27-08-2026, 08:12 PM
रात की पूजा और दरवाजे के पार की हलचल
रात के दस बज रहे थे। घर फिर से शांत हो चुका था। आंचल अपने कमरे में किताब लेकर लेटी हुई थी, पर पन्ने पलट नहीं रही थी। प्रिया अपने कमरे का दरवाजा आधा खुला छोड़कर बैठी थी। मैं अपने कमरे की अंधेरे में खड़ा सुन रहा था।
सुमन पूजा के कमरे में थीं। उन्होंने लाल रंग की साड़ी पहन रखी थी—वही जो त्योहारों पर पहनती थीं। पल्लू सिर पर ढका हुआ था। सामने छोटी सी दीया जल रही थी। धुएँ की हल्की रेखा ऊपर उठ रही थी। वे हाथ जोड़कर बैठी थीं, होंठों पर मंत्र चल रहे थे। पर मन मंत्रों पर नहीं था।
हर साँस के साथ राजेश की आवाज याद आ रही थी—“जो अंदर जाग चुका है, वह भागने से नहीं सोएगा।”
उनके स्तन साड़ी के आँचल के नीचे भारी थे। निप्पल अभी भी सख्त थे, कपड़े से रगड़ खाकर संवेदनशील। जब वे झुककर दीया की बाती ठीक करतीं, तो स्तनों की गोलाई और उभर आती। जाँघों के बीच वह हल्की नमी रात भर बनी हुई थी। पूजा के आसन पर बैठे-बैठे उनकी कमर में एक अजीब सी बेचैनी फैल रही थी।
मंत्र अधूरा छोड़कर उन्होंने आँखें खोल दीं। दीया की रोशनी में उनकी छाया दीवार पर काँप रही थी। “भगवान… मुझे बचाओ,” उन्होंने फुसफुसाया। आवाज में प्रार्थना से ज्यादा हार थी।
उसी समय घर के दूसरे सिरे पर हलचल हुई।
प्रिया अपने कमरे से बाहर निकली। उसने हल्की सी चप्पल पहनी थी। सलवार-कमीज में शरीर की रेखाएँ साफ थीं—पतली कमर, उभरे नितंब, और स्तनों की युवा भारीपन। वह धीरे-धीरे गलियारे से गुजरी। चाचा के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। अंदर एक छोटी सी लाइट जल रही थी।
प्रिया ने दरवाजे के पास खड़े होकर आवाज दी, बहुत धीमी। “चाचा… आप जागे हुए हैं?”
अंदर से चाचा की गहरी आवाज आई। “हाँ। अंदर आ जाओ।”
प्रिया ने दरवाजा और खोला। कमरे में घुसते हुए उसकी साँस तेज हो गई। चाचा बिस्तर पर बैठे थे। कमीज के ऊपर के दो बटन खुले हुए थे। छाती के बाल हल्के से दिख रहे थे। प्रिया ने दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया। बस आधा रखा।
“मैं… सो नहीं पा रही,” प्रिया ने कहा। आवाज में संकोच था। “आपकी बातें… दिन भर दिमाग में घूम रही हैं。”
चाचा ने उसे कुर्सी की तरफ इशारा किया। “बैठो। कहो जो कहना है।”
प्रिया बैठ गई। सलवार का कपड़ा जाँघों पर तन गया। गोरी त्वचा की चमक लाइट में साफ थी। “मैं अपने आप को रोक नहीं पा रही। शरीर… माँग कर रहा है। पर डर भी लग रहा है।”
चाचा ने आगे झुककर कहा, “डर स्वाभाविक है। पर भूख भी। तुम बताओ—तुम्हें क्या चाहिए? सिर्फ बात? या कुछ और?”
प्रिया की उंगलियाँ सलवार के किनारे को मरोड़ रही थीं। स्तन तेजी से उठ-गिर रहे थे। “मुझे नहीं पता… बस यह अकेलापन खत्म हो जाए।”
चाचा ने हाथ बढ़ाया और उसकी हथेली पर अपनी हथेली रख दी। गर्म स्पर्श। प्रिया का शरीर सिहर उठा। उसने हाथ नहीं हटाया। उंगलियाँ एक-दूसरे में उलझ गईं।
उसी क्षण गलियारे में हल्के कदमों की आवाज आई।
आंचल अपने कमरे से निकली थी। पानी पीने के बहाने। उसने चाचा के कमरे का आधा खुला दरवाजा देखा। अंदर की रोशनी में प्रिया की पीठ और चाचा का हाथ उसकी हथेली पर दिख रहा था। आंचल की साँस रुक गई। वह दीवार से सट कर खड़ी हो गई। आँखें फटी की फटी।
उसने देखा—चाचा का दूसरा हाथ अब प्रिया के घुटने पर था। सलवार के ऊपर। उंगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर की तरफ सरक रही थीं। प्रिया की गर्दन पीछे झुक गई। होंठ खुले हुए थे। कोई चुप्पी थी, सिर्फ साँसों की आवाज।
आंचल का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी युवा स्तन फ्रॉक (उसने फिर से फ्रॉक पहन ली थी) के अंदर काँप रहे थे। जाँघों में एक अजीब सी गर्मी फैल गई। वह वहाँ से हटी नहीं। देखती रही।
पूजा वाले कमरे में सुमन अभी भी बैठी हुई थीं। दीया की बाती अब छोटी हो चुकी थी। अचानक उन्हें गलियारे से हल्की सी आवाज सुनाई दी—किसी के कमरे का दरवाजा हिलने की। उन्होंने कान तेज किए। कुछ स्पष्ट नहीं सुनाई दिया। पर मन में एक अजीब सा संदेह उठ खड़ा हुआ।
वे उठकर खड़ी हो गईं। साड़ी का पल्लू ठीक किया। दिल तेजी से धड़क रहा था—पूजा की शांति अब टूट चुकी थी। शरीर की बेचैनी और मन का संदेह दोनों एक साथ बढ़ रहे थे।
वे गलियारे की तरफ एक कदम बढ़ातीं कि अचानक प्रिया का कमरे से निकलने का हल्का सा शोर हुआ। दरवाजा बंद हुआ। फिर सन्नाटा।
सुमन वहीं रुक गईं। अंधेरे में खड़ी। उनके स्तन भारी साँस के कारण साड़ी के अंदर गति कर रहे थे। जाँघों के बीच नमी फिर से जाग उठी थी।
और इस बार उनके मन में एक नया प्रश्न था—
“क्या सिर्फ मैं ही नहीं…?”
दीया बुझ गई। अंधेरा गहरा हो गया। घर की हर दीवार अब कुछ छुपाए हुए लग रही थी।
दीया बुझने के बाद सुमन अपने कमरे में लौट आईं। साड़ी अभी भी पहने हुए थीं। उन्होंने दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर बैठ गईं। दिल की धड़कन तेज थी। गलियारे वाली आवाज उनके कानों में गूँज रही थी—दरवाजे का हिलना, फिर सन्नाटा।
“प्रिया…?” मन में सवाल उठा।
वे उठकर खड़ी हो गईं। आईने के सामने आकर पल्लू हटाया। स्तन साड़ी के आँचल से बाहर आ गए—भारी, गोरे, निप्पल अभी भी तने हुए। उन्होंने उन्हें दोनों हाथों से पकड़ा। उंगलियाँ गोलाई को कसकर दबा रही थीं। सिहरन कमर तक उतर गई। जाँघें खुल गईं। नमी अब चादर तक पहुँचने को थी।
“क्या वह भी…?” उन्होंने फुसफुसाया। आवाज में जलन थी—ईर्ष्या नहीं, बल्कि एक अजीब सी सहानुभूति और डर का मिश्रण। “क्या राजेश ने उसे भी छू लिया?”
उन्होंने हाथ हटाए। शर्म से चेहरा जल उठा। फिर से साड़ी ठीक की और बिस्तर पर लेट गईं। आँखें बंद कीं, पर नींद नहीं आई। हर बार पलक झपकते ही चाचा का चेहरा और प्रिया की पीठ दिखाई दे जाती।
उसी समय आंचल अपने कमरे में थी। उसने जो देखा था, वह आँखों के सामने घूम रहा था—चाचा का हाथ प्रिया के घुटने पर, उंगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर सरकती हुई, प्रिया की गर्दन का पीछे झुकना।
आंचल ने फ्रॉक उतार दी। सिर्फ पैंटी में रह गई। युवा स्तन हवा में तन गए—गोल, सख्त, निप्पल गुलाबी और खड़े। उसने आईने के सामने खड़े होकर उन्हें देखा। हाथ बढ़ाकर एक स्तन को सहलाया। सिहरन इतनी तेज थी कि उसकी कमर काँप गई।
“भाभी… और चाचा…” उसने फुसफुसाया। आवाज में डर नहीं, बल्कि एक नई सी उत्तेजना थी।
उसने पैंटी के अंदर उंगलियाँ डालीं। वहाँ पहले से गीलापन था। उंगलियाँ धीरे-धीरे घूमने लगीं। आँखें बंद हो गईं। कल्पना में वही दृश्य और तेज हो गया—चाचा का हाथ अब और ऊपर, प्रिया की सलवार खिसकती हुई, आवाजें दबती हुई। आंचल की साँसें तेज हो गईं। जाँघें काँपने लगीं। उसने मुँह पर दूसरा हाथ रख लिया ताकि आवाज बाहर न जाए।
बहुत देर तक वह अपने शरीर से खेलती रही। फिर अचानक रुक गई। आँखें खोलीं। चेहरे पर पसीना चमक रहा था। स्तन तेजी से उठ-गिर रहे थे। उसने पैंटी ठीक की और बिस्तर पर लेट गई। मन में एक सवाल बार-बार घूम रहा था—“क्या माँ भी…?”
