11-09-2026, 02:21 PM
बाबाजी ने गिलास को एक तरफ रख दिया और गोपाल की आँखों में सीधे देखते हुए बोले,
“देखो गोपाल… मैं तुम्हें कुछ विशेष और बहुत निजी बातें बताना चाहता हूँ। इनमें मयूरी के शरीर, उसके अंगों और उसकी काम-इच्छा के बारे में बात आएगी। इसलिए मैं पहले ही कह देता हूँ कि तुम इन बातों का बुरा मत मानना। मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ, बस इतना ही।”
गोपाल ने तुरंत सिर हिलाया और उत्सुकता भरे स्वर में बोला,
“ये कैसी बातें कर रहे हैं बाबाजी जी? मैं भला क्यों बुरा मानूँगा? आप मेरे लिए इतना कुछ कर रहे हैं। अगर आप कहें तो मैं मयूरी को कल ही आपके सामने हाजिर कर दूँ। आप उसके साथ अपनी इच्छा के अनुसार जो चाहे कर लीजिए… मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी।”
बाबाजी गोपाल की इस अंधी दरियादिली और हताशा को देखकर मन ही मन मुस्कुरा दिए। उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान खेल गई। शिकार अब पूरी तरह उनके जाल में फँस चुका था। निर्मात्री मैत्री पटेल है।
बाबाजी ने धीरे-धीरे, हर शब्द को स्वाद लेकर कहा,
“अच्छा… अब ध्यान से सुनो। आज रात जब तुम घर जाओ और मयूरी के पास जाओ, तो सबसे पहले उसे जी भरकर चूमना। उसके होंठों को चूसो, जीभ डालकर उसके मुंह का रस पीओ। फिर उसे ऊपर से पूरी तरह नंगा कर दो। उसके स्तनों का पूरा पान करना… खासकर उसकी घुंडियों, निप्पलों को अपने अँगूठे और उँगलियों से मसल-मसलकर उत्तेजित करो। उन्हें होंठों में दबाकर जोर-जोर से चूसो। दाँतों से हल्का-हल्का काटो, निशान बना दो। उसके भारी स्तनों को अपने दोनों हाथों से जी भरकर मर्दन करो… दबाओ, निचोड़ो, सहलाओ।”
बाबाजी बोलते जा रहे थे और गोपाल का चेहरा उत्तेजना से लाल होता जा रहा था। बाबाजी ने नोट किया कि ये सब सुनकर गोपाल का लंड तो खड़ा हो ही गया था, बल्कि उनका अपना लंड भी मयूरी के मोटे, रसीले बोब्लो की याद में फड़कने लगा था।
गोपाल ने अधीर होकर पूछा, “जी बाबाजी जी… फिर आगे…?”
बाबाजी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“बस, आज की रात सिर्फ़ ऊपर वाले हिस्से को पूजना है। हाथों से, मुंह से, जीभ से। नीचे… चूत वाले हिस्से को हाथ भी नहीं लगाना। भले ही वो खुद माँगने लगे, तब भी नहीं। उसे सिर्फ़ तड़पाओ। उसके स्तनों को इतना उत्तेजित कर दो कि वो रात भर कराहती रहे, लेकिन उसे पूरी राहत न दो।” सहायक सौनी पटेल है।
गोपाल सोच में डूब गया। उसके मन में मयूरी की भरी-भरी छातियाँ घूम रही थीं। बाबाजी ने आगे कहा,
“देखो गोपाल… अभी जो मैं कह रहा हूँ, वैसा ही करना। कंट्रोल रखना। अगर तुम मेरे बताए अनुसार चले, तो जल्दी ही देखोगे कि मयूरी खुद तुम्हारे आगे घुटनों पर बैठ जाएगी। और जब वो पूरी तरह तैयार हो जाएगी… तब मैं तुम्हें अगला कदम बताऊँगा।”
बाबाजी ने एक पल रुककर, आँखों में अंधेरी चमक भरकर कहा,
“और याद रखना… सारा फल तुम्हारे सामने है। मयूरी की जवानी के साथ-साथ ऋचा की कोमल, ताजा देह। अगर तुम मेरी बात मानोगे, तो दोनों तुम्हारी मुट्ठी में होंगी। बस धैर्य रखो। रिचा की चूत फिर ज्यादा दिन तुम्हारे लंड के निचे आने के लिए दूर नहीं होगी। पर धीरी रखना जरूरी है।”
गोपाल के मन में अपनी नंगी बेटी ऋचा की कल्पना घूम गई। उसकी छोटी-छोटी उभरती छातियाँ, गुलाबी होंठ, मांसल गांड… ये सब देखकर उसे शराब छोड़ना अब बहुत छोटा काम लग रहा था। उसने तुरंत सिर हिला दिया,
“जी बाबाजी जी… जैसा आप कह रहे हैं, वैसा ही करूँगा।”
थोड़ी देर और बातें करने के बाद गोपाल उठा और घर चला गया। उसके कदमों में एक अजीब-सी उत्तेजना और उम्मीद थी। संपादिका फनलवर है।
बाबाजी भी आराम से लेट गए। लेकिन उनकी नींद में मयूरी की भारी छातियाँ और ऋचा की नाजुक देह दोनों घूम रही थीं। उन्होंने मन ही मन सोचा - “अब खेल और भी दिलचस्प होने वाला है। ऋचा तुम अब मेरे लंड को शांत करने के लिए तैयार रहो और साथ-साथ में तेरी माँ भी तुम्हे उतना ही साथ देगी, मेरे इस लंड को चूसने और नोचोड़ने में।”
अब उन्हें इंतज़ार था - अगले दिन का… और मयूरी के आने का।
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जुड़े रहिये दोस्तों।
