17-08-2026, 08:03 AM
करीब 9 बजे, दुकान की उस छोटी सी खिड़की से जो दुकान के अंदर से घर की तरफ खुलती थी, मम्मी की आवाज़ आई। "बेटा, खाना घर बैठ कर खाओगे या दुकान पर ही ले आऊं?" उनकी आवाज़ में वही पुरानी सादगी, मासूमियत और ममता भरी मुस्कान थी। वे बिल्कुल शांत और खिली खिली लग रही थीं, जैसे उनके चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि का भाव हो।
उन्हें देखकर मेरे मन में एक विचार आया कि अगर मैं घर जाकर खाना खाऊँगा, तो अंकल और घर की असली स्थिति का पता चल जाएगा। मैं तो बस यही दिखावा कर रहा था कि मैं सुबह सुबह मंदिर गया हुआ था, जबकि सच तो यह था कि मैं वहीं मौजूद था। **मुझे उस समय यह समझ नहीं आ रहा था कि अंकल ने कितनी चालाकी से यह सब किया था। मुझे तब तक यह एहसास नहीं था कि अंकल ने जानबूझकर मुझे अपने उस विकराल लंड का रूप दिखाया था और उसे माँ की चूत में फिसलते हुए दिखाया था। मुझे लगा कि वह सब बस एक इत्तेफाक था, पर असल में शायद कुछ और ही होने वाला था ,जिसकी भूमिका खुद कुदरत बंद रही थी।**
मैंने कहा, "मैं घर में बैठ कर ही खा लेता हूँ, आप खाना लगा दो।" मम्मी बोलीं, "चलो, मैं खाना लगा कर आती हूँ, तुम भी खा लो और अंकल भी खा लेंगे। आज उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, तो उन्होंने छुट्टी ले ली है और अभी आराम कर रहे हैं। तुम दोनों खा लो, तब तक मैं दुकान देख लेती हूँ।" इसके बाद मम्मी खाना लगा कर दुकान पर आ गईं और मैं घर चला गया।
तभी खाना खाते समय अंकल ने अचानक मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी और डर साफ़ दिख रहा था। उन्हें पक्का यकीन था कि मैंने उन्हें देख लिया है, और इसी डर से वो घबराए हुए थे कि कहीं मैं उनकी पोल न खोल दूँ।
मेरे मन यही था के अंकल को बिल्कुल नहीं पता के मैं खिड़की से सब कुश देख चुका था,मैं अपनी थाली में नीचे देख रहा था और चुपचाप खाना खा रहा था। मैं नहीं चाहता था कि अंकल को ज़रा भी शक हो कि मुझे सब पता है। मैं तो बस चुपचाप छुपकर देखना चाहता था, क्योंकि सालों से मेरे मन में ये इच्छा थी। अगर उन्हें पता चल जाता कि मैंने सब देखा है, तो शायद मुझे आगे कभी ऐसा देखने का मौका ही न मिलता। इसलिए मैं पूरी कोशिश कर रहा था कि मैं बिल्कुल सीधा सादा बच्चा बना रहूँ और उन्हें लगे कि मुझे कुछ नहीं पता।
पर अंकल की वो घूरती हुई और बेचैन आँखें मुझे बार बार महसूस करा रही थीं कि वो मेरे बारे में ही सोच रहे हैं,पर क्या सोच रहे है समझ नहीं पा रहा था।
दोपहर के करीब 2:40 बज रहे थे। मैंने अपने दोस्त से कहा, "5 मिनट रुको, मुझे घर में कोई काम है, मैं जा के आता हूँ।" मैं घर के अंदर गया। घर में पसरे उस सन्नाटे के बीच मुझे अंकल के कमरे से कुछ सिसकियाँ सुनाई दे रही थीं।
मैं दबे पाँव उस कमरे की ओर बढ़ा। जैसे ही मैंने दरवाज़े की दरार से अंदर झाँका, मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं।
