18-08-2026, 06:09 PM
बातें चल ही रही थीं कि अचानक रुही के फोन की घंटी बज उठी।
तीखी, तेज़ आवाज़।
रुही के शरीर में जैसे करंट लग गया। उसने झटके से फोन उठाया। स्क्रीन पर नाम चमक रहा था—Sunny।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। हाथ काँप रहे थे। वह जल्दी से फोन को पलटकर सोफे के किनारे की तरफ छुपाने की कोशिश करने लगी, लेकिन रामू की निगाह उससे तेज़ थी।
रामू ने उसका हाथ पकड़ लिया। स्क्रीन उनकी आँखों के सामने आ गई।
“सनी…” उन्होंने धीरे से नाम पढ़ा। फिर मुस्कुराए। नशे में उनकी मुस्कान और खतरनाक लग रही थी। “तेरा चूतिया पति फोन कर रहा है।”
रुही फुसफुसाई, आवाज़ में घबराहट साफ थी, “रामू जी… प्लीज… मत… मैं बाद में बात करती हूँ…”
रामू ने फोन उसके हाथ में ही दबाया और सख्त आवाज़ में कहा, “उठा। अभी। उस चूतिये का फोन उठा और बोल… कि तू अपने यार की गोद में बैठी है।”
रुही की आँखें फटी की फटी रह गईं। “नहीं… रामू जी… प्लीज ऐसा मत कहो… मैं नहीं उठा सकती…”
सोनिया जोर से हँस पड़ी। उसने ताली बजाते हुए कहा, “अरे उठा ले रुही! इतना डर क्यों लग रहा है? बोल दे ना कि तू रामू भाई की गोद में बैठी है। देखें वो क्या कहता है।”
जामिल भी हँस रहा था। “भाभी, हिम्मत करो। एक बार सच बोल दो तो दिल हल्का हो जाएगा।”
रुही का पूरा शरीर काँप रहा था। फोन अभी भी बज रहा था। स्क्रीन बार-बार रोशनी कर रही थी—Sunny Calling… Sunny Calling…
उसके मन में तूफान था।
अगर उठा लिया तो क्या बोलूँगी?
अगर नहीं उठाया तो सनी शक करेगा…
रामू जी देख रहे हैं… सोनिया हँस रही है…
मेरी हालत खराब हो रही है…
आँसू उसकी आँखों में आ गए। उसने रामू की तरफ मदद माँगती हुई निगाहों से देखा। “रामू जी… मैं… मैं नहीं कर सकती ये… बहुत डर लग रहा है… प्लीज आप ही कुछ करो…”
रामू ने उसका चेहरा पकड़ा। आवाज़ में कोई नरमी नहीं थी।
“मैंने कहा उठा। तू मेरी है। आज रात मेरा हुक्म चलेगा। फोन उठा और बोल—‘मैं अपने यार की गोद में बैठी हूँ’। बस इतना। बाकी मैं देख लूँगा।”
सोनिया ने आग में घी डालते हुए कहा, “हाँ हाँ, बोल दे रुही। ‘सनी, मैं रामू की गोद में हूँ’। कितना मज़ा आएगा। बेचारी बुलबुल अब फँस गई है।”
फोन की घंटी रुकने ही वाली थी। आखिरी घंटी बज रही थी।
रुही की साँसें उखड़ रही थीं। हाथ काँप रहे थे। वह फोन को देख रही थी… फिर रामू को… फिर सोनिया को।
मन में एक ही सवाल घूम रहा था—
अब क्या करूँ?
उठाऊँ तो सब कुछ खत्म…
न उठाऊँ तो रामू जी नाराज़…
उसने आँखें बंद कर लीं। आँसू उसकी पलकों से बह निकले। फोन अभी भी उसके काँपते हाथ में था… और तीनों जोड़े की निगाहें उस पर टिकी हुई थीं।
रुही ने आँखें बंद कीं… और फोन उठा लिया।
“हेलो…” आवाज़ इतनी काँप रही थी कि खुद को पहचानना मुश्किल था।
दूसरी तरफ सनी की सिंपल, नॉर्मल आवाज़ आई—
“बेबी? क्या कर रही हो? सब ठीक है न?”
