17-08-2026, 09:12 AM
रामू जी का तीसरा पेग भी खत्म हो चुका था। नशा अब आँखों में साफ उतर आया था। आवाज़ भारी हो गई थी, हाथों में एक अलग तरह की मर्दाना सख्ती आ गई थी।
उन्होंने फिर से रुही का चेहरा पकड़ा। दोनों हाथों से गाल दबाए और मुँह खोलने की कोशिश की।
“खोल,” उन्होंने कहा।
रुही ने सिर हिलाया। आवाज़ में डर और संकोच दोनों थे, “नहीं रामू जी… प्लीज। गला जल जाता है… एक बार काफी था…”
रामू की आँखें सिकुड़ गईं। नशे में उनकी सहानुभूति कम हो चुकी थी। उन्होंने रुही के चेहरे पर एक हल्का सा थप्पड़ मारा—जोर का नहीं, लेकिन काफी सख्त था कि रुही की गर्दन झटक गई। गाल पर हल्की लालिमा फैल गई।
फिर उन्होंने बहुत ही मर्दाना, भारी और सख्त आवाज़ में कहा,
“मैंने कहा खोल। ये मेरा हक़ है। तू मेरी है। आज रात तेरा मुँह भी मेरा है। खोल।”
रुही की आँखें भर आईं। वह बेबस हो गई। थप्पड़ की जलन गाल पर थी, और रामू की आवाज़ में वो मालिकाना अंदाज़ था जिससे इंकार करने की हिम्मत नहीं बचती थी। उसने काँपते हुए धीरे-धीरे अपने होठ खोल दिए। आँखें बंद कर लीं। बेचारी की तरह इंतज़ार करने लगी।
रामू ने बड़ा घूँट भरा। फिर अपना मुँह उसके खुले मुँह पर रख दिया और पूरी शराब उसके अंदर उड़ेल दी।
रुही ने इस बार निगलने की कोशिश की। गला फिर जला, आँखों से आँसू निकल आए, लेकिन उसने बाहर नहीं फेंकी। कुछ बूँदें कोनों से बह निकलीं, बाकी उसने बर्दाश्त कर ली।
रामू ने उसका मुँह नहीं छोड़ा।
“और,” उन्होंने बस इतना कहा।
फिर से घूँट भरा। फिर से रुही के मुँह में डाल दिया।
तीसरी बार। चौथी बार।
हर बार रुही के गाल पर उनकी उंगलियों का दबाव बढ़ता जा रहा था। हर बार वह थोड़ी और काँप रही थी। आँसू उसकी आँखों से लगातार बह रहे थे—शर्म के, जलन के, और एक अजीब सी समर्पण वाली कमजोरी के।
पाँचवी बार जब रामू ने फिर शराब उनके मुँह से उसके मुँह में डाली, तो रुही ने सिर्फ एक हल्की सी सिसकारी निकाली। अब वह विरोध नहीं कर रही थी। बस मुँह खोले हुए, आँखें बंद किए, उनकी दी हुई हर घूँट को निगल रही थी।
सामने सोनिया और जामिल चुपचाप देख रहे थे। सोनिया की साँसें तेज़ थीं। जामिल ने उसके कान में कुछ कहा, लेकिन आवाज़ कमरे तक नहीं पहुँची।
रामू ने आखिरी बार रुही के गीले होठों को अपने अंगूठे से पोछा। उसकी आवाज़ अभी भी सख्त थी, लेकिन उसमें एक मालिकाना संतुष्टि थी।
“अब समझ गई? जब मैं कहूँ, तब खोलना। तेरा मुँह मेरा है।”
रुही ने आँखें नहीं खोलीं। गला जल रहा था, होठ काँप रहे थे, और गाल पर थप्पड़ की हल्की जलन बाकी थी। उसने बस धीरे से सिर हिलाया और फुसफुसाई—
“हाँ… रामू जी।”
