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मकड़ी का जाला
#9
उन्होंने अपनी नैतिकता के गुरूर को एक बार दांव पर लगा दिया था, लेकिन वह दोबारा उस ज़हर को नहीं पीना चाहती थीं।
लेकिन मेरे अंदर का वह विकृत राक्षस इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। वह जो पहला तमाशा था, उसने मेरे अंदर की आग बुझाई नहीं थी, बल्कि उसे और भड़का दिया था।
"नहीं मम्मी!" मैंने तुरंत टोका। "डॉ. विक्रम ने कहा था कि अगर दर्द दोबारा उठे, तो तुरंत ले आना। इन्फेक्शन अगर आंतों में फैल गया, तो ऑपरेशन की नौबत आ सकती है!" मैंने उनकी रूढ़िवादी सोच पर डर का सबसे बड़ा हथौड़ा मारा।
'ऑपरेशन' शब्द सुनते ही मम्मी के चेहरे का रंग फीका पड़ गया।
"लेकिन... वह डॉक्टर... वह अजीब तरह से चेक करता है। मुझे अच्छा नहीं लगा। मैं कल बड़े अस्पताल चली जाऊंगी," उन्होंने दबी हुई, लगभग हारती हुई आवाज़ में अपना बचाव किया। उनके होंठ कांप रहे थे। यह पहली बार था जब मैंने अपनी तानाशाह मम्मी को मुझसे, अपने 19 साल के बेटे से, किसी चीज़ के लिए बचकर भागते या बहाना बनाते देखा था।
यह मेरा मनोवैज्ञानिक चरम था। मेरी मम्मी, जो घर का संविधान थी, आज अपनी रक्षा के लिए गिड़गिड़ाने के कगार पर थी।
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा—एक रक्षक का हाथ नहीं, बल्कि एक शिकारी का हाथ।
"मम्मी, वह डॉक्टर है। बीमारी पकड़ने के लिए पेट तो चेक करना ही पड़ेगा ना? तुम खामखां इतना सोच रही हो। मैं हूँ ना तुम्हारे साथ। उठो... चलो। रिस्क नहीं ले सकते," मैंने एक ऐसा कठोर आदेश दिया, जिसमें चिंता की मिठास घुली थी।
मम्मी ने एक पल के लिए मेरी आँखों में देखा। शायद वह मेरी आँखों में छिपी उस ज़हरीली साज़िश को पढ़ना चाहती थीं, लेकिन उन्हें वहाँ सिर्फ एक 'फिक्रमंद बेटे' का मुखौटा दिखा। दर्द के डर और मेरे दबाव के आगे वह टूट गईं।
उन्होंने गहरी साँस लेते हुए, हार मानकर सिर हिला दिया। वह उठीं और बिना कुछ बोले बाहर की तरफ चल दीं।
जब हम दोबारा उस धूल भरी सड़क से होते हुए डॉ. विक्रम के क्लिनिक की तरफ बढ़ रहे थे, तो मेरे पेट में उत्तेजना की वह जानी-पहचानी ऐंठन फिर से शुरू हो गई थी। मेरी हथेलियाँ फिर से पसीने से भीगने लगी थीं।
मम्मी आज पहले से भी ज़्यादा कसकर अपनी साड़ी में लिपटी थीं। उनका चलना पहले से भी धीमा था, जैसे वह फांसी के फंदे की तरफ जा रही हों।
और मैं?
