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Fantasy Mummy aur Uncle. Part 2 in hindi font
#3
मुझे नींद आ रही थी तो मैं आकर सो गया। मेरी नींद सुबह सात बजे खुली क्योंकि मैंने सुबह सात बजे का अलार्म लगाया था। मैंने सोचा मम्मी और अंकल को जाकर देखूँ कि क्या कर रहे हैं। जब मैं ऊपर गया तो मम्मी अपने कमरे में थीं। कमरे के बाहर आंटी नज़र आईं। आंटी मुझे देखकर हड़बड़ाते हुए बोलीं, “बेटा, मैं तेरी मम्मी को ढूँढ रही हूँ, कहाँ हैं?” मेरे जवाब देने से पहले ही वे नीचे चली गईं। मैं समझ चुका था कि आंटी ने ज़रूर अंकल और मम्मी को देख लिया है।

फिर मैं खिड़की पर गया तो देखा दोनों एकदम नंगे एक-दूसरे से चिपके हुए सो रहे हैं। मैं एकदम डर गया—अब क्या होगा? आंटी ने मम्मी और अंकल को देख लिया है।

फिर मैं वापस नीचे आंटी के पास गया। आंटी बोलीं, “बेटा, तेरी मम्मी कहाँ हैं? मिली क्या?”

मैं बोला, “नहीं आंटी।”

आंटी: “बेटा, क्या तुझसे कुछ पूछ सकती हूँ?”

मैं: “जी आंटी, पूछिए।”

आंटी: “तू अपनी मम्मी से कितना प्यार करता है?”

मैं: “बहुत प्यार करता हूँ आंटी। उनके लिए मैं अपनी जान भी दे सकता हूँ।”

आंटी: “शाबाश बेटा। और तुझे पता है योगेश जी इस समय कहाँ हैं?”

मैं: “नहीं आंटी।”

आंटी: “बेटा, मुझे लगता है तुझे पता है, पर तू झूठ बोल रहा है।”

मैं: “नहीं पता आंटी, और मुझे जानना भी नहीं है।”

आंटी: “बेटा, तेरी मम्मी ऊपर कमरे में सो रही हैं।”

मैं: “मुझे मालूम नहीं है। आप कह रही हैं तो ज़रूर ऊपर कमरे में सो रही होंगी।”

आंटी: “बेटा, क्या तू ऊपर जाकर देखेगा नहीं अपनी मम्मी को?”

मैं: “नहीं आंटी, उनकी नींद डिस्टर्ब होगी।”

आंटी: “बेटा, अगर मैं कहूँ कि तेरी मम्मी के साथ ऊपर कोई और भी सो रहा है, तो पूछेगा नहीं कौन?”

मैं: “जी नहीं आंटी।”

आंटी: “बेटा, अगर मैं कहूँ कि कोई मर्द तेरी मम्मी के साथ सो रहा है तो?”

मैं: “नहीं आंटी। सोने में क्या? शादी वाले घर में कोई किसी के साथ भी सो सकता है। उससे क्या फ़र्क पड़ता है?”

आंटी: “बेटा, मैं कहूँ कि तेरी मम्मी किसी मर्द की बाँहों में नंगी सो रही हैं?”

मैं: “नहीं आंटी, ऐसा नहीं हो सकता।”

आंटी: “यदि मैं साबित कर दूँ तो?”

मैं: “आंटी, साबित करने की ज़रूरत नहीं है। मुझे मम्मी पर भरोसा है। वे ऐसा नहीं करेंगी। वे एडल्ट हैं, समझदार हैं। वे जो भी करेंगी, अच्छा ही करेंगी।”

आंटी: “मैं सच कह रही हूँ।”

मैं: “आंटी, आप कह रही हैं तो मैं मान लेता हूँ।”

आंटी: “तो अब तू क्या करेगा?”

