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Incest परिवार के गंदे राज़
#1
“परिवार के गंदे राज़”


रसूलपुर।
बाहर से देखने पर यह साधारण सा गाँव लगता था—कच्ची सड़कें, पुराने पीपल, लहलहाते खेत और शाम को जलने वाली लालटेनें। लेकिन इंटरनेट पर यह गाँव किसी और नाम से बदनाम था। लोग फुसफुसाकर कहते थे कि यहाँ के बड़े परिवारों के अंदर ऐसी चीजें चलती हैं जो बाहर वाले कल्पना भी नहीं कर सकते। कोई सबूत नहीं था, लेकिन अफवाहें सालों से जिंदा थीं।
चौधरी परिवार उन्हीं में से एक था। हवेली पुरानी थी, दीवारें मोटी थीं, और अंदर जितना दिखाया जाता था उससे कहीं ज्यादा छिपा था।

परिवार का मुखिया था बाबा रामप्रसाद चौधरी। सत्तर साल के करीब, लेकिन शरीर अभी भी डरावना मजबूत। छह फुट का कद, चौड़े कंधे, सफेद बालों वाला मोटा सीना, बाँहें नसों वाली। उनका लंड परिवार की महिलाओं के बीच किंवदंती था—मोटा, लंबा, भारी। बाबा कम बोलते थे, लेकिन जब बोलते थे तो पूरा घर चुप हो जाता था। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक रहती थी, जैसे वे हर चीज जानते हों।
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अमन के पिता थे सुरेश चौधरी। पैंतालीस साल के। कद छह फुट के करीब, शरीर मजबूत और मेहनत से कसा हुआ। खेतों में काम करने के कारण उनके हाथ कठोर थे, कंधे चौड़े, छाती घनी। उनका लंड बाबा जितना नहीं था, लेकिन मोटा और भारी था। सुरेश घर में कम बोलते थे। ज्यादातर समय खेत या बाहर रहते। पत्नी सुशीला के साथ उनके संबंध सामान्य लगते थे, लेकिन अमन कभी-कभी रात को उनके कमरे से दबी आवाजें सुन लेता था। सुरेश अमन को सख्ती से देखते थे। “मर्द बन, लड़का मत बन,” यही उनकी सबसे आम सलाह थी।
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चाचा रमेश चौधरी। बाबा के छोटे भाई। बयालीस साल के। शरीर थोड़ा मोटा, लेकिन ताकतवर। गंजा सिर, मोटी मूंछें, और भारी आवाज। उनका लंड परिवार में चर्चा का विषय रहता था—बहुत मोटा। रमेश की पहली पत्नी मर चुकी थी। अब उनकी दूसरी पत्नी सरला थी। रमेश घर में अक्सर हँसते-बोलते रहते, लेकिन उनकी निगाहें महिलाओं पर कभी-कभी बहुत देर तक ठहर जातीं।
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अमन की माँ सुशीला। पैंतालीस साल की। गेहुँआ रंग, भारी और लटकते स्तन जो साड़ी के नीचे हमेशा हिलते। स्तन इतने बड़े थे कि पल्लू कभी उन्हें पूरी तरह ढँक नहीं पाता। निप्पल गाढ़े भूरे और मोटे। कमर पर थोड़ी चर्बी, लेकिन गाँड गोल, मुलायम और बड़ी। जब वे झुकतीं तो दरार साफ झलक जाती। सुशीला अमन को बहुत लाड़ करतीं। “मेरा छोटा राजकुमार,” यही कहतीं।

