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Thriller बेटे के दोस्त ने आंटी को सम्मोहित(hypnotize) किया....फिर क्या हुआ?
#8

"इतना इंतज़ार काफी है," हरीश की आवाज़ में एक अजीब सा अधिकार था, जो कमरे की खामोशी को चीरते हुए गूँजा। उसने चैताली की ओर देखा, उसकी आँखों में एक ऐसी भूख थी जो केवल आदेश देने से शांत होती थी। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के, एक कठोर लहजे में निर्देश दिया, "चैताली, अपनी पैंटी उतारो। अभी।"

चैताली के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने धीरे से अपने हाथों को नीचे ले जाकर अपनी कमर पर बंधी उस काली लेसी पैंटी के महीन किनारों को पकड़ा। कपड़े का वह छोटा सा टुकड़ा उसके शरीर के सबसे निजी हिस्से को जकड़े हुए था। उसने एक गहरी सांस ली और धीरे-धीरे, बहुत सावधानी से, उस रेशमी कपड़े को नीचे की ओर खींचना शुरू किया। जैसे-जैसे कपड़ा नीचे सरक रहा था, उसकी धड़कनें तेज़ होती जा रही थीं। अंततः, वह पैंटी उसके पैरों से अलग होकर फर्श पर गिर गई और अब वह पूरी तरह से नंगी थी।

उसकी देह अब बिना किसी पर्दे के उजागर थी। उसके भारी, उभरे हुए बोबे उसकी सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, उसकी चौड़ी कमर और कूल्हों का उभार कमरे की मद्धम रोशनी में साफ दिख रहा था। सबसे ज़्यादा ध्यान खींचने वाला था उसका वह हिस्सा, जहाँ घने काले बाल उसकी गुलाबी और संवेदनशील चूत को घेरे हुए थे। वह अब पूरी तरह से बेपर्दा और लाचार थी।

हरीश ने एक कुटिल मुस्कान के साथ आदित्य की ओर देखा, जो यह सारा मंज़र अपनी फटी आँखों से देख रहा था। "आदित्य," हरीश ने उसे पुकारते हुए कहा, "सिर्फ देखना काफी नहीं है। जाओ, उस पैंटी को उठाओ और उसे गहराई से सूंघो। महसूस करो कि तुम्हारी माँ की चूत की असल महक कैसी होती है।"

आदित्य के लिए यह एक ऐसा क्षण था जहाँ उसकी दुनिया सिमट कर सिर्फ उस काले कपड़े के टुकड़े पर आ गई थी। उसने कांपते हाथों से फर्श पर पड़ी उस गीली पैंटी को उठाया। जैसे ही उसने उसे अपनी नाक के एकदम करीब लाया, एक तीखी, कामुक और पसीने से भीगी हुई गंध उसके नथुनों से होते हुए सीधे उसके दिमाग पर हावी हो गई। यह महक उत्तेजना और वासना का मिश्रण थी। वह मदहोश होकर फुसफुसाया, "भाई... यह तो बहुत ज्यादा गंदी और हॉट है... इसकी गंध मुझे पागल कर रही है।"

"यही तो असली मज़ा है, आदित्य। इस गंध में ही असली नशा है," हरीश ने जवाब दिया। उसने अपनी पकड़ चैताली की चर्बीदार कमर पर मजबूत की और एक झटके से उसे फर्श पर लेटा दिया। चैताली की पीठ ठंडी जमीन से लगी, लेकिन उसका शरीर अंदर से तप रहा था। हरीश ने उसकी आँखों में झांकते हुए आदेश दिया, "अब, चैताली, अपनी उंगलियों का इस्तेमाल करो। अपनी चूत को खुद रगड़ो और हमें दिखाओ कि तुम अंदर से कितनी प्यासी और बड़ी रंडी हो।"

चैताली ने एक गहरी आह भरी और धीरे-धीरे अपनी टांगों को फैलाना शुरू किया। उसकी गुलाबी चूत अब पूरी तरह से खुली हुई थी, जैसे कोई फूल खिल गया हो। उत्तेजना इतनी अधिक थी कि वहां से पारदर्शी, चिपचिपा तरल पदार्थ धीरे-धीरे रिसकर बाहर आ रहा था, जो उसकी कामुकता की गवाही दे रहा था। उसने अपनी मध्यम उंगली उठाई और बहुत धीरे से, सहलाते हुए उसे अपनी चूत के गीले छेद के मुहाने पर रखा और फिर धीरे से उसे अंदर की ओर धकेल दिया।

