18-08-2026, 05:34 PM
शराब का हल्का नशा अब रुही पर भी चढ़ने लगा था। सिर थोड़ा घूम रहा था, शरीर में एक अजीब सी गर्माहट फैल रही थी। वह और ज्यादा रामू जी से चिपक गई। उनकी चौड़ी छाती से अपना गाल सटा लिया, एक हाथ उनकी कमर पर रख दिया। नाइटी अब लगभग अर्थहीन हो चुकी थी—सिर्फ पतली पैंटी बची थी।
सामने जामिल और सोनिया की हालत और आगे बढ़ चुकी थी। जामिल ने सोनिया को अपनी गोद में खींच लिया था। दोनों के होठ जुड़े हुए थे—गहरे, गीले चुम्बन। सोनिया की हल्की सिसकारियाँ सुनाई दे रही थीं। जामिल का हाथ उसकी पीठ पर फिसल रहा था।
रुही यह देखकर और शर्मा गई, लेकिन अंदर ही अंदर उत्तेजना भी बढ़ रही थी। उसने अपना चेहरा रामू की छाती में और छुपा लिया।
रामू ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए हँसते हुए कहा, “देख कितनी शर्मा रही है मेरी बुलबुल। नशा चढ़ा है न? अब और चिपक। छुपने की जगह यही है।”
सोनिया ने चुम्बन तोड़ा। होंठ चमक रहे थे। उसने रुही की तरफ देखा और मुस्कुराई।
“अरे रुही… इतनी लाल क्यों हो गई? हम तो बस चूम रहे हैं। तू तो रामू भाई के मुँह से शराब भी पी चुकी है। अब शर्म किस बात की?”
जामिल भी हँसा। उसकी आवाज़ में मजाक और तंज दोनों थे। “भाभी, सच बताओ… अंदर से कितना गीली हो चुकी हो? शर्माने का नाटक मत करो। हम सब जानते हैं कि तुम यहाँ क्यों हो।”
रुही ने आँखें और बंद कर लीं। आवाज़ बहुत धीमी निकली, “मत बोलो न… बहुत शर्म आ रही है…”
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। नशे में उनकी आँखें चमक रही थीं।
“शर्म आ रही है? तू मेरी रखैल है। इनके सामने भी। बोल, तू मेरी क्या है?”
रुही की आँखों में पानी आ गया। उत्तेजना और अपमान दोनों एक साथ। उसने फुसफुसाते हुए कहा, “आपकी… आपकी औरत… आपकी बुलबुल…”
सोनिया ताली बजाते हुए हँसी। “वाह! देख जामिल, कितनी जल्दी मान गई। रुही, तू तो पूरी तरह बिक चुकी है। सनी के घर की बहू होकर किसी ऑटो वाले की रंडी बनी घूम रही है।”
जामिल ने सोनिया को और कस लिया और रुही से बोला, “सही कह रही हैं मैडम। तुम्हारा पति सोच रहा होगा पत्नी गर्ल्स नाइट मनाने गई है… और तुम यहाँ घुटनों के बल बैठने वाली हो अपने यार के सामने।”
रुही का पूरा शरीर काँप रहा था। शर्म से गर्दन तक लाल हो चुकी थी, लेकिन जाँघें अपने-आप भींच रही थीं। वह रामू से और चिपक गई, जैसे छुपना चाहती हो।
रामू ने उसके कान में गरम साँस छोड़ते हुए कहा, “सुन रही है न? ये सब सच बोल रहे हैं। तू मेरी है। इनके सामने भी मैं तुझे अपना समझता हूँ। आज रात तेरी सारी शर्म निकाल दूँगा।”
सोनिया ने फिर से जामिल को चूमते हुए कहा, “रामू भाई, इसे और दबाओ। ये जब शर्माती है ना… तो और मज़ेदार लगती है। रुही, सिर उठा। इतना मत छुप। तू हमारी जैसी ही है… बस थोड़ी ज्यादा बेचारी।”
रुही ने धीरे से सिर उठाया। आँखें नम थीं। उसने रामू की आँखों में देखा और सिर्फ इतना कहा—
“रामू जी… बस करो… मैं… मैं और नहीं सुन सकती…”
लेकिन उसकी आवाज़ में विरोध कम, और समर्पण ज्यादा था। शरीर पूरी तरह उनके सहारे झुक चुका था। नशा, शर्म, उत्तेजना और अपमान—सब मिलकर उसे और गहरे उनकी बाँहों में धकेल रहे थे।
सामने सोनिया और जामिल फिर से एक-दूसरे में खो गए थे। और रुही… रामू की छाती से चिपकी हुई, उनकी हर बात सह रही थी।
