18-08-2026, 05:00 AM
रात का सन्नाटा गहरा रहा है। डाइनिंग टेबल पर लाइट हल्की है और माहौल में एक अजीब सी भारीपन और **कामुक तनाव** है। मैं (रवि) अपनी प्लेट में खाना खत्म कर रहा हूँ, लेकिन मेरा पूरा ध्यान मम्मी और अंकल पर है। मैं देख पा रहा हूँ कि अंकल की नज़रें बार बार मम्मी के **गहरे गले और उभारते हुए सीने** पर टिक रही हैं। उनके चेहरे पर एक ऐसी **गंदी और भूखी चमक** है जिसे वे छिपा नहीं पा रहे।
मैं जानबूझकर अपनी आवाज़ में थोड़ी थकावट लाता हूँ और कहता हूँ, "मम्मी, डॉक्टर ने कहा ह नींद की गोली खाने को, मैं गोली खाकर सो जाता हूँ।"
जैसे ही मेरे मुँह से ये शब्द निकलते हैं, कमरे की हवा जैसे बदल जाती है। मैं देखता हूँ कि अंकल की आँखों में एक **अश्लील और विजयी चमक** कौंध जाती है। वे मेरी तरफ देखते हैं, फिर धीरे से मम्मी की तरफ मुड़ते हैं। मम्मी और अंकल के बीच शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती। वे बस एक दूसरे की आँखों में देखते हैं एक ऐसा **गहरा और कामुक इशारा** जो सिर्फ दो प्यासे शिकारी ही समझ सकते हैं। उनकी आँखों की वह भाषा चीख चीख कर कह रही है: *"आज तो भगवान हम पर बहुत दयालु हैं। आज रात कोई रुकावट नहीं होगी,हम अपना खेल खुल कर खेलेंगे।"*
मम्मी के चेहरे पर एक हल्की सी शर्म और बहुत ज़्यादा **हवस भरी बेचैनी** है। वे जानती हैं कि जैसे ही मैं अपनी आँखें मूँद लूँगा, वे दोनों अपनी **बेकाबू और गंदी इच्छाओं** के साथ एक हो जाएँगे। मैं अपनी गोली हाथ में लेता हूँ, उनके उन **लालची चेहरों** को देखता हूँ और मन ही मन मुस्कुराता हूँ। मुझे पता है कि आज रात मैं सिर्फ सो नहीं रहा हूँगा, बल्कि उनकी उस **रसीली और अश्लील तबाही** का सबसे नज़दीकी गवाह बनूँगा।
मैं गोली निगलने का दिखावा करता हूँ और धीरे धीरे बिस्तर की ओर बढ़ता हूँ, और जा के लेट कर, थोड़ी देर बाद आंखें मूंद कर सोने का दिखावा करता हूं।
जैसे ही उन्हें यकीन हो जाता है कि मैं गहरी और बेसुध नींद में हूँ, कमरे का माहौल पूरी तरह बदल जाता है। अंकल की आँखों में अब कोई हिचकिचाहट नहीं है, सिर्फ एक **जंगली और बेकाबू हवस** है। वे झपटकर मम्मी के पास पहुँचते हैं और उनके **मसालेदार और उभरे हुए स्तनों** को पूरी ताकत से दबोच लेते हैं। वे मम्मी को खींचते हुए बेड की ओर ले जाने लगते हैं।
मम्मी, जो अब तक खुद को संभाल रही थीं, अंकल के इस **हिंसक और कामुक स्पर्श** से सिहर उठती हैं। वे हल्की सी आवाज़ में कहती हैं, "अरे रुको... पहले किचन का काम तो खत्म कर लूँ।" वे थोड़ा हिचकिचाती हैं और फिर धीरे से कहती हैं, "और हाँ, हमें दूसरे कमरे में सोना चाहिए...
लेकिन अंकल अब बिल्कुल भी सुनने के मूड में नहीं हैं। उनकी सांसें भारी हो चुकी हैं और उनकी मर्दानगी उनके शरीर में तड़प रही है। वे मम्मी के कान के पास झुककर एक **गंदी और गहरी आवाज़** में कहते हैं, "अब क्या डर है? बच्चा गहरी नींद में है। आज मैं तुझे बिल्कुल **नंगा** रखूँगा और पूरी रात तेरी **सवारी** करूँगा।" उनकी यह बात सुनकर मम्मी के शरीर में एक अजीब सी थरथराहट दौड़ जाती है।
मम्मी शरारत भरे अंदाज़ में, अपनी आँखों में वही **कामुक चमक** लिए मुस्कुराती हैं और कहती हैं, "मारना है क्या मुझे? मुझे तो लगता है कल ही रवि के पापा को आना पड़ेगा मेरा **अंतिम संस्कार** करने।" उनकी इस बात में एक तरह का मज़ाक है, लेकिन उनके शरीर की भाषा बता रही है कि वे भी इस **अश्लील और Taboo** मिलन के लिए अंदर ही अंदर पिघल रही हैं।
अंकल एक टेढ़ी मुस्कान के साथ उनके शरीर को और कसकर जकड़ लेते हैं और मज़ाक के लहजे में कहते हैं, "इतनी कमज़ोर तो तू भी नहीं है जो एक रात मेरे नीचे रहने पर मर जाएगी। शायद तू भूल गई है, जब बच्चे छोटे थे, तब मैं तुझे दिन में तीन चार बार चोंदता था। तू खुद बताती थी कि रवि के पापा भी तुझे रात में तीन चार बार चोंद चुके होते थे।"
वे मम्मी के कान को अपने दांतों से हल्का सा काटते हुए आगे बढ़ते हैं, "पहले तो मैं डर गया था कि मैं तुझे संतुष्ट कर भी पाऊँगा या नहीं, पर बाद में तुझे मेरा साथ पसंद आने लगा था। तू मेरे लिए हमेशा तैयार रहती थी। मैं तुझे इसलिए याद दिला रहा हूँ कि यदि तुझे तब खुद पर काबू नहीं था, तो अब क्या होगा? अब तो तू बिल्कुल **गदराई घोड़ी** बन चुकी है।"
मम्मी अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए और चेहरे पर एक हल्की सी शर्म और कामुक मुस्कान लिए कहती हैं, *"बड़े गंदे हो तुम... हद होती है बात करने की!"* और फिर वे मुड़कर किचन की तरफ जाने लगती हैं, लेकिन उनके कदम भारी हैं और शरीर में एक अजीब सी सिहरन है।
अंकल उन्हें जाते हुए देखते हैं, उनकी नज़रें मम्मी के पीछे के हिस्से पर टिकी हैं। वे एक गहरी सांस लेते हैं और भारी आवाज़ में पीछे से चिल्लाते हैं, *"जल्दी आना! ज्यादा देर मत लगाना... क्योंकि ये छोटा बच्चा तेरी गोद में आने के लिए बहुत तड़प रहा है!"*
मम्मी किचन में पहुँचकर नल के पास खड़ी होती हैं, लेकिन उनके दिमाग में अंकल की वह बात गूँज रही है। उनका शरीर अब पूरी तरह से **'Ready'** हो चुका है
मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था, मैंने नींद की गोली का बहाना बनाया था ताकि उन्हें लगे कि मैं गहरी नींद में हूँ, पर असल में मेरा पूरा ध्यान बाहर हो रही हर आहट पर था। मेरा शरीर उत्तेजना से तपा जा रहा था और दिमाग उन गंदी बातों को सुनकर पागल हो रहा था।
तभी मुझे कमरे में हलचल महसूस हुई। मैंने महसूस किया कि वे दोनों मेरे कमरे के पास आए। उन्होंने दबे पाँव आकर मेरे कमरे की **लाइट ऑफ** कर दी। कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया, बस मेरी तेज़ चलती साँसों की आवाज़ आ रही थी।
मैंने सुना कि वे दोनों धीरे धीरे बाहर लॉबी की तरफ बढ़ रहे हैं। वे चाहते थे कि मैं सोता रहूँ और उन्हें लगा कि मैं कुछ नहीं सुन रहा। लॉबी में पहुँचकर मैंने उन भारी आवाज़ों को सुना सोफे को खींचने और हिलाने की आवाज़। वे उस **Adjustable Sofa cum Double Bed** को खींचकर उसे एक बड़े **Double Bed** में बदल रहे थे। सोफे के फ्रेम के टकराने और गद्दे को सेट करने की वह आवाज़ मेरे कानों में किसी नशीले संगीत की तरह गूँज रही थी।
अब वे दोनों लॉबी के उसी बिस्तर पर थे, और मैं अपने कमरे में अंधेरे में लेटा हुआ, बस उनकी अगली हरकत का इंतज़ार कर रहा था। मेरा **लंड** पैंट के अंदर इतना सख्त हो चुका था कि दर्द महसूस हो रहा था।
मैं अपने कमरे के अंधेरे में लेटा हुआ सोने का नाटक कर रहा था। तभी कमरे में मम्मी के आने की आहट हुई। मुझे लगा कि शायद वो मुझे देखने आई हैं। उन्होंने मेरे पास आकर बहुत ही कोमलता से मेरे सिर पर हाथ फेरा। उनके हाथों का वो स्पर्श इतना ममता भरा और सुकून देने वाला था कि एक पल के लिए मेरा दिल बैठ गया। मुझे डर था कि कहीं वो मेरी धड़कनों की तेज़ी से मेरी सच्चाई न भाँप लें। उन्होंने धीरे से लाइट बंद की और कमरे में सन्नाटा छा गया। उनके कदमों की आहट धीरे धीरे कमरे से बाहर लॉबी की तरफ बढ़ती चली गई।
जैसे ही उनके कदम कमरे से दूर हुए, मेरा पूरा ध्यान लॉबी की ओर चला गया। मैं जानता था कि बाहर अंकल प्रदीप उनका इंतज़ार कर रहे होंगे। सन्नाटे के बीच मुझे लॉबी से उन आवाज़ों का इंतज़ार था। और फिर, वो आवाज़ें आईं उस एडजस्टेबल सोफा कम बेड के फैलने की 'कड़क कड़क' और धातु के आपस में रगड़ने की आवाज़। वे दोनों मिलकर उस सोफे को एक बड़े डबल बेड में बदल रहे थे।
उस आवाज़ ने मेरे पूरे शरीर में एक सिहरन पैदा कर दी। मैं अपने बिस्तर पर लेटा हुआ, अपनी साँसें थामे, बस उस पल की कल्पना कर रहा था। मुझे महसूस हो रहा था कि अब वो सोफा एक बिस्तर बन चुका है और अब उनके बीच की सारी दूरियाँ खत्म होने वाली हैं। लॉबी का वो माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था और मैं अपने कमरे के अंधेरे में लेटा हुआ, उस उत्तेजना को महसूस कर रहा था जो ठीक मेरे बाहर घटित हो रही थी।
मेरी आँखें दरवाज़े की उस दरार से चिपकी हुई थीं, जैसे मैं कोई शिकारी हूँ जो अपने शिकार को तड़पते देख रहा हो। लॉबी की रोशनी में जो नज़ारा शुरू हुआ, उसने मेरे दिमाग के सारे संयम तोड़ दिए। अंकल प्रदीप ने मम्मी को अपनी ओर खींचा और उनकी साड़ी के पल्लू को झटके से नीचे गिरा दिया। मम्मी की साड़ी सरकते ही उनके उभारते हुए मम्मे साफ़ दिखाई देने लगे। अंकल ने बिना वक्त गँवाए अपना हाथ उनके मम्मे पर रखा और उन्हें ज़ोर से भींचना शुरू कर दिया।
