23-08-2026, 06:29 PM
"रात के दो बज रहे थे। पूरा घर गहरी खामोशी में डूबा हुआ था, लेकिन मेरे कमरे के बाहर कदमों की बहुत ही धीमी सी आहट सुनाई दी। मैं असल में सो नहीं रहा था, बस अपनी आँखें बंद करके उस पल का इंतज़ार कर रहा था जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार था। दरवाज़ा बहुत धीरे से खुला और एक हल्की सी आहट हुई।
मम्मी अंदर आईं। उनकी चाल में एक अजीब सी हिचकिचाहट और घबराहट थी। उन्होंने अपनी साड़ी को ठीक से लपेट लिया था और चेहरे पर एक ऐसा मुखौटा ओढ़ने की की नाकामयाब कोशिश कर रही थी जिसे देखकर कोई भी कह दे कि वह एक फिक्रमंद माँ हैं। लेकिन उनकी आंखों में एक एक डर ,एक बेचैनी थी और उनके काँपते हुए हाथ साफ दिखाई दे रहे थे। वह मेरी तरफ धीरे धीरे बढ़ीं और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
'बेटा... तू सो गया क्या?' उनकी आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी, जैसे वह खुद को संभाल रही हों। 'मुझे लगा शायद तुझे नींद नहीं आ रही... तुझे कुछ चाहिए तो?' उन्होंने एक माँ की तरह मेरा माथा सहलाने की कोशिश की, लेकिन उनके हाथ का स्पर्श इतना काँप रहा था कि वह डर साफ़ महसूस हो रहा था। वह यह दिखाने की कोशिश कर रही थीं कि वो अपनी गलती पर शर्मिन्दा है। उनके शरीर की हर हरकत कह रही थी कि वह इस वक्त अंदर से कितनी टूटी हुई और डरी हुई हैं। वह मेरे पास बैठी तो थीं, लेकिन उनकी नज़रें बार बार दरवाज़े की तरफ जा रही थीं, जैसे वह यह देख रही हों कि कहीं कोई और तो नहीं आ रहा। वह खुद को बचाने के लिए मेरे करीब आई थीं, लेकिन उनका वह डर ही अब उन्हें मेरे और करीब खींच रहा था।"उनकी इस हालत को देख कर मेरा दिल भी कहीं न कहीं बैठा जा रहा था
मैंने बिना कुछ कहे, धीरे से अपनी आँखें खोलीं और उन्हें अपनी ओर खींच लिया। मैं उन्हें गले लगा लेता हूँ। उस पल, उनके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। वह पूरी तरह से **'मंझधार'** में थीं उनके दिमाग में यह युद्ध चल रहा था कि क्या उनका बेटा उन्हें इस डर से बाहर निकालने के लिए गले लगा रहा है, या फिर वह इस मौके का फायदा उठाना चाहता है। वह चाहकर भी खुद को पीछे नहीं हटा पा रही थीं।
मैंने अपना हाथ उनके कंधे से नीचे की ओर सरकाना शुरू किया। मेरा हाथ धीरे धीरे उनके **वक्षस्थल** की ओर बढ़ रहा था। जैसे ही मेरा हाथ उनके शरीर के उस संवेदनशील हिस्से के करीब पहुँचा, मम्मी के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। वह घबराकर झटके से पीछे हट गईं। उनकी आँखों में डर और शर्मिंदगी का एक मिला जुला भाव था। वह काँपते हुए बोलीं, 'रवि... ये क्या कर रहे हो तुम?'