रामू जी का नशा अब अच्छी तरह चढ़ चुका था। उन्होंने रुही को अपनी गोद में और खींच लिया। एक हाथ उसकी कमर पर था, दूसरा उसके बालों में। फिर उन्होंने सोनिया और जामिल की तरफ देखा और धीरे-धीरे मुस्कुराए।
“सुनो… पहली बार की बात बताऊँ?” रामू की आवाज़ में नशा और मज़ा दोनों थे। “जब पहली बार मेरा लंड इसकी चूत में घुसा था…”
रुही की आँखें तुरंत बड़ी हो गईं। उसने रामू का मुँह बंद करने की कोशिश की, “रामू जी… नहीं… मत बताओ… प्लीज…”
रामू ने उसका हाथ हटा दिया और हँसते हुए जारी रखा। “अरे सुनने दो इन्हें। पहली बार जब मैंने इसे बिस्तर पर लिटाया और अपना लंड इसकी चूत पर रखा… तो ये काँप रही थी। जैसे ही मैंने अंदर धकेला, ये चीख पड़ी। जोर से। आँखों से आँसू आ गए। दोनों हाथों से मेरी छाती धकेलने लगी और रो-रोकर बिनती करने लगी—‘रामू जी धीरे… प्लीज धीरे करो… दर्द हो रहा है… निकल जाओ…’।”
सोनिया जोर से हँस पड़ी। जामिल भी ठहाका लगा रहा था।
“अरे बाप रे!” सोनिया ने कहा, “बेचारी इतनी नज़ुक थी क्या? चिड़ियाँ जैसी चीख रही होगी।”
जामिल ने सिर हिलाया, “सच में भैया, ये तो बहुत नाज़ुक कली लगती है। बेचारी को तो प्यार से, आहिस्ता-आहिस्ता चोदना चाहिए। जबरदस्ती मत करना।”
रामू ने रुही के गाल पर थपकी दी और बोला, “मैं क्या करूँ? ये सरदारनी का पति… उसका लंड या तो छोटा होगा या कमजोर। वरना इतने सालों में इस हिरनी को अच्छी तरह चीर क्यों नहीं पाया? पहली बार मेरे अंदर जाते ही ये रोने लग गई। इतनी टाइट थी इसकी चूत कि मुझे भी धीरे जाना पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे… जब मैं पूरा अंदर तक घुस गया, तो ये खुद अपनी टाँगें और फैलाने लगी।”
रुही का चेहरा शर्म से जल रहा था। आँखों में आँसू थे, लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। सिर्फ रामू से और ज्यादा चिपक गई।
सोनिया ने रुही की तरफ देखकर कहा, “रुही… तू सच में इतनी रोई थी पहली बार? बेचारी। अब तो आदत हो गई होगी न रामू भाई के बड़े वाले की?”
जामिल ने भी तंज कसते हुए कहा, “भाभी, अब तो बताओ… पहले चीखती थी, अब माँगती हो क्या?”
रुही ने आँखें झुकाए हुए बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “मत पूछो… बहुत शर्म आ रही है…”
फिर उसने रामू की छाती से अपना गाल सटाया और फुसफुसाई, “रामू जी… अब तो आपने मुझे कामत परिवार की बहू बना दिया है। मैं आपकी हूँ… बस इतना ही कहना है।”
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। आँखों में मालिकाना संतुष्टि थी।
“हाँ,” उन्होंने साफ कहा, “कमत परिवार की बहू। मेरी बहू। जो मेरे लंड पर रोई थी, अब उसी लंड की दीवानी है। सुन लिया तुम दोनों ने? ये मेरी है।”
सोनिया ने ताली बजाई। “वाह! बहू बन गई। जामिल, देखो कैसे शर्म से लाल होकर अपने यार से लिपट गई है। बेचारी नज़ुक कली… अब तो पूरी तरह खिल चुकी है रामू भाई के हाथों।”
जामिल हँसते हुए बोला, “सही है भैया। अब इसे संभाल के रखना। इतनी नाज़ुक लगती है… लेकिन अंदर से शायद बहुत प्यासी हो।”
रुही अब पूरी तरह रामू से लिपटी हुई थी। दोनों बाँहें उनकी गर्दन में डाले, चेहरा उनकी छाती में छुपाए। शर्म से उसका शरीर काँप रहा था, लेकिन वह अलग होने की कोशिश नहीं कर रही थी। उल्टे और कसकर चिपक गई थी।