प्रिया अपने कमरे में वापस आ चुकी थी। दरवाजा बंद करके उसने कमीज के बटन खोले। स्तन बाहर आ गए। चाचा का हाथ अभी भी उसकी हथेली और घुटने पर महसूस हो रहा था। उसने स्तनों को पकड़ा और जोर से दबाया। निप्पल उंगलियों में दब गए। एक हल्की सी कराह निकल गई।
“उन्होंने सिर्फ इतना छुआ… और मैं इतनी गीली हो गई,” उसने खुद से कहा।
सलवार खिसकाकर उसने उंगलियाँ नीचे ले गईं। वहाँ की गर्मी और नमी ने उसे और बेचैन कर दिया। वह बिस्तर पर लेट गई। एक हाथ स्तन पर, दूसरा जाँघों के बीच। आँखें बंद करके उसने चाचा की आवाज याद की—“तुम बताओ—तुम्हें क्या चाहिए?”
शरीर जवाब माँग रहा था। पर उसने खुद को रोक लिया। पूरी तरह नहीं खोला। सिर्फ किनारे तक गई और रुक गई। साँसें उखड़ी हुई थीं। चादर गीली हो चुकी थी।
घर के तीन अलग-अलग कमरों में तीन औरतें जाग रही थीं।
एक संस्कार और इच्छा के बीच पिस रही थी।
दूसरी स्पर्श की गर्मी से जल रही थी।
तीसरी पहली बार अपनी ही देह की आग से परिचित हो रही थी।
और बीच में चाचा अपने कमरे में शांत लेटे हुए थे। आँखें खुलीं। वे जानते थे कि आज की रात ने घर की हवा बदल दी है। दीवारें अब पहले जैसी मोटी नहीं रहीं।
सुबह दूर थी। पर इच्छा और करीब आ चुकी थी।
सुबह का उजाला धीरे-धीरे घर में फैल रहा था। सुमन की आँखें रात भर की बेचैनी से सूजी हुई थीं। उन्होंने साड़ी पहनी—आज काला रंग, पल्लू कसकर बाँधा हुआ, जैसे कोई दीवार खड़ी कर रही हों। स्तन आँचल के नीचे दबे थे, पर उनकी भारी गोलाई और निप्पलों की सख्ती कपड़े को धकेल रही थी। जाँघों के बीच की नमी रात भर बनी रही थी; सुबह नहाते समय भी वह पूरी तरह नहीं गई थी।
रसोई में उतरते ही उनकी निगाह प्रिया पर पड़ी। प्रिया कुर्ती में थी, बाल खुले, आँखों के नीचे हल्की छाया। दोनों की निगाहें मिलीं। एक पल के लिए सुमन ने प्रिया की आँखों में वह वही बेचैनी देखी जो रात को खुद महसूस कर रही थीं। प्रिया ने जल्दी से निगाहें झुका लीं और चाय बनाने लग गईं।
सुमन पास गईं। आवाज बहुत धीमी रखी, “रात को देर तक जागती रही?”
प्रिया के हाथ में चम्मच थम गई। “हाँ… नींद नहीं आई।”
सुमन ने और कुछ नहीं पूछा। बस प्रिया के गले की हल्की लालिमा और कुर्ती के खुले बटन पर एक पल के लिए निगाह दौड़ाई। स्तनों की युवा गोलाई साफ झलक रही थी। सुमन का मन और उलझ गया। संदेह अब पक्का होता जा रहा था।
आंचल बाद में आई। उसने साधारण सलवार-कमीज पहन रखी थी, पर कमीज का ऊपरी बटन खुला छोड़ दिया था। युवा स्तनों की सख्त गोलाई हर साँस के साथ हिल रही थी। वह नाश्ते की मेज पर बैठते ही चाचा की ओर देखने लगी। निगाह में वह जिज्ञासा थी जो रात को आईने के सामने जाग चुकी थी। चाचा ने उसकी ओर देखा, पर कुछ नहीं कहा। बस हल्की सी मुस्कान दी—वही शांत, समझने वाली मुस्कान।
नाश्ता खत्म होने के बाद घर में काम का बहाना चल पड़ा। प्रिया कपड़े सुखाने छत पर चली गईं। आंचल किताब लेकर बालकनी में बैठ गई। आरव अपने कमरे में चला गया।
सुमन रसोई में बर्तन धो रही थीं कि चाचा अंदर आ गए। दरवाजा उन्होंने आधा ही बंद किया। दूरी कम थी। रसोई की गर्मी में सुमन की गर्दन पर पसीना चमक रहा था। साड़ी का पल्लू कंधे से सरक चुका था। पीठ की चिकनी त्वचा और कमर का मोड़ साफ दिख रहा था।
चाचा ने पानी का गिलास उठाया। फिर धीरे से बोले, “दीदी, आप रात भर जागी हैं। आँखें बता रही हैं।”
सुमन ने बर्तन पर नजर रखी। “कुछ नहीं… बस नींद नहीं आई।”
चाचा एक कदम और करीब आए। उनकी आवाज और धीमी हो गई, “संदेह भी नींद नहीं आने देता। है ना?”
सुमन के हाथ रुक गए। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। चाचा बहुत नजदीक थे। उनकी साँस सुमन के गाल तक महसूस हो रही थी। स्तन भारी हो गए। निप्पल साड़ी के कपड़े से रगड़ खाकर और सख्त हो उठे। जाँघें अपने आप सिकुड़ गईं।
“आप… आप क्या कह रहे हैं?” सुमन की आवाज काँपी।
चाचा ने हाथ बढ़ाया। उंगलियाँ सुमन की कलाई पर रख दीं—वहीं जहाँ नसों की धड़कन तेज चल रही थी। “मैं कुछ नहीं कह रहा। आप खुद महसूस कर रही हैं। प्रिया की आँखों में जो देखा, वह आपने खुद में भी देखा है।”
सुमन ने हाथ खींचने की कोशिश की, पर चाचा ने हल्का सा दबाया। गर्म स्पर्श उनकी त्वचा में उतर गया। स्तनों में सिहरन दौड़ गई। नमी फिर से जाग उठी।
“यह गलत है, राजेश…” उन्होंने फुसफुसाया। “मैं आपकी भाभी हूँ।”
“और एक स्त्री भी,” चाचा ने उत्तर दिया। स्वर में कोई जल्दबाजी नहीं थी। “जो सालों से भूखी है। शरीर अब छुप नहीं रहा, दीदी। आप जब भी मेरे पास आती हैं, आपके निप्पल तन जाते हैं। साड़ी का पल्लू बार-बार सरकता है। जाँघें सिकुड़ती हैं। यह सब मैं देख रहा हूँ।”
सुमन की आँखें भर आईं। उन्होंने अपना हाथ छुड़ाया और पीछे हट गईं। पीठ दीवार से सट गई। साड़ी का आँचल पूरी तरह सरक चुका था। एक स्तन का ऊपरी भाग लगभग बाहर था—गोरा, भारी, निप्पल कपड़े के नीचे गुलाबी बिंदु की तरह तना हुआ।
चाचा ने आगे कदम नहीं बढ़ाया। बस खड़े रहे। “मैं जबरदस्ती नहीं करूँगा। जब आप खुद कहेंगी… तब।”
सुमन ने पल्लू जल्दी से ठीक किया। साँसें उखड़ी हुई थीं। वे रसोई से बाहर निकल गईं, पर उनके जाने के बाद भी शरीर की गर्मी रसोई में बनी रही।
बालकनी में आंचल यह सब आंशिक रूप से सुन चुकी थी। उसने किताब बंद कर दी। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। युवा स्तन कमीज के अंदर काँप रहे थे। उसने अपनी जाँघें भींच लीं। रात वाली गर्मी वापस आ गई थी।
छत पर प्रिया कपड़े टाँग रही थी। हवा में उसकी कुर्ती उड़ रही थी। स्तन स्वतंत्र रूप से हिल रहे थे। चाचा के कल वाले स्पर्श की याद आते ही उसकी उंगलियाँ रुक गईं। उसने आसपास देखा, फिर एक हाथ से अपने स्तन को हल्के से दबाया—जैसे कोई सबूत खोज रही हो कि वह गर्मी अभी भी बाकी है।
घर की तीनों औरतें अब एक ही अदृश्य धागे से बँध चुकी थीं।
सुमन की लड़ाई और गहरी हो गई थी।
प्रिया की भूख और साफ हो गई थी।
आंचल की जिज्ञासा अब खतरे के किनारे पर खड़ी थी।
और चाचा शांत खड़े थे—जैसे वे जानते हों कि अगला कदम अब किसी औरत का होगा, उनका नहीं।
रात के ग्यारह बज चुके थे। घर फिर से सन्नाटे में डूबा था। पंखे की मंद आवाज के अलावा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। सुमन अपने कमरे में बैठी हुई थीं। साड़ी उतारकर उन्होंने नाइटी पहन ली थी—ढीली सफेद, जो उनके भारी स्तनों की गोलाई को मुश्किल से ढक पा रही थी। निप्पल कपड़े के नीचे तने हुए बिंदुओं की तरह उभर रहे थे। जाँघें चादर पर फैली हुई थीं, उनके बीच की हल्की नमी अभी भी बाकी थी।
मन में वही संघर्ष चल रहा था। “सिर्फ बात करूँगी। बस इतना ही।”
वे उठ खड़ी हुईं। चप्पल नहीं पहनी। गलियारे में धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। चाचा के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। अंदर छोटी सी लाइट जल रही थी। सुमन ने दरवाजे पर हल्के से ठोकर लगाई।
“राजेश… जागे हुए हो?”
