09-09-2026, 01:08 PM
दुकान पर बैठे बैठे मेरा मन बार बार उन बातों पर लौट रहा था जो अंकल ने कही थीं। मैंने मन ही मन योजना तो बना ली थी, लेकिन जैसे जैसे वह योजना मेरे दिमाग में साफ़ होती जा रही थी, वैसे वैसे मेरे सीने में एक अजीब सी घबराहट बढ़ने लगी थी।
एक तरफ अंकल का वह भरोसा था, और दूसरी तरफ मम्मी का वह चेहरा, जो शायद मेरे सच जानने के बाद पूरी तरह बदल जाएगा। क्या मैं वाकई इतना हिम्मत वाला हूँ? क्या मैं उस सच का सामना कर पाऊँगा जो मैं बोलने जा रहा हूँ? यह सवाल मेरे अंदर एक युद्ध छेड़ रहा था।
मेरा हाथ बार बार अपने माथे पर जा रहा था। एक अजीब सी झिझक मुझे बार बार रोक रही थी। "अगर मम्मी ने मुझे गलत समझा तो? अगर उन्होंने मुझे घर से ही निकाल दिया तो?" ये विचार किसी ज़हरीले सांप की तरह मेरे दिमाग में घूम रहे थे। योजना तो तैयार थी, पर उस योजना को हकीकत में बदलने के लिए जो कलेजा चाहिए था, वह जैसे कहीं खो गया था।
मैं दुकान के सामानों को बिना मतलब ही इधर उधर खिसका रहा था, बस इसलिए ताकि मेरा ध्यान उन विचारों से हट सके। पर जितना मैं भागने की कोशिश करता, उतना ही मेरा डर मुझे घेर लेता। मैं चाहकर भी खुद को यह यकीन नहीं दिला पा रहा था कि जो मैं करने जा रहा हूँ, वह सही है या गलत। बस एक ही चीज़ साफ़ थी रास्ता कठिन था और वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
***
रात का खाना खत्म करने के बाद मम्मी ने किचन का सारा काम निपटाया और फिर हम दोनों कमरे में सोने चले गए। आज मम्मी ने बहुत ही महीन, गुलाबी रंग की नाइटी पहनी हुई थी, जिसमें वो बेहद खूबसूरत और खिलखिलाती हुई लग रही थीं। मैं अपने कुर्ते पजामे में बिस्तर पर लेटा हुआ था, लेकिन मेरा मन कहीं और था मैं अपने ही ख्यालों के भंवर में खोया हुआ था।
तभी मम्मी मेरे पास आकर लेटीं और उनका चुलबुलापन शुरू हो गया। उन्होंने शरारत भरी नज़रों से मुझे देखते हुए मेरे सिर पर हाथ फेरना शुरू किया। वो जानती थीं कि मैं सामान्य नहीं हूँ। उन्होंने थोड़ा करीब आकर, बड़े लाड़ और प्यार से मेरी आँखों में झाँकते हुए पूछा, "अरे ओ मेरे उदास शहज़ादे! आज क्या बात है? आज मेरा बच्चा इतना चुप चाप क्यों बैठा है? कहीं कोई परेशानी तो नहीं?"
उन्होंने मेरे गाल को धीरे से सहलाया और फिर एक प्यारी सी मुस्कान के साथ थोड़ा और करीब आकर फुसफुसाते हुए बोलीं, "मुझसे कुछ छुपा रहे हो क्या? देखो, अगर मुझसे कुछ कहना है तो कह दो, वरना मैं पूरी रात तुम्हें ऐसे ही तंग करती रहूँगी जब तक तुम मुस्कुरा न दो।" उनके इस चुलबुलेपन और बेपनाह प्यार ने माहौल को इतना हल्का और आत्मीय बना दिया कि मेरा मन चाहकर भी अपनी बात छुपा नहीं पा रहा था। उनकी आँखों में मेरे लिए वो बेइंतहा फिक्र और प्यार देखकर मेरा दिल पिघलने लगा।
मैंने एक फीकी सी मुस्कान के साथ अपनी नज़रें चुराते हुए कहा, "बस ऐसे ही मम्मी... कुछ खास नहीं।"
मेरे "कुछ खास नहीं" कहने पर मम्मी ने अपनी आँखें सिकोड़ीं और एक मासूम सा मुँह बनाकर मुझे घूरने लगीं। उन्होंने मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों के बीच थाम लिया और बिल्कुल एक छोटे बच्चे की तरह लाड़ जताते हुए बोलीं, "अच्छा? कुछ खास नहीं? और ये जो चेहरा लटका हुआ है, ये भी कुछ खास नहीं है? मुझसे झूठ मत बोलो, मैं तुम्हारी माँ हूँ, तुम्हारी आँखों में देखकर ही समझ जाती हूँ कि मेरे बच्चे के मन में कुछ चल रहा है।"
उन्होंने मेरे माथे को चूमते हुए और धीरे धीरे सहलाते हुए बड़े ही प्यार से कहा, "चलो अब जल्दी से बताओ, क्या बात है? अगर नहीं बताओगे तो मैं नाराज़ हो जाऊँगी और फिर तुम्हें बिल्कुल प्यार नहीं करूँगी। बोलो, क्या हुआ है मेरे प्यारे बच्चे को?"
