16-08-2026, 10:40 AM
दुकान के उस सन्नाटे में मैं बस पत्थर बना बैठा था। बाहर की दुनिया से मेरा कोई नाता नहीं रह गया था। मेरा दिमाग उस एक ही मंज़र में फँसा हुआ था। प्रदीप अंकल की वो गंदी और नीच आवाज़ मेरे कानों में ज़हर की तरह घुल रही थी। वो जिस तरह से मेरी माँ को लफ़्ज़ों से काट रहे थे, जिस तरह से उन्हें एक 'गिरे हुए' और 'बेशर्म' औरत की तरह ज़लील कर रहे थे, वो सुनकर मेरा दिल जैसे सीने से बाहर निकल कर गिर गया।
मेरा दम घुट रहा था। एक तरफ वो अपमान था जो मेरी माँ की इज़्ज़त को मिट्टी में मिला रहा था, और दूसरी तरफ वो नज़ारा जो मेरी आँखों के सामने घटा था। "क्या सचमुच मेरी माँ इतनी गिरी हुई औरत है?" यह सवाल मेरे दिमाग में किसी हथौड़े की तरह बार बार चोट कर रहा था। मेरा दिल बैठता जा रहा था, एक अजीब सी भारीपन और घबराहट मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।
प्रदीप अंकल का वो लहज़ा, वो ज़िल्लत भरे शब्द "तुम जैसी औरतें सिर्फ इसी लायक हैं" सुनकर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरे ही वजूद को नोच रहा हो, साथ ही एक गहरी शर्मिंदगी और बेबसी मुझे जकड़े हुए थी। मैं खुद से नफरत कर रहा था मेरा मन चीखना चाहता था, पर मेरा गला सूख चुका था। मैं दुकान के काउंटर पर बैठा बस उस अपमान और उस गंदी हकीकत के बोझ तले दबकर रह गया था।
मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा रहा था, लेकिन दिमाग में एक अजीब सी छटपटाहट थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ।
अचानक मुझे याद आया कि पिछले हफ्ते जब मैं शहर के पुराने बाज़ार की उन तंग गलियों से गुज़र रहा था, तो एक पुरानी किताबों की दुकान के कोने में मुझे यह किताब मिली थी। वह दुकान बहुत ही धुंधली और अजीब सी थी, जहाँ सिर्फ पुरानी और कुछ 'वर्जित' मानी जाने वाली किताबें ही मिलती थीं। दुकानदार ने मुझे वह किताब एक मखमली कपड़े में लपेटकर दी थी और उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जैसे वह कोई बहुत बड़ा राज़ बेच रहा हो। उस वक्त मैंने इसे सिर्फ जिज्ञासावश खरीदा था, मैने पता नहीं किस भावना तहत व
कांपते हाथों से किताब निकाली , वह किताब मेरे लिए किसी जीवन रक्षक की तरह सामने आ गई।
मैंने पन्नों को पलटने लगा। मेरी आँखें उन शब्दों पर ठहर गईं जो मेरे दिमाग में चल रहे तूफान को एक ठोस आकार दे रहे थे। किताब के उस अध्याय में एक पति पत्नी के बीच के उस नग्न और बेबाक दृश्य का वर्णन था, जिसे पढ़ते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उसमें लिखा था कि कैसे चरम उत्तेजना के उस पागलपन में पति अपनी पत्नी को गंदे शब्दों से नवाज़ रहा था। वह चिल्लाकर कह रहा था, *"तुझे ऐसी रंडी बनाऊँगा कि तेरा अपना कौठा खोल दूँगा, जहाँ हर कोई आए और तुझे इस्तेमाल करे!"* और सबसे भयानक बात यह थी कि किताब में लिखा था कि पत्नी भी उस गंदे अपमान का आनंद ले रही थी। वह हाँफते हुए और उत्तेजना में डूबी हुई जवाब दे रही थी, *"हाँ! मुझे रंडी बना दो, मुझे रोज़ नए नए लंड चाहिए, मुझे बस तुम्हारी ये गंदी बातें और ये मर्दानगी चाहिए!"*
