30-08-2026, 11:48 PM
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रुही ने आँखें पोंछीं।
उंगलियों पर अभी भी नमक चिपका था। आईने में चेहरा लाल था, लेकिन रोना अब थम चुका था। सोनिया के शब्द कमरे में अकेले रह गए थे—हल्के, चिपचिपे, और बार-बार लौटने वाले। वह चुपचाप बाथरूम की तरफ चली। पैंटी के इलास्टिक ने जाँघ काटी। ठंडी टाइल से उसके नंगे पैर छुए तो एक हल्की सिहरन उठी। दरवाज़ा बंद किया। लॉक नहीं लगाया। सिर्फ बंद किया। जैसे अभी भी पूरा फैसला नहीं हुआ हो।
वॉशबेसिन के सामने खड़ी हुई। नल खोला। ठंडे पानी से मुँह धोया। आईने में भाप नहीं थी, सिर्फ वह थी—लाल पैंटी में, बिना ब्रा, बाल चेहरे पर चिपकें, आँखें सूजी हुईं। पहले तो नज़रें झुकाईं। फिर धीरे-धीरे उठाईं।
सोनिया की आवाज़ कान में फिर चली।
भगवान ने तुझे इतना सुंदर बनाया है तो दिखाने में क्या हरज़ है।
रुही ने अपने गुलाबी होंठ देखे। थोड़े सूजे हुए, रोने से। उसने अंगूठे से निचला होंठ छुआ। नरम। थोड़ा काँपता। मन में आया—ये होंठ झूठ बोल चुके हैं सनी से। ये होंठ रामू जी के मुँह से शराब पी चुके हैं। ये होंठ किसी और के उभार पर भी रखे जा चुके हैं। फिर भी ये सुंदर लग रहे हैं। शर्म के बाद भी सुंदर। वह शर्मा गई। होंठ काटे। लेकिन देखती रही।
फिर गाल। लाल। एक तरफ थप्पड़ का हल्का निशान अभी भी था। उसने हथेली फेरी। गरम था। यह लालिमा शर्म की है या उनके हाथ की? दोनों जवाब सही लग रहे थे। सोनिया कहती—शर्म गहना है। रुही ने गाल को गहना नहीं समझा। फिर भी आईने में वह लालिमा उसे अपनी लग रही थी। छुपाने लायक भी, और किसी के देखने लायक भी। यही उलझन थी।
आँखें। बड़ी-बड़ी, भीगी, काली पुतलियाँ। वह अपने को देखकर और शर्मा गई। क्योंकि आँखें झूठ नहीं बोल रही थीं। उनमें डर था, थकान थी, और एक दबी हुई स्वीकृति भी थी। ये आँखें रामू जी की आज्ञा से जामिल की तरफ खुली थीं। ये आँखें भागते समय भी लोगों को याद रख गईं। उसने पलकें झपकीं। पानी की एक आखिरी बूँद कौने से लुढ़की। उसने पोंछी। इस बार रोने के लिए नहीं—ताकि अपने को साफ देख सके।
फिर नज़र नीचे गई।
अपने मुम्मे। उसने दोनों हाथों से पहले ढक लिया। आदत। फिर धीरे-धीरे हाथ हटाए। आईने में वे भारी, गोरे, नोक पर गुलाबी थे। ठंडी हवा से नोक खड़ी हो गई थी। रुही की साँस अटक गई। इन्हें सबने देखा। जामिल की जीभ होठों पर फिर गई थी। सोनिया हँसी थी। रामू जी गर्व से खड़े थे। वह एक बार फिर हाथ बढ़ाने लगी, फिर रुक गई। सोनिया की बात फिर आई—जो मर्द तुझे नंगी देख चुका है, तेरे अंदर तक जा चुका है, उसके सामने शर्म कैसी। रामू जी की बात सही थी इस हिसाब से। लेकिन बाथरूम में अकेली खड़ी होकर भी शर्म आ रही थी। अपने से शर्म। यह नई थी। और गहरी थी।
