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Misc. Erotica Kahani mere ghar ki
रात की उस हिंसक और उन्मादी तबाही के बाद शरीर ऐसा टूट चुका था जैसे किसी ने जान ही निकाल ली हो। घड़ी की सुइयां जब पांच बजा रही थीं, तब हम दोनों की हालत ऐसी थी कि हिलना भी नामुमकिन था। वह गहरी और थका देने वाली नींद थी, जो केवल शरीर के पूरी तरह निचोड़ दिए जाने के बाद ही आती है। आमतौर पर मम्मी सुबह चार बजे उठ जाया करती थीं, लेकिनपिछली रात की उस ' जंग ने उन्हें पूरी तरह निढाल कर दिया था।
मैं सात बजे उठ गया, लेकिन उनकी नींद का कोई ठिकाना नहीं था।मैंने चुपचाप उठकर स्नान किया, खुद को तरोताजा किया और फिर दुकान के लिए निकल गया। मम्मी आठ बजे उठी थीं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, लेकिन उनकी आँखों के नीचे के हल्के घेरे बता रहे थे कि रात की वह 'चुदाई' उनके शरीर से कितनी ऊर्जा खींच ले गई थी। उन्होंने बड़े प्यार से पूजा की और मुझे प्रसाद दिया। फिर उन्होंने बड़े ममता भरे अंदाज़ में खाना लगाया।
उन्होंने बड़े धीमे और कोमल स्वर में कहा, **"बेटा, अब तुम जाकर खाना खा लो और फिर थोड़ा आराम कर लो।"** उनकी आवाज़ में एक ऐसी थकावट थी जिसे वह छिपाने की कोशिश कर रही थीं। मुझे साफ दिख रहा था कि वह खुद भी अभी पूरी तरह संभली नहीं थीं। उनका शरीर अभी भी उस रात के प्रहारों की गूँज महसूस कर रहा था। वह खुद इतनी थकी हुई लग रही थीं कि शायद उन्हें भी अभी और सोने की ज़रूरत थी, लेकिन उनकी ममता और फिक्र हमेशा की तरह उनके ऊपर हावी थी। वह चाहती थीं कि मैं आराम करूँ, जबकि उनकी अपनी देह अभी भी उस रात के सुख और दर्द के मिले जुले अहसास से जूझ रही थी।

दो तीन घंटे की उस गहरी और सुकून भरी नींद ने मेरे शरीर की सारी थकान को जैसे सोख लिया था। जब मैं उठा, तो दिमाग एकदम साफ था, लेकिन मम्मी का चेहरा देखकर अभी भी मेरा मन भारी हो रहा था। वह अभी भी रात के असर से पूरी तरह उबर नहीं पाई थीं। उनकी चाल में एक तरह की सुस्ती थी और उनकी आँखों में वह थकावट साफ झलक रही थी जो केवल अत्यधिक शारीरिक श्रम और चरम सुख के बाद आती है।
मैं खुद को थोड़ा तरोताजा महसूस कर रहा था, लेकिन मम्मी को देखकर मुझे उनकी फिक्र होने लगी। मैं वापस दुकान पर आया , मम्मी की हालत देखकर मेरा दिल भर आया।
घर जाकर वह कोशिश तो कर रही थीं कि घर के काम निपटा लें, लेकिन उनका शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था।
मैंने उनके पास जाकर बड़े प्यार से उनका हाथ पकड़ा और उनकी आँखों में देखते हुए धीमे स्वर में कहा, **"मम्मी, अब बहुत हो गया। आप भी जाकर थोड़ा आराम कर लो। आप खुद बहुत थकी हुई लग रही हो।"** मैंने ज़ोर देते हुए कहा, **"मैं हूँ न यहाँ, आप बस जाकर सो जाओ। आपको अभी बहुत आराम की ज़रूरत है।"**
मैं जानता था कि वह मेरी बात टालने की कोशिश करेंगी और कहेंगी कि 'मैं ठीक हूँ', लेकिन मैं उनकी उस थकी हुई देह और उनकी धीमी पड़ती साँसों को समझ पा रहा था। रात की उस तबाही वाली chudai ने उनके शरीर को अंदर तक झकझोर दिया था। मैं चाहता था कि वह कम से कम कुछ घंटे चैन से सो सकें ताकि उनका शरीर फिर से अपनी सामान्य स्थिति में आ सके।
मम्मी ने मेरी बात मान ली और एक भारी मन तथा थकी हुई देह के साथ अपने कमरे में जाकर लेट गईं। उनके जाने के बाद, मैंने खुद को पूरी तरह काम में झोंक दिया। दुकान पर ग्राहकों को संभालना और बीच बीच में घर के कामों के बारे में सोचना मेरा दिमाग दो हिस्सों में बँटा हुआ था।
