27-08-2026, 11:41 AM
वह वाक्य उस छोटे से केबिन में किसी बम की तरह गिरा।
मैंने कोने में खड़े-खड़े अपनी साँस रोक ली। मेरे कानों में सिर्फ छत वाले पंखे की 'खट-खट' और मेरे दिल की जंगली धड़कनें सुनाई दे रही थीं। जो औरत घर में अपनी गर्दन तक का हिस्सा किसी को नहीं दिखने देती थी, जिसका पल्लू लोहे की सेफ्टी पिन से हमेशा सीने पर जड़ा रहता था, उसे आज एक अजनबी मर्द के सामने अपना शरीर खोलने का हुक्म दिया गया था।
मम्मी की आँखों में अचानक दर्द से भी बड़ी एक तिलमिलाहट और खौफ की लहर दौड़ गई। उनकी वह सती-सावित्री और अभेद्य छवि इस हुक्म के आगे बगावत कर रही थी। उन्होंने कांपते हुए, पसीने से भीगे अपने दोनों हाथों को कसकर अपनी छाती और गले पर रखे उस पल्लू पर जमा लिया। उनकी आँखें मुझे ढूँढ रही थीं—अपने रक्षक को, अपने बेटे को।
लेकिन मैं... मैं उस ट्यूबलाइट के साये में एक पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ा रहा। मैंने जानबूझकर अपनी नज़रें नीची कर लीं। मेरी खामोशी ने मेरी मम्मी को निहत्था कर दिया था।
जब मम्मी को अपनी रूढ़िवादी ढाल बचाने का कोई रास्ता नहीं दिखा और दर्द की एक नई भयंकर लहर ने उनके पेट में सूजे चुभाए, तो उनका वह तानाशाह गुरूर घुटने टेकने पर मजबूर हो गया।
उनके कांपते हुए हाथों की उंगलियां उस बड़ी सी स्टील की सेफ्टी पिन तक गईं। पूरे केबिन के सन्नाटे में... 'क्लिक'... वह पिन खुलने की हल्की सी धात्विक आवाज़ गूंजी। मेरे लिए वह आवाज़ दुनिया के सबसे बड़े किले के दरवाज़े टूटने जैसी थी।
उन्होंने झिझकते हुए, बंद आँखों के साथ, भारी मन से उस कड़क कलफ लगे पल्लू को किनारे सरकाया। फिर अपनी उँगलियों से अपनी साड़ी और पेटीकोट के नाड़े वाले हिस्से को हल्का सा नीचे की तरफ खिसकाया।
ट्यूबलाइट की तेज़, निर्दयी रोशनी में उनका गोरा, बिल्कुल बेदाग और दूधिया पेट अचानक पूरी तरह से नंगा हो गया। उनके उस सख्त, रूढ़िवादी लिबास के नीचे छिपकर रहने वाला वह अछूता हिस्सा अब उस केबिन की हवा में बेबस होकर कांप रहा था। साँस लेने के साथ उनका वह नरम, गोरा पेट ऊपर-नीचे हो रहा था।
मैंने विक्रम की तरफ देखा। उसकी नज़रें बीमारी या इलाज पर नहीं थीं। उसकी आँखों की पुतलियाँ चौड़ी हो गई थीं और उसकी गिद्ध जैसी नज़रों में हवस का एक गाढ़ा, चिपचिपा सा अंधकार छा गया था। उसने धीरे से अपना सूखा थूक गटका। उसकी साँसें अचानक तेज़ और भारी हो गई थीं। एक 39 साल की बेहद खूबसूरत, और खुद को हमेशा ढक कर रखने वाली औरत का यह अनावृत रूप उसके लिए किसी दावत से कम नहीं था।
फिर... विक्रम ने अपना दायां हाथ आगे बढ़ाया।
जैसे ही उसकी लंबी, खुरदरी और ठंडी उँगलियों ने मम्मी के उस दूधिया, गर्म पेट को छुआ... मम्मी के पूरे शरीर में करंट सी एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने अपनी आँखें भींच लीं और उनके होंठ कस गए।
विक्रम ने अपने हाथ को उनके पेट के अलग-अलग हिस्सों पर दबाना शुरू किया। तकनीकी रूप से वह लीवर और आंतों की सूजन चेक कर रहा था, लेकिन उसके स्पर्श का तरीका बिल्कुल भी पेशेवर नहीं था। उसकी उँगलियाँ ज़रूरत से ज़्यादा धीरे, ज़रूरत से ज़्यादा गहराई तक और ज़रूरत से ज़्यादा देर तक मम्मी के उस नरम गोरे पेट पर रगड़ खा रही थीं।
उसने अपना स्टेथोस्कोप का ठंडा धात्विक सिरा मम्मी की नाभि के ठीक ऊपर रखा। उसकी नज़रें मम्मी के चेहरे पर नहीं थीं, वे किसी भूखे जानवर की तरह लगातार उनके उस खुले हुए पेट पर चिपकी हुई थीं। वह अपनी नज़रों से उन्हें चाट रहा था, उनके उस पवित्र गुरूर को अपनी हवस भरी आँखों तले कुचल रहा था।
और मैं?
