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Incest परिवार के गंदे राज़
#23
सोमवार की सुबह अमन कॉलेज पहुँचा।
रात भर रेणु की बातें उसके दिमाग में घूमती रहीं—दिल जीतना, समय देना, दबाव न डालना। कक्षा में राधा अपनी जगह पर पहले से बैठी हुई थी। अमन ने उसकी तरफ देखा। राधा ने भी इस बार नजरें नहीं फेरीं। कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर राधा ने बहुत हल्के से सिर हिलाया—जैसे नमस्ते के बदले कोई छोटी सी स्वीकृति दे रही हो। अमन ने भी सिर हिला दिया और अपनी जगह पर बैठ गया।
ब्रेक के समय अमन पानी लेने गया तो राधा भी वहीं खड़ी थी। इस बार उसने खुद अमन की तरफ देखा और धीरे से बोली,
“कल… तुमने मुझे वहाँ से बचा लिया। मैंने ठीक से धन्यवाद भी नहीं कहा।”
अमन थोड़ा चौंका। उसने सोचा था राधा अभी भी दूर रहेगी। लेकिन उसकी आवाज में डर नहीं था। थकान थी, शर्म थी, लेकिन बात करने का इरादा साफ था।
“कोई बात नहीं,” अमन ने धीमे स्वर में जवाब दिया। “तुम ठीक तो हो?”
राधा ने हल्की मुस्कान दी—बहुत हल्की। “अब बेहतर हूँ। रात भर नींद नहीं आई… लेकिन अब समझ में आ गया कि कुछ लोग कितने गंदे हो सकते हैं।” उसने थोड़ा रुककर कहा, “तुमने समय पर बता दिया इसलिए मैं बच गई। शुक्रिया अमन।”
अमन ने सिर्फ सिर हिलाया। रेणु की बात याद आ रही थी—जबरदस्ती मत करना, समय दो। इसलिए उसने और गहरा सवाल नहीं पूछा। दोनों कुछ पल चुप रहे। फिर घंटी बज गई और वे अपनी-अपनी कक्षाओं की तरफ चल दिए। लेकिन पहली बार राधा ने खुद उससे बात की थी। यह छोटी सी बात अमन के लिए बड़ी लग रही थी।
शाम को घर लौटा तो आँगन में माँ सुशीला कपड़े सुखा रही थीं। उन्होंने अमन को देखकर बुलाया और उसके माथे से बाल हटाते हुए पूछा, “आज चेहरा थोड़ा हल्का लग रहा है।” अमन ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। माँ की उंगलियाँ उसके गाल पर थोड़ी देर रुक गईं, फिर उन्होंने हाथ हटा लिया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन की रोशनी कम थी। उसने दरवाजा बंद किया और बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“आज राधा से बात हुई?” उसने पूछा।
अमन ने पूरी बात बता दी—राधा ने खुद धन्यवाद कहा, डर नहीं दिखाया, और सामान्य स्वर में बात की। रेणु ने सुनकर धीरे से मुस्कुराया।
“अच्छा संकेत है। वह तुम्हें खतरा नहीं मान रही। धीरे-धीरे विश्वास बन रहा है। अब उसे और समय दो। रोज थोड़ी-थोड़ी बात बढ़ेगी।”
रेणु थोड़ा पास खिसकी। “आज की शिक्षा में थोड़ा बदलाव रखेंगे। सिर्फ एकतरफा नहीं।”
उसने अमन का चेहरा दोनों हाथों में लिया और अपने होंठ उसके होंठों से लगा दिए। चुंबन इस बार गहरा था। जीभ अंदर तक गई। अमन ने भी जवाब दिया। दोनों की साँसें तेज हो गईं। रेणु ने अमन का हाथ पकड़कर अपने स्तनों पर रखा—ब्लाउज के ऊपर से। फिर धीरे-धीरे उसके हाथ को ब्लाउज के अंदर ले गई। नंगे स्तन की गर्माहट अमन की हथेली में फैल गई।
“आज तुम भी कुछ करो,” रेणु ने फुसफुसाकर कहा। “सिर्फ लेते मत रहो।”
अमन ने हिम्मत करके रेणु के होंठ फिर से चूमे। इस बार उसने खुद पहल की। उसकी जीभ रेणु के मुँह में गई। एक हाथ से वह उसके स्तन को सहला रहा था। रेणु ने पैंट का नाड़ा खोला और अमन का लंड बाहर निकाला। दस इंच का तनाव उसकी मुट्ठी में आ गया। उसने धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया, लेकिन बीच-बीच में रुक-रुककर अमन को चूमती रही।
अमन ने इस बार खुद नीचे झुकने की कोशिश की। रेणु ने उसके बाल पकड़कर रोका नहीं। अमन ने पहली बार खुद रेणु के निप्पल को मुँह में लिया। जीभ घुमाई। रेणु की सिसकारी निकली।
