20-08-2026, 05:50 AM
(This post was last modified: 20-08-2026, 05:56 AM by Motalund14. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
****नहाकर जब मैं बाहर आया, तो देखा कि अंकल लॉबी में बैठे हुए थे। तभी मम्मी पूजा रूम से आरती की थाली लेकर बहुत ही सलीके से बाहर निकलीं। उसी दौरान मेरी और अंकल की नज़रें मिलीं और हमने आँखों ही आँखों में एक दूसरे को इशारों से 'थैंक्स' कहा। ****
****मम्मी हम दोनों को आरती और प्रसाद देती हैं। उसी दौरान मैं मम्मी के पैर छूता हूँ, जो मैं कभी कभी करता ही हूँ। पैर छूते वक्त मैं मम्मी को भरपूर नज़रों से देखता हूँ। मम्मी को इस बात का कारण तो समझ नहीं आता कि मैं उन्हें इस तरह क्यों देख रहा हूँ, पर वो इतना ज़रूर महसूस कर पाती हैं कि मेरी नज़रें उन पर टिकी हुई हैं।****
****तभी अंकल मेरी तरफ देखते हैं और मम्मी की ओर इशारा करते हुए धीरे से कहते हैं, "रवि, तेरी मम्मी आज बहुत थकी हुई लग रही हैं।" यह सुनकर मम्मी एकदम से चौंक जाती हैं और शरमाते हुए मुस्कुरा के अंकल को घूरती हैं। वे कुछ बोलती तो नहीं हैं, पर उनके हाव भाव से लगता है जैसे कह रही हों बच्चे के सामने क्या बोल रहे हो!
****पर मैं सब देख लेता हूँ। मैं वो इशारा और अंकल की बात समझ जाता हूँ। मम्मी को भी यह एहसास हो जाता है कि मैंने अंकल की बात सुन ली है और मैंने उन्हें इशारे से घूरते हुए देख लिया है। मम्मी की आँखों में एक अजीब सी घबराहट और शर्मिंदगी साफ़ झलक रही थी।****और शायद समझती है कि रवि तो बहुत भोला है,इसे क्या पता इन बातों का।
सुबह का समय था। अंकल अपने काम पर चले गए और मैं भी कॉलेज के लिए निकल गया। मम्मी घर के कामों और दुकान की ज़िम्मेदारियों में व्यस्त थीं।
दोपहर में जब मैं कॉलेज से वापस आया, तो घर का नज़ारा बदला हुआ था। मेरी दोनों बड़ी बहनें शादी से वापस आ चुकी थीं। उनके साथ मेरा छोटा भाई भी घर आ गया था, जो मामा के घर में रहकर अपनी पढ़ाई करता था।
घर में अब सब लोग मौजूद थे। बहनें और भाई के आने से घर में काफी चहल पहल मच गई थी। सब अपने अपने कामों और बातों में लग गए थे, जिससे घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था।
अंकल रोज़ाना घर आ जाते थे, पर घर में सभी के होने के कारण वे कुछ कर नहीं पाते थे। मम्मी और अंकल अवसरों की तलाश में रहते। हालांकि, उनके बीच छोटी मोटी इशारों का सिलसिला चलता रहता था, जिसे मैं पिछले कई सालों से देख रहा था। मैं यह भी समझता था कि उनके बीच पहले भी कुछ था, पर वह किस हद तक था, यह बात मुझे पिछले दो दिनों से ही पता चल पाई थी। मुझे नहीं पता कि मेरे दूसरे भाई बहनों को इस बारे में कोई अंदाज़ा था या नहीं।
"घर के माहौल में एक अजीब सी कड़वाहट अक्सर महसूस होती थी। कभी कभी मम्मी और मेरी बड़ी बहनों के बीच अचानक और तीखी बहसबाजी शुरू हो जाती थी। उन झगड़ों का कोई स्पष्ट कारण समझ नहीं आता था कभी छोटी सी बात होती, तो कभी बिना किसी वजह के तनाव बढ़ जाता था। उस वक्त मैं बहुत छोटा था और उन बहसों के पीछे की असली वजह को समझने में असमर्थ था।
लेकिन अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि वह सिर्फ मामूली झगड़े नहीं थे। उन बहसों के पीछे एक गहरा राज़ छिपा था, जो सीधा अंकल और मम्मी के बीच के उस अनकहे रिश्ते से जुड़ा था।
"अंकल का आना अब एक तरह की रस्म बन गया था। वह हर दो तीन दिन में घर आ तो जाते थे, लेकिन उनका आना मम्मी की प्यास बुझाने के लिए काफी नहीं था। विडंबना तो देखिए, अंकल के आते जाते रहने के बावजूद, मम्मी को उनके साथ उस बेतहाशा और रसीले मिलन का मौका महीने डेढ़ महीने में सिर्फ एक ही बार मिल पाता था। वह एक लंबा इंतज़ार था एक ऐसी तड़प जो मम्मी के जिस्म को अंदर ही अंदर गला देती थी।
