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Incest चाचा की आग भरी ज़ुबान: घर की प्यासी औरतें
#6
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सुबह का उजाला इस बार तेज था। कमरे में चारों शरीर अभी भी एक-दूसरे से सटे हुए थे। चादर गीली थी। हवा भारी।
सुमन सबसे पहले उठीं। शरीर में दर्द और थकान दोनों थे। जाँघों के बीच तीनों मर्दों (आरव और चाचा के पुराने निशान) का मिला-जुला अहसास बाकी था। उन्होंने धीरे से आरव का हाथ हटाया और साड़ी ढँक ली। मन में एक अजीब सा सवाल था—अब सामान्य जीवन कैसे जिएँ?
प्रिया और आंचल भी जाग गईं। तीनों औरतें चुपचाप नहाकर तैयार हुईं। नाश्ते पर चाचा पहले से बैठे थे। आरव देर से आया। चेहरा थका हुआ, पर आँखों में एक नया अधिकार था। चारों ने एक-दूसरे को देखा। कोई लंबी बात नहीं हुई। बस एक समझ थी कि रात जो हुई, वह अब रोजमर्रा का हिस्सा बनती जा रही है।
नाश्ता खत्म होने के बाद आरव ने कहा, “आज कॉलेज जाना है। दो दिन से नहीं गया।”
सुमन ने सिर हिलाया। “जा… सामान्य रहने की कोशिश कर।”
आरव निकला। बस स्टॉप तक पैदल गया। दिमाग में रात वाले दृश्य घूम रहे थे—माँ के नीचे, प्रिया की कराहें, आंचल का युवा शरीर। शरीर में अभी भी वह गर्मी बाकी थी।
कॉलेज पहुँचा तो उसका पुराना दोस्त रोहित मिल गया। रोहित हँसते हुए बोला, “अरे साले, दो दिन से गायब था। घरवालों ने बंद कर दिया था क्या? चेहरा ऐसा लग रहा है जैसे रात भर सोया ही न हो।”
आरव ने बनावटी हंसी हँसी। “कुछ घर की समस्या थी। अब ठीक है।”
रोहित ने उसकी ओर गौर से देखा। “समस्या दिखती नहीं। तू चमक रहा है यार। कोई नई वाली पटा ली क्या?”
आरव का दिल तेज धधका। उसने विषय बदल दिया। क्लास में बैठकर भी ध्यान नहीं लग रहा था। प्रोफेसर कुछ समझा रहे थे, पर आरव की निगाह खिड़की से बाहर थी। मन घर पर था—माँ अभी क्या कर रही होंगी, प्रिया, आंचल।
दोपहर को कैंटीन में रोहित ने फिर पूछा, “सच बता। घर में कुछ गड़बड़ है? तू पहले इतना चुप नहीं रहता था।”
आरव ने कॉफी की चुस्की ली। “घर… बदल गया है। बस।”
रोहित ने और कुछ नहीं पूछा। पर उसकी निगाह में सवाल रह गया। आरव समझ गया कि बाहरी दुनिया अभी भी वही है। दोस्त, क्लास, हँसी-मजाक। पर अंदर वह अब वही आरव नहीं रहा।
शाम को घर लौटा तो देखा कि बैठक में एक नई औरत बैठी है। पड़ोस की श्रीमती मेहता। उम्र करीब अड़तीस। गोरी, सुडौल शरीर। साड़ी में भारी स्तन और पतली कमर। वह सुमन के साथ चाय पी रही थी। हँस रही थी।
सुमन ने आरव को देखा और सामान्य स्वर में बोलीं, “आ गया? मेहता जी आई हुई हैं। उनके पति बाहर गए हैं दो दिन के लिए। अकेली थीं तो बात करने आ गईं।”
श्रीमती मेहता ने आरव को देखा। निगाह थोड़ी देर तक रुकी। “बेटा बड़ा हो गया है। पहले तो छोटा सा लगता था।”
आरव ने नमस्ते की और कमरे में चला गया। मन में हल्की बेचैनी हुई। घर के अंदर का सच और बाहर का सामान्य जीवन अब टकराने वाले थे।
रात का खाना चुपचाप हुआ। चाचा ने श्रीमती मेहता के बारे में हल्की सी टिप्पणी की, “अच्छी औरत है। अकेली पड़ने पर समय कटना मुश्किल हो जाता है।”
सुमन ने उनकी ओर देखा। निगाह में एक छोटा सा सवाल था। प्रिया चुप रही। आंचल ने रोटी तोड़ते हुए सिर नीचे रखा।
खाना खत्म होने के बाद आरव अपने कमरे में गया। दरवाजा बंद किया। बिस्तर पर लेटते ही रोहित की बात याद आई—“तू चमक रहा है यार।” फिर श्रीमती मेहता की निगाह। फिर माँ का चेहरा। सब कुछ एक साथ उलझ रहा था।
गलियारे में हल्के कदम सुनाई दिए। दरवाजे पर दस्तक नहीं हुई। सिर्फ आवाज आई—सुमन की। “सो गया क्या?”