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बड़ी बहन रेणु। बाईस साल। गोरी, लंबे काले बाल, सख्त और ऊपर उठी हुई छाती, पतली कमर, चौड़े कूल्हे। उसकी चूत के बाल घने और काले थे। रेणु शांत रहती, लेकिन उसकी आँखों में एक तेज चमक थी। वह परिवार की सबसे होशियार औरत लगती थी। अमन को वह हमेशा कुछ ज्यादा ही ध्यान से देखती।
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दूसरी बहन कविता। बीस साल। शरीर भरा हुआ, बड़े नरम स्तन, मोटी गाँड। चुप रहने वाली, लेकिन निगाहें तेज।
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चाची कमला। रमेश की पहली पत्नी की बहन, अड़तीस साल की, विधवा। शरीर अभी भी भरा हुआ। बड़े ढीले स्तन, मोटी गाँड। वह अमन को “बेटा” कहतीं, लेकिन उसका हाथ कभी-कभी उसकी पीठ पर जरूरत से ज्यादा देर रुक जाता।
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चचेरी बहन मीना। उन्नीस साल। पतली कमर, सख्त स्तन, गोल कूल्हे। मुस्कान में चंचलता थी।

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परिवार में और भी थे—रमेश और सरला का बेटा गौरव, बाईस साल का। शरीर मजबूत, कद लंबा, लंड मोटा। गौरव शहर में कॉलेज जाता था, लेकिन छुट्टियों में घर रहता। अमन से वह थोड़ी ऊँचाई से बात करता था। “तू अभी बच्चा है,” यही कहता।
अमन खुद अठारह साल का था। बारहवीं कक्षा में। कद पाँच फुट सात इंच, शरीर दुबला-पतला, कंधे पतले, छाती पर बालों की शुरुआत मात्र। उसका लंड आराम में साढ़े चार इंच, खड़ा होने पर सात इंच—अभी भी परिवार के पुरुषों के सामने छोटा लगता। वह भोला था। कॉलेज जाता, दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलता, घर आकर पढ़ाई करता। सेक्स के बारे में सिर्फ अस्पष्ट सी बातें सुनता। घर की औरतों के शरीर को देखकर शर्म महसूस करता, इच्छा नहीं।
उसकी जिंदगी बहुत सीधी थी। सुबह उठना, नहाना, कॉलेज जाना, शाम को घर लौटना, बाबा को प्रणाम करना, माँ के हाथ का खाना खाना, और सो जाना। दुनिया छोटी थी—कॉलेज, मैदान, हवेली।
एक मंगलवार की बात है। कॉलेज की छुट्टी जल्दी हो गई। अमन साइकिल लेकर घर आया। आँगन खाली था। बाबा और पिता खेत गए हुए थे। चाचा रमेश बाजार गए थे। गौरव अपने कमरे में था। अमन ने किताबें रखीं और पानी पीने रसोई की तरफ बढ़ा। तभी हवेली के पिछले हिस्से से आवाज आई—कोठरी की तरफ से।
औरत की दबी सिसकारी और मर्द की भारी साँसें।
अमन रुक गया। पैर अपने आप बढ़े। कोठरी का दरवाजा अधखुला था। उसने साँस रोककर झाँका।
अंदर उसकी माँ सुशीला थीं। साड़ी कमर तक उठी हुई। भारी स्तन बाहर, निप्पल सख्त। उनके पीछे एक मर्द खड़ा था—गाँव का ही कोई आदमी, जिसे अमन कभी-कभी मजदूरों के साथ देखता था। मर्द की पैंट खुली थी। उसका मोटा लंड सुशीला की चूत में जोर-जोर से अंदर-बाहर हो रहा था। सुशीला के हाथ दीवार पर टिके थे। गाँड हिल रही थी। मुँह से आवाजें निकल रही थीं—“जोर से… हाँ… और अंदर…”