"अंकल से मिल न पाने के कारण मम्मी के व्यवहार में बदलाव आने लगा था। रवि ने कई बार देखा कि कैसे उनकी नज़रों में मर्दों के लिए एक अजीब सी प्यास उभरने लगी थी। कभी पड़ोसियों के आने पर उनकी नज़रों का ठहर जाना, तो कभी अकेले में खुद को सँवारते हुए उनके चेहरे पर आने वाली वह मदहोश कर देने वाली मुस्कान इन छोटी छोटी घटनाओं ने रवि को यकीन दिला दिया था कि मम्मी की आँखों में अब एक मूक आमंत्रण है।"
"एक दिन मैने मम्मी और उनकी एक सहेली के बीच हो रही आपसी बातचीत भी सुनी, जो इस बात की पुष्टि करती थी कि मम्मी अब अपनी प्यास बुझाने के लिए कोई भी रास्ता चुन सकती है।"
आंटी कह रही थीं, *'अरे, वो ड्राइवर लोग बड़े अच्छे होते हैं!'* उस वक्त मुझे कुछ समझ नहीं आया, पर अब समझ आता है कि आंटी का 'अच्छे' से मतलब उनकी **ज़बरदस्त और बेतहाशा चोदाई** करने की काबिलियत से था। मम्मी की आँखों में भी वही चमक थी जैसे वो उन ट्रक ड्राइवरों के उस कच्चे और जंगली अंदाज़ को आज़माने के लिए बेताब हों, जहाँ कोई औपचारिकता नहीं, बस शुद्ध और रसीला मिलन हो।"
कभी कभी जब वो रात को अकेले कमरे में बैठी रहतीं और उनकी आँखों में वो अधूरी प्यास और तड़प साफ़ झलकती, तो मेरा जी करता कि मैं उनके पास जाऊँ, उनके उस तड़पते हुए जिस्म को छू लूँ और उनकी उस महीनों की प्यास को एक पल में बुझा दूँ। मेरा मन करता कि मैं उन्हें बता दूँ कि मैं उनकी उस हर एक आह और हर एक चाहत को महसूस कर सकता हूँ।
लेकिन फिर अचानक **रिश्ते की मर्यादा** का डर मुझे झकझोर देता। एक पल में मैं एक बेटा बन जाता जो शर्म से झुक जाता, और दूसरे ही पल मैं एक जवान मर्द बन जाता जो उनकी उस रसीली और प्यासी देह को पाने के लिए बेताब रहता। मैं उनके करीब तो जाना चाहता था, पर वो 'रिश्ते की मार' मुझे रोक देती। मैं चाहकर भी कुछ कह नहीं पाता था न अपनी मर्दानगी की उस चाहत के बारे में, और न ही उस कामुकता के बारे में जो मुझे उनकी तरफ खींचती थी। मैं बस चुपचाप खड़ा रहकर उनकी उस तड़प को देखता रहता और खुद भी उस आग में जलता रहता ।**
" मम्मी कभी कभी उस आंटी के साथ सत्संग , बाबा की हाज़िरी या किसी और बहाने बाहर जाती थीं। शुरुआत में मुझे कुछ समझ नहीं आया, लेकिन कुश समय बीतने के बाद मुझे ,मम्मी और आंटी की बातें सुनधीरे धीरे अहसास होने लगा कि वो असल में बाबा की भक्ति के लिए नहीं, बल्कि अपनी उस दबी हुई प्यास और अपनी मानसिक शांति के लिए जाती थीं। मुझे अब समझ आने लगा था कि उस आंटी के साथ जाने का असली मकसद कुछ और ही था।
"मेरे मन में चल रहे शकों और तड़प के बीच एक ऐसी खबर आई जिसने सब कुछ बदल दिया। पापा एक दो महीने के लिए घर वापस आ रहे थे। रवि को लगा था कि अब सब कुछ बदल जाएगा, अब माँ को सब छुपाना पड़ेगा। लेकिन उसे क्या पता था कि खेल तो अब शुरू होने वाला है।
पापा कोई साधारण इंसान नहीं थे, वो इस खेल के मंझे हुए खिलाड़ी थे। उन्हें पता था कि माँ की आँखों में वो चमक कहाँ से आती है और उनकी वो 'शांति' कहाँ मिलती है। घर में अब कुछ भी छुपाने की ज़रूरत नहीं थी। पापा के आने का मतलब था माँ की उस प्यासी धरती पर संतुष्टि की वो बरसात, जिसका इंतज़ार उन्हें बरसों से था। अब घर के बंद दरवाजों के पीछे एक ऐसा खेल खेला जाएगा जहाँ दो शरीरों में मिलन की आंधी आने वाली है,और वासना का एक नया अध्याय शुरू होगा। रवि बस एक गवाह बनकर इस अद्भुत और वर्जित नज़ारे को देखने के लिए बेताब था।"