और उसी पल रुही के दिमाग में तूफान आ गया।
क्या कर रही हूँ?
कैसे बताऊँ सनी… कि तुम्हारी बेबी को अभी तुम्हारे सामने वाले कमरे में रामू जी ने दबोच रखा है।
तुम्हारी वो बेबी, जो घर में इतनी अकड़ में रहती थी… जो कभी-कभी तुमसे भी ऊँची आवाज़ में बात कर लिया करती थी… वो अभी रामू जी के थप्पड़ खाकर, उनकी गोद में दुबकी हुई बैठी है।
गाल अभी भी हल्का जल रहा है।
और मैं… मैं उनके सीने से चिपकी हूँ।
उसके गले में जैसे कुछ अटक गया।
कैसे बोलूँ कि तुम्हारी बीवी अभी आधी नंगी है… सिर्फ एक छोटी सी पैंटी में… और सामने सोनिया और जामिल बैठे हँस रहे हैं।
कैसे बताऊँ कि थोड़ी देर पहले तुम्हारी बेबी ने रामू जी के मुँह से शराब पी है… बार-बार… क्योंकि उन्होंने कहा था “खोल”।
कैसे कहूँ कि मैंने खुद उनसे कहा था—‘अब आपने मुझे कामत परिवार की बहू बना दिया है’।
आँसू उसकी आँखों में फिर से भर आए। वह रामू की छाती से और कसकर चिपक गई, जैसे कोई उसे वहाँ से खींच ले जाएगा।
सनी… तुम पूछ रहे हो “क्या कर रही हो?”
मैं क्या जवाब दूँ?
कि तुम्हारी बीवी अपने यार की गोद में बैठी है?
कि वो यार अभी मेरे बालों में उंगलियाँ फेर रहा है और मुझे देख रहा है कि मैं तुमसे क्या झूठ बोलती हूँ?
कि सोनिया सामने बैठी है और मुझे आँखें मार रही है?
मन में एक और ख्याल आया, और वह और काँप गई—
अगर मैं सच बोल दूँ… तो सब खत्म।
अगर झूठ बोलूँ… तो रामू जी नाराज़ होंगे। उन्होंने साफ कहा था—बोल दे कि तू अपने यार की गोद में बैठी है।
उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। फोन कान से चिपका था, लेकिन दिमाग कहीं और था।
मैं वो रुही नहीं रही जो सुबह तुम्हें चाय देकर ऑफिस छोड़ती थी।
मैं वो औरत बन गई हूँ जो थप्पड़ खाने के बाद भी लिपटी रहती है।
जो अपने मर्द के मुँह से गिरी शराब निगल लेती है।
जो लोगों के सामने “कमत परिवार की बहू” कहलवाने में शर्म के साथ-साथ एक अजीब सी शांति भी महसूस करती है।
रामू का हाथ उसकी कमर पर थोड़ा और कस गया। जैसे याद दिला रहा हो—फोन पर हो, लेकिन तू अभी भी मेरी है।
रुही की आँखें बंद थीं। आँसू धीरे-धीरे गालों पर बह रहे थे।
सनी… तुम्हारी बेबी अभी बहुत गिरी हुई है।
और सबसे बड़ी बात…
उसे इस गिरावट में एक अजीब सा सुकून भी मिल रहा है।
फोन के उस पार सनी फिर से बोला, “बेबी? सुन रही हो? कुछ हुआ क्या?”
रुही ने सिर्फ एक लंबी, काँपती साँस भरी।
जवाब अभी भी उसके गले में अटका हुआ था।
सामने सोनिया और जामिल दोनों मुस्कुरा रहे थे। सोनिया ने आँखें मारकर इशारा किया जैसे कह रही हो—“बोल दे”। जामिल भी हल्के से हँस रहा था।
रामू जी ने रुही की कमर पर हाथ और कस दिया। उन्होंने आँखों और सिर के हल्के इशारे से साफ हुक्म दिया—जवाब दे। फोन पर बात कर।
रुही की साँस अटक गई। आँखों में आँसू आ गए। वह रामू की छाती से और चिपकी और मन ही मन सोचा—
मैं अपने रामू जी को इतना समर्पित हो चुकी हूँ… कि ना भी नहीं कह सकती।
फोन के उस पार सनी फिर बोला, “बेबी? सुन रही हो?”
