15-08-2026, 05:35 PM
मैं कोने में खड़ा होकर अपनी ही नज़रों से भागना चाहता था। मेरी आँखों के सामने जो हो रहा था, वह किसी भयानक दुःस्वप्न जैसा था। मम्मी का वह विवश और आधा टूटा हुआ स्वरूप मुझे अंदर तक झकझोर रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपनी नज़रें हटा लूँ या इस अनैतिकता के साक्षी बने रहूँ। मेरा हृदय ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था और मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी ऐसे पाप का हिस्सा बन रहा हूँ जिसका प्रायश्चित जीवन भर संभव नहीं होगा। उस पल में, नैतिकता और वासना के बीच का संघर्ष अब एक ऐसे बिंदु पर पहुँच गया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचा था।
जैसे ही अंकल ने अपना वस्त्र पूरी तरह नीचे किया, मेरी नज़रें उनके उस अंग पर जाकर जम गईं। वह दृश्य इतना विकराल और डरावना था कि मेरे रोंगटे खड़े हो गए। वह अंग अत्यंत विशाल, शिराओं से भरा हुआ और गहरे रंग का था, जो अपनी कठोरता से एक अनिष्ट का संकेत दे रहा था। उसे देखकर मेरे मन में एक अनजाना सा डर बैठ गया। मैं सोचने लगा कि मम्मी की कोमल और छोटी सी वो जगह इस विशाल और कठोर वस्तु को कैसे बर्दाश्त करेगी? वह दर्द और वह दबाव उनके शरीर को किस तरह झकझोर देगा, यह सोचकर ही मैं भीतर तक सहम गया।
फिर ये सोचकर मन को तसल्ली मिली कि अभी 6-7 घंटे पहले यानी रात के 11बजे ही तो मम्मी इस को अपने भीतर आराम से ले रही थी ,जब अंधेरे कमरे में उस चारपाई पर जो मेरे बेड के पास ही लगाई गई थी दोनों के शरीर टकरा रहे थे और सिसकिया और गंदी बातें सुनाई दे रही थी ।मन में उस दृश्य की याद आते ही वो अंकल के इस भयानक स्वरूप को अपनी मम्मी के अंदर जाता देखने को व्याकुल हो उठा।
अंकल के उस विशाल और शिराओं से भरे विकराल अंग के दर्शन होते ही कमरे का वातावरण पूरी तरह बदल गया
मम्मी का चेहरा भय, शर्म और एक अनचाही उत्तेजना के बीच झूल रहा था। उनकी आँखें पथराई हुई थीं और उनके होंठ कांप रहे थे। उनके चेहरे पर उस विशाल अंग को देखकर एक गहरा संकोच और डर था कि वह उनके शरीर को कैसे छिन्न भिन्न कर देगा। लेकिन उस डर के नीचे एक ऐसी दबी हुई प्रतिक्रिया भी थी जिसे वे चाहकर भी छिपा नहीं पा रही थीं एक ऐसी प्रतिक्रिया जो रात के उन अनुभवों से उपजी थी। उनका पूरा शरीर एक अनचाहे समर्पण की स्थिति में था।
अंकल के चेहरे पर एक क्रूर और अदम्य विजय का भाव था। उनकी आँखों में वासना की एक ऐसी चमक थी जो किसी भी मर्यादा को कुचल देने के लिए काफी थी। उनके चेहरे पर एक प्रकार का अहंकार था, जैसे वे उस अंग के माध्यम से अपनी मर्दानगी और अधिकार को पूरी तरह से सिद्ध कर रहे हों। वे अपनी इस शक्ति को देखकर और मम्मी की विवशता को देखकर एक अघोषित उत्तेजना में डूबे हुए थे।
उस पल की भयावहता मेरे लिए केवल एक दृश्य नहीं थी, बल्कि मेरे बचपन के अंत की शुरुआत थी। ऐसी उम्र जहाँ दुनिया अभी भी सुरक्षित और मर्यादित लगती थी। लेकिन उस दरवाजे की दरार से जो मैंने देखा, उसने मेरी मासूमियत को एक ही झटके में राख कर दिया।
खिड़की में से मैं जो देख रहा था, वह मेरी कल्पना से परे था। प्रदीप अंकल का व्यवहार अचानक बदल गया था। उन्होंने अपनी नज़रें मम्मी के शरीर से हटाकर एक पल के लिए उस दिशा में घुमाईं जहाँ मैं छिपा हुआ था, लेकिन उनकी आँखों में कोई डर नहीं था वहाँ केवल एक शिकारी की जीत थी। पर मुझे लगा कि शायद वे बस यूँ ही देख रहे थे। मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि वे मुझे देख चुके हैं।