कमरे की खामोशी अब उन गीली आवाज़ों से भर गई थी। उंगलियों के अंदर जाने और बाहर आने की वह चिपचिपी आवाज़ किसी संगीत की तरह गूंज रही थी। चैताली ने अब अपनी गति बढ़ा दी। उसकी उंगलियाँ तेज़ी से अंदर-बाहर होने लगीं, जिससे वह तरल पदार्थ और भी ज़्यादा बाहर छिटकने लगा। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और उसके गले से धीमी, दर्दभरी लेकिन सुखद कराहें निकलने लगीं। वह पूरी तरह से अपनी ही दुनिया में खो चुकी थी।

"देख रहे हो आदित्य? देखो कैसे अपनी ही चूत को पागलों की तरह रगड़ रही है," हरीश ने उत्तेजित होकर कहा। वह धीरे-धीरे झुकते हुए अपना चेहरा चैताली की खुली जांघों के बीच ले गया। उसकी सांसें चैताली के संवेदनशील अंगों को छू रही थीं। "देख कितना पानी निकल रहा है... इसकी चूत इतनी गीली हो चुकी है, जैसे कोई कामुक झरना बह रहा हो।"

चैताली की सांसें अब उखड़ने लगी थीं। वह अपनी कमर को फर्श से ऊपर-नीचे हिलाकर अपनी उंगलियों के दबाव को और बढ़ा रही थी। उसकी उंगलियाँ अब और गहराई तक जा रही थीं, और वह अपने भगशेफ (क्लिटोरिस) को ज़ोर-ज़ोर से रगड़ रही थी, जिससे उसे मिलने वाला सुख असहनीय होता जा रहा था। वह बस उस चरम आनंद की तलाश में थी, जबकि हरीश और आदित्य उसे इस हालत में देख कर अपनी उत्तेजना की चरम सीमा पर थे।

"आह... ओह... मैं... मैं आने वाली हूँ!" चैताली की आवाज़ एक बेकाबू लहर की तरह निकली। उसका पूरा शरीर एक बिजली के झटके की तरह कमान बन गया, और उसकी मांसपेशियों में एक ऐसा खिंचाव आया जैसे वह किसी अदृश्य ताकत से जकड़ी गई हो। एक जोरदार, तीव्र झटके के साथ उसका शरीर कांप उठा, और उस चरम सुख की लहर ने उसकी चेतना को कुछ पलों के लिए धुंधला कर दिया। उसी क्षण, उसके शरीर के सबसे संवेदनशील हिस्से से एक गर्म फव्वारा छूटा, जिसने नीचे की फर्श को पूरी तरह भिगो दिया। वह पूरी तरह से चरमसुख (climax) की उस गहरी खाई में गिर चुकी थी, जहाँ समय और स्थान का कोई अर्थ नहीं रह जाता। उसकी सांसें उखड़ी हुई थीं और वह पूरी तरह से निढाल हो चुकी थी।

लेकिन हरीश के लिए यह खेल अभी खत्म नहीं हुआ था। वह उसकी इस हालत को देखकर और भी ज्यादा उत्तेजित हो गया था। उसने बिना देर किए चैताली को उसकी कमर से पकड़कर ऊपर उठाया और उसे अपने सामने खड़ा किया। उसकी आँखों में एक अजीब सी भूख थी और चेहरे पर एक विजेता जैसी मुस्कान। 

उसने बिना उसकी आँखों से नज़रें हटाए, अपनी जींस का बटन खोला और ज़िप को नीचे खींचते हुए अपना सख्त, मोटा और पूरी तरह से उत्तेजित लन्ड बाहर निकाला। वह इतना उत्तेजित था कि उसकी नसों में खून का बहाव तेज़ था, और उसके अग्रभाग से गाढ़ा प्री-कम धीरे-धीरे रिस रहा था, जो उसकी चरम उत्तेजना की गवाही दे रहा था।

हरीश की आवाज़ अब भारी और आदेशात्मक हो गई थी। उसने उसकी आँखों में गहराई से देखते हुए कहा, "अब मेरा इनाम देने का वक्त आ गया है, चैताली। बहुत देर हो चुकी है और मेरा सब्र अब जवाब दे रहा है। चलो, अब घुटनों के बल नीचे बैठो और इस लन्ड को अपने मुँह में ले लो। मैं चाहता हूँ कि तुम इसे इतनी शिद्दत और गहराई से चूसो, जैसे तुम अपनी पूरी जिंदगी की भूख इस एक पल में मिटा रही हो। मुझे महसूस होना चाहिए कि तुम मेरी प्यास बुझाने के लिए कितनी बेताब हो।"
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RE: बेटे के दोस्त ने आंटी को सम्मोहित(hypnotize) किया..फिर उसकी चूत मारी - by MohdIqbal - 16-08-2026, 03:52 PM



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