मैं इस बार कोई सहमा हुआ, डरा हुआ लड़का नहीं था। मैं एक अनुभवी दर्शक था, जो अपना पसंदीदा खेल दोबारा देखने जा रहा था। मैं फिर से अपनी उस अजेय मम्मी को विक्रम की उन गिद्ध जैसी नज़रों और खुरदरे हाथों के हवाले करने जा रहा था, और इस बार... मुझे पता था कि मैं इसका एक-एक सेकंड, एक-एक एहसास पूरी तरह जियूँगा।
हम क्लिनिक के उस धुंधले कांच के दरवाज़े के पास पहुँचे, और अंदर से वही स्पिरिट और फिनायल की सीलन भरी ठंडक बाहर आई। मेरा खेल फिर से शुरू होने वाला था।
कांच के भारी दरवाज़े को धकेलते ही ऊपर लगी छोटी सी घंटी ने 'टिंग' की आवाज़ की। हम अंदर दाखिल हुए। क्लिनिक में वही जानी-पहचानी एसी की सीलन, डिटॉल और पुरानी स्पिरिट की गंध का कॉकटेल हवा में तैर रहा था।
मेज के पीछे बैठा डॉ. विक्रम आज कोई किताब पढ़ रहा था। घंटी की आवाज़ सुनकर उसने अपना सिर उठाया। जैसे ही उसकी नज़र मुझ पर और फिर मेरे सहारे खड़ी मेरी मम्मी पर पड़ी, उसके उबाऊ चेहरे पर एक पल के लिए चौंकने का भाव आया, जो तुरंत ही एक गहरी, शातिर और लगभग शिकारी जैसी मुस्कान में बदल गया। उसे शायद उम्मीद नहीं थी कि यह नायाब और सख्त शिकार खुद चलकर उसके जाले में दोबारा वापस आ जाएगा।
"अरे... आइए, आइए मैडम," विक्रम ने अपनी कुर्सी से उठते हुए कहा। इस बार उसकी आवाज़ में हमदर्दी कम और एक अजीब सी आतुरता ज़्यादा थी।
मम्मी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने अपनी आँखें नीची कर लीं। उनका दायां हाथ कसकर उनकी छाती पर बंधे पल्लू को पकड़े हुए था, जैसे वह उस कपड़े से अपनी पूरी गरिमा को बांध कर रखना चाहती हों। उनकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए थे।
"क्या हुआ? दर्द दोबारा लौट आया क्या?" विक्रम ने मेज के पास आते हुए पूछा। उसकी नज़रें सीधे मम्मी के चेहरे पर थीं, मानो वह उनकी घबराहट और खौफ का मज़ा ले रहा हो।
"हाँ डॉक्टर, थोड़ा दर्द फिर से उठ रहा है। हमने सोचा कोई रिस्क ना लें," मैंने एक आज्ञाकारी बेटे का पर्दा ओढ़ते हुए तुरंत जवाब दिया।
विक्रम ने मेरी तरफ सिर्फ एक सेकंड देखा और फिर अपनी नज़रें वापस मम्मी के कसकर बंधे हुए लिबास पर गाड़ दीं। "बहुत अच्छा किया। इन्फेक्शन को हल्के में नहीं लेना चाहिए। ले जाइए इन्हें अंदर... उसी चेकअप केबिन में।" उसने उसी गंदे, फीके पड़ चुके हरे परदे की तरफ इशारा किया।
जैसे ही हम उस हरे परदे के पीछे घुसे, उस छोटे से केबिन की सफेद, निर्दयी ट्यूबलाइट की रोशनी ने हमें घेर लिया। वही काली रेक्सीन वाला बेड, वही दमघोंटू हवा।
मम्मी कांप रही थीं। यह दर्द की वजह से कम और उस आने वाले अपमान के खौफ की वजह से ज़्यादा था। वह बेड के किनारे पर बैठीं, लेकिन इस बार उनका शरीर एकदम अकड़ा हुआ था। उन्होंने मुझे देखा। उनकी उन सख्त आँखों में, जिनसे कभी मेरे पिताजी भी कांपते थे, आज एक मूक विनती थी। वह जैसे मुझसे कह रही थीं कि 'मुझे यहाँ से ले चलो।'
लेकिन मैंने जानबूझकर अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया और केबिन के उसी पुराने अंधेरे कोने में जाकर खड़ा हो गया। मैंने अपना फैसला सुना दिया था—मैं उन्हें नहीं बचाऊंगा।