उसने हथेली पेट पर रखी। सपाट पेट। नाभि के आसपास त्वचा चिकनी। उंगली घुमाई। यह पेट कभी सनी के घर की बहू का था। अब रामू जी हाथ रखते हैं जैसे उनका हक हो। पेट में कोई निशान नहीं था, लेकिन अंदर बहुत कुछ हो चुका था। वह सोचने लगी—अगर शरीर सच में दिखाने के लिए है, तो यह पेट भी छुपाने की चीज़ क्यों लगता है? जवाब नहीं मिला। बस उंगली नाभि के पास रुकी रही।
फिर उसने एक कदम पीछे लिया। आईने में लंबी, सुडौल टाँगें दिखीं। पैंटी से निकलती गोरी लकीरें। उसने एक टाँग हल्की सी मोड़ी। पिंडली की गोलाई, घुटने की नर्म हड्डी, एड़ी तक की साफ रेखा। भागते समय जामिल ने इन्हीं टाँगों को देखा होगा। यह ख्याल आते ही गाल और गरम हुए। उसने अपने हाथ देखे—प्यारे, नरम, कोमल। वही हाथ जो स्तन छुपाते भागे थे। वही हाथ जो रामू जी का अंडरवियर पकड़ चुके थे। उसने एक हाथ दूसरे हाथ से सहलाया। इतने छोटे लग रहे थे अब। जैसे किसी बड़े हुक्म के आगे हमेशा काँपने वाले हाथ।
जाँघें। गोल। चिकनी। पैंटी की लेस उन पर दब रही थी। उसने हथेली अंदरूनी जाँघ पर फेरी। त्वचा सिहर गई। सोनिया कह रही थी—मर्दों की प्यासी निगाहों का आनंद लो। रुही ने आँखें बंद कीं। आनंद नहीं आया। लेकिन इनकार भी पूरा नहीं रहा। जाँघ के नीचे एक हल्की गर्मी थी। शर्म की, या शरीर की—वह फर्क नहीं कर पा रही थी।
फिर सबसे मुश्किल जगह आई।
उसने पैंटी के इलास्टिक में उंगली डाली। पूरी नहीं उतारी। बस थोड़ा सा किनारा खींचा और आईने में झाँका। चुई-मुई सी, प्यारी, गुलाब जैसी चूत—चिकनी, शेव की हुई, हल्की गुलाबी। रामू जी के लिए आज ही साफ की गई। यह याद आते ही वह झट से पैंटी ठीक कर गई। दिल ज़ोर से धड़का। दोनों हाथों से मुँह ढक लिया, फिर हाथ हटाए और फिर से देखने लगी—इस बार कपड़े के ऊपर से ही, लेकिन मन नीचे उतर चुका था।
यह सबसे ज्यादा मेरी है… और सबसे ज्यादा उनकी भी हो चुकी है।
इसी को उन्होंने चाटा। इसी से मूत निकलवाया। इसी को सबके सामने गीला कहा।
सोनिया कहती है इसे छुपाना सज़ा है। मुझे लगता है इसे दिखाना सज़ा है।
तो फिर सज़ा कौन सी है?
वह आईने के और करीब आ गई। माथा शीशे से लगभग छू रहा था। साँस धुंधला कर रही थी। हर अंग एक-एक करके देखा जा चुका था, और हर अंग के साथ एक सवाल चिपक गया था। होंठ—झूठ के। गाल—थप्पड़ के। आँखें—आज्ञा की। मुम्मे—निगाहों के। पेट—हक के। हाथ—काँपने के। जाँघें—भागने के। और वह छोटी गुलाबी जगह—समर्पण के।
रुही ने धीरे से अपने आप से कहा, बिना आवाज़ के—
सोनिया शायद आधी सही है।
मैं सुंदर हूँ। मैं बनी हुई हूँ देखने के लिए भी।
लेकिन वह यह नहीं कहती कि देखने वाला कौन है।
रामू जी की निगाह में मैं उनकी बहू हूँ।
जामिल की निगाह में मैं माल हूँ।
आईने की निगाह में मैं अभी भी शर्माती हुई रुही हूँ।