तभी, प्रदीप ने एक ऐसा काम किया जिसने मेरे दिमाग के सारे संस्कार और धार्मिकता की नींव हिला दी। उन्होंने मम्मी को एक तरफ थोड़ा सा हटाकर, जानबूझकर अपने उस विशाल और उत्तेजित अंग को खिड़की की दिशा में और भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया। उन्होंने उसे अपने हाथ से पकड़कर ऊपर की ओर खींचा और एक अजीब सी मुस्कान के साथ उसे हिलाने लगे। यह कोई सामान्य क्रिया नहीं थी; यह एक प्रदर्शन था।
वे मुझे यह दिखाना चाह रहे थे कि जिस माँ को मैं अब तक केवल पूजा और मर्यादा की प्रतिमूर्ति मानता था, वह इस समय इस 'पाप' के सामने कितनी बेबस और समर्पित है। प्रदीप की आँखों में एक क्रूर चमक थी, जैसे वे कह रहे हों *"देखो रवि, देखो अपनी इस धार्मिक माँ का असली रूप।"* मैं वहीं खड़ा काँप रहा था। मुझे लगा कि मैं शायद कुछ गलत देख रहा हूँ, लेकिन वह दृश्य इतना जीवंत और इतना भयावह था कि मैं अपनी आँखें नहीं हटा सका। वह अंग, वह वासना और मम्मी की वह बेबसी सब कुछ मेरे भीतर के उस बच्चे को मार रहा था जो अब तक केवल ईश्वर और धर्म को जानता था।
जैसे ही प्रदीप ने वह प्रदर्शन किया, कमरे के भीतर का तापमान और भी बढ़ गया। मम्मी, जो अब तक केवल अपनी उत्तेजना में खोई हुई थीं, प्रदीप के उस अचानक और आक्रामक बदलाव से थोड़ा सकपका गईं। उन्होंने अपनी धुंधली आँखों से प्रदीप की ओर देखा और धीरे से फुसफुसायीं, "प्रदीप... क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा..." उनकी आवाज़ में डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी समर्पण भरी घबराहट थी जो प्रदीप को और भी ज़्यादा उकसा रही थी।
प्रदीप ने उनकी बात अनसुनी कर दी। उन्होंने मम्मी के शरीर को और भी ज़ोर से पीछे की ओर धकेला, जिससे उनका शरीर खिड़की की उस दिशा में और भी स्पष्ट हो गया जहाँ मैं खड़ा था। उन्होंने एक हाथ से मम्मी की कमर को ज़ोर से जकड़ा और दूसरे हाथ से अपने उस उत्तेजित अंग को मम्मी के अंगों के साथ रगड़ना शुरू कर दिया। उनकी रगड़ की आवाज़ और मम्मी की दबी हुई आहें उस सन्नाटे में गूँज रही थीं।
मैं खिड़की के पीछे खड़ा अपनी साँसें रोककर यह सब देख रहा था। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे डर था कहीं वह आवाज़ मम्मी तक न पहुँच जाए। प्रदीप का वह अंग, जो अब पूरी तरह से उभर कर सामने था, मम्मी की कोमल त्वचा से टकरा रहा था। वह दृश्य इतना कच्चा और इतना अनैतिक था कि मेरी धार्मिक परवरिश मुझे वहाँ से भाग जाने को कह रही थी, लेकिन मेरा शरीर जैसे जम गया था।
तभी प्रदीप ने अचानक मम्मी के कान के पास झुककर कुछ कहा और फिर उन्होंने अपनी क्रिया की गति को और तेज़ कर दिया। वे अब केवल संभोग नहीं कर रहे थे, वे एक तमाशा पेश कर रहे थे एक ऐसा तमाशा जिसका दर्शक मैं था, और जिसका उद्देश्य मेरे भीतर के उस मासूम को हमेशा के लिए खत्म करना था।
प्रदीप का वह प्रदर्शन अब केवल एक प्रदर्शन नहीं रह गया था, वह एक पूर्ण समर्पण की ओर बढ़ रहा था। मम्मी की आँखों में जो पहले थोड़ी सी हिचकिचाहट या डर था, वह अब पूरी तरह से गायब हो चुका था। उनकी जगह एक ऐसी गहरी, आदिम भूख ने ले ली थी जिसे देखकर मेरा कलेजा मुँह को आ रहा था।
