06-09-2026, 03:58 PM
उस दिन के बाद से यह सिलसिला हर रात को चलने लगा। कभी एक बार, कभी दो बार और कभी कभी तो तीन तीन बार हमारी हवस का खेल चलता। हमारी भूख इतनी बढ़ गई थी कि अब सिर्फ रातें ही काफी नहीं थीं; कभी कभी तो दोपहर में भी हमारा मिलन हो जाता था, क्योंकि घर में सिर्फ मैं और मम्मी ही होते थे।हां,जब कभी कोई बहन या भाई आया होता तब थोड़ा सावधानी रखनी पड़ती ,जिससे शारीरिक संबंधों का सिलसिला पूरी तरह बंद तो नहीं होता काफी धीमा हो जाता।
नअंकल ने उस दिन के बाद घर आना बिल्कुल बंद कर दिया था।मुझे बाद में पता चला कि असल में, मम्मी ने ही उन्हें ये कहते हुए के रवि ने देख लिया है,तो अब उनको नहीं आना चाहिए, आने से मना कर दिया था। उन्हें इस बात की ज़रा भी भनक नहीं थी कि ,,, मेरा मम्मी को अंकल के साथ sex करते देख लेना ,फिर मम्मी को रूठने का बहाना करके इमोशनल ब्लैकमेल करके अपने नीचे लाने का masterplan मैंने और अंकल ने ही बनाया था। अंकल ने भी बहुत सब्र दिखाया और घर आना बंद कर दिया था। पर मैं इस बात के लिए अंकल का दिल से ऋणी था कि उन्हीं के कारण मैं मम्मी के साथ इस तरह के सेक्स संबंध बना पाया था। मैं यह बात उनसे मिलकर भी कहना चाहता था, पर अंकल से मेरी मुलाकात ही नहीं हो पा रही थी। शायद उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि मेरे और मम्मी के बीच अब किस हद तक संबंध बन चुके हैं और हमारी हवस अब अपने चरम पर पहुँच चुकी है।
सच पूछो तो कहीं न कहीं मेरे मन में थोड़ी सी बेईमानी भी थी एक ऐसा अहसास कि अंकल के न आने से मुझे मम्मी के इस सुलगते हुए जिस्म से अकेले खेलने का सौभाग्य मिल रहा है। पर फिर मेरे मन में एक ख्याल आया कि काश! एक बार अंकल से मुलाकात हो जाए।
सब कुछ एक तय रूटीन से चल रहा था। मेरा सुबह 8 बजे से 1 बजे तक कॉलेज जाना, मम्मी का पूजा पाठ करके घर संभालना और दुकान की देखभाल करना। दोपहर 1 से 3 बजे तक दुकान का शटर डाउन रहता था। फिर 3 बजे मैं दुकान पर जाता और दुकानदारी के साथ साथ पढाई करता, मम्मी घर के बाकी काम निपटाकर थोड़ा आराम करती थीं। रात को 8 बजे शटर डाउन होने के बाद रात का खाना ,उसके बाद सोने की तैयारी शुरू हो जाती और लगभग 9 बजे तक हम बिस्तर पर होते। बाकी तो मैं फिजिकल होने का हमारा रूटीन बता ही चुका हूँ।
उस दिन रविवार था। मैंने मम्मी से कहा, "मम्मी, मुझे थोड़ा घूमने जाना है।" मम्मी के 'हाँ' कहते ही मैंने अपनी बाइक उठाई और सीधे अंकल के पास पहुँच गया। अंकल को दफ्तर के ही प्रांगण में एक कमरा मिला हुआ था,अंकल मुझे देखकर बहुत खुश हुए। वो मुझसे ऐसे मिले जैसे किसी बच्चे से नहीं, बल्कि किसी बहुत गहरे राज़दार दोस्त से मिल रहे हों। उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, जैसे उन्हें पता हो कि मैं यहाँ सिर्फ घूमने के लिए नहीं आया हूँ।
अंकल ने चाय बनाई और पास की दुकान से गरमा गरम समोसे मंगवा लिए
अंकल ने चाय बनाई और पास की दुकान से गरमागरम समोसे मंगवा लिए। चाय पीते हुए अंकल ने मुस्कुराते हुए पूछा, "और सुनाओ ,कैसे हो दोस्त?"
मैंने हैरानी से अंकल की ओर देखा। पहले तो अंकल मुझे हमेशा 'बेटा' कहकर बुलाते थे, लेकिन आज वो मुझे 'दोस्त' कह रहे थे। मुझे यह सुनकर बहुत अच्छा लगा कि मुझसे लगभग तीन गुना उम्र के अंकल मुझे अपना दोस्त मान रहे हैं। शायद अंकल ने मेरे मन में चल रहे विचारों को पढ़ लिया था, क्योंकि उन्होंने तुरंत कहा, "हाँ रवि, अब हम अच्छे दोस्त हैं, क्योंकि अब हम सभी *विषयों* पर खुलकर डिस्कशन कर लेते हैं।" उनका इशारा साफ़ तौर पर सेक्स की तरफ था।
उनकी यह बात सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई और मैंने अपनी मुस्कुराहट से अपनी खुशी ज़ाहिर कर दी। अंकल ने मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए मेरे कंधे पर थपकी दी, जैसे वो मुझे यह एहसास दिला रहे हों कि अब हमारे बीच कोई पर्दा नहीं रहा।
अंकल ने मेरी आँखों में आँखें डालकर बड़े ही बेबाक अंदाज़ में पूछा, "और बताओ रवि, कुछ हुआ क्या मम्मी के साथ?"
मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के, एक शरारती मुस्कुराहट के साथ अंकल को सब कुछ विस्तार से बता दिया। मैंने उन्हें बताया कि कैसे उनके बनाए हुए प्लान के मुताबिक मम्मी पूरी तरह मेरे समर्पण में आ गईं और कैसे वो मेरे नीचे आकर पूरी तरह मेरी हो जाती हैं। मैं एक एक पल का वर्णन कर रहा था और अंकल पूरी उत्सुकता से मेरी बातें सुन रहे थे। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और वो बीच बीच में सुनकर मुस्कुरा रहे थे।
जैसे ही मेरी बात खत्म हुई, अंकल के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आई। उन्होंने जोश के साथ मेरी जांघ पर ज़ोर से थपकी दी और बोले, "वाह! ये हुई न मर्दों वाली बात! शाबाश मेरे शेर!" उनकी आवाज़ में एक तरह का गर्व था शायद इसलिए कि उनका प्लान कामयाब हो गया था, जैसे वो मम्मी पर मेरी पकड़ से बेहद खुश और संतुष्ट हों।
अंकल की उस शाबाशी ने मेरे अंदर एक अजीब सा जोश भर दिया था। मैंने थोड़ा रुककर, अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा और गहरा करते हुए कहा, "अंकल, सच कहूँ तो मम्मी के साथ जो मज़ा आता है, वो लाजवाब है। लेकिन कभी कभी मुझे ऐसा महसूस होता है कि जैसे कुछ कमी है। जैसे कोई चीज़ अधूरी रह गई हो।"
अंकल ने अपनी चाय का आखिरी घूँट भरा और मेरी तरफ झुकते हुए बोले, "कमी? कैसी कमी रवि? क्या मम्मी तुम्हें पूरा नहीं दे पा रही हैं?"