आरव ने जवाब नहीं दिया। मन में फैसला नहीं हो पा रहा था। बाहर की दुनिया अब घर के अंदर घुसने लगी थी। दोस्त के सवाल। पड़ोस की औरत की निगाह। और घर के अंदर वो रिश्ते जो अब छुपाए नहीं छुप रहे थे।
दूसरी तरफ बैठक में चाचा और सुमन अकेले थे। चाचा ने धीमे से कहा, “मेहता वाली बार-बार आएगी। अकेलापन सबसे बड़ा कमजोर बिंदु होता है। तू देखती रह।”
सुमन ने पल्लू ठीक किया। “घर के अंदर ही इतना कुछ हो रहा है… बाहर से और उलझ जाएगा क्या?”
चाचा ने जवाब नहीं दिया। बस खिड़की से बाहर देखा। रात गहरी होती जा रही थी।
आरव के कमरे में अंधेरा था। वह लेटा हुआ सोच रहा था—कॉलेज, दोस्त, पड़ोस… सब सामान्य लग रहे थे। पर वह खुद अब सामान्य नहीं रहा। और यह फर्क अब ज्यादा दिन छुप नहीं सकता था।
एक छोटी सी दरार बाहर की दुनिया में भी पड़ चुकी थी।
रोहित के सवाल।
श्रीमती मेहता की निगाह।
और घर के अंदर वो सन्नाटा जो हर रात कुछ नया जन्म दे रहा था।

अगले दिन आरव कॉलेज गया तो रोहित ने सीधा पूछा, “आज शाम को तेरे घर चलते हैं। बहुत दिन हो गए। तेरी माँ के हाथ की चाय पीनी है।”
आरव का चेहरा एक पल के लिए कठोर हो गया। “आज नहीं यार। घर में थोड़ी व्यस्तता है।”
रोहित हँसा, “क्या व्यस्तता? तू तो पहले कहता था घर पर कोई रोक-टोक नहीं। चल, शाम को बस से उतरकर सीधा तेरे घर।”
आरव ने मना करने की कोशिश की, पर रोहित ने जिद पकड़ ली। आखिरकार आरव ने हामी भर ली। मन में बेचैनी बढ़ गई। घर का सच और दोस्त का आना—दोनों चीजें एक साथ कैसे संभलेंगी?
शाम को दोनों दोस्त घर पहुँचे। आरव ने घंटी बजाई। सुमन ने दरवाजा खोला। साड़ी में थीं। चेहरे पर सामान्य मुस्कान लगाई, पर आँखों में हल्की घबराहट थी। “आओ बेटा… रोहित भी साथ में?”
रोहित ने नमस्ते की। “आंटी, बहुत दिन बाद आया हूँ। आपका हाथ का खाना याद आ रहा था।”
सुमन उन्हें अंदर ले गईं। प्रिया रसोई से निकलीं। उन्होंने भी मुस्कान दी, पर आरव की निगाह से निगाह मिलते ही थोड़ी सकुचा गईं। आंचल अपने कमरे से बाहर आई। छोटी कुर्ती में थी। रोहित ने उसे देखा और हल्की सी मुस्कान दी। “आंचल भी बड़ी हो गई।”
चारों बैठक में बैठे। चाचा भी आ गए। बातें सामान्य रहीं—पढ़ाई, मौसम, पुरानी यादें। पर आरव हर पल सतर्क था। सुमन चाय बनाने गईं तो प्रिया साथ हो लीं। रसोई में प्रिया ने धीमे से कहा, “दोस्त के सामने सामान्य रहना होगा दीदी। ज्यादा देर आँखें मत झुकाना।”
सुमन ने सिर हिलाया। हाथ काँप रहे थे। चाय के कप ले जाते समय उनकी निगाह आरव पर गई। बेटे की आँखों में वही अधिकार था जो रात को था। सुमन ने जल्दी से निगाह फेर ली।
रोहित चाय पीते हुए बोला, “आंटी, आरव पिछले कुछ दिनों से अजीब सा व्यवहार कर रहा है। घर में सब ठीक तो है न?”
सुमन की साँस एक पल के लिए रुकी। फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ बेटा। सब ठीक है। बस थोड़ी घर की व्यस्तता थी।”
चाचा ने बीच में कहा, “युवावस्था में मन कई बार उलझ जाता है। सामान्य बात है।”
रोहित ने आरव की ओर देखा। कुछ और पूछने वाला था कि दरवाजे की घंटी फिर बज गई। आंचल ने दरवाजा खोला। श्रीमती मेहता फिर आ गई थीं। हाथ में एक छोटी सी मिठाई की डब्बी थी। “सुमन जी, कल की बात अधूरी रह गई थी। सोचा चाय पीते हुए बात हो जाए।”
अब बैठक में भीड़ हो गई थी। रोहित, श्रीमती मेहता, चाचा, सुमन, प्रिया, आंचल और आरव। बाहरी दुनिया घर के अंदर आ चुकी थी। सुमन ने मेहता जी को बैठाया। चाय और मिठाई आने लगी।
श्रीमती मेहता ने आरव को गौर से देखा। “बेटा, कॉलेज में पढ़ाई कैसी चल रही है? चेहरा थोड़ा थका हुआ लग रहा है।”
आरव ने संक्षिप्त जवाब दिया। रोहित ने श्रीमती मेहता से बातचीत शुरू कर दी। प्रिया चुपचाप सबको देख रही थी। आंचल रोहित की ओर कभी-कभी देख लेती। चाचा शांत बैठे सबकी हरकतें नोट कर रहे थे।
थोड़ी देर बाद रोहित ने उठते हुए कहा, “आंटी, आज तो रुक जाता हूँ खाने पर। बहुत दिन बाद इतना अच्छा महसूस हो रहा है।”