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने बस एक गहरी ठंडी सांस ली और अपनी नज़रें नीचे झुका लीं। मैंने अपने चेहरे पर एक गहरी **'निराशा'** का भाव ला दिया, जैसे उनका पीछे हटना मेरे दिल को छलनी कर गया हो। मैंने बहुत ही ठंडी और बेजान आवाज़ में कहा,कहा,"क्यों मम्मी क्या हुआ...।' मम्मी बोलीनहीं बेटा ,"ये पाप है"। उमर के उस दौर में मुझे कुश समझ नहीं आया कि मुझे अब क्या करना चाहिए।
मैं फिर से आँखें बंद करके लेट गया। तभी पता नहीं किस भावना के साथ मम्मी उठ कर अपने कमरे में जा कर सो गई।
उस रात के बाद से मेरा व्यवहार पूरी तरह बदल गया। मैं एकदम चुप रहने लगा। न किसी से बात करना, न किसी की तरफ देखना। मैंने खाना पीना लगभग छोड़ दिया था। मैं बस एक ज़िंदा लाश की तरह अपने कमरे में पड़ा रहता। शाम ढलते ही लाइट्स बंद कर लेता।मेरा यह **'इमोशनल ड्रामा'** मम्मी को अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। उन्हें लग रहा था कि उन्होंने अपने बेटे का दिल दुखी किया है।मम्मी के मन में अपराधबोध का एक अजीब सा तूफान चल रहा था। उन्हें लग रहा था कि उनकी बेरुखी ने मेरे मासूम दिल को तोड़ दिया है। वह मुझे यह महसूस कराना चाहती थीं कि मैं अकेला नहीं हूँ।
दो तीन दिन ही बीते होंगे ,मै अपने कमर में सोने की
कोशिश कर रहा था पर नींद का कोई आता पता नहीं था,मै सोच रहा था क्या मेरा ये प्लान असफल हो गया?,कही अंकल ने मुझे बेवकूफ तो नहीं बना दिया? क्या मम्मी के साथ sex करने का मेरा सपना अब कभी पूरा नहीं होगा?मम्मी का वो वो गोरा चिट्ठा नंगा और कामिक बदन मेरे दिमाग में घूम रहा था।मैने अपने दिमाग में चल रहे सब विचारों को झटक कर फिर से सोने की कोशिश के तहत अपनी आंखें बंद का लीं पर नींद तो आने का नाम ही नहीं ले रही थी।
तभी जैसे कोई चमत्कार हो गया हो ,मम्मी दबे पाँव मेरे कमरे में दाखिल हुईं
वह धीरे से बिस्तर के पास आईं और बिना कुछ सोचे, अंधेरे का फायदा उठाते हुए मेरे बगल में लेट गईं। कमरे में इतना अंधेरा था कि कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था, बस एक भारी सन्नाटा था। मैंने गहरी नींद का नाटक जारी रखा, लेकिन मेरा दिमाग पूरी तरह जाग रहा था। मुझे उनकी मौजूदगी का अहसास हो रहा था।
जैसे ही वह मेरे करीब आईं, मैने नींद में होने का बहाना करते हुए अपना हाथ मम्मी के ऊपर रख दिया, जैसे ही मेरा हाथ उनके शरीर से टकराया, मेरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। मुझे लगा जैसे मेरा हाथ किसी कपड़े से नहीं, बल्कि सीधे **कोमल और गर्म त्वचा** से टकराया है।
मैं चौंक गया। मैंने अंधेरे में ही महसूस किया कि वह **बिल्कुल नग्न** थीं। उनके शरीर की गर्माहट और उनकी त्वचा का अहसास इतना वास्तविक था कि मेरी सांसें थम गईं। वह बिना किसी कपड़े के, पूरी तरह से असुरक्षित और समर्पित होकर मेरे पास लेटी हुई थीं। उस पल मुझे समझ आ गया कि वह केवल 'माँ' बनकर मुझे सांत्वना देने नहीं आई थीं, बल्कि उन्होंने मेरा रूखापन और तड़प को देखते हुए अपनी सारी मर्यादाएँ और शर्म पीछे छोड़ दी थी। वह खुद को पूरी तरह मेरे हवाले कर चुकी थीं।