उसने बाल पीछे किए। पीठ सीधी की। स्तन अब हाथों से नहीं ढके थे। ढकने की कोशिश मन में चल रही थी, शरीर पर नहीं। बाथरूम की रोशनी ठंडी थी, शरीर गरम। पैंटी के बीच एक हल्की नमी थी—शर्म की, याद की, और उस बात की जिसे वह आनंद नहीं कहना चाहती थी।
नल फिर खोला। ठंडा पानी चेहरे पर लिया। आईने में औरत वही थी। सिर्फ अब वह अपने हर अंग को जानती हुई खड़ी थी। न पूरी तरह सोनिया जैसी। न पूरी तरह पुरानी रुही जैसी।
बीच में।
शीशे के सामने।
लाल पैंटी में।
और पहली बार अपने शरीर को दुश्मन की तरह नहीं, सवाल की तरह देख रही थी।
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रुही बाथरूम से बेडरूम लौटी तो कदम पहले जैसे नहीं थे। भागने वाले कदम नहीं। सोचने वाले कदम थे। दरवाज़ा बंद किया। शीशा सामने था। ड्रेसिंग टेबल पर सोनिया की छोड़ी हुई चीज़ें पड़ी थीं—लिपस्टिक, काजल, एक छोटा परफ्यूम, और अलमारी के खुले दरवाज़े में एक नई लINGERIE। काली नहीं। गहरी मरून, पतली लेस, जैसे जानबूझकर किसी के देखने के लिए सिली गई हो।
उसने उसे हाथ में लिया। कपड़ा हल्का था। लगभग कपड़ा नहीं था। छाती पर लेस की जाली, नीचे की पट्टी इतनी पतली कि छुपाने से ज्यादा दिखाने का वादा करती थी। रुही की उंगलियाँ काँपीं। फिर एक छोटी सी मुस्कान आई। शर्मीली। जैसे कोई गुनाह सोच रही हो और गुनाह सुंदर लग रहा हो।
सोनिया सही कह रही थी।
यह वाक्य अब विरोध की तरह नहीं आया। थकान की तरह आया। और थकान के बाद कभी-कभी फैसला बहुत साफ हो जाता है।
वह शीशे के सामने खड़ी हुई। पुरानी लाल पैंटी उतारी। नई मरून लेस पहनी। ब्रा के हुक पीछे फँसाए तो स्तन ऊपर उठ आए। गले में एक पतली स्ट्रैप चढ़ी। उसने अपना पेट देखा, जाँघें देखीं, कमर की लकीर देखी। हाथ अपने-आप छाती पर गए—आदत। फिर उसने हाथ हटाए। इस बार जानबूझकर।
शीशे में औरत ने भी हाथ हटाए।
रुही मुस्कुराई। मुस्कान पूरी नहीं खुली। एक कोने से निकली और गाल तक गई। फिर शर्म से उसने निगाह झुका ली। देख रही हूँ खुद को… और मज़ा भी आ रहा है, शर्म भी। दोनों साथ हैं। ठीक है। दोनों साथ रहें।
ड्रेसिंग टेबल पर बैठ गई। काजल लगाया। आँखें और बड़ी हो गईं। ब्लश से गालों की लालिमा को शर्म की जगह सजाने लगी। लिपस्टिक गुलाबी-लाल। होंठ चमक उठे। हर स्ट्रोक के साथ मन में एक वाक्य बैठता गया।
मैं जवान हूँ।
यह बात पहली बार बोझ नहीं लगी। ताकत लगी।
मैं सुंदर हूँ।
यह बात पहले खतरा लगती थी। अब औज़ार लग रही थी।
तो क्यों न मैं खूब एन्जॉय करूँ।
उसने बाल खोलकर कंघी की। लहरें कंधों पर गिरीं। एक लट को उंगली पर लपेटकर छोड़ा। शीशे में झुककर अपने होंठ देखे। चूमा नहीं। बस देखा। फिर हल्के से मुस्कुराई। आज से नई रुही का जन्म होगा। यह सोच इतनी बड़ी थी कि वह खुद से शर्मा गई। जैसे कोई नया नाम रख लिया हो बिना पूछे।
नई रुही कौन थी?
