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Thriller बेटे के दोस्त ने आंटी को सम्मोहित(hypnotize) किया....फिर क्या हुआ?
#36
विवेक मार्किट में खड़ा था। उसने देखा की एक मारुति रिट्ज कार आकर रुकी। कार से एक औरत उतरी जिसने काला चश्मा पहना हुआ था और गले में ऑफिस का आईडी कार्ड लटका था। वह धूप में पसीने से तरबतर थी, जिससे उसका नीला कमीज उसके शरीर से चिपक गया था। पहली नज़र में वह ऐसी नहीं लगी जिसके साथ सेक्स किया जाए। उसका रंग सांवला था, चेहरा बिल्कुल साधारण और घरेलू-सा था, और शरीर भरा-पूरा था।

विवेक ने सोचा की इसे थोड़ा तड़पाया जाए। वह चुपचाप उसके पीछे चलने लगा। चैताली मार्केट में इधर-उधर घूम रही थी, जैसे वह कुछ ढूँढ रही हो, लेकीन उसका चेहरा भावशून्य था। विवेक उसकी भारी कमर और हिलते हुए कूल्हों को निहार रहा था। उसके मन में गंदी बातें चल रही थीं।

बाज़ार में चैताली का पीछा करते और उसे गौर से देखते हुए, विवेक को एहसास हुआ कि उस औरत के बारे में उसकी पहली सोच शायद गलत थी। वह एक शरीफ़, घरेलू हाउसवाइफ़ जैसी दिखती थी, लेकिन उसमें कुछ ऐसा था जो किसी कामुक और बेबाक औरत का संकेत दे रहा था—जैसे कोई माहिर वेश्या हो। उसके चलने के अंदाज़ से वह एक सेक्सी औरत लग रही थी। उसकी हल्की पारदर्शी कमीज़ के आर-पार उसकी ब्रा साफ़ दिख रही थी, उसके स्तन बड़े और भारी लग रहे थे। उसके कूल्हे चौड़े थे और हर कदम पर उसकी गांड हिलती डुलती थी। अब उसे पक्का यकीन हो गया था कि वह उसके साथ सेक्स करना चाहता है।

विवेक उसके पास गया और आत्मविश्वास के साथ बोला, "चैताली जी? मैं हरीश का दोस्त विवेक हूँ। वह मुझे आपके बारे में बता चुका है। चलिए मेरे साथ।"

चैताली ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी खामोशी में एक तरह की सहमति थी, एक ऐसी रजामंदी जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। उसने बस धीरे से अपना सिर हिलाया। 

विवेक ने अपनी भारी-भरकम रॉयल एनफील्ड बुलेट की ओर देखा। उसने किक मारी और इंजन एक गूँजती हुई दहाड़ के साथ ज़िंदा हो उठा। बुलेट की वह खास 'थम्प-थम्प' वाली आवाज़ पूरे माहौल में फैल गई, जिससे आसपास की शांति अचानक टूट गई। बाइक के वाइब्रेशन विवेक के पैरों तक महसूस हो रहे थे, और उसकी धड़कनें भी उसी रफ़्तार से तेज़ हो रही थीं।

उसने पीछे मुड़कर चैताली की तरफ देखा और अपनी ठुड्डी से पीछे बैठने का इशारा किया। चैताली ने एक गहरी सांस ली और बहुत ही सलीके से, लेकिन जानबूझकर, बाइक की सीट पर अपनी जगह बनाई। वह इस तरह से बैठी कि उनके बीच हवा के गुजरने की भी जगह नहीं बची थी। वह विवेक के बिल्कुल करीब थी—इतनी करीब की विवेक उसकी सांसों की गर्मी अपनी गर्दन पर महसूस कर सकता था।

जैसे ही चैताली ने खुद को व्यवस्थित किया, उसकी भारी और उभरी हुई छातियाँ विवेक की चौड़ी और सख्त पीठ से पूरी तरह सट गईं। वह दबाव इतना गहरा था कि विवेक के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। वह महसूस कर सकता था कि चैताली का शरीर उसके शरीर के सांचे में पूरी तरह फिट हो चुका था। 

अचानक, विवेक ने तेज़ी से क्लच छोड़ा और रेस दी। बाइक ने एक ज़ोरदार झटका लिया और आगे की ओर झपटी। उस झटके के कारण संतुलन बनाने के लिए चैताली ने विवेक को कसकर पकड़ लिया। उसके हाथ विवेक की कमर पर जकड़े हुए थे, लेकिन उसका ऊपरी हिस्सा और भी ज़्यादा मजबूती से विवेक की पीठ से चिपक गया। अब वह दबाव और भी गहरा हो गया था; उन दो बड़े और नरम गोलों का दबाव विवेक की रीढ़ की हड्डी तक महसूस हो रहा था।