“हाँ… ऐसे ही… सीख रहे हो,” उसने धीमी आवाज में कहा।
थोड़ी देर दोनों एक-दूसरे को चूमते और छूते रहे। रेणु ने अमन के लंड को अपने हाथ में लेकर फिर से मुँह में लिया—लेकिन इस बार सिर्फ थोड़ी देर। फिर उसने खुद रोक दिया।
“बस। आज यहीं तक। तुमने खुद कोशिश की, यह अच्छी बात है। कल और आगे बढ़ेंगे।”
रेणु ने कपड़े ठीक किए। दरवाजे तक जाकर बोली,
“राधा के साथ धीरे-धीरे बढ़ो। बात करते रहो, लेकिन सीमा में रहो। और मुझसे कुछ मत छुपाना। जैसा आज बताया, वैसे ही आगे भी बताते रहना।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। होंठों पर रेणु के चुंबन का स्वाद था, हाथ पर उसके स्तन की गर्माहट, और मन में राधा की हल्की मुस्कान। पहली बार लगा कि चीजें सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रह गईं। दिल की बात भी शुरू हो चुकी थी—बहुत धीरे-धीरे।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं।
कल फिर कॉलेज था। राधा शायद फिर बात करे। और रेणु की शिक्षा अब सिर्फ एकतरफा नहीं रह गई थी।

मंगलवार की सुबह अमन कॉलेज पहुँचा।
कक्षा में राधा पहले से बैठी थी। अमन अपनी जगह पर बैठते ही उसकी तरफ देखा। राधा ने इस बार हल्की मुस्कान दी—बहुत छोटी सी, लेकिन साफ। अमन ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया। कोई बात नहीं हुई, लेकिन वह छोटी सी मुस्कान पूरे दिन उसके दिमाग में रही।
ब्रेक में दोनों फिर पानी की टंकी के पास मिले। राधा ने खुद पहले बात शुरू की।
“कल रात सो पाई तुम?” उसने धीमे स्वर में पूछा।
अमन ने सिर हिलाया। “तुम?”
राधा ने हल्की साँस छोड़ी। “अब बेहतर है। मन थोड़ा हल्का लग रहा है। तुमने जो किया… वह आसान नहीं था। ज्यादातर लड़के चुप रह जाते।”
अमन ने जवाब में सिर्फ इतना कहा, “जरूरी था।”
दोनों कुछ पल चुप रहे। फिर राधा ने अपनी किताब दबाई और बोली, “चलो, घंटी बजने वाली है।” वह चली गई, लेकिन जाते-जाते एक बार फिर पीछे मुड़कर अमन की तरफ देखा। अमन को लगा कि उनके बीच की दूरी थोड़ी और कम हुई है—बहुत धीरे, लेकिन कम हुई है।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कविता कपड़े सुखा रही थी। साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था। अमन के पास से गुजरते समय कविता ने सिर उठाया और उसकी तरफ देखा। निगाहें एक पल के लिए मिलीं। कविता ने कुछ नहीं कहा, बस हल्के से मुस्कुरा दी और फिर अपना काम करने लगी। अमन ने नजरें झुका लीं और अंदर चला गया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“आज राधा से फिर बात हुई?” उसने पूछा।
अमन ने बताया—राधा ने खुद बात शुरू की, धन्यवाद दोहराया, और जाते समय पीछे मुड़कर देखा। रेणु ने सुनकर संतुष्ट होकर सिर हिलाया।
“धीरे-धीरे बढ़ रहा है। अच्छा है। अब तुम भी थोड़ा आगे बढ़ो, लेकिन सीमा में। कभी-कभी खुद भी छोटी सी बात पूछ लिया करो—जैसे खाना खाया या नहीं, या पढ़ाई कैसी चल रही है। दबाव वाली बातें मत करना।”
रेणु थोड़ा करीब आई। “आज फिर तुम खुद कोशिश करना।”
उसने अमन का चेहरा पकड़कर चूम लिया। चुंबन गहरा था। अमन ने भी जवाब दिया। इस बार उसने खुद रेणु के होंठों को और गहराई से चूसा। एक हाथ से उसने रेणु के बाल सहलाए, दूसरे हाथ से उसकी कमर पकड़ ली। रेणु ने अमन का हाथ पकड़कर अपने स्तनों पर रखा—सीधे ब्लाउज के अंदर।
“आज तुम छुओ,” रेणु ने फुसफुसाकर कहा। “जैसा तुम्हें सही लगे।”
