01-09-2026, 06:36 PM
![[Image: grok-1788266457929.jpg]](https://i.ibb.co/SDLXJPc2/grok-1788266457929.jpg)
सनी घर पर था। देर रात का कमरा, टीवी बंद, फोन कान से चिपका। पहली कॉल अनजाने में लग गई थी—आहें, सोनिया की चीख, जामिल का नाम, और एक दूसरी औरत की दबी सिसकी। वह घबरा गया। अँगूठा फिसला। लाल बटन दब गया।
कॉल कट गई।
“नहीं… नहीं नहीं—” उसने फिर डायल किया। हाथ काँप रहे थे। रुही। अभी। अभी उठा।
फोन सोफे और तकिए की दरार में मुँह के बल पड़ा था। साइलेंट था। स्क्रीन नीचे। वाइब्रेशन कपड़े में दबकर मर गया। रुही को कुछ नहीं पता चला।
रामू उसके ऊपर थे। लingerie आधी उतर चुकी थी। ब्रा खुली पड़ी थी। पैंटी एक जाँघ पर अटकी थी। उनका लंड उसकी गीली चूत के मुँह पर टिका था।
“देख मुझे,” उन्होंने कहा। “अब मैं अंदर जा रहा हूँ।”
रुही ने उनकी कलाई पकड़ी। आँखें बड़ी थीं। “रामू जी… धीरे… प्लीज… आप बहुत बड़े हो…”
उन्होंने जवाब में धक्का दिया। आधा अंदर। रुही की कमर उछली। आवाज़ फट गई—
“आह्ह्ह्ह्ह! निकल… दर्द… रामू जी… दर्द हो रहा है…!”
“सह,” उन्होंने दाँत भींचे। “तेरी चूत मेरी है। खुल। खुल जा।”
एक और धक्का। पूरा। जड़ तक। रुही की टाँगें उनके कमर पर लिपट गईं, फिर छूट गईं, फिर कंधों की तरफ चढ़ने लगीं। चीख लंबी निकली—
“आह्ह्ह्ह! मर गई… पूरी… पूरी अंदर… रामू जी… तारस खाओ… प्लीज तारस खाओ…!”
सनी के फोन पर घंटी बज रही थी। उठ नहीं रही थी। उसने कटी कटी साँस में सोचा—साइलेंट होगा। सो गई होगी। नहीं… अभी तो कराहें आ रही थीं। उठा क्यों नहीं रही?
फिर डायल। फिर घंटी। फिर खाली रिंग।
सोफे पर रामू रुक नहीं रहे थे। पहले धीमे। फिर गहरे। हर बार जड़ तक। रुही के नाखून उनकी पीठ पर रेखाएँ खींच रहे थे।
“आह्ह… आह्ह्ह… रामू जी… इतना गहरा मत… मेरी चूत फट जाएगी… भिख माँगती हूँ… थोड़ा सा तारस…”
रामू झुके। उसके होंठ काटे। “तारस बाद में। पहले मेरा हक। बोल—किसकी चूत है?”
“आप… आपकी… आह्ह्ह! आपकी चूत… रामू जी की… बस धीरे… आह्ह धीरे करो ना…!”
उन्होंने धीरे नहीं किया। लय बढ़ी। सोफा खटकने लगा। रुही की चीखें टूट-टूटकर निकल रही थीं—कभी नाम, कभी नों, कभी और।
“नहीं… नहीं इतनी तेज़… अह्ह्ह्ह! रामू जी… मैं चीखूँगी… सोनिया सुन लेगी… अह्ह… सुन लेगी…!”
अंदर से सोनिया की आवाज़ पहले से आ रही थी। अब दोनों घर एक साथ गूँज रहे थे। रामू ने रुही की टाँगें अपने कंधों पर चढ़ा दीं। कोण बदल गया। लंड और गहराई तक चला।
रुही की आँखों से आँसू निकल आए। मुँह खुला रह गया।
“आह्ह्ह्ह्ह! यह वाला… यह वाला मत… बहुत गहरा है… मैं मर रही हूँ… तारस… तारस कर दो रामू जी… अपनी बहू पर तारस खाओ…!”
“बहू चीखेगी तो चीखे,” उन्होंने साँस भारी करते हुए कहा। “मैं निकालूँगा नहीं। तू गीली हो रही है दर्द में भी।”
“हाँ… गीली हूँ… आह्ह… आपकी वजह से… लेकिन प्लीज… दस सेकंड… दस सेकंड निकालो… मैं सँभाल लूँ… फिर दे देना… अह्ह्ह्ह!”
