01-09-2026, 06:10 PM
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सोफे पर रात अब धीमी नहीं रह गई थी। अंदर से सोनिया की कराहें आ रही थीं—कभी दबी, कभी खुली। बिस्तर की लकड़ी हल्के-हल्के बज रही थी। रुही रामू की गोद में थी, मरून लेस में, मेकअप हल्का सा बिखरा हुआ। उसके नाखून उनकी पीठ पर थे।
रामू ने जल्दी नहीं की। उन्होंने रुही का चेहरा थामा।
“शांत। पहले सुन मेरी बात।”
रुही की आवाज़ काँपी, “रामू जी… वे कर रहे हैं… मैं सुनकर पागल हो रही हूँ…”
“पागल हो,” उन्होंने कहा। “लेकिन भाग नहीं। आज मैं धीरे लूँगा। तू माँगेगी, मैं दूँगा। समझी?”
उसने सिर हिलाया। “हाँ… जैसा आप कहो।”
रामू ने पहले उसके माथे पर चुम्बन लिया। फिर गाल पर। फिर होंठों पर—हल्का, फिर गहरा। जीभ अंदर आई, निकली, फिर आई। रुही की कमर लचक गई। उनके हाथ लingerie के ऊपर रहे—कमर पर, पीठ पर, जाँघ की लेस पर। अंदर नहीं गए।
“यहाँ,” उन्होंने उसके कान में कहा। “यहीं रह। कपड़े अभी मेरे हैं उतारने को।”
“उतार दो…” रुही फुसफुसाई।
“नहीं। अभी नहीं।”
इतने में गलियारे में कदमों की आवाज़ आई। रुही झटके से उनकी छाती में दुबक गई। सोनिया बाहर आई—पसीने से भीगी, बाल चिपके, सिर्फ पैंटी में, साँसें उखड़ी हुईं। उसने किचन की तरफ जाते-जाते सोफा देखा। रुक गई। पानी का गिलास हाथ में लिया, घूँट भरा, फिर मुस्कुराई।
“ओहो,” उसने धीरे कहा। “नई रुही सोफे पर सिमटी हुई है। और रामू… तू अभी कपड़े भी नहीं उतारे इसके?”
रुही की आवाज़ तकिए जैसी दबी निकली, “सोनिया… जाओ न…”
सोनिया ने एक और घूँट लिया। “जा रही हूँ। बस पानी लिया। अंदर वाला भूखा है बहुत।” फिर रुही की तरफ देखकर बोली, “तू भी चीख ले आज। घर बड़ा है, आवाज़ समा जाएगी।”
रामू ने सोनिया की तरफ सिर किया। “जा। अपने मर्द के पास जा।”
सोनिया हँसी और अधखुले दरवाज़े में गायब हो गई। थोड़ी देर बाद अंदर फिर से उसकी आवाज़ उठी—“आह्ह… जामिल…”
रुही ने आँखें भींच लीं। “वह देख गई… मेरी हालत देख गई…”
“देखने दे,” रामू ने उसकी ठुड्डी उठाई। “तू मेरी गोद में है। बाकी सब बाहर की बात है।”
उन्होंने उसके मुम्मे लingerie के ऊपर से दबाए। रुही की आवाज़ निकली, “आह्ह्ह…” उनके हाथ धीरे थे, लेकिन सख्त। उन्होंने ब्रा की स्ट्रैप उंगली से सरकाई, पूरी नहीं उतारी। पेट पर होंठ रखे। नाभि चाटी। रुही का शरीर काँपा।
“रामू जी… और…”
“माँग। साफ माँग।”
“आपको चाहिए… आपका हाथ… आपका मुँह… मुझे खाली मत छोड़ो…”
तभी सोफे के किनारे रखा फोन काँपा। स्क्रीन जल उठी। Sunny calling… नहीं। मैसेज था।
Baby, flight delay. You sleeping? Miss you.
रुही की साँस अटक गई। एक पल के लिए पुरानी औरत कमरे में आ गई—बीवी वाली, झूठ वाली, फोन छुपाने वाली। रामू ने स्क्रीन देख ली। कुछ नहीं बोले। सिर्फ देखा।
रुही का हाथ काँपा। उसने फोन उठाया। पढ़ा। आँखें भर आईं… फिर उसने फोन उल्टा कर दिया। स्क्रीन नीचे। सोफे के पीछे धकेल दिया जैसे वह चीज़ अब इस गोद में नहीं चलती।
“नहीं देखना,” उसने फुसफुसाया। “आज नहीं। आज मैं… आपकी हूँ।”
रामू ने उसके गाल पर अंगूठा फेरा। “सही किया। अब मेरी तरफ देख।”
रुही ने देखा। काजल थोड़ा बह चुका था। होंठ खुले थे।
“बोल,” उन्होंने कहा। “किसकी है तू?”