पापा के घर कदम रखते ही माहौल में एक अजीब सी भारीपन और गर्मी महसूस होने लगी। रवि ने देखा कि जैसे ही पापा ने माँ को देखा, उनके बीच का मिलना कोई साधारण मिलन नहीं था। पापा ने माँ को जिस तरह से गले लगाया, वो गले मिलना नहीं बल्कि एक दूसरे में समा जाने की पहली कोशिश थी। उनकी बाँहों की पकड़ में एक ऐसी तड़प थी जिसे देखकर रवि की साँसें भी थम गईं। माँ की आँखों में भी वही बेताबी थी, वो पापा के सीने से ऐसे चिपकीं जैसे बरसों की प्यास एक पल में मिटाना चाहती हों। उनके बीच की वो 'गर्मजोशी' इतनी तीव्र थी कि रवि को लगा जैसे कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया हो।
पापा अपने साथ सिर्फ यादें नहीं, बल्कि एक पूरा पिटारा लेकर आए थे एक ऐसा पिटारा जो उस रात को यादगार बनाने के लिए था। रवि ने देखा कि पापा के बैग में कुछ ऐसी चीज़ें थीं जो घर के सलीके से बिल्कुल अलग थीं। रेशमी और बेहद **sexy undergarments** का वो ढेर, जो माँ के बदन पर आग लगाने के लिए काफी था। कमरे को महकाने के लिए महंगे **room sprays** और पापा के खुद के शरीर को मदहोश करने वाले **body sprays**। इतना ही नहीं, माँ की त्वचा को रेशम जैसा चिकना बनाने के लिए **hair remover** और वो सब कुछ जो एक बेतहाशा रात के लिए ज़रूरी था।
कमरे में रखे ताज़ा **फूलों** की खुशबू और उन नशीले स्प्रेज़ के मिश्रण ने हवा को भारी बना दिया था। रवि समझ गया कि आज रात उस कमरे की दीवारों के पीछे जो होने वाला है, वो किसी तूफ़ान से कम नहीं होगा। वो सामान, वो खुशबू और वो गर्मजोशी सब कुछ इशारा कर रहे थे कि पहली रात का वो एहसास अब बस दरवाज़ा खटखटाने ही वाला है।
पापा के पास वो सब कुछ था जो एक औरत की प्यास को पूरी तरह से मिटाने के लिए चाहिए होता है। रवि सोच रहा था कि कैसे पापा उन महंगे स्प्रेज़ की खुशबू के बीच माँ के बदन को अपने हाथों से सहलाएंगे, कैसे वो नए रेशमी कपड़ों को उतारकर माँ की नग्नता का स्वागत करेंगे, और कैसे वो 'सर्विस' इतनी गहन होगी कि माँ की सिसकियाँ पूरे घर में गूँज उठेंगी।
उस कमरे के भीतर अब मर्यादा का कोई अस्तित्व नहीं था। वहाँ सिर्फ एक पुरुष की ताकत और एक स्त्री की बेताबी का मिलन होने वाला था। रवि को लग रहा था कि आज की रात तो बस एक शुरुआत है; आने वाले दो महीनों में पापा माँ के शरीर के साथ जो खेल खेलेंगे, वो माँ को एक ऐसी दुनिया में ले जाएगा जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होगा।
रात गहराती जा रही थी और घर के उस कोने में सन्नाटा नहीं, बल्कि एक भारी और नशीली बेचैनी पसरी हुई थी। रवि अपने कमरे में लेटा हुआ था, लेकिन उसकी आँखें बंद नहीं हो रही थीं। उसके कानों में उस बंद कमरे के भीतर होने वाली हलचल की कल्पनाएँ गूँज रही थीं।
जैसे ही रात के सन्नाटे ने अपना डेरा जमाया, रवि को लगा कि उस कमरे के भीतर 'सर्विस' का असली दौर शुरू हो चुका है। पापा ने कमरे के दरवाज़े को अंदर से कुंडी लगाकर बंद कर दिया था एक ऐसा संकेत जो यह बता रहा था कि अब दुनिया का कोई भी नियम या मर्यादा उस कमरे की दहलीज पार नहीं कर सकती।
मैं कल्पना कर सकता था कि कैसे पापा ने सबसे पहले उन महकते हुए **room sprays** का इस्तेमाल किया होगा, जिससे कमरे की हवा एकदम भारी और मदहोश कर देने वाली हो गई होगी। फिर शुरू हुआ हाेगा वो खेल, जिसमें माँ के शरीर को एक खिलौने की तरह सजाया जा रहा होगा। पापा ने उन नए और **sexy undergarments** को माँ के बदन पर ऐसे चढ़ाया होगा जैसे किसी बेशकीमती तोहफे को रैप किया जाता है। माँ का वो रेशमी बदन, जो अब तक सादे कपड़ों में ढका रहता था, अब पापा के हाथों के स्पर्श से थरथरा रहा होगा।