मैंने कहा, "रहने दो मम्मी... न बताने से तो शायद आप नाराज़ न हो, पर लगता है कि बता दिया तो ज़रूर नाराज़ हो जाओगी।"
मम्मी बोलीं, "बताओ बेटा, मैं नाराज़ नहीं होऊंगी।"
मैंने कहा, **"मम्मी... वो... दरअसल बात कुछ ऐसी है कि मैं समझ नहीं पा रहा कि कैसे कहूँ। मुझे डर लग रहा है कि कहीं आप मुझे गलत न समझ लें या मुझसे नाराज़ न हो जाएँ।"** मेरी आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी और मैं उनकी आँखों में देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मेरा गला सूख रहा था और दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि मुझे लग रहा था जैसे वे मेरे कानों में सुनाई दे रही हों।
मम्मी ने मेरी घबराहट को भांप लिया। उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में और भी मजबूती से थाम लिया और बहुत ही कोमल स्वर में बोलीं, **"अरे पागल, डर कैसा? मैं तुम्हारी माँ हूँ। दुनिया की कोई भी बात हो, तुम मुझसे क्यों डर रहे हो? जो भी है, बिना डरे कह दो। मैं वादा करती हूँ कि मैं नाराज़ नहीं होऊँगी।"**
उनका यह आश्वासन सुनकर एक पल के लिए मुझे हिम्मत मिली, लेकिन अगले ही पल मेरा मन फिर से उसी कश्मकश में फंस गया। मैं सोच रहा था कि क्या मैं वाकई वो सब कह पाऊँगा जो मेरे दिमाग में चल रहा है? क्या मैं उन्हें वो सच बता पाऊँगा जो शायद हमारे रिश्ते की परिभाषा ही बदल दे? मेरा हाथ कांप रहा था और मैं बस उनके स्पर्श को महसूस करते हुए उस सच को अपने होंठों तक लाने की कोशिश कर रहा था जो मेरे अंदर एक तूफान की तरह उठ रहा था।
मैंने मम्मी की आँखों में देखते हुए अपनी आवाज़ को थोड़ा और धीमा और गहरा कर लिया। मैं जानता था कि मैं किस रास्ते पर चल रहा हूँ, लेकिन मेरा लक्ष्य साफ़ था। मैंने धीरे से उनका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, **"मम्मी,मै सोच रहा था कि अंकल का अब घर आना जाना कम हो गया है... क्या आप उन्हें याद नहीं करतीं? मतलब, मेरा मतलब है कि वो भी तो आपको बहुत पसंद करते थे, और आप भी तो उन्हें पसंद करती थीं ना ,फिर add अब क्यों नहीं आते वो?"**
मम्मी के चेहरे पर एक पल के लिए एक अजीब सी चमक आई, जो तुरंत ही शर्मिंदगी में बदल गई। उन्होंने अपनी नज़रें चुरा लीं और एक लंबी साँस भरते हुए बोलीं, **"रवि, तू ये क्या बातें कर रहा है? वो सब पुरानी बातें हैं। अब वो नहीं आते, तो क्या हुआ? बेटा... सच तो ये है कि मैं नहीं चाहती थी कि तुझे कभी बुरा लगे। मुझे डर था कि अगर वो यहाँ आए और हमारे बीच वो सब हुआ जो पहले हुआ करता था, तो शायद तू मुझे अलग नज़र से देखने लगेगा। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से तेरे मन में मेरे लिए कोई गलत विचार आए। इसलिए मैंने ही उन्हें मना कर दिया कि वो अब यहाँ न आएँ। तेरे लिए तो बेटा, मैं कुछ भी कुर्बाानी देने को तैयार हूँ।"**
मैंने हार नहीं मानी। मैं थोड़ा और करीब आया, उनके और भी करीब, ताकि मेरी मौजूदगी का अहसास उन्हें पूरी तरह महसूस हो। मैंने उनके कान के पास झुककर बहुत ही कोमल स्वर में कहा, **"पर मम्मी, क्या आपको सच में उनकी कमी महसूस नहीं होती? वो जो नज़दीकियाँ थीं, वो जो प्यार था... क्या वो सब बस एक सपना था?"**
मम्मी का चेहरा लाल हो गया। वे मेरी बातों के पीछे के इरादे को पूरी तरह तो नहीं समझ पा रही थीं, लेकिन उन्हें अपनी भावनाओं की हलचल साफ़ महसूस हो रही थी। उन्होंने मेरा हाथ झटकने की कोशिश की, पर उनके हाथ में वो ज़ोर नहीं था। उन्होंने एक गहरी साँस ली और मेरी आँखों में देखते हुए बड़े ही भावुक और दृढ़ स्वर में कहा, **"नहीं रवि... अब मुझे किसी और की ज़रूरत नहीं है। अब तू है ना मेरा ख्याल रखने के लिए, मेरा साथ देने के लिए। मुझे किसी और की क्या ज़रूरत?"**
उनका यह कहना कि 'अब तू है ना मेरा ख्याल रखने के लिए', मेरे अंदर एक अजीब सी उत्तेजना और जीत का अहसास जगा गया। उनके इस वाक्य ने अनजाने में ही मुझे वो जगह दे दी थी जिसकी मुझे तलाश थी। अब खेल और भी गहरा होने वाला था।
"अब तू है ना मेरा ख्याल रखने के लिए" यह वाक्य सिर्फ एक माँ का अपने बेटे के प्रति भरोसा ही नहीं , पूर्ण समर्पण की भावना से ओत प्रोत था।"पर मेरे मन में तो कुछ और ही था न, और वो थी मेरे ,मम्मी और अंकल के बीच threesom की भावना।