मैं उस केबिन के अंधेरे कोने में अपनी पसीने से चिपचिपी मुट्ठियों को भींचे खड़ा था। एक बेटे के तौर पर मुझे उस डॉक्टर का गला पकड़ लेना चाहिए था, लेकिन इसके उलट... मेरी रगों में एक ज़हरीली, डरावनी और वर्जित उत्तेजना का लावा उबल रहा था।
मेरी अपनी तानाशाह मम्मी, जिनकी कड़क आवाज़ से पूरा घर थरथराता था, आज मेरे ही सामने एक झोलेछाप हवसी डॉक्टर के गंदे हाथों और भूखी नज़रों के नीचे एक बेबस, लाचार शिकार बनी पड़ी थीं। मैं अपनी इसी मनोवैज्ञानिक बगावत, इसी 'ककल्ड' जीत को महसूस कर रहा था, जो शर्मनाक होने के बावजूद मुझे एक अजीब सी, घुटन भरी विकृत संतुष्टि दे रही थी। वह दीवार टूट चुकी थी, और मैं उस मलबे के सामने खड़ा अपना तमाशा देख रहा था।
केबिन की उस घुटन भरी हवा में समय जैसे जम सा गया था। डॉ. विक्रम की उंगलियाँ मम्मी के गोरे, पसीने से चमकते हुए पेट पर अब एक क्रूर और धीमी लय में घूम रही थीं। उसकी आँखों की वह चिपचिपी, भूखी चमक उस तेज़ सफेद ट्यूबलाइट में और भी भयानक लग रही थी।
"यहाँ दर्द है?" विक्रम ने अपनी आवाज़ को भारी और अधिकारपूर्ण बनाते हुए पूछा। उसने अपने अँगूठे और उँगलियों से मम्मी की नाभि के ठीक नीचे, पेटीकोट के नाड़े के ठीक किनारे वाले हिस्से को गहराई से दबाया।
मम्मी के मुँह से एक दबी हुई, सिसकती हुई कराह निकल गई— "आह्ह... ह..हाँ।"
यह कराह सिर्फ उस शारीरिक दर्द की नहीं थी। यह उस असहज, अवांछित स्पर्श की चुभन थी। डॉ. विक्रम की उँगलियाँ ज़रूरत से ज़्यादा नीचे, उनकी साड़ी की सरहद तक पहुँच गई थीं। मम्मी का पूरा शरीर एक कमान की तरह तन गया था। उन्होंने अपने होठों को इतने ज़ोर से भींच लिया था कि उनका रंग सफेद पड़ गया था। उनके हाथ, जो अब तक अपने पल्लू को बचाने की कोशिश कर रहे थे, अब हार मानकर उस काली, खुरदरी रेक्सीन को खरोंच रहे थे।
विक्रम ने उस मेडिकल अधिकार का पूरा फायदा उठाया, जिसके आगे इंसान पूरी तरह निहत्था हो जाता है। उसने अपना दूसरा हाथ भी उनके पेट पर रख दिया। अब उसके दोनों खुरदरे, बड़े हाथ मम्मी के उस नाज़ुक, अछूते जिस्म को टटोल रहे थे। वह कभी दाईं तरफ दबाता, कभी बाईं तरफ, लेकिन हर बार उसके हाथ वापस नाभि के आस-पास आकर कुछ पलों के लिए रुक जाते। उसकी उँगलियों की पोरें मम्मी की त्वचा पर सिर्फ दबाव नहीं डाल रही थीं, बल्कि उसे सहला रही थीं।
उस छोटे से केबिन में सिर्फ तीन आवाज़ें गूँज रही थीं—छत के पंखे की 'चर्र-चर्र', मम्मी की उथली, कांपती हुई साँसों की 'हश-हश', और डॉ. विक्रम की भारी, उत्तेजित साँसें जो बिल्कुल मम्मी के चेहरे के करीब से आ रही थीं।
उसने अपना स्टेथोस्कोप फिर से लगाया। इस बार उसने स्टेथोस्कोप का ठंडा हिस्सा मम्मी के पेट के ऊपरी हिस्से, पसलियों के ठीक नीचे रखा। ऐसा करने के लिए उसे अपना पूरा शरीर मम्मी के ऊपर झुकाना पड़ा। विक्रम का चेहरा अब मम्मी के सीने और खुले पेट के बिल्कुल करीब था। मैं विक्रम के बालों से आती उस सस्ते, चमेली के तेल की तेज़ गंध को उस कोने तक महसूस कर सकता था।
