मिट्टी के खिलौने देखे, कभी बच्चों को सर्कस के तंबू में घुसते देखा। राधा कभी-कभी अमन का हाथ पकड़ लेती जब भीड़ ज्यादा हो जाती। अमन उसका हाथ छोड़ता नहीं था। दोनों एक-दूसरे के साथ इतनी आसानी से चल रहे थे जैसे सालों से साथ घूम रहे हों।
दूर लाउडस्पीकर पर कोई पुराना गाना बज रहा था। धूप अब थोड़ी तेज हो चली थी। हवा में धूल और मिठास की मिली-जुली खुशबू तैर रही थी।
अमन ने राधा की तरफ देखा। वह गुब्बारे की दुकान पर खड़ी एक लाल गुब्बारा चुन रही थी। उसके चेहरे पर जो शांति और खुशी थी, वह अमन ने पहली बार देखी थी।
मेला अभी शुरू ही हुआ था।
जलेबी और चाट खा लेने के बाद दोनों ने थोड़ी देर और मेला घूमा। धूप अब तेज हो चली थी। लाउडस्पीकर पर गाने बदलते जा रहे थे। तभी राधा की नजर एक बड़े तंबू पर पड़ी। तंबू के बाहर बड़े-बड़े पोस्टर लगे थे—जादूगर की तस्वीर और नीचे लिखा था “लड़की को टुकड़े-टुकड़े करके फिर जोड़ने वाला अद्भुत जादू”।
राधा ने अमन का हाथ हल्के से खींचते हुए कहा, “चलो यह देखें।”
अमन ने सिर हिलाया। दोनों तंबू के अंदर घुसे। अंदर काफी अँधेरा था। आगे की तरफ छोटी सी स्टेज बनी हुई थी। बीच में रोशनी का एक घेरा था, बाकी जगह धुँधली। लोग आगे की कुर्सियों पर बैठे थे। आखिरी कोने में दो खाली सीटें बची थीं—दीवार के बिल्कुल पास, जहाँ रोशनी लगभग नहीं पहुँच रही थी।
अमन और राधा वहीं जाकर बैठ गए। जगह कम थी। दोनों के कंधे एक-दूसरे से छू रहे थे। बैठते समय राधा का हाथ अनजाने में अमन के हाथ पर पड़ गया। उसने हटाया नहीं। अमन ने भी नहीं हटाया। दोनों के हाथ अँधेरे में एक-दूसरे से जुड़े रह गए।
थोड़ी देर बाद जादूगर स्टेज पर आया। काले कपड़ों में था। उसने जोर-जोर से बातें कीं, फिर एक लड़की को स्टेज पर बुलाया। लड़की एक लंबे बक्से में लेट गई। जादूगर ने बक्से के ढक्कन बंद किए और बड़ी आरी निकालकर बक्से को बीच से काटना शुरू कर दिया। आरी की आवाज और जादूगर की जोर-जोर से की गई बातें तंबू में गूँज रही थीं।
राधा की पकड़ अमन के हाथ पर अचानक कस गई। जब जादूगर ने बक्से के दोनों हिस्से अलग किए और लड़की के शरीर के दो टुकड़े दिखाए, तो राधा डरकर अमन की तरफ झुक गई। उसका शरीर अमन के शरीर से चिपक गया।
“डर लग रहा है…” उसने बहुत धीमी आवाज में कहा। आवाज काँप रही थी।
अमन ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया। फिर धीरे से अपना दूसरा हाथ बढ़ाकर उसकी कमर पर रख दिया और उसे अपनी तरफ खींच लिया। राधा पूरी तरह उसकी बाँहों में समा गई। अमन ने उसे अपने से सटा लिया। राधा का सिर उसके कंधे के पास था। उसकी साँसें तेज चल रही थीं।
स्टेज पर जादूगर बक्से के दोनों हिस्से जोड़ रहा था। लेकिन अँधेरे कोने में बैठे दोनों को अब जादू से ज्यादा एक-दूसरे की गर्माहट महसूस हो रही थी। राधा अमन की बाँहों में सिमटी हुई थी। अमन उसके बालों में मुँह किए हुए था। दोनों की साँसें एक-दूसरे से मिल रही थीं।
जादू खत्म हुआ। लोग ताली बजाने लगे। रोशनी थोड़ी बढ़ी। राधा ने धीरे से अमन की बाँहों से खुद को अलग किया। उसका चेहरा लाल हो चुका था। आँखें झुकी हुई थीं।
“मैं… डर गई थी,” उसने बहुत धीमी आवाज में कहा। शर्म से उसका गला बैठ गया था।
अमन ने भी धीमे स्वर में जवाब दिया, “कोई बात नहीं।”
