17-08-2026, 03:55 PM
अगले दिन रात को जो हुआ, उसने हमारी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
मम्मी अभी किचन से फ्री होकर बैठी थीं और मैं अपनी स्टडी कर रहा था कि तभी मम्मी का फोन बज उठा। स्क्रीन पर पापा का नाम चमक रहा था।
मैंने झटके से फोन उठाया और कॉल रिसीव की।
“हाँ पापा,” मैंने जवाब दिया।
“पंकज, मेरी राहुल से अभी बात हुई। वो हमारे इलाके में किसी काम से आया था। अभी बाहर बारिश बहुत तेज़ हो गई है। रास्तों में पानी भर गया है और उसकी बाइक भी स्लिप कर रही थी,” पापा की आवाज़ में चिंता थी।
“तो… तो वो घर पहुँच गया ना?” मैंने उम्मीद करते हुए पूछा।
“अरे कहाँ! मैंने ही उसे रास्ते से वापस भेज दिया है। इतनी रात में और इतने खराब मौसम में मैं उस लड़के को खतरे में नहीं डाल सकता। मैंने उससे कह दिया है कि आज रात वो हमारे ही घर रुक जाए। बाहर वाले गेस्ट रूम में उसे सुला देना।”
पापा के ये शब्द मेरे कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गिरे।
“पापा! नहीं! मेरा मतलब है… गेस्ट रूम की सफ़ाई नहीं हुई है। और… और वो चला जाएगा, वो कोई बच्चा थोड़ी है,” मैंने हताशा में कहा।
“कैसी बातें कर रहा है पंकज? वो हमारा अपना ही लड़का है। गेस्ट रूम गंदा है तो हॉल में सोफ़े पर बिस्तर लगा देना। उसे बोल दिया है मैंने, वो बस पहुँचता ही होगा। जा दरवाज़ा खोल। और अपनी मम्मी से कह दे कि उसे एक कंबल दे दें। मैं रखता हूँ।” पापा ने बात खत्म कर दी और फोन कट गया।
मैंने फोन नीचे रखा। मम्मी ने मेरी बात सुन ली थी। उनका चेहरा कागज़ की तरह सफ़ेद पड़ गया था। उनकी आँखों में वह खौफ़ था जो किसी जानवर को कसाई के सामने देखकर होता है।
“मम्मी…”
“नहीं…” मम्मी के होंठ हिले, लेकिन आवाज़ गले में ही अटक गई। “पंकज, वो रात भर यहाँ…”
तभी मेन गेट की घंटी बजी।
टन-टन…
इस बार यह घंटी किसी मौत के फ़रमान जैसी लग रही थी। वह दरिंदा जिसे मैं घर से बाहर रखना चाहता था, अब पूरी रात के लिए हमारे घर में दाखिल होने वाला था। और सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि मेरे ही पिता ने उसे यह हक़ दिया था।
मैंने मम्मी को हाथ पकड़कर उठाया। “आप अपने कमरे में जाओ। दरवाज़ा अंदर से लॉक कर लेना। चाहे जो हो जाए, दरवाज़ा मत खोलना। मैं बाहर हॉल में ही सोऊँगा।”
मम्मी बिना कुछ कहे लगभग भागते हुए अपने कमरे में गईं। मैंने उनके कमरे की कुंडी अंदर से बंद होने की ‘क्लिक’ की आवाज़ सुनी। उसके बाद मैं भारी कदमों से दरवाज़े की तरफ़ गया।
दरवाज़ा खोला। सामने राहुल खड़ा था।
वह बारिश में पूरी तरह भीग चुका था। उसकी टी-शर्ट उसके शरीर से चिपक गई थी, जिससे उसके कसे हुए मसल्स साफ़ दिख रहे थे। पानी उसके बालों से टपककर उसके चेहरे पर आ रहा था। लेकिन उस भीगे हुए चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह खून सुखा देने वाली थी।
“सॉरी पंकज भाई,” उसने एक नकली बेचारगी का नाटक करते हुए कहा। “अंकल ने इतनी ज़िद की कि मैं मना ही नहीं कर पाया। बोले, ‘तू मेरा बेटा है, बारिश में कुछ हो गया तो मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा’।”
वह जानबूझकर ‘बेटा’ शब्द पर ज़ोर दे रहा था।
“अंदर आ जा,” मैंने कठोरता से कहा और किनारे हट गया।
वह अंदर आया। घर के बीचों-बीच खड़े होकर उसने अपने गीले बाल झटके। फिर उसकी नज़रें सीधे मम्मी के बंद दरवाज़े पर जाकर टिक गईं।
“आंटी सो गईं क्या? मुझे लगा शायद मेरे लिए तौलिया लेकर आएँगी,” उसने दरवाज़े की तरफ़ देखते हुए कहा।
“मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है। तौलिया मैं ले आता हूँ,” मैंने कहा।
मैं बाथरूम से एक तौलिया ले आया और उसकी तरफ़ फेंक दिया। उसने तौलिया पकड़ा और अचानक, बिना कुछ कहे, उसने अपनी गीली टी-शर्ट उतार दी। उसका नंगा, गठीला शरीर मेरे सामने था।
“अरे, भीग गया था ना… कपड़े तो सुखाने पड़ेंगे,” उसने बड़ी बेशर्मी से कहा और अपनी टी-शर्ट को सोफ़े के किनारे पर डाल दिया।
“तू इसी सोफ़े पर सोएगा। ये रहा कंबल,” मैंने सेंटर टेबल पर कंबल रखते हुए कहा। “और सुन… बाथरूम हॉल के इस तरफ़ है।”
राहुल तौलिए से अपने बाल पोंछ रहा था। उसने तौलिए के पीछे से मुझे देखा। उसकी आँखों में एक खतरनाक, भूखी चमक थी।
“अरे भाई, तुम इतना क्यों घबरा रहे हो?” वह धीरे से मेरे करीब आया। उसकी आवाज़ अब फुसफुसाहट में बदल गई थी। “मैं तो बस यहाँ… रखवाली करने आया हूँ। अंदर की चीज़ें… महफ़ूज़ रहनी चाहिए, है ना?”