रुही की आवाज़ अब भी गले में अटकी हुई थी। रामू का इशारा उसके सिर पर भारी पड़ रहा था… और वह खुद को मना करने में पूरी तरह असमर्थ पा रही थी।
रुही ने जैसे-तैसे गला साफ किया और जवाब दिया—
“हाँ… सनी, सुन रही हूँ।”
आवाज़ अभी भी थोड़ी काँप रही थी। रामू जी का हाथ उसकी कमर पर मजबूती से टिका था। सोनिया और जामिल दोनों मुस्कुरा रहे थे। सोनिया ने होंठ दबाकर हँसी रोकने की कोशिश की, लेकिन आँखें चमक रही थीं।
सनी ने पूछा, “कहाँ हो अभी?”
रुही ने एक पल की हिचकिचाहट के बाद कहा, “सोनिया के घर… हाँ, यहीं हूँ।”
सामने सोनिया ने आँखें मारकर धीरे से जामिल से कुछ बुदबुदाया। जामिल भी हल्के से हँसा और उसके कान में कुछ कहा। रुही को साफ तो नहीं सुनाई दिया, लेकिन लहजा मजाकिया था।
सनी फिर बोला, “गर्ल्स नाइट कैसी चल रही है? मज़े कर रही हो न?”
रुही की नज़र रामू पर गई। उन्होंने सिर के हल्के इशारे से कहा—बोल।
उसने झूठ को जितना सामान्य बना सके, उतना बनाया—
“हाँ… मार्केट गए थे थोड़ी देर। खूब मज़े किए… शॉपिंग वगैरह। अब बस घर आकर खाना खा रहे हैं। आराम कर रहे हैं।”
बोलते हुए उसका गला सूख रहा था। रामू जी का हाथ धीरे-धीरे उसकी पीठ सहला रहा था—जैसे इनाम दे रहा हो कि उसने झूठ बोल लिया। सोनिया ने मुँह के पीछे हल्की सी हँसी दबाई। जामिल ने भी मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, जैसे कह रहा हो “शाबाश”।
रुही के मन में शर्म की लहर दौड़ गई।
मैं झूठ बोल रही हूँ… और ये तीनों सुनकर मुस्कुरा रहे हैं।
मेरी आवाज़ में कम्पन है… सनी को पता चल जाएगा क्या?
रामू जी का हाथ मेरी कमर पर है… और मैं उनके सहारे बैठकर अपने पति से झूठ बोल रही हूँ।
सनी ने कुछ और पूछा, “अच्छा… बहुत देर तक जागना है क्या? कल सुबह मैं थोड़ा लेट उठूँगा शायद।”
रुही ने जल्दी से जवाब दिया, “नहीं… जल्दी सो जाएँगे। तू आराम से रह… मैं ठीक हूँ।”
उसने बात खत्म करने की कोशिश की। आवाज़ में थकान और घबराहट दोनों थीं।
रामू ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए बहुत धीमी आवाज़ में कान के पास कहा, “अच्छा बोली। शाबाश।”
सोनिया ने जामिल से फिर कुछ बुदबुदाया। इस बार रुही को थोड़ा सुनाई दिया—“देखा… कैसे संभाल लिया बेचारी ने।” जामिल हल्के से हँसा।
रुही ने फोन कान से हटाया नहीं था, लेकिन उसकी निगाहें रामू के चेहरे पर थीं। अंदर शर्म, डर, और एक अजीब सी समर्पण वाली राहत एक साथ चल रही थी।
उसने मन ही मन सोचा—
मैं झूठ बोल पाई… क्योंकि रामू जी चाह रहे थे।
और यही बात मुझे सबसे ज्यादा शर्मिंदा कर रही है… और सबसे ज्यादा बाँध भी रही है।
तीखी, तेज़ आवाज़।
