10-09-2026, 02:03 PM
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गुरुवार की सुबह अमन कॉलेज गया।
राधा वाली बात उसके दिमाग में बार-बार आ रही थी। कक्षा में वह राधा को दूर से देखता रहा। वह शांत बैठी थी, नोट्स बना रही थी। अमन के मन में एक अजीब सा बोझ था—रविवार आ रहा है और वह अभी भी तय नहीं कर पाया था कि ठीक क्या करेगा। ब्रेक में उसने फिर से उस समूह को ढूँढा, लेकिन वे आज अलग-अलग दिखे। कोई नई बात नहीं सुनाई दी।
शाम को घर लौटकर उसने सामान्य दिनचर्या निभाई। खाना खाया, थोड़ी देर किताब खोली, लेकिन ध्यान नहीं लगा। दिमाग में दो सवाल घूम रहे थे—राधा को कैसे बचाए, और रेणु यह सब क्यों सिखा रही है।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके वह बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने इस बार थोड़ा रुककर पूछा, “दीदी… एक बात पूछनी है।”
रेणु ने सिर हिलाया। “पूछो।”
“तुम मुझे यह सब क्यों सिखा रही हो? क्या किसी ने कहा है… कोई टास्क है, या… खुद से?”
रेणु कुछ पल चुप रही। उसकी आँखों में पहली बार एक अलग तरह की गंभीरता दिखी। फिर उसने धीरे से कहा,
“अभी जवाब पूरा नहीं दे सकती। इतना समझ लो कि यह सिर्फ मन बहलाने के लिए नहीं है। इस घर में हर चीज का एक हिसाब होता है। तुम बदल रहे हो, इसलिए तुम्हें तैयार करना जरूरी है। बाकी… जब समय आएगा तब बताऊँगी।”
अमन ने और पूछना चाहा, लेकिन रेणु ने सिर हिलाकर मना कर दिया।
“आज इतना काफी है। जल्दबाजी मत करो। सवाल सही हैं, लेकिन जवाब धीरे-धीरे ही मिलेंगे।”
वह थोड़ा करीब आई। “अब शिक्षा की बारी।”
रेणु ने ब्लाउज के बटन खोले। स्तन बाहर आ गए। उसने अमन का हाथ उन पर रखा, फिर उसकी पैंट खोली। दस इंच का लंड सख्त निकल आया। रेणु ने इसे अपने हाथ में लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगी। इस बार वह और झुकी।
पिछली रात की तरह उसने मुँह में लिया—पहले सिर्फ सिर, फिर धीरे-धीरे और अंदर। जीभ घुमाती रही। एक हाथ से जड़ को सहलाती रही। अमन की साँसें तेज हो गईं। उसने रेणु के बाल पकड़ रखे थे।
कुछ देर बाद रेणु ने मुँह हटाया। लार से चमकता लंड उसके हाथ में था।
“आज यहीं तक,” उसने कहा। आवाज थोड़ी भारी थी। “तुम्हारा शरीर अब अच्छी तरह जवाब दे रहा है। कल और आगे बढ़ेंगे।”
उसने ब्लाउज पहन लिया। दरवाजे तक जाकर रुकी।
“एक बात और। तुम घर की औरतों को भी ध्यान से देखो। सब एक जैसी नहीं हैं। कोई बहुत आगे निकल चुकी है, कोई अभी भी… अलग है। समझोगे धीरे-धीरे।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु की गर्माहट बची हुई थी। लंड तना हुआ था। लेकिन दिमाग में उसके सवाल और भी साफ हो गए थे। रेणु कुछ छुपा रही थी। कोई वजह थी इस शिक्षा के पीछे। और घर की लड़कियों में भी फर्क था—कोई पूरी तरह अनुभव से गुजर चुकी थी, कोई अभी भी अलग थी।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं। राधा का चेहरा, रेणु के अधूरे जवाब, और घर के राज़—सब एक साथ घूम रहे थे।