"...दोपहर होते होते मैंने दुकान के कुछ काम निपटाए और फिर रसोई की ओर रुख किया। रसोई में जो कुछ भी बना, वह पूरी तरह बेढंगा था। रोटियाँ गोल होने के बजाय टेढ़ी मेढ़ी और कहीं से थोड़ी जलकर काली पड़ गई थीं। दाल में मसालों का संतुलन भी बिगड़ गया था। वह खाना खाने लायक कम और मेरे अनाड़ीपन का सबूत ज़्यादा लग रहा था।हा मैने दाल में अलग से थोड़ा घी डाल दिया था और गुड़ का छोटा सा टुकड़ा भी रख लिया,क्योंकि मैने सुन रखा था के ये दोनों शरीर की एनर्जी को बढ़ाते हैं।
जब मैं कांपते हाथों और भारी मन से वह थाली लेकर उनके कमरे की ओर बढ़ा, तो मेरे दिल में एक अजीब सा डर था। मुझे लग रहा था कि शायद वह मेरे इस खराब खाने को देखकर दुखी होंगी या मुझ पर गुस्सा करेंगी। लेकिन जैसे ही मैंने कमरे में कदम रखा और उनके सामने वह थाली रखी, उनकी नज़रें खाने पर नहीं, बल्कि मेरे चेहरे पर टिकी थीं। उन्होंने मेरी आँखों में वह थकान और वह अपराधबोध पढ़ लिया। उस पल, उनके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं आई, बल्कि उनकी आँखों में ममता का एक ऐसा सागर उमड़ पड़ा जिसने मेरे अंदर के सारे शोर को शांत कर दिया।"उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक और नमी आ गई। वह मुझे देख रही थीं एक ऐसा बेटा जो उनकी हर ज़रूरत का ख्याल रख रहा था। उनकी आँखों में कृतज्ञता थी, जैसे वह कहना चाह रही हों कि उन्हें पता है कि मैं उनके प्रति कितना समर्पित हूँ। उनकी आँखों में आँसू तैरने लगे, शायद इसलिए क्योंकि वह इस बात से अभिभूत थीं कि उनका बेटा उनके लिए इतना कुछ कर रहा है।
मेरी आँखों में भी एक अजीब सी भारीपन महसूस हो रहा था। उन्हें इस हालत में देखना, इतना असहाय और थका हुआ देखना मेरे दिल को झकझोर रहा था। मैंने धीरे से उनका हाथ अपने हाथों में लिया। उनके हाथ थोड़े ठंडे थे। मैंने उनका हाथ सहलाते हुए कहा, **"आप बस खा लीजिए, फिर मैं आपको सुला दूँग।
** मेरी आवाज़ में एक ऐसी गहराई थी जो खुद मेरे लिए भी नई थी। वह बस चुपचाप मुझे देखती रहीं, जैसे वह मेरे भीतर छिपे उस कामुक रवि और इस ममतामयी बेटे के बीच के संतुलन को समझने की कोशिश कर रही हों। खाना खाते समय कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज़ और बाहर की शांति थी। वह पल इतना भारी और इतना पवित्र था कि मुझे डर लग रहा था कि कहीं कोई शब्द इस जादुई और दर्दनाक मौन को तोड़ न दे।
खाना खत्म करने के बाद, उन्होंने अपना सिर धीरे से मेरे कंधे पर टिका दिया। उनके शरीर में अभी भी वह थकावट साफ महसूस हो रही थी। मैंने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए महसूस किया कि वह कितनी शांत और समर्पण की मुद्रा में थीं। उनके चेहरे पर जो सुकून था, वह शायद उस सुरक्षा का अहसास था जो मैं उन्हें देना चाहता था।
मैंने उनके माथे को चूमते हुए बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा, **"अब आप सो जाइए मम्मी, मैं यहीं पास में हूँ।"** उन्होंने बस धीरे से मेरा हाथ दबाया, जैसे वह कह रही हों कि वह मेरी मौजूदगी को महसूस कर रही हैं। उस पल में, कमरे की हवा में एक अजीब सा भारीपन और एक गहरा अहसास था एक ऐसा अहसास जहाँ ममता और वासना की सीमाएँ धुंधली पड़ गई थीं।