मैंने धीरे से अपना हाथ उनके चेहरे से नीचे खिसकाते हुए उनके कंधे पर रखा। उनकी साँसें अब तेज़ हो चली थीं और उनके शरीर में एक हल्की सी थरथराहट महसूस हो रही थी। मैंने उनकी आँखों में आँखें डालकर, बेहद धीमी और गहरी आवाज़ में कहा, **"मम्मी, आप मेरे लिए इतना कुछ करने को तैयार हैं... पर क्या आप जानती हैं कि आपका ये ख्याल रखना मेरे लिए क्या मायने रखता है? आप कहती हैं कि आपको किसी और की ज़रूरत नहीं है, पर मुझे पता है आप ये सिर्फ मेरी खुशी के लिए कह रही हैं क्योंकि आप मुझे बहुत प्यार करती हैं,मम्मी आप मेरे लिए इतना त्याग कर सकती हो तो मेरा भी तो फर्ज है कि मैं भी आप की इच्छाओं का ख्याल रखूँ, मम्मी मैं जनता हु के आप के दिल में अंकल के प्रति सम्मानजनक जगह है और मैं नही चाहता कि आप अपनी इच्छाओं का गला घोंट दो**
मम्मी ने अपनी पलकें झुका लीं, जैसे वो सच का सामना करने से डर रही हों। उनका चेहरा शर्म से सुर्ख हो चुका था। मैंने उनके और करीब झुकते हुए उनके कान के पास फुसफुसाया, **"अगर आप मेरे लिए इतना त्याग कर सकती हैं, तो क्या मैं आपको वो सब नहीं दे सकता जो आपको खुशी दे सके? मैं चाहता हूँ कि आप फिर से वही महसूस करें जो आप अंकल के साथ करती थीं... पर इस बार, मैं भी आपके साथ रहूँगा। मैं आपको वो सब दूँगा जो आपको चाहिए।"**
मम्मी के होंठ हल्के से काँपे। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया, बस एक गहरी और भारी साँस ली। उनके शरीर की ढीली पड़ती पकड़ इस बात का सबूत थी कि उनका मन अब मेरी बातों के आगे हार मान रहा था। सैयद,उनके अंदर का कोई दबा हुआ अहसास अब बाहर आने को बेताब था।
मैंने उनके कंधे पर अपनी पकड़ थोड़ी मज़बूत की और महसूस किया कि उनका शरीर अब पूरी तरह से मेरी छुअन के प्रति संवेदनशील हो चुका था। मैंने उनके माथे को चूमते हुए कहा, **"मम्मी, आज से आपको कोई भी कमी महसूस नहीं होने दूँगा। मैं आपका ख्याल रखूँगा... बिल्कुल वैसे ही जैसे आप चाहती हैं।"**
कमरे में सन्नाटा था, लेकिन दोनों की तेज़ होती साँसों की आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी। खेल अब सिर्फ बातों तक सीमित नहीं रहा था, अब भावनाओं और इच्छाओं का एक ऐसा भंवर शुरू होने वाला था जिससे वापस लौटना नामुमकिन था।
मम्मी ने मेरी आँखों में देखा , शायद उनको मेरी आँखों में अब सिर्फ एक बेटे का प्यार नहीं , बल्कि एक पुरुष की तीव्र चाहत और अधिकार दिखाई दे रहा था। मेरा हाथ अपने कंधे पर महसूस करके उनकी सांसें और उखड़ने लगीं।
मैने आगे बढ़ते हुए कहा, **"मम्मी, ख्याल रखने का मतलब सिर्फ ज़रूरतें पूरी करना नहीं होता... ख्याल रखने का मतलब होता है आपको उस सुकून में ले जाना जहाँ आप खुद को पूरी तरह भूल जाएँ। जहाँ आप सिर्फ और सिर्फ महसूस करें।"**
मम्मी ने कांपती आवाज़ में पूछा, "तू... तू क्या कहना चाहता है रवि?"
रवि ने उनके और करीब आकर उनके कान के पास झुककर फुसफुसाया, **"मैं चाहता हूँ कि हम तीनों मिलकर एक ऐसा रिश्ता बनाएँ, जहाँ कोई पर्दा न हो, कोई शर्म न हो। मैं चाहता हूँ कि आप अंकल के साथ और मेरे साथ, उस चरम सुख को महसूस करें जिसका सपना शायद हम तीनों ने देखा है।"**
मैंने मम्मी के चेहरे पर छाई उस घबराहट को महसूस किया। उनके होंठ थरथरा रहे थे और आँखों में एक अजीब सा डर और संकोच था। उन्होंने हड़बड़ाते हुए मुझसे कहा, **"ये... ये तू क्या बोल रहा है रवि? पागल हो गया है क्या तू?"**
उनकी इस बात पर मेरे चेहरे पर एक गहरी और मदहोश कर देने वाली मुस्कान आ गई। मैंने उनके और करीब जाकर, उनकी आँखों में सीधे देखते हुए बड़े ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, **"मम्मी, मैं आपको एक ऐसा सच बताता हूँ जिसका शायद आपको अंदाज़ा नहीं है। मुझे आपके और अंकल के बीच के उन गुप्त और गहरे संबंधों के बारे में सालों से पता है। सच तो यह है कि पिछले कुछ महीनों में मैंने आप दोनों को कई बार उस चरम सुख में डूबते हुए देखा है।"**
मम्मी का चेहरा शर्म से एकदम लाल पड़ गया। उन्हें तो अब तक यही लग रहा था कि मैने सिर्फ एक बार ही उन्हें अंकल के साथ देखा है। मैंने अपनी बात जारी रखी, **"क्या बताऊं मम्मी? कई बार मुझे ऐसा लगता था कि अंकल जानबूझकर मुझे दिखाते हुए आपके साथ सब कुछ कर रहे हैं। और मेरी यह बात सिर्फ मेरा वहम नहीं थी। मुझे याद है वो दिन जब अंकल ने मुझे देखते हुए ही आपको पकड़ लिया था, और दूसरी बार जब उन्होंने जानबूझकर कमरे की सारी लाइटें जला दी थीं ताकि मैं आपकी और उनकी उस क्रिया को पूरी स्पष्टता से देख सकूँ। मुझे यकीन है कि उन्हें भी इस बात से एक अलग ही उत्तेजना मिलती थी कि कोई उन्हें देख रहा है, और उस अहसास से उनकी प्यास और उत्तेजना कई गुना बढ़ जाती थी।"**