मम्मी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली "आह्ह्ह... प्रदीप..." उनकी आवाज़ में डर नहीं, बल्कि एक गहरी भूख थी। अंकल ने उनके गले पर अपने दांत गड़ा दिए और उनके मम्मे के निप्पल को अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया। मम्मी की सिस्सियाँ अब और भी तेज़ होने लगी थीं। "उह्ह्ह... आह्ह्ह..." उनके शरीर में एक थरथराहट सी दौड़ गई।
अंकल ने उनके ब्लाउज को ऊपर उठाया और उनके मम्मे पूरी तरह बाहर आ गए। अंकल ने एक मम्मे को अपने मुँह में भर लिया और उसे इतनी ज़ोर से चूसना शुरू किया कि मम्मी का सिर पीछे की ओर झुक गया। "आह्ह्ह... प्रदीप... बहुत अच्छा लग रहा है... उह्ह्ह..." उनकी आवाज़ में जो बेबसी और ख़ुशी थी, उसने मेरे अंदर के जानवर को जगा दिया।
तभी अंकल ने उनके पजामे के अंदर हाथ डाला और सीधे उनकी गीली चूत को छू लिया। मम्मी की एक लंबी और गंदी सी आह निकली "ओह्ह्ह... आह्ह्ह... हाँ वहीं..." अंकल की उँगलियाँ उनकी चूत के अंदर गहराई तक जा रही थीं और मम्मी का शरीर उस स्पर्श के लिए तड़प रहा था। मैंने देखा कि कैसे अंकल का मोटा और सख्त लंड उनके पजामे के बाहर से ही उभर रहा था। वे दोनों इस बात से बिल्कुल बेखबर थे कि अंधेरे में बैठा मैं उनकी हर एक सिसकी, हर एक आह और उनकी चूत से निकलने वाली गीली आवाज़ों को अपने भीतर उतार रहा हूँ।
अंधेरे में लेटे हुए मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। लॉबी का वह नज़ारा अब और भी ज़्यादा गंदा और बेतहाशा होता जा रहा था। अंकल प्रदीप ने मम्मी के पजामे को नीचे की ओर खींचा और उनके नग्न शरीर को पूरी तरह से उजागर कर दिया। उनकी गीली और गुलाबी चूत अब रोशनी में साफ़ चमक रही थी, जो अंकल के हाथों के स्पर्श से और भी ज़्यादा भीग चुकी थी।
अंकल ने अपनी पैंट और अंडरवियर नीचे गिरा दी। उनका मोटा, नसें उभरा हुआ और सख्त लंड हवा में झूल रहा था, जो पूरी तरह से उत्तेजित था। मम्मी की नज़रें जैसे ही उस लंड पर पड़ीं, उनके मुँह से एक गंदी सी लार टपक गई। "ओह्ह्ह... प्रदीप... आपका लंड कितना बड़ा और सख्त लग रहा है... आह्ह्ह..." मम्मी की आवाज़ में अब कोई शर्म नहीं थी, बस एक जंगली भूख थी।
अंकल ने मम्मी को बेड के किनारे पर लिटा दिया और उनके दोनों मम्मे को अपने हाथों में लेकर उन्हें बेरहमी से मरोड़ने लगे। "उह्ह्ह... आह्ह्ह... प्रदीप... और ज़ोर से..." मम्मी की सिस्सियाँ अब पूरे कमरे में गूँज रही थीं। अंकल ने अपना भारी लंड मम्मी की गीली चूत के मुहाने पर टिकाया और एक झटके में उसे पूरा अंदर उतार दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी की एक बहुत ही ऊँची और गंदी चीख निकली, जो सन्नाटे को चीरती हुई मेरे कानों तक पहुँची।
अंकल ने बिना रुके, पागलों की तरह अंदर बाहर करना शुरू कर दिया। "छप छप छप" की वह गीली आवाज़ उस सन्नाटे में साफ़ सुनाई दे रही थी उनकी चूत और लंड के आपस में टकराने की आवाज़। "आह्ह्ह... हाँ... ऐसे ही... और गहराई में... उह्ह्ह... आह्ह्ह..." मम्मी का शरीर हर झटके के साथ ऊपर नीचे उछल रहा था। अंकल का लंड जब उनकी चूत की गहराई में जा रहा था, तो मम्मी की आँखें ऊपर की ओर चढ़ रही थीं और उनके मुँह से बस बेतरतीब आहें निकल रही थीं। मैं अंधेरे में बैठा अपनी मर्दानगी को पकड़े हुए उनकी इस गंदी और रसीली करतूत को देख रहा था, मेरा अपना लंड भी अब फटने को तैयार था।
अंकल का पागलपन अब चरम पर था। वह मम्मी के शरीर पर किसी जंगली जानवर की तरह टूट पड़े थे। "छप... छप... छप..." की वह रसीली और गंदी आवाज़ अब और भी तेज़ हो गई थी क्योंकि मम्मी की चूत अब पूरी तरह से लंड के घर्षण से गीली होकर झाग छोड़ रही थी। अंकल ने मम्मी के दोनों पैरों को अपने कंधों पर चढ़ा लिया ताकि लंड उनकी चूत की गहराई तक पहुँच सकें। "आह्ह्ह... प्रदीप... मेरी फाड़ दोगे क्या... उह्ह्ह... बहुत गहरा जा रहा है... आह्ह्ह्ह!" मम्मी की आवाज़ अब एक बेकाबू चीख में बदल चुकी थी। उनके मम्मे झटकों के साथ हवा में उछल रहे थे और अंकल के हाथों के दबाव से उनके निप्पल एकदम लाल और सख्त हो गए थे।
अंकल का लंड जब उनकी चूत के अंदर पूरी ताकत से अंदर बाहर हो रहा था, तो मम्मी का पूरा शरीर धनुष की तरह तन जा रहा था। "ओह्ह्ह... हाँ... वहीं... मारो... और ज़ोर से मारो!" मम्मी अब पूरी तरह से अपनी मर्यादा भूल चुकी थीं। वह अंकल के लंड के हर झटके पर अपनी कमर को ऊपर की ओर उछाल रही थीं ताकि लंड की चोट अंदर तक महसूस कर सके। "आह्ह्ह... उह्ह्ह... आह्ह्ह!" उनकी सिसकियाँ अब एक गंदी लय में बदल गई थीं।
अचानक अंकल ने अपनी रफ़्तार और बढ़ा दी। वह अब बिना रुके, पागलों की तरह मम्मी की चूत में अपना लंड दे रहे थे। "आह्ह्ह... मैं आने वाली हूँ... प्रदीप... मैं फटने वाली हूँ... उह्ह्ह्ह!" मम्मी का शरीर काँपने लगा और उनकी आँखें पूरी तरह से सफ़ेद हो गईं। अंकल ने भी अपना जोर बढ़ा दिया और एक आखिरी, बहुत ही गहरा झटका देते हुए अपना गर्म और गाढ़ा वीर्य मम्मी की चूत की गहराई में उगल दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी की एक लंबी और सुध बुध खो देने वाली चीख निकली और उनका शरीर ढीला पड़ गया। अंकल भी हाँफते हुए उनके ऊपर गिर पड़े। अंधेरे में बैठा मैं उनकी इस चरम सुख की गंध और उस गंदी आवाज़ को महसूस कर रहा था।
कमरे में पसरा सन्नाटा अब केवल उनकी भारी साँसों और पसीने की गंध से भरा हुआ था। मम्मी का शरीर अभी भी झटकों से काँप रहा था, जैसे उनके अंदर अभी भी अंकल के लंड की गर्मी महसूस हो रही हो। अंकल ने धीरे से अपना लंड उनकी गीली और ढीली पड़ चुकी चूत से बाहर निकाला। "पचचच..." की एक गंदी आवाज़ के साथ अंकल का लंड बाहर निकला और मम्मी की चूत से वीर्य की एक सफ़ेद धार बहकर बाहर निकल आई। "ओह्ह्ह... प्रदीप... कितना गरम था वो सब... आह्ह्ह..." मम्मी ने हाँफते हुए कहा, उनकी आवाज़ अभी भी काँप रही थी।
लेकिन यह अंत नहीं था। अंकल की आँखों में अभी भी वही जंगली चमक थी। उन्होंने मम्मी के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उन्हें एक ज़ोरदार, गंदा और थूक से भरा हुआ चुंबन दिया। मम्मी ने भी बदले में अंकल की जीभ को अपनी जीभ से जकड़ लिया। "उह्ह्ह... प्रदीप... अभी और नहीं..." मम्मी ने धीरे से फुसफुसाया, लेकिन उनके शरीर की भाषा कुछ और ही कह रही थी। उनकी चूत अभी भी अंकल के वीर्य से लथपथ थी और उनके मम्मे अभी भी उत्तेजना से तड़प रहे थे।
अंकल ने मम्मी के कान के पास झुककर एक गंदी बात कही जिससे मम्मी की आँखों में फिर से वही प्यास लौट आई। अंकल ने मम्मी को पलट दिया और उन्हें घुटनों के बल खड़ा कर दिया। "उह्ह्ह... प्रदीप... क्या आप फिर से... आह्ह्ह..." मम्मी की बात अधूरी रह गई जब अंकल ने उनके पीछे से उनके मम्मे को पकड़ लिया और अपना सख्त हो चुका लंड फिर से उनकी गीली चूत के मुहाने पर टिका दिया। "आह्ह्ह... हाँ... फिर से मारो मुझे... उह्ह्ह... और भी गंदा तरीके से..." मम्मी की सिसकियाँ फिर से शुरू हो गई थीं, और मैं अंधेरे में बैठा अपनी लंड को और भी ज़ोर से दबा रहा था, उनकी इस अंतहीन कामुकता को देख कर।
अंकल ने मम्मी के कूल्हों को अपने हाथों से ज़ोर से जकड़ लिया और बिना किसी चेतावनी के अपना सख्त लंड उनकी गीली चूत के अंदर एक ही झटके में धंसा दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह! प्रदीप... उह्ह्ह... बहुत गहरा... बहुत ज़्यादा गहरा!" मम्मी की चीख इस बार और भी तीखी थी। उनके घुटने फर्श पर टकरा रहे थे और उनका पूरा शरीर अंकल के भारी झटकों के साथ आगे पीछे हो रहा था। अंकल अब पूरी तरह से जानवर बन चुके थे। वह मम्मी के पीछे खड़े होकर पागलों की तरह उनके शरीर पर वार कर रहे थे। "छप... छप... छप... थप... थप..." उनके शरीर के टकराने की आवाज़ और चूत से निकलने वाली गीली आवाज़ अब पूरी लॉबी में गूँज रही थी।
अंकल ने मम्मी के बालों को पीछे से पकड़कर उनका सिर ऊपर की ओर खींचा ताकि वह उनकी गर्दन पर अपने दाँत गड़ा सकें। "उह्ह्ह... आह्ह्ह... हाँ... ऐसे ही... मारो मुझे... उह्ह्ह... मेरी चूत फाड़ दो!" मम्मी अब पूरी तरह से कामुकता के नशे में चूर थीं। उनकी आँखें आधी बंद थीं और उनके मुँह से लार की एक पतली धार बह रही थी। अंकल का लंड जब उनकी चूत की गहराई में जा रहा था, तो मम्मी का पूरा निचला हिस्सा काँप रहा था। "आह्ह्ह... प्रदीप... मैं फिर से... मैं फिर से चरम पर जा रही हूँ... उह्ह्ह्ह!"