आरव की निगाह माँ से मिली। सुमन ने हल्के से सिर हिलाया। “रुक जाओ बेटा। खाना लग जाएगा।”
श्रीमती मेहता भी मुस्कुराईं। “तो फिर मैं भी उठती हूँ। कल फिर आऊँगी।”
चाचा ने कहा, “रुक जाइए। खाना साथ ही हो जाए।”
मेहता जी थोड़ी सकुचाईं, पर बैठ गईं। अब घर में दो बाहरी लोग थे। आरव का दोस्त और पड़ोस की अकेली औरत। बातें चलती रहीं। हँसी-मजाक हुआ। पर हर हँसी के नीचे घर के लोगों की निगाहों में एक तनाव था।
खाना लगने के समय सुमन और प्रिया रसोई में थीं। प्रिया ने धीमे से कहा, “दोस्त रुक गया। मेहता जी भी। आज रात कुछ नहीं हो सकेगा।”
सुमन ने बर्तन धोते हुए जवाब दिया, “शायद यही ठीक है। थोड़ी साँस लेने का समय मिल जाएगा।”
पर उनकी आवाज में पूरा विश्वास नहीं था। शरीर अभी भी रात की गर्मी याद रखे हुए था।
खाना खत्म होने के बाद रोहित ने आरव के कमरे में जाने को कहा। दोनों दोस्त कमरे में गए। दरवाजा बंद हुआ। रोहित ने सीधा पूछा, “अब सच बता। घर में कुछ न कुछ है। तेरी माँ की आँखें झुक रही थीं। भाभी तेरी ओर देख रही थीं। तू खुद भी अजीब सा है। क्या चल रहा है?”
आरव ने खिड़की की तरफ देखा। जवाब नहीं दिया। मन में माँ का नंगा शरीर, प्रिया की कराहें, आंचल का चेहरा सब घूम रहा था। उसने सिर्फ इतना कहा, “घर… थोड़ा बदल गया है। उससे ज्यादा कुछ नहीं।”
रोहित ने और दबाव डाला, पर आरव चुप रहा। बाहर बैठक में श्रीमती मेहता चाचा और सुमन के साथ बात कर रही थीं। आंचल चुपचाप सब सुन रही थी।
रात गहराई। रोहित सोफे पर सोने को तैयार हो गया। श्रीमती मेहता जाने को हुईं तो चाचा ने कहा, “देर हो गई है। कल सुबह चली जाना।”
मेहता जी ने मना करने की कोशिश की, पर अंत में हामी भर ली। अब घर में दो बाहरी लोग रात बिताने वाले थे।
आरव अपने कमरे में लेटा। दिमाग में सवाल घूम रहे थे। माँ दूसरे कमरे में होगी। प्रिया और आंचल भी। चाचा भी। और बीच में रोहित और श्रीमती मेहता। घर का सच अब बहुत करीब से छुपना पड़ रहा था।
सुमन ने रात को आरव के कमरे का दरवाजा धीरे से खोला। सिर्फ एक बार देखा। आरव जाग रहा था। दोनों की निगाहें मिलीं। सुमन ने कुछ नहीं कहा। बस दरवाजा बंद करके चली गईं।
आरव की मुट्ठी बंद हो गई। बाहरी दुनिया अब घर की दहलीज पर खड़ी थी। और अंदर का सच कितने दिन छुप पाएगा… यह सवाल अब सबके मन में था।

रात के बारह बज चुके थे। घर में दो अतिरिक्त लोग सो रहे थे—रोहित सोफे पर, श्रीमती मेहता मेहमान वाले छोटे कमरे में। बाकी सब अपने-अपने कमरों में थे, पर कोई गहरी नींद में नहीं था।
आरव अपने बिस्तर पर लेटा हुआ आँखें खोले हुए था। दिमाग में रोहित के सवाल घूम रहे थे। “घर में कुछ न कुछ है।” वह बात बार-बार कानों में गूँज रही थी। थोड़ी देर बाद उसे हल्की प्यास लगी। वह पानी लेने उठा। गलियारे में निकला तो देखा कि माँ का कमरा आधा खुला है। अंदर हल्की रोशनी थी।
सुमन बिस्तर पर बैठी थीं। साड़ी का पल्लू ढीला था। उन्होंने आरव को देख लिया। दोनों की निगाहें मिलीं। सुमन ने इशारे से उसे अंदर बुलाया। आरव घुस गया और दरवाजा धीरे से बंद कर दिया।
“सो नहीं पा रही,” सुमन ने धीमी आवाज में कहा। “घर में बाहर वाले हैं। मन घबरा रहा है।”
आरव पास बैठ गया। “रोहित पूछ-पूछ कर थक गया। मैं कुछ बता नहीं सका। माँ… अगर कुछ सुन लिया तो?”
सुमन ने बेटे का हाथ पकड़ लिया। “संभालना पड़ेगा। आज रात कोई हलचल मत करना। चुपचाप सो जा।”
पर हाथ पकड़ते ही दोनों की साँसें थोड़ी तेज हो गईं। रात वाली यादें एक पल के लिए लौट आईं। आरव की उंगलियाँ माँ की हथेली पर दब गईं। सुमन ने हाथ नहीं छुड़ाया। कुछ पल वे ऐसे ही बैठे रहे। फिर सुमन ने धीरे से कहा, “जा… अपने कमरे में। कल बात करते हैं।”
आरव उठकर चला गया। गलियारे में उसने देखा कि प्रिया का दरवाजा भी आधा खुला है। प्रिया अंदर खड़ी थी। उसने आरव को देखते ही दरवाजा और खोल दिया। आवाज बहुत धीमी थी, “रोहित सो गया? मेहता जी का कमरा शांत है?”