अमन ने दोनों स्तनों को धीरे-धीरे सहलाया। निप्पल उंगलियों के बीच ले करके हल्के से दबाए। रेणु की साँस तेज हो गई। उसने अमन की पैंट खोली और लंड बाहर निकाल लिया। इस बार उसने खुद नहीं चूसा। बल्कि अमन का हाथ पकड़कर अपने होंठों पर ले गई।
“आज तुम मेरे होंठों पर रखो,” उसने कहा।
अमन ने अपना लंड रेणु के होंठों पर लगाया। रेणु ने जीभ निकाली और सिर को चाटा। फिर धीरे से मुँह में लिया—लेकिन नियंत्रण अमन के हाथ में छोड़ दिया। अमन ने धीरे-धीरे आगे-पीछे किया। रेणु ने उसकी जाँघ पकड़ रखी थी। कुछ देर तक यही चला। फिर रेणु ने खुद पीछे हट गया।
“बस। आज इतना काफी है,” उसने कहा। आवाज थोड़ी भारी थी। “तुम खुद आगे बढ़ रहे हो। यह अच्छी बात है। कल और सीखेंगे।”
रेणु ने कपड़े ठीक किए। दरवाजे तक जाकर बोली,
“राधा के साथ यही गति रखो। धीरे-धीरे। और घर में आँखें खुली रखना। यहाँ भी बहुत कुछ चलता रहता है।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। होंठों पर रेणु का स्वाद था, हाथ पर उसके स्तनों की गर्माहट, और मन में राधा की छोटी सी मुस्कान। पहली बार लगा कि दोनों रिश्ते—एक घर के अंदर और एक कॉलेज में—बहुत धीमी गति से लेकिन सही दिशा में बढ़ रहे हैं।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं।
कल फिर एक नया दिन था।


बुधवार की सुबह कॉलेज पहुँचते ही अमन की नजर राधा पर गई। वह अपनी जगह पर पहले से बैठी हुई थी। अमन के बैठते ही राधा ने सिर उठाया और इस बार हल्की लेकिन साफ मुस्कान दी। अमन ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया। कक्षा के दौरान कई बार उनकी निगाहें मिलीं। हर बार राधा जल्दी से नजरें नहीं फेरेगी, बल्कि एक पल और देखती रहती।
ब्रेक की घंटी बजते ही अमन पानी की टंकी की तरफ गया। राधा भी लगभग उसी समय वहाँ पहुँची। दोनों अकेले थे। थोड़ी देर तक कोई नहीं बोला। फिर राधा ने अपनी किताब दोनों हाथों में दबाए हुए धीमे स्वर में कहा,
“अमन… एक बात कहनी थी।”
अमन ने उसकी तरफ पूरा ध्यान दिया।
“पास वाले गाँव में इस रविवार को बड़ा मेला लग रहा है। मैं बचपन से सुनती आई हूँ लेकिन कभी जा नहीं पाई। अकेली नहीं जा सकती… और घर वाले भी नहीं जाने देंगे। तुम मेरे साथ चलोगे? पूरी तरह चुपके से। किसी को कुछ पता नहीं चलना चाहिए।”
अमन कुछ पल चुप रहा। माँ का चेहरा आँखों के सामने आ गया। माँ आसानी से बाहर जाने की अनुमति नहीं देती थीं, खासकर लड़की के साथ। राधा उसकी चुप्पी समझ गई। उसने जल्दी से कहा,
“अगर मुश्किल है तो छोड़ दो। मैंने सिर्फ सोचा कि तुम… भरोसे के लायक हो।”
अमन ने सिर हिलाया। “मैं चलूँगा। लेकिन घर पर कैसे कहूँ, यह सोचना पड़ेगा। शाम को या कल सुबह तक बताता हूँ।”
राधा के चेहरे पर राहत की हल्की मुस्कान फैली। “ठीक है। मैं इंतजार करूँगी।” दोनों कुछ पल और खड़े रहे। न कोई और बात हुई, न कोई वादा। लेकिन हवा में एक नया तरह का विश्वास तैर रहा था।
शाम को घर लौटकर अमन ने सामान्य दिनचर्या निभाई। खाना खाया, थोड़ी देर किताब खोली, लेकिन दिमाग मेले और माँ को मनाने के तरीके में उलझा रहा। रात के बारह बजते-बजते रेणु आई। लालटेन की रोशनी कम थी। उसने दरवाजा बंद किया, सिटकिनी लगाई और बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने देर नहीं लगाई। “दीदी, राधा ने मेले में चलने को कहा है। पास वाले गाँव में। रविवार को। चुपके से। लेकिन माँ को कैसे मनाऊँ? सीधे कहूँगा तो मना कर देंगी।”
रेणु ने अमन की आँखों में देखा। थोड़ी देर सोचा, फिर बोली,
“सीधे मेला मत कहना। कहना कि कॉलेज का ग्रुप प्रोजेक्ट है। पास के गाँव में जाकर कुछ जानकारी इकट्ठा करनी है। दो-तीन और लड़के भी जा रहे हैं। शिक्षक ने कहा है कि शाम तक लौटना है। पढ़ाई का नाम आते ही माँ ज्यादातर बार मान जाती हैं। आज़माकर देखना। अगर और पूछें तो कह देना कि बहुत जरूरी है, नंबर में फायदा होगा।”
