Thread Rating:
  • 0 Vote(s) - 0 Average
  • 1
  • 2
  • 3
  • 4
  • 5
Incest चाचा की आग भरी ज़ुबान: घर की प्यासी औरतें
#3
सुबह का उजाला इस बार और भी भारी लग रहा था। घर की हवा में रात की कराहें और गीलापन अभी भी तैर रहा था।
प्रिया जब रसोई में उतरी तो उसकी चाल बिलकुल अलग थी। कुर्ती पतली थी, अंदर ब्रा नहीं। स्तन स्वतंत्र रूप से हिल रहे थे, निप्पल कपड़े को धकेल रहे थे। जाँघों के बीच चलते समय हल्की सी रगड़ हो रही थी। आँखों में वह शांत, संतुष्ट चमक थी जो रात भर की तीव्रता के बाद आती है। वह सुमन के पास से गुजरी तो जानबूझकर उनकी निगाह से निगाह मिलाई। एक पल के लिए। फिर मुस्कुरा दी—हल्की, गुप्त।
सुमन की साड़ी का पल्लू उस मुस्कान से ही सरक गया। स्तन भारी हो गए। निप्पल तुरंत सख्त। उन्होंने जल्दी से निगाहें झुका लीं, पर शरीर ने गद्दारी कर दी। जाँघें भींच गईं। नमी ताजी महसूस हुई।
आंचल नाश्ते पर आई तो फ्रॉक की जगह उसने छोटी सी नाइटी जैसी कुर्ती पहन रखी थी। युवा स्तन साफ उभरे हुए थे। निप्पल की आकृति कपड़े पर साफ दिख रही थी। वह चाचा के सामने से गुजरी तो जानबूझकर धीरे चली। जाँघें हिलीं। चाचा की निगाह एक पल के लिए उसकी युवा गोलाई पर रुकी, फिर सामान्य हो गई।
नाश्ता चुपचाप चला। पर हर कोई जान रहा था कि रात कुछ बदल चुकी है।
नाश्ते के बाद प्रिया छत पर चली गई। आंचल बालकनी में। आरव बाहर।
चाचा ने सुमन को रसोई से बुलाया। आवाज सामान्य थी, “दीदी, एक मिनट कमरे में।”
सुमन का दिल जोर से धधकने लगा। वे उनके कमरे तक गईं। चाचा ने दरवाजा बंद किया। कुंडी लगा दी।
कमरे में हल्की रोशनी थी। सुमन दीवार से सट गईं। साड़ी का पल्लू पहले से ही ढीला था। चाचा पास आए। बिना कुछ कहे उन्होंने सुमन का पल्लू पूरी तरह हटा दिया। दोनों स्तन साड़ी के आँचल से बाहर आ गए—भारी, गोरे, निप्पल गहरे गुलाबी और तने हुए।
चाचा ने दोनों हाथों से स्तन पकड़ लिए। जोर से मसला। उंगलियों से निप्पलों को ऐंठा, खींचा। सुमन की कराह दबी हुई निकली। “राजेश… आह…”
चाचा ने एक निप्पल मुँह में ले लिया। जीभ घुमाई, जोर से चूसा। दाँतों से हल्के से काटा। सुमन की कमर लचक गई। पीठ दीवार से रगड़ खा रही थी। चाचा का दूसरा हाथ साड़ी के नीचे चला गया। पेटीकोट ऊपर खिसकाया। उंगलियाँ सीधे गीलेपन पर पहुँच गईं।
“इतनी गीली… सिर्फ कराहें सुनकर,” चाचा ने निप्पल छोड़कर कहा। आवाज भारी थी।
उंगलियाँ अंदर घुस गईं—दो उंगलियाँ एक साथ। सुमन की आँखें बंद हो गईं। मुँह खुला। चाचा की उंगलियाँ तेज अंदर-बाहर होने लगीं। अंगूठा ऊपर की घुंडी पर जोर-जोर से रगड़ने लगा। दूसरी ओर मुँह फिर से स्तन पर था—चूसते हुए, काटते हुए, जीभ घुमाते हुए।
सुमन का शरीर काँप रहा था। जाँघें चाचा के हाथ को जकड़ रही थीं। “और… जोर से… अंदर…” आवाज टूटी हुई थी।