मैंने अपनी उत्सुकता को रोकते हुए सीधे पूछा, "अच्छा अंकल, पहले सच सच बताइए... आपको मम्मी में सबसे ज्यादा क्या पसंद है?" अंकल ने एक गहरी साँस ली, जैसे वो किसी बहुत ही खूबसूरत याद में खो गए हों। उन्होंने अपनी चाय का कप मेज पर रखा और एक गहरी नज़र मुझ पर डालते हुए बोलना शुरू किया। उनकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और प्रशंसा थी।
"रवि, अब हम दोनों दोस्त बन चुके हैं,तो मै तुमसे कुछ भी छिपाऊंगा नहीं। 20--22 सालों में मैने पता नहीं कितनी औरतों को भोगा है पर किसी में भी वो बात नहीं जो तुम्हारी मम्मी में है।तुम्हारी मम्मी सिर्फ एक औरत नहीं हैं, वो एक जीती जागती काम कला की मूर्ति हैं," अंकल ने शुरू किया। "उनकी खूबसूरती की तारीफ करना तो बहुत छोटी बात होगी। उनकी आँखों में जो गहराई है, जो शरारत है, वो किसी को भी अपना दीवाना बना दे। और उनका वो बदन... उफ़! उनकी कमर की लचक और उनकी त्वचा की वो मखमली कोमलता, जिसे छूते ही इंसान सुध बुध खो दे।"
अंकल ने मेरे कंधे को थोड़ा को थोड़ा दबाते हुए अपनी बात जारी रखी, "लेकिन रवि, उनकी सबसे बड़ी खूबी उनका जिस्म नहीं, बल्कि उनकी समझ है। वो काम कला में बहुत निपुण हैं। उन्हें पता है कि किस समय, किस सिचुएशन में एक मर्द के जिस्म को किस चीज़ की ज़रूरत होती है। उन्हें ये मालूम है कि कब उसे अपनी उंगलियों से सहलाना है और कब अपनी साँसों की गर्मी से उसे पिघलाना है।
तभी मेरे ख्यालो में मम्मी के साथ बिताए उन शेक्सी पलों की तस्वीर एक फिल्म के रूप में चलने लगी,मैने सोचा अंकल सच ही तो कह रहे हैं,सच में मम्मी ऐसी ही तो है।
अंकल ने मुझे ख्यालों में डूबा हुआ देखकर मुझे कंधे से पकड़ का झिंझोड़कर कहा, "क्या हुआ कहाँ खो गए।,""मैने तुरंत उनकी तरफ देखा जैसे गहरी नींद से किसी ने जगा दिया हो,हाँ बताइए मै सुन रहा हु।" अंकल की आँखों में एक चमक आ गई ,उन्होंने आगे कहा, "वो जानती हैं कि एक मर्द को कब सुकून चाहिए और कब उसे उकसाकर पागलपन की हद तक ले जाना है। वो बिना कहे समझ जाती हैं कि कब मर्द को प्यार की गर्माहट चाहिए और कब उसे अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए एक चुनौती चाहिए। उनकी सबसे बड़ी ताकत यही है कि वो सिर्फ शरीर से नहीं, बल्कि अपनी रूह और अपनी समझ से खेलती हैं। वो जानती हैं कि मर्द के अंदर के जानवर को कैसे जगाना है और फिर उसे कैसे अपनी उंगलियों पर नचाना है।"
अंकल की ये बातें सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मुझे एहसास हुआ कि मम्मी के बारे में अंकल की सोच कितनी गहरी और कामुक और बिल्कुल सच्ची है। अंकल की बातों ने न केवल मम्मी की तारीफ की थी, बल्कि उन्होंने अनजाने में ही उस 'थ्रीसम' के लिए एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया था जहाँ अब सिर्फ शरीर का मिलन नहीं, बल्कि अनुभवों का एक महाकुंभ होने वाला था।
मैंने अपनी नज़रें अंकल की आँखों में गड़ा दीं और थोड़ा और झुककर, आवाज़ को एकदम धीमा और शरारती बनाते हुए पूछा, "अंकल, एक बात बताइए... ये तो सब जानते हैं कि इस काम को पर्दे के पीछे, अकेले में करने में बहुत आनंद आता है। लेकिन मुझे ये जानना है कि जब हमें ये पता हो कि कोई हमें देख रहा है कोई ऐसा जो भरोसेमंद हो, जो हमारी प्राइवेसी का सम्मान करे पर हमारी हर हरकत का गवाह बने तो क्या इससे वो मज़ा और भी बढ़ न जाता है क्या?"