उस पल कमरे का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया था। अंधेरे में भी मैं उनकी तेज चलती हुई साँसों की आवाज़ साफ सुन सकता था। मेरा हाथ अभी भी उनकी उस मखमली और गर्म त्वचा पर टिका हुआ था। मुझे लगा कि वह डर के मारे जम गई हैं, लेकिन उन्होंने मुझे पीछे धकेलने की कोई कोशिश नहीं की। इसके बजाय, उन्होंने एक लंबी और भारी आह भरी, जो उनके भीतर चल रहे द्वंद्व और समर्पण का प्रमाण थी।
इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उनकी ममता और वासना के बीच का संघर्ष खत्म हो चुका था। उन्होंने धीरे से अपना हाथ मेरे सीने पर रखा और बहुत ही कोमल लेकिन दृढ़ता के साथ मेरी टी शर्ट को ऊपर की ओर खींचना शुरू किया। उनकी उँगलियाँ मेरी त्वचा को सहलाते हुए मेरे शरीर से कपड़ा अलग कर रही थीं। जैसे ही मेरी टी शर्ट सिर के ऊपर से निकली और बिस्तर पर गिरी, मुझे उनकी गर्म हथेलियों का अहसास अपनी नग्न छाती पर हुआ। वह मेरे शरीर की गर्मी को महसूस करना चाहती थीं।
फिर उनके हाथ मेरे पजामे की गाँठ तक पहुँचे। उनकी साँसें अब और भी भारी और अनियंत्रित हो चुकी थीं। उन्होंने बहुत ही धीमी और काँपती हुई उँगलियों से पजामे की गाँठ को ढीला किया। जैसे ही पजामे का दबाव कम हुआ, उन्होंने उसे धीरे धीरे मेरे पैरों के नीचे तक सरका दिया। उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे नग्न शरीर को ऐसे सहलाया जैसे वह किसी पवित्र वस्तु को छू रही हों, लेकिन उनके बदन में एक अलग ही प्यास मै fमहसूस कर रहा था।
मैंने अपनी आँखें नहीं खोलीं, लेकिन मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था। मैंने धीरे से अपनी उँगलियों को उनके शरीर पर और गहराई से चलाना शुरू किया। जैसे ही मेरा हाथ उनके शरीर के उभारों से टकराया, उनके शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपना सिर धीरे से मेरे कंधे की ओर झुका दिया। उनकी गर्म साँसें अब मेरी गर्दन को छू रही थीं।
तभी उन्होंने बहुत ही धीमी और काँपती हुई आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा, *"रवि... मेरा बच्चा..."* उनकी आवाज़ में ममता कम और एक औरत की बेबसी ज़्यादा थी। उन्होंने अपना नग्न शरीर धीरे से मेरे शरीर के साथ सटा लिया। उनकी त्वचा की गर्मी अब मेरे पूरे शरीर में उतर रही थी। उस सन्नाटे में, दो शरीरों का आपस में टकराना और उनकी रगड़ का अहसास इतना तीव्र था कि मेरा नियंत्रण खोने लगा था। मैंने महसूस किया कि वह अब खुद को पूरी तरह ढीला छोड़ चुकी थीं, जैसे वह चाहती हों कि मैं अब आगे बढ़ूँ और जो कुछ भी होना है, उसे होने दूँ।
अंधेरे कमरे में अब सिर्फ दो जिस्मों की बेताबी और उनकी भारी होती सांसों का शोर था। हमारे दोनों के नग्न शरीर पूरी तरह एक दूसरे में उलझ चुके थे। मम्मी की त्वचा की वो रेशमी गर्माहट और उनके शरीर का भारीपन मेरे ऊपर इस कदर हावी था कि मेरा दिमाग काम करना बंद कर चुका था। उनके नग्न अंगों का मेरे शरीर से रगड़ खाना एक ऐसी बिजली पैदा कर रहा था जो मेरे पूरे वजूद को झकझोर रही थी।