“आपकी।”
“नाम ले।”
“रामू जी की। कामत परिवार की बहू। आपकी मादा।”
अंदर सोनिया की चीख थोड़ी तेज़ हुई। बाहर रामू ने रुही को सोफे पर लिटा दिया। खुद उसके ऊपर आ गए। लingerie अभी थी। उनके अंडरवियर की सख्त गरमाहट उसकी जाँघों के बीच आ गई। रुही की टाँगें अपने-आप खुलीं।
“यहीं,” उन्होंने कहा। “सोफे पर। उनके कमरे की आवाज़ें सुनती रह। और मेरे नीचे चीख।”
“हाँ… यहीं… प्लीज…”
उन्होंने ब्रा का हुक खोला। लेस सरकी। मुम्मे बाहर आए। रामू ने एक नोक मुँह में ली, चूसी, दाँतों से हल्के से काटा। रुही का कमर उठा। आवाज़ दबाने के लिए उसने अपना हाथ मुँह पर रखा। रामू ने हाथ हटा दिया।
“दबा मत। निकलने दे।”
“सोनिया सुन लेगी…”
“सुन ले। तूने कहा था—देख सकते हैं, ले नहीं सकते। सुन भी सकते हैं। ले सिर्फ मैं रहा हूँ।”
पैंटी के ऊपर से उनके हाथ ने उसकी चूत दबानी शुरू की। गीली थी। बहुत। रामू की उंगली कपड़े के ऊपर से फाँक के बीच रुकी। रुही की साँस टूटी।
“रामू जी… अंदर…”
“धीरे,” उन्होंने दोहराया। “मैंने कहा था। पहले मेरे हाथ से। फिर मेरे मुँह से। फिर मैं।”
उंगली ने पैंटी का किनारा सरकाया। चिकनी, गुलाबी, तड़पती हुई जगह उनके खुरदरे स्पर्श से सिकुड़ गई। रुही की आँखें भर आईं—इस बार रोने से नहीं, भर जाने से। अंदर जामिल की भारी साँस और सोनिया की गीली आवाज़ें एक लय में चल रही थीं। बाहर सोफे की चमड़ी हिल रही थी।
रामू झुके। उसकी चूत पर मुँह रखा। जीभ कपड़े के ऊपर से, फिर कपड़े हटाकर। रुही की टाँग उनकी कंधे पर चढ़ गई। जामिल वाली पुरानी बात अचानक सच के किनारे आ गई—जब तेरी टाँगें रामू के कंधों पर होंगी, तब रामू जी ही बोलना पड़ेगा।
“रामू जी…” वह लगभग रोते हुए बोली। “रामू जी… वहाँ… मत छोड़ो… और चाटो… प्लीज…”
उन्होंने चाटा। धीरे। फिर जोर से। फिर धीरे। रुही की आवाज़ सोफे में गूँजने लगी—छोटी चीखें, सिसकियाँ, नाम। फोन पीछे उल्टा पड़ा था। सनी का मैसेज अंधेरे में सो रहा था। सोनिया के कमरे से आवाज़ें आ रही थीं। और रुही पहली बार उन आवाज़ों से नहीं भाग रही थी। वह उन्हीं आवाज़ों के बीच अपने मर्द के मुँह पर कमर दे रही थी।
रामू ने सिर उठाया। होठ चमक रहे थे। उन्होंने उससे पूछा, “अब?”