अंकल ने मेरी बात सुनकर एक लंबी और गहरी साँस ली। उनकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जैसे कोई पुराना राज़ खुल गया हो। उन्होंने अपनी कुर्सी पर थोड़ा पीछे झुकते हुए अपनी नज़रें मेरी आँखों में गड़ा दीं और एक बेहद गहरी, भारी आवाज़ में बोले,मै समझ गया रवि,"तुम यही पूछना चाहते हो न के उस दिन मुझे कैसा लगा था,जब तुम नींद की गोली खाने का बहाना करके सोने की एक्टिंग कर रहे थे,तो मैने और तेरी मम्मी ने लॉबी में पूरी तरह निर्वस्त्र हो के chudai की थी ,जब राउंड खत्म हुआ तेरी मम्मी नंगी ही बाथरूम चली गई,मुझे थोड़ा शक हुआ तो मै चुपके से तेरे रूम में जाकर देखा तो तुम जाग रहे थेे ,मैने तुम्हे विश्वास में लेके दूसरी बार तुमारी मम्मी की पूरी रोशनी में मारी थी ताकि तुम अच्छे से देख सको।
मैं थोड़ा सकपका गया। मेरी आँखों में हैरानी और घबराहट साफ़ दिख रही थी। मैंने अपनी आवाज़ को थोड़ा संभालते हुए कहा, "हाँ अंकल... मैं बस यही पूछना चाहता था। पर... पर आपको कैसे पता चला कि मेरे दिमाग में क्या चल रहा है? मैं तो खुद भी नहीं समझ पा रहा था कि मैं क्या पूछना चाह रहा हूँ।"मैं एक पल के लिए चुप रहा, जैसे खुद को कोस रहा हूँ। फिर मुझे अचानक एहसास हुआ कि मैं कितनी बड़ी भूल कर रहा हूँ। मैं उनसे ऐसे सवाल पूछ रहा था जैसे मैं कोई बच्चा हूँ जो अभी दुनिया देख रहा है। मैं भूल गया था कि सामने कोई अनजाना नहीं, बल्कि मुझसे कहीं ज़्यादा उम्र का एक ऐसा तजुर्बेकार आदमी बैठा है जिसने ज़िंदगी और इंसानी फितरत के वो रंग देखे हैं जिनकी मैं अभी कल्पना भी नहीं कर सकता। वो मेरी तरह अनाड़ी नहीं थे; उनके पास वो अनुभव और वो समझ थी जो एक पल में मेरे मन की हर उलझन को सुलझा सकती थी।अंकल ने मेरी इस घबराहट को देख लिया। उनके चेहरे पर एक समझदार और हल्की सी मुस्कान उभरी ऐसी मुस्कान जो कहती है कि 'बेटा, तुम अभी बहुत कुछ सीख रहे हो'। उन्होंने मेरी घबराहट को भांपते हुए मेरी आँखों में देखा, और उनकी उस शांत नज़र ने मुझे बता दिया कि उन्हें मेरे शब्दों से ज़्यादा मेरे मन की तड़प और मेरी उलझन का पता है।
मैंने अपनी घबराहट को थोड़ा किनारे रखा और हिम्मत जुटाकर फिर से वही सवाल दोहराया, जो मेरे दिमाग में बार बार घूम रहा था। मैंने उनकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "हाँ अंकल... मैं सच में यही पूछना चाहता हूँ कि जब आपने यह जानते हुए कि मैं सब कुछ देख रहा हूँ, मम्मी के साथ सभी बल्ब जला कर सम्बोग किया था,... तो क्या आपको पहले से कहीं ज़्यादा आनंद आया? क्या उस रोशनी ने और उस 'देखने' के अहसास ने आपके अनुभव को बदल दिया था, या फिर यह सिर्फ एक मामूली सा फर्क था?"
"" अंकल के चेहरे पर एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान आ गई।" वो बोले, "जब मैं तुम्हारी मम्मी के साथ था, और मुझे इस बात का पूरा अहसास था कि तुम अंधेरे में खड़े होकर हमारी हर एक हरकत को अपनी आँखों में उतार रहे हो... तो उस अहसास ने मेरे अंदर के मर्द को एक अलग ही स्तर पर पहुँचा दिया था।"
उन्होंने थोड़ा और आगे झुककर अपनी आवाज़ को और भी धीमा और कामुक कर लिया, "मम्मी के जिस्म की गर्माहट तो थी ही, लेकिन तुम्हारी मौजूदगी का वो दबाव, वो 'देखने' का अहसास... उसने मेरे हर स्पर्श को और भी ज़्यादा तीव्र बना दिया था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं सिर्फ मम्मी को नहीं छू रहा हूँ, बल्कि तुम्हारी नज़रों की गर्मी भी मेरे जिस्म को छू रही है। हर बार जब मम्मी कराहती थीं, तो मुझे लगता था कि तुम्हारी साँसें भी तेज़ हो रही हैं। उस पल में, हम सिर्फ दो लोग नहीं थे, बल्कि एक त्रिकोण (triangle) बन गए थे जहाँ तुम हमारी उत्तेजना का ईंधन बन रहे थे।"
अंकल की आँखों में अब एक बेकाबू प्यास साफ़ दिख रही थी। उन्होंने आगे कहा, "सच तो ये है रवि, कि उस दिन मुझे पहली बार समझ आया कि 'परफॉर्म' करने का असली मज़ा क्या होता है। जब तुम्हें पता हो कि कोई तुम्हें देख रहा है, तो तुम अपनी सीमाओं को तोड़ देते हो। मैं तेरी मम्मी के साथ और भी ज़्यादा बेबाक और बेखौफ हो गया था, क्योंकि मुझे पता था कि तुम्हारी आँखें मेरी मर्दानगी का गवाह बन रही हैं। उस दिन मज़ा सिर्फ शारीरिक नहीं था, वो मानसिक रूप से इतना गहरा था कि आज भी जब मैं उस पल के बारे में सोचता हूँ, तो मेरा शरीर कांप उठता है। तेरी मम्मी का जिस्म और तुम्हारी नज़रें, दोनों मिलकर मुझे एक ऐसी चरम सीमा पर ले जा रहे थे जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी। तो हाँ रवि, वो आनंद पहले से कहीं ज़्यादा गहरा, ज़्यादा तीव्र और कहीं ज़्यादा बेबाक था।""
मेरा अगला सवाल सीधा और बिना किसी लाग लपेट के था,मेरी आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी और एक दबी हुई चाहत थी। मैंने अपनी नज़रें झुका लीं, "अंकल, मुझे वो सब देखने में बहुत अच्छा लग रहा था। और अब तो ये साफ़ हो गया कि आपकी उत्तेजना में मेरी मौजूदगी का बहुत बड़ा हाथ था। यानी देखने में भी मज़ा है और किसी के सामने होकर करने में भी।मैंने एक गहरी साँस ली और हिम्मत जुटाकर फ़िर पूछा , "एक और सवाल है... उस दिन को ही ध्यान में रखते हुए बताना अंकल, मेरा तो दिल कर रहा था कि काश मैं भी आपको और मम्मी को जॉइन कर पाता... क्या उस वक्त आपके मन में भी यही ख्याल आया था कि मुझे भी बुला लिया जाए और हम तीनों मिलकर एक 'थ्रीसम' (threesome) करें?"
