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Adultery हवस और नादानियां ~ (आप-बीती)
#91
भाग ~ २४



मैं बगीचे में पहुंचा ही था कि महसूस हुआ मुझे टट्टी लग आई है। वैसे तो सुबह मैं दिशा मैदान करने गया था मगर पता नहीं कैसे मुझे इस वक्त दिशा मैदान जाने को मजबूर हो जाना पड़ रहा था। 

बगीचे के पीछे तरफ एक छोटी सी नदी थी जिसमें बड़ी नदी का पानी तब आता था जब लोगों को अपने खेतों की सिंचाई करनी होती थी। मैंने सोचा इससे पहले कि अनीता आ जाए मैं दिशा मैदान कर लेता हूं।

जल्दी ही मैं बगीचे के पीछे वाले हिस्से की तरफ पहुंच गया। बगीचे से नदी तरफ जाने के लिए थोड़ा ढलान था इस लिए जैसे ही मैं ढलान में उतरने लगा तो सहसा मुझे अजीब सी आवाज सुनाई दी। पहले तो मुझे लगा पेड़ों पर बैठा कोई पक्षी होगा लेकिन जब फिर से आवाज आई तो मेरे कान खड़े हो गए।

कुछ ही पलों में मैं उस आवाज से पहचान गया कि वो आवाज किसी पक्षी की नहीं बल्कि इंसान की है। आवाज ऐसी थी कि सुन कर और समझ कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैं फौरन ही दबे पांव आवाज की दिशा में बढ़ चला।

ढलान के बाएं तरफ झाड़ियों के अलावा बेशरम के बड़े बड़े पेड़ थे। थोड़ा आगे गया तो मुझे झाड़ियों के आगे एक इंसान की झलक दिखी। वो अजीब तरह से हिल रहा था। तभी फिर से आवाज आई। आवाज किसी औरत की थी और जिस तरह से वो आवाज निकाल रही थी वैसी आवाज तभी निकलती है जब कोई मर्द उसे चोद रहा हो।

मेरी धड़कनें एकाएक ही तेज हो गईं। मुझे सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि इस वक्त इतनी गर्मी में इस जगह कोई ऐसा काम कर रहा होगा। ये तो मैं समझ चुका था कि यहां पर कोई चुदाई के काम में लगा हुआ है लेकिन मेरे मन में ये जानने की उत्सुकता बढ़ गई कि आखिर वो कौन हो सकता है?

मैं दबे पांव आगे बढ़ा तो जल्दी ही मुझे वो आदमी साफ दिखा। उसकी पीठ मेरी तरफ थी। उसने ऊपर एक सफेद कमीज पहन रखी थी जो उसके पसीने से भीगी हुई थी, जबकि नीचे उसकी लुंगी थी जो ऊपर कमर में लिपटी हुई थी। उसका काले रंग का पिछवाड़ा एकदम नंगा था और पूरी टांगें भी। किसी औरत के ऊपर सवार हो कर वो अपनी कमर हिलाए जा रहा था। उसके नीचे लेटी औरत की दोनों टांगें फैली हुईं थी और वो रह रह कर कभी सिसकियां लेती तो कभी आहें भरती।

उन दोनों को खड़ी दोपहर में चुदाई करते देख मेरा दिल अब धाड़ धाड़ कर के बजने लगा था। ये तीसरी बार था जब मैं किसी आदमी को चुदाई करते देख रहा था। पहले आदमी खुद मेरे बापू थे, दूसरे मझले काका और तीसरा ये। मैं अब ये जानने के लिए और भी ज्यादा उत्सुक हो उठा कि ये दोनों आखिर हैं कौन? मुझे थोड़ी घबराहट होने लगी थी लेकिन फिर मैंने सोचा कि इस वक्त घबराने की जरूरत मुझे नहीं बल्कि इन दोनों को है। आखिर गलत काम तो यही कर रहे हैं।

ये सोचते ही मैं आगे बढ़ा और एकदम से उन दोनों के सामने ही जा कर खड़ा हो गया।

"ये क्या कर रहे हो तुम दोनों?" मैंने बेधड़क थोड़ा ऊंचे स्वर में पूछा।

किसी को एकदम से आ गया देख और साथ ही ये बात सुनते ही वो दोनों बुरी तरह उछल पड़े। ऐसा लगा जैसे अचानक ही दोनों के ऊपर आसमानी बिजली आ गिर पड़ी हो। 

