22-08-2026, 02:04 PM
पूजा बाबाजी की प्रशंसा सुनकर मन ही मन खिल उठी। एक स्त्री के लिए अपने शरीर की इतनी कच्ची और लालच भरी तारीफ पाकर उसके अंदर का नारीत्व संतुष्ट हो रहा था। उसने दोनों हाथों से अपने भारी, दूध से भरे बोब्लो को थोड़ा और ऊपर उठाया और बाबाजी के चेहरे को अपनी छातियों में पूरी तरह दबा दिया - जैसे कोई नवजात शिशु माँ के स्तन से लिपटा हो। और उसे अपना दूध पिला रही हो। प्रस्तुतकर्ता मैत्री है।
“चूसिए बाबाजी… जितना मन करे…” पूजा ने काँपती आवाज़ में कहा।
बाबाजी ने लालच भरी तृप्ति से एक-एक करके दोनों बोब्लो के निपल को मुँह में भरा, दाँतों से हल्का-हल्का काटा, जीभ से चक्ती हुई चूसने लगे। साथ ही नीचे उनकी कमर तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगी। उनके मोटे लंड का मर्दन पूजा की चूत में और भी जोरदार हो गया। कमरे में चमड़ी की चप-चप, पसीने की छप-छप और दोनों की दबी हुई कराहों का मिश्रित संगीत गूँज रहा था।
गाड़ी पूरी चरम सीमा पर दौड़ रही थी।
अंत में बाबाजी ने जोर से कराहते हुए अपना पूरा गाढ़ा, गरम रस पूजा की रसीली चूत की गहराई में उड़ेल दिया। उनकी गोटियाँ सिकुड़कर खाली हो गईं। पूजा भी उनके ऊपर लुढ़क गई, दोनों एक-दूसरे से चिपके पड़े रहे।
कुछ देर बाद बाबाजी ने साँस लेते हुए कहा, “अह्ह्ह्ह पूजा… मजा आ गया। सच में तुम काम की मूरत हो। तुम जितने दिन तक इन सुखों से वंचित रही, मैं उसकी पूरी भरपाई करूँगा। अब से हर रोज़… दुगना, तिगुना मजा दूँगा।” लेखिका फनलव के साथ मैत्री।
पूजा शर्म और आनंद से मुस्कुराई। वह नीचे सरकी और बाबाजी के अभी भी अर्ध-खड़े, अपने ही रस से चिपचिपे लंड को मुँह में ले लिया। उसने पूरी निष्ठा से उसे चूसा, साफ़ किया, जीभ से हर बूँद तक पी ली।
फिर दोनों नंगे ही उठे और बाथरूम में घुस गए। वहाँ गर्म पानी के नीचे एक-दूसरे को साबुन लगाते, चूमते, सहलाते रहे। नहाकर पूजा ने कपड़े पहने, बालों में उँगलियाँ फिराईं और पीछे वाले दरवाज़े से निकलकर तेज़ी से अपने घर की ओर चल दी।
हमेशा की तरह आज भी किसी ने उसे जाते हुए नहीं देखा।
*****
रात के नौ बज चुके थे।
सभी पूजा-पाठ और आश्रम के कामकाज से निवृत्त होकर बाबाजी जैसे ही अपने कक्ष में पहुँचे, पीछे वाले दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। वे मुस्कुराए, समझ गए की गोपाल ही होगा।
दरवाज़ा खोला तो गोपाल अंदर सरक गया। उसकी सब्ज़ी वाली रेहड़ी बाहर ही खड़ी थी। हाथ में शराब की बोतल और कागज़ के लिफाफे में नमकीन-भुजिया।
दोनों अंदर बैठ गए। गोपाल ने चुपचाप दो गिलास बनाए। पहला, दूसरा, तीसरा… पीते गए।
हमेशा की तरह दो गिलास के बाद गोपाल की ज़बान खुल गई। आज वह पहले से ज़्यादा नशे में और बड़बड़ा रहा था।
“बाबाजी जी… आप कितने सुखी हो। अकेले रहते हो, कोई टोकने वाला नहीं। घर-गृहस्थी के बंधनों से आज़ाद। और देखो मुझे… बीबी तो है, पर उसका सुख नहीं मिलता। साली, कुतिया अपने पास फटकने भी नहीं देती। बोलती है, ‘बेटी बड़ी हो गई है, शराब पीकर मत आया करो, अब ये सब शोभा नहीं देता।“
गोपाल ने एक और घूँट लिया और तीखे स्वर में बोला,
“अरे बाबाजी जी… एक आदमी पूरा दिन मेहनत करके जब घर आता है तो उसे सिर्फ़ दो ही चीज़ों की तमन्ना होती है - एक दारू, दूसरी अपनी बीबी की चूत। पर यहाँ तो साली दोनों के लिए मना कर देती है। अब आप ही बताइए बाबाजी… मैं क्या करूँ?”