अंदर से गहरी आवाज आई, “हाँ, दीदी। आ जाओ।”
सुमन अंदर गईं। दरवाजा उन्होंने पूरी तरह बंद नहीं किया। चाचा बिस्तर पर बैठे थे। कमीज के बटन खुले हुए थे। छाती के बाल लाइट में चमक रहे थे। सुमन कुर्सी पर बैठ गईं। नाइटी का कपड़ा जाँघों पर तन गया। गोरी, मोटी जाँघें साफ दिख रही थीं।
“मैं… बात करना चाहती थी,” सुमन ने कहा। आवाज में संकोच था। “आज रसोई में जो कुछ हुआ… वह मेरे मन से नहीं उतर रहा।”
चाचा ने उन्हें देखा। निगाह में कोई जल्दबाजी नहीं थी। “कहकर देखो। जो भी है।”
सुमन की उंगलियाँ नाइटी के किनारे को मरोड़ रही थीं। स्तन तेजी से उठ-गिर रहे थे। “मैं डरती हूँ। अपने आप से। शरीर… मान नहीं रहा। जब आप पास होते हो तो… सब गड़बड़ हो जाता है।”
चाचा कुर्सी से उठे और उनके सामने खड़े हो गए। दूरी बहुत कम रह गई। “शरीर गड़बड़ नहीं कर रहा, दीदी। वह सिर्फ याद दिला रहा है कि वह अभी भी जीवित है। आप सालों से उसे चुप कराती रही हैं।”
सुमन ने आँखें उठाईं। चाचा की आँखें बहुत करीब थीं। उनकी साँस सुमन के होठों तक महसूस हो रही थी। एक पल के लिए सुमन का शरीर आगे बढ़ने को हुआ। स्तन लगभग छूने को थे। फिर उन्होंने खुद को रोक लिया।
“मैं जाऊँ,” उन्होंने फुसफुसाया और उठ खड़ी हुईं।
चाचा ने उनका हाथ पकड़ लिया—सिर्फ कलाई से। गर्म उंगलियाँ। सुमन की साँस अटक गई। निप्पल और सख्त हो गए। नाइटी के कपड़े में उनकी आकृति साफ उभर आई।
“जब तैयार हो, तब लौटना,” चाचा ने धीरे से कहा। हाथ छोड़ दिया।
सुमन कमरे से निकल गईं। गलियारे में उनका शरीर काँप रहा था। स्तन भारी थे, जाँघों के बीच नमी बढ़ चुकी थी। वे अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया और बिस्तर पर गिर गईं। हाथ अपने आप स्तनों पर चले गए। उंगलियाँ निप्पलों को दबा रही थीं। सिहरन इतनी तेज थी कि उन्होंने मुँह तकिए में दबा लिया।
उसी समय प्रिया अपने कमरे में थी। उसने कल वाले स्पर्श की गर्मी को बर्दाश्त नहीं किया। कमीज उतार दी। स्तन स्वतंत्र हो गए—गोल, सख्त, निप्पल तने हुए। उसने आईने के सामने खड़े होकर दोनों हाथों से उन्हें पकड़ा और जोर से दबाया। एक हल्की कराह निकल गई। फिर सलवार खिसकाई। उंगलियाँ नीचे चली गईं। वहाँ की गर्मी और गीलापन ने उसे काँप दिया।
इस बार उसने खुद को नहीं रोका। उंगलियाँ अंदर-बाहर होने लगीं। आँखें बंद थीं। कल्पना में चाचा का हाथ उसके घुटने से ऊपर सरक रहा था, फिर और ऊपर। साँसें तेज हो गईं। जाँघें काँपने लगीं। शरीर में एक लहर दौड़ी—पहली बार इतनी तीव्र। उसने मुँह पर हाथ रख लिया। आवाज दबा ली। चादर गीली हो गई।
बहुत देर बाद वह शांत हुई। शरीर ढीला पड़ गया। आँखों में पानी था—संतुष्टि और शर्म का मिश्रण।
आंचल ने यह सब आंशिक रूप से भाँप लिया था। वह अपने कमरे से निकली और गलियारे में चुपचाप खड़ी हो गई। चाचा के कमरे का दरवाजा अब बंद था। माँ का कमरा भी। प्रिया के कमरे से हल्की सी आवाजें आ रही थीं—साँसों की, फिर सन्नाटा।
आंचल का दिल जोर से धड़क रहा था। उसने अपने कमरे में वापस जाकर फ्रॉक उतार दी। सिर्फ पैंटी में रह गई। युवा स्तन हवा में तन गए। उसने एक हाथ से स्तन सहलाया, दूसरे हाथ से पैंटी के अंदर उंगलियाँ डालीं। रात वाला दृश्य आँखों के सामने घूम रहा था—चाचा का हाथ, प्रिया की गर्दन, माँ की काँपती आवाज। उंगलियाँ तेज घूमने लगीं। शरीर में गर्मी फैल गई। उसने खुद को रोकने की कोशिश नहीं की। पहली बार पूरा अनुभव लिया—काँपते हुए, मुँह दबाए हुए।
घर की तीनों औरतें उसी रात अपने-अपने कमरों में अपनी भूख से मिलीं।
सुमन ने सिर्फ छुआ।
प्रिया ने पहली बार खुद को पूरा खोला।
आंचल ने अपनी जिज्ञासा को शरीर तक पहुँचा दिया।
और चाचा अपने कमरे में जाग रहे थे। वे जानते थे कि आज की रात ने एक रेखा पार कर दी है। अगली बार कोई सिर्फ बात करने नहीं आएगा।
सुबह का उजाला इस बार भारी लग रहा था। घर की हवा में एक अजीब सी नमी तैर रही थी—जैसे रात की घटनाएँ दीवारों में समा गई हों।
सुमन रसोई में थीं। साड़ी आज हल्के गुलाबी रंग की थी। पल्लू ढीला छोड़ रखा था। स्तन आँचल के नीचे भारी और संवेदनशील थे; हर हल्की रगड़ पर निप्पल तन जाते। जाँघों के बीच की नमी नहाते समय भी पूरी तरह साफ नहीं हुई थी। उनकी आँखों में उलझन साफ थी—शर्म, इच्छा और एक नई सी स्वीकारोक्ति का मिश्रण।
प्रिया जब उतरकर आई तो उसकी चाल में फर्क था। कुर्ती का कपड़ा शरीर से चिपक रहा था। स्तन स्वतंत्र रूप से हिल रहे थे। आँखों में वह चमक थी जो रात की संतुष्टि के बाद आती है। वह सुमन के पास से गुजरी तो दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। सुमन ने प्रिया की गर्दन पर हल्की लालिमा देखी। प्रिया ने जल्दी से निगाहें फेर लीं, पर उसके होठों पर एक छोटी सी सिहरन रह गई।
आंचल सबसे बाद में आई। उसने ढीली फ्रॉक पहन रखी थी। युवा स्तन कपड़े के अंदर सख्त थे। चलते समय उसकी जाँघें एक-दूसरे से रगड़ खा रही थीं। वह नाश्ते की मेज पर बैठती तो बार-बार अपनी स्थिति संभालती—जैसे शरीर अभी भी रात की गर्मी याद रख रहा हो। चाचा की ओर उसकी निगाह बार-बार उठती और झुक जाती।
नाश्ता चुपचाप हुआ। चाचा सामान्य बातें करते रहे—मौसम, बाजार, पुरानी यादें। पर उनकी निगाह हर औरत पर एक-एक करके रुकती। सुमन की साड़ी का सरकता पल्लू, प्रिया के तने हुए निप्पल, आंचल की बेचैन जाँघें—सब नोट कर रहे थे।
नाश्ते के बाद प्रिया कपड़े धोने के बहाने पीछे के आँगन में चली गई। आंचल बालकनी में किताब लेकर बैठ गई। आरव बाहर चला गया।
सुमन पूजा के कमरे में दीया जलाने गईं। तभी चाचा ने पीछे से आवाज दी, “दीदी, एक मिनट।”
सुमन मुड़ीं। चाचा गलियारे में खड़े थे। उन्होंने इशारे से अपने कमरे की तरफ बुलाया। सुमन का दिल तेज धड़कने लगा। वे धीरे-धीरे उनके कमरे तक गईं। चाचा ने दरवाजा बंद कर दिया। कुंडी लग गई।
कमरे में हल्की रोशनी थी। सुमन दीवार से सट गईं। साड़ी का पल्लू कंधे से सरक चुका था। स्तनों की भारी गोलाई साफ उभर रही थी।
चाचा पास आए। दूरी अब कुछ इंच की रह गई थी। “रात को आप आई थीं। बात अधूरी रह गई।”
सुमन ने निगाहें झुका लीं। “मैं… मैं सिर्फ बात करने आई थी।”
चाचा ने हाथ बढ़ाया। उंगलियाँ सुमन के गाल पर रखीं। गर्म स्पर्श। सुमन की साँस रुक गई। फिर उंगलियाँ धीरे-धीरे नीचे सरकीं—गर्दन से होती हुई कॉलरबोन तक। साड़ी का आँचल और खिसक गया। एक स्तन का ऊपरी भाग बाहर आ गया। गोरा, मुलायम, निप्पल गुलाबी और तना हुआ।
चाचा ने उसे नहीं छुआ। बस पास से देखा। “यह शरीर अब छुपाने लायक नहीं रहा, दीदी। यह माँग कर रहा है।”
सुमन की आँखें बंद हो गईं। शरीर काँप रहा था। जाँघें सिकुड़ गईं। नमी ताजी हो उठी। चाचा का हाथ अब उनके कंधे पर था, फिर पीठ पर। उंगलियाँ कमर के मोड़ तक पहुँचीं। साड़ी का कपड़ा हल्के से दब गया।
“राजेश…” सुमन की आवाज टूटी हुई थी। “बस… यहीं तक।”
चाचा रुक गए। हाथ हटा लिया। “जैसा आप कहें।”
पर उन्होंने एक कदम और करीब आकर अपनी साँस सुमन के कान तक पहुँचाई। “अगली बार जब आओगी, तो सिर्फ बात के लिए नहीं आना।”
सुमन ने आँखें खोलीं। चेहरा लाल था। उन्होंने जल्दी से पल्लू ठीक किया और दरवाजा खोला। गलियारे में निकलते समय उनके पैर काँप रहे थे। स्तन भारी थे, निप्पल कपड़े से दर्द कर रहे थे। जाँघों के बीच गीलापन अब साफ महसूस हो रहा था।
वे अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया। साड़ी का आँचल पूरी तरह खोला। दोनों स्तन बाहर आ गए। उन्होंने उन्हें हाथों में लिया और जोर से दबाया। सिहरन कमर तक उतर गई। उंगलियाँ निप्पलों पर घूमने लगीं। आँखें बंद थीं। कल्पना में चाचा का हाथ अब स्तनों तक पहुँच चुका था। उन्होंने जाँघें खोल दीं। एक हाथ नीचे चला गया। नमी उंगलियों से चिपक रही थी। इस बार उन्होंने खुद को थोड़ा और आगे बढ़ने दिया—किनारे तक, फिर रुक गईं। साँसें उखड़ी हुई थीं। तकिया गीला हो चुका था।