आदमी को देखते ही मैं पहचान गया और उस औरत को भी। वो दोनों हमारे ही गांव के लेकिन निचली जाति के मजदूर थे। आदमी चालीस के आसपास की उम्र का था जबकि औरत सत्ताइस अट्ठाईस के आसपास की थी। गांव के रिश्ते में वो आदमी मेरा काका लगता था जबकि औरत भौजी लगती थी।

"बिरजू काका तुम ये क्या कर रहे हो भौजी के साथ?" दोनों डरे सहमे और भौचक्के से जब देखते ही रहे तो मैंने फिर पूछा।

इस बार जैसे वो दोनों ही नींद से जागे। हड़बड़ा कर दोनों उठे और अपने नंगेपन को छुपाने लगे। इस चक्कर में मेरी नजर काका के काले मगर मुरझाए लंड पर पड़ी और उधर भौजी की काली नंगी बुर के साथ साथ खुले हुए ब्लाउज से उसकी सांवली चूचियों पर पड़ चुकी थी।

"र..राजू..बे..बेटा तुम यहां कैसे?" बिरजू काका अपनी लुंगी को फटाफट नीचे कर झट से उठते हुए बोला।

"मैं तो इधर दिशा मैदान के लिए आया था पर नहीं पता था कि तुम लोग यहां गंदा काम कर रहे होगे।" मैंने डरी सहमी और घबराई हुई उस भौजी को देखते हुए कहा जो जल्दी जल्दी ब्लाउज के बटन बंद करने में लगी हुई थी।

"म..माफ़ कर दो राजू।" बिरजू घबराया सा बोल पड़ा─"भगवान के लिए किसी को इस बारे में मत बताना नहीं तो बदनामी हो जाएगी।"

"वो तो होगी ही।" बिरजू को इस तरह डरा हुआ देख मेरा हौसला बढ़ गया था─"तुम अपने ही भतीजे की मेहरारू के साथ ये जो गंदा काम कर रहे थे न उसके बारे में मैं राकेश को जा कर बताऊंगा।"

"नहीं नहीं राजू।" बिरजू बुरी तरह घबरा कर मेरे पैरों में ही गिर गया─"भगवान के लिए किसी को मत बताना।"

मैंने देखा बिरजू काका की हालत खराब हो गई थी। उधर भौजी की हालत तो उससे भी ज्यादा बिगड़ गई थी। जब उसने ये सुना था कि मैं ये बात उसके मरद से बता दूंगा तो वो रोने ही लग गई।

"तुम्हें शरम नहीं आई काका ऐसा करते हुए?" मैंने उसे और डराया─"ये तो तुम्हारी बहू है न फिर कैसे तुम इनके साथ इतना गंदा काम कर सकते हो?" कहते हुए मैं औरत की तरफ पलटा और उससे बोला─"और तुम भौजी, तुमको भी शर्म नहीं आई..छी। अपने ही चाचा ससुर के साथ यहां पर चु..चुदाई कर रही थी?"

मेरे मुख से चुदाई शब्द सुनते ही भौजी का शर्म से बुरा हाल हो गया। उसके आंसू रुक ही नहीं रहे थे। 

"ग..गलती हो गई राजू।" फिर वो रोते गिड़गिड़ाते बोली─"भगवान के लिए माफ कर दो। अब से ऐसा कभी नहीं करूंगी। तुम कृपया उनसे(उसका मरद) मत बताना वरना वो मुझे घर से निकाल देंगे।"

अभी मैं उसे कुछ बोलने ही वाला था कि तभी मेरी नजर थोड़ी दूर खड़ी अनीता पर पड़ गई। पता नहीं वो कब यहां आ गई थी? उसे देखते ही मैं झटका सा खा गया। मन में एक ही खयाल उभरा कि क्या उसने भी ये सब देख लिया होगा और बातें सुन ली होंगी? हालांकि वो थोड़ी दूर थी मगर आवाज तो सुनाई ही दे सकती थी उसे। 

मेरे अंदर फौरन विचार उभरा कि इस वक्त उसका यहां पर रहना ठीक नहीं होगा। मैं सोचने लगा कि क्या करूं?