अमन ने सिर हिलाया। रेणु थोड़ा और करीब खिसकी। उसकी आँखों में वह परिचित चमक थी।
“अब आज की शिक्षा की बारी है। आज तुम और आगे बढ़ोगे।”
रेणु ने दोनों हाथों से अमन का चेहरा पकड़ा और अपने होंठ उसके होंठों से लगा दिए। चुंबन धीरे शुरू हुआ, फिर गहरा होता गया। जीभ अंदर तक चली गई। अमन ने भी जवाब दिया। दोनों की साँसें तेज हो गईं। रेणु ने अमन की पैंट का नाड़ा खोला और उसका लंड बाहर निकाल लिया। दस इंच का तनाव उसकी मुट्ठी में आ गया। वह झुकी और लंड को मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ सिर चूसा, फिर धीरे-धीरे और गहराई तक ले गई। जीभ घुमाती रही। अमन की उंगलियाँ उसके बालों में फँस गईं।
कुछ देर तक रेणु उसे चूसती रही। फिर अमन ने अचानक खुद से हाथ बढ़ाया। उसने रेणु की सलवार के ऊपर से ही उसकी चूत पर हथेली रख दी। रेणु की लंबी सिसकारी निकली। लंड उसके मुँह से बाहर निकल आया।
“अमन…” उसकी आवाज काँप रही थी।
अमन ने उसे फिर से चूम लिया। चुंबन के दौरान ही उसने रेणु को धीरे-धीरे बिस्तर पर लिटा दिया। एक हाथ से उसके स्तन सहला रहा था और दूसरा हाथ सलवार के ऊपर से उसकी चूत पर गोल-गोल फेर रहा था। नमी बढ़ती जा रही थी। रेणु की कमर हल्के-हल्के हिलने लगी। उसकी साँसें तेज हो गईं।
थोड़ी देर बाद अमन उठा। उसने दोनों हाथों से रेणु की सलवार और पैंटी एक साथ पकड़ी और नीचे खींच ली। रेणु की गीली, हल्की गुलाबी चूत पूरी तरह सामने आ गई। अमन बिना किसी हिचकिचाहट के झुक गया और अपनी जीभ सीधे उसकी चूत पर रख दी।
“आह्ह्ह्ह… अमन…” रेणु की लंबी और कामुक सिसकारी निकली।
अमन ने जीभ से चाटना शुरू किया। पहले धीरे-धीरे नीचे से ऊपर की ओर। फिर बीच की सबसे संवेदनशील जगह पर जीभ को गोल-गोल घुमाने लगा। रेणु की जाँघें काँपने लगीं। उसने एक हाथ उठाकर अमन के सिर पर रखा और उसे अपनी चूत पर और जोर से दबाने लगी।
“जीभ अंदर डालो… हाँ… ऐसे… और गहरा… चूसो… वहीं… वहीं रखो… मत रोको…”
अमन ने जीभ अंदर तक डाली और तेजी से अंदर-बाहर करने लगा। साथ ही ऊपर वाली घुंडी को भी चूसता और चाटता रहा। रेणु अब पागलों की तरह सिसकारियाँ ले रही थी। उसकी कमर बार-बार बिस्तर से उठ रही थी। नाखून अमन के बालों में गड़ गए थे।
“हाँ… ऐसे ही… बहुत अच्छा… अमन… मैं… आ रही हूँ… मत छोड़ना… जीभ मत निकालना…”
अमन ने और तेज कर दिया। जीभ अंदर तक डाले हुए वह ऊपर की जगह को भी लगातार चाट रहा था। कुछ ही पल में रेणु का पूरा शरीर अकड़ गया। उसकी कमर जोर से उठी, जाँघें काँपने लगीं और एक लंबी, दबी हुई चीख निकलते हुए उसका पानी अमन की जीभ, होंठ और ठुड्डी पर छूट गया। रेणु कई सेकंड तक काँपती रही। फिर उसका शरीर पूरी तरह ढीला पड़ गया। साँसें तेज चल रही थीं। छाती ऊपर-नीचे हो रही थी।
अमन धीरे से उठा। उसके होंठ और ठुड्डी चमक रहे थे। रेणु ने आँखें खोलीं। चेहरे पर गहरी संतुष्टि और थकान दोनों साफ थे। उसने अमन को अपनी तरफ खींचकर उसके माथे पर लंबा चुंबन दिया।
“बहुत अच्छा किया,” उसने थकी हुई लेकिन खुश आवाज में कहा। “अगर तुम किसी भी लड़की, भाभी या औरत को ऐसे चूसोगे… तो वह तुम्हारे सामने खुद अपनी चूत खोलकर लेट जाएगी। कोई मना नहीं कर पाएगी।”
रेणु ने गहरी साँस ली। आँखों में एक अलग सी चमक थी—गर्व और खुशी मिली-जुली।
“तुम तेजी से सीख रहे हो अमन। एक परफेक्ट मर्द बनाने में अब बस कुछ ही कदम बाकी हैं। शरीर भी संभालना सीख रहे हो, दिमाग भी, और दिल भी।”
