01-09-2026, 07:01 PM
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सनी घर पर था। देर रात का कमरा, टीवी बंद, फोन कान से चिपका। पहली कॉल अनजाने में लग गई थी—आहें, सोनिया की चीख, जामिल का नाम, और एक दूसरी औरत की दबी सिसकी। वह घबरा गया। अँगूठा फिसला। लाल बटन दब गया।
कॉल कट गई।
“नहीं… नहीं नहीं—” उसने फिर डायल किया। हाथ काँप रहे थे। रुही। अभी। अभी उठा।
फोन सोफे और तकिए की दरार में मुँह के बल पड़ा था। साइलेंट था। स्क्रीन नीचे। वाइब्रेशन कपड़े में दबकर मर गया। रुही को कुछ नहीं पता चला।
रामू उसके ऊपर थे। लingerie आधी उतर चुकी थी। ब्रा खुली पड़ी थी। पैंटी एक जाँघ पर अटकी थी। उनका लंड उसकी गीली चूत के मुँह पर टिका था।
“देख मुझे,” उन्होंने कहा। “अब मैं अंदर जा रहा हूँ।”
रुही ने उनकी कलाई पकड़ी। आँखें बड़ी थीं। “रामू जी… धीरे… प्लीज… आप बहुत बड़े हो…”
उन्होंने जवाब में धक्का दिया। आधा अंदर। रुही की कमर उछली। आवाज़ फट गई—
“आह्ह्ह्ह्ह! निकल… दर्द… रामू जी… दर्द हो रहा है…!”
“सह,” उन्होंने दाँत भींचे। “तेरी चूत मेरी है। खुल। खुल जा।”
एक और धक्का। पूरा। जड़ तक। रुही की टाँगें उनके कमर पर लिपट गईं, फिर छूट गईं, फिर कंधों की तरफ चढ़ने लगीं। चीख लंबी निकली—
“आह्ह्ह्ह! मर गई… पूरी… पूरी अंदर… रामू जी… तारस खाओ… प्लीज तारस खाओ…!”
सनी के फोन पर घंटी बज रही थी। उठ नहीं रही थी। उसने कटी कटी साँस में सोचा—साइलेंट होगा। सो गई होगी। नहीं… अभी तो कराहें आ रही थीं। उठा क्यों नहीं रही?
फिर डायल। फिर घंटी। फिर खाली रिंग।
सोफे पर रामू रुक नहीं रहे थे। पहले धीमे। फिर गहरे। हर बार जड़ तक। रुही के नाखून उनकी पीठ पर रेखाएँ खींच रहे थे।
“आह्ह… आह्ह्ह… रामू जी… इतना गहरा मत… मेरी चूत फट जाएगी… भिख माँगती हूँ… थोड़ा सा तारस…”
रामू झुके। उसके होंठ काटे। “तारस बाद में। पहले मेरा हक। बोल—किसकी चूत है?”
“आप… आपकी… आह्ह्ह! आपकी चूत… रामू जी की… बस धीरे… आह्ह धीरे करो ना…!”
उन्होंने धीरे नहीं किया। लय बढ़ी। सोफा खटकने लगा। रुही की चीखें टूट-टूटकर निकल रही थीं—कभी नाम, कभी नों, कभी और।
“नहीं… नहीं इतनी तेज़… अह्ह्ह्ह! रामू जी… मैं चीखूँगी… सोनिया सुन लेगी… अह्ह… सुन लेगी…!”
अंदर से सोनिया की आवाज़ पहले से आ रही थी। अब दोनों घर एक साथ गूँज रहे थे। रामू ने रुही की टाँगें अपने कंधों पर चढ़ा दीं। कोण बदल गया। लंड और गहराई तक चला।
रुही की आँखों से आँसू निकल आए। मुँह खुला रह गया।
“आह्ह्ह्ह्ह! यह वाला… यह वाला मत… बहुत गहरा है… मैं मर रही हूँ… तारस… तारस कर दो रामू जी… अपनी बहू पर तारस खाओ…!”
“बहू चीखेगी तो चीखे,” उन्होंने साँस भारी करते हुए कहा। “मैं निकालूँगा नहीं। तू गीली हो रही है दर्द में भी।”
“हाँ… गीली हूँ… आह्ह… आपकी वजह से… लेकिन प्लीज… दस सेकंड… दस सेकंड निकालो… मैं सँभाल लूँ… फिर दे देना… अह्ह्ह्ह!”