तभी प्रदीप ने मम्मी को और भी बेपरवाह तरीके से झकझोर दिया। उन्होंने मम्मी की कमर को इतनी ज़ोर से अपने हाथों में जकड़ा कि उनके शरीर पर उनकी उंगलियों के निशान पड़ गए। और फिर, अचानक से उन्होंने मम्मी के शरीर को नीचे की ओर एक ज़ोरदार झटका दिया। वह झटका इतना गहरा और इतना तीव्र था कि मम्मी का पूरा शरीर हवा में थोड़ा सा उछला और फिर वापस प्रदीप के उस कठोर अंग के संपर्क में आ गया।
मम्मी ने उस झटके के साथ एक ऐसी आवाज़ निकाली जो किसी पवित्र स्त्री की नहीं हो सकती थी वह एक ऐसी दबी हुई चीख थी जिसमें शर्म नहीं, बल्कि एक अदम्य तृप्ति थी। उन्होंने अपने कूल्हों को प्रदीप की ओर और भी आक्रामक तरीके से धकेला, जैसे वे खुद उस 'झटके' की मांग कर रही हों। उनके शरीर की वह हरकत साफ़ कह रही थी कि वह अब किसी मर्यादा या धार्मिकता की परवाह नहीं करतीं; वह अब पूरी तरह से उस वासना के वश में थीं।
मैं खिड़की के पीछे खड़ा काँप रहा था। मेरी आँखों के सामने मेरी 'धार्मिक' माँ का वह रूप था जो किसी 'रंडी' की तरह उस वासना के खेल में पूरी तरह डूब चुकी थी। वह झटका और मम्मी का उस पर प्रतिक्रिया देना यह सब देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वे दोनों मिलकर उस पवित्र घर की हर मर्यादा को पैरों तले कुचल रहे हों। प्रदीप की आँखों में अब एक क्रूर मुस्कान थी, क्योंकि वह देख पा रहा था कि उसने न केवल मम्मी को जीता है, बल्कि मेरे मन में बसी उनकी पवित्रता की छवि को भी हमेशा के लिए नष्ट कर दिया है।
कमरे के भीतर का माहौल अब पूरी तरह से बदल चुका था। वह पवित्रता का ढोंग अब पूरी तरह से ढह गया था और उसकी जगह एक ऐसी अश्लील और कच्ची वासना ने ले ली थी जो रूह कंपा देने वाली थी। प्रदीप ने मम्मी को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में ले लिया था। उन्होंने मम्मी के शरीर को एक अजीब और अपमानजनक मुद्रा में झुकाया और फिर उनके उस हिस्से पर प्रहार करना शुरू किया जहाँ से उनका सारा नियंत्रण खो रहा था।
संभोग की गति अब धीमी नहीं थी; वह एक क्रूर और लयबद्ध प्रहार बन चुका था। हर झटके के साथ मम्मी का शरीर आगे पीछे झूल रहा था और कमरे में केवल उनके शरीर के टकराने की आवाज़ और उनकी भारी साँसों का शोर था। प्रदीप ने एक हाथ से मम्मी के बालों को ज़ोर से पीछे खींचा ताकि उनका चेहरा ऊपर की ओर हो जाए और उनकी आँखें सीधे खिड़की की उस दिशा में हों जहाँ मैं छिपा था।
प्रदीप ने उनके कान के पास झुककर एक ज़हरीली मुस्कान के साथ फुसफुसाया, "कहाँ गई तुम्हारी वो धार्मिकता? कहाँ गई तुम्हारी वो मर्यादा जिसकी तुम बातें करती थी? कहाँ है तुम्हारी वो पवित्रता जो इस घर की दीवारों में बसी है?" उनकी आवाज़ में एक तरह का उपहास था, जैसे वे मम्मी की आत्मा को नोच रहे हों।
मम्मी की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे दुख के नहीं, बल्कि उस चरम सुख और आत्मसमर्पण के थे जो उन्हें इस पाप में मिल रहा था। उन्होंने एक गहरी और काँपती हुई आवाज़ में, जो पूरी तरह से टूट चुकी थी, जवाब दिया, "धार्मिकता... सब खत्म हो गई प्रदीप। मैं कोई धार्मिक माँ या पत्नी नहीं हूँ... मैं तो बस एक रंडी हूँ... तुम्हारी रंडी! मुझे बस और ज़ोर से मारो, मुझे और ज़ोर से चाहिए!"