चाचा ने उंगलियाँ और तेज कीं। तीसरी उंगली भी अंदर धकेल दी। सुमन की कराहें अब दबाने के बावजूद निकल रही थीं। अचानक शरीर में तेज बिजली दौड़ी। अंदर की दीवारें उंगलियों को कसकर जकड़ गईं। पानी की तरह गीलापन चाचा की हथेली पर बह निकला। सुमन काँपते हुए चाचा के कंधे से लिपट गईं। स्तन उनके चेहरे पर दब गए।
बहुत देर तक वे वैसे ही रहे। सुमन की साँसें उखड़ी हुई थीं। चाचा ने उंगलियाँ निकालीं। वे पूरी तरह चमक रही थीं। उन्होंने सुमन की आँखों में देखा और उंगलियाँ उनके होठों पर रख दीं। सुमन ने बिना सोचे उन्हें मुँह में ले लिया। चाखी।
चाचा ने धीरे से कहा, “अब तुम भी प्रिया जैसी हो गई हो। अगली बार पूरा लूँगा।”
सुमन ने कुछ नहीं कहा। बस काँपते हुए साड़ी ठीक की। दरवाजा खोला। गलियारे में निकलते समय उनके पैर लड़खड़ा रहे थे। साड़ी का निचला हिस्सा हल्का गीला था।
वे अपने कमरे में जाकर गिर गईं। शरीर अभी भी काँप रहा था। स्तन नंगे। निप्पल पर चाचा के दाँतों के हल्के निशान। जाँघों के बीच नमी बह रही थी। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। पहली बार इतनी तीव्र संतुष्टि मिली थी—और वह भी अपने देवर की उंगलियों से।
बाहर बालकनी में आंचल ने माँ के कमरे से आती दबी कराहें सुन ली थीं। उसने कुर्ती ऊपर की। युवा स्तन नंगे कर दिए। एक हाथ से मसलने लगी, दूसरा पैंटी के अंदर। उंगलियाँ तेज घूमने लगीं। आँखें बंद। कल्पना में माँ और चाचा। शरीर जल्दी काँप उठा। गीलापन उसकी उंगलियों से नीचे टपकने लगा। उसने मुँह दबा लिया। कराह अंदर ही दब गई।
छत पर प्रिया खड़ी थी। हवा में उसकी कुर्ती उड़ रही थी। उसने जानबूझकर ब्रा नहीं पहनी थी। निप्पल हवा में तन गए थे। मुस्कान उसके होठों पर थी—अब वह अकेली नहीं रह गई थी।
घर की तीनों औरतें अब एक ही आग में जल रही थीं।
सुमन ने पहली बार पूरा चरम सुख चाचा की उंगलियों से लिया था।
प्रिया अपनी जीत पर मुस्कुरा रही थी।
आंचल अपनी बारी का इंतजार कर रही थी।
और चाचा अपने कमरे में उंगलियाँ सूंघ रहे थे। सुमन की गंध अभी भी उन पर बाकी थी। वे जानते थे कि अब कोई वापस नहीं लौटेगा।

रात के बारह बजने वाले थे। घर में सन्नाटा पसरा था, पर हवा भारी थी।
आंचल अपने कमरे में beless नहीं रह सकी। शरीर जल रहा था। उसने सिर्फ एक पतली सी स्लिप पहन रखी थी—नीचे कुछ नहीं। युवा स्तन सख्त थे, निप्पल तने हुए, गुलाबी। जाँघों के बीच पहले से ही गीलापन फैल चुका था। रात-रात भर माँ और भाभी की कराहें उसके कानों में गूँज रही थीं। अब वह और इंतजार नहीं कर सकती थी।
वह उठी। चप्पल नहीं पहनी। गलियारे में धीरे-धीरे गई। चाचा के कमरे के दरवाजे पर खड़ी हुई। दिल जोर-जोर से धधक रहा था। फिर हल्के से ठोकर लगाई।
“चाचा… आप जागे हो?”
