3 hours ago
बोतल घूमी। इस बार सोनिया हारी।
रामू ने नशे में भी साफ आवाज़ में कहा, “डेयर मेरी। जामिल का लंड चूस। सबके सामने। अच्छी तरह।”
रुही ने झटके से सिर उठाया। आँखों में घबराहट थी। “नहीं रामू जी… ये मत… कोई और डेयर दे दो… प्लीज… मैं नहीं देख सकती ये…”
रामू ने रुही की कमर दबाई। “तू देखने वाली है। सोनिया करने वाली है। डेयर नहीं बदलेगा।”
सोनिया ने रुही की तरफ देखा। उसके चेहरे पर शर्म कम, स्वीकार ज्यादा था। “बुलबुल, तू क्यों मना कर रही है? डेयर मेरी है।”
फिर वह जामिल के सामने घुटनों पर बैठ गई। जामिल पहले से ही बाहर था—मोटा, तना, भारी। सोनिया ने उसे जड़ से पकड़ा। एक पल उसके चेहरे को निहारा, फिर जीभ निकालकर नोक से चाटा।
“देख,” उसने रुही की तरफ आँखें उठाए बिना ही कहा, “मैं कैसे करती हूँ।”
फिर उसने मुँह खोलकर लंड को अंदर ले लिया। पहले थोड़ा, फिर और गहरा। गाल पिचक गए। लार बहने लगी। वह धीरे-धीरे चूसने लगी—कभी नोक को चूसती, कभी नीचे तक जाने की कोशिश करती। जामिल की साँस भारी हो गई। उसने सोनिया के बाल पकड़ लिए।
“हाँ… ऐसे ही… सोनिया…”
रुही ने मुँह रामू की छाती में छुपा लिया। “रामू जी… मैं नहीं देखना चाहती… प्लीज…”
रामू ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे किया। “आँखें खोल। देख। मैं कह रहा हूँ।”
रुही सिसकते हुए आँखें खोली। उसकी निगाह अनिच्छा से नीचे गई—सोनिया जामिल का मोटा लंड मुँह में लिए हुए थी। लार उसकी ठुड्डी तक बह रही थी। कभी-कभी वह लंड को मुँह से निकालकर चाटती, फिर फिर से अंदर ले लेती। आवाज़ें गीली और गहरी थीं।
रुही की आवाज़ टूट गई, “बहुत… बहुत अश्लील लग रहा है… मैं नहीं देख सकती…”
रामू ने उसकी ठुड्डी थामी। “देखती रह। मेरी बहू आँखें बंद नहीं करेगी। सोनिया तेरी सहेली है। उसका मुँह भर रहा है। तू देख।”
सोनिया ने एक पल मुँह हटाया। लंड उसकी लार से चमक रहा था। वह साँस लेती हुई रुही की तरफ मुड़ी।
“देख रही है न? डर मत। यह सिर्फ मुँह है। तू भी तो रामू भाई का अंडरवियर के ऊपर से चूस चुकी है।”
फिर उसने दोबारा जामिल को मुँह में लिया—इस बार और गहरा। जामिल की कमर हिल गई। “ऊंह… सोनिया… और ले…”
सोनिया लेती गई। आँखें कभी बंद, कभी रुही पर। जैसे जानबूझकर दिखा रही हो कि समर्पण को बिना रोए भी किया जा सकता है।
रुही रो रही थी, लेकिन देख रही थी। रामू का हाथ उसके जबड़े पर था, ताकि वह मुँह न फेर सके। उसके मन में शर्म और एक दबी हुई घबराहट दोनों थीं।
“रामू जी… काफी हो गया न… अब छुपने दो…”
रामू ने सिर हिलाया। “थोड़ी देर और। जब तक मैं न कहूँ।”
सोनिया चूसती रही—गीली आवाज़ों के साथ, बाल बिखरे, घुटनों पर, पूरी तरह खुली हुई। जामिल का हाथ उसके सिर पर था। कमरा उन आवाज़ों से भर गया।
आखिरकार रामू बोले, “बस।”
सोनिया ने धीरे से मुँह हटाया। होंठ चमक रहे थे। उसने जामिल के लंड को एक आखिरी चाट दिया और उठकर उनकी गोद में चली गई।
रुही ने तुरंत चेहरा रामू की छाती में छुपा लिया। शरीर काँप रहा था।
रामू ने उसके बाल सहलाते हुए कहा, “देख लिया। अब समझ गई? तू रोती है, सोनिया करती है। फर्क यही है। लेकिन दोनों अपने मर्द की हैं।”
रुही ने सिसकते हुए सिर्फ इतना कहा, “हाँ… रामू जी… मैंने देख लिया… अब और मत दिखाना…”
कमरे में सोनिया की तेज़ साँसें और रुही की दबी सिसकियाँ दोनों एक साथ चल रही थीं।
बोतल फिर घूमी। कमरे में हँसी थम चुकी थी, लेकिन खेल खत्म नहीं हुआ था। बोतल धीरे-धीरे घूमकर रुही के सामने रुकी।
सोनिया ने तुरंत पूछा, “बुलबुल… ट्रूथ ऑर डेयर?”
रुही रामू की गोद में थी। सिर्फ पैंटी में। उसने जवाब देने की बजाय और अंदर दुबकने की कोशिश की। रामू ने धीरे से उसके बाल सहलाए, लेकिन कुछ नहीं कहा।
रुही ने काँपती आवाज़ में कहा, “डेयर मत दो… प्लीज…”
सोनिया मुस्कुराई। “डेयर ही है। अपनी ब्रा और पैंटी दोनों उतार दे। अभी। सबके सामने।”
रुही जैसे झटके से टूट गई। उसने अपना पूरा चेहरा रामू की छाती में घुसा दिया और फफककर रोने लगी।
“नहीं… नहीं… सोनिया प्लीज… ये मत… मैं नहीं उतार सकती… रामू जी… बचा लो…”
सोनिया हँस पड़ी। जामिल भी हँसने लगा।
“अरे देखो,” सोनिया बोली, “फिर वही नाटक। बुलबुल हर बार रोती है, फिर मान जाती है।”
जामिल ने कहा, “भाभी, अब क्या बचा है छुपाने को? नाइटी तो गई। अब ये दो कपड़े रह गए।”
रुही और जोर से रोने लगी। उसके कंधे काँप रहे थे। आँसू रामू की छाती पर गिर रहे थे।
“मैं नहीं कर सकती… बहुत शर्म आ रही है… पैंटी मत उतरवाओ… ब्रा भी नहीं… प्लीज कोई और डेयर दे दो…”
सोनिया ने ताली सी बजाई। “रामू भाई, अब तो बोलो। आपकी बहू फिर अड़ गई है।”
लेकिन इस बार रामू चुप रहे।
उनका हाथ रुही की पीठ पर था, लेकिन मुँह से एक शब्द नहीं निकला। न हुक्म, न मनाही, न हँसी। बस चुप। उनकी चुप्पी कमरे में हँसी से भी भारी पड़ गई।
रुही उस चुप्पी से और डर गई। वह और तेज़ रोने लगी।
“रामू जी… कुछ बोलो न… प्लीज… आप ही कह दो कि नहीं… आप चुप क्यों हो… मैं डर गई… मैं नहीं उतार सकती… माफ़ कर दो…”
सोनिया ने भौंहें चढ़ाईं। “ओहो, रामू भाई आज गंभीर हो गए। बुलबुल, तेरे मर्द कुछ बोल ही नहीं रहे। मतलब मान गए शायद।”
जामिल हँसा। “या सोच रहे हैं कितनी देर रोएगी।”
रुही ने रामू की छाती में मुँह दबाए हुए बार-बार कहा, “मैं नहीं उतारूँगी… दोनों नहीं… प्लीज रामू जी… आप ही कुछ बोलो… मैं आपकी बात मानूँगी… लेकिन ये डेयर मत होने दो…”
कुछ देर और चुप्पी रही। सिर्फ रुही की सिसकियाँ चलती रहीं। सोनिया की हँसी धीमी पड़ गई। जामिल भी अब देख रहा था कि रामू क्या करते हैं।
फिर रामू बोले। आवाज़ सख्त नहीं थी, लेकिन साफ थी।
“रो मत।”
रुही की सिसकी एकदम थम सी गई, फिर और टूटकर निकली। “रामू जी…”
रामू ने उसका चेहरा छाती से थोड़ा अलग किया। आँखों में नशा था, लेकिन इस बार उतावलापन नहीं था।
“सुन,” उन्होंने कहा। “अगर कच्छी नहीं उतरानी, तो मत उतार। रहने दे।”
रुही ने आँखें खोलीं। आँसू अभी बह रहे थे। जैसे विश्वास न हो।
“सच में…?” उसकी आवाज़ बहुत छोटी थी।
रामू ने सिर हिलाया। “पैंटी रहने दे। लेकिन ब्रा उतार। इतना कर। बस ब्रा।”
सोनिया ने आवाज़ उठाई, “अरे रामू भाई, डेयर तो दोनों की थी—”
रामू ने सोनिया की तरफ देखा। “डेयर मैंने नरम कर दी। पैंटी नहीं उतरेगी। ब्रा उतरेगी।”