रुही के शरीर में जैसे करंट लग गया। उसने झटके से फोन उठाया। स्क्रीन पर नाम चमक रहा था—Sunny।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया। दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। हाथ काँप रहे थे। वह जल्दी से फोन को पलटकर सोफे के किनारे की तरफ छुपाने की कोशिश करने लगी, लेकिन रामू की निगाह उससे तेज़ थी।
रामू ने उसका हाथ पकड़ लिया। स्क्रीन उनकी आँखों के सामने आ गई।
“सनी…” उन्होंने धीरे से नाम पढ़ा। फिर मुस्कुराए। नशे में उनकी मुस्कान और खतरनाक लग रही थी। “तेरा चूतिया पति फोन कर रहा है।”
रुही फुसफुसाई, आवाज़ में घबराहट साफ थी, “रामू जी… प्लीज… मत… मैं बाद में बात करती हूँ…”
रामू ने फोन उसके हाथ में ही दबाया और सख्त आवाज़ में कहा, “उठा। अभी। उस चूतिये का फोन उठा और बोल… कि तू अपने यार की गोद में बैठी है।”
रुही की आँखें फटी की फटी रह गईं। “नहीं… रामू जी… प्लीज ऐसा मत कहो… मैं नहीं उठा सकती…”
सोनिया जोर से हँस पड़ी। उसने ताली बजाते हुए कहा, “अरे उठा ले रुही! इतना डर क्यों लग रहा है? बोल दे ना कि तू रामू भाई की गोद में बैठी है। देखें वो क्या कहता है।”
जामिल भी हँस रहा था। “भाभी, हिम्मत करो। एक बार सच बोल दो तो दिल हल्का हो जाएगा।”
रुही का पूरा शरीर काँप रहा था। फोन अभी भी बज रहा था। स्क्रीन बार-बार रोशनी कर रही थी—Sunny Calling… Sunny Calling…
उसके मन में तूफान था।
अगर उठा लिया तो क्या बोलूँगी?
अगर नहीं उठाया तो सनी शक करेगा…
रामू जी देख रहे हैं… सोनिया हँस रही है…
मेरी हालत खराब हो रही है…
आँसू उसकी आँखों में आ गए। उसने रामू की तरफ मदद माँगती हुई निगाहों से देखा। “रामू जी… मैं… मैं नहीं कर सकती ये… बहुत डर लग रहा है… प्लीज आप ही कुछ करो…”
रामू ने उसका चेहरा पकड़ा। आवाज़ में कोई नरमी नहीं थी।
“मैंने कहा उठा। तू मेरी है। आज रात मेरा हुक्म चलेगा। फोन उठा और बोल—‘मैं अपने यार की गोद में बैठी हूँ’। बस इतना। बाकी मैं देख लूँगा।”
सोनिया ने आग में घी डालते हुए कहा, “हाँ हाँ, बोल दे रुही। ‘सनी, मैं रामू की गोद में हूँ’। कितना मज़ा आएगा। बेचारी बुलबुल अब फँस गई है।”
फोन की घंटी रुकने ही वाली थी। आखिरी घंटी बज रही थी।
रुही की साँसें उखड़ रही थीं। हाथ काँप रहे थे। वह फोन को देख रही थी… फिर रामू को… फिर सोनिया को।
मन में एक ही सवाल घूम रहा था—
अब क्या करूँ?
उठाऊँ तो सब कुछ खत्म…
न उठाऊँ तो रामू जी नाराज़…
उसने आँखें बंद कर लीं। आँसू उसकी पलकों से बह निकले। फोन अभी भी उसके काँपते हाथ में था… और तीनों जोड़े की निगाहें उस पर टिकी हुई थीं।
रुही ने आँखें बंद कीं… और फोन उठा लिया।
“हेलो…” आवाज़ इतनी काँप रही थी कि खुद को पहचानना मुश्किल था।
दूसरी तरफ सनी की सिंपल, नॉर्मल आवाज़ आई—
“बेबी? क्या कर रही हो? सब ठीक है न?”