"राजू बेटा...माफ कर दो।" तभी बिरजू काका बोल पड़ा─"सब मेरी ही गलती थी। मैंने ही इसे बहकाया था। तुम कृपया किसी को मत बताना। मैं अपने बच्चों की कसम खा के कहता हूं कि अब से ऐसा कभी नहीं करूंगा।"

"अच्छा ठीक है।" मैं अब उन दोनों को यहां से जल्दी टरकाने का सोचा─"तुम दोनों फटाफट निकल जाओ यहां से।"

उसके बाद मैं तेजी से अनीता की तरफ चल पड़ा। जब मैं उसके पास पहुंचा तो वो मुझे अजीब तरह से देखने लगी।

"तू यहां क्या कर रही है?" मैंने थोड़ा कठोरता से कहा─"चल यहां से।"

अनीता कुछ पलों तक मुझे देखती रही फिर चुपचाप वापस बगीचे की तरफ चल पड़ी। मैंने एक बार पलट कर पीछे देखा तो वो दोनों जाते दिखे।

"तूने बताया नहीं वहां क्यों गई थी?" बगीचे के अंदर आते ही मैंने अनीता से पूछा।

"और तू क्यों गया था वहां?" उसने पलट कर उल्टा सवाल किया।

"मैं दिशा मैदान के लिए गया था।"

"अच्छा तो तू वहां उन लोगों के पास खड़ा हो कर दिशा मैदान कर रहा था?" अनीता ने घूरते हुए कहा।

"बकवास न कर।" मैंने उसे आँखें दिखाई─"और चुपचाप जा यहां से।"

"नहीं जाऊंगी।" अनीता अड़ गई─"पहले सच सच बता किस लिए गया था वहां?"

उसके इस तरह सवाल करने पर मुझे गुस्सा तो आया लेकिन मैं नहीं चाहता था कि उससे मेरा मन मुटाव हो जाए। इस लिए मैंने आँखें बंद कर के दो तीन गहरी गहरी साँसें ली।

"यार भरोसा कर मैं सच में वहां दिशा मैदान के लिए ही गया था।" फिर मैंने थोड़ा शांत हो कर कहा─"लेकिन वहां जाते ही मुझे अजीब सी आवाजें सुनाई देने लगीं थी। मैं ये जानने के लिए उत्सुक हो गया था कि आखिर यहां पर इस तरह की आवाजें कहां से और क्यों आ रही हैं? अब मुझे क्या पता था कि वहां पर वो लोग होंगे।"

अनीता अपलक देख रही थी मुझे। इधर एकाएक ही मुझे थोड़ा शर्म महसूस होने लगी। 

"तू न बहुत बिगड़ गया है आजकल।" तभी वो बोली।

"म..मैं?? 

"हां तू।"

"पर मैं कहां बिगड़ गया हूं?"

अनीता ने कुछ बोलने के लिए मुंह खोला मगर जल्दी ही उसने अपने होंठ भींच लिए। उसके चेहरे पर बेबसी और कशमकश साफ दिखाई दी।

जब वो कुछ न बोली तो मैने कहा─"मैं दिशा मैदान जा रहा हूं। बहुत जोर की लग आई है। काका लोग अगर आएं तो बता देना कि मैं कहां गया हूं।"

अनीता सख्ती से मुझे घूरती रही जबकि मैं पलट कर फिर से नदी की तरफ चल दिया। बल्कि चल क्या दिया इस बार दौड़ ही पड़ा क्योंकि सच में बहुत तेज लग आई थी।

**********

जब मैं वापस आया तो अनीता को एक पेड़ के नीचे बैठे पाया। गर्मी के चलते उसने अपना दुपट्टा निकाल कर एक तरफ रख दिया था। उसके दोनों घुटने ऊपर की तरफ मुड़े थे। उसके दोनों हाथ घुटनों को समेटे हुए थे और अपना चेहरा उसने घुटनों के ऊपर ही ठुड्ढी के बल पर टिका रखा था। उसकी नजरें शून्य में टिकी हुईं थी। चेहरे पर गहन सोचो के भाव गर्दिश कर रहे थे।

उसको बगीचे में इस तरह अकेले बैठा देख मेरे अंदर हलचल सी मच गई। मुझे अच्छी तरह एहसास था कि वो सिर्फ मेरी वजह से ही यहां पर बैठी हुई थी। भले ही वो मौजूदा वक्त में मुझसे ठीक से बात नहीं करती थी लेकिन उसका ये रवैया साफ जाहिर करता था कि कहीं न कहीं उसके अंदर मेरे प्रति लगाव जरूर है।

"अरे! तू यहीं बैठी है?" मैंने उसके करीब पहुंच कर कहा─"खलिहान तरफ क्यों नहीं गई?"