हरे परदे के सरकने की 'सर्रर्र' आवाज़ हुई और विक्रम अंदर दाखिल हुआ। उसके गले में स्टेथोस्कोप लटक रहा था और उसके चेहरे पर अब एक ऐसा आत्मविश्वास था, जो पिछली बार से कहीं ज़्यादा खतरनाक था। उसे समझ आ गया था कि यह सख्त दिखने वाली औरत उसकी उस छोटी सी मेडिकल दुनिया में पूरी तरह बेबस है।
"लेट जाइए," विक्रम ने एक सर्द, हुक्म देने वाली आवाज़ में कहा।
मम्मी ने एक गहरी, कांपती हुई साँस ली और बेड पर लेट गईं।
विक्रम बेड के करीब आया। वह बिल्कुल मम्मी के ऊपर खड़ा था। इस बार उसने कोई भूमिका नहीं बांधी, कोई नज़ाकत नहीं दिखाई।
"साड़ी का पल्लू और कपड़े हटाइए। पूरा पेट चेक करना होगा कि सूजन कहाँ तक फैली है," उसने आदेश दिया।
मम्मी के पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने अपनी पलकें झपकाईं और अपनी कांपती आवाज़ में विरोध करने की एक आखिरी, कमज़ोर कोशिश की— "द...दर्द सिर्फ ऊपर की तरफ है। नीचे... नीचे ठीक है।"
उनका यह बोलना, वह भी एक मामूली डॉक्टर के सामने गिड़गिड़ाने के लहज़े में, मेरे लिए किसी अफीम के नशे जैसा था। मेरे दिल की धड़कनें बेतहाशा तेज़ हो गईं। मेरी हथेलियाँ पसीने से भीगने लगीं।
विक्रम की आँखों में एक क्रूर चमक आ गई। "मैडम, आप डॉक्टर हैं या मैं? इन्फेक्शन नीचे आंतों तक फैल सकता है। पूरा पेट चेक किए बिना मैं कैसे दवा दे दूँगा? कपड़े ऊपर कीजिए।" उसका स्वर इतना तीखा और पेशेवर था कि उसमें बहस की कोई गुंजाइश नहीं बची थी।
मम्मी ने हार मान ली।
उस छोटे से केबिन के सन्नाटे में एक बार फिर से उस बड़ी स्टील की सेफ्टी पिन के खुलने की 'क्लिक' आवाज़ गूंजी। वह आवाज़ मेरे लिए दुनिया का सबसे बेहतरीन संगीत थी।
मम्मी के कांपते हुए, पसीने से भीगे हाथों ने भारी मन से कलफ लगे पल्लू को सीने से हटाया और अपनी सूती साड़ी को हल्का सा नीचे खिसका दिया। ट्यूबलाइट की चकाचौंध रोशनी में, उनका वह गोरा, बेदाग और भरा हुआ दूधिया पेट एक बार फिर से उस अजनबी की हवस भरी नज़रों के लिए बेपर्दा हो गया।
जैसे ही मम्मी का पेट नंगा हुआ, मैंने देखा कि विक्रम की साँसें अचानक भारी हो गईं। उसके नथुने फूल गए। उसकी नज़रें बीमारी को नहीं ढूँढ रही थीं; वे किसी गिद्ध की तरह मम्मी के उस गोरे जिस्म पर टूट पड़ी थीं।
उसने बिना कोई और बात किए, अपने दोनों बड़े, खुरदरे और ठंडे हाथ मम्मी के उस नरम, गर्म पेट पर रख दिए।
मम्मी के मुँह से दर्द और अपमान की एक घुटी हुई सिसकी निकल गई। उन्होंने अपनी आँखें इतनी ज़ोर से भींच लीं कि उनके माथे पर सिलवटें पड़ गईं। उन्होंने अपना सिर दूसरी तरफ मोड़ लिया। वह अपनी ही बेबसी का यह तमाशा नहीं देखना चाहती थीं।
विक्रम की उंगलियाँ इस बार पिछली बार से ज़्यादा बेखौफ थीं। वह अपने अँगूठे से नाभि के आस-पास दबाव डाल रहा था। उसकी हथेलियों की रगड़ मम्मी की त्वचा पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी। वह कभी पसलियों के नीचे दबाता, तो कभी अपनी उंगलियों को खिसका कर बिल्कुल पेटीकोट के नाड़े के पास ले आता। उसका हर स्पर्श धीमा, जानबूझकर किया गया और हवस में डूबा हुआ था।
कोने में खड़े होकर मेरी साँसें मेरे सीने में अटक रही थीं। मेरी आँखें फटी हुई थीं। मैं इस पूरे दृश्य का एक-एक कतरा अपने अंदर सोख रहा था।