और उसी पल रुही के दिमाग में तूफान आ गया।
क्या कर रही हूँ?
कैसे बताऊँ सनी… कि तुम्हारी बेबी को अभी तुम्हारे सामने वाले कमरे में रामू जी ने दबोच रखा है।
तुम्हारी वो बेबी, जो घर में इतनी अकड़ में रहती थी… जो कभी-कभी तुमसे भी ऊँची आवाज़ में बात कर लिया करती थी… वो अभी रामू जी के थप्पड़ खाकर, उनकी गोद में दुबकी हुई बैठी है।
गाल अभी भी हल्का जल रहा है।
और मैं… मैं उनके सीने से चिपकी हूँ।
उसके गले में जैसे कुछ अटक गया।
कैसे बोलूँ कि तुम्हारी बीवी अभी आधी नंगी है… सिर्फ एक छोटी सी पैंटी में… और सामने सोनिया और जामिल बैठे हँस रहे हैं।
कैसे बताऊँ कि थोड़ी देर पहले तुम्हारी बेबी ने रामू जी के मुँह से शराब पी है… बार-बार… क्योंकि उन्होंने कहा था “खोल”।
कैसे कहूँ कि मैंने खुद उनसे कहा था—‘अब आपने मुझे कामत परिवार की बहू बना दिया है’।
आँसू उसकी आँखों में फिर से भर आए। वह रामू की छाती से और कसकर चिपक गई, जैसे कोई उसे वहाँ से खींच ले जाएगा।
सनी… तुम पूछ रहे हो “क्या कर रही हो?”
मैं क्या जवाब दूँ?
कि तुम्हारी बीवी अपने यार की गोद में बैठी है?
कि वो यार अभी मेरे बालों में उंगलियाँ फेर रहा है और मुझे देख रहा है कि मैं तुमसे क्या झूठ बोलती हूँ?
कि सोनिया सामने बैठी है और मुझे आँखें मार रही है?
मन में एक और ख्याल आया, और वह और काँप गई—
अगर मैं सच बोल दूँ… तो सब खत्म।
अगर झूठ बोलूँ… तो रामू जी नाराज़ होंगे। उन्होंने साफ कहा था—बोल दे कि तू अपने यार की गोद में बैठी है।
उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। फोन कान से चिपका था, लेकिन दिमाग कहीं और था।
मैं वो रुही नहीं रही जो सुबह तुम्हें चाय देकर ऑफिस छोड़ती थी।
मैं वो औरत बन गई हूँ जो थप्पड़ खाने के बाद भी लिपटी रहती है।
जो अपने मर्द के मुँह से गिरी शराब निगल लेती है।
जो लोगों के सामने “कमत परिवार की बहू” कहलवाने में शर्म के साथ-साथ एक अजीब सी शांति भी महसूस करती है।
रामू का हाथ उसकी कमर पर थोड़ा और कस गया। जैसे याद दिला रहा हो—फोन पर हो, लेकिन तू अभी भी मेरी है।
रुही की आँखें बंद थीं। आँसू धीरे-धीरे गालों पर बह रहे थे।
सनी… तुम्हारी बेबी अभी बहुत गिरी हुई है।
और सबसे बड़ी बात…
उसे इस गिरावट में एक अजीब सा सुकून भी मिल रहा है।
फोन के उस पार सनी फिर से बोला, “बेबी? सुन रही हो? कुछ हुआ क्या?”
रुही ने सिर्फ एक लंबी, काँपती साँस भरी।
जवाब अभी भी उसके गले में अटका हुआ था।
सामने सोनिया और जामिल दोनों मुस्कुरा रहे थे। सोनिया ने आँखें मारकर इशारा किया जैसे कह रही हो—“बोल दे”। जामिल भी हल्के से हँस रहा था।
रामू जी ने रुही की कमर पर हाथ और कस दिया। उन्होंने आँखों और सिर के हल्के इशारे से साफ हुक्म दिया—जवाब दे। फोन पर बात कर।
रुही की साँस अटक गई। आँखों में आँसू आ गए। वह रामू की छाती से और चिपकी और मन ही मन सोचा—
मैं अपने रामू जी को इतना समर्पित हो चुकी हूँ… कि ना भी नहीं कह सकती।
फोन के उस पार सनी फिर बोला, “बेबी? सुन रही हो?”
