01-09-2026, 10:52 PM
कमरे के अंदर कदम रखते ही माहौल में एक अजीब सी भारीपन और तनाव था। विवेक की उत्तेजना चरम पर थी; वह लगभग बेकाबू महसूस कर रहा था। जैसे ही वे लिविंग रूम के सोफे पर बैठे, विवेक ने बिना एक पल गंवाए चैताली को अपनी ओर खींच लिया। उसने उसे अपने बिल्कुल करीब बिठाया, इतना करीब कि दोनों की साँसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। विवेक की आँखों में एक भूखी तड़प थी, और वह बिना किसी हिचकिचाहट के चैताली के होंठों पर अपने होंट बसाने लगा।
दूसरी ओर, चैताली बिल्कुल स्थिर थी। उसकी खामोशी में एक अजीब सा रहस्य था—वह न तो विरोध कर रही थी और न ही पूरी तरह से प्रतिक्रिया दे रही थी। वह बस एक मूक दर्शक की तरह उस पल को महसूस कर रही थी।
तभी हरीश, जो अब तक चुपचाप इस दृश्य को देख रहा था, बीच में हस्तक्षेप करने का फैसला किया। उसकी आँखों में एक शरारती चमक थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "सिर्फ लेने से काम नहीं चलेगा, विवेक। चैताली, अब तुम्हारी बारी है। विवेक को वह सब कुछ महसूस कराओ जिसकी वह उम्मीद कर रहा है। उसे दिखाओ कि तुम उसे कितनी शिद्दत से चाहती हो।"
हरीश के इस एक इशारे ने जैसे चैताली के अंदर किसी बंद दरवाजे को खोल दिया। उसकी दुनिया पल भर में बदल गई। अचानक उसकी वह शांति एक तीव्र जुनून में बदल गई। उसने फुर्ती से अपने दोनों हाथ विवेक के गले में डाल दिए, उसे अपनी ओर और मजबूती से खींच लिया, और फिर एक गहरी, जुनून भरी फ्रेंच किस में डूब गई।
उनकी जुबानें एक-दूसरे से उलझ गईं, और एक गहरे, गीले अहसास के साथ लार का आदान-प्रदान होने लगा। यह चुंबन अब सिर्फ एक स्पर्श नहीं था, बल्कि एक प्यास थी। विवेक की साँसें अब तेज और उखड़ी हुई थीं; उसका दिल उसकी छाती में तेजी से धड़क रहा था। उत्तेजना में बहकर, उसने अनजाने में अपना हाथ नीचे बढ़ाया और उसकी सलवार के अंदर घुसने की कोशिश की, ताकि वह उस गर्माहट को महसूस कर सके।
लेकिन इससे पहले कि वह आगे बढ़ पाता, हरीश की सख्त लेकिन धीमी आवाज़ ने उसे रोक दिया।
"रुक जा, इतनी जल्दबाजी मत कर," हरीश ने उसे टोकते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सा रोमांच था। "धैर्य रख, विवेक। असली तमाशा तो अब शुरू होगा।"


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