अमन की साँस अटक गई। शरीर काँपने लगा। उसका लंड अपनी इच्छा के खिलाफ सख्त हो गया। वह भागना चाहता था, लेकिन हिल नहीं पाया। मर्द ने कमर पकड़कर और जोर लगाया। सुशीला की सिसकारी तेज हो गई।
अमन ने आँखें मूंद लीं और काँपते हुए अपने कमरे में पहुँच गया। दरवाजा बंद करके बिस्तर पर गिर पड़ा। आँखों के सामने माँ के स्तन, उनकी हिलती गाँड और उस मर्द का लंड घूम रहा था। शर्म, डर, और एक अजीब सी गर्मी उसके शरीर में फैल रही थी।
रात भर वह सो नहीं पाया।
सुबह जब माँ आईं और सामान्य स्वर में बोलीं, “अमन उठ जा… कॉलेज का समय हो गया,” तो अमन उनकी आँखों में नहीं देख पाया। सुशीला ने उसके बाल सहलाए। उंगलियाँ गर्दन तक गईं। अमन का शरीर सिहर उठा।
उस दिन कॉलेज में वह बिल्कुल चुप रहा। दोस्तों ने पूछा तो टाल गया। मैदान में खेलते समय भी उसका ध्यान नहीं था।
शाम को घर लौटा तो रेणु आँगन में बैठी थी। उसने अमन को देखते ही सिर उठाया। आँखों में वह तेज चमक थी।
“तुमने कुछ देखा है न?” उसने बहुत धीमी आवाज में पूछा।
अमन का चेहरा सफेद पड़ गया। रेणु ने और कुछ नहीं कहा। बस इतना बोली, “डरो मत। इस घर में बहुत कुछ होता है। तुम अभी भोले हो। लेकिन भोलापन यहाँ नहीं चलेगा।”
उसने अमन के कंधे पर हाथ रखा। उंगलियाँ थोड़ी देर दबकर रही।
“मैं तुम्हें सिखाऊँगी। धीरे-धीरे। दिमाग से, शरीर से… हर तरह से। बस सब्र रखना।”
रेणु उठकर चली गई।
अमन वहीं खड़ा रह गया। उसके मन में माँ का दृश्य और रेणु के शब्द एक साथ घूम रहे थे। पहली बार उसने महसूस किया कि हवेली की दीवारें जितनी मोटी दिखती हैं, उतनी मजबूत नहीं हैं। और उसकी भोली जिंदगी अब खत्म होने वाली है।
बाप खेत से लौटे तो अमन ने उनकी तरफ देखा। सुरेश सामान्य लग रहे थे। जैसे कुछ पता ही न हो। चाचा रमेश हँसते हुए आँगन में बैठे थे। गौरव अपने कमरे से निकला और अमन को देखकर बोला, “क्या हुआ छोरे, चेहरा उतर गया है?”
अमन ने कुछ नहीं कहा।
रात गहरी होती गई। हवेली के अंदर कई साँसें चल रही थीं। और अमन पहली बार समझ रहा था कि परिवार के गंदे राज़ अब उसे भी अपनी चपेट में लेने वाले हैं।

आँखें बंद करता तो माँ का ही दृश्य आ जाता—साड़ी कमर तक उठी हुई, भारी स्तन हवा में झूलते हुए, निप्पल सख्त, और उस मजदूर का मोटा लंड उनकी चूत में जोर-जोर से धंसता हुआ। सुशीला की सिसकियाँ कानों में गूँजतीं। अमन का अपना लंड बार-बार सख्त हो जाता। वह शर्म से काँपता, खुद को गालियाँ देता, फिर भी शरीर नहीं मानता। तकिया से मुँह दबाए वह लेटा रहा जब तक कि आसमान में हल्की रोशनी नहीं फैल गई।
सुबह पाँच बजे बाबा के कमरे से आवाज आई। रामप्रसाद रोज़ की तरह उठ चुके थे। अमन ने भी बिस्तर छोड़ दिया। नहाने गया तो आईने में अपना चेहरा देखा—आँखें सूजी हुई, चेहरा थका हुआ। लंड अभी भी हल्का सख्त था। उसने ठंडे पानी से नहाया, लेकिन गर्मी अंदर से नहीं गई।