मैंने उनके कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और बड़े ही नशीले अंदाज़ में उनके कान के पास फुसफुसाया, **"मम्मी, सच तो यह है कि मैं भी वही चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि जब मैं आपको प्यार करूँ, जब मैं आपके शरीर की गहराइयों में उतरूँ, तो कोई पास बैठकर हमें निहार रहा हो। मैं महसूस करना चाहता हु कि वो एहसास किस्सा होता है जब आपको कोई मिलाप करते देख रहा होता है। मम्मी, आप तो जानती हैं कि अंकल के सिवा इस दुनिया में कोई ऐसा नहीं जिस पर हम इतना भरोसा कर सकें। इसलिए प्लीज मम्मी, मेरी इस ख्वाहिश को मान जाइए।"**
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, मैं चाहता हूँ कि यह हमारे आने वाले समय का एक नया अध्याय बने। एक ऐसा रिश्ता जो हर रात, हर पल हमारे बीच की सारी मर्यादाओं को तोड़कर हमें एक नए और बेबाक अहसास से जोड़ दे।"**
मम्मी के चेहरे पर डर, शर्म और संकोच के मिले जुले भाव आ गए। वो बिल्कुल बेबस दिख रही थी, लेकिन उसकी वो बेबसी मुझे पागल कर रही थी।
उसने कांपती हुई आवाज़ में मुझसे कहा *'बेटा नहीं, ऐसा नहीं कर सकती। तेरे अंकल क्या सोचेंगे कि माँ बेटा में कैसे संबंध हैं... चोदने वाले?'*
जब उसके मुँह से वो शब्द निकले, तो मेरा पूरा शरीर उत्तेजना से भर गया। वो खुद को रोक रही थी, समाज का डर दिखा रही थी, लेकिन उसके शब्द कुछ और ही कहानी कह रहे थे। उसने आगे कहा *'और उनको ये सुनकर कैसा लगेगा कि कैसी औरत है जो एक ही समय पर अपने बेटे और यार के साथ सोना चाहती है!'*
उसकी ये बातें सुनकर मुझे लगा जैसे उसने खुद ही अपनी सारी पाबंदियाँ तोड़ दी हों। वो एक तरफ तो डर रही थी, लेकिन दूसरी तरफ वो अपनी उस गंदी इच्छा को भी स्वीकार कर रही थी। उसकी वो शर्म और वो गंदी बातें मुझे और भी ज़्यादा उसकी तरफ खींच रही थीं। मुझे समझ आ गया कि मेरी माँ के अंदर एक ऐसी औरत छिपी है जो मर्यादाओं की परवाह नहीं करती, जो बस अपनी प्यास बुझाना चाहती है।***
"उसकी बातें सुनकर मुझे एक पल के लिए लगा जैसे वो सच में डर रही है, लेकिन मैं जानता था कि ये सिर्फ एक दिखावा है, एक आखिरी कोशिश है खुद को बचाने की। मैंने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए अपना तर्क उसके सामने रख दिया। मैंने उसे वो सच बताया जो हम तीनों के बीच एक गहरा राज बन चुका है।
मैंने बड़े शांत लेकिन भारी स्वर में उससे कहा, *'मम्मी, ये अंकल और समाज का डर दिखाना बंद करो। सच तो ये है कि अंकल को सब पता है हमारे और आपके बीच के इस संबंध के बारे में। वो सब जानते हैं कि हम क्या कर रहे हैं।'*
मैंने देखा कि उसके चेहरे पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। मैंने आगे बढ़ते हुए उसकी बात का जवाब दिया, *'जब हम तीनों एक दूसरे का राज जानते हैं, जब हम तीनों को पता है कि असल में क्या चल रहा है, तो फिर ये दिखावा करने की क्या जरूरत है? इसमें अब छुपाने जैसा कुछ बचा ही नहीं है।'*
मेरी ये बात सुनकर उसके चेहरे की वो शर्म और डर अब धीरे धीरे एक अजीब सी राहत और उत्तेजना में बदलने लगा था। उसे समझ आ गया था कि अब भागने का कोई रास्ता नहीं है, और शायद... शायद वो अब इस सच को स्वीकार करने के लिए तैयार थी।"
"उसकी आँखों में वो खौफ और उलझन देख कर मेरा दिल तो पिघल ही रहा था, लेकिन मेरा जुनून उससे कहीं ज्यादा गहरा था। मैं बस और इंतज़ार नहीं कर पा रहा था। मैंने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसके कांपते हुए हाथों को अपने मजबूत हाथों में थाम लिया। उसकी त्वचा इतनी कोमल और गर्म थी कि जैसे मेरे स्पर्श से ही उसमें बिजली दौड़ रही हो।
मैंने उसके हाथों को कसकर पकड़ा और झुककर उसकी आँखों में सीधे झाँका। उसकी आँखों में आँसू थे, पर उनमें एक अजीब सी चमक भी थी। मैंने बहुत ही धीमी और भारी आवाज़ में, लगभग फुसफुसाते हुए उससे उसकी रजामंदी मांगी:
