21-08-2026, 08:25 PM
रामू जी धीरे से नीचे झुके।
रुही के हाथ अपने-आप उनके चौड़े कंधों पर जा रखे। उंगलियाँ उनकी गर्म त्वचा पर काँप रही थीं। रामू ने उसकी मिनी नाइटी के किनारे पकड़े और धीरे-धीरे जाँघों से ऊपर सरका दिए। नाइटी कमर तक उठ गई। फिर उन्होंने सिर झुकाया और उसकी नरम, गोरी जाँघों पर होंठ रख दिए।
पहले हल्के चुम्बन। फिर धीरे-धीरे और अंदर की तरफ। दाँत हल्के से त्वचा को दबाते, जीभ से चाटते। रुही की कमर लचक गई। साँस अटक गई। रोमांच और उत्तेजना इतनी तेज़ थी कि उसकी चूत से एक-दो बूँद पेशाब बिना नियंत्रण के निकल गई। गर्म बूँदें उसकी जाँघ के अंदरूनी हिस्से पर बह गईं।
रामू ने महसूस किया। उन्होंने सिर उठाए बिना ही कहा, “हूँ… निकल रही है?”
रुही शर्म से मर रही थी। आवाज़ काँपती हुई निकली, “रामू जी… छोड़ो… मैं… कंट्रोल नहीं कर पा रही…”
रामू ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने उसकी छोटी लाल पैंटी के इलास्टिक में उंगलियाँ डालकर उसे जाँघों से नीचे सरका दिया। पूरी तरह नहीं उतारी—सिर्फ घुटनों तक लाकर छोड़ दी। पैंटी उसके पैरों में उलझी रह गई। अब उसकी चिकनी, मुंडा हुआ चूत पूरी तरह खुली थी।
रुही की हालत खराब थी। शर्म और उत्तेजना दोनों चरम पर थीं। उसने दोनों हाथों से अपना मुँह ढक लिया। आँखें बंद थीं।
रामू ने अपना बड़ा हाथ उसकी चूत पर फेरा। दो उंगलियाँ उसके गीले होंठों के बीच से गुज़रीं। फिर उन्होंने मर्दाना हँसी के साथ कहा—
“देख… कितनी गीली हो गई है तेरी चूत। इतनी शर्म आ रही है, फिर भी पानी छोड़ रही है।”
रुही ने सिर झुकाया। आवाज़ में रोना था, “मत छुओ… प्लीज… बहुत शर्म आ रही है… रामू जी…”
रामू उनकी बात अनसुनी करके और नीचे झुके। उन्होंने उसकी चिकनी चूत पर सीधे होंठ रख दिए। पहले एक लंबा, गहरा चुम्बन। फिर जीभ निकालकर उसके गीले होंठों के बीच चाटा। रुही की कमर उछल गई। एक सिसकारी निकल गई।
रामू ने मुँह लगाए हुए ही कहा, “क्या चिकना माल है तू। बिल्कुल मुलायम… साफ…।” उन्होंने फिर चाटा। “भेंचोद, वो पागल चूतिया सनी कितना बदकिस्मत है… इतना कीमती माल छोड़कर दूसरे शहर धन कमाने निकल गया। इसकी चूत यहाँ पड़ी तरस रही है, और वो बिज़नेस की फिक्र में है।”
रुही के आँसू निकल आए। शर्म से वह जल रही थी, लेकिन शरीर उनकी जीभ के आगे बेबस था। उसने बहुत हिम्मत करके, काँपती आवाज़ में कहा—
“आज… आज ही शेव की है… आपके लिए…”
रामू ने सिर उठाया। उनके होंठ चमक रहे थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए रुही की आँखों में देखा।
“मेरे लिए?” उन्होंने दोहराया। आवाज़ में संतुष्टि थी। “अच्छी लड़की। तू सीख रही है। अब याद रख… ये चूत सिर्फ मेरे लिए साफ रहेगी। समझी?”