नाश्ते के समय पूरा परिवार आँगन में बैठा था। बाबा चारपाई पर बैठे तंबाकू लगा रहे थे। पिता सुरेश चुपचाप चाय पी रहे थे। उनके मजबूत हाथ में गिलास छोटा लग रहा था। चाचा रमेश हँसते हुए गौरव से कुछ बात कर रहे थे। गौरव ने अमन को देखते ही कहा, “अरे छोरे, रात भर जागा क्या? आँखें लाल हो रखी हैं।”
अमन ने सिर झुका लिया। माँ सुशीला रसोई से निकलकर आईं। साड़ी का पल्लू ठीक से डाला हुआ था, लेकिन स्तनों का भारीपन छुप नहीं पा रहा था। उन्होंने अमन के सामने थाली रखी और उसके बाल सहलाए। उंगलियाँ गर्दन तक गईं।
“आज मन नहीं है?” सुशीला ने पूछा। आवाज बिल्कुल सामान्य थी। जैसे कल कोठरी में कुछ हुआ ही न हो।
अमन ने जवाब नहीं दिया। रेणु उसके ठीक सामने बैठी थी। उसने धीरे से सिर उठाया और अमन की आँखों में देखा। कोई मुस्कान नहीं, सिर्फ एक शांत समझ। जैसे कह रही हो—मैं जानती हूँ।
पिता सुरेश ने अचानक बात की। “अमन, कॉलेज से वापस आकर खेत में आजा। कुछ काम है।” आवाज सख्त थी। अमन ने सिर हिलाया। सुरेश की निगाह कुछ पल के लिए उस पर टिकी रही—जैसे वे कुछ भाँप रहे हों। फिर उन्होंने चाय खत्म की और उठ गए।
कॉलेज में अमन बिल्कुल अलग था। दोस्तों के बीच बैठकर भी वह चुप रहा। जब वे लड़कियों की बातें करने लगे—कौन कितनी गरम है, किसकी क्या अदा है—तो अमन पहले की तरह शर्म से दूर नहीं हुआ। वह चुपचाप सुनता रहा। दिमाग में रेणु के शब्द घूम रहे थे—“भोलापन यहाँ नहीं चलेगा।” पहली बार उसने महसूस किया कि दोस्तों की बातें अब उसे अजीब लग रही हैं। वे सिर्फ कल्पना कर रहे थे। उसने तो अपनी माँ को असली हालत में देख लिया था।
छुट्टी में क्रिकेट के मैदान में वह विकेट के पास खड़ा रहा। गेंद आई तो उसने बल्ला चलाया, लेकिन दिमाग कहीं और था। बार-बार कोठरी का दृश्य आँखों के सामने आ जाता। माँ की गाँड कैसे हिल रही थी, मर्द के हाथ कैसे उनकी कमर पर दबे थे… अमन का लंड पैंट में हल्का तन गया। वह झेंप गया और मैदान से अलग हो गया।
शाम को कॉलेज से लौटा तो सीधे खेत की तरफ चला गया। पिता सुरेश वहाँ पहले से मौजूद थे। शरीर पर पसीना चमक रहा था। कमीज के बटन खुले हुए थे, छाती के घने बाल और मजबूत मांसपेशियाँ साफ दिख रही थीं। सुरेश ने अमन को देखते ही कहा, “इधर आ। यह रस्सी पकड़।”
अमन ने रस्सी पकड़ी। दोनों पिता-पुत्र चुपचाप काम करने लगे। कुछ देर बाद सुरेश ने अचानक पूछा, “रात को नींद नहीं आई तुझे?”
अमन का हाथ रुक गया। “नहीं… यानी… थोड़ी देर जागा था।”
सुरेश ने उसकी तरफ देखा। आँखों में वही सख्ती थी। “मर्द को रात की नींद पूरी रखनी चाहिए। कमजोरी दिखेगी तो घर वाले भी कमजोर समझेंगे।” उन्होंने फिर से काम शुरू कर दिया। “और हाँ, घर की औरतों को ज्यादा घूर मत। आँखें झुकाकर रह। समझा?”