सवाल पूछते ही कमरे का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया। अंकल के चेहरे पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया, और फिर उनकी आँखों में एक ऐसी चमक उतरी जिसे देखकर मेरी रूह कांप गई। वो चमक कोई साधारण चमक नहीं थी, वो एक शिकारी की चमक थी जिसने अपने शिकार को देख लिया हो।
उन्होंने अपनी कुर्सी पर थोड़ा और आराम से बैठते हुए मेरी तरफ एक बेहद गहरी और नशीली नज़र डाली। "रवि..." उन्होंने मेरा नाम ऐसे लिया जैसे वो मेरे मन की गहराई को पढ़ रहे हों। "तुमने जो पूछा है, वो सिर्फ एक ख्याल ही नहीं , एक ऐसी इच्छा थी जो उस वक्त मेरे पूरे वजूद में दौड़ रही थी। जब मैं तुम्हारी मम्मी के जिस्म में खोया हुआ था और तुम्हारी उन नज़रों की तपिश को अपने ऊपर महसूस कर रहा था, तो मेरा दिमाग बार बार एक ही चीज़ की तरफ भाग रहा था कि काश तुम ये नज़ारा सिर्फ देखने तक सीमित न रहो बल्कि खुद भी इसका हिस्सा बन जाओ।"
उनकी आवाज़ अब और भी भारी और कामुक हो गई थी। "उस पल में, जब मैं तुम्हें देख रहा था और तुम हमें देख रहे थे, तो हमारे बीच एक अदृश्य तार खिंच गया था। मेरा मन कर रहा था कि मैं तुम्हें उस अंधेरे से खींचकर ले आऊं, तुम्हें भी वो नशा महसूस कराऊं जिस में , मैं और तेरी मम्मी डूबे हुए थे। मेरा मन था कि तुम्हारी वो तड़पती हुई आँखें सिर्फ देख न रही हों, बल्कि तुम्हारी वो गर्म साँसें भी हमारे बीच महसूस हों। उस वक्त एक थ्रीसम का ख्याल मेरे दिमाग में किसी आग की तरह सुलग रहा था। अगर तुम उस वक्त वहां होते, तो वो रात सिर्फ कामुकता की नहीं, बल्कि एक ऐसी चरम सीमा की होती जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। तुम्हारा शामिल होना उस पूरी प्रक्रिया को पूर्ण बना देता।"
मैंने उनकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, " बस ये ही कमी महसूस करता हु मै, मम्मी तो सब कुछ देती हैं, पर जब मैं उनके जिस्म के साथ खेलता हूँ, तो अक्सर मेरा मन करता है कि काश कोई और भी होता जो इस खेल को और भी रोमांचक बना देता। काश कोई ऐसा होता जो हमारे इस पागलपन को देख पाता और उसमें शामिल हो पाता।"
अंकल के चेहरे पर एक गहरी और समझदार मुस्कान तैर गई। उन्होंने समझ लिया था कि मैं किस तरफ इशारा कर रहा हूँ। उन्होंने धीरे से कहा, "रवि, एक मर्द को पता होना चाहिए कि कब अकेले खेलना है और कब पूरी महफ़िल जमानी है। अगर तुम और मम्मी दोनों मिलकर एक ऐसा अनुभव चाहते हो जो तुम्हारी रूह को झकझोर दे, तो उसके लिए सही साथी का होना ज़रूरी है।"
मैंने उत्सुकता से पूछा, "कैसा साथी अंकल?"
अंकल ने थोड़ा रुककर, एक रहस्यमयी अंदाज़ में कहा, "ऐसा साथी जो तुम्हारी हर ख्वाहिश को समझे, जो मम्मी के जिस्म की हर थरथराहट को महसूस कर सके और जो इस खेल का हिस्सा बनकर उसे और भी गहरा बना दे। अगर तुम चाहो, तो हम इस 'अधूरी कमी' को मिलकर पूरा कर सकते हैं।"
उनकी बात सुनकर मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई। मुझे समझ आ गया कि अंकल अब सिर्फ एक दर्शक ही नहीं , बल्कि वो इस खेल के खिलाड़ी बनने के लिए तैयार थे।
मैंने एक लंबी और गहरी साँस ली। अब बात उस मोड़ पर आ गई थी जहाँ से आगे का रास्ता बहुत संजीदा और पेचीदा था। मैंने अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा और गंभीर करते हुए कहा, "अंकल, अब असली समस्या यह है कि मम्मी को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि आप और मैं एक दूसरे के राज़दार हैं। उन्हें तो यह भी लगता है कि आपको इस माँ बेटे के बीच चल रहे इस खेल या हमारी इस 'सेटिंग' के बारे में कुछ पता ही नहीं है। वो आपको एक बिल्कुल अलग नज़र से देखती हैं। अब सवाल यह है कि उन्हें इस सच्चाई का अहसास कैसे कराया जाए? उन्हें कैसे मनाया जाए कि वो इस खेल का हिस्सा बनें और हमें इस तरह स्वीकार करें?"
अंकल ने मेरी बात सुनी और एक पल के लिए अपनी आँखें मूँद लीं, जैसे वो इस जटिल पहेली को सुलझाने का कोई रास्ता खोज रहे हों। फिर उन्होंने अपनी आँखें खोलीं, और उनके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो रहस्यमयी भी थी और आत्मविश्वास से भरी भी। उन्होंने थोड़ा आगे झुककर मेरी तरफ देखा और बहुत ही शांत लेकिन भारी आवाज़ में कहा, "रवि, यह कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे सुलझाया न जा सके। बस इसमें जल्दबाजी की ज़रूरत नहीं है।तुम्हारी मम्मी को सीधे तौर पर यह बताना कि हम दोनों क्या करना चाहते हैं, उन्हें डरा सकता है या उन्हें रक्षात्मक बना सकता है।"
मैंने कहा, "पर अंकल, उस रात जब मम्मी को पता चला कि मैंने आप दोनों को उस हालत में देख लिया है, तो शायद मम्मी ने आपको को घर आने से मना कर दिया होगा। तो फिर आपका घर में आना जाना दोबारा कैसे शुरू होगा?"