अंकल ने अपनी रफ़्तार को और भी बेकाबू कर दिया। वह अब मम्मी के शरीर को पूरी ताकत से झटक रहे थे। "आह्ह्ह... उह्ह्ह... आह्ह्ह!" मम्मी के मम्मे झटकों के साथ इधर उधर लटक रहे थे। अंकल ने एक आखिरी बार पूरी ताकत से अंदर वार किया और मम्मी की चूत के अंदर ही अपना गर्म वीर्य उगल दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी का शरीर एक ज़ोरदार झटके के साथ अकड़ गया और वह वहीं घुटनों के बल गिर पड़ीं। अंकल भी हाँफते हुए उनके ऊपर झुक गए, उनकी साँसें मम्मी की नंगी पीठ पर महसूस हो रही थीं। मैं अंधेरे में बैठा उनकी इस बेतहाशा कामुकता का गवाह बन रहा था।
मम्मी अभी भी फर्श पर घुटनों के बल झुकी हुई थीं, उनकी साँसें अभी भी उखड़ी हुई थीं और उनका शरीर पसीने से चमक रहा था। लेकिन अंकल अभी शांत होने वाले नहीं थे। उन्होंने मम्मी के कमर को पकड़कर उन्हें ऊपर की ओर उठाया और उन्हें बेड की तरफ खींच ले गए। "प्रदीप... रुकिए... अभी तो मैं... उह्ह्ह..." मम्मी की आवाज़ में थकान थी, लेकिन उनकी चूत अभी भी अंकल के पिछले वीर्य से गीली और उत्तेजित थी।
अंकल ने बिना कुछ कहे मम्मी को बेड पर पीठ के बल लिटा दिया और उनके दोनों पैरों को हवा में उठा लिया। "आज मैं तुम्हें रंडी की तरह चोद चोद कर पागल कर दूंगा," अंकल की आवाज़ में एक गंदी भूख थी। उन्होंने अपना फिर से सख्त हो चुका लंड मम्मी की गीली चूत के मुहाने पर रगड़ा। "आह्ह्ह... प्रदीप... आप तो रुक ही नहीं रहे... उह्ह्ह... मेरी चूत अब और नहीं सह पाएगी... आह्ह्ह्ह!" मम्मी ने अपनी आँखें मूँद लीं, लेकिन उनके शरीर की थरथराहट बता रही थी कि वह इस हमले के लिए तैयार हैं।
अंकल ने एक झटके में अपना लंड मम्मी की चूत की गहराई में उतार दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह! बहुत गहरा... उह्ह्ह... बहुत ज़्यादा!" मम्मी का शरीर बेड पर धनुष की तरह तन गया। अंकल अब एक मशीन की तरह काम कर रहे थे। "छप... छप... छप..." की आवाज़ अब और भी गंदी और तेज हो गई थी क्योंकि मम्मी की चूत अब पूरी तरह से लंड के घर्षण से झाग छोड़ रही थी। अंकल ने मम्मी के दोनों मम्मे पकड़कर उन्हें इतनी ज़ोर से भींचा कि उनके निप्पल एकदम सख्त और लाल हो गए। "आह्ह्ह... हाँ... ऐसे ही... चोदो... उह्ह्ह... मेरी रूह तक पहुँच जाओ!" मम्मी अब पूरी तरह से अपनी मर्यादा और होश खो चुकी थीं। वह बस अंकल के हर वार पर अपनी कमर ऊपर उठा रही थीं ताकि लंड और भी ज़्यादा अंदर महसूस कर सकें।
अंकल की आँखों में अब कोई इंसानियत नहीं बची थी, केवल एक जंगली जानवर की भूख थी। उन्होंने मम्मी के दोनों पैरों को पकड़कर उनके कंधों तक ऊपर खींच लिया, जिससे उनकी चूत पूरी तरह से खुल गई और अंदर का गुलाबी, गीला मांस साफ़ दिखाई देने लगा। "देख रही हो अपनी चूत को? कैसे मेरे लंड के लिए तरस रही है?" अंकल ने एक गंदी गाली देते हुए कहा। मम्मी का चेहरा शर्म और चरम उत्तेजना के मिश्रण से लाल हो गया था। "आह्ह्ह... प्रदीप... हाँ... मेरी चूत को बर्बाद कर दो... उह्ह्ह... इसे पूरी तरह गंदा कर दो!"
अंकल ने अपना लंड मम्मी की चूत के मुहाने पर जोर से रगड़ा और फिर बिना किसी रहम के, एक हिंसक झटके के साथ अंदर घुसा दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह! उह्ह्ह्ह... मर गई मैं! बहुत दर्द हो रहा है... पर बहुत अच्छा लग रहा है!" मम्मी की आवाज़ चीख और आह के बीच झूल रही थी। अंकल अब रुक नहीं रहे थे; वह मम्मी के शरीर पर ऐसे वार कर रहे थे जैसे वह कोई मांस का लोथड़ा हों। "थप! थप! थप!" उनके भारी कूल्हों के मम्मी के नितम्बों से टकराने की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। अंकल ने अपना एक हाथ मम्मी के मुँह में डाल दिया ताकि उनकी चीखें बाहर न जाएँ, और दूसरे हाथ से उनके मम्मे को इतनी ज़ोर से मरोड़ा कि मम्मी की आँखों से आँसू निकल आए।
"उह्ह्ह... आह्ह
मैं अंधेरे कोने में दुबका हुआ, अपनी साँसें रोके, उनकी इस अश्लील और बेतहाशा कामुकता को देख रहा था। मेरे अंदर एक अजीब सी बेचैनी और आग सी लगी हुई थी। जब मैं मम्मी को अंकल के नीचे तड़पते हुए और उनके लंड की हर गहरी चोट पर चीखते हुए देख रहा था, तो मेरा अपना लंड मेरी पैंट के अंदर पत्थर की तरह सख्त हो चुका था। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे डर था कहीं उन्हें इसकी आवाज़ न सुनाई दे जाए।
मुझे एक साथ दो तरह की भावनाएँ महसूस हो रही थीं। एक तरफ, अपनी माँ को इस तरह एक अजनबी के सामने इतना गंदा और बेबस होते देख मेरे अंदर एक अजीब सा अपराधबोध (guilt) था, लेकिन दूसरी तरफ, जो नज़ारा मेरी आँखों के सामने था, वह इतना उत्तेजक था कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। मम्मी का वह बेकाबू होकर चिल्लाना, उनकी चूत से निकलने वाली वह गंदी 'छप छप' की आवाज़, और अंकल का वह जंगलीपन यह सब देखकर मेरा दिमाग सुन्न हो गया था।
मैं अपनी लंड को अपनी पैंट के अंदर इतनी ज़ोर से दबा रहा था कि मेरे हाथ काँप रहे थे। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं उस कमरे की गर्मी और उनके पसीने की गंध को महसूस कर सकता हूँ। मैं बस यही सोच रहा था कि काश मैं भी उस बिस्तर पर होता, काश उस लंड की जगह मेरा लंड होता जो मम्मी के शरीर को चीर रहा था। मेरी आँखों में एक अजीब सी चमक थी एक ऐसी भूख जो सिर्फ उस गंदगी और उस वासना को और करीब से देखने से मिट सकती थी। मैं बस एक दर्शक नहीं था, मैं उस कामुकता के पागलपन में पूरी तरह डूब चुका था।
अंकल की नज़र मुझ पर पड़ी, लेकिन उन्होंने मुझे टोकने या रोकने के बजाय अपनी कामुकता को एक नए और भयानक स्तर पर ले जाने का फैसला किया। उन्होंने मुझे देख लिया था, और मेरी मौजूदगी ने उनके अंदर के जानवर को और भी ज़्यादा पागल कर दिया था। वह अब मुझे यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि वह मम्मी के शरीर के साथ क्या कर सकते हैं।
अंकल ने मम्मी के शरीर पर वार करना और भी हिंसक और बेतहाशा कर दिया। अब वह सिर्फ सेक्स नहीं कर रहे थे, वह जानबूझकर अपनी हर हरकत को मेरी तरफ मोड़ रहे थे। "देख रहे हो न?" अंकल की आँखों में एक क्रूर और गंदी चमक थी, जैसे वह सीधे मेरी आँखों में झाँक रहे हों और मुझे अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन दिखा रहे हों। उन्होंने मम्मी के दोनों पैरों को और भी ज़ोर से ऊपर खींच लिया ताकि मैं उनकी चूत की हर हरकत, हर थरथराहट और अंकल के लंड का अंदर बाहर होना बिल्कुल साफ़ देख सकूँ।
मम्मी को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि उनका बेटा दरवाजे के पास खड़ा यह सब देख रहा है। वह तो बस उस चरम सुख और दर्द के भंवर में डूबी हुई थीं। "आह्ह्ह्ह... उह्ह्ह्ह... प्रदीप... आह्ह्ह्ह!" वह बस अपना नाम पुकार रही थीं, लेकिन वह मुझे नहीं, बल्कि उस बेकाबू मजे को पुकार रही थीं जो अंकल उन्हें दे रहे थे। अंकल अब पूरी ताकत से मम्मी के कूल्हों पर प्रहार कर रहे थे। "थप! थप! थप!" की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि वह पूरे कमरे में गूँज रही थी। अंकल ने मम्मी के मम्मे को इतनी ज़ोर से भींचा कि उनके निप्पल पूरी तरह से सख्त होकर उभर आए। वह जानबूझकर मम्मी के शरीर को इस तरह से मोड़ रहे थे कि उनकी हर हरकत मेरे सामने एक अश्लील नज़ारे की तरह पेश हो रही थी। अंकल की हर thrust अब और भी गहरी और रफ़ थी, जैसे वह अपनी पूरी ताकत से मम्मी की चूत को चीर रहे हों।