अमन ने सिर हिलाया। पिता की बात सुनकर उसके मन में और उलझन बढ़ गई। क्या सुरेश को माँ के बारे में कुछ पता है? या वे सिर्फ सामान्य सलाह दे रहे हैं? अमन तय नहीं कर पा रहा था।
घर लौटे तो शाम के खाने का समय हो चुका था। चाचा रमेश आँगन में बैठे हुए थे। उनकी मोटी मूंछों पर मुस्कान थी। उन्होंने अमन को देखकर कहा, “अर्रे भतीजा, आज चेहरा उतरने का क्या कारण है? कोई कॉलेज वाली याद आ रही है क्या?” फिर जोर से हँसे। गौरव भी साथ में हँस दिया। अमन ने कुछ नहीं कहा।
रात का खाना खत्म होने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए। अमन अपने कमरे में लेटा तो दिमाग फिर से उलझ गया। तभी दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई। रेणु अंदर आई। हाथ में छोटी लालटेन थी। उसने दरवाजा बंद किया।
“सोया नहीं?” उसने पूछा।
अमन उठकर बैठ गया। रेणु बिस्तर के किनारे आकर बैठ गई। कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “तुमने माँ को देखा। वह मजदूर… उसका नाम भोलू है। खेतों में कभी-कभी आता है। माँ उससे सालों से मिलती है।”
अमन की आँखें फटी की फटी रह गईं। “सालों से…?”
रेणु ने सिर हिलाया। “हाँ। बाबा जानते हैं। पिता भी जानते हैं। सब जानते हैं। बस कोई बोलता नहीं।” उसने अमन की तरफ देखा। “यह घर ऐसा ही है। यहाँ शरीर की भूख को पाप नहीं माना जाता। बस छुपाकर रखा जाता है। बाहर वाले को पता नहीं चलना चाहिए।”
अमन का गला सूख गया। “पिता जानते हैं… और फिर भी?”
“पिता के भी अपने राज़ हैं,” रेणु ने शांत स्वर में कहा। “चाचा रमेश के भी। गौरव के भी। हर मर्द के, हर औरत के। तुम अभी सिर्फ किनारे पर खड़े हो। अंदर आने के लिए दिमाग तेज करना होगा।”
उसने अमन का हाथ पकड़ा। उंगलियाँ उसकी हथेली पर धीरे से फिरीं। “कल रात तुम्हारा शरीर प्रतिक्रिया दे रहा था। शर्म मत करना। शरीर सच बोलता है। दिमाग झूठ बोलता है।”
अमन चुप रहा। रेणु ने अपना हाथ छुड़ाया और उठ खड़ी हुई।
“आज बस इतना ही। सो जाओ। कल रात फिर आऊँगी। तब तुम्हें और बताऊँगी—इस घर के मर्दों के बारे में, औरतों के बारे में… और अपने बारे में भी।”
वह दरवाजे तक गई, फिर मुड़ी। “एक बात याद रखना अमन। इस परिवार में जो भोला रहता है, वह सिर्फ देखा जाता है। जो समझदार बनता है, वह खुद देखने लगता है।”
रेणु चली गई।
अमन अकेला रह गया। कमरे में अँधेरा था। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। पहली बार उसने महसूस किया कि उसका बाप, चाचा, बाबा—सब इस गंदे चक्र के हिस्से हैं। माँ अकेली नहीं थी। और रेणु… रेणु तो जानबूझकर उसे इस चक्र के अंदर खींच रही थी।
उसने खिड़की से बाहर देखा। हवेली के पिछले हिस्से में कोठरी का दरवाजा बंद था। लेकिन अमन जानता था कि अंदर क्या हो चुका था। और अब वह यह भी समझने लगा था कि आगे और बहुत कुछ होने वाला है।
उसकी भोली दुनिया दरक रही थी। टुकड़े-टुकड़े होकर गिर रही थी। और रेणु उन टुकड़ों को अपने हाथों से उठा-उठाकर उसे एक नई तस्वीर दिखा रही थी—गंदी, खतरनाक, लेकिन सच्ची।
रात गहरी होती गई। अमन लेटा रहा। आँखें खुली थीं। दिमाग में एक नया सवाल घूम रहा था—पिता के अपने राज़ क्या हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—रेणु खुद इस खेल में कितनी गहराई तक है?
Fuckuguy
albertprince547;
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परिवार के गंदे राज़ - by Fuckuguy - 08-09-2026, 11:23 AM



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