आरव ने सिर हिलाया। प्रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया। “आज नहीं। जोखिम मत ले। पर… दिन भर तरासता रहा।” उसकी आँखों में वही भूख थी। आरव ने सिर्फ सिर हिलाया और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।
इतने में आंचल भी गलियारे में आ गई। पानी की बोतल हाथ में थी। तीनों एक पल के लिए गलियारे में आमने-सामने खड़े हो गए। कोई कुछ नहीं बोला। बस निगाहें मिलीं। फिर सब अपने कमरों में लौट गए।
नीचे सोफे पर रोहित करवट बदल रहा था। नींद पूरी नहीं आ रही थी। अचानक उसे ऊपर से हल्की सी आवाज सुनाई दी—जैसे कोई दरवाजा बंद हो रहा हो। उसने कान तेज किए। फिर सन्नाटा। वह उठकर बैठ गया। मन में शक की एक छोटी सी लकीर तन गई। पर कुछ समझ नहीं आया। वापस लेट गया।
मेहमान वाले कमरे में श्रीमती मेहता भी जाग रही थीं। पति के बाहर होने पर अकेलापन अख्तर आ रहा था। घर की दीवारों से हल्की हलचल सुनाई दी। उन्होंने सोचा शायद कोई पानी लेने उठा होगा। पर मन में एक अजीब सा ख्याल आया—इस घर में कुछ अलग सा लगता है। सुमन जी की आँखें, प्रिया की चुप्पी, आरव का व्यवहार… सब थोड़ा अलग।
ऊपर चाचा अपने कमरे में खड़े खिड़की से बाहर देख रहे थे। उन्हें सबकी हलचल का अंदाजा था। उन्होंने दरवाजा खोला और गलियारे में आकर धीमी आवाज में कहा, “सब अपने कमरों में रहो। आज कोई गलती मत करना।”
आवाज सुनकर सुमन, प्रिया और आंचल ने अपने दरवाजे पूरी तरह बंद कर लिए। आरव ने भी कुंडी लगा दी। घर फिर से शांत हो गया।
पर सन्नाटा भारी था।
रोहित आँखें बंद किए लेटा था, पर दिमाग चल रहा था। श्रीमती मेहता करवट बदल-बदल कर सोच रही थीं। आरव अपने बिस्तर पर माँ की छुई हुई उंगलियों की गर्माहट महसूस कर रहा था। सुमन अंधेरे में लेटी हुई बेटे की आँखें याद कर रही थीं। प्रिया और आंचल दोनों अपने-अपने कमरों में बेचैन थीं।
सुबह से पहले एक छोटी सी घटना और हुई।
रोहित प्यास लगने पर उठा। रसोई की तरफ जा रहा था कि सीढ़ियों के पास आंचल से टकरा गया। आंचल पानी की बोतल लेकर जा रही थी। दोनों एक पल के लिए स्तब्ध रह गए। आंचल की कुर्ती का बटन खुला था। युवा स्तनों की हल्की रेखा रोहित की निगाह में आ गई। आंचल ने जल्दी से बटन बंद किया और सर झुकाकर निकल गई। रोहित वहीं खड़ा रह गया। मन में एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ।
वह रसोई से पानी लेकर वापस सोफे पर आ गया। आँखें अब पूरी तरह खुल चुकी थीं। घर की हर छोटी-छोटी बात अब उसे संदिग्ध लगने लगी थी।
सुबह का उजाला धीरे-धीरे आया। घर में सभी जल्दी उठ गए। रोहित की आँखों में नींद से ज्यादा सवाल थे। श्रीमती मेहता भी थकी हुई लग रही थीं। नाश्ते पर बातें सामान्य रखने की कोशिश हुई, पर तनाव हवा में तैर रहा था।
रोहित ने नाश्ता खत्म करके कहा, “आंटी, अब मैं चलता हूँ। आरव, शाम को कॉलेज में मिलते हैं। बात करनी है।”
आरव ने सिर्फ सिर हिलाया। श्रीमती मेहता भी उठीं। “सुमन जी, कल फिर आऊँगी। अकेलापन अच्छा नहीं लगता।”
चाचा ने उन्हें दरवाजे तक छोड़ा। जब दोनों बाहरी लोग चले गए तो घर में फिर से वही पुराना सन्नाटा छा गया। पर अब वह सन्नाटा पहले जैसा नहीं था। बाहर की दुनिया ने घर की दीवारों पर अपनी छाप छोड़ दी थी।
सुमन ने आरव की ओर देखा। “संभल कर। रोहित शक कर रहा है।”
आरव ने जवाब दिया, “जानता हूँ। अब और सावधान रहना होगा।”
प्रिया ने धीमे से कहा, “मेहता जी भी बार-बार आएंगी। अकेलापन उन्हें यहाँ खींच लाएगा।”
आंचल चुपचाप सब सुन रही थी। मन में रात वाली मुलाकात घूम रही थी—रोहित की निगाह और अपना खुला बटन।
घर के अंदर का सच अब सिर्फ अंदर तक सीमित नहीं रह गया था।
दोस्त के सवाल।
पड़ोसिन की अकेली आँखें।
और घर के लोगों का दबा हुआ तनाव।
सब मिलकर एक नई परत बना रहे थे—सरल, साफ, लेकिन खतरनाक।

कॉलेज की कैंटीन में भीड़ थी। आरव कोने की मेज पर बैठा कॉफी ठंडी होने दे रहा था। रोहित सामने बैठ गया। चेहरे पर सामान्य मुस्कान नहीं थी।
“अब बहाने मत बना,” रोहित ने सीधा कहा। “कल रात मैंने आवाजें सुनी थीं। ऊपर किसी के कमरे के दरवाजे बंद हो रहे थे। आंचल से टकराया तो वह घबरा गई। तेरी माँ की आँखें झुक रही थीं। भाभी तेरी तरफ देख रही थीं। घर में कुछ चल रहा है आरव। बता।”
आरव की उंगलियाँ कप पर कस गईं। उसने आसपास देखा और धीमी आवाज में कहा, “घर में कुछ उलझनें हैं। परिवार की। तुझे बताकर क्या करेगा?”