रुही फिर से उनकी छाती में जा छुपी। रोना रुका नहीं, लेकिन अब उसमें थोड़ी राहत भी थी।
“रामू जी… पैंटी रहने दोगे न… प्लीज… सिर्फ ब्रा… मैं… मैं कोशिश करती हूँ…”
रामू ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरीं। “रो मत। ब्रा उतार। धीरे-धीरे उतार। मैं यहीं हूँ।”
सोनिया होठ निकाले बैठी रही। “हम्म। भेड़िया आज थोड़ा नरम पड़ गया।”
जामिल ने धीरे कहा, “नरम नहीं। अपनी चीज़ संभाल रहा है।”
रुही काँपते हाथों से अपनी पीठ पीछे ले गई। उंगलियाँ ब्रा के हुक पर थीं, लेकिन रुक गईं। वह फिर रो पड़ी।
“सब देख रहे हैं… मैं नहीं कर पा रही…”
रामू ने उसके कान के पास कहा, “कर पा रही है। पैंटी नहीं उतरेगी। मैंने कहा न। अब ब्रा उतार। मेरी बात मान।”
रुही ने आँखें बंद कीं। सिसकते हुए उसने हुक खोला। ब्रा ढीली हुई। उसने उसे बाँहों से नीचे सरकाया और जल्दी से छाती पर दोनों हाथ रख लिए। ब्रा सोफे के किनारे गिर गई।
अब वह सिर्फ पैंटी में थी, हाथों से स्तन छुपाती हुई, रोती हुई, रामू की गोद में।
सोनिया ने धीरे से कहा, “चलो, आधा तो हुआ।”
रुही ने मुँह रामू से सटाए रखा। “अब और मत… प्लीज… पैंटी रहने दो… आपने कहा था…”
रामू ने उसके हाथ नहीं हटाए। सिर्फ इतना कहा, “हाँ। पैंटी रहेगी। अब शांत हो जा। तूने मेरी बात मानी।”
रुही रोती रही, लेकिन इस बार रोने में एक थकी हुई स्वीकृति भी थी। पूरी नंगी नहीं हुई थी। एक कपड़ा बच गया था। और वही एक कपड़ा उसके लिए उस पल बहुत बड़ा लगा।
रामू का हाथ उसकी पीठ पर था—न तो पूरी सख्ती से, न पूरी ममता से। बस इतना सा कहता हुआ कि फैसला अभी भी उनका ही है।
रुही अभी भी रामू की गोद में रो रही थी। दोनों हाथों से अपने स्तन छुपाए हुए थी। ब्रा सोफे पर गिरी पड़ी थी। छोटी लाल पैंटी के सिवा कुछ नहीं बचा था। गालों पर आँसू चमक रहे थे, कंधे काँप रहे थे। वह साँस भी ठीक से नहीं ले पा रही थी।
सोनिया ने धीरे से कहा, “अब इतना क्या रोना बुलबुल। ब्रा ही तो उतरी है।”
जामिल हँसा। “भाभी, हाथ हटा भी दो। कब तक छुपाओगी।”
रुही ने जवाब नहीं दिया। उसने रामू की छाती में मुँह और दबा लिया। “मत देखो… प्लीज मत देखो…”
रामू का हाथ उसकी पीठ पर था। वे कुछ कहने ही वाले थे कि अचानक रुही उठ खड़ी हुई।
जैसे कोई चीज़ टूट गई हो उसके अंदर। उसने दोनों हाथों से स्तन और कसकर ढक लिए और बिना एक शब्द कहे बेडरूम की तरफ भागने लगी। उसके नंगे पैर फर्श पर थप-थप की आवाज़ कर रहे थे। पीठ खुली हुई थी। कमर की लकीर, पैंटी की पतली पट्टी, और चिकनी जाँघें भागते हुए साफ दिख रही थीं।
“रुही!” सोनिया चिल्लाई। “कहाँ भाग रही है?”
रुही ने मुड़कर भी नहीं देखा। आवाज़ रोते हुए पीछे छूटी, “मत आना… कोई मत आना… मुझे रहने दो…”
जामिल की निगाह उसके पीछे-पीछे चली गई।
वह भागती हुई गई—हाथों से स्तन दबाए, पैंटी में, बाल बिखरे, आँसू गिराती हुई। जामिल का मुँह थोड़ा खुला रह गया। उसने जीभ होठों पर फेरी। मन के अंदर बातें अपने-आप चलने लगीं।
कितनी चिकनी जाँघें हैं इसकी… भागते हुए और भी गोल लग रही हैं।
हाथों के बीच से भी सीना दब-दब के दिख रहा है। इतना नरम माल रामू भैया रोज़ देखते होंगे।
पैंटी में ये कैसे भाग रही है… शर्म से पागल हो गई है बेचारी।
अगर रुक जाती… हाथ हट जाते… तो पूरा नज़ारा हो जाता।
रामू कितने किस्मत वाले हैं। ऐसी कबूतरी को रोते हुए भी अपनी गोद में रखते हैं।
सोनिया ने जामिल की हालत देख ली। “क्या जीभ फेरे जा रहे हो? तेरी मैडम यहाँ बैठी है।”
जामिल ने मुस्कुराते हुए कहा, “देख रहा हूँ बस। भागती हुई और भी… अलग लग रही है। भैया का माल है, जानता हूँ।”
रामू उठ खड़े हुए। उनका चेहरा गंभीर था। “बैठ जामिल। पीछा नहीं करना।”
फिर उन्होंने बेडरूम की तरफ आवाज़ लगाई, “रुही। छुप मत। मैं आ रहा हूँ।”
अंदर से रुही की दबी सिसकी आई। “रामू जी… मत आइए… मुझे अकेला छोड़ दीजिए… मैं नहीं आ सकती अभी…”
सोनिया सोफे पर पीछे झुकी। “भाग गई बेचारी। अब ब्रा भी छूट गई, हिम्मत भी।”
जामिल ने फिर जीभ होठों पर फेरी। आँखें गलियारे की तरफ ही थीं, जहाँ रुही की चिकनी टाँगों का आखिरी दृश्य गायब हुआ था।
“सच कहूँ भैया,” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “ऐसे रोते-भागते हुए तो और भी… मन कर गया। आपकी है, बस देख लिया।”
रामू ने उसकी तरफ तेज़ नज़र से देखा। “देख लिया तो बस। अब और मत बोल। मैं जा रहा हूँ।”
वे बेडरूम की तरफ चल दिए। पीछे सोनिया और जामिल सोफे पर रह गए। जामिल की साँस अभी भी थोड़ी तेज़ थी। उसके मन में वही तस्वीर घूम रही थी—रुही के हाथों में दबे स्तन, भागती चिकनी जाँघें, पैंटी में कसी हुई कमर, और वह रोता हुआ चेहरा जो मुड़कर भी नहीं देखा।
बेडरूम के दरवाज़े तक पहुँचकर रामू ने धीरे से कहा, “रुही, दरवाज़ा खोल। तू भागी इसलिए नहीं कि तुझे छोड़ दूँ। तू भागी इसलिए कि तुझे संभालना है।”
अंदर से सिर्फ रोना सुनाई दिया। और जामिल बाहर बैठा वही दृश्य दोहरा रहा था—रुही का शरीर, रुही की टाँगें, रुही के हाथों के नीचे दबे स्तन—और मुँह पर जीभ फेरता रह गया।
रुही ने दरवाज़ा नहीं खोला।
रामू बाहर खड़े रहे। उन्होंने फिर दस्तक दी। “रुही, खोल। मैं हूँ।”
अंदर से सिर्फ सिसकी आई। “नहीं… नहीं आइए… प्लीज… मुझे अकेला छोड़ दीजिए…”
इतने में सोनिया गलियारे से आ गई। ब्रा-पैंटी में ही थी, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर हँसी नहीं थी। उसने रामू की बाँह हल्के से छुई।
“रामू भाई, आप जाइए। मैं देखती हूँ।”
रामू ने दरवाज़े की तरफ देखा। “यह मेरी है। मैं—”
“जानती हूँ,” सोनिया ने धीरे कहा। “इसीलिए जाइए। अभी आप गए तो और डरेगी। मैं सहेली हूँ। मुझे अंदर जाने दो।”
रामू कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने दरवाज़े की तरफ आवाज़ दी, “रुही, सोनिया आ रही है। मैं जा रहा हूँ।”
वे भारी कदमों से लौट गए।
सोनिया ने धीरे-धीरे दस्तक दी। एक… दो… तीन।
“रुही? मैं सोनिया हूँ। अकेली हूँ। जामिल नहीं है। रामू भाई भी चले गए। दरवाज़ा खोल।”
अंदर चुप्पी रही। फिर एक टूटी आवाज़ आई, “नहीं… सोनिया… तुम भी मत आओ… मैं ठीक हूँ… जाओ न…”
सोनिया ने माथा दरवाज़े से सटा लिया। “तू ठीक नहीं है। मैंने देखा है। खोल। बस मैं हूँ। कुछ नहीं करूँगी। गेम नहीं है अभी।”