रात की वह बेतहाशा तबाही और दोपहर की यह कोमल देखभाल, दोनों ने मिलकर हमारे बीच एक ऐसा रिश्ता बुन दिया था जिसे दुनिया की कोई परिभाषा नहीं दे सकती थी। मैं बस उन्हें देखते रहा, यह जानते हुए कि आज से हमारा जीवन और हमारी दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी है। वह सो गईं, और मैं व उनकी थकी हुई देह और हमारे इस नए, अनछुए सच के बारे में सोचता हुआ दुकान पर आ गया,मेरे मन में एक अजीब तरह की संतुष्टि थी।
रात का सन्नाटा घर में गहरा चुका था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी, जिससे कमरे का माहौल और भी शांत और मदहोश करने वाला हो गया था। मम्मी ने खाना बना लिया था दाल, चावल और गरमा गरम रोटियाँ। वह रसोई से बाहर आईं, उनके चेहरे पर एक सुकून भरी चमक थी। मैं डाइनिंग टेबल पर बैठा था, लेकिन मेरा ध्यान खाने पर कम और उनके चलने के अंदाज़ पर ज़्यादा था। उनकी साड़ी के पल्लू से आती वह जानी पहचानी खुशबू मेरे दिमाग को सुन्न कर रही थी।
मम्मी ने थाली मेरे सामने रखी और खुद मेरे पास बैठ गईं। उन्होंने एक निवाला तोड़ा और मेरे मुँह के पास लाईं। "खा ले बेटा, सारा दिन दुकान पर बहुत भाग दौड़ की है तूने। देख कितना कमजोर लग रहा है।" जैसे ही मैंने निवाला लिया, उनका हाथ मेरे होंठों के पास रुक गया। उनकी उंगलियाँ हल्के से मेरे होंठों को छू गईं। वह स्पर्श बिजली की तरह मेरे पूरे शरीर में दौड़ गया।

मैंने उनकी आँखों में देखा , वहाँ एक गहरी समझ थी। उनकी आँखों की वह चमक बता रही थी कि वह सब समझ चुकी हैं। वह जानती हैं कि मेरा ध्यान कहाँ है, वह जानती हैं कि मेरी बेचैनी का कारण क्या है। तभी, खाना खिलाते खिलाते उन्होंने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया। उनका हाथ गर्म और कोमल था। उन्होंने धीरे से मेरे हाथ को सहलाना शुरू किया। वह सहलाना इतना सहज था कि वह ममता जैसा लग रहा था, लेकिन मेरे लिए वह एक तपती आग जैसा था। मैंने उनके हाथ को कसकर पकड़ लिया। मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं। मैंने उनके चेहरे की ओर देखा, वह बस मुस्कुरा रही थीं, उनकी आँखों में एक ऐसी गहराई थी जो मुझे बार बार उस अंधेरी रात की याद दिला रही थी। वह मुझे यह एहसास दिला रही थीं कि वह मेरी हर गलती, मेरी हर इच्छा और मेरी हर तड़प को जानती हैं और फिर भी वह मेरे पास हैं।
मैंने उनके हाथ को इतनी जोर से पकड़ लिया था कि शायद उन्हें हल्का दर्द भी हो रहा होगा, लेकिन उन्होंने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा। बल्कि, उन्होंने अपनी पकड़ और भी मजबूत कर ली। कमरे में सिर्फ बारिश की आवाज़ और हमारी तेज़ होती धड़कनों का शोर था। उनके चेहरे की वह मुस्कुराहट अब और भी गहरी और रहस्यमयी हो गई थी।
"तू इतना परेशान क्यों है?" उन्होंने बहुत ही धीमी और मखमली आवाज़ में पूछा। उनकी आवाज़ में वो अधिकार था जो एक माँ का होता है, लेकिन उस पल में उसमें एक ऐसी कशिश थी जो मुझे पागल कर रही थी। उनकी आँखों की चमक अब सीधे मेरी रूह में उतर रही थी। वह जानती थीं कि मेरा शरीर और मेरा मन किस कशमकश से जूझ रहा है।
मैंने कुछ नहीं कहा, बस उनकी आँखों में देखते हुए उनके हाथ को अपने गाल से लगा लिया। उनकी हथेलियों की गर्माहट मेरे चेहरे पर एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थी। मैंने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा, "मम्मी... आप जानती हैं न कि मैं क्या महसूस कर रहा हूँ?"