उसकी बात का इशारा इतना गंदा था कि मेरा हाथ खुद-ब-खुद मुट्ठी में बँध गया।
“जैसी तुम्हारी मर्ज़ी, पंकज भाई,” उसने कंबल उठाया और सोफ़े पर पसर गया।
मैंने हॉल की लाइट बंद कर दी। सिर्फ़ एक छोटा सा नाइट बल्ब जल रहा था। मैं अपने कमरे में गया, लेकिन मैंने अपना दरवाज़ा खुला रखा ताकि मेरी सीधी नज़र हॉल और मम्मी के कमरे के दरवाज़े पर रहे। मैं अपनी कुर्सी खींचकर दरवाज़े के ठीक सामने बैठ गया।
बाहर बारिश ज़ोरों से हो रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट और घर के अंदर पसरा वह भयानक सन्नाटा—दोनों मिलकर एक खौफ़नाक माहौल बना रहे थे।
रात के बारह बज चुके थे। घर में अँधेरा था। सोफ़े की तरफ़ से राहुल के गहरी साँसें लेने की आवाज़ आ रही थी, जैसे वह सो गया हो। लेकिन मुझे पता था कि वह सोया नहीं है। वह बस इंतज़ार कर रहा था।
और मम्मी… मैं जानता था कि दीवार के उस पार, अपने बिस्तर पर सिकुड़ी हुई मम्मी भी नहीं सोई होंगी। आज रात, इस घर में कोई भी नहीं सोने वाला था।
रात के करीब दो बज चुके थे। बाहर बारिश की आवाज़ अब एक डरावनी धुन की तरह लग रही थी। नाइट बल्ब की हल्की पीली रोशनी में हॉल का दृश्य किसी डरावने सपने जैसा था।
मैं अपनी कुर्सी पर बैठा था। मेरी आँखें सामने सोफ़े पर टिके राहुल के शरीर पर थीं। उसने कंबल आधा हटा दिया था। उसका चौड़ा सीना और गठीले बाइसेप्स उस हल्की रोशनी में भी साफ़ चमक रहे थे।
तभी… हॉल के सन्नाटे में एक हल्की सी आवाज़ गूँजी।
चररर…
मेरे पूरे शरीर में बिजली सी दौड़ गई।
यह आवाज़ मम्मी के कमरे के दरवाज़े की थी। कुंडी खुलने की आवाज़।
मैंने अपनी साँस रोक ली। अँधेरे में मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। मम्मी के कमरे का दरवाज़ा बहुत धीरे-धीरे खुला। एक नंगे, गोरे पैर ने बाहर हॉल के फ़र्श पर कदम रखा।
मम्मी बाहर आ गई थीं।
उन्होंने वही ढीला सूट पहना हुआ था। नींद में करवटें बदलने की वजह से उनका दुपट्टा खिसक कर एक कंधे पर झूल रहा था। उनके एक हाथ में खाली स्टील का गिलास था। शायद गला सूख गया था और वे किचन से पानी लेने आई थीं।
उन्हें लगा होगा कि राहुल सो गया है। और उन्हें यह भी लगा होगा कि मैं अपने कमरे में सो रहा हूँ।
वे दबे पाँव किचन की तरफ़ बढ़ने लगीं। किचन तक जाने के लिए उन्हें उस सोफ़े के पास से गुज़रना था जहाँ राहुल लेटा हुआ था।
मैं चीखकर उन्हें रोकना चाहता था—‘मम्मी, वापस जाओ! वो जाग रहा है!’ लेकिन मेरे होंठ सिले हुए थे। मेरी वह बीमार मानसिकता मुझे रोकने के बजाय तमाशा देखने पर मजबूर कर रही थी।
मैंने धीरे से अपना हाथ अपनी पैंट की ज़िप पर रखा।
मम्मी सोफ़े के करीब पहुँचीं। उनकी नज़रें सोफ़े पर थीं, यह पक्का करने के लिए कि राहुल सो रहा है।
लेकिन जैसे ही वे सोफ़े के ठीक सामने से गुज़रने लगीं, अँधेरे में एक आवाज़ गूँजी।
“प्यास लगी है… आंटी?”