बाहर बालकनी में आंचल ने माँ के कमरे का दरवाजा बंद होते देखा था। उसने किताब बंद कर दी। फ्रॉक के अंदर उसके युवा स्तन काँप रहे थे। उसने अपनी जाँघें भींच लीं। जिज्ञासा अब शरीर की गर्मी में बदल चुकी थी।
आँगन में प्रिया कपड़े धोते-धोते रुक गई। उसके मन में रात वाली संतुष्टि अभी भी तैर रही थी। उसने आसपास देखा, फिर एक हाथ से अपने स्तन को कुर्ती के ऊपर से दबाया। निप्पल तुरंत सख्त हो गया। मुस्कान हल्की सी फैल गई—जैसे कोई गुप्त जीत मिल गई हो।
घर अब पहले जैसा नहीं रहा था।
सुमन ने पहली बार बंद दरवाजे के पीछे स्पर्श को स्वीकार किया था।
प्रिया अपनी भूख को छुपा नहीं पा रही थी।
आंचल हर हलचल को नोट कर रही थी।
और चाचा अपने कमरे में खड़े थे। उंगलियों पर अभी भी सुमन की त्वचा की गर्माहट बाकी थी। वे जानते थे कि अगली दीवार अब गिरने वाली है।
रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। घर पूरी तरह सो चुका लग रहा था। पर तीन कमरों में आँखें खुली थीं।
प्रिया अपने बिस्तर पर beless लेटी नहीं रह सकी। शरीर जल रहा था। उसने हल्की सी नाइटी पहन रखी थी—पतली, सफेद, नीचे कुछ नहीं। स्तन पूरी तरह साफ झलक रहे थे। निप्पल तने हुए, गहरे गुलाबी। जाँघों के बीच पहले से गीलापन फैल चुका था। वह उठी और चुपके से गलियारे में निकली।
चाचा के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। प्रिया ने हल्के से ठोकर लगाई।
“चाचा…”
अंदर से आवाज आई, “आ जाओ।”
प्रिया घुसी और पीछे से दरवाजा बंद कर दिया। कुंडी लगा दी। कमरे में सिर्फ एक छोटी सी लाइट जल रही थी। चाचा बिस्तर पर बैठे थे। कमीज पूरी तरह खुली हुई थी। छाती के बाल, मजबूत पेट, और नीचे पैंट में उभरी हुई सख्ती साफ दिख रही थी।
प्रिया की साँस तेज हो गई। “मैं… सो नहीं पा रही। शरीर पागल हो रहा है।”
चाचा ने उसे पास बुलाया। प्रिया नजदीक गई। चाचा ने उसका हाथ पकड़ा और अपनी हथेली पर रखा। फिर धीरे-धीरे उसका हाथ अपनी छाती पर फेरने लगे। प्रिया की उंगलियाँ बालों में उलझ गईं। गर्म त्वचा।
“यहीं तक नहीं रहेगा,” चाचा ने धीमी आवाज में कहा। “तुम खुद बताओ, कहाँ तक ले जाना है।”
प्रिया का शरीर काँप रहा था। चाचा ने उसका हाथ छोड़ा और दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ ली। नाइटी ऊपर खिसक गई। नितंब नंगे हो गए। चाचा की उंगलियाँ गोल, मुलायम नितंबों पर फिरने लगीं। जोर से दबाया। प्रिया की एक हल्की कराह निकल गई।
फिर चाचा ने नाइटी और ऊपर की। दोनों स्तन बाहर आ गए—गोल, सख्त, निप्पल खड़े। चाचा ने एक स्तन को हाथ में लिया। भारी गोलाई को मसलने लगे। निप्पल को अंगूठे और उंगली से दबाया, ऐंठा। प्रिया की कमर लचक गई। जाँघें खुल गईं।
“आह… चाचा…” आवाज दबी हुई थी।
चाचा ने दूसरा स्तन भी पकड़ लिया। दोनों हाथों से मसल रहे थे, निप्पलों को खींच रहे थे। प्रिया की नाइटी कमर तक उलझी हुई थी। चाचा का एक हाथ नीचे गया। उंगलियाँ जाँघों के अंदर स्लाइड हुईं। गीलापन उंगलियों से चिपक गया। उन्होंने धीरे से एक उंगली अंदर धकेल दी।
प्रिया की आँखें बंद हो गईं। मुँह खुला। साँसें तेज। चाचा की उंगली अंदर-बाहर होने लगी। दूसरी उंगली भी अंदर चली गई। प्रिया की जाँघें काँप रही थीं। नितंब चाचा के हाथ में दब रहे थे। स्तन उनके चेहरे के करीब आ गए। चाचा ने एक निप्पल मुँह में ले लिया। जीभ घुमाने लगे, दाँतों से हल्के से काटने लगे।
प्रिया का शरीर ऐंठने लगा। “और… अंदर… जोर से…”
चाचा ने उंगलियाँ तेज कीं। अंगूठा ऊपर की संवेदनशील जगह पर रगड़ने लगा। प्रिया की कराहें दबाने के बावजूद निकल रही थीं। अचानक शरीर में तेज लहर दौड़ी। जाँघें चाचा के हाथ के आसपास कस गईं। अंदर की दीवारें उंगलियों को जकड़ रही थीं। पानी की तरह गीलापन बह निकला। प्रिया काँपते हुए चाचा के कंधे से लिपट गई।
बहुत देर तक दोनों वैसे ही रहे। प्रिया की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हुईं। चाचा ने उंगलियाँ निकालीं। वे चमक रही थीं। प्रिया ने शर्म से आँखें चुरा लीं, पर शरीर अभी भी काँप रहा था।
उसी समय सुमन अपने कमरे में खड़ी थीं। कान गलियारे की तरफ। प्रिया की दबी कराहें उन्हें साफ सुनाई दे रही थीं। “आह… चाचा… जोर से…”
सुमन की साड़ी का पल्लू अपने आप सरक गया। स्तन बाहर आ गए। उन्होंने एक स्तन को जोर से पकड़ लिया। निप्पल इतना सख्त था कि दर्द हो रहा था। दूसरा हाथ साड़ी के नीचे चला गया। उंगलियाँ गीलेपन में डूब गईं। प्रिया की कराहें सुनकर सुमन की उंगलियाँ तेज हो गईं। आँखें बंद। कल्पना में वही दृश्य—चाचा के हाथ, प्रिया के स्तन, उंगलियाँ अंदर। सुमन की कमर लचकने लगी। वह दीवार से सट गईं। मुँह पर हाथ रखा। शरीर में लहर दौड़ी। जाँघें काँप उठीं। नमी उनकी उंगलियों से नीचे टपकने लगी।
आंचल ने भी आवाजें सुन ली थीं। वह चुपके से गलियारे में आ गई। चाचा के कमरे के दरवाजे के पास खड़ी हो गई। अंदर से हल्की सी चरमराने की आवाज और प्रिया की भारी साँसें आ रही थीं। आंचल की फ्रॉक के अंदर युवा स्तन तन गए। उसने पैंटी के अंदर हाथ डाल दिया। उंगलियाँ घूमने लगीं। आँखें बंद करके वह कल्पना करने लगी—अंदर क्या हो रहा होगा। शरीर जल्दी ही काँप उठा। उसने मुँह दबा लिया। गीलापन उसकी उंगलियों पर फैल गया।
दरवाजे के अंदर प्रिया अभी भी चाचा के पास खड़ी थी। नाइटी कमर तक उलझी हुई। स्तन नंगे। जाँघों से नमी चमक रही थी। चाचा ने उसके निप्पल को फिर से हल्के से ऐंठा और कहा, “यह तो बस शुरुआत है। अगली बार और ले लूँगा।”
प्रिया ने कुछ नहीं कहा। बस काँपते हुए नाइटी ठीक की और दरवाजा खोला। गलियारे में आंचल जल्दी से अंधेरे में गायब हो गई। प्रिया अपने कमरे की तरफ चली गई। चाल लड़खड़ा रही थी।
सुमन अपने कमरे में वापस बिस्तर पर गिर गईं। शरीर ढीला। उंगलियाँ अभी भी गीली। आँखों में पानी था—उत्तेजना और जलन दोनों।
घर की दीवारें अब सिर्फ ईंट की नहीं रह गई थीं। वे साँसें, कराहें और गीलापन सोख रही थीं।
रात के दस बज रहे थे। घर फिर से शांत हो चुका था। आंचल अपने कमरे में किताब लेकर लेटी हुई थी, पर पन्ने पलट नहीं रही थी। प्रिया अपने कमरे का दरवाजा आधा खुला छोड़कर बैठी थी। मैं अपने कमरे की अंधेरे में खड़ा सुन रहा था।
सुमन पूजा के कमरे में थीं। उन्होंने लाल रंग की साड़ी पहन रखी थी—वही जो त्योहारों पर पहनती थीं। पल्लू सिर पर ढका हुआ था। सामने छोटी सी दीया जल रही थी। धुएँ की हल्की रेखा ऊपर उठ रही थी। वे हाथ जोड़कर बैठी थीं, होंठों पर मंत्र चल रहे थे। पर मन मंत्रों पर नहीं था।
हर साँस के साथ राजेश की आवाज याद आ रही थी—“जो अंदर जाग चुका है, वह भागने से नहीं सोएगा।”
उनके स्तन साड़ी के आँचल के नीचे भारी थे। निप्पल अभी भी सख्त थे, कपड़े से रगड़ खाकर संवेदनशील। जब वे झुककर दीया की बाती ठीक करतीं, तो स्तनों की गोलाई और उभर आती। जाँघों के बीच वह हल्की नमी रात भर बनी हुई थी। पूजा के आसन पर बैठे-बैठे उनकी कमर में एक अजीब सी बेचैनी फैल रही थी।
मंत्र अधूरा छोड़कर उन्होंने आँखें खोल दीं। दीया की रोशनी में उनकी छाया दीवार पर काँप रही थी। “भगवान… मुझे बचाओ,” उन्होंने फुसफुसाया। आवाज में प्रार्थना से ज्यादा हार थी।
उसी समय घर के दूसरे सिरे पर हलचल हुई।
प्रिया अपने कमरे से बाहर निकली। उसने हल्की सी चप्पल पहनी थी। सलवार-कमीज में शरीर की रेखाएँ साफ थीं—पतली कमर, उभरे नितंब, और स्तनों की युवा भारीपन। वह धीरे-धीरे गलियारे से गुजरी। चाचा के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। अंदर एक छोटी सी लाइट जल रही थी।
प्रिया ने दरवाजे के पास खड़े होकर आवाज दी, बहुत धीमी। “चाचा… आप जागे हुए हैं?”