मेरे दिमाग में दृश्य और भी गहरा होता गया पापा ने माँ के बदन पर वो **body spray** छिड़का होगा जिसकी खुशबू माँ की अपनी प्राकृतिक गंध के साथ मिलकर एक नशीला मिश्रण बना रही होगी। फिर शुरू हुआ वो स्पर्श, जहाँ पापा के हाथ माँ की चिकनी और **hair remover** से साफ की हुई त्वचा पर फिसल रहे होंगे। माँ की वो दबी हुई सिसकियाँ अब धीरे धीरे बाहर आने लगी होंगी।
मुझे लग रहा था जैसे दीवारें भी उस गर्मी को महसूस कर रही हैं। पापा माँ के हर उस हिस्से को सहला रहे होंगे जिसे उन्होंने बरसों से छुपा कर रखा था। वह सिर्फ मिल नहीं रहे होंगे, बल्कि माँ के शरीर के हर रोम रोम को अपनी मर्दानगी से तृप्त कर रहे होंगे। उस कमरे के भीतर अब केवल वासना का साम्राज्य होगा, जहाँ माँ की सिसकियाँ और पापा की भारी साँसें मिलकर एक ऐसा संगीत रच रही होंगी, जो आने वाले दो महीनों तक थमने वाला नहीं था।
उस पहली रात के बाद से मेरा पूरा वजूद जैसे बदल गया था। जब सुबह मेरी आँख खुली और मैं दबे पाँव पापा के कमरे की तरफ बढ़ा, तो मेरा दिल सीने को चीरकर बाहर आने को बेताब था। जैसे ही मैंने दरवाज़े की दरार से अंदर झाँका, मेरी साँसें थम गईं।
फर्श पर बिखरा हुआ वो नज़ारा देख कर मेरा दिमाग सुन्न हो गया। माँ का वो कीमती **makeup** इधर उधर फैला था, और उनके वो **sexy lacey undergarments** फर्श पर ऐसे पड़े थे जैसे किसी ने उन्हें झपट्टा मारकर उतार फेंका हो। उन्हें देखकर मेरे शरीर में एक अजीब सी बिजली दौड़ गई। मेरा मन कर रहा था कि मैं झुकूँ और उन कपड़ों को छूकर देखूँ कि उनमें अभी भी माँ की खुशबू और रात की वो गर्मी बाकी है या नहीं।
लेकिन जब मेरी नज़र बिस्तर की तरफ गई, तो मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। बेडशीट पूरी तरह से अस्त व्यस्त थी और उस पर पसीने और **body fluids** के सूखे हुए निशान साफ़ चमक रहे थे। वो **चिपचिपी और गीली बेडशीट** देख कर मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं खुद उस रात के उस बेतहाश और गंदे खेल का हिस्सा था।
मुझे डर लग रहा था, पर उससे कहीं ज़्यादा मैं उत्तेजित था। मेरा शरीर कांप रहा था और मेरा प्राइवेट पार्ट उस दृश्य की कल्पना मात्र से ही सख्त हो रहा था। मैं उन निशानों को देख कर बस एक ही बात सोच पा रहा था *'रात भर माँ के साथ क्या क्या हुआ होगा? पापा ने उन्हें कितनी बेदर्दी से इस्तेमाल किया होगा?'* वो बिखरा हुआ सामान और वो गीली बेडशीट मेरे लिए किसी नशीले ड्रग्ग की तरह काम कर रही थी। मैं डर नहीं रहा था, मैं उस गंदगी में डूब जाने के लिए बेताब हो रहा था।
****मम्मी हम दोनों को आरती और प्रसाद देती हैं। उसी दौरान मैं मम्मी के पैर छूता हूँ, जो मैं कभी कभी करता ही हूँ। पैर छूते वक्त मैं मम्मी को भरपूर नज़रों से देखता हूँ। मम्मी को इस बात का कारण तो समझ नहीं आता कि मैं उन्हें इस तरह क्यों देख रहा हूँ, पर वो इतना ज़रूर महसूस कर पाती हैं कि मेरी नज़रें उन पर टिकी हुई हैं।****
****तभी अंकल मेरी तरफ देखते हैं और मम्मी की ओर इशारा करते हुए धीरे से कहते हैं, "रवि, तेरी मम्मी आज बहुत थकी हुई लग रही हैं।" यह सुनकर मम्मी एकदम से चौंक जाती हैं और शरमाते हुए मुस्कुरा के अंकल को घूरती हैं। वे कुछ बोलती तो नहीं हैं, पर उनके हाव भाव से लगता है जैसे कह रही हों बच्चे के सामने क्या बोल रहे हो!