मैत्री पटेल का निर्माण।
“देखो गोपाल… मैं तुम्हें कुछ विशेष और बहुत निजी बातें बताना चाहता हूँ। इनमें मयूरी के शरीर, उसके अंगों और उसकी काम-इच्छा के बारे में बात आएगी। इसलिए मैं पहले ही कह देता हूँ कि तुम इन बातों का बुरा मत मानना। मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ, बस इतना ही।”
गोपाल ने तुरंत सिर हिलाया और उत्सुकता भरे स्वर में बोला,
“ये कैसी बातें कर रहे हैं बाबाजी जी? मैं भला क्यों बुरा मानूँगा? आप मेरे लिए इतना कुछ कर रहे हैं। अगर आप कहें तो मैं मयूरी को कल ही आपके सामने हाजिर कर दूँ। आप उसके साथ अपनी इच्छा के अनुसार जो चाहे कर लीजिए… मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी।”
बाबाजी गोपाल की इस अंधी दरियादिली और हताशा को देखकर मन ही मन मुस्कुरा दिए। उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान खेल गई। शिकार अब पूरी तरह उनके जाल में फँस चुका था। निर्मात्री मैत्री पटेल है।
बाबाजी ने धीरे-धीरे, हर शब्द को स्वाद लेकर कहा,
“अच्छा… अब ध्यान से सुनो। आज रात जब तुम घर जाओ और मयूरी के पास जाओ, तो सबसे पहले उसे जी भरकर चूमना। उसके होंठों को चूसो, जीभ डालकर उसके मुंह का रस पीओ। फिर उसे ऊपर से पूरी तरह नंगा कर दो। उसके स्तनों का पूरा पान करना… खासकर उसकी घुंडियों, निप्पलों को अपने अँगूठे और उँगलियों से मसल-मसलकर उत्तेजित करो। उन्हें होंठों में दबाकर जोर-जोर से चूसो। दाँतों से हल्का-हल्का काटो, निशान बना दो। उसके भारी स्तनों को अपने दोनों हाथों से जी भरकर मर्दन करो… दबाओ, निचोड़ो, सहलाओ।”
बाबाजी बोलते जा रहे थे और गोपाल का चेहरा उत्तेजना से लाल होता जा रहा था। बाबाजी ने नोट किया कि ये सब सुनकर गोपाल का लंड तो खड़ा हो ही गया था, बल्कि उनका अपना लंड भी मयूरी के मोटे, रसीले बोब्लो की याद में फड़कने लगा था।
गोपाल ने अधीर होकर पूछा, “जी बाबाजी जी… फिर आगे…?”
बाबाजी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“बस, आज की रात सिर्फ़ ऊपर वाले हिस्से को पूजना है। हाथों से, मुंह से, जीभ से। नीचे… चूत वाले हिस्से को हाथ भी नहीं लगाना। भले ही वो खुद माँगने लगे, तब भी नहीं। उसे सिर्फ़ तड़पाओ। उसके स्तनों को इतना उत्तेजित कर दो कि वो रात भर कराहती रहे, लेकिन उसे पूरी राहत न दो।” सहायक सौनी पटेल है।
गोपाल सोच में डूब गया। उसके मन में मयूरी की भरी-भरी छातियाँ घूम रही थीं। बाबाजी ने आगे कहा,
“देखो गोपाल… अभी जो मैं कह रहा हूँ, वैसा ही करना। कंट्रोल रखना। अगर तुम मेरे बताए अनुसार चले, तो जल्दी ही देखोगे कि मयूरी खुद तुम्हारे आगे घुटनों पर बैठ जाएगी। और जब वो पूरी तरह तैयार हो जाएगी… तब मैं तुम्हें अगला कदम बताऊँगा।”
बाबाजी ने एक पल रुककर, आँखों में अंधेरी चमक भरकर कहा,
“और याद रखना… सारा फल तुम्हारे सामने है। मयूरी की जवानी के साथ-साथ ऋचा की कोमल, ताजा देह। अगर तुम मेरी बात मानोगे, तो दोनों तुम्हारी मुट्ठी में होंगी। बस धैर्य रखो। रिचा की चूत फिर ज्यादा दिन तुम्हारे लंड के निचे आने के लिए दूर नहीं होगी। पर धीरी रखना जरूरी है।”
गोपाल के मन में अपनी नंगी बेटी ऋचा की कल्पना घूम गई। उसकी छोटी-छोटी उभरती छातियाँ, गुलाबी होंठ, मांसल गांड… ये सब देखकर उसे शराब छोड़ना अब बहुत छोटा काम लग रहा था। उसने तुरंत सिर हिला दिया,
“जी बाबाजी जी… जैसा आप कह रहे हैं, वैसा ही करूँगा।”
थोड़ी देर और बातें करने के बाद गोपाल उठा और घर चला गया। उसके कदमों में एक अजीब-सी उत्तेजना और उम्मीद थी। संपादिका फनलवर है।
बाबाजी भी आराम से लेट गए। लेकिन उनकी नींद में मयूरी की भारी छातियाँ और ऋचा की नाजुक देह दोनों घूम रही थीं। उन्होंने मन ही मन सोचा - “अब खेल और भी दिलचस्प होने वाला है। ऋचा तुम अब मेरे लंड को शांत करने के लिए तैयार रहो और साथ-साथ में तेरी माँ भी तुम्हे उतना ही साथ देगी, मेरे इस लंड को चूसने और नोचोड़ने में।”
अब उन्हें इंतज़ार था - अगले दिन का… और मयूरी के आने का।
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मैत्री पटेल का निर्माण।



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