अंदर से चाचा की गहरी आवाज आई। “हाँ। अंदर आ जाओ।”
प्रिया ने दरवाजा और खोला। कमरे में घुसते हुए उसकी साँस तेज हो गई। चाचा बिस्तर पर बैठे थे। कमीज के ऊपर के दो बटन खुले हुए थे। छाती के बाल हल्के से दिख रहे थे। प्रिया ने दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया। बस आधा रखा।
“मैं… सो नहीं पा रही,” प्रिया ने कहा। आवाज में संकोच था। “आपकी बातें… दिन भर दिमाग में घूम रही हैं。”
चाचा ने उसे कुर्सी की तरफ इशारा किया। “बैठो। कहो जो कहना है।”
प्रिया बैठ गई। सलवार का कपड़ा जाँघों पर तन गया। गोरी त्वचा की चमक लाइट में साफ थी। “मैं अपने आप को रोक नहीं पा रही। शरीर… माँग कर रहा है। पर डर भी लग रहा है।”
चाचा ने आगे झुककर कहा, “डर स्वाभाविक है। पर भूख भी। तुम बताओ—तुम्हें क्या चाहिए? सिर्फ बात? या कुछ और?”
प्रिया की उंगलियाँ सलवार के किनारे को मरोड़ रही थीं। स्तन तेजी से उठ-गिर रहे थे। “मुझे नहीं पता… बस यह अकेलापन खत्म हो जाए।”
चाचा ने हाथ बढ़ाया और उसकी हथेली पर अपनी हथेली रख दी। गर्म स्पर्श। प्रिया का शरीर सिहर उठा। उसने हाथ नहीं हटाया। उंगलियाँ एक-दूसरे में उलझ गईं।
उसी क्षण गलियारे में हल्के कदमों की आवाज आई।
आंचल अपने कमरे से निकली थी। पानी पीने के बहाने। उसने चाचा के कमरे का आधा खुला दरवाजा देखा। अंदर की रोशनी में प्रिया की पीठ और चाचा का हाथ उसकी हथेली पर दिख रहा था। आंचल की साँस रुक गई। वह दीवार से सट कर खड़ी हो गई। आँखें फटी की फटी।
उसने देखा—चाचा का दूसरा हाथ अब प्रिया के घुटने पर था। सलवार के ऊपर। उंगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर की तरफ सरक रही थीं। प्रिया की गर्दन पीछे झुक गई। होंठ खुले हुए थे। कोई चुप्पी थी, सिर्फ साँसों की आवाज।
आंचल का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी युवा स्तन फ्रॉक (उसने फिर से फ्रॉक पहन ली थी) के अंदर काँप रहे थे। जाँघों में एक अजीब सी गर्मी फैल गई। वह वहाँ से हटी नहीं। देखती रही।
पूजा वाले कमरे में सुमन अभी भी बैठी हुई थीं। दीया की बाती अब छोटी हो चुकी थी। अचानक उन्हें गलियारे से हल्की सी आवाज सुनाई दी—किसी के कमरे का दरवाजा हिलने की। उन्होंने कान तेज किए। कुछ स्पष्ट नहीं सुनाई दिया। पर मन में एक अजीब सा संदेह उठ खड़ा हुआ।
वे उठकर खड़ी हो गईं। साड़ी का पल्लू ठीक किया। दिल तेजी से धड़क रहा था—पूजा की शांति अब टूट चुकी थी। शरीर की बेचैनी और मन का संदेह दोनों एक साथ बढ़ रहे थे।
वे गलियारे की तरफ एक कदम बढ़ातीं कि अचानक प्रिया का कमरे से निकलने का हल्का सा शोर हुआ। दरवाजा बंद हुआ। फिर सन्नाटा।
सुमन वहीं रुक गईं। अंधेरे में खड़ी। उनके स्तन भारी साँस के कारण साड़ी के अंदर गति कर रहे थे। जाँघों के बीच नमी फिर से जाग उठी थी।
और इस बार उनके मन में एक नया प्रश्न था—
“क्या सिर्फ मैं ही नहीं…?”
दीया बुझ गई। अंधेरा गहरा हो गया। घर की हर दीवार अब कुछ छुपाए हुए लग रही थी।
दीया बुझने के बाद सुमन अपने कमरे में लौट आईं। साड़ी अभी भी पहने हुए थीं। उन्होंने दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर बैठ गईं। दिल की धड़कन तेज थी। गलियारे वाली आवाज उनके कानों में गूँज रही थी—दरवाजे का हिलना, फिर सन्नाटा।
“प्रिया…?” मन में सवाल उठा।
वे उठकर खड़ी हो गईं। आईने के सामने आकर पल्लू हटाया। स्तन साड़ी के आँचल से बाहर आ गए—भारी, गोरे, निप्पल अभी भी तने हुए। उन्होंने उन्हें दोनों हाथों से पकड़ा। उंगलियाँ गोलाई को कसकर दबा रही थीं। सिहरन कमर तक उतर गई। जाँघें खुल गईं। नमी अब चादर तक पहुँचने को थी।
“क्या वह भी…?” उन्होंने फुसफुसाया। आवाज में जलन थी—ईर्ष्या नहीं, बल्कि एक अजीब सी सहानुभूति और डर का मिश्रण। “क्या राजेश ने उसे भी छू लिया?”
उन्होंने हाथ हटाए। शर्म से चेहरा जल उठा। फिर से साड़ी ठीक की और बिस्तर पर लेट गईं। आँखें बंद कीं, पर नींद नहीं आई। हर बार पलक झपकते ही चाचा का चेहरा और प्रिया की पीठ दिखाई दे जाती।
उसी समय आंचल अपने कमरे में थी। उसने जो देखा था, वह आँखों के सामने घूम रहा था—चाचा का हाथ प्रिया के घुटने पर, उंगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर सरकती हुई, प्रिया की गर्दन का पीछे झुकना।
आंचल ने फ्रॉक उतार दी। सिर्फ पैंटी में रह गई। युवा स्तन हवा में तन गए—गोल, सख्त, निप्पल गुलाबी और खड़े। उसने आईने के सामने खड़े होकर उन्हें देखा। हाथ बढ़ाकर एक स्तन को सहलाया। सिहरन इतनी तेज थी कि उसकी कमर काँप गई।
“भाभी… और चाचा…” उसने फुसफुसाया। आवाज में डर नहीं, बल्कि एक नई सी उत्तेजना थी।
उसने पैंटी के अंदर उंगलियाँ डालीं। वहाँ पहले से गीलापन था। उंगलियाँ धीरे-धीरे घूमने लगीं। आँखें बंद हो गईं। कल्पना में वही दृश्य और तेज हो गया—चाचा का हाथ अब और ऊपर, प्रिया की सलवार खिसकती हुई, आवाजें दबती हुई। आंचल की साँसें तेज हो गईं। जाँघें काँपने लगीं। उसने मुँह पर दूसरा हाथ रख लिया ताकि आवाज बाहर न जाए।
बहुत देर तक वह अपने शरीर से खेलती रही। फिर अचानक रुक गई। आँखें खोलीं। चेहरे पर पसीना चमक रहा था। स्तन तेजी से उठ-गिर रहे थे। उसने पैंटी ठीक की और बिस्तर पर लेट गई। मन में एक सवाल बार-बार घूम रहा था—“क्या माँ भी…?”