मैं: “कुछ नहीं।”

आंटी: “तेरी मम्मी ने इतना गलत किया और तू चुप रहेगा?”

मैं: “आंटी, इसमें कुछ गलत नहीं। वे समझदार हैं। उनकी ज़िंदगी है। उन्होंने जो किया, सोच-समझकर ही किया होगा।”

आंटी: “उसने तेरे पापा को धोखा दिया है।”

मैं: “नहीं आंटी। उनकी ज़िंदगी है। उनको भी जीने का अधिकार है। इसमें कोई धोखा नहीं।”

आंटी: “क्या तू कहना चाहता है कि तेरे पापा नामर्द हैं?”

मैं: “नहीं आंटी। मेरे पापा एक अच्छे पति और पिता हैं। मम्मी ने पापा को धोखा नहीं दिया। मम्मी-पापा एक-दूसरे को बहुत प्यार करते हैं। हो सकता है उनको किसी और का साथ अच्छा लगा हो, तो इसमें क्या गलत है?”

आंटी: “क्या तू अपने पापा को नहीं बोलेगा?”

मैं: “नहीं आंटी। इससे पापा-मम्मी में टेंशन होगी। मैं किसी को कुछ नहीं बोलूँगा—ना पापा को, ना मम्मी को। मम्मी को मेरे सामने शर्मिंदा होना पड़ेगा। मम्मी की ज़िंदगी, मम्मी अपने हिसाब से जिएँ। मैं कुछ नहीं बोलूँगा।”

आंटी: “सब जानते हुए चुप रहेगा?”

मैं: “आंटी, वे मेरी मम्मी हैं। उनकी खुशी में ही मेरी खुशी है। और पापा-मम्मी हमेशा साथ रहें, मैं यही चाहता हूँ। मम्मी अगर किसी और के साथ एन्जॉय करें तो मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं।”

आंटी: “बेटा, तुझे पता है वो आदमी कौन है?”

मैं: “नहीं आंटी। मुझे नहीं पता और जानना भी नहीं है।”

आंटी: “एक बार उसका नाम जान ले, तुझे भी तो पता लगे वो कौन है।”

मैं: “नहीं आंटी। मैं तो बस इतना चाहता हूँ कि मेरी मम्मी हमेशा खुश रहें और वो इंसान भी खुश रहे जो मम्मी को प्यार करे, मम्मी को खुशी दे।”

आंटी: “बेटा, क्या तेरे पापा तेरी मम्मी को…?”

मैं: “नहीं आंटी। पापा भी मम्मी को बहुत प्यार करते हैं। आपने कहा मम्मी किसी के साथ रूम में हैं, इसका मतलब पापा ज़्यादातर आउट ऑफ़ सिटी रहते हैं, इसलिए मम्मी किसी और के साथ…”

आंटी: “इसीलिए कहती हूँ, एक बार उसका नाम सुन ले जो तेरी मम्मी के साथ है।”

मैं: “नहीं आंटी। मुझे नहीं जानना। मैं तो बस इतना चाहता हूँ कि मेरी मम्मी को वो इंसान हमेशा खुश रखे।”

आंटी: “वो कोई और नहीं, योगेश है।”

मैं: “चाहे योगेश अंकल हों या कोई और, मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं।”

आंटी: “बेटा, क्या तुझे पहले से पता है?”

मैं: “नहीं आंटी। आपने बताया तो पता चला।”

आंटी: “शाबाश बेटा। वर्षा बहुत खुशनसीब है जो उसे तेरा जैसा बेटा मिला।”

मैं: “आंटी, आप मम्मी को ये मत बताना कि आपने मुझसे उनके बारे में कुछ बोला है।”

आंटी: “मैंने कुछ नहीं बोला। मैं भी भूल गई और तू भी भूल जा। अब मैं तेरी मम्मी को बुलाने जा रही हूँ, कहीं कोई देख न ले।”

मैं: “जी आंटी।”

