22-08-2026, 01:55 PM
बाबाजी ने अपनी मोटी आवाज़ में कहा,
“और रही बात ऋचा की पढ़ाई की, तो तुम इसकी चिंता मत करो मयूरी। कोष में आने वाले पैसों से उसकी आगे की पढ़ाई पूरी हो जाएगी। मैं तुम्हें कहता हूँ, इसे मना मत करना। ऊपर वाले को यही मंजूर है कि तुम्हारी बेटी उच्च शिक्षा प्राप्त करे। इसे एहसान मत समझना। जब भी तुम्हारे पास कुछ पैसे हों, कोष में डाल देना। ऋण उतर जाएगा।”
बाबाजी की बात सुनते ही मयूरी की आँखों में आँसू छलक आए। वह भाव-विभोर होकर आगे बढ़ी और उनके पैरों में झुक गई। बाबाजी ने मुस्कुराते हुए अपना दाहिना हाथ उसके कंधे पर रखा, फिर धीरे-धीरे नीचे सरकाकर उसकी कमर पर टिका दिया। उँगलियाँ उसकी ब्रा की पट्टी को महसूस करते हुए रगड़ने लगीं। मयूरी का मांसल, परिपक्व शरीर उनकी स्पर्श के नीचे थरथरा उठा, लेकिन वह कुछ नहीं बोली। मैत्री की प्रस्तुति।
“ऋचा, बेटा, इधर आ,” मयूरी ने अपनी बेटी को पुकारा,
“बाबाजी के पैर छू। उनके आशीर्वाद से अब तुझे किसी बात की चिंता नहीं करनी है। तू आगे पढ़ सकेगी, सपने पूरे कर सकेगी।”
ऋचा धीरे से आगे आई। अठारह साल की यह नाजुक-सी लड़की अपनी माँ के ठीक उलट थी - दुबली-पतली, कोमल, अभी-अभी खिलने वाली। उसके स्तन अभी-अभी उभरकर छोटे-छोटे उभार लेने लगे थे, कूल्हे हल्के से गोलाई पकड़ रहे थे। वह झुककर बाबाजी के पैर छूती है तो उसके लंबे काले बाल उनके घुटनों पर बिखर गए।
बाबाजी ने पहली बार उसे इस नजर से देखा। उनका हाथ धीरे से उसके सिर पर पड़ा, बालों में उँगलियाँ फिराईं। फिर उनकी नजर उठकर मयूरी के भारी, छलकते उरोजों पर टिक गई। वे दोनों माँ-बेटी को एक साथ देख रहे थे - एक परिपक्व, रस भरा शरीर, दूसरा कोमल और ताज़ा। उनके मन में एक गहरी, अंधेरी लालसा जाग उठी। और वह चक्षु चोदन करने लगे।
“जय बाबा,” दोनों ने कहा और प्रसाद लेकर लौटने लगीं।
जाते-जाते मयूरी ने ऋचा को थोड़ा आगे भेज दिया और वापस लौट आई। उसने धीमी, कंपकंपी वाली आवाज़ में कहा, “बाबाजी… इन्होंने (पति) जो भी आपके सामने हमारे बारे में कहा है, उसके बारे में मैं कल दोपहर को विस्तार से बात करना चाहती हूँ। इसी समय आउंगी।”
बाबाजी की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने सिर्फ़ सिर हिलाया।
जैसे ही दोनों चली गईं, बाबाजी के होंठों पर एक विजयी मुस्कान फैल गई।
“पहले पूजा… अब मयूरी… और अगर यह माँ-बेटी दोनों मिल जाएँ तो…” उन्होंने मन ही मन सोचा। लेकिन अभी तो उनके कमरे में पूजा इंतजार कर रही थी। पूरी तरह नंगी। चुदने के लिए तैयार। मैत्री की रचना।
बाबाजी ने दरवाज़ा खोला तो अंदर का दृश्य देखकर उनका लंड धोती के अंदर ही फड़क उठा।