मम्मी ने अपनी बेताबी को और बढ़ाते हुए मुझे बिस्तर पर पूरी तरह दबा लिया। उनके शरीर का हर उभार, उनकी छाती की कोमलता और उनके अंगों का दबाव मेरे अंगों से टकराकर मुझे पागल कर रहा था। उनकी सांसें मेरी गर्दन पर तप रही थीं। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के, अपनी पूरी वासना को मुझ पर जाहिर कर दिया। उनके हाथों का स्पर्श अब और भी उग्र और बेखौफ हो गया था।
जैसे ही उन्होंने खुद को पूरी तरह मेरे करीब लाया, हमारे बीच का घर्षण चरम पर पहुँच गया। उनके शरीर की उत्तेजना और मेरी बेकाबू होती प्यास ने मिलकर एक ऐसा माहौल बना दिया था जहाँ अब कोई मर्यादा नहीं बची थी। उनके अंगों का मेरे अंगों के साथ वो जबरदस्त और रसीला घर्षण अब एक गहरे मिलन की ओर बढ़ रहा था।
मम्मी की आँखों में एक अजीब सी मदहोशी थी और उनके शरीर की हर हरकत मुझे और भी उत्तेजित कर रही थी। उनके नग्न शरीर की रगड़ और उनकी भारी साँसों के बीच, अब हम दोनों एक ऐसी चरम सीमा की ओर बढ़ रहे थे जहाँ सिर्फ मांस का मांस से टकराना और एक दूसरे के भीतर समा जाने की तीव्र इच्छा ही शेष थी। वह पल इतना उग्र और तीव्र था कि ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया थम गई है और बस हम दोनों का यह नग्न और अनियंत्रित मिलन ही सच है।
> "...अंधेरे में हम दोनों की साँसें एक दूसरे के शरीर से टकरा रही थीं। तभी अचानक... **'खट... खट... खट...'**।
>
> दरवाज़े पर किसी के धीरे धीरे दस्तक देने की आवाज़ आई। मेरे शरीर का खून जैसे जम गया। मम्मी का हाथ मेरे कंधे पर कस गया और उनकी साँसें एकदम से थम गईं। हम दोनों बिना किसी हरकत के, पत्थर की तरह बिस्तर पर पड़े रहे। अंधेरे में डर और वासना का ऐसा संगम था कि समझ नहीं आ रहा था कि मैं डर से कांप रहा हूँ या उत्तेजना से। क्या कोई हमें इस हाल में देख लेगा? क्या हमारी ये गुनाहगार रात यहीं खत्म हो जाएगी?"
मम्मी अंदर आईं। उनकी चाल में एक अजीब सी हिचकिचाहट और घबराहट थी। उन्होंने अपनी साड़ी को ठीक से लपेट लिया था और चेहरे पर एक ऐसा मुखौटा ओढ़ने की की नाकामयाब कोशिश कर रही थी जिसे देखकर कोई भी कह दे कि वह एक फिक्रमंद माँ हैं। लेकिन उनकी आंखों में एक एक डर ,एक बेचैनी थी और उनके काँपते हुए हाथ साफ दिखाई दे रहे थे। वह मेरी तरफ धीरे धीरे बढ़ीं और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
'बेटा... तू सो गया क्या?' उनकी आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी, जैसे वह खुद को संभाल रही हों। 'मुझे लगा शायद तुझे नींद नहीं आ रही... तुझे कुछ चाहिए तो?' उन्होंने एक माँ की तरह मेरा माथा सहलाने की कोशिश की, लेकिन उनके हाथ का स्पर्श इतना काँप रहा था कि वह डर साफ़ महसूस हो रहा था। वह यह दिखाने की कोशिश कर रही थीं कि वो अपनी गलती पर शर्मिन्दा है। उनके शरीर की हर हरकत कह रही थी कि वह इस वक्त अंदर से कितनी टूटी हुई और डरी हुई हैं। वह मेरे पास बैठी तो थीं, लेकिन उनकी नज़रें बार बार दरवाज़े की तरफ जा रही थीं, जैसे वह यह देख रही हों कि कहीं कोई और तो नहीं आ रहा। वह खुद को बचाने के लिए मेरे करीब आई थीं, लेकिन उनका वह डर ही अब उन्हें मेरे और करीब खींच रहा था।"उनकी इस हालत को देख कर मेरा दिल भी कहीं न कहीं बैठा जा रहा था