आंटी: “बेटा, ऐसा कुछ भी नहीं है। मैं तो तेरी परीक्षा ले रही थी कि तू वर्षा से कितना प्यार करता है। तेरी मम्मी किसी भी मर्द के साथ नहीं, बल्कि अकेली सो रही हैं। मैंने झूठ बोला सब।”

मैं: “अगर आंटी, आपने जो बोला वो सच भी होता तो मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं होती। मैं बस मम्मी की खुशी चाहता हूँ।”

आंटी: “अब मैं ऊपर जाती हूँ उसे बुलाने। तू यहीं रुक।”

और आंटी ऊपर जाने लगीं। पीछे से मैं भी चुपके से जाने लगा।

आंटी मम्मी को जोर-जोर से आवाज़ देती हुईं—“वर्षा… अरे वर्षा… कहाँ हो…”

आंटी आवाज़ देती हुई ऊपर पहुँच गईं और उसी कमरे के बाहर खड़ी हो गईं जहाँ अंकल-मम्मी एक-दूसरे की बाँहों में लेटे हुए थे। कमरा बंद देखकर आंटी ने दरवाज़ा खटखटाया।

पहले तो कोई नहीं आया, लेकिन करीब दस मिनट बाद मम्मी ने ही दरवाज़ा खोला। मम्मी की हालत देखने लायक हो गई थी।

मम्मी ने बाल पीछे बाँध दिए थे। उनकी साड़ी थोड़ी बिखरी हुई लग रही थी और ब्लाउज़ थोड़ा कंधे पर खिसका हुआ था। चूचियाँ ब्रा न होने के कारण बड़ी दिख रही थीं। मम्मी की बिंदी गायब थी। उनकी लिपस्टिक भी निकल गई थी। गहने उतारे हुए थे। मम्मी बहुत ही मदक लग रही थीं।

कोई भी बता सकता था कि क्या हुआ है।

आंटी मम्मी का ऐसा रूप देख मुस्कुराने लगीं और अंदर देखने लगीं। अंदर बिस्तर बिखरा हुआ था और अंकल का पैंट नीचे गिरा हुआ दिख रहा था। मम्मी के बालों में लगा हुआ गजरा भी बिस्तर पर बिखरा हुआ दिख रहा था।

लेकिन अंकल कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। शायद वे बाथरूम में चले गए होंगे। मम्मी डरी हुई लग रही थीं।

आंटी को पहले से ही पता था कि क्या हुआ है, लेकिन वे कुछ नहीं बोलीं।

आंटी: “वर्षा, तो तू यहाँ सो गई?”

मम्मी: “हाँ…”

आंटी: “नहा ली क्या? अभी नहाने वाली हो?”

मम्मी: “नहीं, अभी नहीं। अब नहाने वाली हूँ।”

आंटी: “ठीक है। नहाकर नीचे आ जाना। मैं चाय-नाश्ता बनाती हूँ।”

मम्मी: “ठीक है, मैं अभी आती हूँ।”

आंटी: “वैसे योगेश जी कहाँ हैं? तुमने देखा क्या उन्हें?”

मम्मी इस सवाल से एकदम डर गईं। बाथरूम की तरफ़ देखकर फिर आंटी की तरफ़ देखने लगीं।

मम्मी: “न-नहीं तो… होंगे बाहर, यहीं कहीं।”

आंटी ने जो समझना था वो समझ लिया।

आंटी: “ठीक है। आओ जल्दी। अभी तुम्हें घर भी जाना है।”

मम्मी: “हाँ।”

आंटी अंदर बिस्तर की तरफ़ देखते हुए बोलीं, “ठीक है, मैं जाती हूँ। तुम तैयार होकर आ जाना।” मम्मी ने गेट बंद कर लिया और आंटी मुस्कुराते हुए आने लगीं। मैं दौड़कर जल्दी से नीचे आ गया। थोड़ी देर बाद आंटी भी आ गईं, हँसती हुईं।

मैंने पूछा, “आंटी, आप हँस क्यों रही हो?”