दोनों तंबू से बाहर निकले। धूप में आने के बाद भी राधा का चेहरा लाल था। वह अमन की तरफ सीधे देख नहीं पा रही थी। अमन के शरीर पर अभी भी उसकी गर्माहट बाकी थी। हाथों में उसकी हथेली की नमी थी।
मेला अभी बाकी था। लेकिन दोनों के बीच की दूरी थोड़ी और कम हो चुकी थी।
जादू के तंबू से निकलने के बाद दोनों मेले में धीरे-धीरे चलने लगे। भीड़ थी, धूल उड़ रही थी, लाउडस्पीकर पर गाने बज रहे थे, लेकिन दोनों के बीच एक अलग सी चुप्पी थी। राधा अभी भी थोड़ी शर्माई हुई थी। जादू वाले तंबू में जो हुआ था, वह उसके चेहरे पर साफ दिख रहा था।
अमन ने हल्के स्वर में कहा, “तुम्हारे बाल हवा में ऐसे उड़ रहे हैं… अच्छे लग रहे हैं।”
राधा ने उसकी तरफ देखा और जल्दी से नजरें झुका लीं। “बातें मत बनाओ।”
अमन मुस्कुराया। “बना नहीं रहा। सच लग रहे हो तुम आज। मेले में आने के बाद और भी।”
राधा का चेहरा और लाल हो गया। वह थोड़ा तेज चलने लगी। अमन उसके साथ कदम मिलाता रहा। थोड़ी देर तक दोनों चुपचाप चलते रहे। फिर राधा ने अचानक धीमी आवाज में कहा,
“इतना प्यार करते हो मुझसे? मैं तो एक गरीब घर की लड़की हूँ… और तुम अमीर घर के लड़के हो।”
अमन रुक गया। राधा भी दो कदम आगे जाकर रुकी। उसने पीछे मुड़कर अमन की तरफ देखा। अमन की आँखों में एक गंभीर भाव था। उसने राधा का हाथ हल्के से पकड़ा और उसे भीड़ से थोड़ा हटाकर एक शांत कोने की तरफ ले गया। वहाँ एक बड़ा पेड़ था और उसके पीछे थोड़ी खाली जगह। लोग कम आ-जा रहे थे।
अमन ने राधा को पेड़ के पास खड़ा किया। दोनों हाथों से उसके कंधे पकड़कर कहा,
“आज यह बात कह दी। आज के बाद ऐसा मत कहना। कभी मत कहना।”
राधा की आँखें उसकी आँखों में थीं। अमन की आवाज में एक अजीब सी सच्चाई थी।
“मैं तुमसे बहुत समय से प्यार करता हूँ राधा,” अमन ने धीमे लेकिन साफ स्वर में कहा। “कॉलेज में भी… तुम्हें दूर से देखता था। लेकिन बोल नहीं पाता था। हिम्मत नहीं होती थी। अब जब तुम मेरे इतने करीब आई हो… तो मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। गरीब-अमीर की बात मत करना। मेरे लिए तुम सिर्फ राधा हो।”
राधा की आँखों में धीरे-धीरे आँसू भर आए। वह कुछ बोल नहीं पाई। आँसू उसकी पलकों पर टिक गए। अमन ने दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़ा और धीरे से उसका सर ऊपर उठाया। फिर अपने होंठों से उसके आँसुओं को चूम लिया—पहले एक आँख के नीचे, फिर दूसरी के। आँसू उसके होंठों पर लग गए।
राधा की साँसें काँप रही थीं। अमन ने उसके माथे से लेकर नाक तक हल्के चुंबन दिए। फिर धीरे से उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
चुंबन बहुत नरम था। जल्दबाजी में नहीं। प्यार से भरा हुआ। राधा ने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठ काँप रहे थे, लेकिन उसने अमन के होंठों को धक्का नहीं दिया। दोनों के होंठ कुछ पल तक जुड़े रहे। न जीभ थी, न कोई जल्दी। सिर्फ एक लंबा, नरम और भरा हुआ चुंबन।
जब अमन ने होंठ हटाए तो राधा की आँखें अभी भी बंद थीं। गालों पर आँसुओं के निशान थे और होंठ हल्के से खुले हुए। उसने आँखें खोलीं तो अमन को देखते हुए बहुत धीमी आवाज में कहा,
“अमन…”
सिर्फ इतना ही। बाकी शब्द उसके गले में अटक गए।
अमन ने उसके बालों को सहलाते हुए कहा, “अब रो मत। और गरीब-अमीर की बात भी मत करना। ठीक है?”