मेरी मम्मी... घर की तानाशाह... जिस औरत ने मुझे कभी अपनी मर्ज़ी से सांस तक नहीं लेने दी... वह आज एक ऐसे आदमी के गंदे हाथों के नीचे कांप रही थी, जिसे वह देखना तक पसंद नहीं करती थी। विक्रम उनके जिस्म के उस हिस्से को सहला रहा था (चेकअप की आड़ में), जिसे किसी ने बरसों से नहीं देखा था।
विक्रम ने अपना सिर झुकाया। उसका चेहरा मम्मी के खुले हुए पेट और सीने के इतना करीब था कि मैं महसूस कर सकता था कि उसकी गर्म, भारी साँसें मम्मी की त्वचा से टकरा रही होंगी। उसने अपना स्टेथोस्कोप लगाया और उसे पेट के निचले हिस्से तक घुमाया। वह अपनी नज़रों से मम्मी के उस बेबस रूप को अपनी यादों में कैद कर रहा था, और मैं अपनी नज़रों से उसके इस अधिकार को सेलिब्रेट कर रहा था।
"दर्द यहाँ है?" विक्रम ने फुसफुसाते हुए पूछा, जबकि उसका अंगूठा मम्मी के पेट पर गहराई से धंसा हुआ था।
मम्मी बस "हम्म..." में एक कमज़ोर सी आवाज़ निकाल पाईं। उनका सारा अहंकार, उनकी वह 'छू-कर-तो-दिखाओ' वाली छवि, आज इस चेकअप बेड पर राख हो चुकी थी।
मुझे अचानक अपने अंदर एक डरावनी सच्चाई का एहसास हुआ। मैं इस बेबसी को देखकर दुखी नहीं था। मैं खुश था। मैं एक 'ककल्ड' मानसिकता के इतने गहरे कुएं में गिर चुका था कि मुझे अपनी ही मम्मी के इस चरम अपमान, उनके इस पतन में एक अजीब, वर्जित और गंदी यौन उत्तेजना महसूस हो रही थी। मेरी खामोश बगावत जीत चुकी थी, और इस जीत का नशा मेरे रग-रग में किसी मीठे ज़हर की तरह दौड़ रहा था।
केबिन के अंदर हवा जैसे किसी भारी पत्थर की तरह जम गई थी। छत के पंखे की 'चर्र-चर्र' आवाज़ अब मुझे दूर से आती हुई किसी धुन की तरह लग रही थी। मेरी पूरी चेतना सिर्फ उस बेड पर केंद्रित थी, जहाँ एक भयानक और वर्जित खेल चल रहा था।
डॉ. विक्रम के दोनों हाथ अभी भी मम्मी के गोरे, पसीने से भीगे हुए पेट पर टिके हुए थे। उसकी खुरदरी उँगलियों का धीमा, लगभग सहलाता हुआ दबाव मम्मी की नाभि के आस-पास घूम रहा था। मम्मी का चेहरा दीवार की तरफ मुड़ा हुआ था, आँखें कसकर बंद थीं और होठों को इतने ज़ोर से भींच रखा था कि वे सफेद पड़ गए थे। उनकी उथली, कांपती हुई साँसों से उनका नंगा पेट ऊपर-नीचे हो रहा था, जो विक्रम की आँखों में हवस की आग को और भड़का रहा था।
तभी, विक्रम ने कुछ ऐसा किया जिसने मेरे दिमाग के सारे तार झकझोर कर रख दिए।
उसने "पेट की आवाजें" सुनने का बहाना बनाते हुए अपना सिर नीचे किया। वह स्टेथोस्कोप के बिना, सीधे अपने कान को मम्मी के पेट के करीब ले गया। उसका चेहरा मम्मी के उस खुले हुए, दूधिया पेट से महज़ कुछ इंच की दूरी पर था।
उस छोटे से, शांत केबिन में मैंने साफ सुना... 'शशश... हह्ह...'।
विक्रम ने जानबूझकर एक गहरी साँस छोड़ी। उसकी वह भारी, गर्म और हवस से भरी साँस सीधा मम्मी के उस नरम, पसीने से चमकते हुए नंगे पेट की त्वचा से जाकर टकराई।
उस साँस की गर्मी का अहसास होते ही मम्मी के पूरे शरीर में बिजली के झटके जैसी एक भयानक सिहरन दौड़ गई। उनका पेट अचानक अंदर की तरफ सिकुड़ गया। उनका मुड़ा हुआ चेहरा और ज़्यादा तकिए में धंस गया, और उनके गले से एक बेहद घबराई हुई, दबी हुई सी घुटन भरी आवाज़ निकली— "डॉक्टर..."
