24-08-2026, 02:57 PM
बाबाजी ने धीरे से साँस ली और गंभीर, लेकिन मीठा स्वर अपनाया।
“देखो मयूरी… वैसे तो मुझे किसी के गृहस्थ जीवन में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। पर गोपाल को मैं अपने मित्र की तरह मानता हूँ। वो भी मुझे अपना मित्र समझकर अपनी सारी परेशानियाँ बेझिझक कह देता है। कल रात की ही बात ले लो… वो आकर रो रहा था कि तुम उसे अपने जिस्म को हाथ तक लगाने नहीं देतीं। पिछले एक महीने से तो उसने तुम्हारा एक चुम्बन भी नहीं लिया है।” निर्मात्री मैत्री पटेल है।
मयूरी शर्म से गड़ गई। उसका चेहरा, गला और कान तक लाल हो गए। बाबाजी के मुँह से अपनी निजी, अंतरंग बातें सुनकर वह जमीन में समा जाना चाहती थी। उसने नजरें झुका लीं, उँगलियाँ अपनी साड़ी के पल्लू में फँस गईं।
बाबाजी ने आगे कहा, आवाज़ को और नरम करते हुए: “देखो बेटी… चाहे तुम जो भी कहो, वो तुम्हारा पति है। पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध विवाह को मजबूत रखने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। हर पुरुष चाहता है कि उसकी पत्नी उसे मानसिक और शारीरिक रूप से पूरा संतोष दे। अगर तुम ये नहीं दोगी तो उसका मन भटक सकता है। बाहर कहीं… किसी और के पास… शारीरिक सुख ढूंढने लगेगा। और ये तुम्हारे पूरे परिवार के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।”
मयूरी काफी देर तक चुपचाप सुनती रही। उसके मन में तूफान उठ रहा था। आखिरकार उसकी आवाज़ फटी:
“बाबाजी… आपने सिर्फ उनकी बातें सुनी हैं और मुझे दोषी बना दिया…”
बाबाजी ने कोमल स्वर में कहा, “तो बताओ न मुझे… तुम्हें क्या परेशानी है? क्यों तुम ऐसा बर्ताव करती हो गोपाल के साथ? मयूरी, तुम मुझे भी अपना मित्र समझो। सब कुछ खुलकर बता दो। ये बात हमारे बीच ही रहेगी। इतना तो विश्वास कर ही सकती हो तुम मुझ पर… और यहाँ सिर्फ मैं औत तुम हो और यह उपरवाला।”
कहते हुए बाबाजी आगे झुके और अपना दाहिना हाथ मयूरी के नंगे, मांसल कंधे पर रख दिया। स्पर्श हल्का था, लेकिन भरा हुआ। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी उँगलियों से उसके कंधे की नरम, गर्म त्वचा को सहलाना शुरू कर दिया - जैसे भरोसा दिला रहे हों, पर असल में उसकी देह को महसूस कर रहे थे।
मयूरी ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी आँखों में आँसू थे। पलकों पर पानी चमक रहा था। संपादिका फनलवर है।
“बाबाजी जी… जिस दिन से इन्हें शराब पीने की लत लगी है, वो अपने आपे में नहीं रहते। उन्होंने आपको ये तो बता दिया कि मैंने एक महीने से उन्हें अपने पास नहीं आने दिया… लेकिन ये नहीं बताया कि उन्होंने क्या हरकत की थी, जिसकी वजह से मैंने वो सब किया।”
बाबाजी ने सांत्वना भरे स्वर में कहा, “नहीं… मुझे नहीं मालूम। तुम बताओ मुझे पूरी बात।”
मयूरी ने गहरी साँस ली। शर्म से उसका गला रुंध रहा था, फिर भी बोली:
“बाबाजी जी… कहते हुए मुझे बहुत शर्म आ रही है… पर जब बात यहाँ तक आ ही गई है, तो मैं आपसे कुछ नहीं छुपाऊँगी। ऐसा नहीं है कि मेरा मन इन सब चीजों के लिए नहीं करता, बल्कि मैं तो उनसे कहीं ज्यादा तड़पती हूँ। पहले जब वो मेरे साथ प्यार करते थे, तो मैं उन्हें हर प्रकार से खुश करने की कोशिश करती थी। जैसा वो चाहते, वैसा करती। वो कहते थे - ‘अंग्रेजी पिक्चर में जैसे होता है, वैसा करो’…”
बाबाजी ने बीच में ही टोका, आँखों में चमक के साथ:
“अंग्रेजी पिक्चर में… मतलब?”