अंकल ने सोचते हुए कहा, "यह बात तो है दोस्त।" और फिर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, "अब क्या करें यार।"
मैं थोड़ा मुस्कुराते हुए बोला, "मैं सब कर लूँगा अंकल, आपके आशीर्वाद से।" मेरी बात सुनकर अंकल ने मुझे सवालिया नज़रों से देखा, जैसे वो मेरी बातों पर यकीन न कर पा रहे हों। मैंने उनके हाथ को अपने हाथों में थाम लिया और आश्वासन देती हुई नज़रों से उनकी तरफ देखा।
मैं थोड़ी देर और अंकल के पास बैठा रहा, फिर उन्हें नमस्ते करते हुए विदा ली और घर आ गया। घर पहुँचकर मैं सीधा दुकान पर जाकर बैठ गया। उधर मम्मी घर जाकर अपना कामकाज निपटाने लगीं, इधर मैं मन ही मन योजना बनाने लगा कि इस विषय पर मम्मी से कब और कैसे बात करूँ। थोड़ी देर के विचार मंथन के बाद, मैं अपने प्लान को कैसे अमल में लाना है, उसका पूरा खाका मन ही मन तैयार कर चुका था।
नअंकल ने उस दिन के बाद घर आना बिल्कुल बंद कर दिया था।मुझे बाद में पता चला कि असल में, मम्मी ने ही उन्हें ये कहते हुए के रवि ने देख लिया है,तो अब उनको नहीं आना चाहिए, आने से मना कर दिया था। उन्हें इस बात की ज़रा भी भनक नहीं थी कि ,,, मेरा मम्मी को अंकल के साथ sex करते देख लेना ,फिर मम्मी को रूठने का बहाना करके इमोशनल ब्लैकमेल करके अपने नीचे लाने का masterplan मैंने और अंकल ने ही बनाया था। अंकल ने भी बहुत सब्र दिखाया और घर आना बंद कर दिया था। पर मैं इस बात के लिए अंकल का दिल से ऋणी था कि उन्हीं के कारण मैं मम्मी के साथ इस तरह के सेक्स संबंध बना पाया था। मैं यह बात उनसे मिलकर भी कहना चाहता था, पर अंकल से मेरी मुलाकात ही नहीं हो पा रही थी। शायद उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि मेरे और मम्मी के बीच अब किस हद तक संबंध बन चुके हैं और हमारी हवस अब अपने चरम पर पहुँच चुकी है।
सच पूछो तो कहीं न कहीं मेरे मन में थोड़ी सी बेईमानी भी थी एक ऐसा अहसास कि अंकल के न आने से मुझे मम्मी के इस सुलगते हुए जिस्म से अकेले खेलने का सौभाग्य मिल रहा है। पर फिर मेरे मन में एक ख्याल आया कि काश! एक बार अंकल से मुलाकात हो जाए।
सब कुछ एक तय रूटीन से चल रहा था। मेरा सुबह 8 बजे से 1 बजे तक कॉलेज जाना, मम्मी का पूजा पाठ करके घर संभालना और दुकान की देखभाल करना। दोपहर 1 से 3 बजे तक दुकान का शटर डाउन रहता था। फिर 3 बजे मैं दुकान पर जाता और दुकानदारी के साथ साथ पढाई करता, मम्मी घर के बाकी काम निपटाकर थोड़ा आराम करती थीं। रात को 8 बजे शटर डाउन होने के बाद रात का खाना ,उसके बाद सोने की तैयारी शुरू हो जाती और लगभग 9 बजे तक हम बिस्तर पर होते। बाकी तो मैं फिजिकल होने का हमारा रूटीन बता ही चुका हूँ।
उस दिन रविवार था। मैंने मम्मी से कहा, "मम्मी, मुझे थोड़ा घूमने जाना है।" मम्मी के 'हाँ' कहते ही मैंने अपनी बाइक उठाई और सीधे अंकल के पास पहुँच गया। अंकल को दफ्तर के ही प्रांगण में एक कमरा मिला हुआ था,अंकल मुझे देखकर बहुत खुश हुए। वो मुझसे ऐसे मिले जैसे किसी बच्चे से नहीं, बल्कि किसी बहुत गहरे राज़दार दोस्त से मिल रहे हों। उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, जैसे उन्हें पता हो कि मैं यहाँ सिर्फ घूमने के लिए नहीं आया हूँ।
अंकल ने चाय बनाई और पास की दुकान से गरमा गरम समोसे मंगवा लिए
अंकल ने चाय बनाई और पास की दुकान से गरमागरम समोसे मंगवा लिए। चाय पीते हुए अंकल ने मुस्कुराते हुए पूछा, "और सुनाओ ,कैसे हो दोस्त?"
मैंने हैरानी से अंकल की ओर देखा। पहले तो अंकल मुझे हमेशा 'बेटा' कहकर बुलाते थे, लेकिन आज वो मुझे 'दोस्त' कह रहे थे। मुझे यह सुनकर बहुत अच्छा लगा कि मुझसे लगभग तीन गुना उम्र के अंकल मुझे अपना दोस्त मान रहे हैं। शायद अंकल ने मेरे मन में चल रहे विचारों को पढ़ लिया था, क्योंकि उन्होंने तुरंत कहा, "हाँ रवि, अब हम अच्छे दोस्त हैं, क्योंकि अब हम सभी *विषयों* पर खुलकर डिस्कशन कर लेते हैं।" उनका इशारा साफ़ तौर पर सेक्स की तरफ था।
उनकी यह बात सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई और मैंने अपनी मुस्कुराहट से अपनी खुशी ज़ाहिर कर दी। अंकल ने मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए मेरे कंधे पर थपकी दी, जैसे वो मुझे यह एहसास दिला रहे हों कि अब हमारे बीच कोई पर्दा नहीं रहा।
अंकल ने मेरी आँखों में आँखें डालकर बड़े ही बेबाक अंदाज़ में पूछा, "और बताओ रवि, कुछ हुआ क्या मम्मी के साथ?"
मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के, एक शरारती मुस्कुराहट के साथ अंकल को सब कुछ विस्तार से बता दिया। मैंने उन्हें बताया कि कैसे उनके बनाए हुए प्लान के मुताबिक मम्मी पूरी तरह मेरे समर्पण में आ गईं और कैसे वो मेरे नीचे आकर पूरी तरह मेरी हो जाती हैं। मैं एक एक पल का वर्णन कर रहा था और अंकल पूरी उत्सुकता से मेरी बातें सुन रहे थे। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और वो बीच बीच में सुनकर मुस्कुरा रहे थे।
जैसे ही मेरी बात खत्म हुई, अंकल के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आई। उन्होंने जोश के साथ मेरी जांघ पर ज़ोर से थपकी दी और बोले, "वाह! ये हुई न मर्दों वाली बात! शाबाश मेरे शेर!" उनकी आवाज़ में एक तरह का गर्व था शायद इसलिए कि उनका प्लान कामयाब हो गया था, जैसे वो मम्मी पर मेरी पकड़ से बेहद खुश और संतुष्ट हों।
अंकल की उस शाबाशी ने मेरे अंदर एक अजीब सा जोश भर दिया था। मैंने थोड़ा रुककर, अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा और गहरा करते हुए कहा, "अंकल, सच कहूँ तो मम्मी के साथ जो मज़ा आता है, वो लाजवाब है। लेकिन कभी कभी मुझे ऐसा महसूस होता है कि जैसे कुछ कमी है। जैसे कोई चीज़ अधूरी रह गई हो।"
अंकल ने अपनी चाय का आखिरी घूँट भरा और मेरी तरफ झुकते हुए बोले, "कमी? कैसी कमी रवि? क्या मम्मी तुम्हें पूरा नहीं दे पा रही हैं?"