रोहित ने आगे झुककर कहा, “इसलिए तो पूछ रहा हूँ। तू बदल गया है। पहले हँसता था, अब हर बात पर बचता है। अगर कोई समस्या है तो बता। दोस्त हूँ।”
आरव चुप रहा। मन में माँ का चेहरा, प्रिया की आँखें, आंचल की घबराहट सब घूम गया। उसने आखिरकार सिर हिलाया। “सच में कुछ बताने लायक नहीं। बस घर का माहौल थोड़ा अलग हो गया है। तू ज्यादा मत सोच।”
रोहित ने उसे गौर से देखा। विश्वास नहीं हुआ, पर और दबाव नहीं डाला। “ठीक है। पर अगर कुछ बिगड़ता दिखे तो बता। मैं यहाँ हूँ।”
क्लास में आरव का ध्यान नहीं लग सका। रोहित के सवाल उसके दिमाग में गूँजते रहे। दोपहर होते-होते उसने फैसला किया—घर जाकर सबको सावधान करना होगा।
शाम को घर पहुँचा तो देखा कि श्रीमती मेहता फिर से बैठी हैं। इस बार अकेली नहीं, सुमन के साथ छत पर चाय पी रही थीं। प्रिया नीचे रसोई में थीं। आंचल अपने कमरे में। चाचा अखबार पढ़ रहे थे।
आरव ने नमस्ते की और ऊपर छत पर चला गया। दोनों औरतें कुर्सियों पर बैठी थीं। सुमन ने बेटे को देखकर हल्की मुस्कान दी। श्रीमती मेहता ने कहा, “आओ बेटा। तुम्हारी माँ से बातें हो रही थीं।”
आरव पास खड़ा रह गया। श्रीमती मेहता ने आगे कहा, “पति दो दिन और बाहर रहेंगे। घर में सन्नाटा बहुत अख्तर है। यहाँ आकर थोड़ा मन हल्का हो जाता है।”
सुमन ने चाय की प्याली घुमाते हुए कहा, “अकेलापन सबको होता है। हम सब यहीं हैं।”
बातें सामान्य रहीं—मौसम, बाजार, पुरानी यादें। पर श्रीमती मेहता की निगाह बार-बार सुमन पर ठहर जाती। जैसे कोई बात पूछना चाहती हों पर हिम्मत नहीं जुटा पा रही हों। थोड़ी देर बाद आरव नीचे चला गया। प्रिया ने उसे रसोई में देखकर धीमे से पूछा, “रोहित ने क्या कहा?”
“पूछ रहा था। शक हो गया है। सावधान रहना होगा।”
प्रिया ने सिर हिलाया। “मेहता जी भी बार-बार आ रही हैं। दीदी के साथ छत पर काफी देर से हैं।”
ऊपर छत पर श्रीमती मेहता ने अचानक आवाज धीमी कर दी। “सुमन जी, एक बात पूछूँ? आपका घर… थोड़ा अलग लगता है। सब लोग एक-दूसरे को जैसे… ज्यादा करीब से देखते हैं। मेरी गलतफहमी है क्या?”
सुमन का हाथ प्याली पर रुक गया। दिल तेज धधकने लगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “गलतफहमी ही होगी। परिवार है। साथ रहते हैं तो करीब लगते हैं।”
श्रीमती मेहता ने गहराई से देखा। “अकेलापन में इंसान बहुत कुछ सोचने लगता है। कभी-कभी गलत भी। माफ करना अगर ज्यादा बोल गई।”
सुमन ने विषय बदल दिया। थोड़ी देर बाद दोनों नीचे आ गईं। श्रीमती मेहता ने विदा ली। “कल फिर आऊँगी। अगर तकरीफ न हो।”
चाचा ने दरवाजे पर कहा, “कोई तकरीफ नहीं। आती रहिए।”
जब वह चली गईं तो घर में फिर से वही चार लोग रह गए। आरव ने सबको बैठक में बुलाया। सीधे कहा, “रोहित शक कर रहा है। कल रात की हलचल उसने सुन ली। आंचल से टकराया भी। मेहता जी भी सवाल पूछ रही हैं। अब और लापरवाही नहीं चलेगी।”
सुमन ने पल्लू कसकर बाँधा। “तो फिर कुछ दिन संयम रखें। बाहर वाले संदेह में हैं।”
प्रिया ने धीमे से कहा, “संयम रखा जा सकता है। पर अंदर की बेचैनी कैसे दबेगी?”