पूजा नहाकर निकली थी। उसकी पीठ उनकी तरफ थी। वह झुकी हुई थी, अपनी जाँघों और पिंडलियों से पानी पोंछ रही थी। नहाने के बाद उसकी चिकनी, गेहुँआन त्वचा पर पानी की बूँदें अभी भी चमक रही थीं। उसकी मोटी, गोल, भरी-भरी गांड इस मुद्रा में और भी उभरकर बाहर निकल आई थी - दो बड़े, निचले, लुभावने गोले। ठीक उसके गुदा द्वार के नीचे उसकी चूत के मोटे, रस से भीगे होंठ ऊपर से नीचे की तरफ़ खुलकर दिख रहे थे। कुछ पानी की बूँदें और कुछ उसकी अपनी उत्तेजना की चिपचिपी बूँदें धीरे-धीरे निकल रही थीं।
बाबाजी की सहनशक्ति टूट गई।
वे झपटे। पीछे से झुककर अपना चेहरा सीधे उसके दोनों जाँघों के बीच धकेल दिया। उनकी गर्म, मोटी जीभ एक ही झटके में पूजा की चूत के भीतर तक घुस गई।
“आह्ह्ह…!” पूजा चौंककर काँप उठी। उसके घुटने थरथरा गए। लेकिन अगले ही पल जब बाबाजी की जीभ उसके रस से लबालब सागर में डुबकियाँ लगाने लगी, तो उसके पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई। वह मचल उठी, पीछे हटकर अपनी भारी गांड को और जोर से उनके मुँह पर दबा दिया।
“बाबाजी… उफ्फ्… धीरे…” उसकी आवाज़ में वासना और समर्पण दोनों थे।
बाबाजी ने दोनों हाथों से उसके मोटे नितंबों को फैलाया और पूरी तन्मयता से चूसने-चाटने लगे। उनकी जीभ कभी उसकी चूत के अंदर गहराई तक जाती, कभी क्लिटोरिस को तेज़ी से चाटती। पूजा के मुँह से अनियंत्रित कराहें निकलने लगीं। उसका शरीर पसीने से तर हो रहा था।
कुछ ही देर बाद बाबाजी उठे, अपनी धोती उतारी और अपना मोटा, खड़ा लोडा पूजा की भीगी चूत पर रगड़ने लगे…
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जुड़े रहिये दोस्तों।
मैत्री पटेल.
“और रही बात ऋचा की पढ़ाई की, तो तुम इसकी चिंता मत करो मयूरी। कोष में आने वाले पैसों से उसकी आगे की पढ़ाई पूरी हो जाएगी। मैं तुम्हें कहता हूँ, इसे मना मत करना। ऊपर वाले को यही मंजूर है कि तुम्हारी बेटी उच्च शिक्षा प्राप्त करे। इसे एहसान मत समझना। जब भी तुम्हारे पास कुछ पैसे हों, कोष में डाल देना। ऋण उतर जाएगा।”
बाबाजी की बात सुनते ही मयूरी की आँखों में आँसू छलक आए। वह भाव-विभोर होकर आगे बढ़ी और उनके पैरों में झुक गई। बाबाजी ने मुस्कुराते हुए अपना दाहिना हाथ उसके कंधे पर रखा, फिर धीरे-धीरे नीचे सरकाकर उसकी कमर पर टिका दिया। उँगलियाँ उसकी ब्रा की पट्टी को महसूस करते हुए रगड़ने लगीं। मयूरी का मांसल, परिपक्व शरीर उनकी स्पर्श के नीचे थरथरा उठा, लेकिन वह कुछ नहीं बोली। मैत्री की प्रस्तुति।
“ऋचा, बेटा, इधर आ,” मयूरी ने अपनी बेटी को पुकारा,
“बाबाजी के पैर छू। उनके आशीर्वाद से अब तुझे किसी बात की चिंता नहीं करनी है। तू आगे पढ़ सकेगी, सपने पूरे कर सकेगी।”
ऋचा धीरे से आगे आई। अठारह साल की यह नाजुक-सी लड़की अपनी माँ के ठीक उलट थी - दुबली-पतली, कोमल, अभी-अभी खिलने वाली। उसके स्तन अभी-अभी उभरकर छोटे-छोटे उभार लेने लगे थे, कूल्हे हल्के से गोलाई पकड़ रहे थे। वह झुककर बाबाजी के पैर छूती है तो उसके लंबे काले बाल उनके घुटनों पर बिखर गए।