यह सुनते ही मेरा दिल जैसे धड़कना भूल गया। मेरी माँ के मुँह से निकले उन शब्दों ने मेरे अस्तित्व को ही झकझोर दिया। जिस स्त्री को मैं भगवान की तरह पूजता था, वह आज खुद को एक 'रंडी' घोषित कर चुकी थी। प्रदीप ने उनकी इस बात को सुनकर एक क्रूर हँसी हँसी और उनके शरीर पर और भी अधिक आक्रामकता के साथ प्रहार करना शुरू कर दिया। वह संभोग अब केवल शारीरिक नहीं रह गया था; वह एक मानसिक विनाश था, जहाँ मम्मी अपनी गरिमा को त्यागकर पूरी तरह से उस वासना के गर्त में डूब चुकी थीं।
प्रदीप ने अब मम्मी के साथ केवल संभोग नहीं करना था, उन्हें पूरी तरह से एक खिलौने की तरह इस्तेमाल करना था। उन्होंने मम्मी को बिस्तर के किनारे पर इस तरह झुकाया कि उनका शरीर पूरी तरह से खुला और असुरक्षित हो गया। प्रदीप ने उनके अंगों के साथ खेलना शुरू किया, लेकिन यह कोई कोमल स्पर्श नहीं था। यह एक शिकारी का अपने शिकार के साथ खेलने जैसा था।
उन्होंने अपने हाथों और उंगलियों का इस्तेमाल करके मम्मी के शरीर के उन हिस्सों को टटोलना शुरू किया जिन्हें उन्होंने अब तक छुपा कर रखा था। प्रदीप ने उनके अंगों को इतनी बेरहमी और कुशलता से छुआ कि मम्मी के शरीर में बिजली की लहरें दौड़ गईं। उन्होंने मम्मी के अंगों को खींचकर, दबाकर और उनके साथ अजीबोगरीब तरीके से छेड़छाड़ करके उन्हें यह अहसास दिलाया कि अब उनके शरीर पर उनका नहीं, बल्कि केवल प्रदीप का अधिकार है।
प्रदीप ने मम्मी के संवेदनशील हिस्सों को अपनी उंगलियों से इस तरह रगड़ना शुरू किया कि मम्मी की चीखें अब नियंत्रण से बाहर होने लगीं। "देख रही हो?" प्रदीप ने उनके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "तुम्हारे ये अंग किसी मंदिर की मूर्ति की तरह नहीं हैं, ये तो बस वासना की प्यास बुझाने के लिए बने हैं।" उन्होंने एक हाथ से मम्मी के अंगों को पूरी तरह फैला दिया और दूसरे हाथ से उन पर अपनी उंगलियों का क्रूर खेल जारी रखा।
मम्मी का शरीर अब केवल प्रतिक्रिया दे रहा था। वे अपनी आँखें मूँदकर और अपने कूल्हों को प्रदीप के हाथों की दिशा में झटककर उस 'खिलवाड़' का आनंद ले रही थीं। उनके शरीर से निकलने वाली आवाज़ें अब और भी अधिक कामुक और अपमानजनक होती जा रही थीं। मैं खिड़की के पीछे खड़ा यह सब देख रहा था कैसे मेरी माँ का शरीर एक निर्जीव वस्तु की तरह प्रदीप के हाथों में आकार बदल रहा था। वह उनके अंगों के साथ ऐसे खेल रहे थे जैसे कोई बच्चा मिट्टी से खेलता है, लेकिन यह खेल बहुत ही गहरा और विनाशकारी था। मम्मी की वह 'धार्मिक' छवि अब पूरी तरह से ढह चुकी थी; अब वहाँ केवल एक ऐसी स्त्री थी जो अपने अंगों के साथ किए जा रहे उस क्रूर खिलवाड़ में अपनी आत्मा को खो रही थी।