रामू ने दस सेकंड नहीं दिए। उन्होंने उसकी कलाई सोफे के ऊपर दबाई। दूसरा हाथ कमर के नीचे गया। धक्के पूरे होने लगे—गहरे, भारी, मर्दाना।
रुही की आवाज़ अब भीख बन चुकी थी—
“रामू जी… मैं आपकी दासी… आपकी रंडी… आपकी बहू… बस एक बार छोड़ दो… फिर जितना मारना मारना… अह्ह… अह्ह्ह… मैं सह नहीं पा रही… सह नहीं पा रही…!”
“सह रही है,” उन्होंने उसके माथे से माथा सटाया। “देख तेरी चूत कैसे निगल रही है। बोल—और चाहिए?”
रुही ने सिर हिलाया। इनकार और माँग एक साथ। “नहीं… हाँ… नहीं इतना तेज़… हाँ अंदर… रामू जी मैं पागल हो गई… आपकी चूत पागल हो गई… तारस… थोड़ा सा तारस…!”
सनी ने पाँचवीं बार कॉल किया। कान पर फोन। घर का अँधेरा। कोई नहीं उठा। दिमाग घूम रहा था—पहली कॉल में चीखें थीं। सोनिया। जामिल। रुही का फोन खुला था। अब उठ नहीं रही। फोन गिर गया? बैटरी? या… वह जानबूझकर नहीं उठा रही?
उसने मैसेज टाइप किया हाथ काँपते हुए: Ruhi pick up. Please. I heard something. Call me.
भेजा। देखा। डिलीवर्ड भी नहीं दिखा—फोन तकिए तले दबा था, नेटवर्क की हल्की सी लाइट भी कपड़े में खो गई।
सोफे पर रामू ने रुही को पलटने जैसा किया, फिर वही रखा—पीठ सोफे से सटी, टाँगें उनके कंधों पर, पूरा शरीर उनके नीचे। हर धक्के पर उसके मुम्मे हिल रहे थे। लेस की ब्रा एक बाजू पर लटकी थी।
“आह्ह्ह! रामू जी… मैं आ रही हूँ… रुक जाओ… रुक… नहीं रुकना… अह्ह्ह्ह्ह… तारस खाकर भी मत निकालना… बस नाम लेकर मारो…!”
“नाम ले,” उन्होंने हुक्म दिया।
“रामू जी… रामू जी… रामू जी… आपकी… आपकी… अह्ह्ह… भर दो… अंदर भर दो… मैं आपकी हूँ… सनी नहीं… आज सनी नहीं… अह्ह्ह्ह!”
नाम सोफे में गूँजा। फोन तकिए तले चुप था। सनी के घर में सिर्फ रिंगटोन की कटी हुई याद बची थी, और वह खाली कॉल-लॉग जिसमें लिखा था—Ruhi. No answer. No answer. No answer.
रामू ने आखिरी लय तेज़ की। रुही की चीख टूटकर सिसकी हो गई, सिसकी टूटकर एक लंबी आह हो गई। उसके नाखून उनकी पीठ में गड़े। आँसू गालों पर थे। मुँह खुला था।
“तारस… अब तारस… अब प्यार से… अब निकालकर प्यार से लगाओ… मैं सह नहीं सकती इतनी… अह्ह… लेकिन मत निकलो पूरी तरह… अंदर ही रहो… रामू जी अंदर ही रहो…”
रामू उसके अंदर ही रुके। साँसें दोनों की एक लय में थीं। उन्होंने उसके गीले माथे पर चुम्बन लिया।
“अब प्यार,” उन्होंने कहा। “अब धीमे। लेकिन निकलूँगा नहीं। तू मेरी है आज रात।”
रुही ने आँखें मूंदकर सिर हिलाया। आवाज़ अब भीख जैसी नहीं, समर्पण जैसी थी—
“हाँ… आपकी… जितना चाहो… बस थोड़ा थाम के… मैं आपकी बहू हूँ… आपकी मादा हूँ… चीखने दो… तारस बाद में देना…”
तकिए तले फोन एक बार और काँपा। साइलेंट।
सनी की कॉल।
कोई नहीं उठा।
और सोफे पर रामू ने फिर हिम्मत की—धीरे, गहरे, पूरे—जबकि घर के दूसरे कमरे से सोनिया की आवाज़ अभी भी आ रही थी, और सनी के घर में सिर्फ एक सवाल घूम रहा था: वहाँ आखिर क्या चल रहा है?