*'मम्मी... बस एक बार... अपनी आँखें बंद मत करना। बस एक बार मुझे अपनी सहमति दे दो। मुझे तुम्हारी वो सारी पाबंदियाँ नहीं चाहिए, मुझे बस तुम चाहिए। क्या तुम वाकई इस सच को स्वीकार नहीं कर पाओगी? क्या तुम वाकई मेरे और अंकल के साथ इस पागलपन को जीने से डर रही हो? बस एक बार हाँ कह दो...'*
उसकी आँखों में मैंने वो पल देखा जहाँ उसकी सारी मर्यादाएँ हार रही थीं। वो मेरी आँखों में देख रही थी, और मैं उसके उस मौन जवाब का इंतज़ार कर रहा था जो उसकी रजामंदी बन जाए।"
मम्मी ने एक गहरी और लंबी सांस ली। उनके शरीर की थरथराहट अब डर से नहीं, बल्कि एक दबी हुई उत्तेजना से थी। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं मेरे कंधे को अपने हाथ से और ज़ोर से दबाते हुए कहा, **"अगर तुम्हारी यही इच्छा है... तो मैं अपनी सारी मर्यादाएँ तुम्हारे कदमों में रख देती हूँ। मुझे बस तुम्हे खुश रखना है।"**
यह सुनते ही मेरे अंदर जैसे ज्वालामुखी फट पड़ा। मैने एक झटके में मम्मी को अपनी ओर खींचा और अपने होंठ उनके होंठो पर रख दिए "
एक तरफ अंकल का वह भरोसा था, और दूसरी तरफ मम्मी का वह चेहरा, जो शायद मेरे सच जानने के बाद पूरी तरह बदल जाएगा। क्या मैं वाकई इतना हिम्मत वाला हूँ? क्या मैं उस सच का सामना कर पाऊँगा जो मैं बोलने जा रहा हूँ? यह सवाल मेरे अंदर एक युद्ध छेड़ रहा था।
मेरा हाथ बार बार अपने माथे पर जा रहा था। एक अजीब सी झिझक मुझे बार बार रोक रही थी। "अगर मम्मी ने मुझे गलत समझा तो? अगर उन्होंने मुझे घर से ही निकाल दिया तो?" ये विचार किसी ज़हरीले सांप की तरह मेरे दिमाग में घूम रहे थे। योजना तो तैयार थी, पर उस योजना को हकीकत में बदलने के लिए जो कलेजा चाहिए था, वह जैसे कहीं खो गया था।
मैं दुकान के सामानों को बिना मतलब ही इधर उधर खिसका रहा था, बस इसलिए ताकि मेरा ध्यान उन विचारों से हट सके। पर जितना मैं भागने की कोशिश करता, उतना ही मेरा डर मुझे घेर लेता। मैं चाहकर भी खुद को यह यकीन नहीं दिला पा रहा था कि जो मैं करने जा रहा हूँ, वह सही है या गलत। बस एक ही चीज़ साफ़ थी रास्ता कठिन था और वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
***
रात का खाना खत्म करने के बाद मम्मी ने किचन का सारा काम निपटाया और फिर हम दोनों कमरे में सोने चले गए। आज मम्मी ने बहुत ही महीन, गुलाबी रंग की नाइटी पहनी हुई थी, जिसमें वो बेहद खूबसूरत और खिलखिलाती हुई लग रही थीं। मैं अपने कुर्ते पजामे में बिस्तर पर लेटा हुआ था, लेकिन मेरा मन कहीं और था मैं अपने ही ख्यालों के भंवर में खोया हुआ था।
तभी मम्मी मेरे पास आकर लेटीं और उनका चुलबुलापन शुरू हो गया। उन्होंने शरारत भरी नज़रों से मुझे देखते हुए मेरे सिर पर हाथ फेरना शुरू किया। वो जानती थीं कि मैं सामान्य नहीं हूँ। उन्होंने थोड़ा करीब आकर, बड़े लाड़ और प्यार से मेरी आँखों में झाँकते हुए पूछा, "अरे ओ मेरे उदास शहज़ादे! आज क्या बात है? आज मेरा बच्चा इतना चुप चाप क्यों बैठा है? कहीं कोई परेशानी तो नहीं?"
उन्होंने मेरे गाल को धीरे से सहलाया और फिर एक प्यारी सी मुस्कान के साथ थोड़ा और करीब आकर फुसफुसाते हुए बोलीं, "मुझसे कुछ छुपा रहे हो क्या? देखो, अगर मुझसे कुछ कहना है तो कह दो, वरना मैं पूरी रात तुम्हें ऐसे ही तंग करती रहूँगी जब तक तुम मुस्कुरा न दो।" उनके इस चुलबुलेपन और बेपनाह प्यार ने माहौल को इतना हल्का और आत्मीय बना दिया कि मेरा मन चाहकर भी अपनी बात छुपा नहीं पा रहा था। उनकी आँखों में मेरे लिए वो बेइंतहा फिक्र और प्यार देखकर मेरा दिल पिघलने लगा।
मैंने एक फीकी सी मुस्कान के साथ अपनी नज़रें चुराते हुए कहा, "बस ऐसे ही मम्मी... कुछ खास नहीं।"
मेरे "कुछ खास नहीं" कहने पर मम्मी ने अपनी आँखें सिकोड़ीं और एक मासूम सा मुँह बनाकर मुझे घूरने लगीं। उन्होंने मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों के बीच थाम लिया और बिल्कुल एक छोटे बच्चे की तरह लाड़ जताते हुए बोलीं, "अच्छा? कुछ खास नहीं? और ये जो चेहरा लटका हुआ है, ये भी कुछ खास नहीं है? मुझसे झूठ मत बोलो, मैं तुम्हारी माँ हूँ, तुम्हारी आँखों में देखकर ही समझ जाती हूँ कि मेरे बच्चे के मन में कुछ चल रहा है।"
उन्होंने मेरे माथे को चूमते हुए और धीरे धीरे सहलाते हुए बड़े ही प्यार से कहा, "चलो अब जल्दी से बताओ, क्या बात है? अगर नहीं बताओगे तो मैं नाराज़ हो जाऊँगी और फिर तुम्हें बिल्कुल प्यार नहीं करूँगी। बोलो, क्या हुआ है मेरे प्यारे बच्चे को?"