मयूरी और भी शर्म से सिकुड़ गई। उसकी आवाज़ अब barely सुनाई दे रही थी। उसने नजरें नीचे कर लीं और फुसफुसाकर बोली:
“वो… वो अक्सर… रात को टीवी में अंग्रेजी फिल्में आती हैं न… जिसमें… जिसमें औरत… आदमी का लंड… मुंह में लेकर चूसती हुई दिखाई जाती है।”
वह बोलते-बोलते रुक गई। उसके गालों पर लाली छा गई। साँसें तेज हो गई थीं।
बाबाजी की उँगलियाँ अब भी उसके कंधे पर धीरे-धीरे घूम रही थीं। उन्होंने जानबूझकर स्पर्श को थोड़ा और गहरा किया - गर्दन की तरफ सरकाते हुए। उनकी आवाज़ में एक गहरी, वासना भरी सहानुभूति थी:
“तो… गोपाल तुमसे वो सब करवाना चाहता था?” मैत्री की प्रस्तुति।
मयूरी ने सिर्फ सिर हिलाया।
बाबाजी ने धीरे से पूछा, “और तुम… नहीं करती थीं?”
मयूरी ने काँपती आवाज़ में जवाब दिया, “कभी-कभी करती थी। लेकिन जब वो शराब पीकर आते थे, तो बहुत खतरनाक हो जाते थे। जबरदस्ती… बहुत रूखे और बेरहमी से करते थे… मुझे दर्द होता था। उसी रात उन्होंने मेरे मुँह में… जबरदस्ती… और जब मैंने मना किया तो गुस्सा हो गए। बस उसी दिन से मैंने उन्हें दूर रख लिया है।”
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Maitri Patel.
“देखो मयूरी… वैसे तो मुझे किसी के गृहस्थ जीवन में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। पर गोपाल को मैं अपने मित्र की तरह मानता हूँ। वो भी मुझे अपना मित्र समझकर अपनी सारी परेशानियाँ बेझिझक कह देता है। कल रात की ही बात ले लो… वो आकर रो रहा था कि तुम उसे अपने जिस्म को हाथ तक लगाने नहीं देतीं। पिछले एक महीने से तो उसने तुम्हारा एक चुम्बन भी नहीं लिया है।” निर्मात्री मैत्री पटेल है।
मयूरी शर्म से गड़ गई। उसका चेहरा, गला और कान तक लाल हो गए। बाबाजी के मुँह से अपनी निजी, अंतरंग बातें सुनकर वह जमीन में समा जाना चाहती थी। उसने नजरें झुका लीं, उँगलियाँ अपनी साड़ी के पल्लू में फँस गईं।
बाबाजी ने आगे कहा, आवाज़ को और नरम करते हुए: “देखो बेटी… चाहे तुम जो भी कहो, वो तुम्हारा पति है। पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध विवाह को मजबूत रखने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। हर पुरुष चाहता है कि उसकी पत्नी उसे मानसिक और शारीरिक रूप से पूरा संतोष दे। अगर तुम ये नहीं दोगी तो उसका मन भटक सकता है। बाहर कहीं… किसी और के पास… शारीरिक सुख ढूंढने लगेगा। और ये तुम्हारे पूरे परिवार के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।”
मयूरी काफी देर तक चुपचाप सुनती रही। उसके मन में तूफान उठ रहा था। आखिरकार उसकी आवाज़ फटी:
“बाबाजी… आपने सिर्फ उनकी बातें सुनी हैं और मुझे दोषी बना दिया…”
बाबाजी ने कोमल स्वर में कहा, “तो बताओ न मुझे… तुम्हें क्या परेशानी है? क्यों तुम ऐसा बर्ताव करती हो गोपाल के साथ? मयूरी, तुम मुझे भी अपना मित्र समझो। सब कुछ खुलकर बता दो। ये बात हमारे बीच ही रहेगी। इतना तो विश्वास कर ही सकती हो तुम मुझ पर… और यहाँ सिर्फ मैं औत तुम हो और यह उपरवाला।”