मैंने बिना कुछ कहे, धीरे से अपनी आँखें खोलीं और उन्हें अपनी ओर खींच लिया। मैं उन्हें गले लगा लेता हूँ। उस पल, उनके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। वह पूरी तरह से **'मंझधार'** में थीं उनके दिमाग में यह युद्ध चल रहा था कि क्या उनका बेटा उन्हें इस डर से बाहर निकालने के लिए गले लगा रहा है, या फिर वह इस मौके का फायदा उठाना चाहता है। वह चाहकर भी खुद को पीछे नहीं हटा पा रही थीं।
मैंने अपना हाथ उनके कंधे से नीचे की ओर सरकाना शुरू किया। मेरा हाथ धीरे धीरे उनके **वक्षस्थल** की ओर बढ़ रहा था। जैसे ही मेरा हाथ उनके शरीर के उस संवेदनशील हिस्से के करीब पहुँचा, मम्मी के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। वह घबराकर झटके से पीछे हट गईं। उनकी आँखों में डर और शर्मिंदगी का एक मिला जुला भाव था। वह काँपते हुए बोलीं, 'रवि... ये क्या कर रहे हो तुम?'
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने बस एक गहरी ठंडी सांस ली और अपनी नज़रें नीचे झुका लीं। मैंने अपने चेहरे पर एक गहरी **'निराशा'** का भाव ला दिया, जैसे उनका पीछे हटना मेरे दिल को छलनी कर गया हो। मैंने बहुत ही ठंडी और बेजान आवाज़ में कहा,कहा,"क्यों मम्मी क्या हुआ...।' मम्मी बोलीनहीं बेटा ,"ये पाप है"। उमर के उस दौर में मुझे कुश समझ नहीं आया कि मुझे अब क्या करना चाहिए।
मैं फिर से आँखें बंद करके लेट गया। तभी पता नहीं किस भावना के साथ मम्मी उठ कर अपने कमरे में जा कर सो गई।
उस रात के बाद से मेरा व्यवहार पूरी तरह बदल गया। मैं एकदम चुप रहने लगा। न किसी से बात करना, न किसी की तरफ देखना। मैंने खाना पीना लगभग छोड़ दिया था। मैं बस एक ज़िंदा लाश की तरह अपने कमरे में पड़ा रहता। शाम ढलते ही लाइट्स बंद कर लेता।मेरा यह **'इमोशनल ड्रामा'** मम्मी को अंदर ही अंदर खाए जा रहा था। उन्हें लग रहा था कि उन्होंने अपने बेटे का दिल दुखी किया है।मम्मी के मन में अपराधबोध का एक अजीब सा तूफान चल रहा था। उन्हें लग रहा था कि उनकी बेरुखी ने मेरे मासूम दिल को तोड़ दिया है। वह मुझे यह महसूस कराना चाहती थीं कि मैं अकेला नहीं हूँ।
दो तीन दिन ही बीते होंगे ,मै अपने कमर में सोने की
कोशिश कर रहा था पर नींद का कोई आता पता नहीं था,मै सोच रहा था क्या मेरा ये प्लान असफल हो गया?,कही अंकल ने मुझे बेवकूफ तो नहीं बना दिया? क्या मम्मी के साथ sex करने का मेरा सपना अब कभी पूरा नहीं होगा?मम्मी का वो वो गोरा चिट्ठा नंगा और कामिक बदन मेरे दिमाग में घूम रहा था।मैने अपने दिमाग में चल रहे सब विचारों को झटक कर फिर से सोने की कोशिश के तहत अपनी आंखें बंद का लीं पर नींद तो आने का नाम ही नहीं ले रही थी।
तभी जैसे कोई चमत्कार हो गया हो ,मम्मी दबे पाँव मेरे कमरे में दाखिल हुईं