रविवार नजदीक आ रहा था। और अमन महसूस कर रहा था कि उसकी जिंदगी अब सिर्फ कॉलेज और घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रह गई है।
शुक्रवार की सुबह अमन कॉलेज गया।
कक्षा में राधा अपनी जगह पर बैठी थी। अमन ने आज जानबूझकर उसका ध्यान रखने की कोशिश की। वह शांत थी, शिक्षिका की बातें लिख रही थी। ब्रेक में अमन ने देखा कि वह अकेली बैठी है। उस समूह के दो लड़के मैदान की तरफ गए हुए थे। लड़की भी कहीं और थी। अमन के मन में फिर वही सवाल उठा—रविवार को कैसे रोके? सीधे जाकर बताए तो राधा शायद डरे या विश्वास न करे। चुप रहे तो वह फँस जाएगी। कोई साफ रास्ता अभी भी नहीं सूझ रहा था।
पूरे दिन उसका ध्यान बँटा रहा। छुट्टी होते ही वह घर लौट आया। माँ ने पूछा, “आज थके लग रहे हो?” अमन ने सिर हिलाया और कमरे में चला गया।
रात के खाने के बाद रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने इस बार धीरे से पूछा, “दीदी… कल तुमने कहा था कि घर की औरतें सब एक जैसी नहीं हैं। कुछ… अलग हैं।”
रेणु ने उसकी तरफ देखा। “हाँ। कहा था।”
“कौन… अभी भी…” अमन ने पूरा वाक्य नहीं बनाया।
रेणु थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “अभी नाम नहीं लूँगी। इतना समझ लो कि कुछ बहुत आगे निकल चुकी हैं। कुछ अभी भी अपनी जगह पर हैं। तुम्हारे लिए सब खुला नहीं है। न ही सब बंद है। समय आने पर खुद समझ जाओगे।”
अमन ने और पूछना चाहा, लेकिन रेणु ने सिर हिलाकर रोक दिया।
“आज शिक्षा की बारी है। सवाल बाद में।”
रेणु ने ब्लाउज खोला। स्तन बाहर आ गए। उसने अमन का हाथ उन पर रखा, फिर उसकी पैंट खोली। लंड सख्त निकल आया। रेणु ने इसे अपने हाथ में लिया और मुँह के करीब ले गई।
इस बार उसने पहले की तुलना में थोड़ा और गहरा लिया। जीभ घुमाती रही, कभी सिर चूसती, कभी और अंदर ले जाती। एक हाथ से जड़ को सहलाती रही। अमन की साँसें तेज हो गईं। उसकी उंगलियाँ रेणु के बालों में फँस गईं।
रेणु ने कुछ देर तक यही किया। फिर अचानक रुक गई और मुँह हटा लिया। लंड लार से चमक रहा था।
“बस। आज यहीं तक,” उसने कहा। आवाज थोड़ी भारी थी। “तुम्हारा शरीर अब अच्छी तरह तैयार हो रहा है। कल और आगे बढ़ेंगे।”
उसने ब्लाउज पहन लिया। दरवाजे तक जाकर बोली,
“राधा वाली बात अभी भी दिमाग में है न? सोचते रहो। लेकिन जल्दबाजी में कोई कदम मत उठाना। और घर के सवाल भी धीरे-धीरे ही पूछना। सब एक साथ नहीं मिलेगा।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु की गर्माहट बची हुई थी। लंड तना हुआ था। दिमाग में राधा का चेहरा और रेणु के अधूरे जवाब दोनों घूम रहे थे। घर की कौन सी लड़की अभी भी अलग है—यह सवाल भी अब साफ होकर बैठ गया था।