प्रिया अपने कमरे में वापस आ चुकी थी। दरवाजा बंद करके उसने कमीज के बटन खोले। स्तन बाहर आ गए। चाचा का हाथ अभी भी उसकी हथेली और घुटने पर महसूस हो रहा था। उसने स्तनों को पकड़ा और जोर से दबाया। निप्पल उंगलियों में दब गए। एक हल्की सी कराह निकल गई।
“उन्होंने सिर्फ इतना छुआ… और मैं इतनी गीली हो गई,” उसने खुद से कहा।
सलवार खिसकाकर उसने उंगलियाँ नीचे ले गईं। वहाँ की गर्मी और नमी ने उसे और बेचैन कर दिया। वह बिस्तर पर लेट गई। एक हाथ स्तन पर, दूसरा जाँघों के बीच। आँखें बंद करके उसने चाचा की आवाज याद की—“तुम बताओ—तुम्हें क्या चाहिए?”
शरीर जवाब माँग रहा था। पर उसने खुद को रोक लिया। पूरी तरह नहीं खोला। सिर्फ किनारे तक गई और रुक गई। साँसें उखड़ी हुई थीं। चादर गीली हो चुकी थी।
घर के तीन अलग-अलग कमरों में तीन औरतें जाग रही थीं।
एक संस्कार और इच्छा के बीच पिस रही थी।
दूसरी स्पर्श की गर्मी से जल रही थी।
तीसरी पहली बार अपनी ही देह की आग से परिचित हो रही थी।
और बीच में चाचा अपने कमरे में शांत लेटे हुए थे। आँखें खुलीं। वे जानते थे कि आज की रात ने घर की हवा बदल दी है। दीवारें अब पहले जैसी मोटी नहीं रहीं।
सुबह दूर थी। पर इच्छा और करीब आ चुकी थी।
सुबह का उजाला धीरे-धीरे घर में फैल रहा था। सुमन की आँखें रात भर की बेचैनी से सूजी हुई थीं। उन्होंने साड़ी पहनी—आज काला रंग, पल्लू कसकर बाँधा हुआ, जैसे कोई दीवार खड़ी कर रही हों। स्तन आँचल के नीचे दबे थे, पर उनकी भारी गोलाई और निप्पलों की सख्ती कपड़े को धकेल रही थी। जाँघों के बीच की नमी रात भर बनी रही थी; सुबह नहाते समय भी वह पूरी तरह नहीं गई थी।
रसोई में उतरते ही उनकी निगाह प्रिया पर पड़ी। प्रिया कुर्ती में थी, बाल खुले, आँखों के नीचे हल्की छाया। दोनों की निगाहें मिलीं। एक पल के लिए सुमन ने प्रिया की आँखों में वह वही बेचैनी देखी जो रात को खुद महसूस कर रही थीं। प्रिया ने जल्दी से निगाहें झुका लीं और चाय बनाने लग गईं।
सुमन पास गईं। आवाज बहुत धीमी रखी, “रात को देर तक जागती रही?”
प्रिया के हाथ में चम्मच थम गई। “हाँ… नींद नहीं आई।”
सुमन ने और कुछ नहीं पूछा। बस प्रिया के गले की हल्की लालिमा और कुर्ती के खुले बटन पर एक पल के लिए निगाह दौड़ाई। स्तनों की युवा गोलाई साफ झलक रही थी। सुमन का मन और उलझ गया। संदेह अब पक्का होता जा रहा था।
आंचल बाद में आई। उसने साधारण सलवार-कमीज पहन रखी थी, पर कमीज का ऊपरी बटन खुला छोड़ दिया था। युवा स्तनों की सख्त गोलाई हर साँस के साथ हिल रही थी। वह नाश्ते की मेज पर बैठते ही चाचा की ओर देखने लगी। निगाह में वह जिज्ञासा थी जो रात को आईने के सामने जाग चुकी थी। चाचा ने उसकी ओर देखा, पर कुछ नहीं कहा। बस हल्की सी मुस्कान दी—वही शांत, समझने वाली मुस्कान।
नाश्ता खत्म होने के बाद घर में काम का बहाना चल पड़ा। प्रिया कपड़े सुखाने छत पर चली गईं। आंचल किताब लेकर बालकनी में बैठ गई। आरव अपने कमरे में चला गया।
सुमन रसोई में बर्तन धो रही थीं कि चाचा अंदर आ गए। दरवाजा उन्होंने आधा ही बंद किया। दूरी कम थी। रसोई की गर्मी में सुमन की गर्दन पर पसीना चमक रहा था। साड़ी का पल्लू कंधे से सरक चुका था। पीठ की चिकनी त्वचा और कमर का मोड़ साफ दिख रहा था।
चाचा ने पानी का गिलास उठाया। फिर धीरे से बोले, “दीदी, आप रात भर जागी हैं। आँखें बता रही हैं।”
सुमन ने बर्तन पर नजर रखी। “कुछ नहीं… बस नींद नहीं आई।”
चाचा एक कदम और करीब आए। उनकी आवाज और धीमी हो गई, “संदेह भी नींद नहीं आने देता। है ना?”
सुमन के हाथ रुक गए। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। चाचा बहुत नजदीक थे। उनकी साँस सुमन के गाल तक महसूस हो रही थी। स्तन भारी हो गए। निप्पल साड़ी के कपड़े से रगड़ खाकर और सख्त हो उठे। जाँघें अपने आप सिकुड़ गईं।
“आप… आप क्या कह रहे हैं?” सुमन की आवाज काँपी।
चाचा ने हाथ बढ़ाया। उंगलियाँ सुमन की कलाई पर रख दीं—वहीं जहाँ नसों की धड़कन तेज चल रही थी। “मैं कुछ नहीं कह रहा। आप खुद महसूस कर रही हैं। प्रिया की आँखों में जो देखा, वह आपने खुद में भी देखा है।”
सुमन ने हाथ खींचने की कोशिश की, पर चाचा ने हल्का सा दबाया। गर्म स्पर्श उनकी त्वचा में उतर गया। स्तनों में सिहरन दौड़ गई। नमी फिर से जाग उठी।
“यह गलत है, राजेश…” उन्होंने फुसफुसाया। “मैं आपकी भाभी हूँ।”
“और एक स्त्री भी,” चाचा ने उत्तर दिया। स्वर में कोई जल्दबाजी नहीं थी। “जो सालों से भूखी है। शरीर अब छुप नहीं रहा, दीदी। आप जब भी मेरे पास आती हैं, आपके निप्पल तन जाते हैं। साड़ी का पल्लू बार-बार सरकता है। जाँघें सिकुड़ती हैं। यह सब मैं देख रहा हूँ।”
सुमन की आँखें भर आईं। उन्होंने अपना हाथ छुड़ाया और पीछे हट गईं। पीठ दीवार से सट गई। साड़ी का आँचल पूरी तरह सरक चुका था। एक स्तन का ऊपरी भाग लगभग बाहर था—गोरा, भारी, निप्पल कपड़े के नीचे गुलाबी बिंदु की तरह तना हुआ।
चाचा ने आगे कदम नहीं बढ़ाया। बस खड़े रहे। “मैं जबरदस्ती नहीं करूँगा। जब आप खुद कहेंगी… तब।”
सुमन ने पल्लू जल्दी से ठीक किया। साँसें उखड़ी हुई थीं। वे रसोई से बाहर निकल गईं, पर उनके जाने के बाद भी शरीर की गर्मी रसोई में बनी रही।
बालकनी में आंचल यह सब आंशिक रूप से सुन चुकी थी। उसने किताब बंद कर दी। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। युवा स्तन कमीज के अंदर काँप रहे थे। उसने अपनी जाँघें भींच लीं। रात वाली गर्मी वापस आ गई थी।
छत पर प्रिया कपड़े टाँग रही थी। हवा में उसकी कुर्ती उड़ रही थी। स्तन स्वतंत्र रूप से हिल रहे थे। चाचा के कल वाले स्पर्श की याद आते ही उसकी उंगलियाँ रुक गईं। उसने आसपास देखा, फिर एक हाथ से अपने स्तन को हल्के से दबाया—जैसे कोई सबूत खोज रही हो कि वह गर्मी अभी भी बाकी है।
घर की तीनों औरतें अब एक ही अदृश्य धागे से बँध चुकी थीं।
सुमन की लड़ाई और गहरी हो गई थी।
प्रिया की भूख और साफ हो गई थी।
आंचल की जिज्ञासा अब खतरे के किनारे पर खड़ी थी।
और चाचा शांत खड़े थे—जैसे वे जानते हों कि अगला कदम अब किसी औरत का होगा, उनका नहीं।
रात के ग्यारह बज चुके थे। घर फिर से सन्नाटे में डूबा था। पंखे की मंद आवाज के अलावा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। सुमन अपने कमरे में बैठी हुई थीं। साड़ी उतारकर उन्होंने नाइटी पहन ली थी—ढीली सफेद, जो उनके भारी स्तनों की गोलाई को मुश्किल से ढक पा रही थी। निप्पल कपड़े के नीचे तने हुए बिंदुओं की तरह उभर रहे थे। जाँघें चादर पर फैली हुई थीं, उनके बीच की हल्की नमी अभी भी बाकी थी।
मन में वही संघर्ष चल रहा था। “सिर्फ बात करूँगी। बस इतना ही।”
वे उठ खड़ी हुईं। चप्पल नहीं पहनी। गलियारे में धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। चाचा के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। अंदर छोटी सी लाइट जल रही थी। सुमन ने दरवाजे पर हल्के से ठोकर लगाई।
“राजेश… जागे हुए हो?”