मम्मी के कदम वहीं जम गए। उनके हाथ से स्टील का गिलास छूटकर नीचे गिरा, लेकिन ज़मीन पर टकराने से पहले ही अँधेरे से एक मज़बूत हाथ बिजली की फ़ुर्ती से निकला और उसने हवा में ही गिलास को पकड़ लिया।
वह राहुल का हाथ था।
मम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकली, जिसे उन्होंने तुरंत अपने दूसरे हाथ से दबा लिया। वे दो कदम पीछे हटीं।
राहुल धीरे से सोफ़े से उठा। वह कमर से ऊपर पूरी तरह नंगा था। नाइट बल्ब की रोशनी उसके चौड़े सीने और गठीले पेट पर पड़ रही थी। वह बिल्कुल एक भूखे शेर की तरह लग रहा था।
“इतनी रात को… अकेले बाहर नहीं आना चाहिए था,” राहुल ने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा। वह गिलास लेकर मम्मी की तरफ़ बढ़ा।
“मु… मुझे पानी लेना है… तुम सो जाओ,” मम्मी की आवाज़ काँप रही थी।
“लाइए, मैं पिला देता हूँ,” राहुल ने उनके बिल्कुल करीब आकर कहा।
मम्मी पीछे हटना चाहती थीं, लेकिन उनकी पीठ डाइनिंग टेबल से टकरा गई। अब उनके पास पीछे जाने का कोई रास्ता नहीं था। राहुल उनके और करीब आ गया। उनके बीच मुश्किल से एक इंच का फ़ासला था। राहुल का नंगा, गर्म शरीर लगभग मम्मी के कपड़ों को छू रहा था।
मैंने धीरे से अपनी ज़िप खोल दी। मेरे अंदर का वह नामर्द और हवसी बेटा अब पूरी तरह जाग चुका था।
राहुल ने जग से गिलास में पानी डाला और मम्मी के होठों के पास ले गया। मम्मी डर के मारे काँप रही थीं। उन्होंने गिलास अपने हाथों में लेना चाहा, लेकिन राहुल ने गिलास नहीं छोड़ा।
“पी लीजिए आंटी… गला बहुत सूख रहा है आपका,” उसने गहरी आवाज़ में कहा।
मम्मी ने डरते-डरते पानी का घूँट भरा। उनके होंठ काँप रहे थे, जिसकी वजह से पानी की कुछ बूँदें उनके होठों से छलक कर उनकी ठुड्डी और फिर गले से होती हुई उनके सीने तक बह गईं।
राहुल की आँखें उस पानी की बूँद का पीछा कर रही थीं।
“पानी गिर गया,” राहुल ने फ़ुसफ़ुसाया। उसने अपना गिलास नीचे रखा और अपना बड़ा, खुरदरा हाथ मम्मी के गले की तरफ़ बढ़ा दिया।
“राहुल… नहीं…” मम्मी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।
राहुल के हाथ नहीं रुके। उसके अँगूठे ने मम्मी के गले पर गिरी पानी की बूँद को पोंछा। उसकी खुरदरी उंगलियाँ मम्मी के गोरे, मुलायम गले को सहलाने लगीं। मम्मी ने आँखें कसकर बंद कर लीं। उनका शरीर बुरी तरह काँप रहा था।
“कितना डरती हैं आप…” राहुल ने अपना चेहरा उनके कान के पास ले जाकर कहा। “पंकज तो अंदर गहरी नींद में है। अंकल शहर से बाहर हैं। फिर ये घबराहट कैसी?”