कमरे के अंदर का नज़ारा इतना **गंदा और उत्तेजक** था कि मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। मम्मी बिस्तर पर थीं, और उनकी हालत देखकर मेरा गला सूख गया। उनके शरीर पर कपड़े पूरी तरह से अस्त व्यस्त थे और उनकी त्वचा पर पसीने की चमक साफ़ दिख रही थी। अंकल उनके ऊपर थे और उनके बीच की **जबरदस्त और बेकाबू** हलचल इतनी तीव्र थी कि कमरे का तापमान बढ़ता हुआ महसूस हो रहा था। मम्मी की वे सिसकियाँ अब और भी गहरी और **कामुक** हो गई थीं। जब भी अंकल उनके शरीर के साथ एक खास लय में **धक्के मारते और रगड़ते** थे, मम्मी के मुँह से एक लंबी और **गंदी** आह निकलती। उनकी आँखें आधी बंद थीं और वे पूरी तरह से उस **अत्यधिक कामुक** अहसास में डूबी हुई थीं।
अंकल की भारी मर्दानगी और मम्मी के शरीर का वह **रसीला और मांसल** मिलन देखकर मेरे अंदर एक अजीब सी **हवस की** लहर दौड़ गई। उनके अंगों के बीच से निकलने वाला **गीलापन और चिपचिपा पानी** बिस्तर की चादर को भिगो रहा था, और जब अंकल का शरीर मम्मी के शरीर से टकराता, तो वह **गीलापन और तरल पदार्थ** एक गंदी आवाज़ के साथ बाहर छलक रहा था। उनकी सिसकियाँ और उनके शरीर के टकराने की वह **चप चप** आवाज़ मेरे कानों में किसी नशीले संगीत की तरह गूँज रही थी। मैं बस वहीं खड़ा होकर उस **अश्लील** और बेकाबू होते दृश्य को अपनी आँखों में भर लेना चाहता था।
लेकिन जैसे ही मैं उस **कातिलाना** नज़ारे में और गहराई से डूबने की कोशिश कर रहा था, अचानक मुझे एक अजीब सी घबराहट हुई। मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। बिना कुछ सोचे समझे, मैं तेज़ क़दमों से वहाँ से बाहर की ओर भागा। मैं उस **हवस भरे** नज़ारे के प्रभाव से बाहर निकलना चाहता था, लेकिन मैं यह बिल्कुल नहीं जानता था कि उस **खतरनाक** पल में, अंकल की नज़रें दरवाज़े की उस दरार से सीधे मेरी आँखों में जा धंसी थीं। उन्होंने मुझे देख लिया था। उनकी आँखों में पकड़ी जाने का डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी शिकारी चमक थी, जैसे वे मुझे उस दृश्य का हिस्सा बनने के लिए चुनौती दे रहे हों। पर मैं उस पल की तीव्रता को झेल नहीं पाया और बदहवास होकर बाहर निकल आया।
उन्हें देखकर मेरे मन में एक विचार आया कि अगर मैं घर जाकर खाना खाऊँगा, तो अंकल और घर की असली स्थिति का पता चल जाएगा। मैं तो बस यही दिखावा कर रहा था कि मैं सुबह सुबह मंदिर गया हुआ था, जबकि सच तो यह था कि मैं वहीं मौजूद था। **मुझे उस समय यह समझ नहीं आ रहा था कि अंकल ने कितनी चालाकी से यह सब किया था। मुझे तब तक यह एहसास नहीं था कि अंकल ने जानबूझकर मुझे अपने उस विकराल लंड का रूप दिखाया था और उसे माँ की चूत में फिसलते हुए दिखाया था। मुझे लगा कि वह सब बस एक इत्तेफाक था, पर असल में शायद कुछ और ही होने वाला था ,जिसकी भूमिका खुद कुदरत बंद रही थी।**
मैंने कहा, "मैं घर में बैठ कर ही खा लेता हूँ, आप खाना लगा दो।" मम्मी बोलीं, "चलो, मैं खाना लगा कर आती हूँ, तुम भी खा लो और अंकल भी खा लेंगे। आज उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, तो उन्होंने छुट्टी ले ली है और अभी आराम कर रहे हैं। तुम दोनों खा लो, तब तक मैं दुकान देख लेती हूँ।" इसके बाद मम्मी खाना लगा कर दुकान पर आ गईं और मैं घर चला गया।
तभी खाना खाते समय अंकल ने अचानक मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी और डर साफ़ दिख रहा था। उन्हें पक्का यकीन था कि मैंने उन्हें देख लिया है, और इसी डर से वो घबराए हुए थे कि कहीं मैं उनकी पोल न खोल दूँ।