मम्मी ने अपनी आँखें पूरी तरह से कसकर बंद कर ली थीं। उन्होंने अपना चेहरा दूसरी तरफ, दीवार की ओर मोड़ लिया था। वह इस सच्चाई का सामना ही नहीं करना चाहती थीं कि उनके साथ क्या हो रहा है। वह औरत, जिसकी एक घूरती हुई नज़र से घर में मेरे पिताजी की भी आवाज़ कांपने लगती थी, आज अपनी आँखें चुरा रही थी। वह इस गंदे, पसीने और स्पिरिट की बदबू वाले केबिन में एक झोलेछाप की हवस भरी नज़रों के नीचे अपनी उस अभेद्य, 'सती-सावित्री' छवि को टुकड़े-टुकड़े होते हुए चुपचाप सह रही थी।
उस अंधेरे कोने में खड़े होकर, मेरी साँसें मेरे गले में अटक गई थीं। मेरी आँखों के सामने मेरी ही रची हुई यह साज़िश अपने चरम पर थी।
विक्रम ने कुछ और सेकंड्स तक स्टेथोस्कोप को उनके पेट पर घुमाया। उसकी आँखें लगातार उनके शरीर के उस खुले हुए हिस्से का नज़ारा ले रही थीं, जैसे वह अपनी नज़रों से ही उस हिस्से को खा जाना चाहता हो। फिर, बहुत धीरे से, लगभग एक अनिच्छा के साथ, उसने अपना हाथ वहाँ से हटाया।
"हम्म..." विक्रम ने एक गहरी, संतुष्ट साँस छोड़ते हुए अपना स्टेथोस्कोप वापस गले में लटका लिया। उसने एक कदम पीछे लिया और मम्मी के शरीर से अपनी वह चिपचिपी नज़र हटाकर मेरी तरफ देखा। "आंतों में काफी तेज़ ऐंठन है और थोड़ा इन्फेक्शन भी लग रहा है। घबराने की बात नहीं है।"
जैसे ही विक्रम ने अपना हाथ हटाया, मम्मी ने बिना एक सेकंड की देरी किए, लगभग कांपते हुए हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू खींचा और अपने पेट को तुरंत ढक लिया। उन्होंने उसे इतनी ज़ोर से पकड़ा, जैसे कोई डूबता हुआ इंसान किसी लकड़ी को पकड़ता है। उनके चेहरे पर अभी भी वह अपमान और बेबसी की कालिख पुती हुई थी, जिसे उन्होंने दर्द की आड़ में छुपाने की नाकाम कोशिश की थी।
मैं अभी भी अपनी जगह पर बुत बना खड़ा था। एक अजीब सा, स्याह सन्नाटा मेरे अंदर पसर गया था। विक्रम ने बिना छुए, सिर्फ अपनी मेडिकल हैसियत और भूखी नज़रों से मेरी मम्मी के गुरूर को कुचल दिया था। और मैं, उनका बेटा, उनका रक्षक, इस पूरी प्रक्रिया में विक्रम का मूक सहयोगी बन गया था।
उस क्षण, अपनी मम्मी को वापस अपने कपड़े ठीक करते और दर्द से कराहते हुए देखकर, मुझे अपने अंदर एक बहुत गहरी, डरावनी और हीन भावना महसूस हुई। मैं अब सिर्फ एक बेटा नहीं रह गया था, मैं पूरी तरह से उस 'ककल्ड' मानसिकता का हिस्सा बन चुका था—एक कमज़ोर दर्शक, जिसने अपने ही घर की तानाशाह को किसी और के सामने घुटने टेकते देखने के लिए, अपनी नैतिकता और ज़मीर का हमेशा के लिए कत्ल कर दिया था।
अगले दिन की सुबह बिल्कुल वैसी ही शुरू हुई, जैसी मेरे घर में हमेशा से होती आई थी।
सूरज की किरणें घर के आंगन में पड़ने से पहले ही, रसोई से प्रेशर कुकर की तेज़ सीटी और बर्तनों के खटकने की जानी-पहचानी आवाज़ें गूँजने लगी थीं। मैं बिस्तर पर लेटा हुआ सुन रहा था। तभी मुझे कदमों की वही भारी, नपी-तुली 'खट-खट' सुनाई दी।
मैं धीरे से उठकर कमरे के दरवाज़े पर आया। मैंने देखा, मम्मी आंगन में खड़ी थीं। उनके शरीर पर वही सूती साड़ी थी, जिस पर कलफ इतनी कड़क थी कि हवा भी शायद उससे टकराकर मुड़ जाती। पल्लू उनके गले तक बिल्कुल उसी लोहे की सेफ्टी पिन से निर्दयता से कसा हुआ था। उनके चेहरे का रंग फिर से दमक रहा था और उनकी आँखों में वही बर्फ जैसी चुभने वाली सख्ती वापस लौट आई थी।
