17-08-2026, 09:14 AM
रामू जी का हाथ अभी भी रुही के गाल पर था। थप्पड़ की हल्की जलन बाकी थी। गले में शराब की जलन बाकी थी। लेकिन सबसे ज्यादा जलन अंदर थी—कहीं सीने के पीछे।
रुही की आँखें अभी भी बंद थीं। वह साँस लेने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हर साँस के साथ एक अजीब सा घुटन सा महसूस हो रहा था। शरीर रामू के बिल्कुल सटा हुआ था, उनके बड़े हाथ उसकी कमर पर मालिकाना अंदाज़ में रखे हुए थे। बाहर से वह पूरी तरह समर्पित दिख रही थी। अंदर कुछ और चल रहा था।
एक हिस्सा उससे नाराज़ था।
तुमने मना किया था। उन्होंने थप्पड़ मारा। उन्होंने ज़बरदस्ती तुम्हारे मुँह में शराब डाली। बार-बार।
दूसरा हिस्सा… शांत था। लगभग राहत महसूस कर रहा था।
कम से कम फैसला किसी और ने ले लिया। तुम्हें सोचना नहीं पड़ा। बस मानना पड़ा।
यही टेंशन उसे अंदर से फाड़ रही थी।
शर्म थी—सोनिया और जामिल के सामने इतना बेबस होने की।
डर था—कि रामू का नशा और बढ़ेगा, और वो और आगे बढ़ेंगे।
और उसके नीचे, बहुत गहराई में, एक काली सी उत्तेजना थी। जिसने थप्पड़ खाया था, जिसने ज़बरदस्ती मुँह खोला था, वही हिस्सा अब और गीला हो रहा था।
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। “आँखें खोल।”
रुही ने धीरे से आँखें खोलीं। आँसू अभी भी कोनों में थे। वह उनकी आँखों में नहीं देख पा रही थी। नज़र झुकी हुई थी।
“देख मुझे,” रामू ने कहा। आवाज़ में नशा था, लेकिन सख्ती बाकी थी।
रुही ने आँखें उठाईं। एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं। उस एक पल में बहुत कुछ था—मालिकाना हक, थोड़ी सी क्रूरता, और उसके पीछे एक अजीब सा कब्ज़ा। रुही की पुतलियाँ काँपीं। उसने फिर से नज़र झुका ली।
अंदर आवाज़ें चल रही थीं।
तुमने खुद चाहा था दो रात उनके नीचे बिताना।
तुमने खुद कहा था—‘जैसे चाहो’।
अब जब वे ‘जैसे चाहो’ कर रहे हैं, तो सीना क्यों तन रहा है?
लेकिन सीना तन रहा था। आँसू आ रहे थे। और उसी समय जाँघें भींच रही थीं।
सोनिया की हल्की हँसी दूर से सुनाई दी। जामिल कुछ बोल रहा था। लेकिन रुही को उनकी बातें साफ नहीं सुनाई दे रही थीं। पूरा ध्यान अंदर की खिंचाव पर था—समर्पण और विरोध के बीच की वो पतली सी रेखा, जो अब लगभग टूट चुकी थी।
रामू ने उसका सिर अपनी छाती से लगा लिया। हाथ उसके बालों में था। बाहर से ये आलिंगन लग रहा था। अंदर रुही महसूस कर रही थी कि अब भागने की कोई जगह नहीं बची।
दो रात अभी शुरू भी नहीं हुई थीं।
और वह पहले ही हार चुकी थी।
रुही की आँखें अभी भी बंद थीं। वह साँस लेने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हर साँस के साथ एक अजीब सा घुटन सा महसूस हो रहा था। शरीर रामू के बिल्कुल सटा हुआ था, उनके बड़े हाथ उसकी कमर पर मालिकाना अंदाज़ में रखे हुए थे। बाहर से वह पूरी तरह समर्पित दिख रही थी। अंदर कुछ और चल रहा था।
एक हिस्सा उससे नाराज़ था।
तुमने मना किया था। उन्होंने थप्पड़ मारा। उन्होंने ज़बरदस्ती तुम्हारे मुँह में शराब डाली। बार-बार।
दूसरा हिस्सा… शांत था। लगभग राहत महसूस कर रहा था।
कम से कम फैसला किसी और ने ले लिया। तुम्हें सोचना नहीं पड़ा। बस मानना पड़ा।
यही टेंशन उसे अंदर से फाड़ रही थी।
शर्म थी—सोनिया और जामिल के सामने इतना बेबस होने की।
डर था—कि रामू का नशा और बढ़ेगा, और वो और आगे बढ़ेंगे।
और उसके नीचे, बहुत गहराई में, एक काली सी उत्तेजना थी। जिसने थप्पड़ खाया था, जिसने ज़बरदस्ती मुँह खोला था, वही हिस्सा अब और गीला हो रहा था।
रामू ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। “आँखें खोल।”
रुही ने धीरे से आँखें खोलीं। आँसू अभी भी कोनों में थे। वह उनकी आँखों में नहीं देख पा रही थी। नज़र झुकी हुई थी।
“देख मुझे,” रामू ने कहा। आवाज़ में नशा था, लेकिन सख्ती बाकी थी।
रुही ने आँखें उठाईं। एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं। उस एक पल में बहुत कुछ था—मालिकाना हक, थोड़ी सी क्रूरता, और उसके पीछे एक अजीब सा कब्ज़ा। रुही की पुतलियाँ काँपीं। उसने फिर से नज़र झुका ली।
अंदर आवाज़ें चल रही थीं।
तुमने खुद चाहा था दो रात उनके नीचे बिताना।
तुमने खुद कहा था—‘जैसे चाहो’।
अब जब वे ‘जैसे चाहो’ कर रहे हैं, तो सीना क्यों तन रहा है?
लेकिन सीना तन रहा था। आँसू आ रहे थे। और उसी समय जाँघें भींच रही थीं।
सोनिया की हल्की हँसी दूर से सुनाई दी। जामिल कुछ बोल रहा था। लेकिन रुही को उनकी बातें साफ नहीं सुनाई दे रही थीं। पूरा ध्यान अंदर की खिंचाव पर था—समर्पण और विरोध के बीच की वो पतली सी रेखा, जो अब लगभग टूट चुकी थी।
रामू ने उसका सिर अपनी छाती से लगा लिया। हाथ उसके बालों में था। बाहर से ये आलिंगन लग रहा था। अंदर रुही महसूस कर रही थी कि अब भागने की कोई जगह नहीं बची।
दो रात अभी शुरू भी नहीं हुई थीं।
और वह पहले ही हार चुकी थी।


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