अंकल की आँखों में एक जंगली पागलपन था। उन्हें पता चल गया था कि कोई उन्हें देख रहा है, और इस बात ने उनके अंदर के जानवर को और भी ज़्यादा बेकाबू कर दिया था। अब वह सिर्फ सेक्स नहीं कर रहे थे, वह एक प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने मम्मी के कूल्हों को अपने हाथों में इतनी ज़ोर से जकड़ लिया कि उनकी उंगलियां मम्मी की गुलाबी त्वचा में धँस गईं।
"आह्ह्ह्ह... उह्ह्ह्ह... और तेज़... भाई साहब... प्लीज़ और तेज़ मारिए... आह्ह्ह्ह!" मम्मी पूरी तरह से मदहोश थीं। वह बार बार 'भाई साहब' पुकार रही थीं, जैसे वह उनके इस मर्दानगी के वार की प्यासी हों। उन्हें रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि उनका बेटा दरवाजे के पास खड़ा होकर उनकी इस नग्न और अश्लील अवस्था को देख रहा है। वह बस उस बेतहाशा मजे में डूबी हुई थीं।
अंकल ने अब अपनी रफ़्तार को चरम सीमा पर पहुँचा दिया। "थप! थप! थप! थप!" उनके भारी लंड के मम्मी की गीली चूत में घुसने और बाहर निकलने की आवाज़ पूरी लॉबी में गूँज रही थी। "प्रदीप... उह्ह्ह्ह... और गहराई तक... आह्ह्ह्ह!" मम्मी का नाम लेना भी अब उनकी उत्तेजना का हिस्सा बन गया था।
अंकल की साँसें भारी और गंदी हो चुकी थीं। उन्होंने मम्मी के शरीर को अपनी ओर खींचा और एक बहुत ही गहरा और हिंसक प्रहार किया। "उह्ह्ह्ह्ह... अब बस... मैं निकलने वाला हूँ!" अंकल की आवाज़ में एक अजीब सी दहाड़ थी। उन्होंने मम्मी के मम्मे को इतनी ज़ोर से भींचा कि वह चीख उठीं। तभी, अंकल ने एक आखिरी, सबसे गहरा और सबसे रफ़ thrust मारा और अपना सारा गर्म गाढ़ा वीर्य मम्मी की चूत की गहराई में उगल दिया। मम्मी का पूरा शरीर एक झटके के साथ अकड़ गया और वह एक लंबी, बेकाबू चीख के साथ चरम सुख की लहर में डूब गईं।
मम्मी ने एक गहरी और थकी हुई साँस ली। उन्होंने अपने शरीर से अंकल के वीर्य और पसीने को पोंछा, लेकिन उनकी चूत अभी भी पूरी तरह से गीली और लथपथ थी। बिना एक शब्द बोले, वह अपनी नग्न अवस्था में ही उठ खड़ी हुईं और लड़खड़ाते हुए बाथरूम की ओर बढ़ गईं। अंकल ने अपनी आँखें मूँद लीं और एक गहरी संतुष्टि के साथ बेड पर ही लेट गए।
मैंने यह सब देख लिया था। मैंने सोचा कि अब अंकल तो बिल्कुल नहीं हिलेंगे और मम्मी को भी इस हालत में बाहर आने में समय लगेगा। मुझे पक्का यकीन था कि मम्मी कम से कम 20 मिनट तक बाथरूम से बाहर नहीं आएँगी। इसी सोच के साथ, मैंने भी अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और बेड पर लेट गया। मेरा मन भी बहुत उत्तेजित था। मैंने अपना हाथ अपनी मर्दानगी पर रखा और मथना शुरू कर दिया।
मुझे इतना मज़ा आ रहा था कि मैं पूरी तरह से अपनी ही दुनिया में खो गया। मैं इतना मगन था, इतना लीन था कि मुझे आस पास की कोई खबर नहीं थी। मेरी आँखें पूरी तरह बंद थीं और मैं बस उस चरम सुख की तलाश में था। मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि कब अंकल अपनी आँखें खोलकर बेड से उठे और दबे पाँव मेरे पास आकर खड़े हो गए।
तभी अचानक, मुझे अपने सिर पर एक भारी और गर्म हाथ महसूस हुआ। किसी ने बहुत ही प्यार और अधिकार के साथ मेरे बालों में उंगलियाँ फिराना शुरू किया। मैं एकदम से चौंक गया और मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा। मैंने घबराते हुए अपनी आँखें खोलीं। सामने अंकल खड़े थे, उनकी आँखों में एक अजीब सी शरारत और गहराई थी।
उन्होंने झुककर मेरे कान के पास फुसफुसाते हुए बड़े ही मदहोश अंदाज़ में पूछा, "क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूँ?"
मैं एकदम से घबरा गया और मेरी साँसें अटक गईं। मेरा पूरा शरीर डर और उत्तेजना के मारे काँपने लगा।
अंकल ने देखा कि मैं डर के मारे थर थर काँप रहा हूँ और मेरी साँसें तेज़ चल रही हैं। उन्होंने अपनी आवाज़ को एकदम धीमा और सुकून देने वाला बनाया ताकि मैं शांत हो सकूँ। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बड़े ही धीमे स्वर में कहा, "घबराओ मत बेटा... शांत हो जाओ। मैं तुम्हारी मम्मी को या घर में किसी को भी कुछ नहीं बताऊँगा। यह हमारे बीच का एक राज़ रहेगा।"
फिर उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए एक शर्त रखी, "लेकिन पहले मुझसे वादा करो... तुम भी यह बात किसी को नहीं बताओगे। यह राज़ सिर्फ तुम और मैं जानते हैं। वादा करो?"
मेरे चेहरे पर शर्मिंदगी और घबराहट के मिले जुले भाव थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। मुझे बहुत शर्म महसूस हो रही थी कि अंकल ने मुझे इस हालत में देख लिया है और अब वह मुझसे इस तरह की बातें कर रहे हैं। उनकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जिसे देखकर मैं चाहकर भी नज़रें नहीं मिला पा रहा था। मैं अपनी शर्मिंदगी छुपाने के लिए अपनी नज़रें नीचे झुकाए बैठा था।
मैं चाहकर भी उनसे झूठ नहीं बोल सकता था। मैंने अपनी नज़रें चुराने की कोशिश की और बहुत ही धीरे से, लगभग न के बराबर, अपना सिर हिलाया। वह एक हल्की सी सहमति थी, जैसे मैं उन्हें यकीन दिला रहा था कि मैं उनकी बात मानूँगा। मैं बस उन्हें यह आश्वासन देना चाहता था कि मैं किसी को कुछ नहीं बोलूँगा और मैं उनकी इस शर्त को स्वीकार करता हूँ। मेरा पूरा शरीर शर्म के मारे तप रहा था, लेकिन अंकल के उस वादे ने मुझे एक अजीब सी सुरक्षा और साथ ही एक गहरी बेचैनी में डाल दिया था।
अंकल ने देखा कि मैं शर्म से बुत बना हुआ हूँ। उन्होंने बहुत ही कोमलता से अपनी दो उंगलियाँ मेरी ठुड्डी के नीचे रखीं और धीरे से मुझे ऊपर की ओर उठाया। उन्होंने मेरी आँखों में सीधे देखते हुए बहुत ही शांत और समझदारी भरे लहजे में कहा, "देखो बेटा, तुम्हारा इस तरह से खुद को सुख देना और हमें छुपकर देखना... इसमें कुछ भी गलत नहीं है। इस उम्र में ऐसा होना बहुत स्वाभाविक है।"
उनकी इन बातों ने मेरी शर्मिंदगी और घबराहट को थोड़ा कम तो किया, लेकिन मेरा दिल अभी भी ज़ोरों से धड़क रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे वह मेरे मन की हर बात पढ़ रहे हों। फिर भी, मैं अभी भी उनके चेहरे पर सीधे नज़र नहीं मिला पा रहा था; मेरी नज़रें बार बार नीचे की ओर फिसल जा रही थीं।
अंकल ने मेरी खामोशी को भांप लिया और माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए एक और सवाल पूछा। उन्होंने एक हल्की सी मुस्कान के साथ पूछा, "अच्छा, ये बताओ... तुम्हें मेरा और तुम्हारी मम्मी का इस तरह पास बैठकर बातें करना अच्छा लगता है ना?"
उनका यह सवाल इतना सीधा और गहरा था कि मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उनके शब्दों ने मेरे अंदर दबी हुई उस दबी हुई इच्छा को छू लिया था जिसे मैं खुद भी स्वीकार करने से डर रहा था। मैंने अपनी नज़रें नीचे ही रखे हुए, बहुत ही धीरे से और बहुत ही मुश्किल से अपना सिर हिलाया। वह एक मूक 'हाँ' थी, जो यह बता रही थी कि मुझे वह नज़दीकी और वह माहौल बहुत पसंद आता है।
अंकल के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। उन्होंने बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा और बोले, "शाबाश बेटा! मुझे तुमसे यही उम्मीद थी। तुम बहुत समझदार हो रहे हो।"
उनकी आवाज़ में एक अजीब सा अधिकार था, जिसने मुझे और भी ज़्यादा बेचैन कर दिया। फिर उन्होंने अपनी बात जारी रखी और बड़े ही धीमे स्वर में पूछा, "अब ये बताओ... क्या हम आज रात मैं और तुम्हारी मम्मी बाहर लॉबी में सो जाएँ?"