"मेरी मर्जी मैं कहीं भी बैठूँ।" उसने चेहरा उठा कर तुनकते हुए कहा─"तुझे इससे क्या। तू अपना काम कर।"

"ओहो इतना गुस्सा? क्यों भला?" मैं मुस्कुरा उठा।

"मुझसे बात मत कर तू।" उसने आँखें दिखाई।

"ठीक है।" मैंने कहा─"अगर तू सच में यही चाहती है तो नहीं करूंगा तुझसे बात। तू यहीं बैठी रह...मैं जा रहा हूं अपनी प्रेमिका से मिलने।"

"क्या कहा???"

"वही जो तूने सुना।" मैंने कहा─"अगर काका लोग या मां बापू मेरे बारे में पूछें तो बता देना कि मेरा पेट दुख रहा था इस लिए घर चला गया हूं, ठीक है न?"

"मैं बता दूंगी कि तेरा कोई पेट वेट नहीं दुख रहा था।" अनीता ने कहा─"मैं बता दूंगी कि तूने एक प्रेमिका बनाई है तो उसी से मिलने गया है।"

"यार कैसी बहन है तू?" मैंने मासूम सी शक्ल बना के कहा─"अपने भाई के लिए छोटा सा झूठ भी नहीं बोल सकती?"

"हां नहीं बोल सकती।" उसने कहा─"जब तक तू सच सच नहीं बताएगा कि कौन है तेरी प्रेमिका तो तेरे लिए किसी से कोई झूठ नहीं बोलूंगी...हां।"

"अच्छा ठीक है।" मैं उसके पास ही सामने बैठ गया फिर बोला─"मैं तुझे सिर्फ इतना बता सकता हूं कि वो तेरी ही तरह बहुत सुंदर है...बस इससे आगे मैं कुछ नहीं बताऊंगा।"

अनीता अजीब भाव से देखने लगी मुझे। उसकी कजरारी आंखों में अजीब से भाव दिखे। मैंने महसूस किया कि मैं पुनः उसकी तरफ खिंचने लगा हूं।

"देख राजू, मैं तुझसे आखिरी बार पूछ रही हूं।" उसने जैसे चेतावनी देते हुए कहा─"मुझे बता दे कौन है वो कमीनी?"

अनीता ने जैसे ही ये कहा तो मैं बरबस ही ठहाका लगा कर हंसने लगा। इतना ही नहीं मैं हंसता ही चला गया। मेरी हंसी रुकी ही नहीं। मुझे यूं पागलो की तरह हंसते देख अनीता अजीब भाव से देखने लगी। उसे समझ न आया कि अचानक मैं इस तरह क्यों हंसे जा रहा हूं?

"तू पागल हो गया है क्या?" फिर वो थोड़ा गुस्से में चीखी─"इतना हँस क्यों रहा है?"

"हसूं नहीं तो क्या करूं?" मैं अपनी हंसी रोकते हुए बोला─"तू बर्ताव ही ऐसा कर रही है।"

"मैंने भला ऐसा कौन सा बर्ताव किया जो तू रावण की तरह हंसने लगा?"

"तूने मेरी प्रेमिका को कमीनी कहा।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा─"और जिस लहजे से तूने ऐसा कहा उससे मुझे हंसी आ गई।"

"तो उसमें हंसने वाली कौन सी बात कही थी मैंने?"

"अच्छा क्या तुझे कुछ समझ नहीं आया?"

"बातें न घुमा...साफ साफ बता मुझे।"

"अच्छा तो सुन, तेरा वो लहजा साफ साफ जाहिर करता है कि तुझे मेरी प्रेमिका से जलन हुई।" मैंने उसकी आंखों में आँखें डाल कर कहा─"तुझे ये बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी कि मेरी कोई प्रेमिका हो और मैं उसके पास जाऊं, कह दे भला कि मैं गलत कह रहा हूं?"