“झूठ बोल रही हो… तुम सब हँस रहे थे…”
“हाँ,” सोनिया ने साफ कहा। “हँसी थी। अब नहीं हँस रही। खोल रुही। प्लीज।”
कुछ देर और सिसकी चलती रही। फिर कुंडी की हल्की आवाज़ हुई। दरवाज़ा दो अंगुल खुला। रुही अंदर अँधेरे में खड़ी थी—दोनों हाथों से स्तन दबाए, आँखें लाल, बाल चेहरे पर चिपके हुए।
सोनिया ने और कुछ कहा नहीं। अंदर घुसी और दरवाज़ा बंद कर दिया।
रुही जैसे ही उसे पास आई देखी, झटके से बिस्तर की तरफ भागी और उल्टा लेट गई। पेट के बल। चेहरा तकिए में धँस गया। दोनों हाथ सिर के दोनों तरफ। पीठ काँप रही थी। पैंटी के अलावा कुछ नहीं था, लेकिन वह शरीर छुपाने की बजाय रोने में डूबी हुई थी।
“मत देखो मुझे… जाओ सोनिया… प्लीज जाओ…”
सोनिया धीरे-धीरे पास गई। बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसने हाथ बढ़ाकर रुही के बिखरे बाल पीछे किए।
“इतनी जोर से मत रो। साँस ले।”
रुही ने तकिया और कस लिया। “तुमने भी हँसी थी… सबने देखा… मैं मर जाऊँ… मैं यहाँ क्यों आई…”
सोनिया चुप रही। फिर उसने रुही का चेहरा बहुत प्यार से दोनों हथेलियों में लिया और तकिए से थोड़ा सा घुमाया। रुही की आँखें भीगी थीं, नाक लाल थी, होंठ काँप रहे थे।
सोनिया ने उसके गाल सहलाते हुए धीरे कहा, “मेरी सहेली इतनी नाज़ुक है… मुझे तो पता ही नहीं था।”
रुही सिसक पड़ी। “पता नहीं था… इसलिए चिढ़ाती रही तुम… इसलिए नाइटी उतरवाई… इसलिए सबके सामने…”
“हाँ,” सोनिया ने इंकार नहीं किया। “चिढ़ाया। खेल भी बनाया। लेकिन अभी देख रही हूँ तो लग रहा है तू उतनी मजबूत नहीं जितनी मैं समझती थी।”
रुही की आवाज़ तकिए में दब गई। “मैं मजबूत नहीं हूँ… मैं डर गई… बहुत डर गई…”
सोनिया ने उसके माथे से पसीना और आँसू दोनों पोंछे। “डरना गलत नहीं है। तू भागकर आई, यह भी गलत नहीं। कभी-कभी शरीर से ज्यादा दिल थक जाता है।”
रुही ने आँखें बंद कर लीं। आँसू फिर बह निकले। “सनी को झूठ बोला… रामू जी के आगे सब किया… अब और नहीं हो रहा मुझसे…”
सोनिया उसके चेहरे को थामे रही। अंगूठे से उसकी पलक के नीचे का आँसू पोंछती रही।
“अभी कुछ मत सोच। न सनी, न गेम, न जामिल। बस साँस ले। मैं यहीं हूँ।”
“तुम क्यों आई?” रुही ने सिसकते हुए पूछा। “हँसने?”
“नहीं,” सोनिया ने धीरे कहा। “देखने। कि मेरी सहेली टूट तो नहीं गई।”
रुही कुछ नहीं बोली। बस सुबकती रही। कंधे काँप रहे थे। सोनिया ने उसका सिर अपनी गोद के करीब खींच लिया, बाल सहलाए, गाल थामे रखा।
“रो ले,” उसने फुसफुसाया। “आज जितना मन करे रो ले। कोई डेयर नहीं है इस कमरे में।”
रुही ने आँखें नहीं खोलीं। सिर्फ सोनिया के हाथ में अपना रोता हुआ चेहरा दिए सुबकती रही—धीमी, थकी, और बहुत नाज़ुक सिसकियों के साथ।
सोनिया रुही के बाल सहलाती रही। रुही अभी भी उल्टी लेटी थी, चेहरा तकिए में, सिसकियाँ अब थोड़ी धीमी पड़ चुकी थीं लेकिन रुक नहीं रही थीं।
“सुन,” सोनिया ने धीरे कहा। “हम औरतों का शरीर बना ही मर्दों को रिझाने के लिए है। तू इसे इतना छुपा-छुपा के क्यों मार रही है?”
रुही ने तकिए में मुँह दबाए कहा, “इतना आसान नहीं होता सोनिया…”
“आसान नहीं होता, सही है,” सोनिया बोली। “लेकिन सच तो यही है। भगवान ने तुझे इतना सुंदर बनाया है तो दिखाने में क्या हरज़ है? गोरी त्वचा, चिकनी जाँघें, ऐसे बदन… यह छुपाने के लिए नहीं बनाया गया।”
रुही सुबकी। “वहाँ जामिल भी था… मुझे बहुत ह्यूमिलिएशन फील हुई… जैसे मैं कोई चीज़ बन गई…”
सोनिया ने उसका चेहरा थोड़ा सा घुमाया। आँखों में अभी भी आँसू थे।
“जामिल था तो क्या हुआ? वह छू भी नहीं रहा था। देख रहा था। और तू तो अपने मर्द की बाँहों में थी। उसी मर्द ने तुझे नंगी भी देखा है, तेरे अंदर तक अपना लंड भी डाला है, तेरी बच्चेदानी में अपना बीज भी डाला है… तो शर्म कैसी? जो पहले ही तेरा पूरा शरीर जीत चुका है, उसके सामने तू और कितना छुपेगी?”
रुही की पलकें काँपीं। मन में बातें उलझ गईं।
सही कह रही है क्या?
रामू जी ने सब देख लिया है… सब ले लिया है… फिर भी जामिल की निगाह अलग थी।
निगाह भी छूती है… बिना हाथ लगाए भी छूती है।
“वह मेरा मर्द नहीं है,” रुही ने सिसकते हुए कहा। “रामू जी हैं… जामिल नहीं। इसलिए शर्म आई।”
सोनिया मुस्कुराई, लेकिन इस बार हँसी तेज़ नहीं थी। “शर्म आएगी। औरतों के लिए शर्म और ह्यूमिलिएशन तो एक गहना है रुही। गले का हार समझ। इसे दिल पर मत ले। इसे पहन। देखना, इसमें तुझे कितना मज़ा आने लगेगा।”
रुही ने आँखें बंद कर लीं। “मज़ा? रोते हुए मज़ा?”
“शुरू में रोना ही आता है,” सोनिया ने उसके माथे पर हाथ फेरा। “फिर आदत लगती है। फिर पता चलता है कि मर्दों की प्यासी निगाहें भी एक तरह का स्पर्श होती हैं। कोई हाथ नहीं लगाता, फिर भी शरीर गर्म हो जाता है। कोई शब्द नहीं कहता, फिर भी अंदर कुछ पिघलता है। हम औरतों को अपनी बॉडी के मज़े लेने चाहिए। छुपा-छुपा के हम खुद को सज़ा देती हैं।”
रुही चुप हो गई। आँसू बह रहे थे, लेकिन अब वह जवाब नहीं दे रही थी। अंदर आवाज़ें चल रही थीं।
गहना… शर्म को गहना कह रही है।
मैंने शर्म को सज़ा समझा। सोनिया उसे गहना समझती है।
रामू जी की बाँहों में होना सुरक्षित लगता है। जामिल की निगाह में वस्तु लगना डराता है।
लेकिन सोनिया कह रही है—डरा मत, आनंद ले।
क्या आनंद सच में आता है? या सिर्फ यही सीखना पड़ता है कि टूटना ही मज़ा है?
सोनिया उसके कान के पास और धीमे बोली, “तू नाज़ुक है, यह मैं अब समझ गई। लेकिन नाज़ुक होने का मतलब यह नहीं कि तू अपने शरीर से डरे। तू अपने मर्द की है। उसके सामने तू पहले ही खुल चुकी है। बाकी निगाहें सिर्फ साया हैं। साया से भी डरोगी तो जीना मुश्किल हो जाएगा।”
रुही ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “मैं डर गई थी… भाग आया… मुझे लगा सब हँस रहे हैं मेरे नंगेपन पर।”
“हँसे भी,” सोनिया ने सच बोला। “लेकिन हँसी हमेशा दुश्मनी नहीं होती। कभी-कभी हँसी इस बात की होती है कि तू खुल रही है। मर्द ऐसी औरत को ही देखते हैं जो थोड़ी टूटती है। तू टूटी, इसलिए जामिल की जीभ होठों पर फिर गई। यह अपमान भी है, और तेरे शरीर की ताकत भी है। दोनों साथ चलते हैं।”
रुही के मन में फिर सवाल उठा।
ताकत? मेरी लाज मेरी ताकत है क्या?