रुही ने आँखें बंद करके सिर हिलाया। आवाज़ लगभग फुसफुसाहट थी—
“हाँ… रामू जी… सिर्फ आपके लिए…”
रामू ने फिर से उसका सिर अपनी जाँघों के बीच दबाया और नीचे जाकर दोबारा उसकी चिकनी चूत चूमने लगे। इस बार और जोर से, और भूखे होकर। रुही की सिसकारियाँ बाथरूम में गूँजने लगीं। शर्म अभी भी थी… लेकिन अब वह उनके मुँह के आगे पूरी तरह खुल चुकी थी।
रामू जी ने अपनी दोनों उंगलियों से रुही की चूत की फाँकों को धीरे से लेकिन मजबूती से खोल दिया। गुलाबी, चिकनी और गीली हुई पंखड़ियाँ उनके अंगूठे और उंगली के बीच फैल गईं। उन्होंने नज़दीक से देखा और भारी आवाज़ में कहा—
“चल… अब मूत।”
रुही की आँखें फटी की फटी रह गईं। शर्म से उसका पूरा चेहरा, गर्दन और छाती तक लाल हो गया। उसने दोनों हाथों से अपना मुँह ढक लिया और काँपती आवाज़ में बोली—
“रामू जी… ऐसे कैसे…? प्लीज… आप बाहर चले जाइए न… मैं अकेली कर लूँगी… बहुत शर्म आ रही है… प्लीज…”
रामू की आँखें सिकुड़ गईं। उनकी आवाज़ में हल्का गुस्सा और पूरा मर्दाना हक झलक रहा था—
“सुना नहीं तूने? मैंने कहा मूत। अभी। मेरे सामने। मेरी उंगलियों के बीच। ये मेरा हक है। तू मेरी है। तेरा मूत भी मेरा है। चल… निकाल।”
रुही डर गई। आँखों में आँसू आ गए। शरीर काँप रहा था। पेशाब का दबाव पहले से ही बहुत ज्यादा था। अब उनके सख्त हुक्म ने बचाव की आखिरी दीवार भी तोड़ दी। वह सिसकते हुए बोली—
“रामू जी… माफ़ करना… मैं… मैं कर रही हूँ…”
फिर उसने आँखें बंद कर लीं और अपने आप को छोड़ दिया।
पहले एक हल्की धार निकली। फिर दबाव इतना ज्यादा था कि पेशाब की तेज़ धार “शूऊऊऊ… शूऊऊ…” की आवाज़ के साथ फूट पड़ी। गरम पेशाब की धार रामू की उंगलियों और हथेली पर सीधे जाकर गिरने लगी। उनकी उंगलियाँ पूरी तरह गीली हो गईं। धार की आवाज़ बाथरूम में साफ गूँज रही थी। रुही की जाँघें काँप रही थीं। वह दोनों हाथों से अपना मुँह दबाए हुए सिसक रही थी।
रामू ने उसकी फाँकों को और फैलाए रखा। पेशाब उनकी हथेली से होते हुए नीचे टॉयलेट में गिर रही थी। उन्होंने मर्दाना संतुष्टि के साथ कहा—
“हाँ… ऐसे ही। पूरी निकाल। दबा मत। मैं देख रहा हूँ तेरा मूत। कितनी तेज़ धार है तेरी…”
रुही रोते-रोते बोली, “बहुत शर्म आ रही है… रामू जी… माफ़ कर दो… अब और मत देखो…”
“शर्म रख अपनी,” रामू ने सख्ती से कहा। “मैं तेरा मर्द हूँ। तू मेरे सामने मूत रही है तो क्या हुआ? तू मेरी बहू है। मेरी औरत है। तेरा ये शरीर, ये चूत, ये मूत… सब मेरा है। समझी?”
रुही ने सिर्फ सिर हिलाया। आँसू उसकी आँखों से बह रहे थे। पेशाब अभी भी निकल रही थी—अब धार थोड़ी धीमी हो चली थी, लेकिन रुक नहीं रही थी। रामू की उंगलियाँ पूरी तरह गीली और गर्म थीं। उन्होंने जानबूझकर अपनी उंगली को उसकी चूत के छेद पर फेरा, जहाँ से अभी पेशाब निकल रही थी।
“देख,” उन्होंने कहा, “मेरा हाथ तेरे मूत से कितना गीला हो गया। अब बता… कैसा लग रहा है मेरे सामने मूत करके?”
रुही की आवाज़ टूट रही थी, “शर्म… बहुत शर्म आ रही है… लेकिन… मैं कुछ नहीं कर सकती… आप… आप जैसा कह रहे हो…”
रामू ने उसकी फाँकों को अभी भी खुला रखा और आखिरी बूँदें निकलने तक इंतज़ार किया। जब धार लगभग रुक गई तो उन्होंने अपनी गीली उंगलियों को उसकी चूत पर धीरे से फेरा और कहा—
“अच्छी लड़की। अब याद रख… जब भी मैं कहूँ, तू मेरे सामने मूतेगी। कोई शर्म नहीं। कोई मना नहीं। ये मेरा मर्दाना हक है। और तू मेरी समर्पित बहू है।”
रुही पूरी तरह टूट चुकी थी। शर्म, डर, उत्तेजना और समर्पण सब एक साथ। उसने आँखें बंद किए हुए सिर्फ इतना फुसफुसाया—
“हाँ… रामू जी… आपका हक है… मैं… मैं आपकी हूँ…”
पेशाब की आखिरी बूँदें टपक रही थीं। रामू का हाथ अभी भी उसकी खुली चूत पर था—गीला, गर्म और मालिकाना। और रुही… बस उनकी उंगलियों के बीच बैठी अपनी शर्म और समर्पण को एक साथ जी रही थी।
रुही के हाथ अपने-आप उनके चौड़े कंधों पर जा रखे। उंगलियाँ उनकी गर्म त्वचा पर काँप रही थीं। रामू ने उसकी मिनी नाइटी के किनारे पकड़े और धीरे-धीरे जाँघों से ऊपर सरका दिए। नाइटी कमर तक उठ गई। फिर उन्होंने सिर झुकाया और उसकी नरम, गोरी जाँघों पर होंठ रख दिए।
पहले हल्के चुम्बन। फिर धीरे-धीरे और अंदर की तरफ। दाँत हल्के से त्वचा को दबाते, जीभ से चाटते। रुही की कमर लचक गई। साँस अटक गई। रोमांच और उत्तेजना इतनी तेज़ थी कि उसकी चूत से एक-दो बूँद पेशाब बिना नियंत्रण के निकल गई। गर्म बूँदें उसकी जाँघ के अंदरूनी हिस्से पर बह गईं।
रामू ने महसूस किया। उन्होंने सिर उठाए बिना ही कहा, “हूँ… निकल रही है?”