आंचल चुप थी। रोहित वाली मुलाकात याद आ रही थी। उसका खुला बटन और रोहित की निगाह। मन में एक अजीब सा डर और उत्सुकता दोनों थे।
चाचा ने शांत स्वर में कहा, “दोनों तरफ से दबाव बढ़ रहा है। बाहर वाले पूछ रहे हैं। अंदर वाले दब रहे हैं। कोई गलती हुई तो सब खुलेगा। इसलिए आज रात सब अपने कमरों में रहें। कोई किसी के पास न जाए।”
सबने सिर हिलाया। पर आँखों में वह बात नहीं थी।
रात हुई। घर शांत था। पर हर कोई जाग रहा था। आरव अपने कमरे में लेटा सोच रहा था—रोहित आगे क्या करेगा। सुमन बिस्तर पर करवटें बदल रही थीं। प्रिया बार-बार उठकर दरवाजे के पास जा रही थीं। आंचल आईने के सामने खड़ी अपने शरीर को देख रही थी।
और कहीं दूर श्रीमती मेहता अपने अकेले घर में बैठी सोच रही थीं—उस घर में सच में क्या चल रहा है। रोहित अपने हॉस्टल में लेटा वही सवाल दोहरा रहा था।
घर की दीवारें अब सिर्फ अंदर का सच नहीं छुपा रही थीं।
बाहर के सवाल अंदर तक आ चुके थे।
और अंदर की बेचैनी बाहर की तरफ धकेल रही थी।
एक छोटी सी गलती अब काफी थी सब कुछ बदल देने के लिए।


रात फिर गहरी थी। घर में सन्नाटा पसरा था, पर हर कोई जाग रहा था। चाचा के आदेश के बाद भी कोई गहरी नींद में नहीं था।
आरव अपने कमरे में खिड़की के पास खड़ा था। रोहित के सवाल उसके दिमाग में घूम रहे थे। “घर में कुछ चल रहा है।” वह बात बार-बार दोहराई जा रही थी। मन में डर था कि कहीं दोस्त सच में कुछ जान न ले। उसी समय गलियारे में हल्के कदम सुनाई दिए।
दरवाजे पर बहुत हल्की दस्तक हुई। आरव ने खोला तो प्रिया खड़ी थी। नाइटी में। बाल खुले। आँखों में वही बेचैनी।
“सो नहीं पा रही,” उसने बहुत धीमी आवाज में कहा। “चाचा ने मना किया है… पर मन नहीं मान रहा।”
आरव ने गलियारे की तरफ देखा। सब शांत था। उसने प्रिया को अंदर खींच लिया और दरवाजा बंद कर दिया। दोनों कुछ पल बस एक-दूसरे को देखते रहे। फिर प्रिया ने आरव का हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दिया। नाइटी पतली थी। स्तनों की गर्मी हथेली में उतर गई।
“बस इतना… आज सिर्फ इतना,” प्रिया ने फुसफुसाया। “बाकी कल।”
आरव की साँस भारी हो गई। उसने प्रिया को दीवार से सटाया और चूम लिया। गहरा। प्रिया की बाँहें उसके गले में बंद हो गईं। चुंबन लंबा चला। हाथ नाइटी के अंदर चले गए। स्तन नंगे हो गए। आरव ने एक निप्पल को उंगलियों से दबाया। प्रिया की हल्की कराह निकल गई।
इतने में बाहर गलियारे में और कदम गूँजे। दोनों थम गए। आरव ने जल्दी से प्रिया की नाइटी ठीक की। दरवाजे के पास जाकर कान लगाया। आवाज सुमन की थी। वह पानी लेने गई थीं। आरव ने प्रिया को इशारे से शांत रहने को कहा। सुमन का कमरा बंद होने की आवाज आई। फिर सन्नाटा।
प्रिया ने धीमे से कहा, “अब जाता हूँ। जोखिम काफी हो गया।”
वह दरवाजा खोलकर चुपचाप निकल गई। आरव अकेला रह गया। शरीर में गर्मी थी, पर मन में डर और भी बढ़ गया था।
उसी रात श्रीमती मेहता अपने घर में नहीं सो पाईं। अकेलापन और पिछले दिनों की मुलाकातें उसके दिमाग में घूम रही थीं। आधी रात को उसने फैसला किया। हल्के कपड़े पहने और पड़ोस वाले घर की तरफ चल दीं। सोचा था सिर्फ गेट तक जाकर देख लें कि कोई रोशनी है या नहीं।
घर के गेट के पास पहुँची तो ऊपर के एक कमरे में हल्की रोशनी देखी। आरव के कमरे की। वह कुछ देर खड़ी रही। फिर वापस अपने घर चली गईं। मन में शक और भी गहरा हो गया।
सुबह हुई तो घर में थकान साफ झलक रही थी। नाश्ते पर सब चुप थे। आरव ने प्रिया की ओर देखा। प्रिया ने निगाहें झुका लीं। सुमन ने दोनों को देख लिया। कुछ नहीं कहा। बस चाय बनाती रही।
कॉलेज में रोहित ने आरव को फिर से पकड़ लिया। “कल रात सोया नहीं। तेरे घर की बातें याद आ रही थीं। आज शाम को फिर चलते हैं। इस बार खाना खाकर ही लौटूँगा।”
आरव ने मना करने की कोशिश की। “यार आज घर पर मेहमान आने वाले हैं।”
रोहित हँसा। “कोई बात नहीं। मेहमानों के साथ भी बैठ लेंगे। मैं तय करके आया हूँ।”
आरव की बेचैनी बढ़ गई। शाम को घर पहुँचा तो देखा कि श्रीमती मेहता पहले से बैठी हैं। सुमन के साथ बातें कर रही हैं। प्रिया और आंचल भी वहीं थीं। चाचा अखबार रख कर बातों में शामिल हो रहे थे।
रोहित पीछे-पीछे आ गया। अब घर में फिर से दो बाहरी लोग थे। बातें सामान्य रहीं। हँसी-मजाक हुआ। पर हर हँसी के नीचे तनाव था। रोहित बार-बार आरव की ओर देख रहा था। श्रीमती मेहता सुमन की आँखों में कुछ खोज रही थीं।
खाना लगने के समय सुमन और प्रिया रसोई में थीं। सुमन ने धीमे से कहा, “रात को तू आरव के कमरे में गई थी?”