या सोनिया मुझे वही सिखा रही है जो उसे खुद को सही साबित करने के लिए चाहिए?
वह आसान लगती है। मैं रोती हूँ। शायद वह चाहती है मैं भी वैसी हो जाऊँ… तो उसकी राह अकेली न रहे।
वह ये बात मुँह से नहीं बोली। बस चुप हो गई। सिसकी अब लगभग थम चुकी थी। सिर्फ कभी-कभी एक लंबी, काँपती साँस निकल जाती।
सोनिया ने उसके बाल पीछे किए। “अब और मत सोच। पानी से मुँह धो। बाल ठीक कर। थोड़ी देर अकेली रह। फिर बाहर आ जाना। कोई ज़बरदस्ती नहीं कर रहा अभी। बस इतना कर—छुपकर मत मर। बाहर आ। अपने मर्द के पास जा। बाकी बातें बाद में।”
रुही ने आँखें खोलीं। आवाज़ बहुत थकी हुई थी। “सोनिया… तुम जा रही हो?”
“हाँ। तू फ्रेश हो। मैं बाहर हूँ। रामू भाई को कह दूँगी—अभी कुछ मत पूछना। तू आने पर आ जाना।”
वह उठी। दरवाज़े तक जाकर रुक गई। मुड़कर बोली, “रुही, एक बात और। शर्म तेरे गले का गहना बने या तेरी बेड़ी—यह तू तय करेगी। मैंने अपना फैसला बहुत पहले कर लिया। तू अभी सोच। लेकिन सोचते-सोचते खुद को सज़ा मत देना।”
दरवाज़ा धीमे से बंद हुआ।
रुही बिस्तर पर वही उल्टी लेटी रही। कमरा शांत हो गया। सोनिया की बातें उसके कानों में घूम रही थीं—शरीर दिखाने के लिए है, शर्म गहना है, निगाहों का आनंद लो, अपने मर्द ने तो सब देख लिया।
वह उठ नहीं रही थी। न मना कर रही थी। न हाँ कह रही थी।
सिर्फ चुप थी।
और उसी चुप्पी में, आँसू सूखने के बाद भी, सोनिया की आवाज़ उसके मन में बैठे-बैठे काम कर रही थी।
रुही अकेले रह गई तो सबसे पहले एक खालीपन आया। रोना थम चुका था, लेकिन शांति नहीं आई थी। शांति की जगह एक धीमी, भारी उलझन बैठ गई थी—जैसे कमरे में कोई और नहीं, सिर्फ उसके दो हिस्से आमने-सामने खड़े हों।
एक हिस्सा अभी भी पुरानी रुही का था।
वही रुही जो सुबह घर से निकलती थी, जो सनी को “बेबी” कहकर फोन काटती थी, जो ऑफिस में सोनिया से शर्म के साथ सुहागरात की बातें दबाती थी। वह हिस्सा कह रहा था—
तू भागकर सही आई। जामिल की निगाह गलत थी। हँसी गलत थी। शरीर दिखाना मर्दों की भूख नहीं, तेरी इज़्ज़त का सवाल है। सोनिया तुझे हल्की करने नहीं, अपने जैसा बनाने आई है।
दूसरा हिस्सा नया था, और खतरनाक हद तक थका हुआ था।
वह कह रहा था—
इज़्ज़त किसकी बची है अब? नाइटी उतर चुकी। ब्रा उतर चुकी। रामू जी के मुँह से शराब पी चुकी। उनके मूत का स्वाद याद है। तू खुद कह चुकी—कमत परिवार की बहू, कामत परिवार की रंडी। अब किस पवित्रता की रक्षा कर रही है?
यहीं संघर्ष तीखा होता था। क्योंकि दोनों आवाज़ें झूठी नहीं लग रही थीं। पुरानी आवाज़ सही लगती थी। नई आवाज़ सच्ची लगती थी। सही और सच अलग-अलग कमरों में खड़े थे, और रुही दोनों के बीच फर्श पर बैठी थी।
सोनिया की बातें उसके शरीर पर नहीं, उसकी थकान पर काम कर रही थीं।
हम औरतों का शरीर मर्दों को रिझाने के लिए है।
यह वाक्य उसे गुस्सा भी दिलाता था, और एक अजीब सी राहत भी। गुस्सा इसलिए कि वह अपने को इससे बड़ा मानती थी। राहत इसलिए कि अगर शरीर सिर्फ दिखाने की चीज़ है, तो आज की शर्म कोई पाप नहीं, सिर्फ काम है। पाप भारी होता है। काम हल्का लगता है। थकी हुई औरत अक्सर भारी सच नहीं, हल्का झूठ पकड़ती है।
फिर जामिल वाली बात लौटती।
रामू जी की निगाह में कब्ज़ा था। जामिल की निगाह में भूख थी। दोनों निगाहें नंगी थीं, लेकिन दोनों का वजन अलग था। रामू जी की निगाह में वह “मेरी” थी। जामिल की निगाह में वह “माल” थी। रुही इसी फर्क को पकड़े हुए थी जैसे आखिरी किनारा हो।
अगर मैं यह फर्क छोड़ दूँ, तो फिर कोई फर्क बचेगा ही नहीं। फिर कोई भी देख ले, कोई भी हँस ले, कोई भी चाहे।
सोनिया कह रही थी—शर्म गहना है, ह्यूमिलिएशन का आनंद लो।
रुही के लिए शर्म गहना नहीं थी। शर्म आखिरी कपड़ा थी। पैंटी शरीर पर थी, शर्म मन पर थी। एक उतर जाए तो दूसरा भी खिंचने लगता था। इसीलिए वह भागी थी। शरीर से नहीं, उस आखिरी कपड़े को बचाने के लिए।
लेकिन भागने के बाद भी मन नहीं बचा था।
अब अकेलापन उसे और सवाल दे रहा था।
रामू जी चुप क्यों रहे थे जब सोनिया ब्रा-पैंटी दोनों उतरवाने को कह रही थी?
क्या वे मेरी रक्षा कर रहे थे, या देख रहे थे कि मैं कितनी टूटती हूँ?
उन्होंने पैंटी बचा दी। क्या यह प्रेम था? या अगली बार के लिए उधार?
यही सबसे गहरा संघर्ष था—रामू जी को मालिक मान चुकी थी, लेकिन मालिक के नरम पड़ने को भी पूरा भरोसा नहीं दे पा रही थी। भरोसा और डर अब एक ही आदमी से जुड़े थे। जो संभालता है, वही नंगा भी करता है। जो आँसू पोंछता है, वही थप्पड़ भी मारता है। ऐसे मर्द के साथ दिल दो भागों में बँट जाता है: एक हिस्सा झुकना चाहता है, दूसरा हिस्सा पूछता है कि झुकने के बाद तू बचेगी भी या नहीं।
सोनिया का चेहरा भी उसके मन में घूम रहा था। सहेली वाली गर्माहट, और खेल वाली क्रूरता। दोनों सच थे। इसलिए रुही उसे न तो पूरी बुरी कह पा रही थी, न पूरी अपनी। सोनिया ने उसे छुआ था—गाल पकड़कर, नाज़ुक कहकर—और उसी छुए हुए गाल पर वह बातें रख गई थी जो रुही को अपने शरीर से कम शर्मिंदा, अपनी शर्म से ज्यादा थका देना चाहती थीं।
रुही ने धीरे से अपने हाथ देखे। वही हाथ जो स्तन छुपाते भाग आए थे। अब वे खाली थे। छुपाने को कोई कमरा काफी नहीं था, क्योंकि देखने वाले बाहर थे, और सोचने वाला अंदर।
मन का आखिरी सवाल बहुत छोटा था, और सबसे भारी—
मैं बाहर जाऊँ तो किसके पास जाऊँ?
रामू जी के पास, क्योंकि मैं उनकी हूँ?
या अपने पास रहूँ, जबकि अपना अब बहुत कम बचा है?