आंटी: “कुछ नहीं बेटा।” और किचन में चली गईं।

फिर मैं वापस ऊपर आया तो देखा अंकल कमरे से अकेले बाहर निकले। मुझे देखकर बोले, “मज़ा आ गया आज। पूरी रात तेरी माँ की चुत फाड़ी।” मैंने पूछा, “मम्मी कैसी हैं?” तो बोले, “अभी थोड़ी देर में आएगी, देख लेना।” और बोले, “मैं नहाने जा रहा हूँ, तू भी नहा ले।” मैंने अंकल को आंटी वाली बात नहीं बताई और मैं नहाने चला गया। थोड़ी देर बाद नहाकर हॉल में आकर बैठ गया।

मम्मी भी नीचे आ गईं। उनके बाल गीले थे और चेहरा पूरा खिला हुआ दिख रहा था।

मम्मी ने आते ही मुझसे पूछा, “बेटा, चाय लाऊँ तुम्हारे लिए?”

मैं: “हाँ मम्मी, लाओ।”

मेरे हाँ कहते ही मम्मी किचन में चली गईं जहाँ आंटी हमारे लिए नाश्ता और चाय बना रही थीं। मैं हॉल में था जहाँ से किचन ठीक बगल में था। किचन की बातें आराम से सुन सकता था। एक तरह से ओपन किचन था।

आंटी: “आ गई तुम। नींद तो अच्छे से आई ना तुम्हें?”

मम्मी: “हाँ, बिल्कुल। बहुत अच्छे से आई।”

आंटी: “कोई परेशानी तो नहीं हुई ना?”

मम्मी: “नहीं-नहीं, परेशानी कैसे?”

तभी अंकल भी नहाकर हॉल में आ गए। आते ही उन्होंने मुझे देखकर स्माइल की।

अंकल: “क्यों अंकित बेटा, कैसे हो? चाय ली कि नहीं अभी?”

मैं: “नहीं, अभी लेने वाला हूँ।”

आंटी को पता लग जाता है कि अंकल भी बाहर आ गए हैं।

आंटी: “चलो, तुम दोनों पे बैठो। मैं ये चाय और नाश्ता योगेश जी और अंकित के लिए लेकर आती हूँ।”

मम्मी: “अरे मुझे दे दीजिए, मैं लेकर जाती हूँ।”

आंटी: “अरे नहीं, तुम तो मेहमान हो। तुम क्यों लेके जा रही हो?”

मम्मी: “अरे क्या आप भी दीदी। मैं लेके जाती हूँ ना। क्यों मेहमान बना रही हो मुझे? मैं आपके घर की जैसी हूँ।”

आंटी मुस्कुराने लगती हैं।

आंटी: “ठीक है, ले जाओ।”

मम्मी चाय लेकर आ जाती हैं। जब मम्मी ने अंकल को चाय दी तो अंकल मम्मी को देखकर मन ही मन हँस रहे थे और मम्मी भी अंकल को तिरछी नज़रों से देखकर स्माइल कर रही थीं।

इसके बाद जब हमारे घर जाने का समय हुआ तो आंटी बोलीं, “वर्षा, रूम में चलते हैं।” और आंटी मम्मी को अपने रूम में ले गईं। अब हॉल में सिर्फ़ मैं और अंकल थे। मैंने अंकल से कहा, “अंकल आप बैठो, उनकी बातें सुनता हूँ।” और मैं आंटी के रूम की खिड़की पर गया जहाँ पर्दा लगा हुआ था। खिड़की बिस्तर के ठीक बगल में थी। आंटी-मम्मी मुझसे बस दो-तीन फ़ीट की दूरी पर थीं। मैं उनकी बातें साफ़-साफ़ सुन रहा था, पर वे मुझे नहीं देख पा रही थीं कि मैं पर्दे के पीछे से उनकी बातें सुन रहा हूँ।

