01-09-2026, 02:44 PM
बाबाजी ने मयूरी के चमकते हुए स्तनों को देखते हुए गहरी आवाज़ में कहा,
“इन्हें पीने की भी एक कला होती है मयूरी… रुको, मैं तुम्हें दिखाता हूँ।”
मयूरी कुछ बोल पाती, उससे पहले ही बाबाजी नीचे झुक गए और अपना मुंह उसके दाएँ स्तन पर लगा दिया। उन्होंने उसके मोटे, बेर जैसे निप्पल को होंठों के बीच फँसा लिया और जोरदार चुप्पा मारा। मैत्री की प्रस्तुति।
पुच्च्च्छ्ह्ह्ह…
एक जोरदार आवाज़ के साथ उन्होंने निप्पल को मुँह में खींच लिया। दूध, शहद और सरसों के तेल का मीठा-तीखा, चिपचिपा स्वाद उनके मुंह में फैल गया।
इसके परिणाम स्वरुप, मयूरी की चूत से अविरल, गाढ़ा रस निकलने लगा। वह पेटीकोट और बाबाजी के बिस्तर पर अपना निशान छोड़ने लगा। उसकी जाँघें काँप रही थीं।
बाबाजी ने दोनों विशाल तरबूजों को अपने मजबूत हाथों में भर लिया और बारी-बारी से एक-एक करके मुंह में लेने लगे। वे निप्पलों को ऐसे चूस रहे थे, मानो उनमें से दूध निकल रहा हो। उनकी जीभ कभी निप्पल के चारों ओर घुम रही थी, कभी तेज़ी से चाट रही थी, तो कभी दाँतों से हल्का-हल्का काट रही थी।
अब ऐसी परिस्थिति में कोई अपने आपको कब तक संभाल सकता है भला। मयूरी से अब रहा नहीं गया। उसने दोनों हाथ बाबाजी के सिर के पीछे रख दिए और उनकी चुटिया को अपनी उँगलियों में कसकर पकड़ लिया। फिर उसने बाबाजी के मुँह को अपनी छातियों पर और जोर से दबा दिया।
“अह्ह्ह्ह्ह्ह…… बाबाजी जी…… मmmmmm…… हाँ……”
मयूरी बाबाजी की लंबी चुटिया को स्टेयरिंग की तरह घुमा-घुमाकर उनके सिर को अपनी इच्छा अनुसार ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ कर रही थी। बाबाजी कुत्ते की तरह अपनी लार बहाते हुए उसके दोनों गुब्बारों पर अपना निशान छोड़ रहे थे। चूस-चूस कर अपने विजय ध्वज उसके बोब्लो पर गाड रहे थे। बिना कोई झिझक, बिना कोई रोक-टोक।
उनका खड़ा, लोहे जैसा कठोर लंड मयूरी की जाँघ से बार-बार टकरा रहा था। उसकी मोटाई और गर्मी को महसूस करते ही मयूरी के मुँह से एक दबी हुई चीत्कार निकली।
“ओह्ह्ह आ...प....का.....” मैत्री निर्मित कहानी।
उसी पल उसकी चूत से ढेर सारा गाढ़ा, गरम रस फूट पड़ा। उसका पूरा शरीर तनकर काँप उठा। बरसों बाद उसे ऐसी गहरी, शुद्ध संतुष्टि मिली थी।
बाबाजी समझ गए कि मयूरी झड़ चुकी है। उसके चूत से निकला प्रवाहि उसकी झांगो के जरिये निचे की और बह रहा था।
वे धीरे से उठे और उसके कान में फुसफुसाए,