मैंने अपनी उत्सुकता को रोकते हुए सीधे पूछा, "अच्छा अंकल, पहले सच सच बताइए... आपको मम्मी में सबसे ज्यादा क्या पसंद है?" अंकल ने एक गहरी साँस ली, जैसे वो किसी बहुत ही खूबसूरत याद में खो गए हों। उन्होंने अपनी चाय का कप मेज पर रखा और एक गहरी नज़र मुझ पर डालते हुए बोलना शुरू किया। उनकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और प्रशंसा थी।
"रवि, अब हम दोनों दोस्त बन चुके हैं,तो मै तुमसे कुछ भी छिपाऊंगा नहीं। 20--22 सालों में मैने पता नहीं कितनी औरतों को भोगा है पर किसी में भी वो बात नहीं जो तुम्हारी मम्मी में है।तुम्हारी मम्मी सिर्फ एक औरत नहीं हैं, वो एक जीती जागती काम कला की मूर्ति हैं," अंकल ने शुरू किया। "उनकी खूबसूरती की तारीफ करना तो बहुत छोटी बात होगी। उनकी आँखों में जो गहराई है, जो शरारत है, वो किसी को भी अपना दीवाना बना दे। और उनका वो बदन... उफ़! उनकी कमर की लचक और उनकी त्वचा की वो मखमली कोमलता, जिसे छूते ही इंसान सुध बुध खो दे।"
अंकल ने मेरे कंधे को थोड़ा को थोड़ा दबाते हुए अपनी बात जारी रखी, "लेकिन रवि, उनकी सबसे बड़ी खूबी उनका जिस्म नहीं, बल्कि उनकी समझ है। वो काम कला में बहुत निपुण हैं। उन्हें पता है कि किस समय, किस सिचुएशन में एक मर्द के जिस्म को किस चीज़ की ज़रूरत होती है। उन्हें ये मालूम है कि कब उसे अपनी उंगलियों से सहलाना है और कब अपनी साँसों की गर्मी से उसे पिघलाना है।
तभी मेरे ख्यालो में मम्मी के साथ बिताए उन शेक्सी पलों की तस्वीर एक फिल्म के रूप में चलने लगी,मैने सोचा अंकल सच ही तो कह रहे हैं,सच में मम्मी ऐसी ही तो है।
अंकल ने मुझे ख्यालों में डूबा हुआ देखकर मुझे कंधे से पकड़ का झिंझोड़कर कहा, "क्या हुआ कहाँ खो गए।,""मैने तुरंत उनकी तरफ देखा जैसे गहरी नींद से किसी ने जगा दिया हो,हाँ बताइए मै सुन रहा हु।" अंकल की आँखों में एक चमक आ गई ,उन्होंने आगे कहा, "वो जानती हैं कि एक मर्द को कब सुकून चाहिए और कब उसे उकसाकर पागलपन की हद तक ले जाना है। वो बिना कहे समझ जाती हैं कि कब मर्द को प्यार की गर्माहट चाहिए और कब उसे अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए एक चुनौती चाहिए। उनकी सबसे बड़ी ताकत यही है कि वो सिर्फ शरीर से नहीं, बल्कि अपनी रूह और अपनी समझ से खेलती हैं। वो जानती हैं कि मर्द के अंदर के जानवर को कैसे जगाना है और फिर उसे कैसे अपनी उंगलियों पर नचाना है।"
अंकल की ये बातें सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मुझे एहसास हुआ कि मम्मी के बारे में अंकल की सोच कितनी गहरी और कामुक और बिल्कुल सच्ची है। अंकल की बातों ने न केवल मम्मी की तारीफ की थी, बल्कि उन्होंने अनजाने में ही उस 'थ्रीसम' के लिए एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया था जहाँ अब सिर्फ शरीर का मिलन नहीं, बल्कि अनुभवों का एक महाकुंभ होने वाला था।
मैंने अपनी नज़रें अंकल की आँखों में गड़ा दीं और थोड़ा और झुककर, आवाज़ को एकदम धीमा और शरारती बनाते हुए पूछा, "अंकल, एक बात बताइए... ये तो सब जानते हैं कि इस काम को पर्दे के पीछे, अकेले में करने में बहुत आनंद आता है। लेकिन मुझे ये जानना है कि जब हमें ये पता हो कि कोई हमें देख रहा है कोई ऐसा जो भरोसेमंद हो, जो हमारी प्राइवेसी का सम्मान करे पर हमारी हर हरकत का गवाह बने तो क्या इससे वो मज़ा और भी बढ़ न जाता है क्या?"