राधा ने धीरे से सिर हिलाया। उसकी आँखों में अभी भी नमी थी, लेकिन मुस्कान भी हल्की सी तैर रही थी।
दोनों पेड़ के नीचे थोड़ी देर और खड़े रहे। भीड़ की आवाजें दूर से आ रही थीं। मेला जारी था। लेकिन उस कोने में दो लोगों का एक छोटा सा संसार बन चुका था।
थोड़ी देर बाद राधा भी आ गई। हल्के गुलाबी रंग की सलवार-सूट में थी। बालों में दो छोटी लटें बाँधी हुई थीं। चेहरे पर हल्की सिंदूरी चमक और आँखों में उत्साह साफ दिख रहा था। अमन ने उसे देखते ही मुस्कुरा दिया।
“तैयार हो?” उसने पूछा।
राधा ने सिर हिलाया। “हाँ। चलो।”
दोनों पास वाली बस स्टैंड तक पैदल गए। छोटी सी बस आई। भीड़ कम थी। दोनों ने टिकट लिया और खिड़की वाली सीट पर बैठ गए। रास्ता लगभग आधे घंटे का था। खिड़की से हरे-भरे खेत, छोटे-छोटे तालाब और दूर तक फैली धूल भरी सड़क दिख रही थी। दोनों ज्यादा बात नहीं कर रहे थे, लेकिन सन्नाटा असहज नहीं लग रहा था।
मेला जिस मैदान में लगा था, वह गाँव के किनारे एक बड़ा खुला मैदान था। दूर से ही रंग-बिरंगे झंडे, गुब्बारे और लाउडस्पीकर की आवाजें सुनाई देने लगीं। जैसे-जैसे बस पास पहुँची, नजारा और साफ होता गया।
मेला सच में बहुत बड़ा था।
एक तरफ ऊँचे-ऊँचे झूले लगे थे—कुछ लोहे के बड़े वाले, कुछ लकड़ी के पारंपरिक। दूसरी तरफ खाने की लंबी कतारें थीं। तंदूरी चना, जलेबी की कड़ाहियाँ, गोलगप्पे, चाट, कुल्फी, मकई भुनी हुई… हर तरफ खुशबू फैली हुई थी। बीच में एक छोटा सा सर्कस का तंबू लगा था। जादूगर की दुकान पर बच्चे जमा थे। आगे की तरफ मिट्टी के बर्तन, खिलौने, चूड़ियाँ, बिंदियाँ और सस्ते गहने बेचने वाले दुकानदार चिल्ला-चिल्लाकर ग्राहक बुला रहे थे। धूल हवा में उड़ रही थी, लेकिन धूप अभी नरम थी। बच्चों की चीखें, हँसने की आवाजें और लाउडस्पीकर पर बजता पुराना गाना—सब मिलकर एक जीवंत माहौल बना रहे थे।
अमन और राधा बस से उतरे। दोनों एक पल के लिए रुककर पूरा नजारा देखते रहे।
“बड़ा है,” राधा ने धीमे स्वर में कहा। आँखें चमक रही थीं।
अमन ने सिर हिलाया। “पहले झूले चलें?”