वह उठकर पानी तक गई, लेकिन मुँह धोते हुए भी जवाब नहीं मिला। आईने में वही चेहरा था—लाल आँखें, गाल पर हल्के निशान, थकी हुई औरत।
आईना कुछ नहीं बोलता था। सोनिया बोल चुकी थी। रामू जी बाहर थे। सनी बहुत दूर था।
रुही की भीतरी लड़ाई इस पल जीत-हार की नहीं रह गई थी। वह अब चुनाव की लड़ाई थी—
शर्म को बेड़ी रखने की,
या उसे गहना मानकर पहन लेने की।
और सबसे डरावनी बात यह थी कि पहली बार, वह साफ-साफ नहीं जानती थी कि कौन-सा चुनाव उसे बचाएगा… और कौन-सा चुनाव उसे हमेशा के लिए उनकी बहू बना देगा।
रामू ने नशे में भी साफ आवाज़ में कहा, “डेयर मेरी। जामिल का लंड चूस। सबके सामने। अच्छी तरह।”
रुही ने झटके से सिर उठाया। आँखों में घबराहट थी। “नहीं रामू जी… ये मत… कोई और डेयर दे दो… प्लीज… मैं नहीं देख सकती ये…”
रामू ने रुही की कमर दबाई। “तू देखने वाली है। सोनिया करने वाली है। डेयर नहीं बदलेगा।”
सोनिया ने रुही की तरफ देखा। उसके चेहरे पर शर्म कम, स्वीकार ज्यादा था। “बुलबुल, तू क्यों मना कर रही है? डेयर मेरी है।”
फिर वह जामिल के सामने घुटनों पर बैठ गई। जामिल पहले से ही बाहर था—मोटा, तना, भारी। सोनिया ने उसे जड़ से पकड़ा। एक पल उसके चेहरे को निहारा, फिर जीभ निकालकर नोक से चाटा।
“देख,” उसने रुही की तरफ आँखें उठाए बिना ही कहा, “मैं कैसे करती हूँ।”
फिर उसने मुँह खोलकर लंड को अंदर ले लिया। पहले थोड़ा, फिर और गहरा। गाल पिचक गए। लार बहने लगी। वह धीरे-धीरे चूसने लगी—कभी नोक को चूसती, कभी नीचे तक जाने की कोशिश करती। जामिल की साँस भारी हो गई। उसने सोनिया के बाल पकड़ लिए।
“हाँ… ऐसे ही… सोनिया…”
रुही ने मुँह रामू की छाती में छुपा लिया। “रामू जी… मैं नहीं देखना चाहती… प्लीज…”
रामू ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे किया। “आँखें खोल। देख। मैं कह रहा हूँ।”
रुही सिसकते हुए आँखें खोली। उसकी निगाह अनिच्छा से नीचे गई—सोनिया जामिल का मोटा लंड मुँह में लिए हुए थी। लार उसकी ठुड्डी तक बह रही थी। कभी-कभी वह लंड को मुँह से निकालकर चाटती, फिर फिर से अंदर ले लेती। आवाज़ें गीली और गहरी थीं।
रुही की आवाज़ टूट गई, “बहुत… बहुत अश्लील लग रहा है… मैं नहीं देख सकती…”
रामू ने उसकी ठुड्डी थामी। “देखती रह। मेरी बहू आँखें बंद नहीं करेगी। सोनिया तेरी सहेली है। उसका मुँह भर रहा है। तू देख।”
सोनिया ने एक पल मुँह हटाया। लंड उसकी लार से चमक रहा था। वह साँस लेती हुई रुही की तरफ मुड़ी।
“देख रही है न? डर मत। यह सिर्फ मुँह है। तू भी तो रामू भाई का अंडरवियर के ऊपर से चूस चुकी है।”
फिर उसने दोबारा जामिल को मुँह में लिया—इस बार और गहरा। जामिल की कमर हिल गई। “ऊंह… सोनिया… और ले…”
सोनिया लेती गई। आँखें कभी बंद, कभी रुही पर। जैसे जानबूझकर दिखा रही हो कि समर्पण को बिना रोए भी किया जा सकता है।
रुही रो रही थी, लेकिन देख रही थी। रामू का हाथ उसके जबड़े पर था, ताकि वह मुँह न फेर सके। उसके मन में शर्म और एक दबी हुई घबराहट दोनों थीं।
“रामू जी… काफी हो गया न… अब छुपने दो…”
रामू ने सिर हिलाया। “थोड़ी देर और। जब तक मैं न कहूँ।”
सोनिया चूसती रही—गीली आवाज़ों के साथ, बाल बिखरे, घुटनों पर, पूरी तरह खुली हुई। जामिल का हाथ उसके सिर पर था। कमरा उन आवाज़ों से भर गया।
आखिरकार रामू बोले, “बस।”
सोनिया ने धीरे से मुँह हटाया। होंठ चमक रहे थे। उसने जामिल के लंड को एक आखिरी चाट दिया और उठकर उनकी गोद में चली गई।
रुही ने तुरंत चेहरा रामू की छाती में छुपा लिया। शरीर काँप रहा था।
रामू ने उसके बाल सहलाते हुए कहा, “देख लिया। अब समझ गई? तू रोती है, सोनिया करती है। फर्क यही है। लेकिन दोनों अपने मर्द की हैं।”
रुही ने सिसकते हुए सिर्फ इतना कहा, “हाँ… रामू जी… मैंने देख लिया… अब और मत दिखाना…”
कमरे में सोनिया की तेज़ साँसें और रुही की दबी सिसकियाँ दोनों एक साथ चल रही थीं।
बोतल फिर घूमी। कमरे में हँसी थम चुकी थी, लेकिन खेल खत्म नहीं हुआ था। बोतल धीरे-धीरे घूमकर रुही के सामने रुकी।
सोनिया ने तुरंत पूछा, “बुलबुल… ट्रूथ ऑर डेयर?”
रुही रामू की गोद में थी। सिर्फ पैंटी में। उसने जवाब देने की बजाय और अंदर दुबकने की कोशिश की। रामू ने धीरे से उसके बाल सहलाए, लेकिन कुछ नहीं कहा।
रुही ने काँपती आवाज़ में कहा, “डेयर मत दो… प्लीज…”
सोनिया मुस्कुराई। “डेयर ही है। अपनी ब्रा और पैंटी दोनों उतार दे। अभी। सबके सामने।”
रुही जैसे झटके से टूट गई। उसने अपना पूरा चेहरा रामू की छाती में घुसा दिया और फफककर रोने लगी।
“नहीं… नहीं… सोनिया प्लीज… ये मत… मैं नहीं उतार सकती… रामू जी… बचा लो…”
सोनिया हँस पड़ी। जामिल भी हँसने लगा।
“अरे देखो,” सोनिया बोली, “फिर वही नाटक। बुलबुल हर बार रोती है, फिर मान जाती है।”
जामिल ने कहा, “भाभी, अब क्या बचा है छुपाने को? नाइटी तो गई। अब ये दो कपड़े रह गए।”
रुही और जोर से रोने लगी। उसके कंधे काँप रहे थे। आँसू रामू की छाती पर गिर रहे थे।
“मैं नहीं कर सकती… बहुत शर्म आ रही है… पैंटी मत उतरवाओ… ब्रा भी नहीं… प्लीज कोई और डेयर दे दो…”
सोनिया ने ताली सी बजाई। “रामू भाई, अब तो बोलो। आपकी बहू फिर अड़ गई है।”
लेकिन इस बार रामू चुप रहे।
उनका हाथ रुही की पीठ पर था, लेकिन मुँह से एक शब्द नहीं निकला। न हुक्म, न मनाही, न हँसी। बस चुप। उनकी चुप्पी कमरे में हँसी से भी भारी पड़ गई।
रुही उस चुप्पी से और डर गई। वह और तेज़ रोने लगी।
“रामू जी… कुछ बोलो न… प्लीज… आप ही कह दो कि नहीं… आप चुप क्यों हो… मैं डर गई… मैं नहीं उतार सकती… माफ़ कर दो…”
सोनिया ने भौंहें चढ़ाईं। “ओहो, रामू भाई आज गंभीर हो गए। बुलबुल, तेरे मर्द कुछ बोल ही नहीं रहे। मतलब मान गए शायद।”
जामिल हँसा। “या सोच रहे हैं कितनी देर रोएगी।”
रुही ने रामू की छाती में मुँह दबाए हुए बार-बार कहा, “मैं नहीं उतारूँगी… दोनों नहीं… प्लीज रामू जी… आप ही कुछ बोलो… मैं आपकी बात मानूँगी… लेकिन ये डेयर मत होने दो…”
कुछ देर और चुप्पी रही। सिर्फ रुही की सिसकियाँ चलती रहीं। सोनिया की हँसी धीमी पड़ गई। जामिल भी अब देख रहा था कि रामू क्या करते हैं।
फिर रामू बोले। आवाज़ सख्त नहीं थी, लेकिन साफ थी।
“रो मत।”
रुही की सिसकी एकदम थम सी गई, फिर और टूटकर निकली। “रामू जी…”
रामू ने उसका चेहरा छाती से थोड़ा अलग किया। आँखों में नशा था, लेकिन इस बार उतावलापन नहीं था।