बाबाजी ने पहली बार उसे इस नजर से देखा। उनका हाथ धीरे से उसके सिर पर पड़ा, बालों में उँगलियाँ फिराईं। फिर उनकी नजर उठकर मयूरी के भारी, छलकते उरोजों पर टिक गई। वे दोनों माँ-बेटी को एक साथ देख रहे थे - एक परिपक्व, रस भरा शरीर, दूसरा कोमल और ताज़ा। उनके मन में एक गहरी, अंधेरी लालसा जाग उठी। और वह चक्षु चोदन करने लगे।
“जय बाबा,” दोनों ने कहा और प्रसाद लेकर लौटने लगीं।
जाते-जाते मयूरी ने ऋचा को थोड़ा आगे भेज दिया और वापस लौट आई। उसने धीमी, कंपकंपी वाली आवाज़ में कहा, “बाबाजी… इन्होंने (पति) जो भी आपके सामने हमारे बारे में कहा है, उसके बारे में मैं कल दोपहर को विस्तार से बात करना चाहती हूँ। इसी समय आउंगी।”
बाबाजी की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने सिर्फ़ सिर हिलाया।
जैसे ही दोनों चली गईं, बाबाजी के होंठों पर एक विजयी मुस्कान फैल गई।
“पहले पूजा… अब मयूरी… और अगर यह माँ-बेटी दोनों मिल जाएँ तो…” उन्होंने मन ही मन सोचा। लेकिन अभी तो उनके कमरे में पूजा इंतजार कर रही थी। पूरी तरह नंगी। चुदने के लिए तैयार। मैत्री की रचना।
बाबाजी ने दरवाज़ा खोला तो अंदर का दृश्य देखकर उनका लंड धोती के अंदर ही फड़क उठा।
पूजा नहाकर निकली थी। उसकी पीठ उनकी तरफ थी। वह झुकी हुई थी, अपनी जाँघों और पिंडलियों से पानी पोंछ रही थी। नहाने के बाद उसकी चिकनी, गेहुँआन त्वचा पर पानी की बूँदें अभी भी चमक रही थीं। उसकी मोटी, गोल, भरी-भरी गांड इस मुद्रा में और भी उभरकर बाहर निकल आई थी - दो बड़े, निचले, लुभावने गोले। ठीक उसके गुदा द्वार के नीचे उसकी चूत के मोटे, रस से भीगे होंठ ऊपर से नीचे की तरफ़ खुलकर दिख रहे थे। कुछ पानी की बूँदें और कुछ उसकी अपनी उत्तेजना की चिपचिपी बूँदें धीरे-धीरे निकल रही थीं।
बाबाजी की सहनशक्ति टूट गई।
वे झपटे। पीछे से झुककर अपना चेहरा सीधे उसके दोनों जाँघों के बीच धकेल दिया। उनकी गर्म, मोटी जीभ एक ही झटके में पूजा की चूत के भीतर तक घुस गई।
“आह्ह्ह…!” पूजा चौंककर काँप उठी। उसके घुटने थरथरा गए। लेकिन अगले ही पल जब बाबाजी की जीभ उसके रस से लबालब सागर में डुबकियाँ लगाने लगी, तो उसके पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई। वह मचल उठी, पीछे हटकर अपनी भारी गांड को और जोर से उनके मुँह पर दबा दिया।
“बाबाजी… उफ्फ्… धीरे…” उसकी आवाज़ में वासना और समर्पण दोनों थे।
बाबाजी ने दोनों हाथों से उसके मोटे नितंबों को फैलाया और पूरी तन्मयता से चूसने-चाटने लगे। उनकी जीभ कभी उसकी चूत के अंदर गहराई तक जाती, कभी क्लिटोरिस को तेज़ी से चाटती। पूजा के मुँह से अनियंत्रित कराहें निकलने लगीं। उसका शरीर पसीने से तर हो रहा था।
कुछ ही देर बाद बाबाजी उठे, अपनी धोती उतारी और अपना मोटा, खड़ा लोडा पूजा की भीगी चूत पर रगड़ने लगे…
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जुड़े रहिये दोस्तों।
मैत्री पटेल.



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