यह कहते हुए राहुल का हाथ गले से नीचे खिसका और उसने मम्मी के सूट के ऊपर से उनके कॉलरबोन को छुआ। मम्मी की साँसें तेज़ हो गईं।
“छोड़ो मुझे… मुझे जाने दो…” मम्मी ने उसे अपने दोनों हाथों से धकेलने की कोशिश की। लेकिन राहुल एक पहाड़ की तरह वहीं खड़ा रहा।
उसने मुस्कुराते हुए मम्मी के दोनों हाथों को अपनी एक ही मज़बूत मुट्ठी में पकड़ लिया और उनके हाथों को नीचे कर दिया। अब मम्मी पूरी तरह उसके सामने बेबस थीं।
मेरा हाथ मेरे शरीर पर तेज़ी से चलने लगा था।
राहुल का दूसरा हाथ नीचे गया। उसने मम्मी की कमर पर हाथ रखा—बिल्कुल उसी जगह जहाँ कल छत पर पकड़ा था।
“कल छत पर आप बहुत जल्दी में थीं, आंटी… मैंने तो ठीक से अंदर की ‘फ़िटिंग’ चेक भी नहीं की थी,” राहुल ने बेशर्मी से कहा।
उसने अपनी उंगलियों से मम्मी के सूट के कपड़े को कसकर मुट्ठी में पकड़ा और हल्का सा ऊपर की तरफ़ खींचा।
“आह…” मम्मी के मुँह से एक दबी हुई, सिसकती हुई आह निकली।
राहुल ने अपना हाथ सूट के अंदर सरका दिया। उसकी बड़ी सी हथेली मम्मी के उसी मुलायम, गोरे पेट पर थी। और उसकी एक उंगली फिर से उनकी गहरी नाभि को टटोल रही थी।
मम्मी का सिर पीछे की तरफ़ लुढ़क गया। उन्होंने अपने दाँतों से अपना निचला होंठ ज़ोर से काट लिया। उनका शरीर राहुल के उस नंगे, गठीले शरीर से सट गया था।
राहुल की उंगलियाँ मम्मी के पेट पर घूम रही थीं जब अचानक उसकी नज़र अँधेरे में मेरे कमरे की तरफ़ चली गई। दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था। नाइट बल्ब की मद्धम रोशनी में उसने मेरी आँखों की चमक पकड़ ली।
उसके चेहरे पर एक धीमी, खतरनाक मुस्कान फैल गई।
वह समझ गया था।
मैं देख रहा हूँ।
राहुल ने मम्मी को और कसकर अपनी ओर खींच लिया। एक हाथ उनकी कमर पर था, दूसरा उनके सिर के पीछे। उसने धीरे से मम्मी का चेहरा मेरे कमरे की तरफ़ घुमा दिया।
“देखो आंटी…” उसने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा। “उधर… अँधेरे में।”
मम्मी की आँखें मेरे कमरे के खुले दरवाज़े पर ठहर गईं। लेकिन अँधेरा इतना गहरा था कि उन्हें कुछ दिखाई नहीं दिया।
“क्या… क्या है वहाँ?” मम्मी की आवाज़ काँप रही थी।
राहुल हल्का सा हँसा। “कुछ नहीं आंटी… बस अँधेरा है।”
फिर उसने वह किया जो मैं चाहता था।
उसने मम्मी के सूट के कुर्ते को दोनों हाथों से पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर की तरफ़ खींच दिया। कपड़ा उनकी कमर से सरकते हुए ऊपर उठने लगा। पहले मम्मी की गहरी नाभि दिखाई दी, फिर पूरा पेट, फिर पसलियों का निचला हिस्सा। गोरी, मुलायम त्वचा नाइट बल्ब की रोशनी में चमक उठी। राहुल ने कुर्ते को और ऊपर खींचकर ठीक उनके स्तनों के नीचे इकट्ठा कर दिया। कपड़ा वहीं अटका दिया गया। अब मम्मी का पूरा पेट और पसलियाँ नंगी थीं।
उसी हाथ से उसने नीचे की तरफ़ भी काम किया। उनकी सलवार को पकड़कर तीन इंच नीचे खींच दिया। नाभि के गड्ढे से काफ़ी नीचे तक कपड़ा सरक गया। गहरी नाभि पूरी तरह बेपर्दा हो गई।
मम्मी के मुँह से एक लंबी, दबी हुई कराह निकल गई। “आह्ह…” शरीर काँप उठा।
मम्मी ने झटके से उसके हाथ पकड़ने की कोशिश की। “नहीं… राहुल… मत करो…”
लेकिन राहुल ने उनके हाथ आसानी से हटा दिए। कुर्ता स्तनों के ठीक नीचे अटका हुआ था और सलवार नाभि से तीन इंच नीचे। मम्मी का गोरा, चिकना पेट नंगा था।
मेरी साँसें अटक गईं। मेरा हाथ और तेज़ हो गया। उत्तेजना सिर तक चढ़ गई थी।
राहुल ने मम्मी के कान के पास मुँह लाते हुए कहा, “पंकज सो रहा है न? तो फिर डर किस बात का?”