****पर मैं सब देख लेता हूँ। मैं वो इशारा और अंकल की बात समझ जाता हूँ। मम्मी को भी यह एहसास हो जाता है कि मैंने अंकल की बात सुन ली है और मैंने उन्हें इशारे से घूरते हुए देख लिया है। मम्मी की आँखों में एक अजीब सी घबराहट और शर्मिंदगी साफ़ झलक रही थी।****और शायद समझती है कि रवि तो बहुत भोला है,इसे क्या पता इन बातों का।
सुबह का समय था। अंकल अपने काम पर चले गए और मैं भी कॉलेज के लिए निकल गया। मम्मी घर के कामों और दुकान की ज़िम्मेदारियों में व्यस्त थीं।
दोपहर में जब मैं कॉलेज से वापस आया, तो घर का नज़ारा बदला हुआ था। मेरी दोनों बड़ी बहनें शादी से वापस आ चुकी थीं। उनके साथ मेरा छोटा भाई भी घर आ गया था, जो मामा के घर में रहकर अपनी पढ़ाई करता था।
घर में अब सब लोग मौजूद थे। बहनें और भाई के आने से घर में काफी चहल पहल मच गई थी। सब अपने अपने कामों और बातों में लग गए थे, जिससे घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था।
अंकल रोज़ाना घर आ जाते थे, पर घर में सभी के होने के कारण वे कुछ कर नहीं पाते थे। मम्मी और अंकल अवसरों की तलाश में रहते। हालांकि, उनके बीच छोटी मोटी इशारों का सिलसिला चलता रहता था, जिसे मैं पिछले कई सालों से देख रहा था। मैं यह भी समझता था कि उनके बीच पहले भी कुछ था, पर वह किस हद तक था, यह बात मुझे पिछले दो दिनों से ही पता चल पाई थी। मुझे नहीं पता कि मेरे दूसरे भाई बहनों को इस बारे में कोई अंदाज़ा था या नहीं।
"घर के माहौल में एक अजीब सी कड़वाहट अक्सर महसूस होती थी। कभी कभी मम्मी और मेरी बड़ी बहनों के बीच अचानक और तीखी बहसबाजी शुरू हो जाती थी। उन झगड़ों का कोई स्पष्ट कारण समझ नहीं आता था कभी छोटी सी बात होती, तो कभी बिना किसी वजह के तनाव बढ़ जाता था। उस वक्त मैं बहुत छोटा था और उन बहसों के पीछे की असली वजह को समझने में असमर्थ था।
लेकिन अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि वह सिर्फ मामूली झगड़े नहीं थे। उन बहसों के पीछे एक गहरा राज़ छिपा था, जो सीधा अंकल और मम्मी के बीच के उस अनकहे रिश्ते से जुड़ा था।
"अंकल का आना अब एक तरह की रस्म बन गया था। वह हर दो तीन दिन में घर आ तो जाते थे, लेकिन उनका आना मम्मी की प्यास बुझाने के लिए काफी नहीं था। विडंबना तो देखिए, अंकल के आते जाते रहने के बावजूद, मम्मी को उनके साथ उस बेतहाशा और रसीले मिलन का मौका महीने डेढ़ महीने में सिर्फ एक ही बार मिल पाता था। वह एक लंबा इंतज़ार था एक ऐसी तड़प जो मम्मी के जिस्म को अंदर ही अंदर गला देती थी।
"अंकल से मिल न पाने के कारण मम्मी के व्यवहार में बदलाव आने लगा था। रवि ने कई बार देखा कि कैसे उनकी नज़रों में मर्दों के लिए एक अजीब सी प्यास उभरने लगी थी। कभी पड़ोसियों के आने पर उनकी नज़रों का ठहर जाना, तो कभी अकेले में खुद को सँवारते हुए उनके चेहरे पर आने वाली वह मदहोश कर देने वाली मुस्कान इन छोटी छोटी घटनाओं ने रवि को यकीन दिला दिया था कि मम्मी की आँखों में अब एक मूक आमंत्रण है।"