मैंने कहा, "रहने दो मम्मी... न बताने से तो शायद आप नाराज़ न हो, पर लगता है कि बता दिया तो ज़रूर नाराज़ हो जाओगी।"
मम्मी बोलीं, "बताओ बेटा, मैं नाराज़ नहीं होऊंगी।"
मैंने कहा, **"मम्मी... वो... दरअसल बात कुछ ऐसी है कि मैं समझ नहीं पा रहा कि कैसे कहूँ। मुझे डर लग रहा है कि कहीं आप मुझे गलत न समझ लें या मुझसे नाराज़ न हो जाएँ।"** मेरी आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी और मैं उनकी आँखों में देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मेरा गला सूख रहा था और दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि मुझे लग रहा था जैसे वे मेरे कानों में सुनाई दे रही हों।
मम्मी ने मेरी घबराहट को भांप लिया। उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में और भी मजबूती से थाम लिया और बहुत ही कोमल स्वर में बोलीं, **"अरे पागल, डर कैसा? मैं तुम्हारी माँ हूँ। दुनिया की कोई भी बात हो, तुम मुझसे क्यों डर रहे हो? जो भी है, बिना डरे कह दो। मैं वादा करती हूँ कि मैं नाराज़ नहीं होऊँगी।"**
उनका यह आश्वासन सुनकर एक पल के लिए मुझे हिम्मत मिली, लेकिन अगले ही पल मेरा मन फिर से उसी कश्मकश में फंस गया। मैं सोच रहा था कि क्या मैं वाकई वो सब कह पाऊँगा जो मेरे दिमाग में चल रहा है? क्या मैं उन्हें वो सच बता पाऊँगा जो शायद हमारे रिश्ते की परिभाषा ही बदल दे? मेरा हाथ कांप रहा था और मैं बस उनके स्पर्श को महसूस करते हुए उस सच को अपने होंठों तक लाने की कोशिश कर रहा था जो मेरे अंदर एक तूफान की तरह उठ रहा था।
मैंने मम्मी की आँखों में देखते हुए अपनी आवाज़ को थोड़ा और धीमा और गहरा कर लिया। मैं जानता था कि मैं किस रास्ते पर चल रहा हूँ, लेकिन मेरा लक्ष्य साफ़ था। मैंने धीरे से उनका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, **"मम्मी,मै सोच रहा था कि अंकल का अब घर आना जाना कम हो गया है... क्या आप उन्हें याद नहीं करतीं? मतलब, मेरा मतलब है कि वो भी तो आपको बहुत पसंद करते थे, और आप भी तो उन्हें पसंद करती थीं ना ,फिर add अब क्यों नहीं आते वो?"**
मम्मी के चेहरे पर एक पल के लिए एक अजीब सी चमक आई, जो तुरंत ही शर्मिंदगी में बदल गई। उन्होंने अपनी नज़रें चुरा लीं और एक लंबी साँस भरते हुए बोलीं, **"रवि, तू ये क्या बातें कर रहा है? वो सब पुरानी बातें हैं। अब वो नहीं आते, तो क्या हुआ? बेटा... सच तो ये है कि मैं नहीं चाहती थी कि तुझे कभी बुरा लगे। मुझे डर था कि अगर वो यहाँ आए और हमारे बीच वो सब हुआ जो पहले हुआ करता था, तो शायद तू मुझे अलग नज़र से देखने लगेगा। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से तेरे मन में मेरे लिए कोई गलत विचार आए। इसलिए मैंने ही उन्हें मना कर दिया कि वो अब यहाँ न आएँ। तेरे लिए तो बेटा, मैं कुछ भी कुर्बाानी देने को तैयार हूँ।"**
मैंने हार नहीं मानी। मैं थोड़ा और करीब आया, उनके और भी करीब, ताकि मेरी मौजूदगी का अहसास उन्हें पूरी तरह महसूस हो। मैंने उनके कान के पास झुककर बहुत ही कोमल स्वर में कहा, **"पर मम्मी, क्या आपको सच में उनकी कमी महसूस नहीं होती? वो जो नज़दीकियाँ थीं, वो जो प्यार था... क्या वो सब बस एक सपना था?"**
मम्मी का चेहरा लाल हो गया। वे मेरी बातों के पीछे के इरादे को पूरी तरह तो नहीं समझ पा रही थीं, लेकिन उन्हें अपनी भावनाओं की हलचल साफ़ महसूस हो रही थी। उन्होंने मेरा हाथ झटकने की कोशिश की, पर उनके हाथ में वो ज़ोर नहीं था। उन्होंने एक गहरी साँस ली और मेरी आँखों में देखते हुए बड़े ही भावुक और दृढ़ स्वर में कहा, **"नहीं रवि... अब मुझे किसी और की ज़रूरत नहीं है। अब तू है ना मेरा ख्याल रखने के लिए, मेरा साथ देने के लिए। मुझे किसी और की क्या ज़रूरत?"**
उनका यह कहना कि 'अब तू है ना मेरा ख्याल रखने के लिए', मेरे अंदर एक अजीब सी उत्तेजना और जीत का अहसास जगा गया। उनके इस वाक्य ने अनजाने में ही मुझे वो जगह दे दी थी जिसकी मुझे तलाश थी। अब खेल और भी गहरा होने वाला था।
"अब तू है ना मेरा ख्याल रखने के लिए" यह वाक्य सिर्फ एक माँ का अपने बेटे के प्रति भरोसा ही नहीं , पूर्ण समर्पण की भावना से ओत प्रोत था।"पर मेरे मन में तो कुछ और ही था न, और वो थी मेरे ,मम्मी और अंकल के बीच threesom की भावना।