अंदर से गहरी आवाज आई, “आ जाओ।”
आंचल घुसी। दरवाजा बंद किया। कुंडी लगा दी। कमरे में मंद रोशनी थी। चाचा बिस्तर पर बैठे थे। कमीज खुली हुई। पैंट में सख्ती साफ उभरी हुई थी। आंचल की निगाह वहीं अटक गई। उसकी साँस तेज हो गई।
चाचा ने उसे देखा। “तुम भी आ गई। सोच रहा था कब आओगी।”
आंचल पास गई। आवाज काँप रही थी, “मैं… सुन रही थी। माँ को… भाभी को… मुझे भी… वैसा ही चाहिए।”
चाचा ने उसे और करीब खींच लिया। दोनों हाथों से उसकी पतली कमर पकड़ी। स्लिप ऊपर खिसक गई। नितंब नंगे हो गए—गोल, मुलायम, युवा। चाचा ने जोर से दबाया। आंचल की हल्की कराह निकल गई।
फिर स्लिप पूरी तरह ऊपर की। दोनों युवा स्तन बाहर आ गए—सख्त, गोल, निप्पल खड़े। चाचा ने एक को मुँह में ले लिया। जोर से चूसा। जीभ घुमाई। दाँतों से हल्के से काटा। आंचल की कमर लचक गई। “आह… चाचा…”
चाचा ने दूसरा स्तन भी हाथ में ले लिया। मसलने लगे। निप्पलों को ऐंठने लगे। आंचल का शरीर काँप रहा था। चाचा का एक हाथ नीचे गया। उंगलियाँ सीधे गीलेपन पर पहुँचीं। इतनी नमी थी कि उंगलियाँ फिसल गईं।
“इतनी प्यासी… पहली बार?” चाचा ने पूछा।
आंचल ने सिर हिलाया। आँखें बंद थीं। चाचा ने दो उंगलियाँ एक साथ अंदर धकेल दीं। आंचल की कराह निकल गई। जाँघें काँप उठीं। चाचा की उंगलियाँ तेज अंदर-बाहर होने लगीं। अंगूठा ऊपर की घुंडी पर जोर से रगड़ने लगा। मुँह स्तन पर था—चूसते, काटते, जीभ से खेलते।
आंचल का शरीर ऐंठने लगा। “और… जोर से… अंदर तक…”
चाचा ने उंगलियाँ और तेज कीं। तीसरी उंगली भी अंदर चली गई। आंचल की कराहें अब दबाने के बावजूद जोर से निकल रही थीं। अचानक शरीर में तेज लहर दौड़ी। अंदर की दीवारें उंगलियों को जकड़ गईं। गीलापन चाचा की हथेली पर बह निकला। आंचल काँपते हुए चाचा से लिपट गई। युवा स्तन उनके चेहरे पर दब गए।
बहुत देर तक वह काँपती रही। फिर चाचा ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। स्लिप पूरी तरह उतार दी। आंचल नंगी लेटी थी—युवा स्तन उठे हुए, जाँघें खुली हुई, बीच में चमकता गीलापन। चाचा ने उसके पैरों को और फैलाया। सिर नीचे किया। जीभ सीधे उस गीली जगह पर लगा दी।
आंचल की कमर उछल गई। “आह्ह… चाचा… जीभ… वहाँ…”
चाचा की जीभ तेज घूमने लगी। अंदर तक घुस रही थी। ऊपर की घुंडी को चूस रहे थे। आंचल के हाथ चाचा के बालों में उलझ गए। जाँघें उनके सिर को जकड़ रही थीं। दूसरी बार लहर और तेज आई। आंचल की कराहें कमरे में गूँज गईं। शरीर ऐंठ गया। पानी की तरह रस उनकी जीभ पर बह निकला।