अनीता चकित भाव से देखती रह गई मुझे। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते जाते नजर आए। उससे फौरन कुछ कहते न बना।

"क्या हुआ, बोल न।" मैंने पुनः उसकी आंखों में देखा─"मानता हूं कि मैं थोड़ा बुद्धू हूं जिससे कोई बात मुझे देर से समझ आती है लेकिन इतना भी नहीं हूं कि कोई बात कभी समझ ही न आए।"

"ये क्या बकवास कर रहा है तू?" 

"देख, अगर तू मुझे अपना भाई मानती तो तुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरी कोई प्रेमिका है।" मैंने कहा─"उल्टा तू खुश होती कि तेरे भाई को कोई लड़की पसंद करती है। इतना ही नहीं इसके लिए तू मेरी मदद भी करती मगर तूने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया। ऊपर से जलन में मेरी प्रेमिका को कमीनी भी कहा। इसका तो यही मतलब हुआ न कि तुझे ये अच्छा नहीं लग रहा है। मतलब तू नहीं चाहती है कि कोई लड़की मेरी प्रेमिका हो।"

अनीता भौचक्की सी देखती रह गई। उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ नजर आया। उसकी हालत चोरी करते पकड़े जाने जैसी हो गई थी। फिर एकाएक उसने खुद की हालत को सम्हाला।

"तेरे मगज में सचमुच गोबर भरा है।" फिर उसने जाने क्या सोचते हुए कहा─"पता नहीं क्या क्या सोच लेता है तू?"

"अच्छा, क्या सच में?"

"हां, मुझे भला इस बात से क्यों कोई आपत्ति होगी कि तेरी कोई प्रेमिका हो?" उसने कहा─"और हां, मुझे किसी से जलन वलन नहीं हो रही है। मैं बस ये चाहती हूं कि तू फालतू में किसी गलत चक्कर में न फंसे।"

"क्या यही बात तू मेरी कसम खा कर कह सकती है?" मैंने पुनः उसकी आंखों में देखा।

मेरी ये बात सुनते ही वो गड़बड़ा गई। मुझसे नजरें भी न मिलाए रह सकी। मैं मुस्कुरा उठा।

"क्या हुआ? मेरी कसम खा कर बोल कि यही सच है।"

"मैं क्यों खाऊं तेरी कसम?" उसने तुनक कर हाथ झटका─"तूने भी तो उस समय मेरी कसम खा कर नहीं बताया था कि कौन है तेरी प्रेमिका।"

"अच्छा अगर मैं तेरी कसम खा कर अपनी प्रेमिका के बारे में बता दूं।" मैंने कहा─"तो क्या तू भी मेरी कसम खा कर कहेगी कि जो तूने अभी कहा वही सच है?"

"ह..हां अगर तू कसम खा के बता देगा तो मैं भी तेरी कसम खा के बता दूंगी।" उसने अजीब भाव से कहा─"वैसे भी मैं तो सच ही बोल रही थी। तुझे भरोसा ही नहीं है तो मैं क्या करूं?"

"जब तुझे नहीं है मुझ पर भरोसा तो मुझे भी नहीं होगा।" 

"अब ज्यादा बातें न कर।" उसने घूरा─"और मेरी कसम खा के अभी बता कि कौन है तेरी प्रेमिका?"

"पहले तू मेरी कसम खा के बोल।"

"अब ये क्या बात हुई?" अनीता की आँखें सिकुड़ गईं─"देख ये गलत है। पहले मैंने तुझसे पूछा था तो पहले तू ही बताएगा...हां।"

"मैं क्यों पहले बताऊं?" मैं मुस्कुरा उठा─"मेरी प्रेमिका को जानने के लिए तू ही इतना मरी जा रही है। बाकी मुझे ये जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है कि तू जो कह रही थी वो सच था या झूठ।"

अनीता ये सुन कर असहाय भाव से देखने लगी। उसके चेहरे पर गहन बेबसी और बेचैनी उभर आई। इधर मुझे अब मजा आने लगा था ऐसी बातों से उसे परेशान कर के।


जारी है..............




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RE: हवस और नादानियां ~ (आप-बीती) - by Rajan Raghuwanshi - 26-08-2026, 07:42 PM



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