वह धीरे से बिस्तर के पास आईं और बिना कुछ सोचे, अंधेरे का फायदा उठाते हुए मेरे बगल में लेट गईं। कमरे में इतना अंधेरा था कि कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था, बस एक भारी सन्नाटा था। मैंने गहरी नींद का नाटक जारी रखा, लेकिन मेरा दिमाग पूरी तरह जाग रहा था। मुझे उनकी मौजूदगी का अहसास हो रहा था।
जैसे ही वह मेरे करीब आईं, मैने नींद में होने का बहाना करते हुए अपना हाथ मम्मी के ऊपर रख दिया, जैसे ही मेरा हाथ उनके शरीर से टकराया, मेरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। मुझे लगा जैसे मेरा हाथ किसी कपड़े से नहीं, बल्कि सीधे **कोमल और गर्म त्वचा** से टकराया है।
मैं चौंक गया। मैंने अंधेरे में ही महसूस किया कि वह **बिल्कुल नग्न** थीं। उनके शरीर की गर्माहट और उनकी त्वचा का अहसास इतना वास्तविक था कि मेरी सांसें थम गईं। वह बिना किसी कपड़े के, पूरी तरह से असुरक्षित और समर्पित होकर मेरे पास लेटी हुई थीं। उस पल मुझे समझ आ गया कि वह केवल 'माँ' बनकर मुझे सांत्वना देने नहीं आई थीं, बल्कि उन्होंने मेरा रूखापन और तड़प को देखते हुए अपनी सारी मर्यादाएँ और शर्म पीछे छोड़ दी थी। वह खुद को पूरी तरह मेरे हवाले कर चुकी थीं।
उस पल कमरे का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया था। अंधेरे में भी मैं उनकी तेज चलती हुई साँसों की आवाज़ साफ सुन सकता था। मेरा हाथ अभी भी उनकी उस मखमली और गर्म त्वचा पर टिका हुआ था। मुझे लगा कि वह डर के मारे जम गई हैं, लेकिन उन्होंने मुझे पीछे धकेलने की कोई कोशिश नहीं की। इसके बजाय, उन्होंने एक लंबी और भारी आह भरी, जो उनके भीतर चल रहे द्वंद्व और समर्पण का प्रमाण थी।
इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उनकी ममता और वासना के बीच का संघर्ष खत्म हो चुका था। उन्होंने धीरे से अपना हाथ मेरे सीने पर रखा और बहुत ही कोमल लेकिन दृढ़ता के साथ मेरी टी शर्ट को ऊपर की ओर खींचना शुरू किया। उनकी उँगलियाँ मेरी त्वचा को सहलाते हुए मेरे शरीर से कपड़ा अलग कर रही थीं। जैसे ही मेरी टी शर्ट सिर के ऊपर से निकली और बिस्तर पर गिरी, मुझे उनकी गर्म हथेलियों का अहसास अपनी नग्न छाती पर हुआ। वह मेरे शरीर की गर्मी को महसूस करना चाहती थीं।
फिर उनके हाथ मेरे पजामे की गाँठ तक पहुँचे। उनकी साँसें अब और भी भारी और अनियंत्रित हो चुकी थीं। उन्होंने बहुत ही धीमी और काँपती हुई उँगलियों से पजामे की गाँठ को ढीला किया। जैसे ही पजामे का दबाव कम हुआ, उन्होंने उसे धीरे धीरे मेरे पैरों के नीचे तक सरका दिया। उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे नग्न शरीर को ऐसे सहलाया जैसे वह किसी पवित्र वस्तु को छू रही हों, लेकिन उनके बदन में एक अलग ही प्यास मै fमहसूस कर रहा था।
मैंने अपनी आँखें नहीं खोलीं, लेकिन मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था। मैंने धीरे से अपनी उँगलियों को उनके शरीर पर और गहराई से चलाना शुरू किया। जैसे ही मेरा हाथ उनके शरीर के उभारों से टकराया, उनके शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपना सिर धीरे से मेरे कंधे की ओर झुका दिया। उनकी गर्म साँसें अब मेरी गर्दन को छू रही थीं।