बाबाजी चुपचाप सिप लेते रहे। उनकी आँखों में एक गहरी चमक थी। वे गोपाल की हर शिकायत का आनंद ले रहे थे। संपादिका फनलव है।
जब गोपाल थोड़ा रुका तो बाबाजी धीरे से बोले, “मैं समझ सकता हूँ गोपाल… तुम्हें कितनी तकलीफ़ होती होगी जब मयूरी भाभी तुम्हें अपनी चू…”
बाबाजी जी “चूत” शब्द कहते ही रुक गए। उन्होंने जानबूझकर रुककर गोपाल का चेहरा देखा।
गोपाल नशे में झूमते हुए बोला, “हाँ… चूत… बोलिए ना। आजकल तो यह शब्द भी सुनने को नहीं मिलता।”
बाबाजी ने गिलास रखा और थोड़ा आगे झुककर गंभीर स्वर में कहा, “गोपाल… मयूरी अच्छी स्त्री है। लेकिन वो भी औरत है। उसे भी प्यार चाहिए, ध्यान चाहिए, और हाँ… शरीर का सुख भी चाहिए। शायद तुम उसे वो नहीं दे पा रहे हो जिसकी उसे ज़रूरत है।”
गोपाल ने निराश स्वर में पूछा, “तो अब मैं क्या करूँ बाबाजी?”
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आज के लिए बस यही तक।
अगला एपिसोड आपके कोमेंट्स आने के बाद तुरंत।
तब तक मैत्री पटेल की तरफ से जय भारत।।
“चूसिए बाबाजी… जितना मन करे…” पूजा ने काँपती आवाज़ में कहा।
बाबाजी ने लालच भरी तृप्ति से एक-एक करके दोनों बोब्लो के निपल को मुँह में भरा, दाँतों से हल्का-हल्का काटा, जीभ से चक्ती हुई चूसने लगे। साथ ही नीचे उनकी कमर तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगी। उनके मोटे लंड का मर्दन पूजा की चूत में और भी जोरदार हो गया। कमरे में चमड़ी की चप-चप, पसीने की छप-छप और दोनों की दबी हुई कराहों का मिश्रित संगीत गूँज रहा था।
गाड़ी पूरी चरम सीमा पर दौड़ रही थी।
अंत में बाबाजी ने जोर से कराहते हुए अपना पूरा गाढ़ा, गरम रस पूजा की रसीली चूत की गहराई में उड़ेल दिया। उनकी गोटियाँ सिकुड़कर खाली हो गईं। पूजा भी उनके ऊपर लुढ़क गई, दोनों एक-दूसरे से चिपके पड़े रहे।
कुछ देर बाद बाबाजी ने साँस लेते हुए कहा, “अह्ह्ह्ह पूजा… मजा आ गया। सच में तुम काम की मूरत हो। तुम जितने दिन तक इन सुखों से वंचित रही, मैं उसकी पूरी भरपाई करूँगा। अब से हर रोज़… दुगना, तिगुना मजा दूँगा।” लेखिका फनलव के साथ मैत्री।
पूजा शर्म और आनंद से मुस्कुराई। वह नीचे सरकी और बाबाजी के अभी भी अर्ध-खड़े, अपने ही रस से चिपचिपे लंड को मुँह में ले लिया। उसने पूरी निष्ठा से उसे चूसा, साफ़ किया, जीभ से हर बूँद तक पी ली।
फिर दोनों नंगे ही उठे और बाथरूम में घुस गए। वहाँ गर्म पानी के नीचे एक-दूसरे को साबुन लगाते, चूमते, सहलाते रहे। नहाकर पूजा ने कपड़े पहने, बालों में उँगलियाँ फिराईं और पीछे वाले दरवाज़े से निकलकर तेज़ी से अपने घर की ओर चल दी।