उसी समय सुमन अपने कमरे में खड़ी थीं। कान दरवाजे से सटे। आंचल की कराहें साफ सुनाई दे रही थीं—“आह… चाचा… जीभ… जोर से…”
सुमन की साड़ी अपने आप खुल गई। स्तन नंगे। उन्होंने एक हाथ से स्तन मसलना शुरू किया, दूसरा साड़ी के नीचे। उंगलियाँ अंदर चली गईं। आंचल की कराहें सुनकर उंगलियाँ पागलों की तरह तेज हो गईं। सुमन की भी कराह निकल गई। शरीर काँप उठा। गीलापन उंगलियों से नीचे टपकने लगा।
प्रिया भी अपने कमरे में जाग रही थी। उसने नाइटी उठा रखी थी। एक हाथ स्तन पर, दूसरा जाँघों के बीच। आंचल की आवाजें सुनकर उसकी उंगलियाँ भी तेज हो गईं। “छोटी भी… चली गई…” उसने फुसफुसाया। शरीर में लहर दौड़ी। वह भी काँपते हुए चरम तक पहुँच गई।
दरवाजे के अंदर चाचा अभी भी आंचल की जाँघों के बीच थे। जीभ निकालकर उन्होंने आंचल की आँखों में देखा। “अब तुम भी तैयार हो। अगली बार तीनों को एक साथ लूँगा।”
आंचल नंगी, काँपती, गीली लेटी थी। साँसें उखड़ी हुईं। युवा शरीर अभी भी सिहर रहा था।
चाचा उठे। पैंट की सख्ती और भी तन गई थी। उन्होंने आंचल को चूमा—गहरा, जीभ के साथ। फिर कहा, “जा, सो जा। कल रात असली खेल शुरू होगा।”
आंचल ने स्लिप पहनी। लड़खड़ाते हुए दरवाजा खोला। गलियारे में माँ और भाभी दोनों के कमरों से हल्की सी साँसों की आवाज आ रही थी। आंचल मुस्कुरा दी—थकी हुई, संतुष्ट।
घर की तीनों औरतें अब पूरी तरह खुल चुकी थीं।
आंचल ने पहली बार चाचा की जीभ से चरम सुख लिया था।
सुमन और प्रिया ने उनकी कराहें सुनकर खुद को फिर से गीला कर लिया था।
और चाचा जानते थे कि अब कोई सीमा बाकी नहीं रही।

अगली रात। बारह बजने में दस मिनट बाकी थे। घर में कोई नहीं सो रहा था।
चाचा अपने कमरे में इंतजार कर रहे थे। कमीज पूरी तरह उतार रखी थी। पैंट की डोरी खुली हुई। सख्ती भारी और तनी हुई थी। बिस्तर पर चादर बिछी थी। लाइट मंद कर दी गई थी।
पहले दस्तक प्रिया की हुई। वह अंदर आई और दरवाजा बंद कर दिया। नाइटी पहले ही उतार रखी थी। नंगी खड़ी थी—गोल स्तन, तने निप्पल, जाँघों के बीच चमकता गीलापन। चाचा ने उसे बिस्तर पर खींच लिया। बिना बात किए मुँह स्तनों पर लगा दिया। जोर से चूसा। उंगलियाँ अंदर घुस गईं। प्रिया तुरंत काँप उठी। “आज… पूरा लो…” उसने माँगा।
चाचा ने उसे बिस्तर पर लिटाया। पैंट नीचे की। सख्ती बाहर आ गई—मोटी, लंबी, नसों से भरी। प्रिया की आँखें फटी की फटी रह गईं। चाचा ने उसके पैर फैलाए। मुँह की नमी से गीला किया। फिर धीरे-धीरे अंदर धकेलना शुरू किया। प्रिया की कराह निकल गई। “आह्ह… इतना मोटा…”