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, बस एक लंबी सांस ली। उनके सीने के उठने गिरने की लय मेरी नज़रों के सामने थी। उन्होंने अपना दूसरा हाथ भी मेरे सिर पर रख दिया और धीरे धीरे सहलाने लगीं। यह स्पर्श अब सिर्फ ममता का नहीं रह गया था; इसमें एक अनकही स्वीकृति थी, एक ऐसी खामोश सहमति थी जो शब्दों से कहीं ज्यादा ताकतवर थी।
तभी उन्होंने धीरे से अपना हाथ मेरे हाथ से हटाकर मेरे चेहरे को अपने दोनों हाथों में भर लिया। उनके अंगूठे मेरे होंठों को सहला रहे थे। उनकी आँखों में अब एक अजीब सी प्यास और गहराई थी। उन्होंने मेरे करीब झुकते हुए कहा, "सब समझती हूँ मैं... सब।"
उनके चेहरे की वह रहस्यमयी मुस्कुराहट और उस स्पर्श ने मेरे अंदर एक तूफान सा खड़ा कर दिया था, लेकिन उनकी आँखों में एक ठहराव भी था। उन्होंने धीरे से मेरे गालों से हाथ हटाया, पर उनका हाथ मेरे हाथ पर ही टिका रहा। उन्होंने एक और निवाला तोड़ा और इस बार थोड़ा और करीब झुककर मेरे मुँह के पास लाईं। "खाना पूरा कर, वरना पेट में जलन होगी। और देख, आज मैंने तेरी पसंद की सब्ज़ी बनाई है।"
मैंने धीरे से उनका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, "मम्मी, आप भी खाइए न। आप बस मुझे खिलाती जा रही हैं, खुद कब खाएंगी?"
उन्होंने एक हल्की सी मुस्कान दी, ऐसी मुस्कान जिसमें एक अजीब सी शरारत और दबी हुई चाहत थी। "तू खा ले पहले, मैं खा लूँगी," उन्होंने कहा, लेकिन उनकी आँखों ने कुछ और ही कहा। उन्होंने एक और निवाला तोड़ा और इस बार वह मेरे होंठों के और भी करीब आईं। जब मैंने वह निवाला लिया, तो उनके अंगूठे ने मेरे होंठों के निचले हिस्से को बहुत ही धीरे से सहलाया। वह स्पर्श इतना लंबा और गहरा था कि मेरा खाना गले के नीचे उतरना ही भूल गया।
फिर उन्होंने खुद एक निवाला लिया, लेकिन उनका ध्यान खाने पर कम और मुझ पर ज़्यादा था। खाना खाते खाते हम दोनों के बीच की खामोशी अब भारी होती जा रही थी। बाहर बारिश की आवाज़ और बढ़ गई थी। मम्मी ने धीरे से अपना हाथ मेज़ पर रखे मेरे हाथ पर फेरना शुरू किया। "आज खाना बहुत स्वाद बना है न?" उन्होंने पूछा, लेकिन उनकी आवाज़ में एक भारीपन था।
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए अपना आखिरी निवाला मुंह में डालते हुए कहा, "हाँ मम्मी, बहुत स्वाद है... पर शायद भूख अब खाने की नहीं रही।"

यह सुनकर उनके चेहरे पर एक ऐसी चमक आई जिसे देखकर मेरा दिल तेज़ धड़कने लगा। उन्होंने भी अपना आखिरी निवाला खत्म किया और थाली को धीरे से एक तरफ खिसका दिया। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और मेरी तरफ झुककर बहुत ही धीमी आवाज़ में कहा, "तो फिर... अब क्या चाहिए तुझे?"