किताब में आगे लिखा था कि कैसे अगले ही पल वे दोनों पूरी तरह से शांत हो जाते हैं और सुबह होते ही वे फिर से वही सभ्य और मर्यादित पति पत्नी बन जाते हैं। लेखक ने अंत में एक विशेष नोट लिखा था: *"चरम उत्तेजना के क्षणों में इंसान अपनी सामाजिक पहचान और नैतिकता को त्याग देता है; उस वक्त बोले गए शब्द चरित्र का हिस्सा नहीं, बल्कि केवल कामुकता की पराकाष्ठा होते हैं।"* इन शब्दों को पढ़ते ही मेरे मन का बोझ अचानक हल्का होने लगा। मुझे लगा जैसे मुझे कोई जवाब मिल गया हो।
मैं उस सुबह के उस मंजर को याद करने लगा माँ का वह पसीने से लथपथ और चिपचिपा सेक्सी बदन, जो कामवासना के चरम पर पागलों की तरह थरथरा रहा था। उनकी भारी और बेकाबू साँसों की वह गंदी आवाज़ और उनके शरीर की वह बेतहाशा, मदहोश कर देने वाली हरकतें मेरी नसों में बिजली की तरह दौड़ रही थीं। और फिर मेरी यादों के अंधेरे में अंकल का वह विकराल, मोटा और सख्त लंड उभर आया, जो माँ की गीली और तड़पती हुई चूत के साथ एक हिंसक और दरिंदे की तरह खेल रहा था। मैं उस दृश्य को बार बार याद कर रहा था कि कैसे वह गरम और कठोर लंड माँ की कोमल और भीगी हुई चूत के अंदर धंस रहा था और बार बार उस मांस के टुकड़े से टकरा रहा था। वह दृश्य इतना कच्चा, इतना गंदा और इतना असली था कि मुझे अपनी त्वचा पर भी उस मर्दानगी की गर्मी और उस गीलेपन का अहसास होने लगा। मेरा दिमाग बार बार उसी बिंदु पर जाकर रुक जाता जहाँ माँ की वह सुंदर चूत अंकल के उस विशाल और बेकाबू लंड के आगे पूरी तरह से हार मान चुकी थी और उसकी मर्दानगी के नीचे पूरी तरह से दब गई थी। वे गंदी यादें अब मेरे दिमाग से हट नहीं रही थीं, बल्कि वे मेरे वजूद का हिस्सा बनती जा रही थीं।
मेरा दम घुट रहा था। एक तरफ वो अपमान था जो मेरी माँ की इज़्ज़त को मिट्टी में मिला रहा था, और दूसरी तरफ वो नज़ारा जो मेरी आँखों के सामने घटा था। "क्या सचमुच मेरी माँ इतनी गिरी हुई औरत है?" यह सवाल मेरे दिमाग में किसी हथौड़े की तरह बार बार चोट कर रहा था। मेरा दिल बैठता जा रहा था, एक अजीब सी भारीपन और घबराहट मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।
प्रदीप अंकल का वो लहज़ा, वो ज़िल्लत भरे शब्द "तुम जैसी औरतें सिर्फ इसी लायक हैं" सुनकर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरे ही वजूद को नोच रहा हो, साथ ही एक गहरी शर्मिंदगी और बेबसी मुझे जकड़े हुए थी। मैं खुद से नफरत कर रहा था मेरा मन चीखना चाहता था, पर मेरा गला सूख चुका था। मैं दुकान के काउंटर पर बैठा बस उस अपमान और उस गंदी हकीकत के बोझ तले दबकर रह गया था।
मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा रहा था, लेकिन दिमाग में एक अजीब सी छटपटाहट थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ।