"एक दिन मैने मम्मी और उनकी एक सहेली के बीच हो रही आपसी बातचीत भी सुनी, जो इस बात की पुष्टि करती थी कि मम्मी अब अपनी प्यास बुझाने के लिए कोई भी रास्ता चुन सकती है।"
आंटी कह रही थीं, *'अरे, वो ड्राइवर लोग बड़े अच्छे होते हैं!'* उस वक्त मुझे कुछ समझ नहीं आया, पर अब समझ आता है कि आंटी का 'अच्छे' से मतलब उनकी **ज़बरदस्त और बेतहाशा चोदाई** करने की काबिलियत से था। मम्मी की आँखों में भी वही चमक थी जैसे वो उन ट्रक ड्राइवरों के उस कच्चे और जंगली अंदाज़ को आज़माने के लिए बेताब हों, जहाँ कोई औपचारिकता नहीं, बस शुद्ध और रसीला मिलन हो।"
कभी कभी जब वो रात को अकेले कमरे में बैठी रहतीं और उनकी आँखों में वो अधूरी प्यास और तड़प साफ़ झलकती, तो मेरा जी करता कि मैं उनके पास जाऊँ, उनके उस तड़पते हुए जिस्म को छू लूँ और उनकी उस महीनों की प्यास को एक पल में बुझा दूँ। मेरा मन करता कि मैं उन्हें बता दूँ कि मैं उनकी उस हर एक आह और हर एक चाहत को महसूस कर सकता हूँ।
लेकिन फिर अचानक **रिश्ते की मर्यादा** का डर मुझे झकझोर देता। एक पल में मैं एक बेटा बन जाता जो शर्म से झुक जाता, और दूसरे ही पल मैं एक जवान मर्द बन जाता जो उनकी उस रसीली और प्यासी देह को पाने के लिए बेताब रहता। मैं उनके करीब तो जाना चाहता था, पर वो 'रिश्ते की मार' मुझे रोक देती। मैं चाहकर भी कुछ कह नहीं पाता था न अपनी मर्दानगी की उस चाहत के बारे में, और न ही उस कामुकता के बारे में जो मुझे उनकी तरफ खींचती थी। मैं बस चुपचाप खड़ा रहकर उनकी उस तड़प को देखता रहता और खुद भी उस आग में जलता रहता ।**
" मम्मी कभी कभी उस आंटी के साथ सत्संग , बाबा की हाज़िरी या किसी और बहाने बाहर जाती थीं। शुरुआत में मुझे कुछ समझ नहीं आया, लेकिन कुश समय बीतने के बाद मुझे ,मम्मी और आंटी की बातें सुनधीरे धीरे अहसास होने लगा कि वो असल में बाबा की भक्ति के लिए नहीं, बल्कि अपनी उस दबी हुई प्यास और अपनी मानसिक शांति के लिए जाती थीं। मुझे अब समझ आने लगा था कि उस आंटी के साथ जाने का असली मकसद कुछ और ही था।
"मेरे मन में चल रहे शकों और तड़प के बीच एक ऐसी खबर आई जिसने सब कुछ बदल दिया। पापा एक दो महीने के लिए घर वापस आ रहे थे। रवि को लगा था कि अब सब कुछ बदल जाएगा, अब माँ को सब छुपाना पड़ेगा। लेकिन उसे क्या पता था कि खेल तो अब शुरू होने वाला है।
पापा कोई साधारण इंसान नहीं थे, वो इस खेल के मंझे हुए खिलाड़ी थे। उन्हें पता था कि माँ की आँखों में वो चमक कहाँ से आती है और उनकी वो 'शांति' कहाँ मिलती है। घर में अब कुछ भी छुपाने की ज़रूरत नहीं थी। पापा के आने का मतलब था माँ की उस प्यासी धरती पर संतुष्टि की वो बरसात, जिसका इंतज़ार उन्हें बरसों से था। अब घर के बंद दरवाजों के पीछे एक ऐसा खेल खेला जाएगा जहाँ दो शरीरों में मिलन की आंधी आने वाली है,और वासना का एक नया अध्याय शुरू होगा। रवि बस एक गवाह बनकर इस अद्भुत और वर्जित नज़ारे को देखने के लिए बेताब था।"