वह लेट गया। आँखें खुली थीं। रविवार और करीब आ रहा था। और अमन महसूस कर रहा था कि हर रात के साथ वह थोड़ा और बदल रहा है—शरीर से भी, सोच से भी।
शनिवार की सुबह अमन कॉलेज गया।
कक्षा में राधा अपनी जगह पर बैठी थी। अमन ने उसे एक बार देखा और फिर नजरें फेर लीं। रविवार अब बस एक दिन दूर था। उसके मन में बार-बार वही सवाल घूम रहा था—कैसे रोके? लेकिन कोई जवाब नहीं मिल रहा था। ब्रेक में उसने उस समूह को दूर से देखा। वे सामान्य बातें कर रहे थे। कोई नया प्लान नहीं सुनाई दिया। अमन चुपचाप अपनी जगह पर लौट आया।
शाम को घर पहुँचा तो आँगन में माँ सुशीला कपड़े सुखा रही थीं। साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था। जब अमन पास से गुजरा तो उन्होंने उसका हाथ पकड़ लिया।
“आज थके लग रहे हो,” सुशीला ने कहा। उंगलियाँ उसके हाथ पर थोड़ी देर रुक गईं। “अंदर जाकर आराम कर लो।”
अमन ने सिर हिलाया। माँ की उंगलियों की गर्माहट उसके हाथ पर रह गई।
रसोई में कविता थी। उसने अमन को देखकर सिर उठाया। निगाहें एक पल के लिए मिलीं। कविता ने कुछ नहीं कहा, बस हल्के से मुस्कुरा दी। मुस्कान में एक अजीब सी शांति थी। अमन ने नजरें झुका लीं और आगे बढ़ गया।
गलियारे में मीना मिली। उसने अमन का हाथ पकड़कर रोका।
“कल छुट्टी है न? कुछ प्लान है?” मीना ने पूछा। आवाज में हल्की चंचलता थी। उसका शरीर अमन के बहुत करीब था। स्तनों का हल्का स्पर्श हुआ। अमन ने सिर हिलाया और कहा, “नहीं।” मीना हँसकर छोड़ दी।
कमला चाची आँगन के दूसरे कोने में बैठी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही बुलाया।
“इधर आ बेटा।” जब अमन पास गया तो कमला ने उसके बाल सहलाए। हाथ गर्दन तक चला गया। “तुम अब बड़े लगने लगे हो।” आवाज सामान्य थी, लेकिन उंगलियाँ थोड़ी देर और रुक गईं।
अमन अपने कमरे में आया। दिमाग में माँ का स्पर्श, कविता की मुस्कान, मीना का करीब आना और कमला चाची की उंगलियाँ सब घूम रही थीं। घर की हर औरत अब अलग नजर आने लगी थी।
रात के बारह बजे रेणु आई। लालटेन लेकर। दरवाजा बंद करके बिस्तर के किनारे बैठ गई।
अमन ने धीरे से पूछा, “दीदी… घर की औरतें… माँ, कविता, मीना, चाची… सब अलग-अलग क्यों लगती हैं?”
रेणु ने उसकी तरफ देखा। “क्योंकि वे हैं। कुछ बहुत कुछ जी चुकी हैं। कुछ अभी भी अपनी सीमाओं में हैं। तुम देख रहे हो, यह अच्छी बात है। लेकिन अभी नाम लेकर मत पूछो। समय आने पर खुद समझ में आ जाएगा।”
वह थोड़ा करीब आई। “आज शिक्षा की बारी है।”
रेणु ने ब्लाउज खोला। स्तन बाहर आ गए। उसने अमन का हाथ उन पर रखा, फिर उसकी पैंट खोली। लंड सख्त निकल आया। रेणु ने इसे अपने हाथ में लिया और मुँह के पास ले गई।