यह कहते हुए उसने मम्मी के कान की लौ को मुँह में भर लिया। एक पल के लिए मम्मी के मुँह से हल्की कराह निकली और उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
मम्मी की आँखें अभी भी मेरे कमरे के अँधेरे दरवाज़े पर थीं। वे काँप रही थीं। उनके नंगे पेट पर राहुल की उंगलियाँ घूम रही थीं—नाभि के आसपास, फिर थोड़ा ऊपर, फिर नीचे। हर स्पर्श पर उनके मुँह से हल्की कराहें निकल रही थीं।
मैं पागल हो रहा था।
राहुल ने मम्मी के नंगे पेट पर अपना गरम हाथ फेरा और धीरे से बोला, “कितना मुलायम शरीर है आपका आंटी… पंकज को पता भी नहीं होगा कि उसकी माँ कितनी… हम्म।”
मम्मी ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ काँप रहे थे। एक आँसू उनकी आँख से निकलकर गाल पर बह गया। एक और कराह उनके गले से फूट निकली।
और मैं अँधेरे में बैठा, हाँफता हुआ, अपनी माँ का नंगा पेट देखता रहा।
मम्मी अभी किचन से फ्री होकर बैठी थीं और मैं अपनी स्टडी कर रहा था कि तभी मम्मी का फोन बज उठा। स्क्रीन पर पापा का नाम चमक रहा था।
मैंने झटके से फोन उठाया और कॉल रिसीव की।
“हाँ पापा,” मैंने जवाब दिया।
“पंकज, मेरी राहुल से अभी बात हुई। वो हमारे इलाके में किसी काम से आया था। अभी बाहर बारिश बहुत तेज़ हो गई है। रास्तों में पानी भर गया है और उसकी बाइक भी स्लिप कर रही थी,” पापा की आवाज़ में चिंता थी।
“तो… तो वो घर पहुँच गया ना?” मैंने उम्मीद करते हुए पूछा।
“अरे कहाँ! मैंने ही उसे रास्ते से वापस भेज दिया है। इतनी रात में और इतने खराब मौसम में मैं उस लड़के को खतरे में नहीं डाल सकता। मैंने उससे कह दिया है कि आज रात वो हमारे ही घर रुक जाए। बाहर वाले गेस्ट रूम में उसे सुला देना।”
पापा के ये शब्द मेरे कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गिरे।
“पापा! नहीं! मेरा मतलब है… गेस्ट रूम की सफ़ाई नहीं हुई है। और… और वो चला जाएगा, वो कोई बच्चा थोड़ी है,” मैंने हताशा में कहा।
“कैसी बातें कर रहा है पंकज? वो हमारा अपना ही लड़का है। गेस्ट रूम गंदा है तो हॉल में सोफ़े पर बिस्तर लगा देना। उसे बोल दिया है मैंने, वो बस पहुँचता ही होगा। जा दरवाज़ा खोल। और अपनी मम्मी से कह दे कि उसे एक कंबल दे दें। मैं रखता हूँ।” पापा ने बात खत्म कर दी और फोन कट गया।
मैंने फोन नीचे रखा। मम्मी ने मेरी बात सुन ली थी। उनका चेहरा कागज़ की तरह सफ़ेद पड़ गया था। उनकी आँखों में वह खौफ़ था जो किसी जानवर को कसाई के सामने देखकर होता है।
“मम्मी…”
“नहीं…” मम्मी के होंठ हिले, लेकिन आवाज़ गले में ही अटक गई। “पंकज, वो रात भर यहाँ…”
तभी मेन गेट की घंटी बजी।
टन-टन…
इस बार यह घंटी किसी मौत के फ़रमान जैसी लग रही थी। वह दरिंदा जिसे मैं घर से बाहर रखना चाहता था, अब पूरी रात के लिए हमारे घर में दाखिल होने वाला था। और सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि मेरे ही पिता ने उसे यह हक़ दिया था।
मैंने मम्मी को हाथ पकड़कर उठाया। “आप अपने कमरे में जाओ। दरवाज़ा अंदर से लॉक कर लेना। चाहे जो हो जाए, दरवाज़ा मत खोलना। मैं बाहर हॉल में ही सोऊँगा।”
मम्मी बिना कुछ कहे लगभग भागते हुए अपने कमरे में गईं। मैंने उनके कमरे की कुंडी अंदर से बंद होने की ‘क्लिक’ की आवाज़ सुनी। उसके बाद मैं भारी कदमों से दरवाज़े की तरफ़ गया।
दरवाज़ा खोला। सामने राहुल खड़ा था।
वह बारिश में पूरी तरह भीग चुका था। उसकी टी-शर्ट उसके शरीर से चिपक गई थी, जिससे उसके कसे हुए मसल्स साफ़ दिख रहे थे। पानी उसके बालों से टपककर उसके चेहरे पर आ रहा था। लेकिन उस भीगे हुए चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह खून सुखा देने वाली थी।
“सॉरी पंकज भाई,” उसने एक नकली बेचारगी का नाटक करते हुए कहा। “अंकल ने इतनी ज़िद की कि मैं मना ही नहीं कर पाया। बोले, ‘तू मेरा बेटा है, बारिश में कुछ हो गया तो मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा’।”
वह जानबूझकर ‘बेटा’ शब्द पर ज़ोर दे रहा था।
“अंदर आ जा,” मैंने कठोरता से कहा और किनारे हट गया।
वह अंदर आया। घर के बीचों-बीच खड़े होकर उसने अपने गीले बाल झटके। फिर उसकी नज़रें सीधे मम्मी के बंद दरवाज़े पर जाकर टिक गईं।
“आंटी सो गईं क्या? मुझे लगा शायद मेरे लिए तौलिया लेकर आएँगी,” उसने दरवाज़े की तरफ़ देखते हुए कहा।
“मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है। तौलिया मैं ले आता हूँ,” मैंने कहा।
मैं बाथरूम से एक तौलिया ले आया और उसकी तरफ़ फेंक दिया। उसने तौलिया पकड़ा और अचानक, बिना कुछ कहे, उसने अपनी गीली टी-शर्ट उतार दी। उसका नंगा, गठीला शरीर मेरे सामने था।
“अरे, भीग गया था ना… कपड़े तो सुखाने पड़ेंगे,” उसने बड़ी बेशर्मी से कहा और अपनी टी-शर्ट को सोफ़े के किनारे पर डाल दिया।
“तू इसी सोफ़े पर सोएगा। ये रहा कंबल,” मैंने सेंटर टेबल पर कंबल रखते हुए कहा। “और सुन… बाथरूम हॉल के इस तरफ़ है।”
राहुल तौलिए से अपने बाल पोंछ रहा था। उसने तौलिए के पीछे से मुझे देखा। उसकी आँखों में एक खतरनाक, भूखी चमक थी।
“अरे भाई, तुम इतना क्यों घबरा रहे हो?” वह धीरे से मेरे करीब आया। उसकी आवाज़ अब फुसफुसाहट में बदल गई थी। “मैं तो बस यहाँ… रखवाली करने आया हूँ। अंदर की चीज़ें… महफ़ूज़ रहनी चाहिए, है ना?”