राधा ने तुरंत हाँ कह दी।
वे भीड़ के बीच से होते हुए झूलों की तरफ बढ़े। ऊँचा वाला लोहे का झूला देखकर राधा थोड़ी हिचकिचाई। अमन ने कहा, “छोटा वाला पहले बैठते हैं। फिर चाहो तो ऊँचे वाले पर।”
दोनों ने छोटे झूले पर जगह बनाई। झूला आगे-पीछे होने लगा। राधा पहले थोड़ी सख्ती से बैठी हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे वह हँसने लगी। बाल हवा में उड़ रहे थे। अमन उसके बगल में बैठा उसे देख रहा था। राधा की हँसी साफ और बेफिक्र थी—जैसी वह कॉलेज में कभी नहीं हँसी थी।
झूला रोकने के बाद राधा ने कहा, “अब जलेबी खाते हैं।”
वे जलेबी वाली दुकान पर गए। गरम-गरम जलेबी की कड़ाही में तेल खौल रहा था। अमन ने दो प्लेट लीं। दोनों ने एक साथ जलेबी तोड़ी। राधा के होंठों पर मीठा चिपक गया। उसने हँसते हुए कहा, “बहुत गरम है।” अमन ने भी हँसी में सिर हिलाया। दोनों ने खड़े-खड़े जलेबी खाई। आसपास भीड़ थी, धूल थी, शोर था, लेकिन उन दोनों को जैसे अपना एक छोटा सा संसार मिल गया हो।
जलेबी के बाद राधा ने चाट की तरफ इशारा किया। “अब वह भी खाते हैं।”
चाट वाले ने दो प्लेट में भरकर दी—पूरी, आलू, चना, दही, चटनी और सेव। दोनों ने एक साथ खाया। राधा की आँखें तीखे स्वाद से भर आईं। उसने पानी माँगा। अमन ने हँसते हुए पानी का गिलास पकड़ा दिया।
“बहुत तीखा कर दिया साले ने,” राधा ने कहा और हँसी।
अमन ने भी हँसी में जवाब दिया, “तुम्हारे चेहरे से लग रहा है।”
दोनों फिर हँसे।
खाना खाने के बाद वे धीरे-धीरे मेले में घूमने लगे। कभी गुब्बारे वाली दुकान के पास रुके, कभी मिट्टी के खिलौने देखे, कभी बच्चों को सर्कस के तंबू में घुसते देखा। राधा कभी-कभी अमन का हाथ पकड़ लेती जब भीड़ ज्यादा हो जाती। अमन उसका हाथ छोड़ता नहीं था। दोनों एक-दूसरे के साथ इतनी आसानी से चल रहे थे जैसे सालों से साथ घूम रहे हों।
दूर लाउडस्पीकर पर कोई पुराना गाना बज रहा था। धूप अब थोड़ी तेज हो चली थी। हवा में धूल और मिठास की मिली-जुली खुशबू तैर रही थी।
अमन ने राधा की तरफ देखा। वह गुब्बारे की दुकान पर खड़ी एक लाल गुब्बारा चुन रही थी। उसके चेहरे पर जो शांति और खुशी थी, वह अमन ने पहली बार देखी थी।
मेला अभी शुरू ही हुआ था।
जलेबी और चाट खा लेने के बाद दोनों ने थोड़ी देर और मेला घूमा। धूप अब तेज हो चली थी। लाउडस्पीकर पर गाने बदलते जा रहे थे। तभी राधा की नजर एक बड़े तंबू पर पड़ी। तंबू के बाहर बड़े-बड़े पोस्टर लगे थे—जादूगर की तस्वीर और नीचे लिखा था “लड़की को टुकड़े-टुकड़े करके फिर जोड़ने वाला अद्भुत जादू”।
राधा ने अमन का हाथ हल्के से खींचते हुए कहा, “चलो यह देखें।”
अमन ने सिर हिलाया। दोनों तंबू के अंदर घुसे। अंदर काफी अँधेरा था। आगे की तरफ छोटी सी स्टेज बनी हुई थी। बीच में रोशनी का एक घेरा था, बाकी जगह धुँधली। लोग आगे की कुर्सियों पर बैठे थे। आखिरी कोने में दो खाली सीटें बची थीं—दीवार के बिल्कुल पास, जहाँ रोशनी लगभग नहीं पहुँच रही थी।