उनका यह सुझाव सुनकर मेरा दिल एक पल के लिए थम सा गया। मुझे पता था कि अगर वे दोनों साथ में सोएंगे, तो लॉबी में जो माहौल बनेगा और जो कुछ भी होगा, वह मेरी कल्पना से भी परे होगा। मैंने अपनी घबराहट को दबाते हुए और अपनी आँखों को झुकाए रखते हुए, बहुत ही धीरे से अपना सिर 'हाँ' में हिला दिया। मेरी इस मूक सहमति ने जैसे उनके मन की बात पक्की कर दी।
अंकल ने मुस्कुराते हुए कहा, "थैंक्स बेटा! अब तू आराम कर, तेरी मम्मी आती होगी।"
इतना कहकर उन्होंने कमरे की लाइट बंद कर दी। अंधेरा होते ही मेरा कमरा और भी रहस्यमयी लगने लगा। मैंने सुना कि उनके कदमों की आहट धीरे धीरे कमरे से बाहर की ओर जा रही है। वे लॉबी में जाकर लेट गए। अब पूरे घर में एक भारी सन्नाटा था, लेकिन मेरे दिमाग में विचारों का तूफ़ान चल रहा था। मैं बेड पर लेटा हुआ बस यही सोच रहा था कि बाहर लॉबी मे आगे क्या होने वाला है।
मैं जानबूझकर अपनी आवाज़ में थोड़ी थकावट लाता हूँ और कहता हूँ, "मम्मी, डॉक्टर ने कहा ह नींद की गोली खाने को, मैं गोली खाकर सो जाता हूँ।"
जैसे ही मेरे मुँह से ये शब्द निकलते हैं, कमरे की हवा जैसे बदल जाती है। मैं देखता हूँ कि अंकल की आँखों में एक **अश्लील और विजयी चमक** कौंध जाती है। वे मेरी तरफ देखते हैं, फिर धीरे से मम्मी की तरफ मुड़ते हैं। मम्मी और अंकल के बीच शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती। वे बस एक दूसरे की आँखों में देखते हैं एक ऐसा **गहरा और कामुक इशारा** जो सिर्फ दो प्यासे शिकारी ही समझ सकते हैं। उनकी आँखों की वह भाषा चीख चीख कर कह रही है: *"आज तो भगवान हम पर बहुत दयालु हैं। आज रात कोई रुकावट नहीं होगी,हम अपना खेल खुल कर खेलेंगे।"*
मम्मी के चेहरे पर एक हल्की सी शर्म और बहुत ज़्यादा **हवस भरी बेचैनी** है। वे जानती हैं कि जैसे ही मैं अपनी आँखें मूँद लूँगा, वे दोनों अपनी **बेकाबू और गंदी इच्छाओं** के साथ एक हो जाएँगे। मैं अपनी गोली हाथ में लेता हूँ, उनके उन **लालची चेहरों** को देखता हूँ और मन ही मन मुस्कुराता हूँ। मुझे पता है कि आज रात मैं सिर्फ सो नहीं रहा हूँगा, बल्कि उनकी उस **रसीली और अश्लील तबाही** का सबसे नज़दीकी गवाह बनूँगा।
मैं गोली निगलने का दिखावा करता हूँ और धीरे धीरे बिस्तर की ओर बढ़ता हूँ, और जा के लेट कर, थोड़ी देर बाद आंखें मूंद कर सोने का दिखावा करता हूं।
जैसे ही उन्हें यकीन हो जाता है कि मैं गहरी और बेसुध नींद में हूँ, कमरे का माहौल पूरी तरह बदल जाता है। अंकल की आँखों में अब कोई हिचकिचाहट नहीं है, सिर्फ एक **जंगली और बेकाबू हवस** है। वे झपटकर मम्मी के पास पहुँचते हैं और उनके **मसालेदार और उभरे हुए स्तनों** को पूरी ताकत से दबोच लेते हैं। वे मम्मी को खींचते हुए बेड की ओर ले जाने लगते हैं।
मम्मी, जो अब तक खुद को संभाल रही थीं, अंकल के इस **हिंसक और कामुक स्पर्श** से सिहर उठती हैं। वे हल्की सी आवाज़ में कहती हैं, "अरे रुको... पहले किचन का काम तो खत्म कर लूँ।" वे थोड़ा हिचकिचाती हैं और फिर धीरे से कहती हैं, "और हाँ, हमें दूसरे कमरे में सोना चाहिए...
लेकिन अंकल अब बिल्कुल भी सुनने के मूड में नहीं हैं। उनकी सांसें भारी हो चुकी हैं और उनकी मर्दानगी उनके शरीर में तड़प रही है। वे मम्मी के कान के पास झुककर एक **गंदी और गहरी आवाज़** में कहते हैं, "अब क्या डर है? बच्चा गहरी नींद में है। आज मैं तुझे बिल्कुल **नंगा** रखूँगा और पूरी रात तेरी **सवारी** करूँगा।" उनकी यह बात सुनकर मम्मी के शरीर में एक अजीब सी थरथराहट दौड़ जाती है।
मम्मी शरारत भरे अंदाज़ में, अपनी आँखों में वही **कामुक चमक** लिए मुस्कुराती हैं और कहती हैं, "मारना है क्या मुझे? मुझे तो लगता है कल ही रवि के पापा को आना पड़ेगा मेरा **अंतिम संस्कार** करने।" उनकी इस बात में एक तरह का मज़ाक है, लेकिन उनके शरीर की भाषा बता रही है कि वे भी इस **अश्लील और Taboo** मिलन के लिए अंदर ही अंदर पिघल रही हैं।
अंकल एक टेढ़ी मुस्कान के साथ उनके शरीर को और कसकर जकड़ लेते हैं और मज़ाक के लहजे में कहते हैं, "इतनी कमज़ोर तो तू भी नहीं है जो एक रात मेरे नीचे रहने पर मर जाएगी। शायद तू भूल गई है, जब बच्चे छोटे थे, तब मैं तुझे दिन में तीन चार बार चोंदता था। तू खुद बताती थी कि रवि के पापा भी तुझे रात में तीन चार बार चोंद चुके होते थे।"
वे मम्मी के कान को अपने दांतों से हल्का सा काटते हुए आगे बढ़ते हैं, "पहले तो मैं डर गया था कि मैं तुझे संतुष्ट कर भी पाऊँगा या नहीं, पर बाद में तुझे मेरा साथ पसंद आने लगा था। तू मेरे लिए हमेशा तैयार रहती थी। मैं तुझे इसलिए याद दिला रहा हूँ कि यदि तुझे तब खुद पर काबू नहीं था, तो अब क्या होगा? अब तो तू बिल्कुल **गदराई घोड़ी** बन चुकी है।"
मम्मी अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए और चेहरे पर एक हल्की सी शर्म और कामुक मुस्कान लिए कहती हैं, *"बड़े गंदे हो तुम... हद होती है बात करने की!"* और फिर वे मुड़कर किचन की तरफ जाने लगती हैं, लेकिन उनके कदम भारी हैं और शरीर में एक अजीब सी सिहरन है।
अंकल उन्हें जाते हुए देखते हैं, उनकी नज़रें मम्मी के पीछे के हिस्से पर टिकी हैं। वे एक गहरी सांस लेते हैं और भारी आवाज़ में पीछे से चिल्लाते हैं, *"जल्दी आना! ज्यादा देर मत लगाना... क्योंकि ये छोटा बच्चा तेरी गोद में आने के लिए बहुत तड़प रहा है!"*
मम्मी किचन में पहुँचकर नल के पास खड़ी होती हैं, लेकिन उनके दिमाग में अंकल की वह बात गूँज रही है। उनका शरीर अब पूरी तरह से **'Ready'** हो चुका है
मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था, मैंने नींद की गोली का बहाना बनाया था ताकि उन्हें लगे कि मैं गहरी नींद में हूँ, पर असल में मेरा पूरा ध्यान बाहर हो रही हर आहट पर था। मेरा शरीर उत्तेजना से तपा जा रहा था और दिमाग उन गंदी बातों को सुनकर पागल हो रहा था।
तभी मुझे कमरे में हलचल महसूस हुई। मैंने महसूस किया कि वे दोनों मेरे कमरे के पास आए। उन्होंने दबे पाँव आकर मेरे कमरे की **लाइट ऑफ** कर दी। कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया, बस मेरी तेज़ चलती साँसों की आवाज़ आ रही थी।
मैंने सुना कि वे दोनों धीरे धीरे बाहर लॉबी की तरफ बढ़ रहे हैं। वे चाहते थे कि मैं सोता रहूँ और उन्हें लगा कि मैं कुछ नहीं सुन रहा। लॉबी में पहुँचकर मैंने उन भारी आवाज़ों को सुना सोफे को खींचने और हिलाने की आवाज़। वे उस **Adjustable Sofa cum Double Bed** को खींचकर उसे एक बड़े **Double Bed** में बदल रहे थे। सोफे के फ्रेम के टकराने और गद्दे को सेट करने की वह आवाज़ मेरे कानों में किसी नशीले संगीत की तरह गूँज रही थी।
अब वे दोनों लॉबी के उसी बिस्तर पर थे, और मैं अपने कमरे में अंधेरे में लेटा हुआ, बस उनकी अगली हरकत का इंतज़ार कर रहा था। मेरा **लंड** पैंट के अंदर इतना सख्त हो चुका था कि दर्द महसूस हो रहा था।
मैं अपने कमरे के अंधेरे में लेटा हुआ सोने का नाटक कर रहा था। तभी कमरे में मम्मी के आने की आहट हुई। मुझे लगा कि शायद वो मुझे देखने आई हैं। उन्होंने मेरे पास आकर बहुत ही कोमलता से मेरे सिर पर हाथ फेरा। उनके हाथों का वो स्पर्श इतना ममता भरा और सुकून देने वाला था कि एक पल के लिए मेरा दिल बैठ गया। मुझे डर था कि कहीं वो मेरी धड़कनों की तेज़ी से मेरी सच्चाई न भाँप लें। उन्होंने धीरे से लाइट बंद की और कमरे में सन्नाटा छा गया। उनके कदमों की आहट धीरे धीरे कमरे से बाहर लॉबी की तरफ बढ़ती चली गई।
जैसे ही उनके कदम कमरे से दूर हुए, मेरा पूरा ध्यान लॉबी की ओर चला गया। मैं जानता था कि बाहर अंकल प्रदीप उनका इंतज़ार कर रहे होंगे। सन्नाटे के बीच मुझे लॉबी से उन आवाज़ों का इंतज़ार था। और फिर, वो आवाज़ें आईं उस एडजस्टेबल सोफा कम बेड के फैलने की 'कड़क कड़क' और धातु के आपस में रगड़ने की आवाज़। वे दोनों मिलकर उस सोफे को एक बड़े डबल बेड में बदल रहे थे।
उस आवाज़ ने मेरे पूरे शरीर में एक सिहरन पैदा कर दी। मैं अपने बिस्तर पर लेटा हुआ, अपनी साँसें थामे, बस उस पल की कल्पना कर रहा था। मुझे महसूस हो रहा था कि अब वो सोफा एक बिस्तर बन चुका है और अब उनके बीच की सारी दूरियाँ खत्म होने वाली हैं। लॉबी का वो माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था और मैं अपने कमरे के अंधेरे में लेटा हुआ, उस उत्तेजना को महसूस कर रहा था जो ठीक मेरे बाहर घटित हो रही थी।