उसकी बात का इशारा इतना गंदा था कि मेरा हाथ खुद-ब-खुद मुट्ठी में बँध गया।
“जैसी तुम्हारी मर्ज़ी, पंकज भाई,” उसने कंबल उठाया और सोफ़े पर पसर गया।
मैंने हॉल की लाइट बंद कर दी। सिर्फ़ एक छोटा सा नाइट बल्ब जल रहा था। मैं अपने कमरे में गया, लेकिन मैंने अपना दरवाज़ा खुला रखा ताकि मेरी सीधी नज़र हॉल और मम्मी के कमरे के दरवाज़े पर रहे। मैं अपनी कुर्सी खींचकर दरवाज़े के ठीक सामने बैठ गया।
बाहर बारिश ज़ोरों से हो रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट और घर के अंदर पसरा वह भयानक सन्नाटा—दोनों मिलकर एक खौफ़नाक माहौल बना रहे थे।
रात के बारह बज चुके थे। घर में अँधेरा था। सोफ़े की तरफ़ से राहुल के गहरी साँसें लेने की आवाज़ आ रही थी, जैसे वह सो गया हो। लेकिन मुझे पता था कि वह सोया नहीं है। वह बस इंतज़ार कर रहा था।
और मम्मी… मैं जानता था कि दीवार के उस पार, अपने बिस्तर पर सिकुड़ी हुई मम्मी भी नहीं सोई होंगी। आज रात, इस घर में कोई भी नहीं सोने वाला था।
रात के करीब दो बज चुके थे। बाहर बारिश की आवाज़ अब एक डरावनी धुन की तरह लग रही थी। नाइट बल्ब की हल्की पीली रोशनी में हॉल का दृश्य किसी डरावने सपने जैसा था।
मैं अपनी कुर्सी पर बैठा था। मेरी आँखें सामने सोफ़े पर टिके राहुल के शरीर पर थीं। उसने कंबल आधा हटा दिया था। उसका चौड़ा सीना और गठीले बाइसेप्स उस हल्की रोशनी में भी साफ़ चमक रहे थे।
तभी… हॉल के सन्नाटे में एक हल्की सी आवाज़ गूँजी।
चररर…
मेरे पूरे शरीर में बिजली सी दौड़ गई।
यह आवाज़ मम्मी के कमरे के दरवाज़े की थी। कुंडी खुलने की आवाज़।
मैंने अपनी साँस रोक ली। अँधेरे में मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। मम्मी के कमरे का दरवाज़ा बहुत धीरे-धीरे खुला। एक नंगे, गोरे पैर ने बाहर हॉल के फ़र्श पर कदम रखा।
मम्मी बाहर आ गई थीं।
उन्होंने वही ढीला सूट पहना हुआ था। नींद में करवटें बदलने की वजह से उनका दुपट्टा खिसक कर एक कंधे पर झूल रहा था। उनके एक हाथ में खाली स्टील का गिलास था। शायद गला सूख गया था और वे किचन से पानी लेने आई थीं।
उन्हें लगा होगा कि राहुल सो गया है। और उन्हें यह भी लगा होगा कि मैं अपने कमरे में सो रहा हूँ।
वे दबे पाँव किचन की तरफ़ बढ़ने लगीं। किचन तक जाने के लिए उन्हें उस सोफ़े के पास से गुज़रना था जहाँ राहुल लेटा हुआ था।
मैं चीखकर उन्हें रोकना चाहता था—‘मम्मी, वापस जाओ! वो जाग रहा है!’ लेकिन मेरे होंठ सिले हुए थे। मेरी वह बीमार मानसिकता मुझे रोकने के बजाय तमाशा देखने पर मजबूर कर रही थी।
मैंने धीरे से अपना हाथ अपनी पैंट की ज़िप पर रखा।
मम्मी सोफ़े के करीब पहुँचीं। उनकी नज़रें सोफ़े पर थीं, यह पक्का करने के लिए कि राहुल सो रहा है।
लेकिन जैसे ही वे सोफ़े के ठीक सामने से गुज़रने लगीं, अँधेरे में एक आवाज़ गूँजी।
“प्यास लगी है… आंटी?”