विवेक के दिमाग में जैसे कोई विस्फोट हुआ हो। वह इस अहसास से पागल हो रहा था। उसकी एकाग्रता अब सड़क पर नहीं, बल्कि अपनी पीठ पर महसूस होने वाली उस नरमी और गर्माहट पर थी। उसके मन में एक जंगली विचार आया, एक ऐसी चाहत जिसने उसे भीतर तक उत्तेजित कर दिया।

"साला, क्या कतई ज़हर माल है!" उसने मन ही मन बुदबुदाते हुए सोचा। उसके चेहरे पर एक कुटिल और संतुष्ट मुस्कान फैल गई। वह इस बात से बेहद खुश था की आज का सफर उसकी उम्मीदों से कहीं ज़्यादा रोमांचक होने वाला था।

वे हरीश के अपार्टमेंट पहुँचे। जैसे वे अंदर दाखिल हुए, माहौल में एक अजीब सी बिजली दौड़ रही थी। वे लिफ्ट की ओर बढ़े। जैसे ही लिफ्ट के स्टील के दरवाजों ने उन्हें अपने भीतर समेटा और वह छोटा सा धातु का बक्सा ऊपर की ओर चढ़ने लगा, विवेक के भीतर का संयम पूरी तरह टूट गया। वह अब और एक पल भी इंतजार करने की स्थिति में नहीं था; उसके दिमाग में पिछले कुछ घंटों से केवल एक ही जुनून सवार था।

लिफ्ट की सफेद रोशनी में चैताली एक मूक मूर्ति की तरह खड़ी थी। अचानक, बिना किसी चेतावनी के, विवेक ने अपनी बाहें फैलाईं और पूरी ताकत के साथ चैताली की गर्दन को अपने मजबूत हाथों की पकड़ में जकड़ लिया। उसने उसे झटके से पीछे की ओर धकेला, जिससे चैताली की पीठ लिफ्ट की ठंडी, कठोर दीवार से जा टकराई। उस झटके से चैताली के मुंह से एक हल्की सी आह निकली, लेकिन वह हिलने की कोशिश नहीं कर रही थी।

विवेक की सांसें तेज हो गई थीं। उसने अपनी पूरी इच्छाशक्ति के साथ झपटकर चैताली के होंठों को अपने कब्जे में ले लिया। वह उसे इतनी तीव्रता से चूम रहा था जैसे वह उसके अस्तित्व को सोख लेना चाहता हो। चैताली का शरीर पूरी तरह शिथिल पड़ गया था। वह कोई विरोध नहीं कर रही थी, न ही वह विवेक के जवाब में उसे चूम रही थी। वह बस एक बेजान गुड़िया की तरह स्थिर खड़ी थी, जिसकी आँखें शायद कहीं दूर किसी शून्य को ताक रही थीं, जबकि विवेक उसके करीबियत की गहराई में डूब रहा था।

विवेक की उत्तेजना अब चरम पर थी। उसने अपना एक हाथ उसकी गर्दन से हटाकर नीचे की ओर ले गया और बिना किसी झिझक के उसका हाथ उसकी कमीज के कपड़े के अंदर डाल दिया। जैसे ही उसकी हथेलियाँ उसकी भारी छाती के संपर्क में आईं, उसने अपनी उंगलियों से उसे जोर से भींचा। उस स्पर्श की तीव्रता ने विवेक को जैसे पागल कर दिया।

"उफ़! यकीन नहीं होता... कितने बड़े हैं ये!" उसने एक गहरी, कामुक आह भरते हुए कहा, उसकी आवाज में एक अजीब सा उन्माद था।

वह अब और इंतजार नहीं करना चाहता था। उसने झटके से उसकी कमीज को ऊपर की ओर उठा दिया, जिससे चैताली का ऊपरी शरीर उजागर हो गया। उसकी सफेद रंग की ब्रा, जो उसकी त्वचा के रंग के साथ एक गहरा विरोधाभास पैदा कर रही थी, विवेक की नजरों में थी। उसने बिना समय गंवाए ब्रा को नीचे खींच लिया और उसकी एक निप्पल को अपने मुंह में ले लिया।

विवेक उसे पूरी शिद्दत और जोर-जोर से चूसने लगा, जैसे वह किसी प्यासे की तरह उसकी देह का स्वाद ले रहा हो। उसी समय, उसका दूसरा हाथ खाली नहीं था; वह चैताली की कमर के घुमावों को सहला रहा था, उसकी त्वचा पर अपनी उंगलियों से एक अदृश्य नक्शा बना रहा था। चैताली अभी भी उसी मूक अवस्था में थी—एक ऐसी गुड़िया जिसे विवेक अपनी मर्जी से मोड़ रहा था, जबकि लिफ्ट धीरे-धीरे उनके मंजिल की ओर बढ़ रही थी।

तभी लिफ्ट की घंटी बजी—'टिंग!'
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RE: बेटे के दोस्त ने आंटी को सम्मोहित(hypnotize) किया....फिर क्या हुआ? - by MohdIqbal - 31-08-2026, 01:26 AM



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