उसने धीरे-धीरे सलवार ऊपर की और बिस्तर पर उठकर बैठ गई।
“माँ को जैसे बताया है वैसे कहना। रविवार को मेला जाना। राधा के साथ सीमा में रहना। और मुझसे कुछ मत छुपाना।”
रेणु ने लालटेन उठाई और दरवाजे तक गई। मुड़कर एक बार फिर अमन को देखा, फिर चुपचाप चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु का स्वाद अभी भी बाकी था। शरीर में एक नई तरह की शक्ति और आत्मविश्वास घूम रहा था। मन में मेले का विचार और राधा की मुस्कान दोनों एक साथ थे।
कल माँ को मनाना था। रविवार को राधा के साथ पहली बार अकेले कहीं जाना था। और रातें अब और गहरी होती जा रही थीं।

गुरुवार की सुबह अमन ने नाश्ते के समय माँ को बात रखी।
सुशीला रसोई में रोटी बना रही थीं। अमन ने उनके पास जाकर सामान्य स्वर में कहा,
“माँ, कॉलेज का एक ग्रुप प्रोजेक्ट है। पास वाले गाँव में जाकर कुछ जानकारी इकट्ठा करनी है। शिक्षक ने कहा है कि दो-तीन लड़के साथ जाएँ। रविवार को जाना है। शाम तक लौट आऊँगा।”
सुशीला ने रोटी हाथ में लिए हुए उसकी तरफ देखा। “कौन-कौन जा रहा है?”
अमन ने पहले से सोची हुई बात कही, “राहुल और एक-दो और लड़के। प्रोजेक्ट के नंबर अच्छे आएँगे तो बोर्ड में फायदा रहेगा।”
सुशीला कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “ठीक है। लेकिन शाम को देर मत करना। और ध्यान रखना।”
अमन ने मन ही मन राहत की साँस ली। रेणु की सलाह काम आ गई थी।
कॉलेज पहुँचते ही उसने राधा को संकेत किया। ब्रेक में दोनों पानी की टंकी के पीछे मिले। अमन ने धीमे स्वर में कहा,
“माँ मान गईं। रविवार को चल सकते हैं।”
राधा के चेहरे पर खुशी साफ झलकी। उसने हल्की मुस्कान दी। “सच? तो फिर सुबह आठ बजे गाँव के बाहर वाली सड़क पर मिलते हैं। वहाँ से बस मिल जाएगी।”
अमन ने सिर हिलाया। दोनों कुछ पल और खड़े रहे। राधा ने इस बार थोड़ा और देर तक उसकी आँखों में देखा, फिर धीरे से बोली, “शुक्रिया अमन… तुमने सच में मदद की।” वह चली गई, लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान अमन के दिमाग में रह गई।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कमला चाची बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखकर बुलाया। जब वह पास गया तो कमला ने उसके बाल सहलाते हुए कहा, “अब तुम सच में बड़े लगने लगे हो। पहले जैसे बच्चे नहीं रहे।” उसकी उंगलियाँ गर्दन पर थोड़ी देर रुक गईं। अमन ने विनम्रता से सिर हिलाया और अंदर चला गया।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन की रोशनी कम थी। उसने दरवाजा बंद किया और बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“माँ मान गईं?” उसने पूछा।
अमन ने बताया कि हाँ, प्रोजेक्ट वाला बहाना काम आ गया। राधा से भी मिल लिया है, रविवार को जाना तय हो गया।
रेणु ने संतुष्ट होकर सिर हिलाया। “अच्छा। अब सीमा में रहना। मेला में बहुत भीड़ होती है। किसी गलत इरादे वाले से बचकर रहना। और राधा का ख्याल रखना।”
फिर वह थोड़ा करीब आई। “आज की शिक्षा जारी रखेंगे।”
रेणु ने अमन का चेहरा दोनों हाथों में लिया और गहराई से चूम लिया। जीभ अंदर तक गई। अमन ने भी जवाब दिया। दोनों की साँसें तेज हो गईं। रेणु ने अमन की पैंट खोली और लंड निकालकर पहले की तरह मुँह में ले लिया। धीरे-धीरे, गहराई से चूसने लगी। अमन की उंगलियाँ उसके बालों में फँस गईं।
इस बार अमन ने खुद पहल की। उसने रेणु को चूमते हुए बिस्तर पर लिटा दिया। एक हाथ से उसके स्तन सहलाए, दूसरे हाथ से सलवार के ऊपर से उसकी चूत पर फेरने लगा। नमी जल्दी बढ़ गई। रेणु की कमर हिलने लगी।