मम्मी के कदम वहीं जम गए। उनके हाथ से स्टील का गिलास छूटकर नीचे गिरा, लेकिन ज़मीन पर टकराने से पहले ही अँधेरे से एक मज़बूत हाथ बिजली की फ़ुर्ती से निकला और उसने हवा में ही गिलास को पकड़ लिया।
वह राहुल का हाथ था।
मम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकली, जिसे उन्होंने तुरंत अपने दूसरे हाथ से दबा लिया। वे दो कदम पीछे हटीं।
राहुल धीरे से सोफ़े से उठा। वह कमर से ऊपर पूरी तरह नंगा था। नाइट बल्ब की रोशनी उसके चौड़े सीने और गठीले पेट पर पड़ रही थी। वह बिल्कुल एक भूखे शेर की तरह लग रहा था।
“इतनी रात को… अकेले बाहर नहीं आना चाहिए था,” राहुल ने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा। वह गिलास लेकर मम्मी की तरफ़ बढ़ा।
“मु… मुझे पानी लेना है… तुम सो जाओ,” मम्मी की आवाज़ काँप रही थी।
“लाइए, मैं पिला देता हूँ,” राहुल ने उनके बिल्कुल करीब आकर कहा।
मम्मी पीछे हटना चाहती थीं, लेकिन उनकी पीठ डाइनिंग टेबल से टकरा गई। अब उनके पास पीछे जाने का कोई रास्ता नहीं था। राहुल उनके और करीब आ गया। उनके बीच मुश्किल से एक इंच का फ़ासला था। राहुल का नंगा, गर्म शरीर लगभग मम्मी के कपड़ों को छू रहा था।
मैंने धीरे से अपनी ज़िप खोल दी। मेरे अंदर का वह नामर्द और हवसी बेटा अब पूरी तरह जाग चुका था।
राहुल ने जग से गिलास में पानी डाला और मम्मी के होठों के पास ले गया। मम्मी डर के मारे काँप रही थीं। उन्होंने गिलास अपने हाथों में लेना चाहा, लेकिन राहुल ने गिलास नहीं छोड़ा।
“पी लीजिए आंटी… गला बहुत सूख रहा है आपका,” उसने गहरी आवाज़ में कहा।
मम्मी ने डरते-डरते पानी का घूँट भरा। उनके होंठ काँप रहे थे, जिसकी वजह से पानी की कुछ बूँदें उनके होठों से छलक कर उनकी ठुड्डी और फिर गले से होती हुई उनके सीने तक बह गईं।
राहुल की आँखें उस पानी की बूँद का पीछा कर रही थीं।
“पानी गिर गया,” राहुल ने फ़ुसफ़ुसाया। उसने अपना गिलास नीचे रखा और अपना बड़ा, खुरदरा हाथ मम्मी के गले की तरफ़ बढ़ा दिया।
“राहुल… नहीं…” मम्मी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।
राहुल के हाथ नहीं रुके। उसके अँगूठे ने मम्मी के गले पर गिरी पानी की बूँद को पोंछा। उसकी खुरदरी उंगलियाँ मम्मी के गोरे, मुलायम गले को सहलाने लगीं। मम्मी ने आँखें कसकर बंद कर लीं। उनका शरीर बुरी तरह काँप रहा था।
“कितना डरती हैं आप…” राहुल ने अपना चेहरा उनके कान के पास ले जाकर कहा। “पंकज तो अंदर गहरी नींद में है। अंकल शहर से बाहर हैं। फिर ये घबराहट कैसी?”
