18-08-2026, 12:38 AM
(This post was last modified: 28-08-2026, 11:08 PM by MohdIqbal. Edited 2 times in total. Edited 2 times in total.)
कुछ दिनों के बाद........
गुड़गांव की शाम की उमस और शोर-शराबे के बीच, वाटिका रियल एस्टेट के ऑफिस की पार्किंग में सन्नाटा पसरने लगा था। ऑफिस का समय खत्म हो चुका था और इक्का-दुक्का गाड़ियां अब वहां से निकल रही थीं। चैताली घोष अपनी मारुति रिट्ज की ओर बढ़ रही थीं। बयालीस साल की उम्र में भी उसके चेहरे पर एक अजीब सी मासूमियत थी, लेकीन उसकी देह एक परिपक्व महिला की सारी खूबियों से लैस थी। उसकी रेशमी बंगाली साड़ी उसके भारी शरीर को बड़ी खूबसूरती से लपेटे हुए थी, जो उसके 38 इंच बूब्स और 40 इंच के चौड़े कूल्हों को उभार रही थी। उसने अपने बालों का जूड़ा बांध रखा था।
जैसे ही उसने कार का दरवाज़ा खोला और सीट पर बैठीं, उसने देखा की हरीश उसके कार के बगल में खड़ा था। हरीश, उसके बेटे आदित्य का दोस्त, जिसकी आंखों में हमेशा एक शरारती और कुछ गहरा छिपा हुआ आकर्षण रहता था।
"अरे हरीश! तुम यहाँ क्या कर रहे हो, बेटा?" चैताली ने मुस्कुराते हुए पूछा, उसकी आवाज़ में एक स्वाभाविक ममता और नरमी थी।
हरीश ने एक फीकी मुस्कान दी और अपनी शर्ट की आस्तीनें ऊपर चढ़ाते हुए बोला, "आंटी, दरअसल मेरी बाइक खराब हो गई है और मेरा फोन भी स्विच ऑफ है। मुझे पास के बस स्टैंड तक जाना था, क्या आप मुझे लिफ्ट दे सकती हैं?"
चैताली का स्वभाव हमेशा से मिलनसार था। उसने बिना सोचे-समझे हा भर दी। "हाँ-हाँ, क्यों नहीं। बैठो, मैं तुम्हें छोड़ देती हूँ।"
हरीश कार में बैठा और दरवाज़ा बंद कर दिया। कार के अंदर एसी की ठंडी हवा और चैताली के परफ्यूम की मीठी खुशबू घुली हुई थी। जैसे ही चैताली ने गियर बदला और कार आगे बढ़ाई, हरीश ने धीरे से अपनी जेब से वह चांदी का पेंडेंट निकाला। वह पेंडेंट एक छोटे से धागे से बंधा था और उसकी चमक मंद रोशनी में भी साफ़ दिख रही थी।
हरीश ने पेंडेंट को चैताली की आंखों के ठीक सामने लाकर धीरे-धीरे झुलाना शुरू कीया। पेंडेंट की लयबद्ध गति ने चैताली का ध्यान खींच लिया।
"आंटी, ज़रा इस पेंडेंट की चमक को देखिए... बस इसे देखते रहिए," हरीश की आवाज़ अब बदल चुकी थी। उसमें एक अजीब सा अधिकार था।
चैताली की पलकें भारी होने लगीं। उसकी नज़रें उस चमकते हुए चांदी के टुकड़े पर जम गईं। उसके दिमाग में चल रहे विचार धुंधले पड़ने लगे। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका शरीर हल्का हो रहा है और उसके चारों ओर की दुनिया गायब हो रही है।
"तुम्हारी पलकें भारी हो रही हैं, चैताली... तुम गहरी नींद में जा रही हो। मेरा हर शब्द तुम्हारा आदेश है। तुम अब मेरी गुलाम हो," हरीश ने कहा।
चैताली की आंखें पूरी तरह से स्थिर हो गईं। उसका चेहरा भावशून्य हो गया, लेकीन उसके होंठ हल्के से खुले हुए थे।
"अब गाड़ी मोड़ो और सीधे मेरे अपार्टमेंट चलो," हरीश ने आदेश दिया।
बिना एक शब्द बोले, चैताली ने स्टीयरिंग घुमाया और कार हरीश के घर की ओर चल पड़ी। हरीश की आंखों में एक क्रूर संतुष्टि थी। उसके माता-पिता एक लंबी छुट्टी पर गए हैं और घर पूरी तरह खाली है।