अमन और राधा वहीं जाकर बैठ गए। जगह कम थी। दोनों के कंधे एक-दूसरे से छू रहे थे। बैठते समय राधा का हाथ अनजाने में अमन के हाथ पर पड़ गया। उसने हटाया नहीं। अमन ने भी नहीं हटाया। दोनों के हाथ अँधेरे में एक-दूसरे से जुड़े रह गए।
थोड़ी देर बाद जादूगर स्टेज पर आया। काले कपड़ों में था। उसने जोर-जोर से बातें कीं, फिर एक लड़की को स्टेज पर बुलाया। लड़की एक लंबे बक्से में लेट गई। जादूगर ने बक्से के ढक्कन बंद किए और बड़ी आरी निकालकर बक्से को बीच से काटना शुरू कर दिया। आरी की आवाज और जादूगर की जोर-जोर से की गई बातें तंबू में गूँज रही थीं।
राधा की पकड़ अमन के हाथ पर अचानक कस गई। जब जादूगर ने बक्से के दोनों हिस्से अलग किए और लड़की के शरीर के दो टुकड़े दिखाए, तो राधा डरकर अमन की तरफ झुक गई। उसका शरीर अमन के शरीर से चिपक गया।
“डर लग रहा है…” उसने बहुत धीमी आवाज में कहा। आवाज काँप रही थी।
अमन ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया। फिर धीरे से अपना दूसरा हाथ बढ़ाकर उसकी कमर पर रख दिया और उसे अपनी तरफ खींच लिया। राधा पूरी तरह उसकी बाँहों में समा गई। अमन ने उसे अपने से सटा लिया। राधा का सिर उसके कंधे के पास था। उसकी साँसें तेज चल रही थीं।
स्टेज पर जादूगर बक्से के दोनों हिस्से जोड़ रहा था। लेकिन अँधेरे कोने में बैठे दोनों को अब जादू से ज्यादा एक-दूसरे की गर्माहट महसूस हो रही थी। राधा अमन की बाँहों में सिमटी हुई थी। अमन उसके बालों में मुँह किए हुए था। दोनों की साँसें एक-दूसरे से मिल रही थीं।
जादू खत्म हुआ। लोग ताली बजाने लगे। रोशनी थोड़ी बढ़ी। राधा ने धीरे से अमन की बाँहों से खुद को अलग किया। उसका चेहरा लाल हो चुका था। आँखें झुकी हुई थीं।
“मैं… डर गई थी,” उसने बहुत धीमी आवाज में कहा। शर्म से उसका गला बैठ गया था।
अमन ने भी धीमे स्वर में जवाब दिया, “कोई बात नहीं।”
दोनों तंबू से बाहर निकले। धूप में आने के बाद भी राधा का चेहरा लाल था। वह अमन की तरफ सीधे देख नहीं पा रही थी। अमन के शरीर पर अभी भी उसकी गर्माहट बाकी थी। हाथों में उसकी हथेली की नमी थी।
मेला अभी बाकी था। लेकिन दोनों के बीच की दूरी थोड़ी और कम हो चुकी थी।
जादू के तंबू से निकलने के बाद दोनों मेले में धीरे-धीरे चलने लगे। भीड़ थी, धूल उड़ रही थी, लाउडस्पीकर पर गाने बज रहे थे, लेकिन दोनों के बीच एक अलग सी चुप्पी थी। राधा अभी भी थोड़ी शर्माई हुई थी। जादू वाले तंबू में जो हुआ था, वह उसके चेहरे पर साफ दिख रहा था।
अमन ने हल्के स्वर में कहा, “तुम्हारे बाल हवा में ऐसे उड़ रहे हैं… अच्छे लग रहे हैं।”
राधा ने उसकी तरफ देखा और जल्दी से नजरें झुका लीं। “बातें मत बनाओ।”