प्रिया का हाथ रुक गया। “सिर्फ बात करने। कुछ नहीं हुआ।”
सुमन ने गौर से देखा। “चेहरे पर लिखा है। संभल। बाहर वाले नजर रखे हुए हैं।”
खाना खत्म होने के बाद रोहित ने आरव से कहा, “आज रात यहीं रुकूँगा। सुबह साथ चलेंगे।”
आरव ने माँ की ओर देखा। सुमन ने हल्के से सिर हिलाया। श्रीमती मेहता भी उठने को हुईं तो चाचा ने कहा, “देर हो गई। कल सुबह चली जाइए।”
मेहता जी फिर रुक गईं। अब घर में दो बाहरी मेहमान रात भर के लिए थे। कमरों का बंटवारा हुआ। रोहित फिर सोफे पर। श्रीमती मेहता मेहमान कमरे में। बाकी अपने-अपने कमरों में।
रात के पहर में जब सब सोने चले गए तो आरव का दरवाजा फिर धीरे से खुला। इस बार आंचल खड़ी थी। आँखों में डर और जिद दोनों। “भाई… आज सिर्फ बात। कुछ और नहीं। मन भारी है।”
आरव ने उसे अंदर लिया। दरवाजा बंद किया। दोनों बैठे। आंचल ने धीमे से कहा, “रोहित बार-बार आ रहा है। मेहता जी भी। मुझे डर लग रहा है कि कहीं सब खुुल न जाए। और… मुझे भी तरास हो रहा है।”
आरव ने बहन का हाथ पकड़ लिया। “आज नहीं। जोखिम बहुत है।”
आंचल ने सिर हिलाया। कुछ पल चुप बैठी रही। फिर उठकर चली गई। गलियारे में उसकी कुर्ती का किनारा हल्का सा फड़फड़ाया।
नीचे सोफे पर रोहित आँखें खोले लेटा था। ऊपर की हलचल उसने फिर से सुन ली थी। इस बार वह उठा। सीढ़ियों की तरफ कुछ कदम बढ़ाया। फिर रुक गया। मन में फैसला कर रहा था—कल सुबह सीधा पूछूँगा। अब और नहीं।
मेहमान कमरे में श्रीमती मेहता भी जाग रही थीं। उन्होंने भी हल्की आवाज सुनी थी। उन्होंने फैसला किया—कल सुमन जी से अकेले में बात करेंगी। साफ-साफ।
घर फिर से शांत हो गया। पर यह खामोशी अब टूटने वाली थी।
दोस्त का शक पक्का हो रहा था।
पड़ोसिन के सवाल गहरे हो रहे थे।
और घर के अंदर दबी हुई भावनाएँ बार-बार दरवाजे खटखटा रही थीं।
एक छोटी सी गलती अब बाकी थी। और वह गलती किसी भी पल हो सकती थी।

रात के दो बज रहे थे। घर में सन्नाटा इतना गहरा था कि पंखे की आवाज भी तेज लग रही थी। रोहित सोफे पर करवटें बदल रहा था। नींद अधूरी थी। श्रीमती मेहता मेहमान कमरे में लेटी हुई अकेलापन से लड़ रही थीं। ऊपर सब अपने कमरों में थे—मना किया गया था, पर शरीर नहीं मान रहा था।
आरव का दरवाजा धीरे से खुला। प्रिया फिर से खड़ी थी। इस बार नाइटी भी नहीं। सिर्फ एक पतली चादर ओढ़े हुए। आँखों में भूख और डर दोनों।
“आज… बस एक बार,” उसने फुसफुसाया। “चुपचाप। कोई आवाज नहीं।”
आरव ने उसे अंदर खींच लिया। दरवाजा बंद किया। कुंडी नहीं लगाई—डर था कि आवाज न हो। दोनों अंधेरे में एक-दूसरे से चिपक गए। प्रिया की चादर गिर गई। नंगा शरीर आरव के हाथों में आ गया। गोल स्तन, तने निप्पल, जाँघों के बीच पहले से गीलापन।
आरव ने उसे दीवार से सटाया। एक हाथ से मुँह दबा रखा था ताकि कराह न निकले। दूसरे हाथ से अपनी पैंट नीचे की। सख्ती निकल आई। प्रिया ने खुद ही टाँग उठाई। आरव ने एक झटके में अंदर तक धकेल दिया।
प्रिया की आँखें फटी रह गईं। मुँह आरव के हाथ में दबा था। सिर्फ नाक से तेज साँसें निकल रही थीं। आरव ने धीरे-धीरे लेकिन गहराई तक चलाना शुरू किया। हर धक्का चुपचाप, लेकिन जोर का। प्रिया के स्तन उसकी छाती से रगड़ खा रहे थे। निप्पल इतने सख्त थे कि आरव को चुभ रहे थे।
“उम्म्म… उम्म्म…” प्रिया की दबी आवाज हाथ के नीचे से निकल रही थी। आँखों में आँसू और मजा दोनों थे। आरव ने कान में बिलकुल धीमे से कहा, “चूत कितनी गीली है… रोहित नीचे सोया है… फिर भी तू भीग रही है…”