उसके मन में एक ही बात घूम रही थी—
हाँ… अब मैं कामत परिवार की बहू हूँ।
इनके सामने भी।
और मुझे शर्म आ रही है… लेकिन छोड़ना भी नहीं चाहती।
सामने जामिल और सोनिया की हालत और आगे बढ़ चुकी थी। जामिल ने सोनिया को अपनी गोद में खींच लिया था। दोनों के होठ जुड़े हुए थे—गहरे, गीले चुम्बन। सोनिया की हल्की सिसकारियाँ सुनाई दे रही थीं। जामिल का हाथ उसकी पीठ पर फिसल रहा था।
रुही यह देखकर और शर्मा गई, लेकिन अंदर ही अंदर उत्तेजना भी बढ़ रही थी। उसने अपना चेहरा रामू की छाती में और छुपा लिया।
रामू ने उसके बालों में उंगलियाँ फेरते हुए हँसते हुए कहा, “देख कितनी शर्मा रही है मेरी बुलबुल। नशा चढ़ा है न? अब और चिपक। छुपने की जगह यही है।”
सोनिया ने चुम्बन तोड़ा। होंठ चमक रहे थे। उसने रुही की तरफ देखा और मुस्कुराई।
“अरे रुही… इतनी लाल क्यों हो गई? हम तो बस चूम रहे हैं। तू तो रामू भाई के मुँह से शराब भी पी चुकी है। अब शर्म किस बात की?”
जामिल भी हँसा। उसकी आवाज़ में मजाक और तंज दोनों थे। “भाभी, सच बताओ… अंदर से कितना गीली हो चुकी हो? शर्माने का नाटक मत करो। हम सब जानते हैं कि तुम यहाँ क्यों हो।”
रुही ने आँखें और बंद कर लीं। आवाज़ बहुत धीमी निकली, “मत बोलो न… बहुत शर्म आ रही है…”
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। नशे में उनकी आँखें चमक रही थीं।
“शर्म आ रही है? तू मेरी रखैल है। इनके सामने भी। बोल, तू मेरी क्या है?”
रुही की आँखों में पानी आ गया। उत्तेजना और अपमान दोनों एक साथ। उसने फुसफुसाते हुए कहा, “आपकी… आपकी औरत… आपकी बुलबुल…”
सोनिया ताली बजाते हुए हँसी। “वाह! देख जामिल, कितनी जल्दी मान गई। रुही, तू तो पूरी तरह बिक चुकी है। सनी के घर की बहू होकर किसी ऑटो वाले की रंडी बनी घूम रही है।”
जामिल ने सोनिया को और कस लिया और रुही से बोला, “सही कह रही हैं मैडम। तुम्हारा पति सोच रहा होगा पत्नी गर्ल्स नाइट मनाने गई है… और तुम यहाँ घुटनों के बल बैठने वाली हो अपने यार के सामने।”
रुही का पूरा शरीर काँप रहा था। शर्म से गर्दन तक लाल हो चुकी थी, लेकिन जाँघें अपने-आप भींच रही थीं। वह रामू से और चिपक गई, जैसे छुपना चाहती हो।
रामू ने उसके कान में गरम साँस छोड़ते हुए कहा, “सुन रही है न? ये सब सच बोल रहे हैं। तू मेरी है। इनके सामने भी मैं तुझे अपना समझता हूँ। आज रात तेरी सारी शर्म निकाल दूँगा।”
सोनिया ने फिर से जामिल को चूमते हुए कहा, “रामू भाई, इसे और दबाओ। ये जब शर्माती है ना… तो और मज़ेदार लगती है। रुही, सिर उठा। इतना मत छुप। तू हमारी जैसी ही है… बस थोड़ी ज्यादा बेचारी।”
रुही ने धीरे से सिर उठाया। आँखें नम थीं। उसने रामू की आँखों में देखा और सिर्फ इतना कहा—
“रामू जी… बस करो… मैं… मैं और नहीं सुन सकती…”
लेकिन उसकी आवाज़ में विरोध कम, और समर्पण ज्यादा था। शरीर पूरी तरह उनके सहारे झुक चुका था। नशा, शर्म, उत्तेजना और अपमान—सब मिलकर उसे और गहरे उनकी बाँहों में धकेल रहे थे।
सामने सोनिया और जामिल फिर से एक-दूसरे में खो गए थे। और रुही… रामू की छाती से चिपकी हुई, उनकी हर बात सह रही थी।
रामू जी का नशा अब अच्छी तरह चढ़ चुका था। उन्होंने रुही को अपनी गोद में और खींच लिया। एक हाथ उसकी कमर पर था, दूसरा उसके बालों में। फिर उन्होंने सोनिया और जामिल की तरफ देखा और धीरे-धीरे मुस्कुराए।