अंदर से गहरी आवाज आई, “हाँ, दीदी। आ जाओ।”
सुमन अंदर गईं। दरवाजा उन्होंने पूरी तरह बंद नहीं किया। चाचा बिस्तर पर बैठे थे। कमीज के बटन खुले हुए थे। छाती के बाल लाइट में चमक रहे थे। सुमन कुर्सी पर बैठ गईं। नाइटी का कपड़ा जाँघों पर तन गया। गोरी, मोटी जाँघें साफ दिख रही थीं।
“मैं… बात करना चाहती थी,” सुमन ने कहा। आवाज में संकोच था। “आज रसोई में जो कुछ हुआ… वह मेरे मन से नहीं उतर रहा।”
चाचा ने उन्हें देखा। निगाह में कोई जल्दबाजी नहीं थी। “कहकर देखो। जो भी है।”
सुमन की उंगलियाँ नाइटी के किनारे को मरोड़ रही थीं। स्तन तेजी से उठ-गिर रहे थे। “मैं डरती हूँ। अपने आप से। शरीर… मान नहीं रहा। जब आप पास होते हो तो… सब गड़बड़ हो जाता है।”
चाचा कुर्सी से उठे और उनके सामने खड़े हो गए। दूरी बहुत कम रह गई। “शरीर गड़बड़ नहीं कर रहा, दीदी। वह सिर्फ याद दिला रहा है कि वह अभी भी जीवित है। आप सालों से उसे चुप कराती रही हैं।”
सुमन ने आँखें उठाईं। चाचा की आँखें बहुत करीब थीं। उनकी साँस सुमन के होठों तक महसूस हो रही थी। एक पल के लिए सुमन का शरीर आगे बढ़ने को हुआ। स्तन लगभग छूने को थे। फिर उन्होंने खुद को रोक लिया।
“मैं जाऊँ,” उन्होंने फुसफुसाया और उठ खड़ी हुईं।
चाचा ने उनका हाथ पकड़ लिया—सिर्फ कलाई से। गर्म उंगलियाँ। सुमन की साँस अटक गई। निप्पल और सख्त हो गए। नाइटी के कपड़े में उनकी आकृति साफ उभर आई।
“जब तैयार हो, तब लौटना,” चाचा ने धीरे से कहा। हाथ छोड़ दिया।
सुमन कमरे से निकल गईं। गलियारे में उनका शरीर काँप रहा था। स्तन भारी थे, जाँघों के बीच नमी बढ़ चुकी थी। वे अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया और बिस्तर पर गिर गईं। हाथ अपने आप स्तनों पर चले गए। उंगलियाँ निप्पलों को दबा रही थीं। सिहरन इतनी तेज थी कि उन्होंने मुँह तकिए में दबा लिया।
उसी समय प्रिया अपने कमरे में थी। उसने कल वाले स्पर्श की गर्मी को बर्दाश्त नहीं किया। कमीज उतार दी। स्तन स्वतंत्र हो गए—गोल, सख्त, निप्पल तने हुए। उसने आईने के सामने खड़े होकर दोनों हाथों से उन्हें पकड़ा और जोर से दबाया। एक हल्की कराह निकल गई। फिर सलवार खिसकाई। उंगलियाँ नीचे चली गईं। वहाँ की गर्मी और गीलापन ने उसे काँप दिया।
इस बार उसने खुद को नहीं रोका। उंगलियाँ अंदर-बाहर होने लगीं। आँखें बंद थीं। कल्पना में चाचा का हाथ उसके घुटने से ऊपर सरक रहा था, फिर और ऊपर। साँसें तेज हो गईं। जाँघें काँपने लगीं। शरीर में एक लहर दौड़ी—पहली बार इतनी तीव्र। उसने मुँह पर हाथ रख लिया। आवाज दबा ली। चादर गीली हो गई।
बहुत देर बाद वह शांत हुई। शरीर ढीला पड़ गया। आँखों में पानी था—संतुष्टि और शर्म का मिश्रण।
आंचल ने यह सब आंशिक रूप से भाँप लिया था। वह अपने कमरे से निकली और गलियारे में चुपचाप खड़ी हो गई। चाचा के कमरे का दरवाजा अब बंद था। माँ का कमरा भी। प्रिया के कमरे से हल्की सी आवाजें आ रही थीं—साँसों की, फिर सन्नाटा।
आंचल का दिल जोर से धड़क रहा था। उसने अपने कमरे में वापस जाकर फ्रॉक उतार दी। सिर्फ पैंटी में रह गई। युवा स्तन हवा में तन गए। उसने एक हाथ से स्तन सहलाया, दूसरे हाथ से पैंटी के अंदर उंगलियाँ डालीं। रात वाला दृश्य आँखों के सामने घूम रहा था—चाचा का हाथ, प्रिया की गर्दन, माँ की काँपती आवाज। उंगलियाँ तेज घूमने लगीं। शरीर में गर्मी फैल गई। उसने खुद को रोकने की कोशिश नहीं की। पहली बार पूरा अनुभव लिया—काँपते हुए, मुँह दबाए हुए।
घर की तीनों औरतें उसी रात अपने-अपने कमरों में अपनी भूख से मिलीं।
सुमन ने सिर्फ छुआ।
प्रिया ने पहली बार खुद को पूरा खोला।
आंचल ने अपनी जिज्ञासा को शरीर तक पहुँचा दिया।
और चाचा अपने कमरे में जाग रहे थे। वे जानते थे कि आज की रात ने एक रेखा पार कर दी है। अगली बार कोई सिर्फ बात करने नहीं आएगा।
सुबह का उजाला इस बार भारी लग रहा था। घर की हवा में एक अजीब सी नमी तैर रही थी—जैसे रात की घटनाएँ दीवारों में समा गई हों।
सुमन रसोई में थीं। साड़ी आज हल्के गुलाबी रंग की थी। पल्लू ढीला छोड़ रखा था। स्तन आँचल के नीचे भारी और संवेदनशील थे; हर हल्की रगड़ पर निप्पल तन जाते। जाँघों के बीच की नमी नहाते समय भी पूरी तरह साफ नहीं हुई थी। उनकी आँखों में उलझन साफ थी—शर्म, इच्छा और एक नई सी स्वीकारोक्ति का मिश्रण।
प्रिया जब उतरकर आई तो उसकी चाल में फर्क था। कुर्ती का कपड़ा शरीर से चिपक रहा था। स्तन स्वतंत्र रूप से हिल रहे थे। आँखों में वह चमक थी जो रात की संतुष्टि के बाद आती है। वह सुमन के पास से गुजरी तो दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। सुमन ने प्रिया की गर्दन पर हल्की लालिमा देखी। प्रिया ने जल्दी से निगाहें फेर लीं, पर उसके होठों पर एक छोटी सी सिहरन रह गई।
आंचल सबसे बाद में आई। उसने ढीली फ्रॉक पहन रखी थी। युवा स्तन कपड़े के अंदर सख्त थे। चलते समय उसकी जाँघें एक-दूसरे से रगड़ खा रही थीं। वह नाश्ते की मेज पर बैठती तो बार-बार अपनी स्थिति संभालती—जैसे शरीर अभी भी रात की गर्मी याद रख रहा हो। चाचा की ओर उसकी निगाह बार-बार उठती और झुक जाती।
नाश्ता चुपचाप हुआ। चाचा सामान्य बातें करते रहे—मौसम, बाजार, पुरानी यादें। पर उनकी निगाह हर औरत पर एक-एक करके रुकती। सुमन की साड़ी का सरकता पल्लू, प्रिया के तने हुए निप्पल, आंचल की बेचैन जाँघें—सब नोट कर रहे थे।
नाश्ते के बाद प्रिया कपड़े धोने के बहाने पीछे के आँगन में चली गई। आंचल बालकनी में किताब लेकर बैठ गई। आरव बाहर चला गया।
सुमन पूजा के कमरे में दीया जलाने गईं। तभी चाचा ने पीछे से आवाज दी, “दीदी, एक मिनट।”
सुमन मुड़ीं। चाचा गलियारे में खड़े थे। उन्होंने इशारे से अपने कमरे की तरफ बुलाया। सुमन का दिल तेज धड़कने लगा। वे धीरे-धीरे उनके कमरे तक गईं। चाचा ने दरवाजा बंद कर दिया। कुंडी लग गई।
कमरे में हल्की रोशनी थी। सुमन दीवार से सट गईं। साड़ी का पल्लू कंधे से सरक चुका था। स्तनों की भारी गोलाई साफ उभर रही थी।
चाचा पास आए। दूरी अब कुछ इंच की रह गई थी। “रात को आप आई थीं। बात अधूरी रह गई।”
सुमन ने निगाहें झुका लीं। “मैं… मैं सिर्फ बात करने आई थी।”
चाचा ने हाथ बढ़ाया। उंगलियाँ सुमन के गाल पर रखीं। गर्म स्पर्श। सुमन की साँस रुक गई। फिर उंगलियाँ धीरे-धीरे नीचे सरकीं—गर्दन से होती हुई कॉलरबोन तक। साड़ी का आँचल और खिसक गया। एक स्तन का ऊपरी भाग बाहर आ गया। गोरा, मुलायम, निप्पल गुलाबी और तना हुआ।
चाचा ने उसे नहीं छुआ। बस पास से देखा। “यह शरीर अब छुपाने लायक नहीं रहा, दीदी। यह माँग कर रहा है।”
सुमन की आँखें बंद हो गईं। शरीर काँप रहा था। जाँघें सिकुड़ गईं। नमी ताजी हो उठी। चाचा का हाथ अब उनके कंधे पर था, फिर पीठ पर। उंगलियाँ कमर के मोड़ तक पहुँचीं। साड़ी का कपड़ा हल्के से दब गया।
“राजेश…” सुमन की आवाज टूटी हुई थी। “बस… यहीं तक।”
चाचा रुक गए। हाथ हटा लिया। “जैसा आप कहें।”