मेरी आँखें दरवाज़े की उस दरार से चिपकी हुई थीं, जैसे मैं कोई शिकारी हूँ जो अपने शिकार को तड़पते देख रहा हो। लॉबी की रोशनी में जो नज़ारा शुरू हुआ, उसने मेरे दिमाग के सारे संयम तोड़ दिए। अंकल प्रदीप ने मम्मी को अपनी ओर खींचा और उनकी साड़ी के पल्लू को झटके से नीचे गिरा दिया। मम्मी की साड़ी सरकते ही उनके उभारते हुए मम्मे साफ़ दिखाई देने लगे। अंकल ने बिना वक्त गँवाए अपना हाथ उनके मम्मे पर रखा और उन्हें ज़ोर से भींचना शुरू कर दिया।
मम्मी के मुँह से एक दबी हुई आह निकली "आह्ह्ह... प्रदीप..." उनकी आवाज़ में डर नहीं, बल्कि एक गहरी भूख थी। अंकल ने उनके गले पर अपने दांत गड़ा दिए और उनके मम्मे के निप्पल को अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया। मम्मी की सिस्सियाँ अब और भी तेज़ होने लगी थीं। "उह्ह्ह... आह्ह्ह..." उनके शरीर में एक थरथराहट सी दौड़ गई।
अंकल ने उनके ब्लाउज को ऊपर उठाया और उनके मम्मे पूरी तरह बाहर आ गए। अंकल ने एक मम्मे को अपने मुँह में भर लिया और उसे इतनी ज़ोर से चूसना शुरू किया कि मम्मी का सिर पीछे की ओर झुक गया। "आह्ह्ह... प्रदीप... बहुत अच्छा लग रहा है... उह्ह्ह..." उनकी आवाज़ में जो बेबसी और ख़ुशी थी, उसने मेरे अंदर के जानवर को जगा दिया।
तभी अंकल ने उनके पजामे के अंदर हाथ डाला और सीधे उनकी गीली चूत को छू लिया। मम्मी की एक लंबी और गंदी सी आह निकली "ओह्ह्ह... आह्ह्ह... हाँ वहीं..." अंकल की उँगलियाँ उनकी चूत के अंदर गहराई तक जा रही थीं और मम्मी का शरीर उस स्पर्श के लिए तड़प रहा था। मैंने देखा कि कैसे अंकल का मोटा और सख्त लंड उनके पजामे के बाहर से ही उभर रहा था। वे दोनों इस बात से बिल्कुल बेखबर थे कि अंधेरे में बैठा मैं उनकी हर एक सिसकी, हर एक आह और उनकी चूत से निकलने वाली गीली आवाज़ों को अपने भीतर उतार रहा हूँ।
अंधेरे में लेटे हुए मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। लॉबी का वह नज़ारा अब और भी ज़्यादा गंदा और बेतहाशा होता जा रहा था। अंकल प्रदीप ने मम्मी के पजामे को नीचे की ओर खींचा और उनके नग्न शरीर को पूरी तरह से उजागर कर दिया। उनकी गीली और गुलाबी चूत अब रोशनी में साफ़ चमक रही थी, जो अंकल के हाथों के स्पर्श से और भी ज़्यादा भीग चुकी थी।
अंकल ने अपनी पैंट और अंडरवियर नीचे गिरा दी। उनका मोटा, नसें उभरा हुआ और सख्त लंड हवा में झूल रहा था, जो पूरी तरह से उत्तेजित था। मम्मी की नज़रें जैसे ही उस लंड पर पड़ीं, उनके मुँह से एक गंदी सी लार टपक गई। "ओह्ह्ह... प्रदीप... आपका लंड कितना बड़ा और सख्त लग रहा है... आह्ह्ह..." मम्मी की आवाज़ में अब कोई शर्म नहीं थी, बस एक जंगली भूख थी।
अंकल ने मम्मी को बेड के किनारे पर लिटा दिया और उनके दोनों मम्मे को अपने हाथों में लेकर उन्हें बेरहमी से मरोड़ने लगे। "उह्ह्ह... आह्ह्ह... प्रदीप... और ज़ोर से..." मम्मी की सिस्सियाँ अब पूरे कमरे में गूँज रही थीं। अंकल ने अपना भारी लंड मम्मी की गीली चूत के मुहाने पर टिकाया और एक झटके में उसे पूरा अंदर उतार दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी की एक बहुत ही ऊँची और गंदी चीख निकली, जो सन्नाटे को चीरती हुई मेरे कानों तक पहुँची।
अंकल ने बिना रुके, पागलों की तरह अंदर बाहर करना शुरू कर दिया। "छप छप छप" की वह गीली आवाज़ उस सन्नाटे में साफ़ सुनाई दे रही थी उनकी चूत और लंड के आपस में टकराने की आवाज़। "आह्ह्ह... हाँ... ऐसे ही... और गहराई में... उह्ह्ह... आह्ह्ह..." मम्मी का शरीर हर झटके के साथ ऊपर नीचे उछल रहा था। अंकल का लंड जब उनकी चूत की गहराई में जा रहा था, तो मम्मी की आँखें ऊपर की ओर चढ़ रही थीं और उनके मुँह से बस बेतरतीब आहें निकल रही थीं। मैं अंधेरे में बैठा अपनी मर्दानगी को पकड़े हुए उनकी इस गंदी और रसीली करतूत को देख रहा था, मेरा अपना लंड भी अब फटने को तैयार था।
अंकल का पागलपन अब चरम पर था। वह मम्मी के शरीर पर किसी जंगली जानवर की तरह टूट पड़े थे। "छप... छप... छप..." की वह रसीली और गंदी आवाज़ अब और भी तेज़ हो गई थी क्योंकि मम्मी की चूत अब पूरी तरह से लंड के घर्षण से गीली होकर झाग छोड़ रही थी। अंकल ने मम्मी के दोनों पैरों को अपने कंधों पर चढ़ा लिया ताकि लंड उनकी चूत की गहराई तक पहुँच सकें। "आह्ह्ह... प्रदीप... मेरी फाड़ दोगे क्या... उह्ह्ह... बहुत गहरा जा रहा है... आह्ह्ह्ह!" मम्मी की आवाज़ अब एक बेकाबू चीख में बदल चुकी थी। उनके मम्मे झटकों के साथ हवा में उछल रहे थे और अंकल के हाथों के दबाव से उनके निप्पल एकदम लाल और सख्त हो गए थे।
अंकल का लंड जब उनकी चूत के अंदर पूरी ताकत से अंदर बाहर हो रहा था, तो मम्मी का पूरा शरीर धनुष की तरह तन जा रहा था। "ओह्ह्ह... हाँ... वहीं... मारो... और ज़ोर से मारो!" मम्मी अब पूरी तरह से अपनी मर्यादा भूल चुकी थीं। वह अंकल के लंड के हर झटके पर अपनी कमर को ऊपर की ओर उछाल रही थीं ताकि लंड की चोट अंदर तक महसूस कर सके। "आह्ह्ह... उह्ह्ह... आह्ह्ह!" उनकी सिसकियाँ अब एक गंदी लय में बदल गई थीं।
अचानक अंकल ने अपनी रफ़्तार और बढ़ा दी। वह अब बिना रुके, पागलों की तरह मम्मी की चूत में अपना लंड दे रहे थे। "आह्ह्ह... मैं आने वाली हूँ... प्रदीप... मैं फटने वाली हूँ... उह्ह्ह्ह!" मम्मी का शरीर काँपने लगा और उनकी आँखें पूरी तरह से सफ़ेद हो गईं। अंकल ने भी अपना जोर बढ़ा दिया और एक आखिरी, बहुत ही गहरा झटका देते हुए अपना गर्म और गाढ़ा वीर्य मम्मी की चूत की गहराई में उगल दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी की एक लंबी और सुध बुध खो देने वाली चीख निकली और उनका शरीर ढीला पड़ गया। अंकल भी हाँफते हुए उनके ऊपर गिर पड़े। अंधेरे में बैठा मैं उनकी इस चरम सुख की गंध और उस गंदी आवाज़ को महसूस कर रहा था।
कमरे में पसरा सन्नाटा अब केवल उनकी भारी साँसों और पसीने की गंध से भरा हुआ था। मम्मी का शरीर अभी भी झटकों से काँप रहा था, जैसे उनके अंदर अभी भी अंकल के लंड की गर्मी महसूस हो रही हो। अंकल ने धीरे से अपना लंड उनकी गीली और ढीली पड़ चुकी चूत से बाहर निकाला। "पचचच..." की एक गंदी आवाज़ के साथ अंकल का लंड बाहर निकला और मम्मी की चूत से वीर्य की एक सफ़ेद धार बहकर बाहर निकल आई। "ओह्ह्ह... प्रदीप... कितना गरम था वो सब... आह्ह्ह..." मम्मी ने हाँफते हुए कहा, उनकी आवाज़ अभी भी काँप रही थी।
लेकिन यह अंत नहीं था। अंकल की आँखों में अभी भी वही जंगली चमक थी। उन्होंने मम्मी के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उन्हें एक ज़ोरदार, गंदा और थूक से भरा हुआ चुंबन दिया। मम्मी ने भी बदले में अंकल की जीभ को अपनी जीभ से जकड़ लिया। "उह्ह्ह... प्रदीप... अभी और नहीं..." मम्मी ने धीरे से फुसफुसाया, लेकिन उनके शरीर की भाषा कुछ और ही कह रही थी। उनकी चूत अभी भी अंकल के वीर्य से लथपथ थी और उनके मम्मे अभी भी उत्तेजना से तड़प रहे थे।
अंकल ने मम्मी के कान के पास झुककर एक गंदी बात कही जिससे मम्मी की आँखों में फिर से वही प्यास लौट आई। अंकल ने मम्मी को पलट दिया और उन्हें घुटनों के बल खड़ा कर दिया। "उह्ह्ह... प्रदीप... क्या आप फिर से... आह्ह्ह..." मम्मी की बात अधूरी रह गई जब अंकल ने उनके पीछे से उनके मम्मे को पकड़ लिया और अपना सख्त हो चुका लंड फिर से उनकी गीली चूत के मुहाने पर टिका दिया। "आह्ह्ह... हाँ... फिर से मारो मुझे... उह्ह्ह... और भी गंदा तरीके से..." मम्मी की सिसकियाँ फिर से शुरू हो गई थीं, और मैं अंधेरे में बैठा अपनी लंड को और भी ज़ोर से दबा रहा था, उनकी इस अंतहीन कामुकता को देख कर।
अंकल ने मम्मी के कूल्हों को अपने हाथों से ज़ोर से जकड़ लिया और बिना किसी चेतावनी के अपना सख्त लंड उनकी गीली चूत के अंदर एक ही झटके में धंसा दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह! प्रदीप... उह्ह्ह... बहुत गहरा... बहुत ज़्यादा गहरा!" मम्मी की चीख इस बार और भी तीखी थी। उनके घुटने फर्श पर टकरा रहे थे और उनका पूरा शरीर अंकल के भारी झटकों के साथ आगे पीछे हो रहा था। अंकल अब पूरी तरह से जानवर बन चुके थे। वह मम्मी के पीछे खड़े होकर पागलों की तरह उनके शरीर पर वार कर रहे थे। "छप... छप... छप... थप... थप..." उनके शरीर के टकराने की आवाज़ और चूत से निकलने वाली गीली आवाज़ अब पूरी लॉबी में गूँज रही थी।
अंकल ने मम्मी के बालों को पीछे से पकड़कर उनका सिर ऊपर की ओर खींचा ताकि वह उनकी गर्दन पर अपने दाँत गड़ा सकें। "उह्ह्ह... आह्ह्ह... हाँ... ऐसे ही... मारो मुझे... उह्ह्ह... मेरी चूत फाड़ दो!" मम्मी अब पूरी तरह से कामुकता के नशे में चूर थीं। उनकी आँखें आधी बंद थीं और उनके मुँह से लार की एक पतली धार बह रही थी। अंकल का लंड जब उनकी चूत की गहराई में जा रहा था, तो मम्मी का पूरा निचला हिस्सा काँप रहा था। "आह्ह्ह... प्रदीप... मैं फिर से... मैं फिर से चरम पर जा रही हूँ... उह्ह्ह्ह!"