कहते हुए बाबाजी आगे झुके और अपना दाहिना हाथ मयूरी के नंगे, मांसल कंधे पर रख दिया। स्पर्श हल्का था, लेकिन भरा हुआ। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी उँगलियों से उसके कंधे की नरम, गर्म त्वचा को सहलाना शुरू कर दिया - जैसे भरोसा दिला रहे हों, पर असल में उसकी देह को महसूस कर रहे थे।
मयूरी ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी आँखों में आँसू थे। पलकों पर पानी चमक रहा था। संपादिका फनलवर है।
“बाबाजी जी… जिस दिन से इन्हें शराब पीने की लत लगी है, वो अपने आपे में नहीं रहते। उन्होंने आपको ये तो बता दिया कि मैंने एक महीने से उन्हें अपने पास नहीं आने दिया… लेकिन ये नहीं बताया कि उन्होंने क्या हरकत की थी, जिसकी वजह से मैंने वो सब किया।”
बाबाजी ने सांत्वना भरे स्वर में कहा, “नहीं… मुझे नहीं मालूम। तुम बताओ मुझे पूरी बात।”
मयूरी ने गहरी साँस ली। शर्म से उसका गला रुंध रहा था, फिर भी बोली:
“बाबाजी जी… कहते हुए मुझे बहुत शर्म आ रही है… पर जब बात यहाँ तक आ ही गई है, तो मैं आपसे कुछ नहीं छुपाऊँगी। ऐसा नहीं है कि मेरा मन इन सब चीजों के लिए नहीं करता, बल्कि मैं तो उनसे कहीं ज्यादा तड़पती हूँ। पहले जब वो मेरे साथ प्यार करते थे, तो मैं उन्हें हर प्रकार से खुश करने की कोशिश करती थी। जैसा वो चाहते, वैसा करती। वो कहते थे - ‘अंग्रेजी पिक्चर में जैसे होता है, वैसा करो’…”
बाबाजी ने बीच में ही टोका, आँखों में चमक के साथ:
“अंग्रेजी पिक्चर में… मतलब?”
मयूरी और भी शर्म से सिकुड़ गई। उसकी आवाज़ अब barely सुनाई दे रही थी। उसने नजरें नीचे कर लीं और फुसफुसाकर बोली:
“वो… वो अक्सर… रात को टीवी में अंग्रेजी फिल्में आती हैं न… जिसमें… जिसमें औरत… आदमी का लंड… मुंह में लेकर चूसती हुई दिखाई जाती है।”
वह बोलते-बोलते रुक गई। उसके गालों पर लाली छा गई। साँसें तेज हो गई थीं।
बाबाजी की उँगलियाँ अब भी उसके कंधे पर धीरे-धीरे घूम रही थीं। उन्होंने जानबूझकर स्पर्श को थोड़ा और गहरा किया - गर्दन की तरफ सरकाते हुए। उनकी आवाज़ में एक गहरी, वासना भरी सहानुभूति थी:
“तो… गोपाल तुमसे वो सब करवाना चाहता था?” मैत्री की प्रस्तुति।
मयूरी ने सिर्फ सिर हिलाया।
बाबाजी ने धीरे से पूछा, “और तुम… नहीं करती थीं?”
मयूरी ने काँपती आवाज़ में जवाब दिया, “कभी-कभी करती थी। लेकिन जब वो शराब पीकर आते थे, तो बहुत खतरनाक हो जाते थे। जबरदस्ती… बहुत रूखे और बेरहमी से करते थे… मुझे दर्द होता था। उसी रात उन्होंने मेरे मुँह में… जबरदस्ती… और जब मैंने मना किया तो गुस्सा हो गए। बस उसी दिन से मैंने उन्हें दूर रख लिया है।”
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Maitri Patel.



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