प्रिया ने सिर हिलाया। जाँघें उसके कमर पर और कस गईं। आरव की गति थोड़ी तेज हुई। दीवार हल्की सी चरमराने लगी। दोनों ने एक साथ साँस रोकी। रुके। फिर फिर से शुरू किया—और भी धीमे, और भी गहरे।
इतने में गलियारे में कदम सुनाई दिए।
दोनों पत्थर की तरह कठोर हो गए। आरव अभी भी अंदर था। प्रिया की पीठ दीवार से सटी थी। कदम करीब आए… फिर रुक गए। दरवाजे के ठीक बाहर।
श्रीमती मेहता खड़ी थीं। अकेलापन उन्हें बाहर निकाल लाया था। पानी की चाह में निकली थीं। अंधेरे में आरव के कमरे का दरवाजा आधा खुला दिखा। अंदर हल्की हलचल। वह पास गईं। दरार से देखा।
अंधेरे में भी साफ दिख रहा था—आरव प्रिया को दीवार से सटाए हुए जोर-जोर से लेकिन चुपचाप चोद रहा था। प्रिया का एक पैर उसके कमर पर था। स्तन दबे हुए। मुँह दबा हुआ। दोनों पसीने से तर।
श्रीमती मेहता की साँस अटक गई। वह भागने वाली थीं… पर शरीर ने साथ नहीं दिया। जाँघों के बीच अचानक गर्मी फैल गई। अकेलापन, दबी इच्छा और यह दृश्य—सब एक साथ। वह वहीं खड़ी रह गईं। दरार से देखती रहीं। एक हाथ अपने स्तन पर चला गया। दूसरे ने साड़ी के नीचे उंगलियाँ डाल दीं।
अंदर आरव ने प्रिया के मुँह से हाथ हटाया। प्रिया की दबी कराह निकली—“आह्ह… चुप… मार… अंदर…”
आरव ने और तेज किया। दीवार हल्की सी धूल उड़ा रही थी। प्रिया का शरीर ऐंठ गया। आरव ने भी उसी पल छोड़ दिया—गर्म रस प्रिया के अंदर धधकता हुआ भर गया। दोनों काँपते हुए एक-दूसरे से चिपके रहे। साँसें उखड़ी हुईं।
दरवाजे के बाहर श्रीमती मेहता भी उसी पल काँप उठीं। उंगलियाँ गीली हो चुकी थीं। उन्होंने मुँह दबा लिया। आँखें खुली की खुली रह गईं।
आरव ने प्रिया को धीरे से अलग किया। दोनों ने कपड़े संभाले। दरवाजा खोला तो गलियारा खाली था। श्रीमती मेहता तेजी से अपने कमरे की तरफ जा चुकी थीं। दिल जोर-जोर से धधक रहा था। शरीर में वह गर्मी पहली बार इतनी तेज जगी थी।
प्रिया आरव के कमरे से निकलकर अपने कमरे में चली गईं। आरव दरवाजा बंद करके बिस्तर पर गिर गया। उसे कुछ पता नहीं था कि दरार से कोई देख रहा था।
मेहमान कमरे में श्रीमती मेहता ने दरवाजा बंद किया। साड़ी उतार दी। नंगी बिस्तर पर लेट गईं। उंगलियाँ फिर से नीचे चली गईं। आँखें बंद करके वही दृश्य दोहराया—आरव, प्रिया, दीवार, चुपचाप धक्के, दबी कराहें। शरीर जल्दी ही दूसरी बार काँप उठा। मुँह में तकिया दबा लिया। आवाज नहीं निकलने दी।
सुबह होने में अभी देर थी।
घर में सब सोने की कोशिश कर रहे थे।
रोहित सोफे पर अधखुली आँखों से छत देख रहा था।
आरव और प्रिया अपने कमरों में थके और संतुष्ट पड़े थे।
और श्रीमती मेहता… अकेली, नंगी, अभी भी काँपती हुई… पहली बार इस घर के सच का हिस्सा बन चुकी थीं—बिना किसी के जाने।
यह रात किसी ने नहीं सोची थी।
न आरव ने।
न प्रिया ने।
न चाचा ने।
और न ही श्रीमती मेहता ने खुद।
अब सवाल यह था—
सुबह जब आँखें खुलेंगी तो श्रीमती मेहता क्या करेंगी?
छुपाएँगी… या फिर इस घर की नई भूख में खुद को और गहरा धकेल देंगी?
Fuckuguy
albertprince547;
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RE: चाचा की आग भरी ज़ुबान: घर की प्यासी औरतें - by Fuckuguy - 30-08-2026, 07:53 AM



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