मैंने धीरे से अपना हाथ उनके चेहरे से नीचे खिसकाते हुए उनके कंधे पर रखा। उनकी साँसें अब तेज़ हो चली थीं और उनके शरीर में एक हल्की सी थरथराहट महसूस हो रही थी। मैंने उनकी आँखों में आँखें डालकर, बेहद धीमी और गहरी आवाज़ में कहा, **"मम्मी, आप मेरे लिए इतना कुछ करने को तैयार हैं... पर क्या आप जानती हैं कि आपका ये ख्याल रखना मेरे लिए क्या मायने रखता है? आप कहती हैं कि आपको किसी और की ज़रूरत नहीं है, पर मुझे पता है आप ये सिर्फ मेरी खुशी के लिए कह रही हैं क्योंकि आप मुझे बहुत प्यार करती हैं,मम्मी आप मेरे लिए इतना त्याग कर सकती हो तो मेरा भी तो फर्ज है कि मैं भी आप की इच्छाओं का ख्याल रखूँ, मम्मी मैं जनता हु के आप के दिल में अंकल के प्रति सम्मानजनक जगह है और मैं नही चाहता कि आप अपनी इच्छाओं का गला घोंट दो**
मम्मी ने अपनी पलकें झुका लीं, जैसे वो सच का सामना करने से डर रही हों। उनका चेहरा शर्म से सुर्ख हो चुका था। मैंने उनके और करीब झुकते हुए उनके कान के पास फुसफुसाया, **"अगर आप मेरे लिए इतना त्याग कर सकती हैं, तो क्या मैं आपको वो सब नहीं दे सकता जो आपको खुशी दे सके? मैं चाहता हूँ कि आप फिर से वही महसूस करें जो आप अंकल के साथ करती थीं... पर इस बार, मैं भी आपके साथ रहूँगा। मैं आपको वो सब दूँगा जो आपको चाहिए।"**
मम्मी के होंठ हल्के से काँपे। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया, बस एक गहरी और भारी साँस ली। उनके शरीर की ढीली पड़ती पकड़ इस बात का सबूत थी कि उनका मन अब मेरी बातों के आगे हार मान रहा था। सैयद,उनके अंदर का कोई दबा हुआ अहसास अब बाहर आने को बेताब था।
मैंने उनके कंधे पर अपनी पकड़ थोड़ी मज़बूत की और महसूस किया कि उनका शरीर अब पूरी तरह से मेरी छुअन के प्रति संवेदनशील हो चुका था। मैंने उनके माथे को चूमते हुए कहा, **"मम्मी, आज से आपको कोई भी कमी महसूस नहीं होने दूँगा। मैं आपका ख्याल रखूँगा... बिल्कुल वैसे ही जैसे आप चाहती हैं।"**
कमरे में सन्नाटा था, लेकिन दोनों की तेज़ होती साँसों की आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी। खेल अब सिर्फ बातों तक सीमित नहीं रहा था, अब भावनाओं और इच्छाओं का एक ऐसा भंवर शुरू होने वाला था जिससे वापस लौटना नामुमकिन था।
मम्मी ने मेरी आँखों में देखा , शायद उनको मेरी आँखों में अब सिर्फ एक बेटे का प्यार नहीं , बल्कि एक पुरुष की तीव्र चाहत और अधिकार दिखाई दे रहा था। मेरा हाथ अपने कंधे पर महसूस करके उनकी सांसें और उखड़ने लगीं।
मैने आगे बढ़ते हुए कहा, **"मम्मी, ख्याल रखने का मतलब सिर्फ ज़रूरतें पूरी करना नहीं होता... ख्याल रखने का मतलब होता है आपको उस सुकून में ले जाना जहाँ आप खुद को पूरी तरह भूल जाएँ। जहाँ आप सिर्फ और सिर्फ महसूस करें।"**
मम्मी ने कांपती आवाज़ में पूछा, "तू... तू क्या कहना चाहता है रवि?"
रवि ने उनके और करीब आकर उनके कान के पास झुककर फुसफुसाया, **"मैं चाहता हूँ कि हम तीनों मिलकर एक ऐसा रिश्ता बनाएँ, जहाँ कोई पर्दा न हो, कोई शर्म न हो। मैं चाहता हूँ कि आप अंकल के साथ और मेरे साथ, उस चरम सुख को महसूस करें जिसका सपना शायद हम तीनों ने देखा है।"**
मैंने मम्मी के चेहरे पर छाई उस घबराहट को महसूस किया। उनके होंठ थरथरा रहे थे और आँखों में एक अजीब सा डर और संकोच था। उन्होंने हड़बड़ाते हुए मुझसे कहा, **"ये... ये तू क्या बोल रहा है रवि? पागल हो गया है क्या तू?"**
उनकी इस बात पर मेरे चेहरे पर एक गहरी और मदहोश कर देने वाली मुस्कान आ गई। मैंने उनके और करीब जाकर, उनकी आँखों में सीधे देखते हुए बड़े ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, **"मम्मी, मैं आपको एक ऐसा सच बताता हूँ जिसका शायद आपको अंदाज़ा नहीं है। मुझे आपके और अंकल के बीच के उन गुप्त और गहरे संबंधों के बारे में सालों से पता है। सच तो यह है कि पिछले कुछ महीनों में मैंने आप दोनों को कई बार उस चरम सुख में डूबते हुए देखा है।"**
मम्मी का चेहरा शर्म से एकदम लाल पड़ गया। उन्हें तो अब तक यही लग रहा था कि मैने सिर्फ एक बार ही उन्हें अंकल के साथ देखा है। मैंने अपनी बात जारी रखी, **"क्या बताऊं मम्मी? कई बार मुझे ऐसा लगता था कि अंकल जानबूझकर मुझे दिखाते हुए आपके साथ सब कुछ कर रहे हैं। और मेरी यह बात सिर्फ मेरा वहम नहीं थी। मुझे याद है वो दिन जब अंकल ने मुझे देखते हुए ही आपको पकड़ लिया था, और दूसरी बार जब उन्होंने जानबूझकर कमरे की सारी लाइटें जला दी थीं ताकि मैं आपकी और उनकी उस क्रिया को पूरी स्पष्टता से देख सकूँ। मुझे यकीन है कि उन्हें भी इस बात से एक अलग ही उत्तेजना मिलती थी कि कोई उन्हें देख रहा है, और उस अहसास से उनकी प्यास और उत्तेजना कई गुना बढ़ जाती थी।"**
मैंने उनके कांपते हुए हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और बड़े ही नशीले अंदाज़ में उनके कान के पास फुसफुसाया, **"मम्मी, सच तो यह है कि मैं भी वही चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि जब मैं आपको प्यार करूँ, जब मैं आपके शरीर की गहराइयों में उतरूँ, तो कोई पास बैठकर हमें निहार रहा हो। मैं महसूस करना चाहता हु कि वो एहसास किस्सा होता है जब आपको कोई मिलाप करते देख रहा होता है। मम्मी, आप तो जानती हैं कि अंकल के सिवा इस दुनिया में कोई ऐसा नहीं जिस पर हम इतना भरोसा कर सकें। इसलिए प्लीज मम्मी, मेरी इस ख्वाहिश को मान जाइए।"**