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बेडरूम में लय पहले से टूटी हुई थी। जामिल सोनिया के ऊपर थे, टोपी टेढ़ी, पसीना छाती पर। सोनिया की कराह अधूरी रह गई जब लिविंग रूम से एक चीख दीवार पार करके आई—
“आह्ह्ह्ह! रामू जी… तारस… तारस खाओ…!”
जामिल के हाथ सोनिया की कमर पर थम गए। दोनों ने साँस रोककर सुना।
सोनिया पहले हँसी, धीमी, काँपती हुई। “सुन… बुलबुल चीख रही है।”
जामिल ने कान लगाए जैसे दरवाज़े की दरार से और निकलेगा। रुही की आवाज़ साफ आ रही थी—दर्द, भीख, नाम।
“निकल… दर्द हो रहा है… पूरी अंदर… मैं मर गई…!”
जामिल के गले में गरमाहट उतर गई। उसने सोनिया से आँख नहीं हटाई, लेकिन मन सोफे की तरफ भाग गया। वही गोरी जाँघें। वही लेस। नाचते वक्त जब लंड उसकी जाँघ से टकराया था… चिकनी… ठंडी नहीं, गर्म। अब वही आवाज़ चीख रही है। रामू उसे चीर रहा है।
“कितनी नाज़ुक चीख है यार,” जामिल ने फुसफुसाया। “जैसे सच में फट रही हो।”
सोनिया ने उसके गाल पर थप्पड़ जैसा स्पर्श किया। “फट नहीं रही। खुल रही है। फर्क पता नहीं तुझे?”
“पता है।” जामिल की आवाज़ भारी हो गई। “पता है इसीलिए सुन रहा हूँ।”
फिर रुही की भीख आई, लंबी—
“रामू जी… दस सेकंड… दस सेकंड निकालो… फिर दे देना… तारस खाओ अपनी बहू पर…!”
सोनिया की आँखें चमक उठीं। “बहू। सुन रहा है? वह खुद को बहू कह रही है। और तारस माँग रही है। मतलब पूरा अंदर है।”
जामिल ने होंठ चाटे। मन में तस्वीर बन गई—रुही सोफे पर, टाँगें रामू के कंधों पर, गोरा पेट तना हुआ, मुम्मे लेस से बाहर, मुँह खुला, आँसू। वह शरीर नाच में कितना सिमटा था। कितना छुपने वाला। अब चीख रहा है। रामू किस्मत वाला है। ऐसी कबूतरी को नीचे दबोचना… वह चूत कितनी तंग होगी जो इतनी चीख निकल रही है। मेरे हाथ में वह कमर आई होती तो…
उसने यह आखिरी बात नहीं बोली। सोनिया के सामने अधूरी रखी।
“तेरे मुँह पर लिखा है,” सोनिया बोली। “तू उसे सोच रहा है।”
जामिल मुस्कुराया, दोष मानते हुए। “सोच रहा हूँ। इनकार नहीं। तू नंगी मेरे नीचे है, और मैं दूसरी की चीख सुन रहा हूँ। गलत है। लेकिन चीख ऐसी है सोनिया… जैसे कोई नई दुल्हन पहली रात सह रही हो।”
“नई दुल्हन नहीं,” सोनिया ने उसकी दाढ़ी पकड़ी। “नई रुही है। आज उसने खुद कहा—भाई-भाभी नहीं, मर्द और मादा। अब मादा चीख रही है। तू जलता है या मज़ा ले रहा है?”
जामिल ने ईमानदारी से कहा, “दोनों।”
बाहर फिर चीख उठी—
“आह्ह्ह्ह्ह! यह वाला मत… बहुत गहरा… मैं सह नहीं पा रही…!”
जामिल की साँस उखड़ गई। उसने सोनिया को और कस लिया, लेकिन आँखें दरवाज़े की तरफ थीं। चिकना बदन। नाचते वक्त पसीना। जब मैं किनारे से गुज़रा और लंड उसकी कमर से सटा… वह बेखबर बनी रही। बेखबर नहीं थी। जानती थी। मुस्कुराई भी थी—देख सकते हो, ले नहीं सकते। अब ले रहा है कोई और। मैं सुन रहा हूँ। यही मेरी सज़ा है, यही मेरा मज़ा है।
सोनिया ने उसकी ठुड्डी घुमाई। “इधर देख। मैं यहाँ हूँ। वह रामू की है। तूने सुना ना उसका वाक्य?”