रुही की आवाज़ अब भी गले में अटकी हुई थी। रामू का इशारा उसके सिर पर भारी पड़ रहा था… और वह खुद को मना करने में पूरी तरह असमर्थ पा रही थी।
रुही ने जैसे-तैसे गला साफ किया और जवाब दिया—
“हाँ… सनी, सुन रही हूँ।”
आवाज़ अभी भी थोड़ी काँप रही थी। रामू जी का हाथ उसकी कमर पर मजबूती से टिका था। सोनिया और जामिल दोनों मुस्कुरा रहे थे। सोनिया ने होंठ दबाकर हँसी रोकने की कोशिश की, लेकिन आँखें चमक रही थीं।
सनी ने पूछा, “कहाँ हो अभी?”
रुही ने एक पल की हिचकिचाहट के बाद कहा, “सोनिया के घर… हाँ, यहीं हूँ।”
सामने सोनिया ने आँखें मारकर धीरे से जामिल से कुछ बुदबुदाया। जामिल भी हल्के से हँसा और उसके कान में कुछ कहा। रुही को साफ तो नहीं सुनाई दिया, लेकिन लहजा मजाकिया था।
सनी फिर बोला, “गर्ल्स नाइट कैसी चल रही है? मज़े कर रही हो न?”
रुही की नज़र रामू पर गई। उन्होंने सिर के हल्के इशारे से कहा—बोल।
उसने झूठ को जितना सामान्य बना सके, उतना बनाया—
“हाँ… मार्केट गए थे थोड़ी देर। खूब मज़े किए… शॉपिंग वगैरह। अब बस घर आकर खाना खा रहे हैं। आराम कर रहे हैं।”
बोलते हुए उसका गला सूख रहा था। रामू जी का हाथ धीरे-धीरे उसकी पीठ सहला रहा था—जैसे इनाम दे रहा हो कि उसने झूठ बोल लिया। सोनिया ने मुँह के पीछे हल्की सी हँसी दबाई। जामिल ने भी मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, जैसे कह रहा हो “शाबाश”।
रुही के मन में शर्म की लहर दौड़ गई।
मैं झूठ बोल रही हूँ… और ये तीनों सुनकर मुस्कुरा रहे हैं।
मेरी आवाज़ में कम्पन है… सनी को पता चल जाएगा क्या?
रामू जी का हाथ मेरी कमर पर है… और मैं उनके सहारे बैठकर अपने पति से झूठ बोल रही हूँ।
सनी ने कुछ और पूछा, “अच्छा… बहुत देर तक जागना है क्या? कल सुबह मैं थोड़ा लेट उठूँगा शायद।”
रुही ने जल्दी से जवाब दिया, “नहीं… जल्दी सो जाएँगे। तू आराम से रह… मैं ठीक हूँ।”
उसने बात खत्म करने की कोशिश की। आवाज़ में थकान और घबराहट दोनों थीं।
रामू ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए बहुत धीमी आवाज़ में कान के पास कहा, “अच्छा बोली। शाबाश।”
सोनिया ने जामिल से फिर कुछ बुदबुदाया। इस बार रुही को थोड़ा सुनाई दिया—“देखा… कैसे संभाल लिया बेचारी ने।” जामिल हल्के से हँसा।
रुही ने फोन कान से हटाया नहीं था, लेकिन उसकी निगाहें रामू के चेहरे पर थीं। अंदर शर्म, डर, और एक अजीब सी समर्पण वाली राहत एक साथ चल रही थी।
उसने मन ही मन सोचा—
मैं झूठ बोल पाई… क्योंकि रामू जी चाह रहे थे।
और यही बात मुझे सबसे ज्यादा शर्मिंदा कर रही है… और सबसे ज्यादा बाँध भी रही है।


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