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, मैं चाहता हूँ कि यह हमारे आने वाले समय का एक नया अध्याय बने। एक ऐसा रिश्ता जो हर रात, हर पल हमारे बीच की सारी मर्यादाओं को तोड़कर हमें एक नए और बेबाक अहसास से जोड़ दे।"**
मम्मी के चेहरे पर डर, शर्म और संकोच के मिले जुले भाव आ गए। वो बिल्कुल बेबस दिख रही थी, लेकिन उसकी वो बेबसी मुझे पागल कर रही थी।
उसने कांपती हुई आवाज़ में मुझसे कहा *'बेटा नहीं, ऐसा नहीं कर सकती। तेरे अंकल क्या सोचेंगे कि माँ बेटा में कैसे संबंध हैं... चोदने वाले?'*
जब उसके मुँह से वो शब्द निकले, तो मेरा पूरा शरीर उत्तेजना से भर गया। वो खुद को रोक रही थी, समाज का डर दिखा रही थी, लेकिन उसके शब्द कुछ और ही कहानी कह रहे थे। उसने आगे कहा *'और उनको ये सुनकर कैसा लगेगा कि कैसी औरत है जो एक ही समय पर अपने बेटे और यार के साथ सोना चाहती है!'*
उसकी ये बातें सुनकर मुझे लगा जैसे उसने खुद ही अपनी सारी पाबंदियाँ तोड़ दी हों। वो एक तरफ तो डर रही थी, लेकिन दूसरी तरफ वो अपनी उस गंदी इच्छा को भी स्वीकार कर रही थी। उसकी वो शर्म और वो गंदी बातें मुझे और भी ज़्यादा उसकी तरफ खींच रही थीं। मुझे समझ आ गया कि मेरी माँ के अंदर एक ऐसी औरत छिपी है जो मर्यादाओं की परवाह नहीं करती, जो बस अपनी प्यास बुझाना चाहती है।***
"उसकी बातें सुनकर मुझे एक पल के लिए लगा जैसे वो सच में डर रही है, लेकिन मैं जानता था कि ये सिर्फ एक दिखावा है, एक आखिरी कोशिश है खुद को बचाने की। मैंने उसकी आँखों में सीधे देखते हुए अपना तर्क उसके सामने रख दिया। मैंने उसे वो सच बताया जो हम तीनों के बीच एक गहरा राज बन चुका है।
मैंने बड़े शांत लेकिन भारी स्वर में उससे कहा, *'मम्मी, ये अंकल और समाज का डर दिखाना बंद करो। सच तो ये है कि अंकल को सब पता है हमारे और आपके बीच के इस संबंध के बारे में। वो सब जानते हैं कि हम क्या कर रहे हैं।'*
मैंने देखा कि उसके चेहरे पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। मैंने आगे बढ़ते हुए उसकी बात का जवाब दिया, *'जब हम तीनों एक दूसरे का राज जानते हैं, जब हम तीनों को पता है कि असल में क्या चल रहा है, तो फिर ये दिखावा करने की क्या जरूरत है? इसमें अब छुपाने जैसा कुछ बचा ही नहीं है।'*
मेरी ये बात सुनकर उसके चेहरे की वो शर्म और डर अब धीरे धीरे एक अजीब सी राहत और उत्तेजना में बदलने लगा था। उसे समझ आ गया था कि अब भागने का कोई रास्ता नहीं है, और शायद... शायद वो अब इस सच को स्वीकार करने के लिए तैयार थी।"
"उसकी आँखों में वो खौफ और उलझन देख कर मेरा दिल तो पिघल ही रहा था, लेकिन मेरा जुनून उससे कहीं ज्यादा गहरा था। मैं बस और इंतज़ार नहीं कर पा रहा था। मैंने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसके कांपते हुए हाथों को अपने मजबूत हाथों में थाम लिया। उसकी त्वचा इतनी कोमल और गर्म थी कि जैसे मेरे स्पर्श से ही उसमें बिजली दौड़ रही हो।
मैंने उसके हाथों को कसकर पकड़ा और झुककर उसकी आँखों में सीधे झाँका। उसकी आँखों में आँसू थे, पर उनमें एक अजीब सी चमक भी थी। मैंने बहुत ही धीमी और भारी आवाज़ में, लगभग फुसफुसाते हुए उससे उसकी रजामंदी मांगी:
*'मम्मी... बस एक बार... अपनी आँखें बंद मत करना। बस एक बार मुझे अपनी सहमति दे दो। मुझे तुम्हारी वो सारी पाबंदियाँ नहीं चाहिए, मुझे बस तुम चाहिए। क्या तुम वाकई इस सच को स्वीकार नहीं कर पाओगी? क्या तुम वाकई मेरे और अंकल के साथ इस पागलपन को जीने से डर रही हो? बस एक बार हाँ कह दो...'*
उसकी आँखों में मैंने वो पल देखा जहाँ उसकी सारी मर्यादाएँ हार रही थीं। वो मेरी आँखों में देख रही थी, और मैं उसके उस मौन जवाब का इंतज़ार कर रहा था जो उसकी रजामंदी बन जाए।"
मम्मी ने एक गहरी और लंबी सांस ली। उनके शरीर की थरथराहट अब डर से नहीं, बल्कि एक दबी हुई उत्तेजना से थी। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं मेरे कंधे को अपने हाथ से और ज़ोर से दबाते हुए कहा, **"अगर तुम्हारी यही इच्छा है... तो मैं अपनी सारी मर्यादाएँ तुम्हारे कदमों में रख देती हूँ। मुझे बस तुम्हे खुश रखना है।"**
यह सुनते ही मेरे अंदर जैसे ज्वालामुखी फट पड़ा। मैने एक झटके में मम्मी को अपनी ओर खींचा और अपने होंठ उनके होंठो पर रख दिए "


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