गुड़गांव की शाम की उमस और शोर-शराबे के बीच, वाटिका रियल एस्टेट के ऑफिस की पार्किंग में सन्नाटा पसरने लगा था। ऑफिस का समय खत्म हो चुका था और इक्का-दुक्का गाड़ियां अब वहां से निकल रही थीं। चैताली घोष अपनी मारुति रिट्ज की ओर बढ़ रही थीं। बयालीस साल की उम्र में भी उसके चेहरे पर एक अजीब सी मासूमियत थी, लेकीन उसकी देह एक परिपक्व महिला की सारी खूबियों से लैस थी। उसकी रेशमी बंगाली साड़ी उसके भारी शरीर को बड़ी खूबसूरती से लपेटे हुए थी, जो उसके 38 इंच बूब्स और 40 इंच के चौड़े कूल्हों को उभार रही थी। उसने अपने बालों का जूड़ा बांध रखा था।
जैसे ही उसने कार का दरवाज़ा खोला और सीट पर बैठीं, उसने देखा की हरीश उसके कार के बगल में खड़ा था। हरीश, उसके बेटे आदित्य का दोस्त, जिसकी आंखों में हमेशा एक शरारती और कुछ गहरा छिपा हुआ आकर्षण रहता था।
"अरे हरीश! तुम यहाँ क्या कर रहे हो, बेटा?" चैताली ने मुस्कुराते हुए पूछा, उसकी आवाज़ में एक स्वाभाविक ममता और नरमी थी।
हरीश ने एक फीकी मुस्कान दी और अपनी शर्ट की आस्तीनें ऊपर चढ़ाते हुए बोला, "आंटी, दरअसल मेरी बाइक खराब हो गई है और मेरा फोन भी स्विच ऑफ है। मुझे पास के बस स्टैंड तक जाना था, क्या आप मुझे लिफ्ट दे सकती हैं?"
चैताली का स्वभाव हमेशा से मिलनसार था। उसने बिना सोचे-समझे हा भर दी। "हाँ-हाँ, क्यों नहीं। बैठो, मैं तुम्हें छोड़ देती हूँ।"
हरीश कार में बैठा और दरवाज़ा बंद कर दिया। कार के अंदर एसी की ठंडी हवा और चैताली के परफ्यूम की मीठी खुशबू घुली हुई थी। जैसे ही चैताली ने गियर बदला और कार आगे बढ़ाई, हरीश ने धीरे से अपनी जेब से वह चांदी का पेंडेंट निकाला। वह पेंडेंट एक छोटे से धागे से बंधा था और उसकी चमक मंद रोशनी में भी साफ़ दिख रही थी।
हरीश ने पेंडेंट को चैताली की आंखों के ठीक सामने लाकर धीरे-धीरे झुलाना शुरू कीया। पेंडेंट की लयबद्ध गति ने चैताली का ध्यान खींच लिया।
"आंटी, ज़रा इस पेंडेंट की चमक को देखिए... बस इसे देखते रहिए," हरीश की आवाज़ अब बदल चुकी थी। उसमें एक अजीब सा अधिकार था।
चैताली की पलकें भारी होने लगीं। उसकी नज़रें उस चमकते हुए चांदी के टुकड़े पर जम गईं। उसके दिमाग में चल रहे विचार धुंधले पड़ने लगे। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका शरीर हल्का हो रहा है और उसके चारों ओर की दुनिया गायब हो रही है।
"तुम्हारी पलकें भारी हो रही हैं, चैताली... तुम गहरी नींद में जा रही हो। मेरा हर शब्द तुम्हारा आदेश है। तुम अब मेरी गुलाम हो," हरीश ने कहा।
चैताली की आंखें पूरी तरह से स्थिर हो गईं। उसका चेहरा भावशून्य हो गया, लेकीन उसके होंठ हल्के से खुले हुए थे।
"अब गाड़ी मोड़ो और सीधे मेरे अपार्टमेंट चलो," हरीश ने आदेश दिया।
बिना एक शब्द बोले, चैताली ने स्टीयरिंग घुमाया और कार हरीश के घर की ओर चल पड़ी। हरीश की आंखों में एक क्रूर संतुष्टि थी। उसके माता-पिता एक लंबी छुट्टी पर गए हैं और घर पूरी तरह खाली है।


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