“अब तुम घर जाओ मयूरी… और रात का इंतज़ार करो। कल फिर इसी समय आना… जाओ।”
“ओह्ह्ह बहनचोद.........” मयूरी के मुंह से एक आह के साथ गाली भी निकल गई।
मयूरी ने सोचा था कि बाबाजी अब उसके शरीर के साथ और आगे कुछ करेंगे। लेकिन उनके आदेश पर वह बिना कोई सवाल किए उठ गई। उसका शरीर अभी भी उत्तेजना और थकान से काँप रहा था। खेर वह झड गई थी तो अब उसके शरीर में एक संतृप्ति का अहसास जुरूर था और उसे अब आगे जाने की लालसा भी कम थी। फिर भी उसकी चूत का मसाज हो जाता तो अच्छा था, ऐसा सोचते-सोचते, वह चुपचाप अपने कपड़े पहनकर बाहर निकल गई।
बाबाजी का लंड स्टील की तरह खड़ा और दर्द कर रहा था।
थोड़ी देर बाद पीछे वाले दरवाज़े से पूजा अंदर आई।
बाबाजी ने जैसे ही उसे देखा, भेड़िए की तरह झपटा। उन्होंने पूजा को जोर से अपनी बाँहों में भर लिया और बिस्तर पर गिरा दिया। फिर बेतहाशा चूमने लगे, उसके होंठ, गर्दन, छाती… कहीं, और कुछ भी नहीं छोड़ रहे थे।
“अरे भोसड़ीकी, कितनी देर कर दी आते-आते! तेरे इन छेदों की प्रतीक्षा में मेरा लंड तन कर खड़ा हो रखा है।“
पूजा को पूरी तरह नंगा कर दिया गया। बाबाजी ने सिर्फ़ लुंगी पहनी थी, जिसे उन्होंने एक झटके में उतार फेंका। उनका मोटा, नसों वाला लंड लोहे की छड़ की तरह तना हुआ था।
पूजा ने हैरानी और उत्तेजना से कहा,
“अरे...अरे...अह्ह्ह्ह… बाबाजी जी… इतनी अधीरता क्यों आज?”
बाबाजी ने उसके बालों को मुट्ठी में भरते हुए गुर्राते हुए जवाब दिया,
“आज सुबह से तेरे बारे में सोच-सोचकर मैं पागल हो रहा था पूजा… तेरी चूत की महक, तेरी गांड की गर्मी… सब कुछ याद आ रहा था। मुझे तो ठीक है पर तेरे इस चोदु को तेरे छेद की ज्यादा जरुरत थी और है।” उन्हों ने पूजा को और करीब खींचते हुए कहा।
अरे....मैंने कहा तो था मैं आउंगी फिर मेरे इस चोदु राजा को तसल्ली नहीं रही....जो इतना तन कर खड़ा हो गया है!” पूजा ने बाबाजी का लंड को अपनी हथेली में समाते हुए कहा। संपादिका फनलवर है।
लेकिन बाबाजी का धैर्य अब ना जाने कहा गूम हो चला था। उन्होंने पूजा की दोनों टांगों को हवा में उठा लिया और अपना मुँह उसके बीच में डाल दिया। वहाँ से बह रही मीठी, चिपचिपी झील को वे लपलपाते हुए पीने लगे।
पूजा मदहोश होकर कराहने लगी। बाबाजी ने उसके चूत के मोटे होंठों को मुंह में भरकर जोर-जोर से चूसना शुरू कर दिया।
तभी पूजा ने कुछ महसूस करके आँखें खोलीं और बोली,
“बाबाजी जी… ये मेरी पीठ के नीचे गीला-गीला क्या है…?”