पिताजी चुपचाप सिर झुकाए चाय पी रहे थे।
"दवा खा ली तुमने, अनीता?" पिताजी ने डरते-डरते पूछा।
"हाँ... खा ली। तुम चाय पीकर जल्दी दफ्तर निकलो, फालतू के सवाल मत करो," मम्मी ने एक कड़क, अधिकारपूर्ण आवाज़ में कहा, जो पूरे घर के सन्नाटे को चीर गई।
वह वापस उसी अजेय, सती-सावित्री और तानाशाह वाले खोल में लौट आई थीं। बाहर से देखने पर वह फिर से वही औरत थीं, जिसके गुरूर को कोई छू तक नहीं सकता था। कोई नहीं कह सकता था कि कल दोपहर यही औरत एक छोटे से क्लिनिक की काली रेक्सीन वाली बेड पर, दर्द और बेबसी के मारे सिसक रही थी।
लेकिन मैं... मैं उस कमरे के दरवाज़े पर खड़ा, उन्हें देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहा था।
पहले, उनकी इस कड़क आवाज़ और सख्त रवैये से मेरे सीने में घुटन होती थी, मुझे गुस्सा आता था। लेकिन आज, उनकी यह आवाज़ मेरे कानों में एक हारी हुई धुन की तरह बज रही थी। मैं उनके चेहरे को देख रहा था, लेकिन मेरी आँखों के सामने वह दृश्य आ रहा था जब उन्होंने कांपते हुए हाथों से इसी साड़ी के पल्लू को खोला था। मैं उनके उस ढके हुए सीने और गले को देख रहा था, लेकिन मेरे दिमाग में डॉ. विक्रम के वे हवस भरे, खुरदरे हाथ उनके गोरे, अनावृत पेट को टटोल रहे थे।
उनकी यह सख्ती अब मुझे डराती नहीं थी; बल्कि यह मुझे उस गहरे, डार्क राज़ की याद दिलाती थी, जो सिर्फ मुझे पता था। मैं उनकी इस झूठी नैतिकता और ढोंग के पीछे की बेबसी का चश्मदीद गवाह था।
दवाइयों से मम्मी का पेट दर्द काफी हद तक ठीक हो गया था, लेकिन तीन दिन बाद वह दर्द फिर से एक हल्की चुभन बनकर लौट आया। शाम का समय था और मैं कॉलेज से वापस आ चुका था।
मम्मी अपने कमरे में बिस्तर के किनारे बैठी थीं और उनके चेहरे पर एक हल्की सी सिकुड़न थी। उन्होंने अपना हाथ अपने पेट के बाईं ओर रखा हुआ था।
"क्या हुआ मम्मी? दर्द फिर से उठ रहा है क्या?" मैंने पास जाकर पूछा। मेरी आवाज़ में वही बनावटी चिंता थी, जो अब मेरा सबसे बड़ा हथियार बन चुकी थी।
उन्होंने एक गहरी साँस ली और अपना चेहरा थोड़ा घुमाते हुए बोलीं, "पता नहीं... थोड़ी सी चुभन है। शायद गैस होगी। मैं अजवायन खा लूंगी।"
उनकी आवाज़ में दर्द से ज़्यादा एक खौफ था—डॉ. विक्रम के पास वापस जाने का खौफ। वह उस सीलन भरे क्लिनिक, उस काली रेक्सीन वाले बेड और विक्रम के उस असहज करने वाले स्पर्श को दोबारा नहीं झेलना चाहती थीं। उन्होंने अपनी नैतिकता के गुरूर को एक बार दांव पर लगा दिया था, लेकिन वह दोबारा उस ज़हर को नहीं पीना चाहती थीं।
मैंने कोने में खड़े-खड़े अपनी साँस रोक ली। मेरे कानों में सिर्फ छत वाले पंखे की 'खट-खट' और मेरे दिल की जंगली धड़कनें सुनाई दे रही थीं। जो औरत घर में अपनी गर्दन तक का हिस्सा किसी को नहीं दिखने देती थी, जिसका पल्लू लोहे की सेफ्टी पिन से हमेशा सीने पर जड़ा रहता था, उसे आज एक अजनबी मर्द के सामने अपना शरीर खोलने का हुक्म दिया गया था।