थोड़ी देर बाद अमन ने उसकी सलवार और पैंटी एक साथ नीचे कर दी। रेणु की गीली चूत सामने आ गई। अमन झुक गया और जीभ से चाटना शुरू किया। पहले धीरे, फिर तेजी से। बीच वाली जगह पर जीभ घुमाता, चूसता, कभी अंदर डालता।
रेणु की सिसकारियाँ तेज हो गईं। उसने दोनों हाथों से अमन का सिर पकड़ लिया और उसे अपनी चूत पर और जोर से दबाने लगी।
“हाँ… ऐसे ही… जीभ अंदर… और तेज… अमन… बहुत अच्छा…”
अमन ने जीभ अंदर तक डाले हुए ऊपर की घुंडी को भी लगातार चाटा। रेणु की जाँघें काँपने लगीं। उसकी कमर बार-बार उठ रही थी। कुछ ही देर में उसका शरीर अकड़ गया। लंबी सिसकारी निकलते हुए उसका पानी अमन के मुँह पर छूट गया। रेणु कई सेकंड तक काँपती रही, फिर ढीली पड़ गई।
अमन उठा। रेणु ने आँखें खोलीं। चेहरे पर संतुष्टि साफ थी। उसने अमन को अपनी तरफ खींचकर उसके होंठों पर चुंबन दिया।
“तुम दिन-ब-दिन बेहतर हो रहे हो,” उसने धीमी आवाज में कहा। “रविवार को मेले में जाओ। राधा का ख्याल रखना। और लौटकर मुझे सब बताना।”
रेणु ने कपड़े ठीक किए। दरवाजे तक जाकर बोली,
“अब तुम सिर्फ शरीर नहीं संभाल रहे। दिमाग और दिल भी संभालना सीख रहे हो। यही तुम्हें बाकियों से अलग बनाएगा।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु का स्वाद था। मन में रविवार का मेला और राधा की मुस्कान दोनों घूम रहे थे। शरीर में एक नई तरह का विश्वास था।
कल फिर कॉलेज था। फिर एक दिन और। फिर रविवार।
और हर रात के साथ वह थोड़ा और बदल रहा था।

शुक्रवार की सुबह कॉलेज में ब्रेक का समय था। अमन और राधा पानी की टंकी के पीछे खड़े थे। आसपास कोई नजदीक नहीं था, लेकिन थोड़ी दूर पेड़ों और पुरानी दीवार के कोने से एक छाया कभी-कभी हिलती हुई महसूस हो रही थी। अमन को लगा कोई उन्हें देख रहा है, लेकिन उसने राधा से कुछ नहीं कहा।
राधा ने धीमे स्वर में पूछा, “मेले में सबसे पहले क्या देखोगे?”
अमन ने जवाब दिया, “पहले पूरी जगह घूम लेंगे। देखेंगे कहाँ-कहाँ क्या है। झूले जरूर होंगे। बड़े-बड़े वाला झूला और छोटा वाला भी। फिर खाने की दुकानें—चना-भुनना, जलेबी, कुल्फी… जो तुम्हें अच्छा लगे।”
राधा की आँखों में हल्की चमक आ गई। “मैं झूले जरूर बैठूँगी। तुम साथ रहना, ऊँचा वाला झूला थोड़ा डरावना लगता है। और एक दुकान पर रंग-बिरंगे गुब्बारे मिलते हैं, वह भी लूँगी। फिर अगर सर्कस या जादू का खेल लगा हो तो वह भी देखेंगे। शाम को वापस लौटते समय कोई छोटी सी चीज यादगार के लिए ले लेंगे।”
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ। भीड़ में तुम मेरे पास ही रहना। कहीं दूर मत जाना।”
राधा ने हल्की मुस्कान दी। “तुम भी। अकेले मत खो जाना।” दोनों हँसे। बातचीत सहज और हल्की थी। लेकिन अमन बार-बार महसूस कर रहा था कि कोई उनकी तरफ देख रहा है। उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा। दीवार के कोने पर कोई छाया जल्दी से हट गई। कोई साफ नहीं दिखा। अमन ने बात जारी रखी, लेकिन मन में सवाल रह गया।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कमला चाची चारपाई पर बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आओ बेटा।”
अमन पास गया। कमला चाची ने उसका हाथ पकड़ा और उसे थोड़ा नीचे झुकाया। फिर उसके दाहिने गाल पर हल्का लेकिन साफ चुंबन कर दिया। गाल पर उनके होंठों की गर्माहट और हल्की नमी रह गई।
“बड़े हो गए हो अब,” कमला ने धीमी आवाज में कहा। आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “पहले जैसे बच्चे नहीं रहे। अब ध्यान रखना… अपना भी, और घर का भी। समझे?”