मेरे मन यही था के अंकल को बिल्कुल नहीं पता के मैं खिड़की से सब कुश देख चुका था,मैं अपनी थाली में नीचे देख रहा था और चुपचाप खाना खा रहा था। मैं नहीं चाहता था कि अंकल को ज़रा भी शक हो कि मुझे सब पता है। मैं तो बस चुपचाप छुपकर देखना चाहता था, क्योंकि सालों से मेरे मन में ये इच्छा थी। अगर उन्हें पता चल जाता कि मैंने सब देखा है, तो शायद मुझे आगे कभी ऐसा देखने का मौका ही न मिलता। इसलिए मैं पूरी कोशिश कर रहा था कि मैं बिल्कुल सीधा सादा बच्चा बना रहूँ और उन्हें लगे कि मुझे कुछ नहीं पता।
पर अंकल की वो घूरती हुई और बेचैन आँखें मुझे बार बार महसूस करा रही थीं कि वो मेरे बारे में ही सोच रहे हैं,पर क्या सोच रहे है समझ नहीं पा रहा था।
दोपहर के करीब 2:40 बज रहे थे। मैंने अपने दोस्त से कहा, "5 मिनट रुको, मुझे घर में कोई काम है, मैं जा के आता हूँ।" मैं घर के अंदर गया। घर में पसरे उस सन्नाटे के बीच मुझे अंकल के कमरे से कुछ सिसकियाँ सुनाई दे रही थीं।
मैं दबे पाँव उस कमरे की ओर बढ़ा। जैसे ही मैंने दरवाज़े की दरार से अंदर झाँका, मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं।
कमरे के अंदर का नज़ारा इतना **गंदा और उत्तेजक** था कि मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। मम्मी बिस्तर पर थीं, और उनकी हालत देखकर मेरा गला सूख गया। उनके शरीर पर कपड़े पूरी तरह से अस्त व्यस्त थे और उनकी त्वचा पर पसीने की चमक साफ़ दिख रही थी। अंकल उनके ऊपर थे और उनके बीच की **जबरदस्त और बेकाबू** हलचल इतनी तीव्र थी कि कमरे का तापमान बढ़ता हुआ महसूस हो रहा था। मम्मी की वे सिसकियाँ अब और भी गहरी और **कामुक** हो गई थीं। जब भी अंकल उनके शरीर के साथ एक खास लय में **धक्के मारते और रगड़ते** थे, मम्मी के मुँह से एक लंबी और **गंदी** आह निकलती। उनकी आँखें आधी बंद थीं और वे पूरी तरह से उस **अत्यधिक कामुक** अहसास में डूबी हुई थीं।
अंकल की भारी मर्दानगी और मम्मी के शरीर का वह **रसीला और मांसल** मिलन देखकर मेरे अंदर एक अजीब सी **हवस की** लहर दौड़ गई। उनके अंगों के बीच से निकलने वाला **गीलापन और चिपचिपा पानी** बिस्तर की चादर को भिगो रहा था, और जब अंकल का शरीर मम्मी के शरीर से टकराता, तो वह **गीलापन और तरल पदार्थ** एक गंदी आवाज़ के साथ बाहर छलक रहा था। उनकी सिसकियाँ और उनके शरीर के टकराने की वह **चप चप** आवाज़ मेरे कानों में किसी नशीले संगीत की तरह गूँज रही थी। मैं बस वहीं खड़ा होकर उस **अश्लील** और बेकाबू होते दृश्य को अपनी आँखों में भर लेना चाहता था।
लेकिन जैसे ही मैं उस **कातिलाना** नज़ारे में और गहराई से डूबने की कोशिश कर रहा था, अचानक मुझे एक अजीब सी घबराहट हुई। मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। बिना कुछ सोचे समझे, मैं तेज़ क़दमों से वहाँ से बाहर की ओर भागा। मैं उस **हवस भरे** नज़ारे के प्रभाव से बाहर निकलना चाहता था, लेकिन मैं यह बिल्कुल नहीं जानता था कि उस **खतरनाक** पल में, अंकल की नज़रें दरवाज़े की उस दरार से सीधे मेरी आँखों में जा धंसी थीं। उन्होंने मुझे देख लिया था। उनकी आँखों में पकड़ी जाने का डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी शिकारी चमक थी, जैसे वे मुझे उस दृश्य का हिस्सा बनने के लिए चुनौती दे रहे हों। पर मैं उस पल की तीव्रता को झेल नहीं पाया और बदहवास होकर बाहर निकल आया।


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