चाचा ने पूरा अंदर तक धकेल दिया। फिर जोर-जोर से चलाने लगे। प्रिया के स्तन हिल रहे थे। नितंब चाचा की जाँघों से टकरा रहे थे। कमरा चरमराने लगा। प्रिया की कराहें तेज हो गईं। अचानक शरीर ऐंठ गया। अंदर की दीवारें सख्ती को जकड़ रही थीं। गीलापन और बढ़ गया। चाचा ने और तेज किया। कुछ देर बाद खुद भी छोड़ दिया—गर्म, गाढ़ा रस प्रिया के अंदर।
प्रिया काँपते हुए लेटी रही। तभी दूसरी दस्तक हुई।
सुमन अंदर आईं। साड़ी पहले ही ढीली थी। उन्होंने दरवाजा बंद किया। प्रिया को नंगा, गीला, चाचा की सख्ती अभी भी अंदर देखकर उनकी साँस रुक गई। पर शरीर ने गद्दारी की। साड़ी अपने आप खुल गई। स्तन बाहर आ गए।
चाचा ने प्रिया से अलग होकर सुमन को खींच लिया। “अब तुम्हारी बारी।”
सुमन को बिस्तर पर लिटाया। प्रिया एक तरफ लेटी देख रही थी। चाचा ने सुमन के भारी स्तनों को मसला, निप्पलों को चूसा। फिर सख्ती जो अभी भी तनी हुई थी, सुमन की गीली जगह पर लगाई। धीरे-धीरे अंदर धकेला। सुमन की आँखें बंद हो गईं। “राजेश… आह… पूरा…”
चाचा ने जोर लगाया। पूरा अंदर। फिर तेज गति। सुमन के भारी स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। कराहें प्रिया से भी जोर की थीं। प्रिया ने खुद के स्तन मसलने शुरू कर दिए। चाचा एक हाथ से सुमन के स्तन दबा रहे थे, दूसरे से प्रिया के। कमरा कराहों से भर गया। सुमन जल्दी ही काँप उठीं। अंदर रस बह निकला। चाचा ने कुछ और देर चलाया, फिर दूसरी बार छोड़ दिया—सुमन के अंदर।
सुमन और प्रिया दोनों गीली, काँपती लेटी थीं। तभी तीसरी दस्तक हुई।
आंचल अंदर आई। स्लिप उतार रखी थी। नंगी। युवा स्तन तने हुए। जाँघों के बीच पहले से नमी। उसने माँ और भाभी को नंगा देखकर निगल लिया। पर रुकी नहीं। चाचा के पास चली गई।
चाचा ने उसे भी बिस्तर पर लिटाया। दोनों औरतों के बीच। मुँह आंचल के युवा स्तनों पर लगाया। जोर से चूसा। फिर सख्ती जो तीसरी बार तन चुकी थी, आंचल की टIGHT जगह पर लगाई। धीरे से अंदर धकेला। आंचल की कराह तेज निकल गई। “आह्ह… चाचा… दर्द… पर अच्छा…”
चाचा ने धीरे-धीरे पूरा अंदर लिया। फिर गति बढ़ाई। आंचल के युवा नितंब उनके हाथ में थे। माँ और भाभी दोनों देख रही थीं—एक हाथ से अपने स्तन, दूसरे से अपनी गीली जगह। चाचा ने आंचल को जोर-जोर से भेदना शुरू किया। आंचल की कराहें कमरे में गूँज रही थीं। जल्दी ही उसका शरीर ऐंठ गया। चाचा ने भी तीसरी बार छोड़ दिया—आंचल के अंदर।