इस बार उसने पहले से थोड़ा और गहरा और देर तक लिया। जीभ घुमाती रही, कभी सिर चूसती, कभी और अंदर ले जाती। अमन की साँसें तेज हो गईं। उसकी उंगलियाँ रेणु के बालों में फँस गईं। रेणु ने कुछ देर तक यही किया, फिर अचानक रुक गई।
“बस। आज यहीं तक,” उसने कहा। आवाज भारी थी। “तुम्हारा शरीर अब अच्छी तरह तैयार हो रहा है। कल रविवार है। सोच-समझकर रहना।”
उसने ब्लाउज पहन लिया। दरवाजे तक जाकर बोली,
“घर की औरतों को देखते रहो। वे भी तुम्हें देख रही हैं। और राधा वाली बात… फैसला तुम्हारा है।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। मुँह में रेणु की गर्माहट थी। लंड तना हुआ था। दिमाग में माँ, कविता, मीना, कमला चाची और राधा सब एक साथ घूम रहे थे।
रविवार अब बस कुछ घंटों दूर था। और अमन महसूस कर रहा था कि घर के अंदर और बाहर दोनों जगह उसके फैसले का इंतजार हो रहा है।
रविवार की सुबह थी।
अमन अभी बिस्तर पर ही था कि माँ सुशीला कमरे में आईं। हाथ में एक थैला था।
“अमन, उठो। बाबूजी खेत पर हैं। उनका खाना ले जाओ। मजदूर अभी तक नहीं पहुँचे होंगे, जल्दी पहुँचा दो।”
अमन ने आँखें रगड़ते हुए सिर हिलाया। राधा वाला प्लान अभी भी उसके दिमाग में था, लेकिन माँ के कहने पर वह तैयार हो गया। नहाया, कपड़े पहने और थैला लेकर निकल पड़ा।
खेत गाँव से थोड़ी दूर था। सुबह का समय होने की वजह से रास्ता सुनसान था। जब वह खेत पहुँचा तो सच में कोई मजदूर नहीं दिखा। पूरा खेत खाली पड़ा था। बाबूजी का छोटा सा कमरा (जहाँ औजार और कभी-कभी आराम करने का सामान रहता) एक तरफ बना था।
अमन कमरे की तरफ बढ़ा ही था कि अंदर से आवाजें आने लगीं।
महिला की दबी हुई लेकिन साफ सिसकारियाँ और पुरुष की भारी साँसें।
अमन रुक गया। दिल जोर से धड़कने लगा। वह धीरे-धीरे खिड़की के पास गया। खिड़की बंद थी, लेकिन कundi नहीं लगी थी। उसने हल्के से धक्का दिया। खिड़की बिना आवाज किए थोड़ी खुल गई।
अंदर नजारा साफ दिख रहा था।
बाबूजी सुरेश चारपाई पर थे। उनकी कमीज पूरी तरह खुली हुई थी, पैंट घुटनों तक नीचे थी। उनके मोटे और लंबे लंड पर एक औरत सवार थी। औरत की साड़ी कमर तक उठी हुई थी, ब्लाउज खुला हुआ था। उसके स्तन बड़े और गोल थे—साफ 36 साइज के, निप्पल सख्त और काले। कमर पतली (32), और गाँड भारी और गोल (36)।
अमन ने पहचान लिया। वह गाँव के मुखिया की पत्नी थी—बाबूजी के बहुत करीबी दोस्त की बीवी। नाम था सुमन।
सुमन उस समय पूरी तरह बेकाबू थी। वह बाबूजी के लंड पर ऊपर-नीचे हो रही थी। स्तन हवा में झूल रहे थे। मुँह से गंदी और मजे भरी आवाजें निकल रही थीं।
“आह्ह्ह… सुरेश… कितना मोटा लंड है तेरा… मेरी चूत फाड़ रहा है… जोर से… और जोर से चोदो इस रंडी को…”
बाबूजी ने उसकी गाँड पर जोरदार थप्पड़ मारा।
“साली मुखिया की बीवी बनके घूमती है, और यहाँ आकर मेरी लंड पर चढ़ जाती है। बोल, तू क्या है?”