“सुन,” उन्होंने कहा। “अगर कच्छी नहीं उतरानी, तो मत उतार। रहने दे।”
रुही ने आँखें खोलीं। आँसू अभी बह रहे थे। जैसे विश्वास न हो।
“सच में…?” उसकी आवाज़ बहुत छोटी थी।
रामू ने सिर हिलाया। “पैंटी रहने दे। लेकिन ब्रा उतार। इतना कर। बस ब्रा।”
सोनिया ने आवाज़ उठाई, “अरे रामू भाई, डेयर तो दोनों की थी—”
रामू ने सोनिया की तरफ देखा। “डेयर मैंने नरम कर दी। पैंटी नहीं उतरेगी। ब्रा उतरेगी।”
रुही फिर से उनकी छाती में जा छुपी। रोना रुका नहीं, लेकिन अब उसमें थोड़ी राहत भी थी।
“रामू जी… पैंटी रहने दोगे न… प्लीज… सिर्फ ब्रा… मैं… मैं कोशिश करती हूँ…”
रामू ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरीं। “रो मत। ब्रा उतार। धीरे-धीरे उतार। मैं यहीं हूँ।”
सोनिया होठ निकाले बैठी रही। “हम्म। भेड़िया आज थोड़ा नरम पड़ गया।”
जामिल ने धीरे कहा, “नरम नहीं। अपनी चीज़ संभाल रहा है।”
रुही काँपते हाथों से अपनी पीठ पीछे ले गई। उंगलियाँ ब्रा के हुक पर थीं, लेकिन रुक गईं। वह फिर रो पड़ी।
“सब देख रहे हैं… मैं नहीं कर पा रही…”
रामू ने उसके कान के पास कहा, “कर पा रही है। पैंटी नहीं उतरेगी। मैंने कहा न। अब ब्रा उतार। मेरी बात मान।”
रुही ने आँखें बंद कीं। सिसकते हुए उसने हुक खोला। ब्रा ढीली हुई। उसने उसे बाँहों से नीचे सरकाया और जल्दी से छाती पर दोनों हाथ रख लिए। ब्रा सोफे के किनारे गिर गई।
अब वह सिर्फ पैंटी में थी, हाथों से स्तन छुपाती हुई, रोती हुई, रामू की गोद में।
सोनिया ने धीरे से कहा, “चलो, आधा तो हुआ।”
रुही ने मुँह रामू से सटाए रखा। “अब और मत… प्लीज… पैंटी रहने दो… आपने कहा था…”
रामू ने उसके हाथ नहीं हटाए। सिर्फ इतना कहा, “हाँ। पैंटी रहेगी। अब शांत हो जा। तूने मेरी बात मानी।”
रुही रोती रही, लेकिन इस बार रोने में एक थकी हुई स्वीकृति भी थी। पूरी नंगी नहीं हुई थी। एक कपड़ा बच गया था। और वही एक कपड़ा उसके लिए उस पल बहुत बड़ा लगा।
रामू का हाथ उसकी पीठ पर था—न तो पूरी सख्ती से, न पूरी ममता से। बस इतना सा कहता हुआ कि फैसला अभी भी उनका ही है।
रुही अभी भी रामू की गोद में रो रही थी। दोनों हाथों से अपने स्तन छुपाए हुए थी। ब्रा सोफे पर गिरी पड़ी थी। छोटी लाल पैंटी के सिवा कुछ नहीं बचा था। गालों पर आँसू चमक रहे थे, कंधे काँप रहे थे। वह साँस भी ठीक से नहीं ले पा रही थी।
सोनिया ने धीरे से कहा, “अब इतना क्या रोना बुलबुल। ब्रा ही तो उतरी है।”
जामिल हँसा। “भाभी, हाथ हटा भी दो। कब तक छुपाओगी।”
रुही ने जवाब नहीं दिया। उसने रामू की छाती में मुँह और दबा लिया। “मत देखो… प्लीज मत देखो…”
रामू का हाथ उसकी पीठ पर था। वे कुछ कहने ही वाले थे कि अचानक रुही उठ खड़ी हुई।
जैसे कोई चीज़ टूट गई हो उसके अंदर। उसने दोनों हाथों से स्तन और कसकर ढक लिए और बिना एक शब्द कहे बेडरूम की तरफ भागने लगी। उसके नंगे पैर फर्श पर थप-थप की आवाज़ कर रहे थे। पीठ खुली हुई थी। कमर की लकीर, पैंटी की पतली पट्टी, और चिकनी जाँघें भागते हुए साफ दिख रही थीं।
“रुही!” सोनिया चिल्लाई। “कहाँ भाग रही है?”
रुही ने मुड़कर भी नहीं देखा। आवाज़ रोते हुए पीछे छूटी, “मत आना… कोई मत आना… मुझे रहने दो…”
जामिल की निगाह उसके पीछे-पीछे चली गई।
वह भागती हुई गई—हाथों से स्तन दबाए, पैंटी में, बाल बिखरे, आँसू गिराती हुई। जामिल का मुँह थोड़ा खुला रह गया। उसने जीभ होठों पर फेरी। मन के अंदर बातें अपने-आप चलने लगीं।
कितनी चिकनी जाँघें हैं इसकी… भागते हुए और भी गोल लग रही हैं।
हाथों के बीच से भी सीना दब-दब के दिख रहा है। इतना नरम माल रामू भैया रोज़ देखते होंगे।
पैंटी में ये कैसे भाग रही है… शर्म से पागल हो गई है बेचारी।
अगर रुक जाती… हाथ हट जाते… तो पूरा नज़ारा हो जाता।
रामू कितने किस्मत वाले हैं। ऐसी कबूतरी को रोते हुए भी अपनी गोद में रखते हैं।
सोनिया ने जामिल की हालत देख ली। “क्या जीभ फेरे जा रहे हो? तेरी मैडम यहाँ बैठी है।”
जामिल ने मुस्कुराते हुए कहा, “देख रहा हूँ बस। भागती हुई और भी… अलग लग रही है। भैया का माल है, जानता हूँ।”
रामू उठ खड़े हुए। उनका चेहरा गंभीर था। “बैठ जामिल। पीछा नहीं करना।”
फिर उन्होंने बेडरूम की तरफ आवाज़ लगाई, “रुही। छुप मत। मैं आ रहा हूँ।”
अंदर से रुही की दबी सिसकी आई। “रामू जी… मत आइए… मुझे अकेला छोड़ दीजिए… मैं नहीं आ सकती अभी…”
सोनिया सोफे पर पीछे झुकी। “भाग गई बेचारी। अब ब्रा भी छूट गई, हिम्मत भी।”
जामिल ने फिर जीभ होठों पर फेरी। आँखें गलियारे की तरफ ही थीं, जहाँ रुही की चिकनी टाँगों का आखिरी दृश्य गायब हुआ था।
“सच कहूँ भैया,” उसने धीमी आवाज़ में कहा, “ऐसे रोते-भागते हुए तो और भी… मन कर गया। आपकी है, बस देख लिया।”
रामू ने उसकी तरफ तेज़ नज़र से देखा। “देख लिया तो बस। अब और मत बोल। मैं जा रहा हूँ।”
वे बेडरूम की तरफ चल दिए। पीछे सोनिया और जामिल सोफे पर रह गए। जामिल की साँस अभी भी थोड़ी तेज़ थी। उसके मन में वही तस्वीर घूम रही थी—रुही के हाथों में दबे स्तन, भागती चिकनी जाँघें, पैंटी में कसी हुई कमर, और वह रोता हुआ चेहरा जो मुड़कर भी नहीं देखा।
बेडरूम के दरवाज़े तक पहुँचकर रामू ने धीरे से कहा, “रुही, दरवाज़ा खोल। तू भागी इसलिए नहीं कि तुझे छोड़ दूँ। तू भागी इसलिए कि तुझे संभालना है।”
अंदर से सिर्फ रोना सुनाई दिया। और जामिल बाहर बैठा वही दृश्य दोहरा रहा था—रुही का शरीर, रुही की टाँगें, रुही के हाथों के नीचे दबे स्तन—और मुँह पर जीभ फेरता रह गया।
रुही ने दरवाज़ा नहीं खोला।
रामू बाहर खड़े रहे। उन्होंने फिर दस्तक दी। “रुही, खोल। मैं हूँ।”
अंदर से सिर्फ सिसकी आई। “नहीं… नहीं आइए… प्लीज… मुझे अकेला छोड़ दीजिए…”
इतने में सोनिया गलियारे से आ गई। ब्रा-पैंटी में ही थी, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर हँसी नहीं थी। उसने रामू की बाँह हल्के से छुई।
“रामू भाई, आप जाइए। मैं देखती हूँ।”
रामू ने दरवाज़े की तरफ देखा। “यह मेरी है। मैं—”
“जानती हूँ,” सोनिया ने धीरे कहा। “इसीलिए जाइए। अभी आप गए तो और डरेगी। मैं सहेली हूँ। मुझे अंदर जाने दो।”
रामू कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने दरवाज़े की तरफ आवाज़ दी, “रुही, सोनिया आ रही है। मैं जा रहा हूँ।”
वे भारी कदमों से लौट गए।
सोनिया ने धीरे-धीरे दस्तक दी। एक… दो… तीन।
“रुही? मैं सोनिया हूँ। अकेली हूँ। जामिल नहीं है। रामू भाई भी चले गए। दरवाज़ा खोल।”