यह शब्द किसी अधिकार या गुस्से से नहीं निकला था; यह एक बेबस, निहत्थी औरत की कांपती हुई सिसकी थी। उनकी वह 'छू-कर-तो-दिखाओ' वाली, लोहे सी सख्त छवि आज एक झोलेछाप डॉक्टर की गर्म साँसों के आगे मोम की तरह पिघल कर बह रही थी।
विक्रम ने उनकी उस कमज़ोर आवाज़ को पूरी तरह अनसुना कर दिया। उसने अपना चेहरा वहीं टिकाए रखा। उसकी नाक लगभग मम्मी की त्वचा को छू रही थी। वह अपनी गिद्ध जैसी आँखों को आधा बंद किए हुए था, जैसे वह मम्मी के उस पवित्र, रूढ़िवादी जिस्म से आती हुई पसीने, कड़क साबुन और चन्दन की उस मिली-जुली महक को अपनी रगों में उतार रहा हो। वह सिर्फ बीमारी नहीं टटोल रहा था; वह अपने अधिकार, अपनी हवस की मुहर मेरी मम्मी के जिस्म पर लगा रहा था।
मैं अंधेरे कोने में खड़ा था। मेरी मुट्ठियाँ इतनी ज़ोर से भिंची हुई थीं कि मेरे नाखूनों ने मेरी हथेलियों में गहरे लाल निशान छोड़ दिए थे।
एक सामान्य, संस्कारी बेटे को इस दृश्य को देखकर पागल हो जाना चाहिए था। उसे विक्रम के उस तेल लगे बालों वाले कॉलर को पकड़कर उसे दीवार में दे मारना चाहिए था। "तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी मम्मी के पेट पर अपनी गंदी साँसें छोड़ने की!"—यह चिल्लाहट मेरे गले से निकलनी चाहिए थी।
लेकिन मेरे होंठ आपस में सिले हुए थे।
मेरे पैरों में जैसे भारी सीसा भर गया था। मैं हिलना भी नहीं चाहता था। मेरी साँसें तेज़ और भारी हो गई थीं। मेरी आँखों की पुतलियाँ फैली हुई थीं। एक भयानक, डार्क और चिपचिपी सी उत्तेजना मेरे पेट के निचले हिस्से में कुंडली मार रही थी।
मेरी तानाशाह मम्मी, जो हर सुबह कलफ लगी साड़ी पहनकर मुझे और मेरे पिता को अपनी एक घूरती हुई नज़र से डरा देती थी, जिसके सामने घर का कोई इंसान ऊँची आवाज़ में बात नहीं कर सकता था, आज वह इस घुटन भरे केबिन में विक्रम की गर्म साँसों के नीचे थरथरा रही थी। वह अपने पल्लू को खोलने पर मजबूर थी। वह एक अनजान, हवसी मर्द की नज़रों और साँसों से लुट रही थी, और उसे बचाने वाला कोई नहीं था।
और सबसे भयानक बात? मैंने खुद इस स्थिति को जन्म दिया था।
यह कोई इत्तेफाक नहीं था; यह मेरे अंदर पल रही उस 'ककल्ड' फैंटेसी का मास्टरपीस था। मैं एक रक्षक की जगह से हटकर पूरी तरह से एक विकृत दर्शक बन चुका था। मुझे इस बात में एक गंदी, डरावनी और अजीब सी चरम संतुष्टि मिल रही थी कि मेरी मम्मी, अपनी सारी नैतिकता और सती-सावित्री वाली ढाल के बावजूद, विक्रम के सामने बस एक 'शिकार', एक आम औरत बनकर रह गई थीं।
कुछ बहुत लंबे, अनगिनत पलों के बाद, विक्रम ने धीरे से अपना सिर ऊपर उठाया। उसने अपनी आँखों में छिपी उस ललचाई चमक को वापस पेशेवर मुखौटे के पीछे धकेला।
"आंतों में ऐंठन काफी गहरी है," विक्रम ने एक सर्द, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा, जबकि उसका हाथ अभी भी मम्मी के पेट पर टिका था। "मुझे एक इंजेक्शन सीधा पेट की नसों के पास देना होगा, ताकि तुरंत आराम मिले।"
'पेट पर इंजेक्शन'—यह सुनते ही मम्मी ने झटके से अपनी आँखें खोलीं। उनकी आँखों में अब सिर्फ दर्द नहीं था, बल्कि एक गहरा, शुद्ध आतंक था।
लेकिन मैं जानता था... और विक्रम भी जानता था... कि अब वह विरोध नहीं कर पाएंगी। उनका गुरूर टूट चुका था, और मेरा डार्क खेल अब अपने सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया था।
'पेट पर इंजेक्शन' सुनते ही मम्मी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
"न...नहीं..." उनकी आवाज़ में अब कड़कपन का एक कतरा भी बाकी नहीं था। वह गिड़गिड़ा रही थीं। "हाथ पर लगा दीजिए... पिछली बार की तरह... हाथ पर।"
उनका कांपता हुआ दायां हाथ, जो अभी तक बेबसी से बेड की रेक्सीन खुरच रहा था, झटके से उठा और उन्होंने अपनी साड़ी को अपने नंगे, पसीने से भीगे हुए पेट पर खींचने की कोशिश की। वह उस असहज और गंदे माहौल से किसी भी कीमत पर खुद को ढँक लेना चाहती थीं।
लेकिन विक्रम का हाथ बिजली की तरह तेज़ी से आगे बढ़ा। उसने मम्मी की कांपती हुई कलाई को बीच में ही कसकर पकड़ लिया।
वह पकड़ महज़ एक डॉक्टर की नहीं थी; वह एक अधिकार जमाने वाले, ताकतवर मर्द की पकड़ थी, जिसने यह दिखा दिया कि इस छोटे से केबिन के अंदर सत्ता किसके पास है।
"मैडम..." विक्रम ने उनकी कलाई को अपनी खुरदरी उँगलियों से कसते हुए एक धीमी, फुफकारती हुई आवाज़ में कहा। उसकी आँखों में अब वह शिकारी वाली चमक बिल्कुल साफ थी। "सूजन आंतों के निचले हिस्से में है। बांह पर दिया गया इंजेक्शन असर करने में घंटों लगा देगा। मैं जो कह रहा हूँ, वह आपके भले के लिए है। कपड़े मत खींचिए।"
विक्रम ने बहुत आराम से, लेकिन एक क्रूर ताकत के साथ, मम्मी का हाथ वापस बेड पर टिका दिया। मम्मी की आँखें एक बार फिर मेरी तरफ उठीं। उनकी उन खूबसूरत आँखों में आंसू तैरने लगे थे। वह मुझसे कह रही थीं, "नवीन... मुझे बचा लो।"
पर मैंने क्या किया?