पापा के घर कदम रखते ही माहौल में एक अजीब सी भारीपन और गर्मी महसूस होने लगी। रवि ने देखा कि जैसे ही पापा ने माँ को देखा, उनके बीच का मिलना कोई साधारण मिलन नहीं था। पापा ने माँ को जिस तरह से गले लगाया, वो गले मिलना नहीं बल्कि एक दूसरे में समा जाने की पहली कोशिश थी। उनकी बाँहों की पकड़ में एक ऐसी तड़प थी जिसे देखकर रवि की साँसें भी थम गईं। माँ की आँखों में भी वही बेताबी थी, वो पापा के सीने से ऐसे चिपकीं जैसे बरसों की प्यास एक पल में मिटाना चाहती हों। उनके बीच की वो 'गर्मजोशी' इतनी तीव्र थी कि रवि को लगा जैसे कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया हो।
पापा अपने साथ सिर्फ यादें नहीं, बल्कि एक पूरा पिटारा लेकर आए थे एक ऐसा पिटारा जो उस रात को यादगार बनाने के लिए था। रवि ने देखा कि पापा के बैग में कुछ ऐसी चीज़ें थीं जो घर के सलीके से बिल्कुल अलग थीं। रेशमी और बेहद **sexy undergarments** का वो ढेर, जो माँ के बदन पर आग लगाने के लिए काफी था। कमरे को महकाने के लिए महंगे **room sprays** और पापा के खुद के शरीर को मदहोश करने वाले **body sprays**। इतना ही नहीं, माँ की त्वचा को रेशम जैसा चिकना बनाने के लिए **hair remover** और वो सब कुछ जो एक बेतहाशा रात के लिए ज़रूरी था।
कमरे में रखे ताज़ा **फूलों** की खुशबू और उन नशीले स्प्रेज़ के मिश्रण ने हवा को भारी बना दिया था। रवि समझ गया कि आज रात उस कमरे की दीवारों के पीछे जो होने वाला है, वो किसी तूफ़ान से कम नहीं होगा। वो सामान, वो खुशबू और वो गर्मजोशी सब कुछ इशारा कर रहे थे कि पहली रात का वो एहसास अब बस दरवाज़ा खटखटाने ही वाला है।
पापा के पास वो सब कुछ था जो एक औरत की प्यास को पूरी तरह से मिटाने के लिए चाहिए होता है। रवि सोच रहा था कि कैसे पापा उन महंगे स्प्रेज़ की खुशबू के बीच माँ के बदन को अपने हाथों से सहलाएंगे, कैसे वो नए रेशमी कपड़ों को उतारकर माँ की नग्नता का स्वागत करेंगे, और कैसे वो 'सर्विस' इतनी गहन होगी कि माँ की सिसकियाँ पूरे घर में गूँज उठेंगी।
उस कमरे के भीतर अब मर्यादा का कोई अस्तित्व नहीं था। वहाँ सिर्फ एक पुरुष की ताकत और एक स्त्री की बेताबी का मिलन होने वाला था। रवि को लग रहा था कि आज की रात तो बस एक शुरुआत है; आने वाले दो महीनों में पापा माँ के शरीर के साथ जो खेल खेलेंगे, वो माँ को एक ऐसी दुनिया में ले जाएगा जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं होगा।
रात गहराती जा रही थी और घर के उस कोने में सन्नाटा नहीं, बल्कि एक भारी और नशीली बेचैनी पसरी हुई थी। रवि अपने कमरे में लेटा हुआ था, लेकिन उसकी आँखें बंद नहीं हो रही थीं। उसके कानों में उस बंद कमरे के भीतर होने वाली हलचल की कल्पनाएँ गूँज रही थीं।
जैसे ही रात के सन्नाटे ने अपना डेरा जमाया, रवि को लगा कि उस कमरे के भीतर 'सर्विस' का असली दौर शुरू हो चुका है। पापा ने कमरे के दरवाज़े को अंदर से कुंडी लगाकर बंद कर दिया था एक ऐसा संकेत जो यह बता रहा था कि अब दुनिया का कोई भी नियम या मर्यादा उस कमरे की दहलीज पार नहीं कर सकती।