“सुना। देख सकते हो, ले नहीं सकते।” जामिल ने दोहराया। कड़वाहट और इच्छा एक साथ। “इसलिए सुन रहा हूँ। ले नहीं सकता तो सुन तो लूँ।”
सोनिया हँसी। “शैतान है तू। चल, बता—उसके बदन में सबसे ज्यादा क्या याद रह गया?”
जामिल चुप रहा एक पल। फिर बोला, धीरे, जैसे कबूल कर रहा हो—
“जाँघ। बहुत चिकनी। और वह शर्म। शर्म के नीचे जो तड़प है ना… वही चीख बनकर आ रही है। मुम्मे जब रामू की छाती से दबे थे, आवाज़ निकली थी। मैंने पूछा था क्या हुआ। तूने कहा था मर्द नहीं समझेंगे। अब समझ रहा हूँ।”
“समझदार हो गया?” सोनिया ने उसे नीचे खींचा। “तो अपनी समझ मुझ पर उतार। उसकी चीख को ईंधन बना, उसकी चूत को नहीं।”
जामिल झुका, सोनिया के गले पर मुँह रखा, लेकिन कान अभी भी बाहर थे। रुही की आवाज़ फिर आई, अब टूटी हुई, रोती-माँगती—
“मैं आपकी दासी… आपकी बहू… बस एक बार छोड़ दो… फिर जितना मारना मारना… अह्ह्ह… नाम लेकर मारो…!”
जामिल की उंगलियाँ सोनिया की पीठ पर गड़ गईं। “सुन… दासी बोल रही है। रामू ने उसे तोड़ दिया लगता है।”
सोनिया की आवाज़ में एक अजीब गर्व था। “तोड़ा नहीं। खोल दिया। मैंने सुबह आईने के सामने भेजा था उसे। वह सजकर आई। अब चीख रही है। यही तो जन्म है नई रुही का।”
“तूने भेजा, रामू ले रहा है, मैं सुन रहा हूँ।” जामिल ने कड़वी मुस्कान दी। “तीनों का हिस्सा अलग है।”
“तेरा हिस्सा मैं हूँ,” सोनिया ने साफ कहा। “उसका चिकना बदन देख, याद रख, तड़स। बस। लंड मेरी तरफ रह।”
जामिल ने हाँ में सिर हिलाया। फिर भी जब बाहर रुही ने चीखा—“भर दो… अंदर भर दो… आज सनी नहीं…!” तो उसके पेट में मरोड़ सी उठी। सनी नहीं। रामू। वह शर्मीली औरत जो मुँह छुपाती थी, अब पति का नाम काट रही है चीख के बीच। वह बदन कितना पागल हुआ होगा। कितनी गीली होगी वह छोटी सी जगह जो इतना बड़ा लंड सह रही है। रामू के कंधों पर टाँगें… मैंने सोचा था कभी…
उसने आँखें भींच लीं। सोनिया के कान में कहा, “मैं तड़स रहा हूँ। छुपा नहीं रहा। लेकिन तेरे से बाहर नहीं जाऊँगा।”
सोनिया ने उसके होठ चूसे। “अच्छा मर्द। तड़स के साथ मुझे चोद। उसकी चीख सुन, मेरी चीख निकाल।”
जामिल ने फिर धक्का दिया। सोनिया की आवाज़ उठी। बाहर रुही की भीख और अंदर सोनिया की कराह एक घर में मिल गईं। जामिल के मन में रुही का चिकना बदन बार-बार आया—जाँघ, कमर, दबे मुम्मे, काजल से भीगी आँखें, खुला मुँह—और हर बार उसने उस तस्वीर को सोनिया के शरीर पर पटक दिया, जैसे इच्छा को जगह दे रहा हो, सीमा नहीं तोड़ रहा हो।
दरवाज़ा अभी भी एक दरार खुला था।
एक तरफ़ तारस की भीख।
एक तरफ़ तड़स का इकरार।
बीच में दो मर्द, दो मादाएँ, और एक चीख जो पूरे घर की संपत्ति बन चुकी थी।
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