तीनों औरतें बिस्तर पर नंगी, गीली, काँपती लेटी थीं। स्तनों पर निशान, जाँघों पर चमक, साँसें उखड़ी हुईं। चाचा बीच में बैठे थे। सख्ती अभी भी भारी थी।
उन्होंने तीनों को देखा और धीमी आवाज में कहा, “अब यह घर सिर्फ तुम्हारा नहीं रहा। हर रात यही होगा। कभी एक-एक करके, कभी तीनों साथ।”
सुमन, प्रिया और आंचल कुछ नहीं बोलीं। सिर्फ काँपती रहीं। शरीर अभी भी सिहर रहे थे। अंदर चाचा का गर्म रस बह रहा था।
गलियारे में आरव खड़ा था। दरवाजे के पास। उसने सब सुन लिया था—कराहें, चरमराने की आवाजें, नाम। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था। पर वह हिला नहीं। बस सुनता रहा।
घर अब पूरी तरह बदल चुका था।
तीनों औरतें चाचा की हो चुकी थीं।
और कथावाचक बेटा अब सब कुछ जान चुका था।

सुबह का उजाला धीरे-धीरे कमरों में घुस रहा था। घर पहले जैसा नहीं लग रहा था। हवा में एक अजीब सी गंध तैर रही थी—पसीना, रस और रात की गर्मी की मिली-जुली।
सुमन सबसे पहले उठीं। नहाते समय जाँघों के बीच से अभी भी गाढ़ा, चिपचिपा रस बह रहा था। चाचा का छोड़ा हुआ। उन्होंने खुद को साफ करने की कोशिश की, पर पूरी तरह नहीं जा सका। साड़ी पहनते समय स्तनों पर हल्के नीले निशान दिख रहे थे—चाचा के दाँतों और उंगलियों के। निप्पल अभी भी संवेदनशील थे। हर कपड़े की रगड़ पर सिहरन हो रही थी।
प्रिया ने नहाया। उसके अंदर भी वही रस था। कुर्ती पहनते समय उसने जानबूझकर ब्रा नहीं डाली। स्तन स्वतंत्र हिल रहे थे। निप्पल कपड़े पर साफ उभर रहे थे। जाँघों के बीच चलते समय हल्की सी चिपचिपाहट महसूस हो रही थी। होठों पर एक शांत, संतुष्ट मुस्कान थी।
आंचल सबसे बाद में उठी। युवा शरीर अभी भी रात की तीव्रता से काँप रहा था। नहाते समय उसके अंदर से भी सफेद रस निकला। उसने छोटी सी फ्रॉक पहनी। अंदर पैंटी हल्की गीली थी। स्तन सख्त थे, निप्पल तने हुए।
नाश्ते की मेज पर तीनों एक साथ बैठीं। चाचा भी आ गए। आरव देर से आया। उसका चेहरा उतरा हुआ था। आँखों में नींद की बजाय कुछ और था—सनसनी, गुस्सा, और एक अजीब सी बेचैनी। वह माँ की ओर देखता, फिर भाभी की ओर, फिर बहन की ओर। तीनों की आँखों में वही थकी हुई, गीली चमक थी।
चाय पीते समय सुमन की उंगलियाँ काँप रही थीं। प्रिया जानबूझकर चाचा के पास बैठ गई थी। उसकी जाँघ चाचा की जाँघ से छू रही थी। आंचल चुपचाप रोटी तोड़ रही थी, पर हर बार जब चाचा कुछ कहते, उसकी जाँघें भींच जातीं।
आरव ने अचानक पूछा, “रात को… सबकी नींद ठीक रही?”