मम्मी की आँखों में अचानक दर्द से भी बड़ी एक तिलमिलाहट और खौफ की लहर दौड़ गई। उनकी वह सती-सावित्री और अभेद्य छवि इस हुक्म के आगे बगावत कर रही थी। उन्होंने कांपते हुए, पसीने से भीगे अपने दोनों हाथों को कसकर अपनी छाती और गले पर रखे उस पल्लू पर जमा लिया। उनकी आँखें मुझे ढूँढ रही थीं—अपने रक्षक को, अपने बेटे को।
लेकिन मैं... मैं उस ट्यूबलाइट के साये में एक पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ा रहा। मैंने जानबूझकर अपनी नज़रें नीची कर लीं। मेरी खामोशी ने मेरी मम्मी को निहत्था कर दिया था।
जब मम्मी को अपनी रूढ़िवादी ढाल बचाने का कोई रास्ता नहीं दिखा और दर्द की एक नई भयंकर लहर ने उनके पेट में सूजे चुभाए, तो उनका वह तानाशाह गुरूर घुटने टेकने पर मजबूर हो गया।
उनके कांपते हुए हाथों की उंगलियां उस बड़ी सी स्टील की सेफ्टी पिन तक गईं। पूरे केबिन के सन्नाटे में... 'क्लिक'... वह पिन खुलने की हल्की सी धात्विक आवाज़ गूंजी। मेरे लिए वह आवाज़ दुनिया के सबसे बड़े किले के दरवाज़े टूटने जैसी थी।
उन्होंने झिझकते हुए, बंद आँखों के साथ, भारी मन से उस कड़क कलफ लगे पल्लू को किनारे सरकाया। फिर अपनी उँगलियों से अपनी साड़ी और पेटीकोट के नाड़े वाले हिस्से को हल्का सा नीचे की तरफ खिसकाया।
ट्यूबलाइट की तेज़, निर्दयी रोशनी में उनका गोरा, बिल्कुल बेदाग और दूधिया पेट अचानक पूरी तरह से नंगा हो गया। उनके उस सख्त, रूढ़िवादी लिबास के नीचे छिपकर रहने वाला वह अछूता हिस्सा अब उस केबिन की हवा में बेबस होकर कांप रहा था। साँस लेने के साथ उनका वह नरम, गोरा पेट ऊपर-नीचे हो रहा था।
मैंने विक्रम की तरफ देखा। उसकी नज़रें बीमारी या इलाज पर नहीं थीं। उसकी आँखों की पुतलियाँ चौड़ी हो गई थीं और उसकी गिद्ध जैसी नज़रों में हवस का एक गाढ़ा, चिपचिपा सा अंधकार छा गया था। उसने धीरे से अपना सूखा थूक गटका। उसकी साँसें अचानक तेज़ और भारी हो गई थीं। एक 39 साल की बेहद खूबसूरत, और खुद को हमेशा ढक कर रखने वाली औरत का यह अनावृत रूप उसके लिए किसी दावत से कम नहीं था।
फिर... विक्रम ने अपना दायां हाथ आगे बढ़ाया।
जैसे ही उसकी लंबी, खुरदरी और ठंडी उँगलियों ने मम्मी के उस दूधिया, गर्म पेट को छुआ... मम्मी के पूरे शरीर में करंट सी एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने अपनी आँखें भींच लीं और उनके होंठ कस गए।
विक्रम ने अपने हाथ को उनके पेट के अलग-अलग हिस्सों पर दबाना शुरू किया। तकनीकी रूप से वह लीवर और आंतों की सूजन चेक कर रहा था, लेकिन उसके स्पर्श का तरीका बिल्कुल भी पेशेवर नहीं था। उसकी उँगलियाँ ज़रूरत से ज़्यादा धीरे, ज़रूरत से ज़्यादा गहराई तक और ज़रूरत से ज़्यादा देर तक मम्मी के उस नरम गोरे पेट पर रगड़ खा रही थीं।
उसने अपना स्टेथोस्कोप का ठंडा धात्विक सिरा मम्मी की नाभि के ठीक ऊपर रखा। उसकी नज़रें मम्मी के चेहरे पर नहीं थीं, वे किसी भूखे जानवर की तरह लगातार उनके उस खुले हुए पेट पर चिपकी हुई थीं। वह अपनी नज़रों से उन्हें चाट रहा था, उनके उस पवित्र गुरूर को अपनी हवस भरी आँखों तले कुचल रहा था।
और मैं?