बाबाजी ने मुस्कुराते हुए अपना मुँह ऊपर उठाया। उनके होंठ पूजा के रस और मयूरी के छोड़े गए रस से चमक रहे थे।
“ये… तेरी बहन का अमृत है पूजा…” उन्होंने गहरी, कामुक आवाज़ में कहा, “आज मयूरी यहीं लेटी हुई थी… और उसकी चूत से काफी रस टपका है।” उन्हों ने बिना झिझक और निखालस होते हुए कह दिया। उनको पता था की अब पूजा से डरना नहीं है। और उसे अब मेरी हर क्रिया-प्रक्रिया में शामिल कर देना चाहिए। और उसके लिए उन्हों ने प्रथम चरण शुरू कर दिया था।
पूजा की आँखें आश्चर्य और उत्तेजना से फैल गईं…
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यही तक दोस्तों।
अगला एपिसोड आपके कोममेंट्स आने के बाद तुरंत।
तब तक Maitri Patel के तरफ से जय भारत।।
“इन्हें पीने की भी एक कला होती है मयूरी… रुको, मैं तुम्हें दिखाता हूँ।”
मयूरी कुछ बोल पाती, उससे पहले ही बाबाजी नीचे झुक गए और अपना मुंह उसके दाएँ स्तन पर लगा दिया। उन्होंने उसके मोटे, बेर जैसे निप्पल को होंठों के बीच फँसा लिया और जोरदार चुप्पा मारा। मैत्री की प्रस्तुति।
पुच्च्च्छ्ह्ह्ह…
एक जोरदार आवाज़ के साथ उन्होंने निप्पल को मुँह में खींच लिया। दूध, शहद और सरसों के तेल का मीठा-तीखा, चिपचिपा स्वाद उनके मुंह में फैल गया।
इसके परिणाम स्वरुप, मयूरी की चूत से अविरल, गाढ़ा रस निकलने लगा। वह पेटीकोट और बाबाजी के बिस्तर पर अपना निशान छोड़ने लगा। उसकी जाँघें काँप रही थीं।
बाबाजी ने दोनों विशाल तरबूजों को अपने मजबूत हाथों में भर लिया और बारी-बारी से एक-एक करके मुंह में लेने लगे। वे निप्पलों को ऐसे चूस रहे थे, मानो उनमें से दूध निकल रहा हो। उनकी जीभ कभी निप्पल के चारों ओर घुम रही थी, कभी तेज़ी से चाट रही थी, तो कभी दाँतों से हल्का-हल्का काट रही थी।
अब ऐसी परिस्थिति में कोई अपने आपको कब तक संभाल सकता है भला। मयूरी से अब रहा नहीं गया। उसने दोनों हाथ बाबाजी के सिर के पीछे रख दिए और उनकी चुटिया को अपनी उँगलियों में कसकर पकड़ लिया। फिर उसने बाबाजी के मुँह को अपनी छातियों पर और जोर से दबा दिया।
“अह्ह्ह्ह्ह्ह…… बाबाजी जी…… मmmmmm…… हाँ……”
मयूरी बाबाजी की लंबी चुटिया को स्टेयरिंग की तरह घुमा-घुमाकर उनके सिर को अपनी इच्छा अनुसार ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ कर रही थी। बाबाजी कुत्ते की तरह अपनी लार बहाते हुए उसके दोनों गुब्बारों पर अपना निशान छोड़ रहे थे। चूस-चूस कर अपने विजय ध्वज उसके बोब्लो पर गाड रहे थे। बिना कोई झिझक, बिना कोई रोक-टोक।
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बाबाजी समझ गए कि मयूरी झड़ चुकी है। उसके चूत से निकला प्रवाहि उसकी झांगो के जरिये निचे की और बह रहा था।
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बाबाजी ने उसके बालों को मुट्ठी में भरते हुए गुर्राते हुए जवाब दिया,
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लेकिन बाबाजी का धैर्य अब ना जाने कहा गूम हो चला था। उन्होंने पूजा की दोनों टांगों को हवा में उठा लिया और अपना मुँह उसके बीच में डाल दिया। वहाँ से बह रही मीठी, चिपचिपी झील को वे लपलपाते हुए पीने लगे।
पूजा मदहोश होकर कराहने लगी। बाबाजी ने उसके चूत के मोटे होंठों को मुंह में भरकर जोर-जोर से चूसना शुरू कर दिया।
तभी पूजा ने कुछ महसूस करके आँखें खोलीं और बोली,
“बाबाजी जी… ये मेरी पीठ के नीचे गीला-गीला क्या है…?”
बाबाजी ने मुस्कुराते हुए अपना मुँह ऊपर उठाया। उनके होंठ पूजा के रस और मयूरी के छोड़े गए रस से चमक रहे थे।
“ये… तेरी बहन का अमृत है पूजा…” उन्होंने गहरी, कामुक आवाज़ में कहा, “आज मयूरी यहीं लेटी हुई थी… और उसकी चूत से काफी रस टपका है।” उन्हों ने बिना झिझक और निखालस होते हुए कह दिया। उनको पता था की अब पूजा से डरना नहीं है। और उसे अब मेरी हर क्रिया-प्रक्रिया में शामिल कर देना चाहिए। और उसके लिए उन्हों ने प्रथम चरण शुरू कर दिया था।
पूजा की आँखें आश्चर्य और उत्तेजना से फैल गईं…
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