“सुनो… पहली बार की बात बताऊँ?” रामू की आवाज़ में नशा और मज़ा दोनों थे। “जब पहली बार मेरा लंड इसकी चूत में घुसा था…”
रुही की आँखें तुरंत बड़ी हो गईं। उसने रामू का मुँह बंद करने की कोशिश की, “रामू जी… नहीं… मत बताओ… प्लीज…”
रामू ने उसका हाथ हटा दिया और हँसते हुए जारी रखा। “अरे सुनने दो इन्हें। पहली बार जब मैंने इसे बिस्तर पर लिटाया और अपना लंड इसकी चूत पर रखा… तो ये काँप रही थी। जैसे ही मैंने अंदर धकेला, ये चीख पड़ी। जोर से। आँखों से आँसू आ गए। दोनों हाथों से मेरी छाती धकेलने लगी और रो-रोकर बिनती करने लगी—‘रामू जी धीरे… प्लीज धीरे करो… दर्द हो रहा है… निकल जाओ…’।”
सोनिया जोर से हँस पड़ी। जामिल भी ठहाका लगा रहा था।
“अरे बाप रे!” सोनिया ने कहा, “बेचारी इतनी नज़ुक थी क्या? चिड़ियाँ जैसी चीख रही होगी।”
जामिल ने सिर हिलाया, “सच में भैया, ये तो बहुत नाज़ुक कली लगती है। बेचारी को तो प्यार से, आहिस्ता-आहिस्ता चोदना चाहिए। जबरदस्ती मत करना।”
रामू ने रुही के गाल पर थपकी दी और बोला, “मैं क्या करूँ? ये सरदारनी का पति… उसका लंड या तो छोटा होगा या कमजोर। वरना इतने सालों में इस हिरनी को अच्छी तरह चीर क्यों नहीं पाया? पहली बार मेरे अंदर जाते ही ये रोने लग गई। इतनी टाइट थी इसकी चूत कि मुझे भी धीरे जाना पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे… जब मैं पूरा अंदर तक घुस गया, तो ये खुद अपनी टाँगें और फैलाने लगी।”
रुही का चेहरा शर्म से जल रहा था। आँखों में आँसू थे, लेकिन वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। सिर्फ रामू से और ज्यादा चिपक गई।
सोनिया ने रुही की तरफ देखकर कहा, “रुही… तू सच में इतनी रोई थी पहली बार? बेचारी। अब तो आदत हो गई होगी न रामू भाई के बड़े वाले की?”
जामिल ने भी तंज कसते हुए कहा, “भाभी, अब तो बताओ… पहले चीखती थी, अब माँगती हो क्या?”
रुही ने आँखें झुकाए हुए बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “मत पूछो… बहुत शर्म आ रही है…”
फिर उसने रामू की छाती से अपना गाल सटाया और फुसफुसाई, “रामू जी… अब तो आपने मुझे कामत परिवार की बहू बना दिया है। मैं आपकी हूँ… बस इतना ही कहना है।”
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। आँखों में मालिकाना संतुष्टि थी।
“हाँ,” उन्होंने साफ कहा, “कमत परिवार की बहू। मेरी बहू। जो मेरे लंड पर रोई थी, अब उसी लंड की दीवानी है। सुन लिया तुम दोनों ने? ये मेरी है।”
सोनिया ने ताली बजाई। “वाह! बहू बन गई। जामिल, देखो कैसे शर्म से लाल होकर अपने यार से लिपट गई है। बेचारी नज़ुक कली… अब तो पूरी तरह खिल चुकी है रामू भाई के हाथों।”
जामिल हँसते हुए बोला, “सही है भैया। अब इसे संभाल के रखना। इतनी नाज़ुक लगती है… लेकिन अंदर से शायद बहुत प्यासी हो।”
रुही अब पूरी तरह रामू से लिपटी हुई थी। दोनों बाँहें उनकी गर्दन में डाले, चेहरा उनकी छाती में छुपाए। शर्म से उसका शरीर काँप रहा था, लेकिन वह अलग होने की कोशिश नहीं कर रही थी। उल्टे और कसकर चिपक गई थी।
उसके मन में एक ही बात घूम रही थी—
हाँ… अब मैं कामत परिवार की बहू हूँ।
इनके सामने भी।
और मुझे शर्म आ रही है… लेकिन छोड़ना भी नहीं चाहती।


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