उसकी आवाज़ में अब सिर्फ समर्पण बचा था। बेबसी और एक गहरी, डूबी हुई स्वीकृति।
उन्होंने फिर से रुही का चेहरा पकड़ा। दोनों हाथों से गाल दबाए और मुँह खोलने की कोशिश की।
“खोल,” उन्होंने कहा।
रुही ने सिर हिलाया। आवाज़ में डर और संकोच दोनों थे, “नहीं रामू जी… प्लीज। गला जल जाता है… एक बार काफी था…”
रामू की आँखें सिकुड़ गईं। नशे में उनकी सहानुभूति कम हो चुकी थी। उन्होंने रुही के चेहरे पर एक हल्का सा थप्पड़ मारा—जोर का नहीं, लेकिन काफी सख्त था कि रुही की गर्दन झटक गई। गाल पर हल्की लालिमा फैल गई।
फिर उन्होंने बहुत ही मर्दाना, भारी और सख्त आवाज़ में कहा,
“मैंने कहा खोल। ये मेरा हक़ है। तू मेरी है। आज रात तेरा मुँह भी मेरा है। खोल।”
रुही की आँखें भर आईं। वह बेबस हो गई। थप्पड़ की जलन गाल पर थी, और रामू की आवाज़ में वो मालिकाना अंदाज़ था जिससे इंकार करने की हिम्मत नहीं बचती थी। उसने काँपते हुए धीरे-धीरे अपने होठ खोल दिए। आँखें बंद कर लीं। बेचारी की तरह इंतज़ार करने लगी।
रामू ने बड़ा घूँट भरा। फिर अपना मुँह उसके खुले मुँह पर रख दिया और पूरी शराब उसके अंदर उड़ेल दी।
रुही ने इस बार निगलने की कोशिश की। गला फिर जला, आँखों से आँसू निकल आए, लेकिन उसने बाहर नहीं फेंकी। कुछ बूँदें कोनों से बह निकलीं, बाकी उसने बर्दाश्त कर ली।
रामू ने उसका मुँह नहीं छोड़ा।
“और,” उन्होंने बस इतना कहा।
फिर से घूँट भरा। फिर से रुही के मुँह में डाल दिया।
तीसरी बार। चौथी बार।
हर बार रुही के गाल पर उनकी उंगलियों का दबाव बढ़ता जा रहा था। हर बार वह थोड़ी और काँप रही थी। आँसू उसकी आँखों से लगातार बह रहे थे—शर्म के, जलन के, और एक अजीब सी समर्पण वाली कमजोरी के।
पाँचवी बार जब रामू ने फिर शराब उनके मुँह से उसके मुँह में डाली, तो रुही ने सिर्फ एक हल्की सी सिसकारी निकाली। अब वह विरोध नहीं कर रही थी। बस मुँह खोले हुए, आँखें बंद किए, उनकी दी हुई हर घूँट को निगल रही थी।
सामने सोनिया और जामिल चुपचाप देख रहे थे। सोनिया की साँसें तेज़ थीं। जामिल ने उसके कान में कुछ कहा, लेकिन आवाज़ कमरे तक नहीं पहुँची।
रामू ने आखिरी बार रुही के गीले होठों को अपने अंगूठे से पोछा। उसकी आवाज़ अभी भी सख्त थी, लेकिन उसमें एक मालिकाना संतुष्टि थी।
“अब समझ गई? जब मैं कहूँ, तब खोलना। तेरा मुँह मेरा है।”
रुही ने आँखें नहीं खोलीं। गला जल रहा था, होठ काँप रहे थे, और गाल पर थप्पड़ की हल्की जलन बाकी थी। उसने बस धीरे से सिर हिलाया और फुसफुसाई—
“हाँ… रामू जी।”
उसकी आवाज़ में अब सिर्फ समर्पण बचा था। बेबसी और एक गहरी, डूबी हुई स्वीकृति।


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