मैंने अंधेरे कोने में खड़े होकर, सिर्फ धीरे से अपना सिर हिला दिया। मेरी आँखों में एक 'मजबूर' बेटे का भाव था, जो कह रहा था—"मम्मी, डॉक्टर सही कह रहे हैं, इलाज तो करवाना पड़ेगा।"
मेरी इस खामोश सहमति ने मम्मी की आखिरी उम्मीद को भी कुचल दिया। वह अंदर से टूटकर बिखर गईं। उन्होंने हार मानकर अपना चेहरा फिर से दीवार की तरफ मोड़ लिया और अपनी दोनों मुट्ठियों को भींच लिया। उनकी आँखें कसकर बंद हो गईं और उनके गाल पर एक अकेली, बेबस आंसू की बूंद छलक आई।
वह मेरी तानाशाह मम्मी, जो मेरी आज़ादी छीनकर खुद को भगवान समझती थी, आज मेरे ही सामने घुटने टेक चुकी थी।
विक्रम अपनी मेज की तरफ गया। उसने सीरिंज निकाली और उसमें एक सफेद रंग की दवा भरी। केबिन में सिर्फ उसकी साँसों और उस सुई के भरने की 'सुप-सुप' आवाज़ आ रही थी।
वह वापस मम्मी के पास आया। उसके हाथ में एक स्पिरिट लगा हुआ रुई का फाहा था।
"कपड़े थोड़े और नीचे खिसकाइए। इंजेक्शन नाभि के थोड़ा नीचे, साइड में लगेगा," विक्रम ने हुक्म दिया।
मम्मी का पूरा शरीर किसी सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। उन्होंने विरोध नहीं किया। उन्होंने अपने होठों को चबाते हुए अपनी उँगलियों से पेटीकोट के नाड़े को पकड़ा और उसे हल्का सा और नीचे सरका दिया।
अब उनका वह गोरा, बेदाग पेट नाभि से काफी नीचे तक उस तेज़ ट्यूबलाइट की रोशनी में नंगा हो चुका था। वह हिस्सा, जो सिर्फ उनका निजी था, आज इस सीलन भरे, बदबूदार केबिन में विक्रम की हवस भरी नज़रों के सामने परोसा गया था।
विक्रम की आँखें उस नज़ारे को देखकर और भी फैल गईं। उसने अपनी जीभ से अपने सूखे होठों को तर किया।
उसने स्पिरिट लगी रुई मम्मी के पेट पर रगड़ी। वह ठंडा और गीला स्पर्श... विक्रम ने जानबूझकर अपनी उँगलियों को उस रुई के साथ मम्मी की त्वचा पर रगड़ा। वह सिर्फ इंजेक्शन की जगह साफ नहीं कर रहा था; वह उनके जिस्म के उस नाज़ुक, अछूते हिस्से को सहला रहा था। उसकी खुरदरी पोरें मम्मी के पेट पर मंडरा रही थीं।
मम्मी के मुँह से सिसकी निकल गई। उनका पेट हवा में ऊपर-नीचे होने लगा।
तभी, विक्रम ने अपना बायां हाथ मम्मी के पेट पर रखा, अपनी उँगलियों से उनके गोरे मांस को थोड़ा सा चुटकी में उठाया, और दाएँ हाथ से...
चुभ...