तभी उन्होंने बहुत ही धीमी और काँपती हुई आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा, *"रवि... मेरा बच्चा..."* उनकी आवाज़ में ममता कम और एक औरत की बेबसी ज़्यादा थी। उन्होंने अपना नग्न शरीर धीरे से मेरे शरीर के साथ सटा लिया। उनकी त्वचा की गर्मी अब मेरे पूरे शरीर में उतर रही थी। उस सन्नाटे में, दो शरीरों का आपस में टकराना और उनकी रगड़ का अहसास इतना तीव्र था कि मेरा नियंत्रण खोने लगा था। मैंने महसूस किया कि वह अब खुद को पूरी तरह ढीला छोड़ चुकी थीं, जैसे वह चाहती हों कि मैं अब आगे बढ़ूँ और जो कुछ भी होना है, उसे होने दूँ।
अंधेरे कमरे में अब सिर्फ दो जिस्मों की बेताबी और उनकी भारी होती सांसों का शोर था। हमारे दोनों के नग्न शरीर पूरी तरह एक दूसरे में उलझ चुके थे। मम्मी की त्वचा की वो रेशमी गर्माहट और उनके शरीर का भारीपन मेरे ऊपर इस कदर हावी था कि मेरा दिमाग काम करना बंद कर चुका था। उनके नग्न अंगों का मेरे शरीर से रगड़ खाना एक ऐसी बिजली पैदा कर रहा था जो मेरे पूरे वजूद को झकझोर रही थी।
मम्मी ने अपनी बेताबी को और बढ़ाते हुए मुझे बिस्तर पर पूरी तरह दबा लिया। उनके शरीर का हर उभार, उनकी छाती की कोमलता और उनके अंगों का दबाव मेरे अंगों से टकराकर मुझे पागल कर रहा था। उनकी सांसें मेरी गर्दन पर तप रही थीं। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के, अपनी पूरी वासना को मुझ पर जाहिर कर दिया। उनके हाथों का स्पर्श अब और भी उग्र और बेखौफ हो गया था।
जैसे ही उन्होंने खुद को पूरी तरह मेरे करीब लाया, हमारे बीच का घर्षण चरम पर पहुँच गया। उनके शरीर की उत्तेजना और मेरी बेकाबू होती प्यास ने मिलकर एक ऐसा माहौल बना दिया था जहाँ अब कोई मर्यादा नहीं बची थी। उनके अंगों का मेरे अंगों के साथ वो जबरदस्त और रसीला घर्षण अब एक गहरे मिलन की ओर बढ़ रहा था।
मम्मी की आँखों में एक अजीब सी मदहोशी थी और उनके शरीर की हर हरकत मुझे और भी उत्तेजित कर रही थी। उनके नग्न शरीर की रगड़ और उनकी भारी साँसों के बीच, अब हम दोनों एक ऐसी चरम सीमा की ओर बढ़ रहे थे जहाँ सिर्फ मांस का मांस से टकराना और एक दूसरे के भीतर समा जाने की तीव्र इच्छा ही शेष थी। वह पल इतना उग्र और तीव्र था कि ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया थम गई है और बस हम दोनों का यह नग्न और अनियंत्रित मिलन ही सच है।
> "...अंधेरे में हम दोनों की साँसें एक दूसरे के शरीर से टकरा रही थीं। तभी अचानक... **'खट... खट... खट...'**।
>
> दरवाज़े पर किसी के धीरे धीरे दस्तक देने की आवाज़ आई। मेरे शरीर का खून जैसे जम गया। मम्मी का हाथ मेरे कंधे पर कस गया और उनकी साँसें एकदम से थम गईं। हम दोनों बिना किसी हरकत के, पत्थर की तरह बिस्तर पर पड़े रहे। अंधेरे में डर और वासना का ऐसा संगम था कि समझ नहीं आ रहा था कि मैं डर से कांप रहा हूँ या उत्तेजना से। क्या कोई हमें इस हाल में देख लेगा? क्या हमारी ये गुनाहगार रात यहीं खत्म हो जाएगी?"


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