अंकल ने मेरी बात सुनकर एक लंबी और गहरी साँस ली। उनकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जैसे कोई पुराना राज़ खुल गया हो। उन्होंने अपनी कुर्सी पर थोड़ा पीछे झुकते हुए अपनी नज़रें मेरी आँखों में गड़ा दीं और एक बेहद गहरी, भारी आवाज़ में बोले,मै समझ गया रवि,"तुम यही पूछना चाहते हो न के उस दिन मुझे कैसा लगा था,जब तुम नींद की गोली खाने का बहाना करके सोने की एक्टिंग कर रहे थे,तो मैने और तेरी मम्मी ने लॉबी में पूरी तरह निर्वस्त्र हो के chudai की थी ,जब राउंड खत्म हुआ तेरी मम्मी नंगी ही बाथरूम चली गई,मुझे थोड़ा शक हुआ तो मै चुपके से तेरे रूम में जाकर देखा तो तुम जाग रहे थेे ,मैने तुम्हे विश्वास में लेके दूसरी बार तुमारी मम्मी की पूरी रोशनी में मारी थी ताकि तुम अच्छे से देख सको।
मैं थोड़ा सकपका गया। मेरी आँखों में हैरानी और घबराहट साफ़ दिख रही थी। मैंने अपनी आवाज़ को थोड़ा संभालते हुए कहा, "हाँ अंकल... मैं बस यही पूछना चाहता था। पर... पर आपको कैसे पता चला कि मेरे दिमाग में क्या चल रहा है? मैं तो खुद भी नहीं समझ पा रहा था कि मैं क्या पूछना चाह रहा हूँ।"मैं एक पल के लिए चुप रहा, जैसे खुद को कोस रहा हूँ। फिर मुझे अचानक एहसास हुआ कि मैं कितनी बड़ी भूल कर रहा हूँ। मैं उनसे ऐसे सवाल पूछ रहा था जैसे मैं कोई बच्चा हूँ जो अभी दुनिया देख रहा है। मैं भूल गया था कि सामने कोई अनजाना नहीं, बल्कि मुझसे कहीं ज़्यादा उम्र का एक ऐसा तजुर्बेकार आदमी बैठा है जिसने ज़िंदगी और इंसानी फितरत के वो रंग देखे हैं जिनकी मैं अभी कल्पना भी नहीं कर सकता। वो मेरी तरह अनाड़ी नहीं थे; उनके पास वो अनुभव और वो समझ थी जो एक पल में मेरे मन की हर उलझन को सुलझा सकती थी।अंकल ने मेरी इस घबराहट को देख लिया। उनके चेहरे पर एक समझदार और हल्की सी मुस्कान उभरी ऐसी मुस्कान जो कहती है कि 'बेटा, तुम अभी बहुत कुछ सीख रहे हो'। उन्होंने मेरी घबराहट को भांपते हुए मेरी आँखों में देखा, और उनकी उस शांत नज़र ने मुझे बता दिया कि उन्हें मेरे शब्दों से ज़्यादा मेरे मन की तड़प और मेरी उलझन का पता है।
मैंने अपनी घबराहट को थोड़ा किनारे रखा और हिम्मत जुटाकर फिर से वही सवाल दोहराया, जो मेरे दिमाग में बार बार घूम रहा था। मैंने उनकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "हाँ अंकल... मैं सच में यही पूछना चाहता हूँ कि जब आपने यह जानते हुए कि मैं सब कुछ देख रहा हूँ, मम्मी के साथ सभी बल्ब जला कर सम्बोग किया था,... तो क्या आपको पहले से कहीं ज़्यादा आनंद आया? क्या उस रोशनी ने और उस 'देखने' के अहसास ने आपके अनुभव को बदल दिया था, या फिर यह सिर्फ एक मामूली सा फर्क था?"
"" अंकल के चेहरे पर एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान आ गई।" वो बोले, "जब मैं तुम्हारी मम्मी के साथ था, और मुझे इस बात का पूरा अहसास था कि तुम अंधेरे में खड़े होकर हमारी हर एक हरकत को अपनी आँखों में उतार रहे हो... तो उस अहसास ने मेरे अंदर के मर्द को एक अलग ही स्तर पर पहुँचा दिया था।"
उन्होंने थोड़ा और आगे झुककर अपनी आवाज़ को और भी धीमा और कामुक कर लिया, "मम्मी के जिस्म की गर्माहट तो थी ही, लेकिन तुम्हारी मौजूदगी का वो दबाव, वो 'देखने' का अहसास... उसने मेरे हर स्पर्श को और भी ज़्यादा तीव्र बना दिया था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं सिर्फ मम्मी को नहीं छू रहा हूँ, बल्कि तुम्हारी नज़रों की गर्मी भी मेरे जिस्म को छू रही है। हर बार जब मम्मी कराहती थीं, तो मुझे लगता था कि तुम्हारी साँसें भी तेज़ हो रही हैं। उस पल में, हम सिर्फ दो लोग नहीं थे, बल्कि एक त्रिकोण (triangle) बन गए थे जहाँ तुम हमारी उत्तेजना का ईंधन बन रहे थे।"
अंकल की आँखों में अब एक बेकाबू प्यास साफ़ दिख रही थी। उन्होंने आगे कहा, "सच तो ये है रवि, कि उस दिन मुझे पहली बार समझ आया कि 'परफॉर्म' करने का असली मज़ा क्या होता है। जब तुम्हें पता हो कि कोई तुम्हें देख रहा है, तो तुम अपनी सीमाओं को तोड़ देते हो। मैं तेरी मम्मी के साथ और भी ज़्यादा बेबाक और बेखौफ हो गया था, क्योंकि मुझे पता था कि तुम्हारी आँखें मेरी मर्दानगी का गवाह बन रही हैं। उस दिन मज़ा सिर्फ शारीरिक नहीं था, वो मानसिक रूप से इतना गहरा था कि आज भी जब मैं उस पल के बारे में सोचता हूँ, तो मेरा शरीर कांप उठता है। तेरी मम्मी का जिस्म और तुम्हारी नज़रें, दोनों मिलकर मुझे एक ऐसी चरम सीमा पर ले जा रहे थे जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी। तो हाँ रवि, वो आनंद पहले से कहीं ज़्यादा गहरा, ज़्यादा तीव्र और कहीं ज़्यादा बेबाक था।""
मेरा अगला सवाल सीधा और बिना किसी लाग लपेट के था,मेरी आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी और एक दबी हुई चाहत थी। मैंने अपनी नज़रें झुका लीं, "अंकल, मुझे वो सब देखने में बहुत अच्छा लग रहा था। और अब तो ये साफ़ हो गया कि आपकी उत्तेजना में मेरी मौजूदगी का बहुत बड़ा हाथ था। यानी देखने में भी मज़ा है और किसी के सामने होकर करने में भी।मैंने एक गहरी साँस ली और हिम्मत जुटाकर फ़िर पूछा , "एक और सवाल है... उस दिन को ही ध्यान में रखते हुए बताना अंकल, मेरा तो दिल कर रहा था कि काश मैं भी आपको और मम्मी को जॉइन कर पाता... क्या उस वक्त आपके मन में भी यही ख्याल आया था कि मुझे भी बुला लिया जाए और हम तीनों मिलकर एक 'थ्रीसम' (threesome) करें?"