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए बस एक हल्की सी मुस्कान दी, जिसमें मेरी सारी बेताबी और सब कुछ कह दिया गया था। मम्मी ने मेरी आँखों में वो सब पढ़ लिया। उन्होंने धीरे से अपना हाथ मेज़ से उठाया और मेरी उंगलियों को अपनी उंगलियों में फँसा लिया। उनके हाथ की गर्माहट मेरे पूरे शरीर में बिजली की तरह दौड़ गई।
उन्होंने बिना कुछ कहे, बस एक इशारा किया। वह इशारा किसी आदेश की तरह नहीं था, बल्कि एक बुलावा था एक ऐसा बुलावा जिसका इंतज़ार हम दोनों ही कर रहे थे। उन्होंने धीरे से उठकर मेरा हाथ थाम लिया। उनके चलने की आहट और साड़ी की सरसराहट उस शांत कमरे में एक अजीब सी लय पैदा कर रही थी।
मैं उनके पीछे पीछे खड़ा हुआ। कमरे की मद्धम रोशनी में उनकी साड़ी का पल्लू और उनकी मखमली चाल मुझे मंत्रमुग्ध कर रही थी। खाना खत्म हो चुका था, भूख मिट चुकी थी, लेकिन अब जो भूख जागने वाली थी, उसका कोई अंत नहीं था। हम दोनों बिना एक शब्द बोले, उस सन्नाटे और बढ़ती हुई बेचैनी को अपने साथ लिए हुए, धीरे धीरे बेडरूम की तरफ बढ़ गए।
> "खाना खाकर हम कमरे में पहुँचे ही थे कि......
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Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 08-08-2026, 11:20 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 10-08-2026, 01:11 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 10-08-2026, 02:12 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 10-08-2026, 06:16 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 11-08-2026, 09:40 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 11-08-2026, 10:19 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 11-08-2026, 10:33 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Ella - 12-08-2026, 02:21 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Renuka Shahane - 12-08-2026, 02:34 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 04:10 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Nomita - 12-08-2026, 04:17 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Suhana. - 12-08-2026, 07:15 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 10:09 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by shalini - 12-08-2026, 07:35 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 12-08-2026, 10:11 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 13-08-2026, 09:39 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 13-08-2026, 12:08 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 13-08-2026, 12:19 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 13-08-2026, 12:21 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Sara Khan - 13-08-2026, 02:05 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 14-08-2026, 08:17 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 13-08-2026, 03:48 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 14-08-2026, 12:30 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 14-08-2026, 01:31 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 14-08-2026, 01:32 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 14-08-2026, 03:38 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Fanfunda - 14-08-2026, 04:58 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 15-08-2026, 04:58 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 15-08-2026, 05:19 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 15-08-2026, 05:24 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 15-08-2026, 05:35 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 15-08-2026, 05:43 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 15-08-2026, 10:38 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Asli lund - 15-08-2026, 09:46 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 16-08-2026, 12:37 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 16-08-2026, 07:28 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Nehapatel - 16-08-2026, 03:26 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Loveakb18 - 17-08-2026, 06:50 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Fattu - 17-08-2026, 09:28 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Rijwana Ansaari - 18-08-2026, 02:13 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by SweetSonali - 18-08-2026, 02:24 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Loveakb18 - 18-08-2026, 08:10 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 19-08-2026, 05:41 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 19-08-2026, 05:44 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 21-08-2026, 07:00 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Sumitra Sen - 22-08-2026, 06:55 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 22-08-2026, 10:10 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 22-08-2026, 10:51 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 22-08-2026, 03:37 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 22-08-2026, 05:07 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by srider69 - 22-08-2026, 07:21 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 22-08-2026, 08:51 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by wetpussy - 23-08-2026, 02:19 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Jasmin. - 23-08-2026, 03:06 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 23-08-2026, 06:25 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 23-08-2026, 06:29 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Sumitra Sen - 24-08-2026, 07:09 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 24-08-2026, 07:24 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by sdd2686 - 24-08-2026, 09:10 AM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 24-08-2026, 02:45 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Monticute - 24-08-2026, 04:01 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Rizwan007 - 25-08-2026, 01:40 PM
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RE: Kahani mere ghar ki - by Prativa Rani Saha - 25-08-2026, 02:05 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 25-08-2026, 02:40 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 25-08-2026, 02:43 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Nova Dewan - 27-08-2026, 12:26 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Anusree - 27-08-2026, 01:36 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Rinkp219 - 28-08-2026, 11:38 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 29-08-2026, 12:34 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 29-08-2026, 01:38 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by KGB - 30-08-2026, 10:26 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Lavoni - 30-08-2026, 01:59 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Dhakaiya Mastan - 30-08-2026, 02:34 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Phallus - 30-08-2026, 02:50 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 31-08-2026, 06:17 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 31-08-2026, 08:04 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by LENNY - 31-08-2026, 02:13 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Tasnova - 31-08-2026, 02:37 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by saya - 31-08-2026, 09:46 PM
RE: Kahani mere ghar ki - by Intruder - 01-09-2026, 11:36 AM
RE: Kahani mere ghar ki - by Motalund14 - 01-09-2026, 01:05 PM
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