रुही ने दोनों हाथ उनके चेहरे पर रखे। शर्म थी। भूख थी। फैसला था।
“अब आप। सोफे पर। मुझे आपके नीचे कर दो। पूरी रात… यहीं।”
रामू ने अंडरवियर नीचे की। तना हुआ लंड उसकी गीली चूत पर टिका। रुही की आँखें बड़ी हो गईं। उसने उन्हें पकड़ लिया। अंदर सोनिया ने फिर आह भरी। बाहर रुही ने फुसफुसाया—
“ले लो रामू जी। मैं तैयार हूँ। नई रुही भी… आपकी बहू भी…”
और सोफा उस रात का पहला बिस्तर बन गया—अधखुले दरवाज़े के सामने, उल्टे फोन के पीछे, और दो मर्दों-दो मादाओं वाले घर के ठीक बीच में।
![[Image: grok-1788266078629.jpg]](https://i.ibb.co/JW57ybmV/grok-1788266078629.jpg)
फोन सोफे के पीछे सरकाते हुए रुही का अँगूठा स्क्रीन पर फिसल गया। उसे पता नहीं चला। उल्टी पड़ी स्क्रीन एक पल जली, हरी बत्ती सी दबी, और कॉल लग गई।
Calling Sunny…
फिर कनेक्ट।
फोन तकिए और सोफे की दरार में मुँह के बल पड़ा रह गया—माइक खुला, स्क्रीन अँधेरे में।
सनी बैठा था। उसी ने मैसेज किया था—Baby, miss you.
अचानक कॉल आ गई। उसने मुस्कुराते हुए उठाया। “हेलो? रुही?”
जवाब में पहले कुछ नहीं। कपड़े की रगड़। किसी की भारी साँस। फिर दूर से, जैसे दूसरे कमरे से—
“आह्ह्ह… जामिल… और…”
सनी की भौंहें चढ़ीं। जामिल? सोनिया के घर… नौकर?
उसने कान और लगाए। “रुही? तू कहाँ है? फोन गिरा है क्या?”
सोफे पर रुही को कॉल की खबर नहीं थी। रामू उसके ऊपर थे। उनके होठ उसके गले पर थे। रुही की आवाज़ दबी थी, कानों के पास—
“रामू जी… धीरे… वहाँ… आह्ह…”
माइक तक यह फुसफुसाहट लगभग नहीं गई। सिर्फ एक गीली सिसकी फूटी, नाम टूटकर रह गया। सनी को लगा जैसे कोई कराह का टुकड़ा हो, शब्द नहीं।
फिर सोनिया के कमरे से साफ आवाज़ आई, दरवाज़ा अधखुला था, आवाज़ घर में तैर रही थी—
“आह्ह्ह्ह! मत रोक… चीखने दे… आह्ह… जामिल!”
सनी कुर्सी पर सीधा हो गया। कान के इर्द-गिर्द शोर था, लेकिन यह शोर घर का था। उसकी पत्नी के फोन से आ रहा था।
ये सोनिया है। पक्का। लेकिन… जामिल? और रुही का फोन क्यों खुला है?
उसने फिर कहा, इस बार तेज़, “रुही! रुही सुन रही है? क्या हो रहा है वहाँ?”
कोई नहीं सुन रहा था। रुही की टाँग रामू के कंधे पर थी। उनके मुँह ने उसकी चूत पर फिर से काम शुरू किया। रुही ने तकिया मुँह पर दबाया, फिर रामू ने तकिया हटा दिया।
“दबा मत।”
“आह्ह्ह… रामू जी… मैं… मैं चीखूँगी…”
नाम फिर फुसफुसाहट में डूब गया। सनी तक सिर्फ यह पहुँचा—
“आह्ह्ह… मैं… चीखूँगी…”
सनी का दिल बैठने लगा। चीखेगी? कौन चीखेगी? रुही? सोनिया के साथ लेडीज नाइट है… फिर ये आवाज़ें?
दिमाग भागने लगा।
शायद मूवी चल रही है।
शायद सोनिया ने कोई गंदी फिल्म लगा दी।
लेकिन मूवी में नाम जामिल क्यों आ रहा है?
सोनिया शादीशुदा है। पति-बेटा गाँव गए हैं। नौकर के साथ…? नहीं। रुही ऐसा घर कैसे—
अंदर सोनिया की चीख और उठी, इस बार लंबी, टूटी—
“आह्ह्ह्ह्ह! वहाँ… मत छोड़… मैं मर गई… आह्ह!”