सुई सीधे मम्मी के पेट के मांस में उतर गई।
"आह्ह्ह्..." मम्मी के गले से दर्द की एक लंबी, टूटी हुई चीख निकल गई।
मैं वहीं खड़ा था। मेरे रोंगटे खड़े थे। मेरे कानों में उनकी वह चीख गूँज रही थी। मेरे शरीर के हर रोम में एक डार्क, वर्जित उत्तेजना दौड़ रही थी। मेरी सांसें भारी हो गई थीं। मेरी हथेलियाँ पसीने से तर-बतर थीं।
डॉक्टर विक्रम ने धीरे-धीरे दवा अंदर धकेली। वह सुई निकाल सकता था, लेकिन उसने उसे ज़रूरत से ज़्यादा देर तक वहाँ रोके रखा, सिर्फ यह देखने के लिए कि मेरी सख्त, रूढ़िवादी मम्मी दर्द और बेबसी के मारे उसके सामने कैसे तड़पती है।
सुई निकालने के बाद, उसने उसी रुई को वहाँ कसकर दबा दिया। इस बार उसकी उँगलियों ने मम्मी के पेट पर जो दबाव डाला, वह साफ-साफ किसी गैर-मर्द का हक जताने वाला स्पर्श था।
"बस... हो गया। अब दर्द गायब हो जाएगा," विक्रम ने फुसफुसाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी संतुष्टि थी, जैसे उसने कोई बहुत बड़ा शिकार मार गिराया हो।
इंजेक्शन लगने के तुरंत बाद, मम्मी ने लगभग झपटकर अपनी साड़ी का पल्लू खींचा और अपने पेट को ढक लिया। उन्होंने उसे इतने ज़ोर से अपनी गर्दन और सीने पर लपेटा, जैसे वह खुद को दुनिया की नज़रों से हमेशा के लिए छुपा लेना चाहती हों।
वह बेड से उतरीं। उनका चेहरा पूरी तरह सफेद था। उनकी आँखों में कोई रौब, कोई कड़कपन या तानाशाही नहीं थी। वहाँ सिर्फ शर्मिंदगी, हार और एक गहरी मनोवैज्ञानिक चोट थी।
विक्रम ने अपने हाथ धोए और एक बनावटी, पेशेवर अंदाज़ में मुझसे कहा, "दवाइयाँ वही कंटिन्यू कीजिएगा। मैंने एक एंटीबायोटिक बढ़ा दी है।"
मैंने पर्चा लिया। विक्रम और मेरी नज़रें एक सेकंड के लिए मिलीं। हम दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई, लेकिन उस पल में... उसकी आँखों की वह शातिर चमक और मेरे चेहरे का वह खामोश, विकृत भाव—हम दोनों जानते थे कि उस केबिन के हरे परदे के पीछे आज क्या हुआ है। हमने मिलकर एक गुरूर को तोड़ा था।
जब हम उस क्लिनिक से बाहर निकले, तो मम्मी का हाथ मेरे कंधे पर पहले से ज़्यादा भारी लग रहा था। वह बिल्कुल चुप थीं। वह पूरी तरह से टूट चुकी थीं।
और मैं? मैं अपने ही मन की उस गंदी, डार्क और वर्जित भूलभुलैया में पूरी तरह खो चुका था। मैं एक 'ककल्ड' बेटे के रूप में अपनी इस खामोश, मनोवैज्ञानिक जीत का जश्न मना रहा था। मैंने अपनी मम्मी के उस अभेद्य, 'सती-सावित्री' वाले तिलिस्म को खुद अपनी आँखों के सामने चकनाचूर होते देखा था।
मुझे अब उनके अनुशासन से डर नहीं लगता था, क्योंकि मैं जान गया था कि इस लोहे की दीवार के पीछे... एक ऐसी बेबस औरत छिपी है, जिसे कोई विक्रम अपनी हवस और मेडिकल अधिकार की आड़ में नंगा कर सकता है। और सबसे खौफनाक सच यह था कि मुझे यह सच्चाई... पसंद आ गई थी।
क्लिनिक के बाहर निकलते ही मम्मी का हाथ मेरे कंधे पर और भी भारी लग रहा था। वह चुप थीं। उनके कदम अनिश्चित थे। मैंने दरवाज़ा खोला और उन्हें कार की ओर ले जाने लगा।
तभी पीछे से विक्रम की आवाज़ आई।
“एक मिनट।”
हम दोनों रुके। विक्रम बाहर आ गया था। उसके हाथ में एक छोटा सा पर्ची थी। उसने मेरी ओर देखा। उसकी नज़रें मेरी आँखों में ठहर गईं।
मैंने जानबूझकर अपनी पुतलियों को थोड़ा और नरम कर दिया। मेरी ठोड़ी थोड़ी झुक गई। मेरी साँसें भारी थीं। मैंने अपनी निगाहें एक पल के लिए नीचे गिराईं, फिर फिर से उठाईं—बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई आज्ञाकारी, कमज़ोर बेटा डॉक्टर के सामने खड़ा हो।