पर उन्होंने एक कदम और करीब आकर अपनी साँस सुमन के कान तक पहुँचाई। “अगली बार जब आओगी, तो सिर्फ बात के लिए नहीं आना।”
सुमन ने आँखें खोलीं। चेहरा लाल था। उन्होंने जल्दी से पल्लू ठीक किया और दरवाजा खोला। गलियारे में निकलते समय उनके पैर काँप रहे थे। स्तन भारी थे, निप्पल कपड़े से दर्द कर रहे थे। जाँघों के बीच गीलापन अब साफ महसूस हो रहा था।
वे अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया। साड़ी का आँचल पूरी तरह खोला। दोनों स्तन बाहर आ गए। उन्होंने उन्हें हाथों में लिया और जोर से दबाया। सिहरन कमर तक उतर गई। उंगलियाँ निप्पलों पर घूमने लगीं। आँखें बंद थीं। कल्पना में चाचा का हाथ अब स्तनों तक पहुँच चुका था। उन्होंने जाँघें खोल दीं। एक हाथ नीचे चला गया। नमी उंगलियों से चिपक रही थी। इस बार उन्होंने खुद को थोड़ा और आगे बढ़ने दिया—किनारे तक, फिर रुक गईं। साँसें उखड़ी हुई थीं। तकिया गीला हो चुका था।
बाहर बालकनी में आंचल ने माँ के कमरे का दरवाजा बंद होते देखा था। उसने किताब बंद कर दी। फ्रॉक के अंदर उसके युवा स्तन काँप रहे थे। उसने अपनी जाँघें भींच लीं। जिज्ञासा अब शरीर की गर्मी में बदल चुकी थी।
आँगन में प्रिया कपड़े धोते-धोते रुक गई। उसके मन में रात वाली संतुष्टि अभी भी तैर रही थी। उसने आसपास देखा, फिर एक हाथ से अपने स्तन को कुर्ती के ऊपर से दबाया। निप्पल तुरंत सख्त हो गया। मुस्कान हल्की सी फैल गई—जैसे कोई गुप्त जीत मिल गई हो।
घर अब पहले जैसा नहीं रहा था।
सुमन ने पहली बार बंद दरवाजे के पीछे स्पर्श को स्वीकार किया था।
प्रिया अपनी भूख को छुपा नहीं पा रही थी।
आंचल हर हलचल को नोट कर रही थी।
और चाचा अपने कमरे में खड़े थे। उंगलियों पर अभी भी सुमन की त्वचा की गर्माहट बाकी थी। वे जानते थे कि अगली दीवार अब गिरने वाली है।
रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। घर पूरी तरह सो चुका लग रहा था। पर तीन कमरों में आँखें खुली थीं।
प्रिया अपने बिस्तर पर beless लेटी नहीं रह सकी। शरीर जल रहा था। उसने हल्की सी नाइटी पहन रखी थी—पतली, सफेद, नीचे कुछ नहीं। स्तन पूरी तरह साफ झलक रहे थे। निप्पल तने हुए, गहरे गुलाबी। जाँघों के बीच पहले से गीलापन फैल चुका था। वह उठी और चुपके से गलियारे में निकली।
चाचा के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। प्रिया ने हल्के से ठोकर लगाई।
“चाचा…”
अंदर से आवाज आई, “आ जाओ।”
प्रिया घुसी और पीछे से दरवाजा बंद कर दिया। कुंडी लगा दी। कमरे में सिर्फ एक छोटी सी लाइट जल रही थी। चाचा बिस्तर पर बैठे थे। कमीज पूरी तरह खुली हुई थी। छाती के बाल, मजबूत पेट, और नीचे पैंट में उभरी हुई सख्ती साफ दिख रही थी।
प्रिया की साँस तेज हो गई। “मैं… सो नहीं पा रही। शरीर पागल हो रहा है।”
चाचा ने उसे पास बुलाया। प्रिया नजदीक गई। चाचा ने उसका हाथ पकड़ा और अपनी हथेली पर रखा। फिर धीरे-धीरे उसका हाथ अपनी छाती पर फेरने लगे। प्रिया की उंगलियाँ बालों में उलझ गईं। गर्म त्वचा।
“यहीं तक नहीं रहेगा,” चाचा ने धीमी आवाज में कहा। “तुम खुद बताओ, कहाँ तक ले जाना है।”
प्रिया का शरीर काँप रहा था। चाचा ने उसका हाथ छोड़ा और दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ ली। नाइटी ऊपर खिसक गई। नितंब नंगे हो गए। चाचा की उंगलियाँ गोल, मुलायम नितंबों पर फिरने लगीं। जोर से दबाया। प्रिया की एक हल्की कराह निकल गई।
फिर चाचा ने नाइटी और ऊपर की। दोनों स्तन बाहर आ गए—गोल, सख्त, निप्पल खड़े। चाचा ने एक स्तन को हाथ में लिया। भारी गोलाई को मसलने लगे। निप्पल को अंगूठे और उंगली से दबाया, ऐंठा। प्रिया की कमर लचक गई। जाँघें खुल गईं।
“आह… चाचा…” आवाज दबी हुई थी।
चाचा ने दूसरा स्तन भी पकड़ लिया। दोनों हाथों से मसल रहे थे, निप्पलों को खींच रहे थे। प्रिया की नाइटी कमर तक उलझी हुई थी। चाचा का एक हाथ नीचे गया। उंगलियाँ जाँघों के अंदर स्लाइड हुईं। गीलापन उंगलियों से चिपक गया। उन्होंने धीरे से एक उंगली अंदर धकेल दी।
प्रिया की आँखें बंद हो गईं। मुँह खुला। साँसें तेज। चाचा की उंगली अंदर-बाहर होने लगी। दूसरी उंगली भी अंदर चली गई। प्रिया की जाँघें काँप रही थीं। नितंब चाचा के हाथ में दब रहे थे। स्तन उनके चेहरे के करीब आ गए। चाचा ने एक निप्पल मुँह में ले लिया। जीभ घुमाने लगे, दाँतों से हल्के से काटने लगे।
प्रिया का शरीर ऐंठने लगा। “और… अंदर… जोर से…”
चाचा ने उंगलियाँ तेज कीं। अंगूठा ऊपर की संवेदनशील जगह पर रगड़ने लगा। प्रिया की कराहें दबाने के बावजूद निकल रही थीं। अचानक शरीर में तेज लहर दौड़ी। जाँघें चाचा के हाथ के आसपास कस गईं। अंदर की दीवारें उंगलियों को जकड़ रही थीं। पानी की तरह गीलापन बह निकला। प्रिया काँपते हुए चाचा के कंधे से लिपट गई।
बहुत देर तक दोनों वैसे ही रहे। प्रिया की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हुईं। चाचा ने उंगलियाँ निकालीं। वे चमक रही थीं। प्रिया ने शर्म से आँखें चुरा लीं, पर शरीर अभी भी काँप रहा था।
उसी समय सुमन अपने कमरे में खड़ी थीं। कान गलियारे की तरफ। प्रिया की दबी कराहें उन्हें साफ सुनाई दे रही थीं। “आह… चाचा… जोर से…”
सुमन की साड़ी का पल्लू अपने आप सरक गया। स्तन बाहर आ गए। उन्होंने एक स्तन को जोर से पकड़ लिया। निप्पल इतना सख्त था कि दर्द हो रहा था। दूसरा हाथ साड़ी के नीचे चला गया। उंगलियाँ गीलेपन में डूब गईं। प्रिया की कराहें सुनकर सुमन की उंगलियाँ तेज हो गईं। आँखें बंद। कल्पना में वही दृश्य—चाचा के हाथ, प्रिया के स्तन, उंगलियाँ अंदर। सुमन की कमर लचकने लगी। वह दीवार से सट गईं। मुँह पर हाथ रखा। शरीर में लहर दौड़ी। जाँघें काँप उठीं। नमी उनकी उंगलियों से नीचे टपकने लगी।
आंचल ने भी आवाजें सुन ली थीं। वह चुपके से गलियारे में आ गई। चाचा के कमरे के दरवाजे के पास खड़ी हो गई। अंदर से हल्की सी चरमराने की आवाज और प्रिया की भारी साँसें आ रही थीं। आंचल की फ्रॉक के अंदर युवा स्तन तन गए। उसने पैंटी के अंदर हाथ डाल दिया। उंगलियाँ घूमने लगीं। आँखें बंद करके वह कल्पना करने लगी—अंदर क्या हो रहा होगा। शरीर जल्दी ही काँप उठा। उसने मुँह दबा लिया। गीलापन उसकी उंगलियों पर फैल गया।
दरवाजे के अंदर प्रिया अभी भी चाचा के पास खड़ी थी। नाइटी कमर तक उलझी हुई। स्तन नंगे। जाँघों से नमी चमक रही थी। चाचा ने उसके निप्पल को फिर से हल्के से ऐंठा और कहा, “यह तो बस शुरुआत है। अगली बार और ले लूँगा।”
प्रिया ने कुछ नहीं कहा। बस काँपते हुए नाइटी ठीक की और दरवाजा खोला। गलियारे में आंचल जल्दी से अंधेरे में गायब हो गई। प्रिया अपने कमरे की तरफ चली गई। चाल लड़खड़ा रही थी।
सुमन अपने कमरे में वापस बिस्तर पर गिर गईं। शरीर ढीला। उंगलियाँ अभी भी गीली। आँखों में पानी था—उत्तेजना और जलन दोनों।
घर की दीवारें अब सिर्फ ईंट की नहीं रह गई थीं। वे साँसें, कराहें और गीलापन सोख रही थीं।
Fuckuguy
albertprince547;
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