पुरानी रुही भागती थी। हाथों से स्तन दबाती थी। आँखें बंद कर लेती थी।
नई रुही भागकर आई थी, यह सच था। लेकिन लौटते समय वह यह तय कर रही थी कि अब डर उसका गहना नहीं रहेगा। सोनिया ने शर्म को गहना कहा था। रुही ने फैसला कुछ और किया—डर को उतारूँगी। शर्म को रखूँगी। लेकिन शर्म अब रोकने वाली नहीं, चमकने वाली होगी।
वह उठी। एक पूरा चक्कर काटा शीशे के सामने। पीछे मुड़ी। कमर देखी। पैंटी की पतली पट्टी पीठ के नीचे गायब होती दिखी। वह झट से मुड़ी और दोनों हाथों से मुँह ढक लिया। हँसी फूट पड़ी—छोटी, दबी, शर्मीली। फिर हाथ हटाए और फिर से देखी।
आज से मैं मर्दों की प्यासी निगाहों से नहीं डरूँगी।
ख्याल आते ही जामिल की आँखें याद आ गईं। लार। जीभ होठों पर। शरीर में सिहरन उठी। पुरानी रुही कहती—छुप जा। नई रुही ने धीरे से कहा—
देखे। देख के तड़पे। छू नहीं सकता। मैं रामू जी की हूँ। लेकिन देखने दो। तड़सने दो।
यह विचार इतना साहसी था कि वह बैठ गई। साँस तेज़ हो गई। गाल जल रहे थे। शीशे में वही जलते गाल बहुत सुंदर लग रहे थे। उसने फुसफुसाया, “शर्म आ रही है…” और फिर मुस्कुराई, “आनी भी चाहिए।”
मेकअप पूरा हुआ। काजल की एक बारीक लकीर उसने आँख के बाहर तक खींची। जैसे निगाह को हथियार बनाना हो। परफ्यूम गर्दन और कलाई पर लगाया। खुशबू उठते ही याद आई—रामू जी की गंध कितनी मर्दाना होती है, यह खुशबू कितनी औरत वाली। दोनों के मिलने की कल्पना से पेट के नीचे मरोड़ सी उठी।
वह खड़ी हुई। कंधे पीछे किए। स्तन लेस में उठे हुए थे। पेट सपाट। जाँघें खुली। हाथ अब छुपाने के लिए नहीं थे। एक हाथ कमर पर रखा। दूसरा बालों में। पोज़ पूरा नहीं था। अधूरा था। इसलिए और ज्यादा सच लग रहा था।
मन में फैसला अब वाक्यों की माला बन चुका था।
मैं अपने अंग नहीं छुपाऊँगी।
खुदा ने यह खूबसूरती दी है तो इसे औजागर करूँगी।
रामू जी के लिए सजी हूँ। बाकी निगाहों के लिए नहीं डरूँगी।
जो देखेगा, तड़सेगा। जो मेरा है, लेगा। फर्क यही रहेगा।
फिर एक पुरानी आवाज़ आई—सनी?
नई रुही ने आँखें नहीं झुकाईं। सिर्फ इतना सोचा, सनी की बीवी कमरे में रोती हुई रह गई। बाहर जाने वाली औरत कामत परिवार की बहू है। यह सोच कर उसे फिर शर्म आई। शर्म के साथ एक अजीब गर्व भी। दोनों को उसने शीशे में एक साथ देखा—लाल गाल, चमकते होंठ, डरी हुई आँखें जिनमें अब एक पतली सी जिद भी थी।
दरवाज़े की तरफ मुड़ी। हाथ नॉब तक गए, फिर रुक गए। एक बार और आईने में देखी। पूछा, बिना आवाज़ के—
तू तैयार है?
जवाब पूरा हाँ नहीं था। अधूरा था। लेकिन अधूरा हाँ भी पुराने इनकार से भारी था। उसने मुस्कुराकर अपने गुलाबी होंठ काटे। काजल वाली आँखें एक बार झपकीं। फिर पीठ सीधी की।
नई रुही ने दरवाज़ा खोला।
मेकअप में। नई लINGERIE में।
शर्म अभी गले में थी।
लेकिन अब वह शर्म हाथों को स्तनों पर नहीं ले जा रही थी।
वह शर्म को चेहरे पर रखकर बाहर जा रही थी—देखने के लिए, दिखने के लिए, और पहली बार खुद तय करके तड़साने के लिए।
नई लINGERIE में शीशे के सामने खड़ी रुही सिर्फ सज नहीं रही थी। वह अपने अंदर जमा हुई बहुत-सी भूखों को एक साथ सुन रही थी। वे भूखें एक-दूसरे से लड़ती नहीं थीं अब। वे एक ही साँस में घुल रही थीं।
पहले जवानी की तड़प आई।