सनी ने कान बंद करने जैसा किया, फिर और चिपका लिया। शर्म और डर एक साथ। अगर कोई और सुन ले लाउंज में… उसने वॉल्यूम घटाया, फोन गाल से सटाए रखा।
सोफे पर रामू रुही के अंदर उतरने वाले थे। लंड उसकी गीली चूत पर टिका था। रुही ने उनके कान में कहा, लगभग बिना आवाज़ के—
“ले लो… मैं आपकी हूँ… फोन… फोन पीछे है, आज नहीं देखना…”
सनी को “फोन” शब्द का धुँधला सा टुकड़ा भी नहीं मिला। मिला सिर्फ रुही जैसी आवाज़ का एक काँपता हुआ—
“आह्ह… ले लो…”
उसके हाथ में कॉफ़ी का कप काँपा।
ले लो? किसे कह रही है? मुझे? कॉल पर है और सो रही है? नहीं, यह सोने वाली आवाज़ नहीं।
एक और संभावना काँटे की तरह चुभी।
क्या सोनिया ने कोई मर्द बुलाया है? रुही वहीं बैठी है? फोन अनजाने में लग गया?
यह सोचकर उसे गुस्सा भी आया, राहत भी। रुही तो मेरी है। वह नहीं कर सकती। वह शर्मीली है। संसकारी है।
इसी पल रुही की आवाज़ पहली बार थोड़ी खुली—रामू के धक्के के साथ, सोफे की चमड़ी की आवाज़ के साथ—
“आह्ह्ह्ह! राम—… धीरे… आह्ह…”
“राम” कटा हुआ था। अधूरा। सनी के कान ने उसे “राम” नहीं, एक अजनबी कराह समझा। दिमाग ने जोड़ा—शायद ‘रुको’ कहा। या सोनिया का नाम।
उसने निगलकर कहा, “रुही अगर तू सुन रही है तो फोन उठा। मैं परेशान हो रहा हूँ। वहाँ क्या चल रहा है?”
जवाब में सोनिया की हँसी और कराह मिली—
“चीख ले बुलबुल! घर बड़ा है… आह्ह्ह जामिल… और अंदर…”
बुलबुल।
सनी ने यह शब्द पहले भी सुना था। सोनिया रुही को बुलबुल कहती थी। खून ठंडा पड़ गया।
सोनिया रुही से बात कर रही है। दोनों एक साथ हैं। और कोई मर्द भी है। जामिल।
लेकिन रुही बोल क्यों नहीं रही मुझसे? फोन पड़ा है। जानबूझकर?
नहीं। रुही जानबूझकर नहीं छोड़ेगी। गिरा होगा।
गिरा होगा तो इतनी देर तक कोई उठाता क्यों नहीं?
सोफे पर रामू पूरी तरह अंदर थे। रुही की आँखें भिंच गई थीं। उसकी चीख दबाने की कोशिश टूट रही थी। हर धक्के पर एक छोटी चीख, फिर नाम—रामू जी—जो माइक से बहुत दूर, छाती में दबकर मर रहा था।
सनी को श्रृंखला यूँ सुनाई दी—
आह्ह…
आह्ह्ह्ह…
सोनिया की तेज़ चीख।
फिर एक और औरत की दबी चीख।
बिस्तर या सोफे की लय।
दो अलग आवाज़ें। दो अलग कमरे जैसे।
उसके दिमाग में तस्वीर बनने लगी और वह तस्वीर को मना कर रहा था।
मेरी बीवी। सोनिया के घर। लेडीज नाइट।
नौकर। कराहें। दो औरतें।
नहीं। कोई प्रैंक है। सोनिया की शरारत है। रुही को फँसाया होगा।
रुही मुझे मिस करती है। उसने फोन नहीं काटा मतलब वह पास है। सो गई होगी। फोन साइड में पड़ गया। मूवी चल रही है। पॉर्न चल रहा है। सोनिया पागल है कभी-कभी।
वह खुद को यही दोहराता रहा। क्योंकि दूसरा सच बहुत बड़ा था। फोन कान से चिपकाए बैठा रहा। अंदर घर में रामू ने रुही की टाँग और उठाई। रुही ने उनके गले में मुँह रखकर चीखा। सोनिया ने उसी लय में जवाब दिया जैसे दोनों घर की दीवारें एक गीत गा रही हों।
सनी ने आँखें बंद कीं। एक वाक्य उसके मुँह से निकला, जो कोई नहीं सुन रहा था—
“रुही… तू वहाँ ठीक तो है ना?”
जवाब में सिर्फ आहें थीं।
एक परिचित।
एक अधपरिचित।
और उन आहों के नीचे वे बातें थीं जो उसे कभी नहीं पहुँचीं—रामू जी, आपकी हूँ, फोन पीछे है, आज नहीं देखना।
कॉल चलती रही।
एक तरफ़ सोफा।
बीच में एक खुला माइक, जो चीखें तो ले जा रहा था, समर्पण के शब्द नहीं।


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