मैं कल्पना कर सकता था कि कैसे पापा ने सबसे पहले उन महकते हुए **room sprays** का इस्तेमाल किया होगा, जिससे कमरे की हवा एकदम भारी और मदहोश कर देने वाली हो गई होगी। फिर शुरू हुआ हाेगा वो खेल, जिसमें माँ के शरीर को एक खिलौने की तरह सजाया जा रहा होगा। पापा ने उन नए और **sexy undergarments** को माँ के बदन पर ऐसे चढ़ाया होगा जैसे किसी बेशकीमती तोहफे को रैप किया जाता है। माँ का वो रेशमी बदन, जो अब तक सादे कपड़ों में ढका रहता था, अब पापा के हाथों के स्पर्श से थरथरा रहा होगा।
मेरे दिमाग में दृश्य और भी गहरा होता गया पापा ने माँ के बदन पर वो **body spray** छिड़का होगा जिसकी खुशबू माँ की अपनी प्राकृतिक गंध के साथ मिलकर एक नशीला मिश्रण बना रही होगी। फिर शुरू हुआ वो स्पर्श, जहाँ पापा के हाथ माँ की चिकनी और **hair remover** से साफ की हुई त्वचा पर फिसल रहे होंगे। माँ की वो दबी हुई सिसकियाँ अब धीरे धीरे बाहर आने लगी होंगी।
मुझे लग रहा था जैसे दीवारें भी उस गर्मी को महसूस कर रही हैं। पापा माँ के हर उस हिस्से को सहला रहे होंगे जिसे उन्होंने बरसों से छुपा कर रखा था। वह सिर्फ मिल नहीं रहे होंगे, बल्कि माँ के शरीर के हर रोम रोम को अपनी मर्दानगी से तृप्त कर रहे होंगे। उस कमरे के भीतर अब केवल वासना का साम्राज्य होगा, जहाँ माँ की सिसकियाँ और पापा की भारी साँसें मिलकर एक ऐसा संगीत रच रही होंगी, जो आने वाले दो महीनों तक थमने वाला नहीं था।
उस पहली रात के बाद से मेरा पूरा वजूद जैसे बदल गया था। जब सुबह मेरी आँख खुली और मैं दबे पाँव पापा के कमरे की तरफ बढ़ा, तो मेरा दिल सीने को चीरकर बाहर आने को बेताब था। जैसे ही मैंने दरवाज़े की दरार से अंदर झाँका, मेरी साँसें थम गईं।
फर्श पर बिखरा हुआ वो नज़ारा देख कर मेरा दिमाग सुन्न हो गया। माँ का वो कीमती **makeup** इधर उधर फैला था, और उनके वो **sexy lacey undergarments** फर्श पर ऐसे पड़े थे जैसे किसी ने उन्हें झपट्टा मारकर उतार फेंका हो। उन्हें देखकर मेरे शरीर में एक अजीब सी बिजली दौड़ गई। मेरा मन कर रहा था कि मैं झुकूँ और उन कपड़ों को छूकर देखूँ कि उनमें अभी भी माँ की खुशबू और रात की वो गर्मी बाकी है या नहीं।
लेकिन जब मेरी नज़र बिस्तर की तरफ गई, तो मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। बेडशीट पूरी तरह से अस्त व्यस्त थी और उस पर पसीने और **body fluids** के सूखे हुए निशान साफ़ चमक रहे थे। वो **चिपचिपी और गीली बेडशीट** देख कर मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैं खुद उस रात के उस बेतहाश और गंदे खेल का हिस्सा था।
मुझे डर लग रहा था, पर उससे कहीं ज़्यादा मैं उत्तेजित था। मेरा शरीर कांप रहा था और मेरा प्राइवेट पार्ट उस दृश्य की कल्पना मात्र से ही सख्त हो रहा था। मैं उन निशानों को देख कर बस एक ही बात सोच पा रहा था *'रात भर माँ के साथ क्या क्या हुआ होगा? पापा ने उन्हें कितनी बेदर्दी से इस्तेमाल किया होगा?'* वो बिखरा हुआ सामान और वो गीली बेडशीट मेरे लिए किसी नशीले ड्रग्ग की तरह काम कर रही थी। मैं डर नहीं रहा था, मैं उस गंदगी में डूब जाने के लिए बेताब हो रहा था।


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