यह कहते हुए राहुल का हाथ गले से नीचे खिसका और उसने मम्मी के सूट के ऊपर से उनके कॉलरबोन को छुआ। मम्मी की साँसें तेज़ हो गईं।
“छोड़ो मुझे… मुझे जाने दो…” मम्मी ने उसे अपने दोनों हाथों से धकेलने की कोशिश की। लेकिन राहुल एक पहाड़ की तरह वहीं खड़ा रहा।
उसने मुस्कुराते हुए मम्मी के दोनों हाथों को अपनी एक ही मज़बूत मुट्ठी में पकड़ लिया और उनके हाथों को नीचे कर दिया। अब मम्मी पूरी तरह उसके सामने बेबस थीं।
मेरा हाथ मेरे शरीर पर तेज़ी से चलने लगा था।
राहुल का दूसरा हाथ नीचे गया। उसने मम्मी की कमर पर हाथ रखा—बिल्कुल उसी जगह जहाँ कल छत पर पकड़ा था।
“कल छत पर आप बहुत जल्दी में थीं, आंटी… मैंने तो ठीक से अंदर की ‘फ़िटिंग’ चेक भी नहीं की थी,” राहुल ने बेशर्मी से कहा।
उसने अपनी उंगलियों से मम्मी के सूट के कपड़े को कसकर मुट्ठी में पकड़ा और हल्का सा ऊपर की तरफ़ खींचा।
“आह…” मम्मी के मुँह से एक दबी हुई, सिसकती हुई आह निकली।
राहुल ने अपना हाथ सूट के अंदर सरका दिया। उसकी बड़ी सी हथेली मम्मी के उसी मुलायम, गोरे पेट पर थी। और उसकी एक उंगली फिर से उनकी गहरी नाभि को टटोल रही थी।
मम्मी का सिर पीछे की तरफ़ लुढ़क गया। उन्होंने अपने दाँतों से अपना निचला होंठ ज़ोर से काट लिया। उनका शरीर राहुल के उस नंगे, गठीले शरीर से सट गया था।
राहुल की उंगलियाँ मम्मी के पेट पर घूम रही थीं जब अचानक उसकी नज़र अँधेरे में मेरे कमरे की तरफ़ चली गई। दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था। नाइट बल्ब की मद्धम रोशनी में उसने मेरी आँखों की चमक पकड़ ली।
उसके चेहरे पर एक धीमी, खतरनाक मुस्कान फैल गई।
वह समझ गया था।
मैं देख रहा हूँ।
राहुल ने मम्मी को और कसकर अपनी ओर खींच लिया। एक हाथ उनकी कमर पर था, दूसरा उनके सिर के पीछे। उसने धीरे से मम्मी का चेहरा मेरे कमरे की तरफ़ घुमा दिया।
“देखो आंटी…” उसने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा। “उधर… अँधेरे में।”
मम्मी की आँखें मेरे कमरे के खुले दरवाज़े पर ठहर गईं। लेकिन अँधेरा इतना गहरा था कि उन्हें कुछ दिखाई नहीं दिया।
“क्या… क्या है वहाँ?” मम्मी की आवाज़ काँप रही थी।
राहुल हल्का सा हँसा। “कुछ नहीं आंटी… बस अँधेरा है।”
फिर उसने वह किया जो मैं चाहता था।
उसने मम्मी के सूट के कुर्ते को दोनों हाथों से पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर की तरफ़ खींच दिया। कपड़ा उनकी कमर से सरकते हुए ऊपर उठने लगा। पहले मम्मी की गहरी नाभि दिखाई दी, फिर पूरा पेट, फिर पसलियों का निचला हिस्सा। गोरी, मुलायम त्वचा नाइट बल्ब की रोशनी में चमक उठी। राहुल ने कुर्ते को और ऊपर खींचकर ठीक उनके स्तनों के नीचे इकट्ठा कर दिया। कपड़ा वहीं अटका दिया गया। अब मम्मी का पूरा पेट और पसलियाँ नंगी थीं।
उसी हाथ से उसने नीचे की तरफ़ भी काम किया। उनकी सलवार को पकड़कर तीन इंच नीचे खींच दिया। नाभि के गड्ढे से काफ़ी नीचे तक कपड़ा सरक गया। गहरी नाभि पूरी तरह बेपर्दा हो गई।
मम्मी के मुँह से एक लंबी, दबी हुई कराह निकल गई। “आह्ह…” शरीर काँप उठा।
मम्मी ने झटके से उसके हाथ पकड़ने की कोशिश की। “नहीं… राहुल… मत करो…”
लेकिन राहुल ने उनके हाथ आसानी से हटा दिए। कुर्ता स्तनों के ठीक नीचे अटका हुआ था और सलवार नाभि से तीन इंच नीचे। मम्मी का गोरा, चिकना पेट नंगा था।
मेरी साँसें अटक गईं। मेरा हाथ और तेज़ हो गया। उत्तेजना सिर तक चढ़ गई थी।
राहुल ने मम्मी के कान के पास मुँह लाते हुए कहा, “पंकज सो रहा है न? तो फिर डर किस बात का?”
यह कहते हुए उसने मम्मी के कान की लौ को मुँह में भर लिया। एक पल के लिए मम्मी के मुँह से हल्की कराह निकली और उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
मम्मी की आँखें अभी भी मेरे कमरे के अँधेरे दरवाज़े पर थीं। वे काँप रही थीं। उनके नंगे पेट पर राहुल की उंगलियाँ घूम रही थीं—नाभि के आसपास, फिर थोड़ा ऊपर, फिर नीचे। हर स्पर्श पर उनके मुँह से हल्की कराहें निकल रही थीं।
मैं पागल हो रहा था।
राहुल ने मम्मी के नंगे पेट पर अपना गरम हाथ फेरा और धीरे से बोला, “कितना मुलायम शरीर है आपका आंटी… पंकज को पता भी नहीं होगा कि उसकी माँ कितनी… हम्म।”
मम्मी ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ काँप रहे थे। एक आँसू उनकी आँख से निकलकर गाल पर बह गया। एक और कराह उनके गले से फूट निकली।
और मैं अँधेरे में बैठा, हाँफता हुआ, अपनी माँ का नंगा पेट देखता रहा।


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