शरीर जवान था। त्वचा तनी हुई थी। खून गर्म था। इतने दिनों की शर्म, इतनी रातों की चुप्पी, सनी वाले बिस्तर की अधूरी ठंडक—सबने इस जवानी को दबाए रखा था। अब दबा नहीं रह रहा था। जाँघों के अंदर एक बेचैनी थी। पेट के नीचे एक हल्की सी धड़कन। जैसे शरीर कह रहा हो—मैं सज गई हूँ, अब मुझे छुओ। रुही ने आँखें बंद कीं। तड़प शर्मनाक नहीं लग रही थी। तड़प ईमानदार लग रही थी। जवान औरत की तड़प छुपाने से नहीं मरती। वह अंदर सड़ती है, या खुलकर साँस लेती है। आज वह साँस लेना चाहती थी।
फिर चूत की ज़रूरत ने अपना नाम लिया।
पैंटी के बीच नमी पहले से थी। शीशे में वह नमी नहीं दिखती थी, लेकिन वह उसे जानती थी। यह सिर्फ उत्तेजना नहीं थी। यह एक खाली जगह की पुकार थी। जिसे रामू जी ने चीरा था, भरा था, अपना कहा था। जिसे सनी कभी पूरा नहीं कर पाए थे। रुही के कान लाल हो गए। मेरी चूत को एक मर्द चाहिए। हुक्म देने वाला। अंदर तक उतरने वाला। यह सोचते ही वह शर्मा गई, फिर मुस्कुराई। क्योंकि इनकार अब झूठ लग रहा था। शरीर झूठ नहीं बोल रहा था। छोटी गुलाबी जगह तड़प रही थी—छुई-मुई सी, और फिर भी भूखी।
समर्पण इसी भूख के ठीक ऊपर बैठा था।
रुही समझ गई थी कि उसकी तड़प आज़ादी माँगती है, लेकिन उसकी आत्मा आज़ादी नहीं, मालिक माँगती है। समर्पण उसके लिए कमजोरी नहीं रह गया था। वह एक भाषा बन गया था। रामू जी जब कहते “खोल”, “देख”, “रो मत”, “मेरी बहू”, तो उसके अंदर की भागती हुई लड़की रुक जाती थी। समर्पण में एक अजीब आराम था। फैसला किसी और के पास चला जाता था। और फैसला देने वाला मर्द जब सख्त होता था, तो उसकी जवानी और गहरी हो जाती थी। वह झुकना चाहती थी। पूरी तरह। लेकिन झुकने के बाद भी सुंदर रहना चाहती थी। यही नई रुही थी।
सोनिया की बातें अब गाली नहीं लग रही थीं। वे एक चाबी लग रही थीं।
शरीर दिखाने के लिए है। शर्म गहना है। निगाहों का आनंद लो।
रुही ने हर वाक्य को अपने हिसाब से तोड़ा। पूरा नहीं निगला। शरीर दिखाने का मतलब उसके लिए सबका होना नहीं था। मतलब यह था कि छुप-छुप कर अपने को सज़ा देना बंद करो। शर्म को उसने पूरी तरह गहना नहीं माना। शर्म उसके गालों पर रही, आँखों में रही—लेकिन हाथ अब छाती पर नहीं जा रहे थे। सोनिया की सबसे काम की बात यही थी: डर मत। बाकी बातें रुही अपने मर्द के हिसाब से रखना चाहती थी।
फिर एक पुरानी भावना उठी—संसकारी पत्नी होने की भावना।
यह भावना मरी नहीं थी। यह कोने में खड़ी थी, साड़ी की याद में, मांग की सिंदूर की याद में, सनी के फोन वाले “बेबी” में। संसकार कह रहे थे—तुम पत्नी हो, प्रदर्शन की वस्तु नहीं। रुही ने इस आवाज़ को नहीं मारा। बस उससे पूछा—संसकार किसके लिए हैं? उस मर्द के लिए जो तुम्हें अधूरा छोड़कर निकल गया, या उस मर्द के लिए जो तुम्हें गोद में उठाकर मूत तक अपना बना बैठा? जवाब दर्दनाक था, लेकिन साफ था। उसकी संसकारिता अब सनी के घर की दीवारों में नहीं रह गई थी। वह रामू जी के हुक्म में सिमट रही थी। बहू बनना उसके लिए नया संसकार था। झुकना, सेवा, लाज—सब एक ही मर्द के नाम पर।
इसीलिए उसे एक डोमिनेंट रामू जी जैसे मर्द की ज़रूरत इतनी गहरी लग रही थी।