आंटी और मम्मी अपने रूम में बातें कर रहे थे। पहले तो आंटी ने फ़ालतू की बातें कीं जो मैं यहाँ नहीं लिख रहा हूँ। फिर मम्मी ने जाने के लिए बोला।

मम्मी: “ठीक है तो अब मैं चलती हूँ। बहुत देर न हो घर जाने के लिए।”

आंटी: “वैसे योगेश और तुमने कल सब अच्छे इंतज़ाम किए।”

मम्मी एकदम से डर गईं। “क्या? कैसा इंतज़ाम?”

आंटी: “शादी का… और किसका?”

मम्मी: “ओह, शादी का… हाँ… कुछ नहीं, ये तो मेरा फ़र्ज़ था।”

आंटी: “वैसे योगेश को मैं अपना भाई मानती हूँ। अगर मेरी भाभी होतीं तो वे भी ऐसे ही करतीं।”

आंटी कुछ निकलवाना चाह रही थीं मम्मी से।

मम्मी: “हाँ, वो भी है।”

आंटी: “तुमने उसकी कमी पूरी कर दी।”

ये कहते हुए आंटी ने मम्मी के चेहरे को उठाया और उनकी तरफ़ देखकर मुस्कुराने लगीं।

मम्मी: “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।”

मम्मी शर्माने लगी थीं।

आंटी: “फिर कैसे बात है? हाँ।”

मम्मी कुछ नहीं बोलीं, सिर्फ़ गर्दन नीचे झुका ली थी। मम्मी नर्वस हो गई थीं और नीचे बिस्तर पर अपना हाथ घुमा रही थीं।

आंटी: “वैसे तुम दोनों की भी एक-सी समस्या है। उसकी बीवी नहीं है और तुम्हारा पति तो ज़्यादातर आउट ऑफ़ सिटी रहते हैं। दोनों की परेशानी एक ही है।”

मम्मी: “हाँ, वो तो है।”

आंटी: “एक औरत होने के नाते भी बहुत ज़रूरी होता है किसी का साथ होना।”

आंटी धीरे-धीरे पॉइंट पर आ रही थीं।

मम्मी: “हाँ।”

आंटी: “वैसे एक बात पूछूँ? बुरा तो नहीं मानोगी?”

मम्मी: “नहीं, पूछिए ना।”

आंटी: “ये सब कब से चल रहा है?”

मम्मी डर गईं। “क्या सब? किस बारे में बात कर रही हैं आप?”

आंटी: “तुम्हारे और योगेश के बारे में।”

मम्मी को अब पसीना आने लगा। “मतलब… मैं समझी नहीं।”

आंटी: “अच्छा वर्षा… सॉरी, भाभी जी। मैं अब तुम्हें भाभी जी ही कहूँगी।” और आंटी हँसने लगीं।

मम्मी शर्म के मारे कुछ बोल नहीं पा रही थीं।

आंटी: “वैसे शक तो मुझे शादी में ही हो गया था। लेकिन सुबह जब उसका पैंट तुम्हारे बिस्तर पर और तुम्हारी हालत देखी तो यक़ीन हो गया।” और आंटी ज़ोर से हँसने लगीं। मम्मी भी मन ही मन मुस्कुरा रही थीं।

आंटी: “अरे कुछ तो बोलो भाभी जी। भैया ने ज़्यादा तंग तो नहीं किया?”