रुही शर्म से मर रही थी। आवाज़ काँपती हुई निकली, “रामू जी… छोड़ो… मैं… कंट्रोल नहीं कर पा रही…”
रामू ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने उसकी छोटी लाल पैंटी के इलास्टिक में उंगलियाँ डालकर उसे जाँघों से नीचे सरका दिया। पूरी तरह नहीं उतारी—सिर्फ घुटनों तक लाकर छोड़ दी। पैंटी उसके पैरों में उलझी रह गई। अब उसकी चिकनी, मुंडा हुआ चूत पूरी तरह खुली थी।
रुही की हालत खराब थी। शर्म और उत्तेजना दोनों चरम पर थीं। उसने दोनों हाथों से अपना मुँह ढक लिया। आँखें बंद थीं।
रामू ने अपना बड़ा हाथ उसकी चूत पर फेरा। दो उंगलियाँ उसके गीले होंठों के बीच से गुज़रीं। फिर उन्होंने मर्दाना हँसी के साथ कहा—
“देख… कितनी गीली हो गई है तेरी चूत। इतनी शर्म आ रही है, फिर भी पानी छोड़ रही है।”
रुही ने सिर झुकाया। आवाज़ में रोना था, “मत छुओ… प्लीज… बहुत शर्म आ रही है… रामू जी…”
रामू उनकी बात अनसुनी करके और नीचे झुके। उन्होंने उसकी चिकनी चूत पर सीधे होंठ रख दिए। पहले एक लंबा, गहरा चुम्बन। फिर जीभ निकालकर उसके गीले होंठों के बीच चाटा। रुही की कमर उछल गई। एक सिसकारी निकल गई।
रामू ने मुँह लगाए हुए ही कहा, “क्या चिकना माल है तू। बिल्कुल मुलायम… साफ…।” उन्होंने फिर चाटा। “भेंचोद, वो पागल चूतिया सनी कितना बदकिस्मत है… इतना कीमती माल छोड़कर दूसरे शहर धन कमाने निकल गया। इसकी चूत यहाँ पड़ी तरस रही है, और वो बिज़नेस की फिक्र में है।”
रुही के आँसू निकल आए। शर्म से वह जल रही थी, लेकिन शरीर उनकी जीभ के आगे बेबस था। उसने बहुत हिम्मत करके, काँपती आवाज़ में कहा—
“आज… आज ही शेव की है… आपके लिए…”
रामू ने सिर उठाया। उनके होंठ चमक रहे थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए रुही की आँखों में देखा।
“मेरे लिए?” उन्होंने दोहराया। आवाज़ में संतुष्टि थी। “अच्छी लड़की। तू सीख रही है। अब याद रख… ये चूत सिर्फ मेरे लिए साफ रहेगी। समझी?”