अमन मुस्कुराया। “बना नहीं रहा। सच लग रहे हो तुम आज। मेले में आने के बाद और भी।”
राधा का चेहरा और लाल हो गया। वह थोड़ा तेज चलने लगी। अमन उसके साथ कदम मिलाता रहा। थोड़ी देर तक दोनों चुपचाप चलते रहे। फिर राधा ने अचानक धीमी आवाज में कहा,
“इतना प्यार करते हो मुझसे? मैं तो एक गरीब घर की लड़की हूँ… और तुम अमीर घर के लड़के हो।”
अमन रुक गया। राधा भी दो कदम आगे जाकर रुकी। उसने पीछे मुड़कर अमन की तरफ देखा। अमन की आँखों में एक गंभीर भाव था। उसने राधा का हाथ हल्के से पकड़ा और उसे भीड़ से थोड़ा हटाकर एक शांत कोने की तरफ ले गया। वहाँ एक बड़ा पेड़ था और उसके पीछे थोड़ी खाली जगह। लोग कम आ-जा रहे थे।
अमन ने राधा को पेड़ के पास खड़ा किया। दोनों हाथों से उसके कंधे पकड़कर कहा,
“आज यह बात कह दी। आज के बाद ऐसा मत कहना। कभी मत कहना।”
राधा की आँखें उसकी आँखों में थीं। अमन की आवाज में एक अजीब सी सच्चाई थी।
“मैं तुमसे बहुत समय से प्यार करता हूँ राधा,” अमन ने धीमे लेकिन साफ स्वर में कहा। “कॉलेज में भी… तुम्हें दूर से देखता था। लेकिन बोल नहीं पाता था। हिम्मत नहीं होती थी। अब जब तुम मेरे इतने करीब आई हो… तो मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। गरीब-अमीर की बात मत करना। मेरे लिए तुम सिर्फ राधा हो।”
राधा की आँखों में धीरे-धीरे आँसू भर आए। वह कुछ बोल नहीं पाई। आँसू उसकी पलकों पर टिक गए। अमन ने दोनों हाथों से उसका चेहरा पकड़ा और धीरे से उसका सर ऊपर उठाया। फिर अपने होंठों से उसके आँसुओं को चूम लिया—पहले एक आँख के नीचे, फिर दूसरी के। आँसू उसके होंठों पर लग गए।
राधा की साँसें काँप रही थीं। अमन ने उसके माथे से लेकर नाक तक हल्के चुंबन दिए। फिर धीरे से उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
चुंबन बहुत नरम था। जल्दबाजी में नहीं। प्यार से भरा हुआ। राधा ने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठ काँप रहे थे, लेकिन उसने अमन के होंठों को धक्का नहीं दिया। दोनों के होंठ कुछ पल तक जुड़े रहे। न जीभ थी, न कोई जल्दी। सिर्फ एक लंबा, नरम और भरा हुआ चुंबन।
जब अमन ने होंठ हटाए तो राधा की आँखें अभी भी बंद थीं। गालों पर आँसुओं के निशान थे और होंठ हल्के से खुले हुए। उसने आँखें खोलीं तो अमन को देखते हुए बहुत धीमी आवाज में कहा,
“अमन…”
सिर्फ इतना ही। बाकी शब्द उसके गले में अटक गए।
अमन ने उसके बालों को सहलाते हुए कहा, “अब रो मत। और गरीब-अमीर की बात भी मत करना। ठीक है?”
राधा ने धीरे से सिर हिलाया। उसकी आँखों में अभी भी नमी थी, लेकिन मुस्कान भी हल्की सी तैर रही थी।
दोनों पेड़ के नीचे थोड़ी देर और खड़े रहे। भीड़ की आवाजें दूर से आ रही थीं। मेला जारी था। लेकिन उस कोने में दो लोगों का एक छोटा सा संसार बन चुका था।
Fuckuguy
albertprince547;
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