अंदर चुप्पी रही। फिर एक टूटी आवाज़ आई, “नहीं… सोनिया… तुम भी मत आओ… मैं ठीक हूँ… जाओ न…”
सोनिया ने माथा दरवाज़े से सटा लिया। “तू ठीक नहीं है। मैंने देखा है। खोल। बस मैं हूँ। कुछ नहीं करूँगी। गेम नहीं है अभी।”
“झूठ बोल रही हो… तुम सब हँस रहे थे…”
“हाँ,” सोनिया ने साफ कहा। “हँसी थी। अब नहीं हँस रही। खोल रुही। प्लीज।”
कुछ देर और सिसकी चलती रही। फिर कुंडी की हल्की आवाज़ हुई। दरवाज़ा दो अंगुल खुला। रुही अंदर अँधेरे में खड़ी थी—दोनों हाथों से स्तन दबाए, आँखें लाल, बाल चेहरे पर चिपके हुए।
सोनिया ने और कुछ कहा नहीं। अंदर घुसी और दरवाज़ा बंद कर दिया।
रुही जैसे ही उसे पास आई देखी, झटके से बिस्तर की तरफ भागी और उल्टा लेट गई। पेट के बल। चेहरा तकिए में धँस गया। दोनों हाथ सिर के दोनों तरफ। पीठ काँप रही थी। पैंटी के अलावा कुछ नहीं था, लेकिन वह शरीर छुपाने की बजाय रोने में डूबी हुई थी।
“मत देखो मुझे… जाओ सोनिया… प्लीज जाओ…”
सोनिया धीरे-धीरे पास गई। बिस्तर के किनारे बैठ गई। उसने हाथ बढ़ाकर रुही के बिखरे बाल पीछे किए।
“इतनी जोर से मत रो। साँस ले।”
रुही ने तकिया और कस लिया। “तुमने भी हँसी थी… सबने देखा… मैं मर जाऊँ… मैं यहाँ क्यों आई…”
सोनिया चुप रही। फिर उसने रुही का चेहरा बहुत प्यार से दोनों हथेलियों में लिया और तकिए से थोड़ा सा घुमाया। रुही की आँखें भीगी थीं, नाक लाल थी, होंठ काँप रहे थे।
सोनिया ने उसके गाल सहलाते हुए धीरे कहा, “मेरी सहेली इतनी नाज़ुक है… मुझे तो पता ही नहीं था।”
रुही सिसक पड़ी। “पता नहीं था… इसलिए चिढ़ाती रही तुम… इसलिए नाइटी उतरवाई… इसलिए सबके सामने…”
“हाँ,” सोनिया ने इंकार नहीं किया। “चिढ़ाया। खेल भी बनाया। लेकिन अभी देख रही हूँ तो लग रहा है तू उतनी मजबूत नहीं जितनी मैं समझती थी।”
रुही की आवाज़ तकिए में दब गई। “मैं मजबूत नहीं हूँ… मैं डर गई… बहुत डर गई…”
सोनिया ने उसके माथे से पसीना और आँसू दोनों पोंछे। “डरना गलत नहीं है। तू भागकर आई, यह भी गलत नहीं। कभी-कभी शरीर से ज्यादा दिल थक जाता है।”
रुही ने आँखें बंद कर लीं। आँसू फिर बह निकले। “सनी को झूठ बोला… रामू जी के आगे सब किया… अब और नहीं हो रहा मुझसे…”
सोनिया उसके चेहरे को थामे रही। अंगूठे से उसकी पलक के नीचे का आँसू पोंछती रही।
“अभी कुछ मत सोच। न सनी, न गेम, न जामिल। बस साँस ले। मैं यहीं हूँ।”
“तुम क्यों आई?” रुही ने सिसकते हुए पूछा। “हँसने?”
“नहीं,” सोनिया ने धीरे कहा। “देखने। कि मेरी सहेली टूट तो नहीं गई।”
रुही कुछ नहीं बोली। बस सुबकती रही। कंधे काँप रहे थे। सोनिया ने उसका सिर अपनी गोद के करीब खींच लिया, बाल सहलाए, गाल थामे रखा।
“रो ले,” उसने फुसफुसाया। “आज जितना मन करे रो ले। कोई डेयर नहीं है इस कमरे में।”
रुही ने आँखें नहीं खोलीं। सिर्फ सोनिया के हाथ में अपना रोता हुआ चेहरा दिए सुबकती रही—धीमी, थकी, और बहुत नाज़ुक सिसकियों के साथ।
सोनिया रुही के बाल सहलाती रही। रुही अभी भी उल्टी लेटी थी, चेहरा तकिए में, सिसकियाँ अब थोड़ी धीमी पड़ चुकी थीं लेकिन रुक नहीं रही थीं।
“सुन,” सोनिया ने धीरे कहा। “हम औरतों का शरीर बना ही मर्दों को रिझाने के लिए है। तू इसे इतना छुपा-छुपा के क्यों मार रही है?”
रुही ने तकिए में मुँह दबाए कहा, “इतना आसान नहीं होता सोनिया…”
“आसान नहीं होता, सही है,” सोनिया बोली। “लेकिन सच तो यही है। भगवान ने तुझे इतना सुंदर बनाया है तो दिखाने में क्या हरज़ है? गोरी त्वचा, चिकनी जाँघें, ऐसे बदन… यह छुपाने के लिए नहीं बनाया गया।”
रुही सुबकी। “वहाँ जामिल भी था… मुझे बहुत ह्यूमिलिएशन फील हुई… जैसे मैं कोई चीज़ बन गई…”
सोनिया ने उसका चेहरा थोड़ा सा घुमाया। आँखों में अभी भी आँसू थे।
“जामिल था तो क्या हुआ? वह छू भी नहीं रहा था। देख रहा था। और तू तो अपने मर्द की बाँहों में थी। उसी मर्द ने तुझे नंगी भी देखा है, तेरे अंदर तक अपना लंड भी डाला है, तेरी बच्चेदानी में अपना बीज भी डाला है… तो शर्म कैसी? जो पहले ही तेरा पूरा शरीर जीत चुका है, उसके सामने तू और कितना छुपेगी?”
रुही की पलकें काँपीं। मन में बातें उलझ गईं।
सही कह रही है क्या?
रामू जी ने सब देख लिया है… सब ले लिया है… फिर भी जामिल की निगाह अलग थी।
निगाह भी छूती है… बिना हाथ लगाए भी छूती है।
“वह मेरा मर्द नहीं है,” रुही ने सिसकते हुए कहा। “रामू जी हैं… जामिल नहीं। इसलिए शर्म आई।”
सोनिया मुस्कुराई, लेकिन इस बार हँसी तेज़ नहीं थी। “शर्म आएगी। औरतों के लिए शर्म और ह्यूमिलिएशन तो एक गहना है रुही। गले का हार समझ। इसे दिल पर मत ले। इसे पहन। देखना, इसमें तुझे कितना मज़ा आने लगेगा।”
रुही ने आँखें बंद कर लीं। “मज़ा? रोते हुए मज़ा?”
“शुरू में रोना ही आता है,” सोनिया ने उसके माथे पर हाथ फेरा। “फिर आदत लगती है। फिर पता चलता है कि मर्दों की प्यासी निगाहें भी एक तरह का स्पर्श होती हैं। कोई हाथ नहीं लगाता, फिर भी शरीर गर्म हो जाता है। कोई शब्द नहीं कहता, फिर भी अंदर कुछ पिघलता है। हम औरतों को अपनी बॉडी के मज़े लेने चाहिए। छुपा-छुपा के हम खुद को सज़ा देती हैं।”
रुही चुप हो गई। आँसू बह रहे थे, लेकिन अब वह जवाब नहीं दे रही थी। अंदर आवाज़ें चल रही थीं।
गहना… शर्म को गहना कह रही है।
मैंने शर्म को सज़ा समझा। सोनिया उसे गहना समझती है।
रामू जी की बाँहों में होना सुरक्षित लगता है। जामिल की निगाह में वस्तु लगना डराता है।
लेकिन सोनिया कह रही है—डरा मत, आनंद ले।
क्या आनंद सच में आता है? या सिर्फ यही सीखना पड़ता है कि टूटना ही मज़ा है?
सोनिया उसके कान के पास और धीमे बोली, “तू नाज़ुक है, यह मैं अब समझ गई। लेकिन नाज़ुक होने का मतलब यह नहीं कि तू अपने शरीर से डरे। तू अपने मर्द की है। उसके सामने तू पहले ही खुल चुकी है। बाकी निगाहें सिर्फ साया हैं। साया से भी डरोगी तो जीना मुश्किल हो जाएगा।”
रुही ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “मैं डर गई थी… भाग आया… मुझे लगा सब हँस रहे हैं मेरे नंगेपन पर।”
“हँसे भी,” सोनिया ने सच बोला। “लेकिन हँसी हमेशा दुश्मनी नहीं होती। कभी-कभी हँसी इस बात की होती है कि तू खुल रही है। मर्द ऐसी औरत को ही देखते हैं जो थोड़ी टूटती है। तू टूटी, इसलिए जामिल की जीभ होठों पर फिर गई। यह अपमान भी है, और तेरे शरीर की ताकत भी है। दोनों साथ चलते हैं।”
रुही के मन में फिर सवाल उठा।
ताकत? मेरी लाज मेरी ताकत है क्या?