रुही ने आँखें बंद करके सिर हिलाया। आवाज़ लगभग फुसफुसाहट थी—
“हाँ… रामू जी… सिर्फ आपके लिए…”
रामू ने फिर से उसका सिर अपनी जाँघों के बीच दबाया और नीचे जाकर दोबारा उसकी चिकनी चूत चूमने लगे। इस बार और जोर से, और भूखे होकर। रुही की सिसकारियाँ बाथरूम में गूँजने लगीं। शर्म अभी भी थी… लेकिन अब वह उनके मुँह के आगे पूरी तरह खुल चुकी थी।
रामू जी ने अपनी दोनों उंगलियों से रुही की चूत की फाँकों को धीरे से लेकिन मजबूती से खोल दिया। गुलाबी, चिकनी और गीली हुई पंखड़ियाँ उनके अंगूठे और उंगली के बीच फैल गईं। उन्होंने नज़दीक से देखा और भारी आवाज़ में कहा—
“चल… अब मूत।”
रुही की आँखें फटी की फटी रह गईं। शर्म से उसका पूरा चेहरा, गर्दन और छाती तक लाल हो गया। उसने दोनों हाथों से अपना मुँह ढक लिया और काँपती आवाज़ में बोली—
“रामू जी… ऐसे कैसे…? प्लीज… आप बाहर चले जाइए न… मैं अकेली कर लूँगी… बहुत शर्म आ रही है… प्लीज…”
रामू की आँखें सिकुड़ गईं। उनकी आवाज़ में हल्का गुस्सा और पूरा मर्दाना हक झलक रहा था—
“सुना नहीं तूने? मैंने कहा मूत। अभी। मेरे सामने। मेरी उंगलियों के बीच। ये मेरा हक है। तू मेरी है। तेरा मूत भी मेरा है। चल… निकाल।”
रुही डर गई। आँखों में आँसू आ गए। शरीर काँप रहा था। पेशाब का दबाव पहले से ही बहुत ज्यादा था। अब उनके सख्त हुक्म ने बचाव की आखिरी दीवार भी तोड़ दी। वह सिसकते हुए बोली—
“रामू जी… माफ़ करना… मैं… मैं कर रही हूँ…”
फिर उसने आँखें बंद कर लीं और अपने आप को छोड़ दिया।
पहले एक हल्की धार निकली। फिर दबाव इतना ज्यादा था कि पेशाब की तेज़ धार “शूऊऊऊ… शूऊऊ…” की आवाज़ के साथ फूट पड़ी। गरम पेशाब की धार रामू की उंगलियों और हथेली पर सीधे जाकर गिरने लगी। उनकी उंगलियाँ पूरी तरह गीली हो गईं। धार की आवाज़ बाथरूम में साफ गूँज रही थी। रुही की जाँघें काँप रही थीं। वह दोनों हाथों से अपना मुँह दबाए हुए सिसक रही थी।
रामू ने उसकी फाँकों को और फैलाए रखा। पेशाब उनकी हथेली से होते हुए नीचे टॉयलेट में गिर रही थी। उन्होंने मर्दाना संतुष्टि के साथ कहा—
“हाँ… ऐसे ही। पूरी निकाल। दबा मत। मैं देख रहा हूँ तेरा मूत। कितनी तेज़ धार है तेरी…”
रुही रोते-रोते बोली, “बहुत शर्म आ रही है… रामू जी… माफ़ कर दो… अब और मत देखो…”
“शर्म रख अपनी,” रामू ने सख्ती से कहा। “मैं तेरा मर्द हूँ। तू मेरे सामने मूत रही है तो क्या हुआ? तू मेरी बहू है। मेरी औरत है। तेरा ये शरीर, ये चूत, ये मूत… सब मेरा है। समझी?”
रुही ने सिर्फ सिर हिलाया। आँसू उसकी आँखों से बह रहे थे। पेशाब अभी भी निकल रही थी—अब धार थोड़ी धीमी हो चली थी, लेकिन रुक नहीं रही थी। रामू की उंगलियाँ पूरी तरह गीली और गर्म थीं। उन्होंने जानबूझकर अपनी उंगली को उसकी चूत के छेद पर फेरा, जहाँ से अभी पेशाब निकल रही थी।
“देख,” उन्होंने कहा, “मेरा हाथ तेरे मूत से कितना गीला हो गया। अब बता… कैसा लग रहा है मेरे सामने मूत करके?”
रुही की आवाज़ टूट रही थी, “शर्म… बहुत शर्म आ रही है… लेकिन… मैं कुछ नहीं कर सकती… आप… आप जैसा कह रहे हो…”
रामू ने उसकी फाँकों को अभी भी खुला रखा और आखिरी बूँदें निकलने तक इंतज़ार किया। जब धार लगभग रुक गई तो उन्होंने अपनी गीली उंगलियों को उसकी चूत पर धीरे से फेरा और कहा—
“अच्छी लड़की। अब याद रख… जब भी मैं कहूँ, तू मेरे सामने मूतेगी। कोई शर्म नहीं। कोई मना नहीं। ये मेरा मर्दाना हक है। और तू मेरी समर्पित बहू है।”
रुही पूरी तरह टूट चुकी थी। शर्म, डर, उत्तेजना और समर्पण सब एक साथ। उसने आँखें बंद किए हुए सिर्फ इतना फुसफुसाया—
“हाँ… रामू जी… आपका हक है… मैं… मैं आपकी हूँ…”
पेशाब की आखिरी बूँदें टपक रही थीं। रामू का हाथ अभी भी उसकी खुली चूत पर था—गीला, गर्म और मालिकाना। और रुही… बस उनकी उंगलियों के बीच बैठी अपनी शर्म और समर्पण को एक साथ जी रही थी।


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