16-08-2026, 05:30 PM
"ठीक है, अब खेल खत्म करो और इसे वापस वैसा ही करते हैं जैसा यह था। वरना अगर इस वक्त चड्डेर्जी अंकल अंदर आ गए, तो हम सबकी ऐसी हालत होगी कि हम अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं भूलेंगे," हरीश ने एक शरारती मुस्कान के साथ कहा, उसकी आवाज़ में घबराहट और उत्तेजना का एक अजीब मिश्रण था।
उसने तुरंत चैताली की ओर देखा, जिसकी आँखें अभी भी शून्य में ताक रही थीं, और उसे एक सख्त आदेश दिया, "चैताली, अब उठो। जल्दी करो और अपने सारे कपड़े पहन लो। एक-एक चीज़ बिल्कुल वैसी ही होनी चाहिए जैसे तुम ऑफिस से घर लौटकर आई थीं। कोई भी कमी नहीं रहनी चाहिए।"
चैताली महज़ एक कठपुतली की तरह हरकत कर रही थी। उसने पूरी तरह से यांत्रिक तरीके से, बिना किसी भाव के, ज़मीन से अपनी पैंटी उठाई और उसे पहन लिया। इसके बाद उसने पेटीकोट बांधा, अपना ब्लाउज ठीक किया और अपनी उस रेशमी साड़ी की तहों को बड़ी सावधानी से वापस अपने शरीर पर लपेट लिया। अंत में, उसने अपने बिखरे हुए बालों को उंगलियों से संवारा और ठीक उसी मुद्रा और स्थिति में स्थिर होकर खड़ी हो गई, जिस स्थिति में वह सम्मोहित होने से ठीक पहले थी।
हरीश धीरे से उसके करीब गया। वह उसके चेहरे के इतने पास था कि वह उसकी सांसों को महसूस कर सकती थी। उसने चैताली की स्थिर आँखों में गहराई से देखा और अचानक अपनी उंगलियों से एक ज़ोरदार चुटकी बजाई।
'चटाक!'
वह आवाज़ कमरे की खामोशी को चीर गई। चैताली की पलकें एक पल के लिए तेज़ी से झपकीं। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वह किसी गहरे सपने से अचानक जाग गई हो। उसने अपनी आँखें मलीं और थोड़ा भ्रमित होकर अपने आसपास के माहौल को देखा। वह उसी सोफे पर बैठी थी, और उसके ठीक सामने हरीश और आदित्य खड़े थे, जो उसे बड़े ध्यान से देख रहे थे।
"तो... मैं कहाँ थी? मैं क्या कह रही थी?" चैताली ने अपनी भवों को सिकोड़ते हुए पूछा। उसके दिमाग में एक धुंधली सी याद थी, लेकिन वह यह समझ नहीं पा रही थी कि पिछले कुछ मिनटों में क्या हुआ था। "ओह, हाँ, याद आया... मैं कह रही थी कि आज ऑफिस में काम का बहुत दबाव था, मैं बहुत थक गई हूँ। हरीश, तुम कुछ कह रहे थे रिलैक्सेशन या आराम के बारे में?"
हरीश के चेहरे पर एक बेहद मासूम और भोली मुस्कान फैल गई, जो उसकी असलियत को पूरी तरह छुपा रही थी। "नहीं आंटी, मैं बस यह कह रहा था कि आप सच में बहुत थकी हुई लग रही हैं। आपके चेहरे से साफ़ दिख रहा है कि आप तनाव में हैं। आपको अब और समय बर्बाद नहीं करना चाहिए, बस जाकर थोड़ा आराम करना चाहिए।"
"हाँ, तुम सही कह रहे हो बेटा। शायद मुझे वाकई एक छोटी सी नींद की ज़रूरत है। मैं अपने कमरे में जा रही हूँ," चैताली ने एक हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया और बिना किसी संदेह के अपने कमरे की ओर बढ़ गई।
जैसे ही वह कमरे की चौखट से ओझल हुई, हरीश और आदित्य के चेहरे से वह मासूमियत गायब हो गई। दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा और उनके चेहरों पर एक विजयी, गहरे संतोष और शैतानी चमक वाली मुस्कान तैर गई।
"भाई, यह तो वाकई कमाल था! यकीन नहीं होता कि यह इतनी आसानी से काम कर गया," आदित्य ने उत्तेजना में कहा।
हरीश ने हाथ में पकड़े हुए कैमरे की स्क्रीन की ओर देखा, जिसमें चैताली की वह सारी नंगी और कामुक तस्वीरें कैद थीं जो उन्होंने अभी-अभी ली थीं। उसने एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा, "यह तो बस एक ट्रेलर था, आदित्य। असली खेल तो अब शुरू हुआ है। अभी बहुत सारी 'रिलैक्सेशन' बाकी है।"


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