रामू ने दस सेकंड नहीं दिए। उन्होंने उसकी कलाई सोफे के ऊपर दबाई। दूसरा हाथ कमर के नीचे गया। धक्के पूरे होने लगे—गहरे, भारी, मर्दाना।
रुही की आवाज़ अब भीख बन चुकी थी—
“रामू जी… मैं आपकी दासी… आपकी रंडी… आपकी बहू… बस एक बार छोड़ दो… फिर जितना मारना मारना… अह्ह… अह्ह्ह… मैं सह नहीं पा रही… सह नहीं पा रही…!”
“सह रही है,” उन्होंने उसके माथे से माथा सटाया। “देख तेरी चूत कैसे निगल रही है। बोल—और चाहिए?”
रुही ने सिर हिलाया। इनकार और माँग एक साथ। “नहीं… हाँ… नहीं इतना तेज़… हाँ अंदर… रामू जी मैं पागल हो गई… आपकी चूत पागल हो गई… तारस… थोड़ा सा तारस…!”
सनी ने पाँचवीं बार कॉल किया। कान पर फोन। घर का अँधेरा। कोई नहीं उठा। दिमाग घूम रहा था—पहली कॉल में चीखें थीं। सोनिया। जामिल। रुही का फोन खुला था। अब उठ नहीं रही। फोन गिर गया? बैटरी? या… वह जानबूझकर नहीं उठा रही?
उसने मैसेज टाइप किया हाथ काँपते हुए: Ruhi pick up. Please. I heard something. Call me.
भेजा। देखा। डिलीवर्ड भी नहीं दिखा—फोन तकिए तले दबा था, नेटवर्क की हल्की सी लाइट भी कपड़े में खो गई।
सोफे पर रामू ने रुही को पलटने जैसा किया, फिर वही रखा—पीठ सोफे से सटी, टाँगें उनके कंधों पर, पूरा शरीर उनके नीचे। हर धक्के पर उसके मुम्मे हिल रहे थे। लेस की ब्रा एक बाजू पर लटकी थी।
“आह्ह्ह! रामू जी… मैं आ रही हूँ… रुक जाओ… रुक… नहीं रुकना… अह्ह्ह्ह्ह… तारस खाकर भी मत निकालना… बस नाम लेकर मारो…!”
“नाम ले,” उन्होंने हुक्म दिया।
“रामू जी… रामू जी… रामू जी… आपकी… आपकी… अह्ह्ह… भर दो… अंदर भर दो… मैं आपकी हूँ… सनी नहीं… आज सनी नहीं… अह्ह्ह्ह!”
नाम सोफे में गूँजा। फोन तकिए तले चुप था। सनी के घर में सिर्फ रिंगटोन की कटी हुई याद बची थी, और वह खाली कॉल-लॉग जिसमें लिखा था—Ruhi. No answer. No answer. No answer.
रामू ने आखिरी लय तेज़ की। रुही की चीख टूटकर सिसकी हो गई, सिसकी टूटकर एक लंबी आह हो गई। उसके नाखून उनकी पीठ में गड़े। आँसू गालों पर थे। मुँह खुला था।
“तारस… अब तारस… अब प्यार से… अब निकालकर प्यार से लगाओ… मैं सह नहीं सकती इतनी… अह्ह… लेकिन मत निकलो पूरी तरह… अंदर ही रहो… रामू जी अंदर ही रहो…”
रामू उसके अंदर ही रुके। साँसें दोनों की एक लय में थीं। उन्होंने उसके गीले माथे पर चुम्बन लिया।
“अब प्यार,” उन्होंने कहा। “अब धीमे। लेकिन निकलूँगा नहीं। तू मेरी है आज रात।”
रुही ने आँखें मूंदकर सिर हिलाया। आवाज़ अब भीख जैसी नहीं, समर्पण जैसी थी—
“हाँ… आपकी… जितना चाहो… बस थोड़ा थाम के… मैं आपकी बहू हूँ… आपकी मादा हूँ… चीखने दो… तारस बाद में देना…”
तकिए तले फोन एक बार और काँपा। साइलेंट।
सनी की कॉल।
कोई नहीं उठा।
और सोफे पर रामू ने फिर हिम्मत की—धीरे, गहरे, पूरे—जबकि घर के दूसरे कमरे से सोनिया की आवाज़ अभी भी आ रही थी, और सनी के घर में सिर्फ एक सवाल घूम रहा था: वहाँ आखिर क्या चल रहा है?
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