कोमल औरत को सख्त मर्द चाहिए होता है। नहीं तो उसकी कोमलता बिखर जाती है। रामू जी थप्पड़ भी मारते थे, आँसू भी पोंछते थे, पैंटी बचा भी देते थे, ब्रा उतरवा भी देते थे। यही मिश्रण उसे बाँधता था। सिर्फ प्यार वाला मर्द उसे भूखा छोड़ देता। सिर्फ क्रूर मर्द उसे तोड़कर फेंक देता। रामू जी दोनों काम एक साथ करते थे। इसलिए उसकी जवानी उनके आगे घुटने टेकती थी। उसे हुक्म चाहिए था। गर्दन पर हाथ चाहिए था। “तू मेरी है” वाली आवाज़ चाहिए थी। बिना उसके उसकी तड़प दिशाहीन हो जाती।
कोमल अंगों पर मर्दाना स्पर्श का एहसास याद आकर शरीर में उतर गया।
रामू जी के खुरदरे हाथ उसके मुम्मों पर, जाँघों पर, पैरों पर। उनकी दाढ़ी उसके गाल पर। उनकी उंगलियाँ उसकी गुलाबी फाँकों पर। वह स्पर्श कोमल त्वचा को नहीं पूछता था। वह लेता था। और लेने में एक गहरी मादा स्वीकृति छुपी थी। रुही ने अपना हाथ गर्दन पर फेरा, जैसे कोई और हाथ वहाँ हो। सिहरन उठी। मेरे नाज़ुक अंग उनके मर्दाना हाथों के लिए बने हैं। यह वाक्य शर्म से भरा था, और सच्चाई से भी।
फिर रामू की बाँहों में सुरक्षा आई।
यह सबसे साफ भावना थी। जामिल की निगाह डराती थी। सोनिया की हँसी काटती थी। खेल नंगा करता था। लेकिन जब रामू जी की छाती से उसका मुँह सटता था, तो दुनिया छोटी हो जाती थी। बाँहें दीवार बन जाती थीं। वह वस्तु भी होती थी उस पल, बहू भी होती थी, रोती हुई लड़की भी। और तीनों सुरक्षित लगती थीं। सुरक्षा प्रेम से अलग चीज़ थी। सुरक्षा यह थी कि कोई है जो कहे—देखो, लेकिन छूना मत। यह मेरी है। रुही को यही छत चाहिए थी। खुले आसमान की आज़ादी नहीं। एक मर्द की छत।
और सबसे नई, सबसे खतरनाक भावना—ग़ैर मर्दों की प्यासी निगाहों का मज़ा।
यह मज़ा अभी छोटा था, अधपका था, शर्म के नीचे छुपा था। लेकिन था। जामिल जब लार टपकाता है, जब उसकी जीभ होठों पर फिरती है, जब वह भागती जाँघों को घूरता है—तो अपमान होता है। और उसी अपमान के नीचे एक काली सी गर्माहट भी। नई रुही ने इस गर्माहट से इनकार नहीं किया। उसने उसे नाम दिया। मज़ा। लेकिन सीमा भी रखी। देखो, तड़सो। छू नहीं सकते। मैं रामू जी की हूँ। उनकी बाँहों में खड़ी होकर तुम्हारी निगाहें सहूँगी। यही मेरा खेल होगा। यही मेरी नई इज़्ज़त होगी।
शीशे में रुही ने अपने गुलाबी होंठ देखे। मुस्कुराई। फिर निगाह झुकाई। शर्म अभी जीवित थी। अच्छी बात थी। शर्म मर जाती तो वह सोनिया हो जाती। शर्म बच रही थी, इसलिए वह रुही रह रही थी—नई रुही। जवान, भूखी, समर्पित, संसकारी बहू, डोमिनेंट मर्द की औरत, कोमल अंगों वाली, सुरक्षित, और अब थोड़ी-थोड़ी निगाहों से खेलने वाली।
उसने धीरे से अपने आप से कहा—
मेरी जवानी तड़प रही है।
मेरी चूत एक मर्द माँग रही है।
मैं झुकना चाहती हूँ—रामू जी के आगे।
सोनिया ने दरवाज़ा दिखाया, रास्ता मैं चुनूँगी।
मैं पत्नी की लाज रखूँगी, लेकिन अब उस मर्द के नाम पर जिसने मुझे पूरा लिया।
मुझे हुक्म चाहिए, स्पर्श चाहिए, बाँहें चाहिए।
और अगर कोई और देखे… तो डर के बदले मैं तड़साऊँगी।
दरवाज़े की तरफ बढ़ते हुए उसके गाल लाल थे। काजल गीला नहीं था। पैंटी के बीच धड़कन थी। दिल में समर्पण था। और आँखों में एक नई सी बात थी—लाज भी, भूख भी, सुरक्षा भी, और पहली बार… खेल भी।


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