अमन ने विनम्रता से सिर हिलाया। “हाँ चाची।” कमला ने उसके बाल एक बार सहलाए, फिर छोड़ दिया। अमन अंदर चला गया। गाल पर अभी भी उनके चुंबन का अहसास बाकी था।
रात के खाने पर पूरा परिवार बैठा था। बाबा, पिता सुरेश, माँ सुशीला, रेणु, कविता और बाकी लोग। खाना चल रहा था जब अमन ने पिता की तरफ देखा और सामान्य स्वर में कहा,
“पिताजी, रविवार को कॉलेज का ग्रुप प्रोजेक्ट है। पास वाले गाँव में जाकर कुछ जानकारी इकट्ठा करनी है। दो-तीन और लड़के भी जाएँगे। शाम तक लौट आऊँगा।”
सुरेश ने उसकी तरफ देखा। कुछ पल चुप रहे, फिर बोले, “ठीक है। ध्यान से जाना। कोई गलत कंपनी में मत पड़ना। शाम को देर मत करना।”
माँ ने भी सिर हिला दिया। “खाना खाकर जाना और समय पर लौटना।” बात वहीं खत्म हो गई। अमन ने मन ही मन राहत महसूस की।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके सिटकिनी लगाई और बिस्तर के किनारे बैठ गई।
“सब बताओ,” उसने कहा।
अमन ने विस्तार से बताया—राधा से मेले की बातें, पीछे कोई देख रहा था, कमला चाची का गाल पर चुंबन और उनकी बात, और पिता को बताने का तरीका।
रेणु ने ध्यान से सुना। “पीछे कोई देख रहा था… गाँव में आँखें बहुत होती हैं। सावधान रहना। कमला चाची की बात भी नोट कर लो। वे बिना मतलब के कुछ नहीं कहतीं।”
फिर वह थोड़ा करीब आई। आँखों में वह चमक थी। “आज की शिक्षा थोड़ी अलग होगी।”
रेणु ने अमन का चेहरा दोनों हाथों में लिया और गहराई से चूम लिया। जीभ अंदर तक गई। अमन ने भी जवाब दिया। दोनों की साँसें तेज हो गईं। चुंबन लंबा चला। बीच-बीच में दोनों एक-दूसरे के होंठ काटते और फिर गहराई से चूमते रहे।
रेणु ने अमन की पैंट खोली और लंड बाहर निकाला। अमन ने भी उसकी सलवार और पैंटी नीचे की। फिर रेणु ने अमन को बिस्तर पर लिटाया और खुद उसके ऊपर उल्टी दिशा में लेट गई—69 की पोजीशन में।
उसका मुँह अमन के लंड के सामने था और उसकी चूत अमन के मुँह के ऊपर। रेणु ने बिना देर किए अमन का लंड मुँह में ले लिया और गहराई से चूसने लगी। अमन ने भी उसकी गीली चूत पर जीभ फेर दी। दोनों एक साथ एक-दूसरे को चूसने और चाटने लगे।
रेणु की सिसकारियाँ लंड मुँह में होने की वजह से दबी हुई निकल रही थीं। अमन की जीभ उसकी चूत के अंदर और बाहर जा रही थी। ऊपर वाली घुंडी को वह लगातार चूस रहा था। रेणु भी अमन के लंड को गहराई तक ले जाकर चूस रही थी। दोनों की साँसें तेज थीं। शरीर काँप रहे थे।
थोड़ी देर बाद रेणु की जाँघें जोर से काँपने लगीं। उसने अमन का लंड और गहराई तक ले लिया और उसी समय उसका पानी अमन के मुँह पर छूट गया। अमन भी खुद को रोक नहीं सका। उसका पानी रेणु के मुँह में छूट गया। दोनों एक साथ चरम पर पहुँचे।
कुछ देर तक दोनों उसी हालत में पड़े रहे। साँसें तेज चल रही थीं। फिर रेणु धीरे से एक तरफ हट गई। उसने मुँह साफ किया और अमन के पास लेट गई।
“आज तुमने अच्छी तरह निभाया,” उसने थकी हुई आवाज में कहा। “रविवार को मेले में जाओ। राधा का ख्याल रखना। और जो कुछ भी हो… लौटकर मुझे सब बताना।”
रेणु ने कपड़े ठीक किए। दरवाजे तक जाकर बोली,
“अब तुम शरीर और दिल दोनों संभालना सीख रहे हो। यही तुम्हें आगे ले जाएगा।”
वह चली गई।
अमन अकेला रह गया। शरीर में थकान और संतुष्टि दोनों थी। गाल पर कमला चाची के चुंबन का अहसास, मुँह में रेणु का स्वाद, और मन में मेले का इंतजार—सब एक साथ घूम रहे थे। साथ ही वह अज्ञात व्यक्ति जो उन्हें कॉलेज में देख रहा था, उसका सवाल भी दिमाग में बाकी था।

शनिवार की सुबह अमन कॉलेज गया।
आज रविवार वाले मेले का इंतजार साफ महसूस हो रहा था। ब्रेक में राधा पहले से पानी की टंकी के पास खड़ी थी। अमन के पास आते ही उसने हल्की मुस्कान दी।
“कल के लिए तैयार हो?” राधा ने धीमे स्वर में पूछा।
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ। सुबह आठ बजे वाली सड़क पर मिलना है न?”