सुमन ने कराहते हुए जवाब दिया, “मैं… मैं तेरी रंडी हूँ… तेरी चुदाई की प्यासी रंडी… आह्ह… और अंदर तक डाल… पूरा लंड दे मुझे…”
बाबूजी ने उसकी कमर पकड़ी और नीचे से जोर-जोर से धक्के मारने लगे। हर धक्के के साथ सुमन की बड़ी गाँड बाबूजी की जाँघों से टकरा रही थी। चूत की गीली आवाजें—छप-छप-छप—कमरे में गूँज रही थीं।
“ले रंडी… ले पूरा… तेरे मुखिया पति को पता है कि उसकी बीवी दूसरों की लंड पर कितनी मस्त होती है?” बाबूजी ने गाली दी।
सुमन ने सिर पीछे फेंक दिया। स्तन और जोर से हिलने लगे।
“पता चले तो चले… आज तो तू मुझे चोद… मेरी चूत में अपना पूरा पानी भर दे… आह्ह्ह… सुरेश… और तेज… मुझे अपनी रंडी बनाकर चोद…”
बाबूजी ने अचानक उसे नीचे गिराया। सुमन चारपाई पर पेट के बल लेट गई। बाबूजी ने पीछे से उसका कमर उठाया और एक झटके में फिर से लंड चूत में डाल दिया।
“गाँड भी फैला… आज दोनों छेद इस्तेमाल करूँगा तेरे।”
सुमन ने दोनों हाथों से चारपाई पकड़ ली और चीख निकाली,
“हाँ… कर ले… मेरी गाँड भी चोद… मैं तेरी पूरी रंडी हूँ आज… चाहे जितना चाहे वैसा इस्तेमाल कर…”
बाबूजी ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और जोर-जोर से धक्के मारने लगे। कमरा सिसकारियों, गालियों और मांस की टकराहट से भर गया।
अमन खिड़की के पीछे पत्थर की तरह खड़ा था। उसका अपना लंड पैंट में पूरी तरह तन चुका था। आँखों के सामने बाबूजी अपनी पूरी ताकत से मुखिया की बीवी को रंडी बनाकर चोद रहे थे। सुमन मजे से ले रही थी—बिल्कुल जैसी कोई अनुभवी रंडी लेती है।
दृश्य जारी था।
खिड़की के पीछे अमन अभी भी काँप रहा था।
अंदर बाबूजी सुरेश ने सुमन को चारपाई पर पेट के बल लिटा रखा था। उनका मोटा लंड उसकी चूत में जोर-जोर से अंदर-बाहर हो रहा था। हर धक्के के साथ सुमन की बड़ी गाँड हिल रही थी और उसकी सिसकारियाँ तेज होती जा रही थीं।
“आह्ह्ह… सुरेश… और गहरा… मेरी चूत फाड़ दे… आज पूरी रंडी बना दे मुझे…” सुमन चीख रही थी।
बाबूजी ने उसके बाल और जोर से पकड़े और सिर पीछे खींच लिया।
“बोल साली… तू क्या है मेरे सामने?”
“मैं… मैं तेरी चुदाई की रंडी हूँ… मुखिया की बीवी होकर भी तेरी लंड की प्यासी रंडी… आह्ह… जोर से चोदो…”
बाबूजी ने एक जोरदार थप्पड़ उसकी गाँड पर मारा। लाल निशान उभर आया। फिर उन्होंने गति और तेज कर दी। कमरे में सिर्फ मांस की टकराहट और गीली आवाजें गूँज रही थीं।
थोड़ी देर बाद बाबूजी ने लंड निकाला। सुमन कराहते हुए पलट गई। उसके बड़े स्तन हवा में फैल गए। बाबूजी ने उसके पैर फैलाए और फिर से लंड चूत में धंस दिया। इस बार आमने-सामने।
सुमन ने बाबूजी की गर्दन पकड़ ली और बोली, साँस फूलती हुई,
“आज तू मुझे इतना जोर से चोद रहा है… जैसे गुस्सा निकाल रहा हो…”
बाबूजी ने धक्का मारते हुए जवाब दिया, “गुस्सा नहीं… मजा है। तेरी यह 36-32-36 वाली बॉडी देखकर नियंत्रण नहीं रहता।”
सुमन हँसी—कराहते हुए। फिर अचानक उसकी आवाज थोड़ी गंभीर हो गई, भले ही धक्के जारी थे।
“सुरेश… तू जानता है न… तेरे घर में भी सब कुछ साफ नहीं है…”
बाबूजी की गति थोड़ी धीमी पड़ी। “क्या मतलब?”