हमेशा की तरह आज भी किसी ने उसे जाते हुए नहीं देखा।
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रात के नौ बज चुके थे।
सभी पूजा-पाठ और आश्रम के कामकाज से निवृत्त होकर बाबाजी जैसे ही अपने कक्ष में पहुँचे, पीछे वाले दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। वे मुस्कुराए, समझ गए की गोपाल ही होगा।
दरवाज़ा खोला तो गोपाल अंदर सरक गया। उसकी सब्ज़ी वाली रेहड़ी बाहर ही खड़ी थी। हाथ में शराब की बोतल और कागज़ के लिफाफे में नमकीन-भुजिया।
दोनों अंदर बैठ गए। गोपाल ने चुपचाप दो गिलास बनाए। पहला, दूसरा, तीसरा… पीते गए।
हमेशा की तरह दो गिलास के बाद गोपाल की ज़बान खुल गई। आज वह पहले से ज़्यादा नशे में और बड़बड़ा रहा था।
“बाबाजी जी… आप कितने सुखी हो। अकेले रहते हो, कोई टोकने वाला नहीं। घर-गृहस्थी के बंधनों से आज़ाद। और देखो मुझे… बीबी तो है, पर उसका सुख नहीं मिलता। साली, कुतिया अपने पास फटकने भी नहीं देती। बोलती है, ‘बेटी बड़ी हो गई है, शराब पीकर मत आया करो, अब ये सब शोभा नहीं देता।“
गोपाल ने एक और घूँट लिया और तीखे स्वर में बोला,
“अरे बाबाजी जी… एक आदमी पूरा दिन मेहनत करके जब घर आता है तो उसे सिर्फ़ दो ही चीज़ों की तमन्ना होती है - एक दारू, दूसरी अपनी बीबी की चूत। पर यहाँ तो साली दोनों के लिए मना कर देती है। अब आप ही बताइए बाबाजी… मैं क्या करूँ?”
बाबाजी चुपचाप सिप लेते रहे। उनकी आँखों में एक गहरी चमक थी। वे गोपाल की हर शिकायत का आनंद ले रहे थे। संपादिका फनलव है।
जब गोपाल थोड़ा रुका तो बाबाजी धीरे से बोले, “मैं समझ सकता हूँ गोपाल… तुम्हें कितनी तकलीफ़ होती होगी जब मयूरी भाभी तुम्हें अपनी चू…”
बाबाजी जी “चूत” शब्द कहते ही रुक गए। उन्होंने जानबूझकर रुककर गोपाल का चेहरा देखा।
गोपाल नशे में झूमते हुए बोला, “हाँ… चूत… बोलिए ना। आजकल तो यह शब्द भी सुनने को नहीं मिलता।”
बाबाजी ने गिलास रखा और थोड़ा आगे झुककर गंभीर स्वर में कहा, “गोपाल… मयूरी अच्छी स्त्री है। लेकिन वो भी औरत है। उसे भी प्यार चाहिए, ध्यान चाहिए, और हाँ… शरीर का सुख भी चाहिए। शायद तुम उसे वो नहीं दे पा रहे हो जिसकी उसे ज़रूरत है।”
गोपाल ने निराश स्वर में पूछा, “तो अब मैं क्या करूँ बाबाजी?”
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आज के लिए बस यही तक।
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तब तक मैत्री पटेल की तरफ से जय भारत।।



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