सवाल पूछते ही कमरे का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया। अंकल के चेहरे पर एक पल के लिए सन्नाटा छा गया, और फिर उनकी आँखों में एक ऐसी चमक उतरी जिसे देखकर मेरी रूह कांप गई। वो चमक कोई साधारण चमक नहीं थी, वो एक शिकारी की चमक थी जिसने अपने शिकार को देख लिया हो।
उन्होंने अपनी कुर्सी पर थोड़ा और आराम से बैठते हुए मेरी तरफ एक बेहद गहरी और नशीली नज़र डाली। "रवि..." उन्होंने मेरा नाम ऐसे लिया जैसे वो मेरे मन की गहराई को पढ़ रहे हों। "तुमने जो पूछा है, वो सिर्फ एक ख्याल ही नहीं , एक ऐसी इच्छा थी जो उस वक्त मेरे पूरे वजूद में दौड़ रही थी। जब मैं तुम्हारी मम्मी के जिस्म में खोया हुआ था और तुम्हारी उन नज़रों की तपिश को अपने ऊपर महसूस कर रहा था, तो मेरा दिमाग बार बार एक ही चीज़ की तरफ भाग रहा था कि काश तुम ये नज़ारा सिर्फ देखने तक सीमित न रहो बल्कि खुद भी इसका हिस्सा बन जाओ।"
उनकी आवाज़ अब और भी भारी और कामुक हो गई थी। "उस पल में, जब मैं तुम्हें देख रहा था और तुम हमें देख रहे थे, तो हमारे बीच एक अदृश्य तार खिंच गया था। मेरा मन कर रहा था कि मैं तुम्हें उस अंधेरे से खींचकर ले आऊं, तुम्हें भी वो नशा महसूस कराऊं जिस में , मैं और तेरी मम्मी डूबे हुए थे। मेरा मन था कि तुम्हारी वो तड़पती हुई आँखें सिर्फ देख न रही हों, बल्कि तुम्हारी वो गर्म साँसें भी हमारे बीच महसूस हों। उस वक्त एक थ्रीसम का ख्याल मेरे दिमाग में किसी आग की तरह सुलग रहा था। अगर तुम उस वक्त वहां होते, तो वो रात सिर्फ कामुकता की नहीं, बल्कि एक ऐसी चरम सीमा की होती जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। तुम्हारा शामिल होना उस पूरी प्रक्रिया को पूर्ण बना देता।"
मैंने उनकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा, " बस ये ही कमी महसूस करता हु मै, मम्मी तो सब कुछ देती हैं, पर जब मैं उनके जिस्म के साथ खेलता हूँ, तो अक्सर मेरा मन करता है कि काश कोई और भी होता जो इस खेल को और भी रोमांचक बना देता। काश कोई ऐसा होता जो हमारे इस पागलपन को देख पाता और उसमें शामिल हो पाता।"
अंकल के चेहरे पर एक गहरी और समझदार मुस्कान तैर गई। उन्होंने समझ लिया था कि मैं किस तरफ इशारा कर रहा हूँ। उन्होंने धीरे से कहा, "रवि, एक मर्द को पता होना चाहिए कि कब अकेले खेलना है और कब पूरी महफ़िल जमानी है। अगर तुम और मम्मी दोनों मिलकर एक ऐसा अनुभव चाहते हो जो तुम्हारी रूह को झकझोर दे, तो उसके लिए सही साथी का होना ज़रूरी है।"
मैंने उत्सुकता से पूछा, "कैसा साथी अंकल?"
अंकल ने थोड़ा रुककर, एक रहस्यमयी अंदाज़ में कहा, "ऐसा साथी जो तुम्हारी हर ख्वाहिश को समझे, जो मम्मी के जिस्म की हर थरथराहट को महसूस कर सके और जो इस खेल का हिस्सा बनकर उसे और भी गहरा बना दे। अगर तुम चाहो, तो हम इस 'अधूरी कमी' को मिलकर पूरा कर सकते हैं।"
उनकी बात सुनकर मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई। मुझे समझ आ गया कि अंकल अब सिर्फ एक दर्शक ही नहीं , बल्कि वो इस खेल के खिलाड़ी बनने के लिए तैयार थे।
मैंने एक लंबी और गहरी साँस ली। अब बात उस मोड़ पर आ गई थी जहाँ से आगे का रास्ता बहुत संजीदा और पेचीदा था। मैंने अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा और गंभीर करते हुए कहा, "अंकल, अब असली समस्या यह है कि मम्मी को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि आप और मैं एक दूसरे के राज़दार हैं। उन्हें तो यह भी लगता है कि आपको इस माँ बेटे के बीच चल रहे इस खेल या हमारी इस 'सेटिंग' के बारे में कुछ पता ही नहीं है। वो आपको एक बिल्कुल अलग नज़र से देखती हैं। अब सवाल यह है कि उन्हें इस सच्चाई का अहसास कैसे कराया जाए? उन्हें कैसे मनाया जाए कि वो इस खेल का हिस्सा बनें और हमें इस तरह स्वीकार करें?"
अंकल ने मेरी बात सुनी और एक पल के लिए अपनी आँखें मूँद लीं, जैसे वो इस जटिल पहेली को सुलझाने का कोई रास्ता खोज रहे हों। फिर उन्होंने अपनी आँखें खोलीं, और उनके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो रहस्यमयी भी थी और आत्मविश्वास से भरी भी। उन्होंने थोड़ा आगे झुककर मेरी तरफ देखा और बहुत ही शांत लेकिन भारी आवाज़ में कहा, "रवि, यह कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे सुलझाया न जा सके। बस इसमें जल्दबाजी की ज़रूरत नहीं है।तुम्हारी मम्मी को सीधे तौर पर यह बताना कि हम दोनों क्या करना चाहते हैं, उन्हें डरा सकता है या उन्हें रक्षात्मक बना सकता है।"
मैंने कहा, "पर अंकल, उस रात जब मम्मी को पता चला कि मैंने आप दोनों को उस हालत में देख लिया है, तो शायद मम्मी ने आपको को घर आने से मना कर दिया होगा। तो फिर आपका घर में आना जाना दोबारा कैसे शुरू होगा?"
अंकल ने सोचते हुए कहा, "यह बात तो है दोस्त।" और फिर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, "अब क्या करें यार।"
मैं थोड़ा मुस्कुराते हुए बोला, "मैं सब कर लूँगा अंकल, आपके आशीर्वाद से।" मेरी बात सुनकर अंकल ने मुझे सवालिया नज़रों से देखा, जैसे वो मेरी बातों पर यकीन न कर पा रहे हों। मैंने उनके हाथ को अपने हाथों में थाम लिया और आश्वासन देती हुई नज़रों से उनकी तरफ देखा।
मैं थोड़ी देर और अंकल के पास बैठा रहा, फिर उन्हें नमस्ते करते हुए विदा ली और घर आ गया। घर पहुँचकर मैं सीधा दुकान पर जाकर बैठ गया। उधर मम्मी घर जाकर अपना कामकाज निपटाने लगीं, इधर मैं मन ही मन योजना बनाने लगा कि इस विषय पर मम्मी से कब और कैसे बात करूँ। थोड़ी देर के विचार मंथन के बाद, मैं अपने प्लान को कैसे अमल में लाना है, उसका पूरा खाका मन ही मन तैयार कर चुका था।


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