मम्मी: “आप भी ना…” और मम्मी जाने लगीं।

आंटी: “अरे-अरे रुको वर्षा।”

मम्मी रुक गईं। आंटी ने मम्मी को अपनी तरफ़ किया और गले लगा लिया।

आंटी: “मैं बहुत खुश हूँ तुम्हारे लिए वर्षा। मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है। मैं तुम्हारे साथ ही हूँ।” और आंटी ने मम्मी के माथे को चूम लिया।

आंटी: “कल शादी मेरी बेटी की, लेकिन सुहागरात भाभी की हो गई। हा हा हा।”

आंटी: “अब बैठो यहाँ पे।”

मम्मी और आंटी बैठ गईं।

आंटी: “अब बताओ मुझे, कब से चल रही है ये लव स्टोरी सब?”

मम्मी: “कल से ही।” (मम्मी ने झूठ बोला, शायद इसलिए क्योंकि आंटी ने उन्हें पहली बार अंकल के साथ देखा था।)

आंटी: “क्या? कल ही? अरे वाह! कल तो दो-दो अच्छे कामों की शुरुआत हो गई।”

आंटी: “अब तुम मेरे घर की मेंबर बन ही चुकी हो। तो एक बात बताती हूँ—जब भी मन करे यहाँ आ जाना। वो बताने की ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि मेरे घर पे कोई नहीं होता। मेरे पति बाहर रहते हैं और बेटी उसके ससुराल चली गई। अब मैं अकेली हूँ और यहाँ तुम्हें और योगेश को प्राइवेसी मिलेगी। क्यों वर्षा भाभी? सही कहा ना मैंने? अब तो तुम मेरी भाभी बन गई हो क्योंकि योगेश मुझसे राखी बंधवाता है।”

दोनों हँसने लगते हैं।

अब आंटी अंकल को बुलाती हैं।

आंटी: “योगेश… अंदर आओ!” आवाज़ देकर।

अंकल मुझे देखकर रूम में चले गए और जाते हुए मुझे आँख मार गए।

आंटी: “ये गलत बात है योगेश। अगर ऐसा कुछ था तो मुझे बता देते। मैं कोई ना कहने वाली थी क्या?”

अंकल को समझने में देर नहीं लगती कि आंटी को सब पता चल गया है। वे मम्मी की तरफ़ देखकर मुस्कुराने लगे।

आंटी: “अब जाओ योगेश, वर्षा को छोड़कर आओ घर। और हाँ, जब भी भाभी से मिलने का दिल करे बता देना। मैं वर्षा भाभी को बुला लूँगी।”

फिर मम्मी, अंकल, आंटी हँसने लगे। फिर मैं बाहर साइड पे आकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद तीनों बाहर आए और फिर आंटी मुझे बोलीं, “बेटा, तू थोड़ी देर मेरे साथ ऊपर चल।”

मैं आंटी के साथ ऊपर आया तो—

आंटी: “बेटा, तुझे क्या लगता है इन दिनों में कुछ है?”

मैं: “नहीं आंटी, मुझे नहीं पता। पर इतना कहूँगा—मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है अगर दोनों के बीच कुछ हो तो।”

आंटी: “बेटा, मुझे लगता है तेरी मम्मी कुछ नहीं है। तेरे पापा आउट ऑफ़ सिटी रहते हैं…”

मैं: “आंटी, मुझे कुछ नहीं जानना। और मम्मी जो करेंगी, मैं हमेशा मम्मी का साथ दूँगा।”

फिर आंटी कुछ नहीं बोलीं और मैं आंटी के साथ नीचे आ गया।

और अंकल मुझे और मम्मी को घर छोड़ देते हैं। घर आते वक्त कार में अंकल और मम्मी आगे बैठे थे। वे ज़्यादा बातें नहीं कर रहे थे, लेकिन जब भी मौक़ा मिलता अंकल मम्मी के पेट को, जाँघों को छू रहे थे। मुझे ये देख मज़ा आ रहा था—एक ग़ैर मर्द मम्मी को चोद चुका है और अभी मेरी मौजूदगी में ही उनसे छेड़छाड़ कर रहा है।
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RE: Mummy aur Uncle. Part 2 in hindi font - by Rahulraj306 - 21-08-2026, 06:13 PM



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