मैं उस केबिन के अंधेरे कोने में अपनी पसीने से चिपचिपी मुट्ठियों को भींचे खड़ा था। एक बेटे के तौर पर मुझे उस डॉक्टर का गला पकड़ लेना चाहिए था, लेकिन इसके उलट... मेरी रगों में एक ज़हरीली, डरावनी और वर्जित उत्तेजना का लावा उबल रहा था।
मेरी अपनी तानाशाह मम्मी, जिनकी कड़क आवाज़ से पूरा घर थरथराता था, आज मेरे ही सामने एक झोलेछाप हवसी डॉक्टर के गंदे हाथों और भूखी नज़रों के नीचे एक बेबस, लाचार शिकार बनी पड़ी थीं। मैं अपनी इसी मनोवैज्ञानिक बगावत, इसी 'ककल्ड' जीत को महसूस कर रहा था, जो शर्मनाक होने के बावजूद मुझे एक अजीब सी, घुटन भरी विकृत संतुष्टि दे रही थी। वह दीवार टूट चुकी थी, और मैं उस मलबे के सामने खड़ा अपना तमाशा देख रहा था।
केबिन की उस घुटन भरी हवा में समय जैसे जम सा गया था। डॉ. विक्रम की उंगलियाँ मम्मी के गोरे, पसीने से चमकते हुए पेट पर अब एक क्रूर और धीमी लय में घूम रही थीं। उसकी आँखों की वह चिपचिपी, भूखी चमक उस तेज़ सफेद ट्यूबलाइट में और भी भयानक लग रही थी।
"यहाँ दर्द है?" विक्रम ने अपनी आवाज़ को भारी और अधिकारपूर्ण बनाते हुए पूछा। उसने अपने अँगूठे और उँगलियों से मम्मी की नाभि के ठीक नीचे, पेटीकोट के नाड़े के ठीक किनारे वाले हिस्से को गहराई से दबाया।
मम्मी के मुँह से एक दबी हुई, सिसकती हुई कराह निकल गई— "आह्ह... ह..हाँ।"
यह कराह सिर्फ उस शारीरिक दर्द की नहीं थी। यह उस असहज, अवांछित स्पर्श की चुभन थी। डॉ. विक्रम की उँगलियाँ ज़रूरत से ज़्यादा नीचे, उनकी साड़ी की सरहद तक पहुँच गई थीं। मम्मी का पूरा शरीर एक कमान की तरह तन गया था। उन्होंने अपने होठों को इतने ज़ोर से भींच लिया था कि उनका रंग सफेद पड़ गया था। उनके हाथ, जो अब तक अपने पल्लू को बचाने की कोशिश कर रहे थे, अब हार मानकर उस काली, खुरदरी रेक्सीन को खरोंच रहे थे।
विक्रम ने उस मेडिकल अधिकार का पूरा फायदा उठाया, जिसके आगे इंसान पूरी तरह निहत्था हो जाता है। उसने अपना दूसरा हाथ भी उनके पेट पर रख दिया। अब उसके दोनों खुरदरे, बड़े हाथ मम्मी के उस नाज़ुक, अछूते जिस्म को टटोल रहे थे। वह कभी दाईं तरफ दबाता, कभी बाईं तरफ, लेकिन हर बार उसके हाथ वापस नाभि के आस-पास आकर कुछ पलों के लिए रुक जाते। उसकी उँगलियों की पोरें मम्मी की त्वचा पर सिर्फ दबाव नहीं डाल रही थीं, बल्कि उसे सहला रही थीं।
उस छोटे से केबिन में सिर्फ तीन आवाज़ें गूँज रही थीं—छत के पंखे की 'चर्र-चर्र', मम्मी की उथली, कांपती हुई साँसों की 'हश-हश', और डॉ. विक्रम की भारी, उत्तेजित साँसें जो बिल्कुल मम्मी के चेहरे के करीब से आ रही थीं।
उसने अपना स्टेथोस्कोप फिर से लगाया। इस बार उसने स्टेथोस्कोप का ठंडा हिस्सा मम्मी के पेट के ऊपरी हिस्से, पसलियों के ठीक नीचे रखा। ऐसा करने के लिए उसे अपना पूरा शरीर मम्मी के ऊपर झुकाना पड़ा। विक्रम का चेहरा अब मम्मी के सीने और खुले पेट के बिल्कुल करीब था। मैं विक्रम के बालों से आती उस सस्ते, चमेली के तेल की तेज़ गंध को उस कोने तक महसूस कर सकता था।