सुमन ने कमर ऊपर उठाते हुए लंड और अंदर लिया और बोली,
“तेरी बीवी सुशीला… सिर्फ तेरे साथ नहीं सोती। गाँव में और भी नाम चलते हैं। और तेरी बड़ी बेटी रेणु… वह भी साधारण नहीं है। वह सब कुछ जानती है घर का। शायद तुझसे भी ज्यादा।”
बाबूजी ने जोर से धक्का मारा। सुमन चीख पड़ी।
“आह्ह्ह… हाँ… ऐसे ही… और सुन… तेरा छोटा बेटा अमन… अब आँखें खोलने लगा है। लोग बातें करने लगे हैं कि चौधरी के छोटे लड़के की निगाहें बदल गई हैं।”
बाबूजी ने सुमन के दोनों स्तन जोर से दबाए और और तेज गति से चोदने लगे।
“तू ज्यादा बकवास मत कर साली। अपनी चूत पर ध्यान दे।”
सुमन ने बाबूजी का चेहरा दोनों हाथों से पकड़ लिया। आँखों में मजा और एक अजीब सी चमक दोनों थीं।
“मैं बकवास नहीं कर रही… मैं सच कह रही हूँ। इस गाँव में सबके राज़ सबको पता होते हैं। मुखिया होने के नाते मेरे पति भी बहुत कुछ जानते हैं… और मैं उनके कानों तक पहुँचाती हूँ। तू मुझे चोद रहा है, तो सुन भी ले…”
बाबूजी ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया।
“चुप कर रंडी। आज सिर्फ चोदने का मूड है।”
सुमन ने हाथ हटाया और कराहते हुए बोली,
“ठीक है… आज चुप रहूँगी… लेकिन याद रखना… तेरे घर के राज़ भी बाहर आने वाले हैं। अब चोद… जोर से चोद… मेरी चूत में अपना सारा पानी भर दे…”
बाबूजी ने दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ी और पूरे जोर से धक्के मारने लगे। सुमन की चीखें कमरे में गूँजने लगीं।
“आह्ह्ह… सुरेश… फाड़ दे… रंडी बना दे पूरी… हाँ… हाँ… ऐसे ही… और तेज…”
अमन खिड़की से यह सब देख और सुन रहा था। उसका शरीर काँप रहा था। बाबूजी की बीवी वाली बातें, रेणु वाली बातें, और खुद के बारे में सुमन के शब्द—सब उसके दिमाग में धमाके की तरह बज रहे थे।
दृश्य अभी खत्म नहीं हुआ था। बाबूजी अभी भी पूरी ताकत से सुमन को चोद रहे थे।
खिड़की के पीछे अमन की साँसें अटक रही थीं।
अंदर बाबूजी सुरेश ने सुमन को चारपाई के किनारे खींच लिया था। उसके दोनों पैर उनके कंधों पर थे। मोटा लंड पूरी तरह उसकी चूत में धंसा हुआ था और बाबूजी अब बिना रुके धक्के मार रहे थे। हर धक्के के साथ सुमन के बड़े स्तन जोर से हिल रहे थे और उसकी गाँड चारपाई से टकरा रही थी।
“आह्ह्ह… सुरेश… मार डालेगा क्या… इतना जोर से… मेरी चूत फट जाएगी… लेकिन मत रुक… चोद… रंडी की तरह चोद मुझे…” सुमन चीख-चीखकर कह रही थी।
बाबूजी ने उसके दोनों स्तनों को जोर से मसलते हुए गाली दी,
“साली मुखिया की बीवी… घर में इज्जतदार बनके घूमती है और यहाँ मेरी लंड पर चढ़कर रंडी बन जाती है। बोल, तेरी चूत किसकी है?”