अचानक मुझे याद आया कि पिछले हफ्ते जब मैं शहर के पुराने बाज़ार की उन तंग गलियों से गुज़र रहा था, तो एक पुरानी किताबों की दुकान के कोने में मुझे यह किताब मिली थी। वह दुकान बहुत ही धुंधली और अजीब सी थी, जहाँ सिर्फ पुरानी और कुछ 'वर्जित' मानी जाने वाली किताबें ही मिलती थीं। दुकानदार ने मुझे वह किताब एक मखमली कपड़े में लपेटकर दी थी और उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जैसे वह कोई बहुत बड़ा राज़ बेच रहा हो। उस वक्त मैंने इसे सिर्फ जिज्ञासावश खरीदा था, मैने पता नहीं किस भावना तहत व
कांपते हाथों से किताब निकाली , वह किताब मेरे लिए किसी जीवन रक्षक की तरह सामने आ गई।
मैंने पन्नों को पलटने लगा। मेरी आँखें उन शब्दों पर ठहर गईं जो मेरे दिमाग में चल रहे तूफान को एक ठोस आकार दे रहे थे। किताब के उस अध्याय में एक पति पत्नी के बीच के उस नग्न और बेबाक दृश्य का वर्णन था, जिसे पढ़ते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उसमें लिखा था कि कैसे चरम उत्तेजना के उस पागलपन में पति अपनी पत्नी को गंदे शब्दों से नवाज़ रहा था। वह चिल्लाकर कह रहा था, *"तुझे ऐसी रंडी बनाऊँगा कि तेरा अपना कौठा खोल दूँगा, जहाँ हर कोई आए और तुझे इस्तेमाल करे!"* और सबसे भयानक बात यह थी कि किताब में लिखा था कि पत्नी भी उस गंदे अपमान का आनंद ले रही थी। वह हाँफते हुए और उत्तेजना में डूबी हुई जवाब दे रही थी, *"हाँ! मुझे रंडी बना दो, मुझे रोज़ नए नए लंड चाहिए, मुझे बस तुम्हारी ये गंदी बातें और ये मर्दानगी चाहिए!"*
किताब में आगे लिखा था कि कैसे अगले ही पल वे दोनों पूरी तरह से शांत हो जाते हैं और सुबह होते ही वे फिर से वही सभ्य और मर्यादित पति पत्नी बन जाते हैं। लेखक ने अंत में एक विशेष नोट लिखा था: *"चरम उत्तेजना के क्षणों में इंसान अपनी सामाजिक पहचान और नैतिकता को त्याग देता है; उस वक्त बोले गए शब्द चरित्र का हिस्सा नहीं, बल्कि केवल कामुकता की पराकाष्ठा होते हैं।"* इन शब्दों को पढ़ते ही मेरे मन का बोझ अचानक हल्का होने लगा। मुझे लगा जैसे मुझे कोई जवाब मिल गया हो।
मैं उस सुबह के उस मंजर को याद करने लगा माँ का वह पसीने से लथपथ और चिपचिपा सेक्सी बदन, जो कामवासना के चरम पर पागलों की तरह थरथरा रहा था। उनकी भारी और बेकाबू साँसों की वह गंदी आवाज़ और उनके शरीर की वह बेतहाशा, मदहोश कर देने वाली हरकतें मेरी नसों में बिजली की तरह दौड़ रही थीं। और फिर मेरी यादों के अंधेरे में अंकल का वह विकराल, मोटा और सख्त लंड उभर आया, जो माँ की गीली और तड़पती हुई चूत के साथ एक हिंसक और दरिंदे की तरह खेल रहा था। मैं उस दृश्य को बार बार याद कर रहा था कि कैसे वह गरम और कठोर लंड माँ की कोमल और भीगी हुई चूत के अंदर धंस रहा था और बार बार उस मांस के टुकड़े से टकरा रहा था। वह दृश्य इतना कच्चा, इतना गंदा और इतना असली था कि मुझे अपनी त्वचा पर भी उस मर्दानगी की गर्मी और उस गीलेपन का अहसास होने लगा। मेरा दिमाग बार बार उसी बिंदु पर जाकर रुक जाता जहाँ माँ की वह सुंदर चूत अंकल के उस विशाल और बेकाबू लंड के आगे पूरी तरह से हार मान चुकी थी और उसकी मर्दानगी के नीचे पूरी तरह से दब गई थी। वे गंदी यादें अब मेरे दिमाग से हट नहीं रही थीं, बल्कि वे मेरे वजूद का हिस्सा बनती जा रही थीं।


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