मम्मी ने अपनी आँखें पूरी तरह से कसकर बंद कर ली थीं। उन्होंने अपना चेहरा दूसरी तरफ, दीवार की ओर मोड़ लिया था। वह इस सच्चाई का सामना ही नहीं करना चाहती थीं कि उनके साथ क्या हो रहा है। वह औरत, जिसकी एक घूरती हुई नज़र से घर में मेरे पिताजी की भी आवाज़ कांपने लगती थी, आज अपनी आँखें चुरा रही थी। वह इस गंदे, पसीने और स्पिरिट की बदबू वाले केबिन में एक झोलेछाप की हवस भरी नज़रों के नीचे अपनी उस अभेद्य, 'सती-सावित्री' छवि को टुकड़े-टुकड़े होते हुए चुपचाप सह रही थी।
उस अंधेरे कोने में खड़े होकर, मेरी साँसें मेरे गले में अटक गई थीं। मेरी आँखों के सामने मेरी ही रची हुई यह साज़िश अपने चरम पर थी।
विक्रम ने कुछ और सेकंड्स तक स्टेथोस्कोप को उनके पेट पर घुमाया। उसकी आँखें लगातार उनके शरीर के उस खुले हुए हिस्से का नज़ारा ले रही थीं, जैसे वह अपनी नज़रों से ही उस हिस्से को खा जाना चाहता हो। फिर, बहुत धीरे से, लगभग एक अनिच्छा के साथ, उसने अपना हाथ वहाँ से हटाया।
"हम्म..." विक्रम ने एक गहरी, संतुष्ट साँस छोड़ते हुए अपना स्टेथोस्कोप वापस गले में लटका लिया। उसने एक कदम पीछे लिया और मम्मी के शरीर से अपनी वह चिपचिपी नज़र हटाकर मेरी तरफ देखा। "आंतों में काफी तेज़ ऐंठन है और थोड़ा इन्फेक्शन भी लग रहा है। घबराने की बात नहीं है।"
जैसे ही विक्रम ने अपना हाथ हटाया, मम्मी ने बिना एक सेकंड की देरी किए, लगभग कांपते हुए हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू खींचा और अपने पेट को तुरंत ढक लिया। उन्होंने उसे इतनी ज़ोर से पकड़ा, जैसे कोई डूबता हुआ इंसान किसी लकड़ी को पकड़ता है। उनके चेहरे पर अभी भी वह अपमान और बेबसी की कालिख पुती हुई थी, जिसे उन्होंने दर्द की आड़ में छुपाने की नाकाम कोशिश की थी।
मैं अभी भी अपनी जगह पर बुत बना खड़ा था। एक अजीब सा, स्याह सन्नाटा मेरे अंदर पसर गया था। विक्रम ने बिना छुए, सिर्फ अपनी मेडिकल हैसियत और भूखी नज़रों से मेरी मम्मी के गुरूर को कुचल दिया था। और मैं, उनका बेटा, उनका रक्षक, इस पूरी प्रक्रिया में विक्रम का मूक सहयोगी बन गया था।
उस क्षण, अपनी मम्मी को वापस अपने कपड़े ठीक करते और दर्द से कराहते हुए देखकर, मुझे अपने अंदर एक बहुत गहरी, डरावनी और हीन भावना महसूस हुई। मैं अब सिर्फ एक बेटा नहीं रह गया था, मैं पूरी तरह से उस 'ककल्ड' मानसिकता का हिस्सा बन चुका था—एक कमज़ोर दर्शक, जिसने अपने ही घर की तानाशाह को किसी और के सामने घुटने टेकते देखने के लिए, अपनी नैतिकता और ज़मीर का हमेशा के लिए कत्ल कर दिया था।
अगले दिन की सुबह बिल्कुल वैसी ही शुरू हुई, जैसी मेरे घर में हमेशा से होती आई थी।
सूरज की किरणें घर के आंगन में पड़ने से पहले ही, रसोई से प्रेशर कुकर की तेज़ सीटी और बर्तनों के खटकने की जानी-पहचानी आवाज़ें गूँजने लगी थीं। मैं बिस्तर पर लेटा हुआ सुन रहा था। तभी मुझे कदमों की वही भारी, नपी-तुली 'खट-खट' सुनाई दी।