या सोनिया मुझे वही सिखा रही है जो उसे खुद को सही साबित करने के लिए चाहिए?
वह आसान लगती है। मैं रोती हूँ। शायद वह चाहती है मैं भी वैसी हो जाऊँ… तो उसकी राह अकेली न रहे।
वह ये बात मुँह से नहीं बोली। बस चुप हो गई। सिसकी अब लगभग थम चुकी थी। सिर्फ कभी-कभी एक लंबी, काँपती साँस निकल जाती।
सोनिया ने उसके बाल पीछे किए। “अब और मत सोच। पानी से मुँह धो। बाल ठीक कर। थोड़ी देर अकेली रह। फिर बाहर आ जाना। कोई ज़बरदस्ती नहीं कर रहा अभी। बस इतना कर—छुपकर मत मर। बाहर आ। अपने मर्द के पास जा। बाकी बातें बाद में।”
रुही ने आँखें खोलीं। आवाज़ बहुत थकी हुई थी। “सोनिया… तुम जा रही हो?”
“हाँ। तू फ्रेश हो। मैं बाहर हूँ। रामू भाई को कह दूँगी—अभी कुछ मत पूछना। तू आने पर आ जाना।”
वह उठी। दरवाज़े तक जाकर रुक गई। मुड़कर बोली, “रुही, एक बात और। शर्म तेरे गले का गहना बने या तेरी बेड़ी—यह तू तय करेगी। मैंने अपना फैसला बहुत पहले कर लिया। तू अभी सोच। लेकिन सोचते-सोचते खुद को सज़ा मत देना।”
दरवाज़ा धीमे से बंद हुआ।
रुही बिस्तर पर वही उल्टी लेटी रही। कमरा शांत हो गया। सोनिया की बातें उसके कानों में घूम रही थीं—शरीर दिखाने के लिए है, शर्म गहना है, निगाहों का आनंद लो, अपने मर्द ने तो सब देख लिया।
वह उठ नहीं रही थी। न मना कर रही थी। न हाँ कह रही थी।
सिर्फ चुप थी।
और उसी चुप्पी में, आँसू सूखने के बाद भी, सोनिया की आवाज़ उसके मन में बैठे-बैठे काम कर रही थी।
रुही अकेले रह गई तो सबसे पहले एक खालीपन आया। रोना थम चुका था, लेकिन शांति नहीं आई थी। शांति की जगह एक धीमी, भारी उलझन बैठ गई थी—जैसे कमरे में कोई और नहीं, सिर्फ उसके दो हिस्से आमने-सामने खड़े हों।
एक हिस्सा अभी भी पुरानी रुही का था।
वही रुही जो सुबह घर से निकलती थी, जो सनी को “बेबी” कहकर फोन काटती थी, जो ऑफिस में सोनिया से शर्म के साथ सुहागरात की बातें दबाती थी। वह हिस्सा कह रहा था—
तू भागकर सही आई। जामिल की निगाह गलत थी। हँसी गलत थी। शरीर दिखाना मर्दों की भूख नहीं, तेरी इज़्ज़त का सवाल है। सोनिया तुझे हल्की करने नहीं, अपने जैसा बनाने आई है।
दूसरा हिस्सा नया था, और खतरनाक हद तक थका हुआ था।
वह कह रहा था—
इज़्ज़त किसकी बची है अब? नाइटी उतर चुकी। ब्रा उतर चुकी। रामू जी के मुँह से शराब पी चुकी। उनके मूत का स्वाद याद है। तू खुद कह चुकी—कमत परिवार की बहू, कामत परिवार की रंडी। अब किस पवित्रता की रक्षा कर रही है?
यहीं संघर्ष तीखा होता था। क्योंकि दोनों आवाज़ें झूठी नहीं लग रही थीं। पुरानी आवाज़ सही लगती थी। नई आवाज़ सच्ची लगती थी। सही और सच अलग-अलग कमरों में खड़े थे, और रुही दोनों के बीच फर्श पर बैठी थी।
सोनिया की बातें उसके शरीर पर नहीं, उसकी थकान पर काम कर रही थीं।
हम औरतों का शरीर मर्दों को रिझाने के लिए है।
यह वाक्य उसे गुस्सा भी दिलाता था, और एक अजीब सी राहत भी। गुस्सा इसलिए कि वह अपने को इससे बड़ा मानती थी। राहत इसलिए कि अगर शरीर सिर्फ दिखाने की चीज़ है, तो आज की शर्म कोई पाप नहीं, सिर्फ काम है। पाप भारी होता है। काम हल्का लगता है। थकी हुई औरत अक्सर भारी सच नहीं, हल्का झूठ पकड़ती है।
फिर जामिल वाली बात लौटती।
रामू जी की निगाह में कब्ज़ा था। जामिल की निगाह में भूख थी। दोनों निगाहें नंगी थीं, लेकिन दोनों का वजन अलग था। रामू जी की निगाह में वह “मेरी” थी। जामिल की निगाह में वह “माल” थी। रुही इसी फर्क को पकड़े हुए थी जैसे आखिरी किनारा हो।
अगर मैं यह फर्क छोड़ दूँ, तो फिर कोई फर्क बचेगा ही नहीं। फिर कोई भी देख ले, कोई भी हँस ले, कोई भी चाहे।
सोनिया कह रही थी—शर्म गहना है, ह्यूमिलिएशन का आनंद लो।
रुही के लिए शर्म गहना नहीं थी। शर्म आखिरी कपड़ा थी। पैंटी शरीर पर थी, शर्म मन पर थी। एक उतर जाए तो दूसरा भी खिंचने लगता था। इसीलिए वह भागी थी। शरीर से नहीं, उस आखिरी कपड़े को बचाने के लिए।
लेकिन भागने के बाद भी मन नहीं बचा था।
अब अकेलापन उसे और सवाल दे रहा था।
रामू जी चुप क्यों रहे थे जब सोनिया ब्रा-पैंटी दोनों उतरवाने को कह रही थी?
क्या वे मेरी रक्षा कर रहे थे, या देख रहे थे कि मैं कितनी टूटती हूँ?
उन्होंने पैंटी बचा दी। क्या यह प्रेम था? या अगली बार के लिए उधार?
यही सबसे गहरा संघर्ष था—रामू जी को मालिक मान चुकी थी, लेकिन मालिक के नरम पड़ने को भी पूरा भरोसा नहीं दे पा रही थी। भरोसा और डर अब एक ही आदमी से जुड़े थे। जो संभालता है, वही नंगा भी करता है। जो आँसू पोंछता है, वही थप्पड़ भी मारता है। ऐसे मर्द के साथ दिल दो भागों में बँट जाता है: एक हिस्सा झुकना चाहता है, दूसरा हिस्सा पूछता है कि झुकने के बाद तू बचेगी भी या नहीं।
सोनिया का चेहरा भी उसके मन में घूम रहा था। सहेली वाली गर्माहट, और खेल वाली क्रूरता। दोनों सच थे। इसलिए रुही उसे न तो पूरी बुरी कह पा रही थी, न पूरी अपनी। सोनिया ने उसे छुआ था—गाल पकड़कर, नाज़ुक कहकर—और उसी छुए हुए गाल पर वह बातें रख गई थी जो रुही को अपने शरीर से कम शर्मिंदा, अपनी शर्म से ज्यादा थका देना चाहती थीं।
रुही ने धीरे से अपने हाथ देखे। वही हाथ जो स्तन छुपाते भाग आए थे। अब वे खाली थे। छुपाने को कोई कमरा काफी नहीं था, क्योंकि देखने वाले बाहर थे, और सोचने वाला अंदर।
मन का आखिरी सवाल बहुत छोटा था, और सबसे भारी—
मैं बाहर जाऊँ तो किसके पास जाऊँ?
रामू जी के पास, क्योंकि मैं उनकी हूँ?
या अपने पास रहूँ, जबकि अपना अब बहुत कम बचा है?
वह उठकर पानी तक गई, लेकिन मुँह धोते हुए भी जवाब नहीं मिला। आईने में वही चेहरा था—लाल आँखें, गाल पर हल्के निशान, थकी हुई औरत।
आईना कुछ नहीं बोलता था। सोनिया बोल चुकी थी। रामू जी बाहर थे। सनी बहुत दूर था।
रुही की भीतरी लड़ाई इस पल जीत-हार की नहीं रह गई थी। वह अब चुनाव की लड़ाई थी—
शर्म को बेड़ी रखने की,
या उसे गहना मानकर पहन लेने की।
और सबसे डरावनी बात यह थी कि पहली बार, वह साफ-साफ नहीं जानती थी कि कौन-सा चुनाव उसे बचाएगा… और कौन-सा चुनाव उसे हमेशा के लिए उनकी बहू बना देगा।


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