सुमन ने आँखें बंद करके जवाब दिया,
“तेरी… सिर्फ तेरी… आज पूरी तरह तेरी रंडी हूँ… चाहे जितना चाहे वैसा इस्तेमाल कर… आह्ह्ह… और गहरा… हाँ… वहीं… वहीं मार…”
बाबूजी ने अचानक लंड निकाला। सुमन कराह उठी। फिर उन्होंने उसे पलट दिया। सुमन चारपाई पर घुटनों के बल झुक गई। बाबूजी ने उसकी गाँड के दोनों भाग फैलाए और लंड को उसकी गाँड की छेद पर लगा दिया।
“अब यह छेद भी लेगी। ढीली कर।”
सुमन ने चारपाई कसकर पकड़ ली और चीख निकाली,
“आहिस्ता… पहली बार नहीं है लेकिन तू बहुत मोटा है… आह्ह्ह… धीरे… अरे बाप रे… जा रहा है अंदर… सुरेश… फाड़ मत देना…”
बाबूजी ने धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से लंड उसकी गाँड में धंसाना शुरू किया। आधा अंदर जाने पर सुमन की सिसकारी और तेज हो गई।
“पूरा… पूरा डाल… मैं सह लूँगी… मैं तेरी रंडी हूँ न… दोनों छेद तेरे हैं आज…”
बाबूजी ने एक झटके में बाकी लंड अंदर कर दिया। सुमन की लंबी चीख निकली। फिर बाबूजी ने उसकी कमर पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारने शुरू कर दिए। गाँड की टकराहट और सुमन की कामुक चीखें कमरे में गूँज रही थीं।
“ले साली… ले पूरी गाँड में… आज तुझे याद रहेगा… मुखिया की बीवी को मैंने कैसे चोदा…”
सुमन बेलगाम हो चुकी थी।
“हाँ… याद रहेगा… हर बार जब मेरे पति मुझे छूएँगे तब तेरा लंड याद आएगा… आह्ह्ह… और तेज… दोनों छेद खराब कर दे मेरे… रंडी बना दे पूरी…”
बाबूजी ने कुछ देर गाँड में चोदा, फिर लंड निकाला और फिर से चूत में डाल दिया। अब उनकी गति बहुत तेज हो गई थी। दोनों पसीने से तर थे। सुमन के नाखून चारपाई में गड़ गए थे।
“सुरेश… आ रहा है… मैं झड़ने वाली हूँ… साथ में झड़… मेरी चूत में भर दे अपना पानी… पूरा…”
बाबूजी ने उसकी कमर और जोर से दबोच ली। कुछ तेज धक्कों के बाद उनका शरीर अकड़ गया। गरम पानी की धार सुमन की चूत में छूट गई। सुमन भी उसी समय काँप उठी। उसकी लंबी सिसकारी निकली और शरीर ढीला पड़ गया।
दोनों कुछ देर तक उसी हालत में पड़े रहे। साँसें तेज चल रही थीं। बाबूजी का लंड अभी भी उसकी चूत में था, धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा था। सुमन के स्तन और जाँघें पसीने से चमक रही थीं।
बाबूजी ने आखिरकार लंड निकाला। सफेद पानी सुमन की चूत से बाहर रिसने लगा। उन्होंने उसकी गाँड पर एक आखिरी थप्पड़ मारा और बोले,
“अब उठ। मजदूर आने वाले होंगे। साफ-सुथरा हो जा।”
सुमन धीरे-धीरे उठी। उसकी टाँगें काँप रही थीं। उसने बाबूजी को देखकर थकी हुई मुस्कान दी।
“अगली बार और जोर से चोधियो… आज तो मेरी हड्डियाँ गल गईं।”
बाबूजी ने कमीज के बटन बंद करते हुए कहा, “जा। और ज्यादा बकवास मत करियो घर जाकर।”
अमन ने इतना देखते ही धीरे से खिड़की बंद कर दी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। लंड पैंट में दर्द कर रहा था। उसने थैला उठाया और काँपते हुए खेत से दूर चला गया। खाना वह वहीं किसी पत्थर पर छोड़ आया।
घर की तरफ लौटते समय उसके दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—बाबूजी, सुमन, उनके गंदे शब्द, और सुमन के खोले हुए राज़।
माँ के बारे में।
रेणु के बारे में।
और खुद अमन के बारे में।
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albertprince547;
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