मैं धीरे से उठकर कमरे के दरवाज़े पर आया। मैंने देखा, मम्मी आंगन में खड़ी थीं। उनके शरीर पर वही सूती साड़ी थी, जिस पर कलफ इतनी कड़क थी कि हवा भी शायद उससे टकराकर मुड़ जाती। पल्लू उनके गले तक बिल्कुल उसी लोहे की सेफ्टी पिन से निर्दयता से कसा हुआ था। उनके चेहरे का रंग फिर से दमक रहा था और उनकी आँखों में वही बर्फ जैसी चुभने वाली सख्ती वापस लौट आई थी।
पिताजी चुपचाप सिर झुकाए चाय पी रहे थे।
"दवा खा ली तुमने, अनीता?" पिताजी ने डरते-डरते पूछा।
"हाँ... खा ली। तुम चाय पीकर जल्दी दफ्तर निकलो, फालतू के सवाल मत करो," मम्मी ने एक कड़क, अधिकारपूर्ण आवाज़ में कहा, जो पूरे घर के सन्नाटे को चीर गई।
वह वापस उसी अजेय, सती-सावित्री और तानाशाह वाले खोल में लौट आई थीं। बाहर से देखने पर वह फिर से वही औरत थीं, जिसके गुरूर को कोई छू तक नहीं सकता था। कोई नहीं कह सकता था कि कल दोपहर यही औरत एक छोटे से क्लिनिक की काली रेक्सीन वाली बेड पर, दर्द और बेबसी के मारे सिसक रही थी।
लेकिन मैं... मैं उस कमरे के दरवाज़े पर खड़ा, उन्हें देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहा था।
पहले, उनकी इस कड़क आवाज़ और सख्त रवैये से मेरे सीने में घुटन होती थी, मुझे गुस्सा आता था। लेकिन आज, उनकी यह आवाज़ मेरे कानों में एक हारी हुई धुन की तरह बज रही थी। मैं उनके चेहरे को देख रहा था, लेकिन मेरी आँखों के सामने वह दृश्य आ रहा था जब उन्होंने कांपते हुए हाथों से इसी साड़ी के पल्लू को खोला था। मैं उनके उस ढके हुए सीने और गले को देख रहा था, लेकिन मेरे दिमाग में डॉ. विक्रम के वे हवस भरे, खुरदरे हाथ उनके गोरे, अनावृत पेट को टटोल रहे थे।
उनकी यह सख्ती अब मुझे डराती नहीं थी; बल्कि यह मुझे उस गहरे, डार्क राज़ की याद दिलाती थी, जो सिर्फ मुझे पता था। मैं उनकी इस झूठी नैतिकता और ढोंग के पीछे की बेबसी का चश्मदीद गवाह था।
दवाइयों से मम्मी का पेट दर्द काफी हद तक ठीक हो गया था, लेकिन तीन दिन बाद वह दर्द फिर से एक हल्की चुभन बनकर लौट आया। शाम का समय था और मैं कॉलेज से वापस आ चुका था।
मम्मी अपने कमरे में बिस्तर के किनारे बैठी थीं और उनके चेहरे पर एक हल्की सी सिकुड़न थी। उन्होंने अपना हाथ अपने पेट के बाईं ओर रखा हुआ था।
"क्या हुआ मम्मी? दर्द फिर से उठ रहा है क्या?" मैंने पास जाकर पूछा। मेरी आवाज़ में वही बनावटी चिंता थी, जो अब मेरा सबसे बड़ा हथियार बन चुकी थी।
उन्होंने एक गहरी साँस ली और अपना चेहरा थोड़ा घुमाते हुए बोलीं, "पता नहीं... थोड़ी सी चुभन है। शायद गैस होगी। मैं अजवायन खा लूंगी।"
उनकी आवाज़ में दर्द से ज़्यादा एक खौफ था—डॉ. विक्रम के पास वापस जाने का खौफ। वह उस सीलन भरे क्लिनिक, उस काली रेक्सीन वाले बेड और विक्रम के उस असहज करने वाले स्पर्श को दोबारा नहीं झेलना चाहती थीं। उन्होंने अपनी नैतिकता के गुरूर को एक बार दांव पर लगा दिया था, लेकिन वह दोबारा उस ज़हर को नहीं पीना चाहती थीं।


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