अंकल ने अपनी रफ़्तार को और भी बेकाबू कर दिया। वह अब मम्मी के शरीर को पूरी ताकत से झटक रहे थे। "आह्ह्ह... उह्ह्ह... आह्ह्ह!" मम्मी के मम्मे झटकों के साथ इधर उधर लटक रहे थे। अंकल ने एक आखिरी बार पूरी ताकत से अंदर वार किया और मम्मी की चूत के अंदर ही अपना गर्म वीर्य उगल दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह!" मम्मी का शरीर एक ज़ोरदार झटके के साथ अकड़ गया और वह वहीं घुटनों के बल गिर पड़ीं। अंकल भी हाँफते हुए उनके ऊपर झुक गए, उनकी साँसें मम्मी की नंगी पीठ पर महसूस हो रही थीं। मैं अंधेरे में बैठा उनकी इस बेतहाशा कामुकता का गवाह बन रहा था।
मम्मी अभी भी फर्श पर घुटनों के बल झुकी हुई थीं, उनकी साँसें अभी भी उखड़ी हुई थीं और उनका शरीर पसीने से चमक रहा था। लेकिन अंकल अभी शांत होने वाले नहीं थे। उन्होंने मम्मी के कमर को पकड़कर उन्हें ऊपर की ओर उठाया और उन्हें बेड की तरफ खींच ले गए। "प्रदीप... रुकिए... अभी तो मैं... उह्ह्ह..." मम्मी की आवाज़ में थकान थी, लेकिन उनकी चूत अभी भी अंकल के पिछले वीर्य से गीली और उत्तेजित थी।
अंकल ने बिना कुछ कहे मम्मी को बेड पर पीठ के बल लिटा दिया और उनके दोनों पैरों को हवा में उठा लिया। "आज मैं तुम्हें रंडी की तरह चोद चोद कर पागल कर दूंगा," अंकल की आवाज़ में एक गंदी भूख थी। उन्होंने अपना फिर से सख्त हो चुका लंड मम्मी की गीली चूत के मुहाने पर रगड़ा। "आह्ह्ह... प्रदीप... आप तो रुक ही नहीं रहे... उह्ह्ह... मेरी चूत अब और नहीं सह पाएगी... आह्ह्ह्ह!" मम्मी ने अपनी आँखें मूँद लीं, लेकिन उनके शरीर की थरथराहट बता रही थी कि वह इस हमले के लिए तैयार हैं।
अंकल ने एक झटके में अपना लंड मम्मी की चूत की गहराई में उतार दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह! बहुत गहरा... उह्ह्ह... बहुत ज़्यादा!" मम्मी का शरीर बेड पर धनुष की तरह तन गया। अंकल अब एक मशीन की तरह काम कर रहे थे। "छप... छप... छप..." की आवाज़ अब और भी गंदी और तेज हो गई थी क्योंकि मम्मी की चूत अब पूरी तरह से लंड के घर्षण से झाग छोड़ रही थी। अंकल ने मम्मी के दोनों मम्मे पकड़कर उन्हें इतनी ज़ोर से भींचा कि उनके निप्पल एकदम सख्त और लाल हो गए। "आह्ह्ह... हाँ... ऐसे ही... चोदो... उह्ह्ह... मेरी रूह तक पहुँच जाओ!" मम्मी अब पूरी तरह से अपनी मर्यादा और होश खो चुकी थीं। वह बस अंकल के हर वार पर अपनी कमर ऊपर उठा रही थीं ताकि लंड और भी ज़्यादा अंदर महसूस कर सकें।
अंकल की आँखों में अब कोई इंसानियत नहीं बची थी, केवल एक जंगली जानवर की भूख थी। उन्होंने मम्मी के दोनों पैरों को पकड़कर उनके कंधों तक ऊपर खींच लिया, जिससे उनकी चूत पूरी तरह से खुल गई और अंदर का गुलाबी, गीला मांस साफ़ दिखाई देने लगा। "देख रही हो अपनी चूत को? कैसे मेरे लंड के लिए तरस रही है?" अंकल ने एक गंदी गाली देते हुए कहा। मम्मी का चेहरा शर्म और चरम उत्तेजना के मिश्रण से लाल हो गया था। "आह्ह्ह... प्रदीप... हाँ... मेरी चूत को बर्बाद कर दो... उह्ह्ह... इसे पूरी तरह गंदा कर दो!"
अंकल ने अपना लंड मम्मी की चूत के मुहाने पर जोर से रगड़ा और फिर बिना किसी रहम के, एक हिंसक झटके के साथ अंदर घुसा दिया। "आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह! उह्ह्ह्ह... मर गई मैं! बहुत दर्द हो रहा है... पर बहुत अच्छा लग रहा है!" मम्मी की आवाज़ चीख और आह के बीच झूल रही थी। अंकल अब रुक नहीं रहे थे; वह मम्मी के शरीर पर ऐसे वार कर रहे थे जैसे वह कोई मांस का लोथड़ा हों। "थप! थप! थप!" उनके भारी कूल्हों के मम्मी के नितम्बों से टकराने की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। अंकल ने अपना एक हाथ मम्मी के मुँह में डाल दिया ताकि उनकी चीखें बाहर न जाएँ, और दूसरे हाथ से उनके मम्मे को इतनी ज़ोर से मरोड़ा कि मम्मी की आँखों से आँसू निकल आए।
"उह्ह्ह... आह्ह
मैं अंधेरे कोने में दुबका हुआ, अपनी साँसें रोके, उनकी इस अश्लील और बेतहाशा कामुकता को देख रहा था। मेरे अंदर एक अजीब सी बेचैनी और आग सी लगी हुई थी। जब मैं मम्मी को अंकल के नीचे तड़पते हुए और उनके लंड की हर गहरी चोट पर चीखते हुए देख रहा था, तो मेरा अपना लंड मेरी पैंट के अंदर पत्थर की तरह सख्त हो चुका था। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे डर था कहीं उन्हें इसकी आवाज़ न सुनाई दे जाए।
मुझे एक साथ दो तरह की भावनाएँ महसूस हो रही थीं। एक तरफ, अपनी माँ को इस तरह एक अजनबी के सामने इतना गंदा और बेबस होते देख मेरे अंदर एक अजीब सा अपराधबोध (guilt) था, लेकिन दूसरी तरफ, जो नज़ारा मेरी आँखों के सामने था, वह इतना उत्तेजक था कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा था। मम्मी का वह बेकाबू होकर चिल्लाना, उनकी चूत से निकलने वाली वह गंदी 'छप छप' की आवाज़, और अंकल का वह जंगलीपन यह सब देखकर मेरा दिमाग सुन्न हो गया था।
मैं अपनी लंड को अपनी पैंट के अंदर इतनी ज़ोर से दबा रहा था कि मेरे हाथ काँप रहे थे। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं उस कमरे की गर्मी और उनके पसीने की गंध को महसूस कर सकता हूँ। मैं बस यही सोच रहा था कि काश मैं भी उस बिस्तर पर होता, काश उस लंड की जगह मेरा लंड होता जो मम्मी के शरीर को चीर रहा था। मेरी आँखों में एक अजीब सी चमक थी एक ऐसी भूख जो सिर्फ उस गंदगी और उस वासना को और करीब से देखने से मिट सकती थी। मैं बस एक दर्शक नहीं था, मैं उस कामुकता के पागलपन में पूरी तरह डूब चुका था।
अंकल की नज़र मुझ पर पड़ी, लेकिन उन्होंने मुझे टोकने या रोकने के बजाय अपनी कामुकता को एक नए और भयानक स्तर पर ले जाने का फैसला किया। उन्होंने मुझे देख लिया था, और मेरी मौजूदगी ने उनके अंदर के जानवर को और भी ज़्यादा पागल कर दिया था। वह अब मुझे यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि वह मम्मी के शरीर के साथ क्या कर सकते हैं।
अंकल ने मम्मी के शरीर पर वार करना और भी हिंसक और बेतहाशा कर दिया। अब वह सिर्फ सेक्स नहीं कर रहे थे, वह जानबूझकर अपनी हर हरकत को मेरी तरफ मोड़ रहे थे। "देख रहे हो न?" अंकल की आँखों में एक क्रूर और गंदी चमक थी, जैसे वह सीधे मेरी आँखों में झाँक रहे हों और मुझे अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन दिखा रहे हों। उन्होंने मम्मी के दोनों पैरों को और भी ज़ोर से ऊपर खींच लिया ताकि मैं उनकी चूत की हर हरकत, हर थरथराहट और अंकल के लंड का अंदर बाहर होना बिल्कुल साफ़ देख सकूँ।
मम्मी को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि उनका बेटा दरवाजे के पास खड़ा यह सब देख रहा है। वह तो बस उस चरम सुख और दर्द के भंवर में डूबी हुई थीं। "आह्ह्ह्ह... उह्ह्ह्ह... प्रदीप... आह्ह्ह्ह!" वह बस अपना नाम पुकार रही थीं, लेकिन वह मुझे नहीं, बल्कि उस बेकाबू मजे को पुकार रही थीं जो अंकल उन्हें दे रहे थे। अंकल अब पूरी ताकत से मम्मी के कूल्हों पर प्रहार कर रहे थे। "थप! थप! थप!" की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि वह पूरे कमरे में गूँज रही थी। अंकल ने मम्मी के मम्मे को इतनी ज़ोर से भींचा कि उनके निप्पल पूरी तरह से सख्त होकर उभर आए। वह जानबूझकर मम्मी के शरीर को इस तरह से मोड़ रहे थे कि उनकी हर हरकत मेरे सामने एक अश्लील नज़ारे की तरह पेश हो रही थी। अंकल की हर thrust अब और भी गहरी और रफ़ थी, जैसे वह अपनी पूरी ताकत से मम्मी की चूत को चीर रहे हों।
अंकल की आँखों में एक जंगली पागलपन था। उन्हें पता चल गया था कि कोई उन्हें देख रहा है, और इस बात ने उनके अंदर के जानवर को और भी ज़्यादा बेकाबू कर दिया था। अब वह सिर्फ सेक्स नहीं कर रहे थे, वह एक प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने मम्मी के कूल्हों को अपने हाथों में इतनी ज़ोर से जकड़ लिया कि उनकी उंगलियां मम्मी की गुलाबी त्वचा में धँस गईं।