विक्रम ने मेरी उस भाव-भंगिमा को पकड़ लिया।
उसकी आँखों में एक धीमी, शातिर चमक फैल गई। उसने मेरी तरफ बहुत हल्का सा सिर हिलाया—जैसे कोई चुपचाप पुष्टि कर रहा हो। वह समझ गया था। वह जान गया था कि मैं सिर्फ एक बेटा नहीं हूँ। वह जान गया था कि मैंने अपनी मम्मी को उसके हाथों में सौंपने में एक गंदी, वर्जित खुशी महसूस की थी। वह जान गया था कि मैं एक कायर, विकृत दर्शक हूँ… एक ककल्ड बेटा।
उसने अपना ध्यान मम्मी की ओर मोड़ा।
“अनीता जी,” उसने धीमी लेकिन दबाव भरी आवाज़ में कहा, “आपकी हालत अभी भी नाज़ुक है। पेट की सूजन पूरी तरह नहीं उतरी है। अगर आपने वही पुरानी, तंग साड़ियाँ और पेटीकोट पहनना जारी रखा… तो हालात और बिगड़ जाएँगे।”
मम्मी ने सिर उठाया। उनकी आँखों में अभी भी डर और शर्म बाकी थी।
“मैं… मैं घर पर ढीले कपड़े पहन लूँगी,” उन्होंने धीमे से कहा।
विक्रम ने सिर हिलाया। उसकी आवाज़ और भी गंभीर हो गई।
“नहीं। सिर्फ घर पर नहीं। आपको अब से ऐसे कपड़े पहनने होंगे जो शरीर को साँस लेने दें। पेट और कमर पर कोई दबाव नहीं होना चाहिए। ढीली, हल्की साड़ी… या फिर घर पर सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज़। शरीर को ताज़ी हवा लगनी चाहिए। नहीं तो सूजन फिर से बढ़ जाएगी और इंजेक्शन भी काम नहीं करेगा।”
मम्मी का चेहरा सफेद पड़ गया।
“लेकिन… बाहर… और घर में भी…”
विक्रम ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी आवाज़ में अब एक हल्की धमकी थी, जो चिकित्सकीय चिंता की आड़ में छिपी थी।
“अगर आपने मेरे कहे अनुसार नहीं किया, तो दर्द फिर से बढ़ जाएगा। और अगली बार इंजेक्शन सिर्फ पेट पर नहीं… और नीचे लगाना पड़ सकता है। आप समझ रही हैं ना?”
मम्मी की साँसें अटक गईं। उन्होंने मेरे चेहरे की ओर देखा, जैसे कोई आखिरी उम्मीद तलाश रही हों। लेकिन मैंने फिर से वही खामोश, विनम्र नज़रें दिखाईं। मैंने सिर हिलाया।
“मम्मी… डॉक्टर सही कह रहे हैं। आपको आराम चाहिए।”
मेरी इस सहमति ने उन्हें फिर से तोड़ दिया।
विक्रम ने मेरी तरफ एक बार और देखा। उसकी आँखों में स्पष्ट संतुष्टि थी। वह जानता था कि मैं उसके खेल में शामिल हूँ। वह जानता था कि मैं अपनी मम्मी को उसके सामने और अधिक कमज़ोर, और अधिक उजागर देखना चाहता हूँ।
उसने मम्मी की तरफ मुड़कर आखिरी निर्देश दिया:
“आज रात से ही ढीले कपड़े पहनना शुरू कर दीजिए। शरीर को हवा लगनी चाहिए। और अगर दर्द बढ़ा… तो तुरंत आ जाना। मैं खुद देख लूँगा।”
मम्मी ने सिर्फ सिर हिलाया। उनकी आवाज़ निकलने लायक नहीं बची थी।
हम कार की ओर बढ़े। मम्मी चुपचाप सीट पर बैठ गईं। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू को और कसकर लपेटा, जैसे अब भी खुद को छिपाना चाहती हों। लेकिन उनकी आँखों में वह पुरानी तानाशाही अब नहीं थी। वहाँ सिर्फ हार और एक नई, गहरी बेबसी थी।
और मैं?
मैं गाड़ी स्टार्ट करते हुए रियरव्यू मिरर में अपनी आँखें देख रहा था।
वहाँ एक बेटा नहीं बैठा था।
वहाँ एक आदमी बैठा था जिसने आज अपनी मम्मी के गुरूर को डॉक्टर के हाथों टूटते हुए देखा था… और उसे पसंद आया था।
विक्रम ने मुझे पहचान लिया था।
और अब खेल सिर्फ क्लिनिक तक सीमित नहीं रहने वाला था। जो मकड़ी का जाला मैंने बुना था, मम्मी उसमें फंस के रह गई थीं।
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RE: मकड़ी का जाला - by ripsin183 - 28-08-2026, 10:26 PM



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