तीनों औरतें एक साथ निगाहें झुका लीं। चाचा ने शांत स्वर में कहा, “हाँ बेटा। बहुत गहरी नींद आई।”
आरव की मुट्ठी बंद हो गई। उसने और कुछ नहीं कहा। बस अपनी प्लेट में देखता रहा। पर उसकी निगाह बार-बार माँ के स्तनों पर जा रही थी—जहाँ साड़ी के आँचल के नीचे हल्के निशान छुपे थे।
नाश्ता खत्म होने के बाद आरव अपने कमरे में चला गया। दरवाजा जोर से बंद किया। प्रिया छत पर चली गई। आंचल बालकनी में।
सुमन रसोई में थीं कि चाचा पीछे से आए। उन्होंने कमर से पकड़ लिया। साड़ी ऊपर की। एक हाथ से भारी स्तन मसला, दूसरे हाथ से जाँघों के बीच उंगलियाँ डाल दीं। अभी भी नमी और पुराना रस दोनों मिला हुआ था। “रात को अंदर कितना छोड़ दिया था… अभी भी बाकी है,” चाचा ने कान में कहा। सुमन की कराह दबी हुई निकली। चाचा ने दो उंगलियाँ अंदर घुमाईं, फिर निकाल लीं। उंगलियाँ चाट कर चले गए।
दिन भर घर में अजीब तनाव रहा। आरव कमरे से बाहर नहीं निकला। तीनों औरतें एक-दूसरे की ओर देखतीं तो शर्म और एक नई सी समझ दोनों होती।
रात फिर आई।
इस बार चाचा ने तीनों को एक साथ बुलाया। कमरे में लाइट और मंद थी। बिस्तर बड़ा था। तीनों नंगी होकर आईं—सुमन के भारी स्तन, प्रिया के गोल सख्त, आंचल के युवा तने हुए। जाँघों के बीच तीनों की नमी पहले से चमक रही थी।
चाचा ने पहले सुमन को चारपाई पर घुटनों के बल कर दिया। पीछे से प्रवेश किया। जोर-जोर से। सुमन के भारी स्तन लटक रहे थे, हिल रहे थे। प्रिया को सुमन के सामने बिठाया। सुमन का मुँह प्रिया की गीली जगह पर लगा दिया। आंचल को चाचा के मुँह के पास खींच लिया। जीभ आंचल के निप्पल पर थी, उंगलियाँ उसकी युवा जगह में।
कमरा कराहों, चपलाने और चरमराने की आवाजों से भर गया। चाचा सुमन को जोर से भेद रहे थे। सुमन प्रिया को चाट रही थीं। प्रिया आंचल के स्तन मसल रही थी। आंचल चाचा की उंगलियों पर काँप रही थी। एक के बाद एक चरम आ रहे थे। रस बह रहा था। चादर गीली हो चुकी थी।
चाचा ने पोजीशन बदली। अब प्रिया को घोड़ी बनाकर पीछे से लिया। सुमन आंचल के युवा स्तन चूस रही थीं। आंचल प्रिया के मुँह में उंगलियाँ दे रही थी। फिर आंचल की बारी आई—चाचा ने उसे ऊपर बिठाया। युवा शरीर उनके ऊपर उछल रहा था। भारी सख्ती पूरी अंदर तक जा रही थी। सुमन और प्रिया दोनों नीचे से आंचल के स्तन और चाचा के अंडकोष सहला रही थीं।
रात बहुत लंबी चली। तीनों औरतें बार-बार काँपीं। चाचा ने तीनों के अंदर बारी-बारी से छोड़ा। आखिर में तीनों बिस्तर पर नंगी, एक-दूसरे से चिपटी, रस से लथपथ लेटी थीं। स्तनों पर दाँतों के निशान, जाँघों पर सफेद धारियाँ, होठों पर थकान और संतुष्टि।
चाचा बीच में बैठे थे। साँसें भारी। उन्होंने तीनों के नितंबों पर हाथ फेरते हुए कहा, “अब यह रोज होगा। कभी कमरे में, कभी रसोई में, कभी छत पर। और हाँ… आरव सुन रहा है। उसे भी आदत पड़ जाएगी।”
तीनों औरतें कुछ नहीं बोलीं। सिर्फ एक-दूसरे के शरीर से चिपककर लेटी रहीं। अंदर अभी भी गर्म रस घूम रहा था।
गलियारे में आरव खड़ा था। इस बार उसने दरवाजे की दरार से कुछ देखा भी था। उसका शरीर काँप रहा था—गुस्से से नहीं, किसी और भावना से। उसने मुट्ठी भींची और अपने कमरे में लौट गया। दरवाजा बंद करके बिस्तर पर गिर गया। आँखें खुली थीं। दिमाग में वही दृश्य घूम रहे थे।
घर अब सिर्फ घर नहीं रह गया था।
वह एक खुला हुआ, गीला, कराहता हुआ खेल बन चुका था।
Fuckuguy
albertprince547;
Like Reply


Messages In This Thread
RE: चाचा की आग भरी ज़ुबान: घर की प्यासी औरतें - by Fuckuguy - 27-08-2026, 08:21 PM



Users browsing this thread: 1 Guest(s)