"आह्ह्ह्ह... उह्ह्ह्ह... और तेज़... भाई साहब... प्लीज़ और तेज़ मारिए... आह्ह्ह्ह!" मम्मी पूरी तरह से मदहोश थीं। वह बार बार 'भाई साहब' पुकार रही थीं, जैसे वह उनके इस मर्दानगी के वार की प्यासी हों। उन्हें रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि उनका बेटा दरवाजे के पास खड़ा होकर उनकी इस नग्न और अश्लील अवस्था को देख रहा है। वह बस उस बेतहाशा मजे में डूबी हुई थीं।
अंकल ने अब अपनी रफ़्तार को चरम सीमा पर पहुँचा दिया। "थप! थप! थप! थप!" उनके भारी लंड के मम्मी की गीली चूत में घुसने और बाहर निकलने की आवाज़ पूरी लॉबी में गूँज रही थी। "प्रदीप... उह्ह्ह्ह... और गहराई तक... आह्ह्ह्ह!" मम्मी का नाम लेना भी अब उनकी उत्तेजना का हिस्सा बन गया था।
अंकल की साँसें भारी और गंदी हो चुकी थीं। उन्होंने मम्मी के शरीर को अपनी ओर खींचा और एक बहुत ही गहरा और हिंसक प्रहार किया। "उह्ह्ह्ह्ह... अब बस... मैं निकलने वाला हूँ!" अंकल की आवाज़ में एक अजीब सी दहाड़ थी। उन्होंने मम्मी के मम्मे को इतनी ज़ोर से भींचा कि वह चीख उठीं। तभी, अंकल ने एक आखिरी, सबसे गहरा और सबसे रफ़ thrust मारा और अपना सारा गर्म गाढ़ा वीर्य मम्मी की चूत की गहराई में उगल दिया। मम्मी का पूरा शरीर एक झटके के साथ अकड़ गया और वह एक लंबी, बेकाबू चीख के साथ चरम सुख की लहर में डूब गईं।
मम्मी ने एक गहरी और थकी हुई साँस ली। उन्होंने अपने शरीर से अंकल के वीर्य और पसीने को पोंछा, लेकिन उनकी चूत अभी भी पूरी तरह से गीली और लथपथ थी। बिना एक शब्द बोले, वह अपनी नग्न अवस्था में ही उठ खड़ी हुईं और लड़खड़ाते हुए बाथरूम की ओर बढ़ गईं। अंकल ने अपनी आँखें मूँद लीं और एक गहरी संतुष्टि के साथ बेड पर ही लेट गए।
मैंने यह सब देख लिया था। मैंने सोचा कि अब अंकल तो बिल्कुल नहीं हिलेंगे और मम्मी को भी इस हालत में बाहर आने में समय लगेगा। मुझे पक्का यकीन था कि मम्मी कम से कम 20 मिनट तक बाथरूम से बाहर नहीं आएँगी। इसी सोच के साथ, मैंने भी अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और बेड पर लेट गया। मेरा मन भी बहुत उत्तेजित था। मैंने अपना हाथ अपनी मर्दानगी पर रखा और मथना शुरू कर दिया।
मुझे इतना मज़ा आ रहा था कि मैं पूरी तरह से अपनी ही दुनिया में खो गया। मैं इतना मगन था, इतना लीन था कि मुझे आस पास की कोई खबर नहीं थी। मेरी आँखें पूरी तरह बंद थीं और मैं बस उस चरम सुख की तलाश में था। मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि कब अंकल अपनी आँखें खोलकर बेड से उठे और दबे पाँव मेरे पास आकर खड़े हो गए।
तभी अचानक, मुझे अपने सिर पर एक भारी और गर्म हाथ महसूस हुआ। किसी ने बहुत ही प्यार और अधिकार के साथ मेरे बालों में उंगलियाँ फिराना शुरू किया। मैं एकदम से चौंक गया और मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा। मैंने घबराते हुए अपनी आँखें खोलीं। सामने अंकल खड़े थे, उनकी आँखों में एक अजीब सी शरारत और गहराई थी।
उन्होंने झुककर मेरे कान के पास फुसफुसाते हुए बड़े ही मदहोश अंदाज़ में पूछा, "क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूँ?"
मैं एकदम से घबरा गया और मेरी साँसें अटक गईं। मेरा पूरा शरीर डर और उत्तेजना के मारे काँपने लगा।
अंकल ने देखा कि मैं डर के मारे थर थर काँप रहा हूँ और मेरी साँसें तेज़ चल रही हैं। उन्होंने अपनी आवाज़ को एकदम धीमा और सुकून देने वाला बनाया ताकि मैं शांत हो सकूँ। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बड़े ही धीमे स्वर में कहा, "घबराओ मत बेटा... शांत हो जाओ। मैं तुम्हारी मम्मी को या घर में किसी को भी कुछ नहीं बताऊँगा। यह हमारे बीच का एक राज़ रहेगा।"
फिर उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए एक शर्त रखी, "लेकिन पहले मुझसे वादा करो... तुम भी यह बात किसी को नहीं बताओगे। यह राज़ सिर्फ तुम और मैं जानते हैं। वादा करो?"
मेरे चेहरे पर शर्मिंदगी और घबराहट के मिले जुले भाव थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। मुझे बहुत शर्म महसूस हो रही थी कि अंकल ने मुझे इस हालत में देख लिया है और अब वह मुझसे इस तरह की बातें कर रहे हैं। उनकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जिसे देखकर मैं चाहकर भी नज़रें नहीं मिला पा रहा था। मैं अपनी शर्मिंदगी छुपाने के लिए अपनी नज़रें नीचे झुकाए बैठा था।
मैं चाहकर भी उनसे झूठ नहीं बोल सकता था। मैंने अपनी नज़रें चुराने की कोशिश की और बहुत ही धीरे से, लगभग न के बराबर, अपना सिर हिलाया। वह एक हल्की सी सहमति थी, जैसे मैं उन्हें यकीन दिला रहा था कि मैं उनकी बात मानूँगा। मैं बस उन्हें यह आश्वासन देना चाहता था कि मैं किसी को कुछ नहीं बोलूँगा और मैं उनकी इस शर्त को स्वीकार करता हूँ। मेरा पूरा शरीर शर्म के मारे तप रहा था, लेकिन अंकल के उस वादे ने मुझे एक अजीब सी सुरक्षा और साथ ही एक गहरी बेचैनी में डाल दिया था।
अंकल ने देखा कि मैं शर्म से बुत बना हुआ हूँ। उन्होंने बहुत ही कोमलता से अपनी दो उंगलियाँ मेरी ठुड्डी के नीचे रखीं और धीरे से मुझे ऊपर की ओर उठाया। उन्होंने मेरी आँखों में सीधे देखते हुए बहुत ही शांत और समझदारी भरे लहजे में कहा, "देखो बेटा, तुम्हारा इस तरह से खुद को सुख देना और हमें छुपकर देखना... इसमें कुछ भी गलत नहीं है। इस उम्र में ऐसा होना बहुत स्वाभाविक है।"
उनकी इन बातों ने मेरी शर्मिंदगी और घबराहट को थोड़ा कम तो किया, लेकिन मेरा दिल अभी भी ज़ोरों से धड़क रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे वह मेरे मन की हर बात पढ़ रहे हों। फिर भी, मैं अभी भी उनके चेहरे पर सीधे नज़र नहीं मिला पा रहा था; मेरी नज़रें बार बार नीचे की ओर फिसल जा रही थीं।
अंकल ने मेरी खामोशी को भांप लिया और माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए एक और सवाल पूछा। उन्होंने एक हल्की सी मुस्कान के साथ पूछा, "अच्छा, ये बताओ... तुम्हें मेरा और तुम्हारी मम्मी का इस तरह पास बैठकर बातें करना अच्छा लगता है ना?"
उनका यह सवाल इतना सीधा और गहरा था कि मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उनके शब्दों ने मेरे अंदर दबी हुई उस दबी हुई इच्छा को छू लिया था जिसे मैं खुद भी स्वीकार करने से डर रहा था। मैंने अपनी नज़रें नीचे ही रखे हुए, बहुत ही धीरे से और बहुत ही मुश्किल से अपना सिर हिलाया। वह एक मूक 'हाँ' थी, जो यह बता रही थी कि मुझे वह नज़दीकी और वह माहौल बहुत पसंद आता है।
अंकल के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। उन्होंने बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा और बोले, "शाबाश बेटा! मुझे तुमसे यही उम्मीद थी। तुम बहुत समझदार हो रहे हो।"
उनकी आवाज़ में एक अजीब सा अधिकार था, जिसने मुझे और भी ज़्यादा बेचैन कर दिया। फिर उन्होंने अपनी बात जारी रखी और बड़े ही धीमे स्वर में पूछा, "अब ये बताओ... क्या हम आज रात मैं और तुम्हारी मम्मी बाहर लॉबी में सो जाएँ?"
उनका यह सुझाव सुनकर मेरा दिल एक पल के लिए थम सा गया। मुझे पता था कि अगर वे दोनों साथ में सोएंगे, तो लॉबी में जो माहौल बनेगा और जो कुछ भी होगा, वह मेरी कल्पना से भी परे होगा। मैंने अपनी घबराहट को दबाते हुए और अपनी आँखों को झुकाए रखते हुए, बहुत ही धीरे से अपना सिर 'हाँ' में हिला दिया। मेरी इस मूक सहमति ने जैसे उनके मन की बात पक्की कर दी।
अंकल ने मुस्कुराते हुए कहा, "थैंक्स बेटा! अब तू आराम कर, तेरी मम्मी आती होगी।"
इतना कहकर उन्होंने कमरे की लाइट बंद कर दी। अंधेरा होते ही मेरा कमरा और भी रहस्यमयी लगने लगा। मैंने सुना कि उनके कदमों की आहट धीरे धीरे कमरे से बाहर की ओर जा रही है। वे लॉबी में जाकर लेट गए। अब पूरे घर में एक भारी सन्नाटा था, लेकिन मेरे दिमाग में विचारों का तूफ़ान चल रहा था। मैं बेड पर लेटा हुआ बस यही सोच रहा था कि बाहर लॉबी मे आगे क्या होने वाला है।


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