राधा ने हाँ कहा। दोनों थोड़ी देर खड़े रहे। अमन ने इस बार थोड़ी हिम्मत करके कहा,
“तुम आज और सुंदर लग रही हो। बाल ऐसे खुले हुए अच्छे लगते हैं।”
राधा का चेहरा हल्का सा लाल हो गया। उसने नजरें झुकाईं, लेकिन मुस्कान छुप नहीं पाई। “बातें मत बनाओ।”
अमन ने हल्के से हँसते हुए कहा, “बना नहीं रहा। सच कह रहा हूँ।”
राधा ने उसकी तरफ देखा। आँखों में एक नई तरह की नजदीकी थी। “तुम भी… अब पहले जैसे नहीं लगते। कुछ बदल गए हो।”
दोनों हँसे। बातचीत में हल्का सा फ्लर्ट का पुट आ गया था। वे इतने में व्यस्त थे कि पीछे दीवार के कोने पर खड़ी छाया को बिल्कुल महसूस नहीं कर पाए। कोई उन्हें चुपके से देख रहा था—बहुत देर तक। दोनों को जरा भी अंदाजा नहीं हुआ।
शाम को घर लौटा तो आँगन में कमला चाची अकेली बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आओ।”
अमन पास गया। कमला चाची ने उसका हाथ पकड़ा और इस बार पहले से थोड़ा ज्यादा देर तक पकड़े रखा।
“आज चेहरा खिल रहा है,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। “कोई खास बात है क्या?”
अमन ने इस बार पीछे नहीं हटा। उसने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “चाची जब बुलाती हैं तो चेहरा खिल ही जाता है।”
कमला चाची एक पल के लिए ठिठक गईं। उनकी आँखों में हल्का सा अचरज दिखा, लेकिन उन्होंने जल्दी से सामान्य मुस्कान बना ली। उंगलियाँ अमन की कलाई पर थोड़ी और रुक गईं।
“बातें बनाना सीख गए हो लगते हो,” उन्होंने धीरे से कहा। आवाज में नाराजगी नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी स्वीकृति थी। “जाओ, हाथ-मुँह धो लो।”
अमन ने सिर हिलाया और अंदर चला गया। मन में हल्की सी जीत का अहसास था। पहली बार उसने कमला चाची की फ्लर्टिंग का जवाब दिया था।
रात का खाना खत्म होने के बाद अमन अपने कमरे में आया। आज रेणु के आने का समय बीतता जा रहा था, लेकिन कोई दस्तक नहीं हुई। थोड़ी देर बाद कविता ने दरवाजे पर आकर कहा,
“रेणु दीदी रिश्तेदारों के घर गई हैं। आज रात नहीं आएंगी। कल लौटेंगी।”
अमन ने सिर हिलाया। पहली बार कई रातों बाद रेणु नहीं आने वाली थी। कमरा खाली-खाली लग रहा था। उसने खिड़की से बाहर देखा। हवेली शांत थी।
वह बिस्तर पर लेट गया। दिमाग में राधा की मुस्कान, कमला चाची की अचरज भरी निगाहें, और वह अज्ञात व्यक्ति जो उन्हें कॉलेज में देख रहा था—सब घूम रहे थे। साथ ही रविवार का मेला अब बस कुछ घंटों दूर था।
आज रात अमन अकेला सोया। पहली बार बिना रेणु की शिक्षा के।
Fuckuguy
albertprince547;
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RE: परिवार के गंदे राज़ - by Fuckuguy - 12-09-2026, 04:12 AM



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