कमरे के भीतर का वातावरण अब पूरी तरह से वासना और पसीने की गंध से भर चुका था। मम्मी और प्रदीप के बीच का वह खेल अब एक उन्माद का रूप ले चुका था। मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से बेकाबू था; उनकी त्वचा लाल पड़ चुकी थी और वे बार बार अपने शरीर को प्रदीप की ओर झटक रही थीं। उनकी आँखें पूरी तरह से पथरा गई थीं, जैसे वे किसी दूसरी ही दुनिया में हों जहाँ केवल स्पर्श और संवेदना का राज था। वे बार बार 'और' की पुकार कर रही थीं, जैसे वे उस असीम सुख के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हों। प्रदीप भी अब पूरी तरह से उत्तेजना के चरम पर थे, उनकी साँसें भारी और उग्र थीं और उनके चेहरे पर एक ऐसी क्रूर संतुष्टि थी जो किसी को भी डरा दे।
लेकिन इस दृश्य का सबसे भयानक हिस्सा मैं था। मैं खिड़की के उस अंधेरे कोने में खड़ा था, मेरा शरीर काँप रहा था और मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे लगा वह सीने से बाहर निकल आएगा। मेरी स्थिति उस समय किसी जीते जागते मुर्दे जैसी थी। मेरी आँखों में एक अजीब सी जलन थी शर्म की नहीं, बल्कि उस दृश्य को न देख पाने की छटपटाहट और साथ ही उसे न छोड़ पाने की मजबूरी की। मेरे हाथ ठंडे पड़ चुके थे और मेरे पैर जैसे ज़मीन में धँस गए थे। मैं अपनी ही माँ को एक वस्तु की तरह इस्तेमाल होते देख रहा था, और मेरा दिमाग इस सच को स्वीकार करने से इनकार कर रहा था। मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे मेरी आँखों को गीला करने के बजाय मेरे गालों पर एक ठंडी लकीर छोड़ रहे थे। मैं उस समय एक ऐसे मानसिक द्वंद्व में था जहाँ मेरी नैतिकता और मेरी वासना के बीच एक भीषण युद्ध चल रहा था। मैं न तो वहाँ से भाग पा रहा था और न ही अपनी नज़रें हटा पा रहा था। मैं बस एक मूक दर्शक बनकर अपनी ही दुनिया के विनाश को देख रहा था।
दृश्य अब उस मोड़ पर आ गया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। प्रदीप ने मम्मी के साथ जो खिलवाड़ किया था, उसने उन्हें पूरी तरह से मानसिक रूप से तोड़ दिया था। मम्मी अब केवल एक शरीर नहीं रह गई थीं; वे वासना की एक ऐसी आग बन चुकी थीं जो सब कुछ भस्म करने को तैयार थी। प्रदीप ने उन्हें बिस्तर पर पूरी तरह से लिटा दिया और उनके ऊपर हावी हो गए। उनकी गति अब पहले से कहीं अधिक हिंसक और अनियंत्रित हो गई थी। हर प्रहार के साथ मम्मी का शरीर बिस्तर से टकरा रहा था और उनके गले से निकलने वाली आवाज़ें अब चीख और कराह के बीच का एक अजीब मिश्रण बन चुकी थीं।
प्रदीप ने उनके चेहरे को अपने हाथों में जकड़ लिया और उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा, "अब बताओ, क्या तुम अब भी उस देवी की तरह महसूस करती हो जिसे तुम दुनिया को दिखाती थी? या अब तुम सिर्फ मेरी भूख मिटाने का एक साधन हो?" मम्मी ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी आँखें मूँद लीं और उनके शरीर ने एक ज़ोरदार झटका लिया। वे उस चरम सुख के बिल्कुल करीब थीं। उनकी उंगलियाँ बिस्तर की चादर को इतनी ज़ोर से जकड़ रही थीं कि उनके नाखून सफेद पड़ गए थे।
मैं खिड़की के पीछे से यह सब देख रहा था और मेरी स्थिति अब और भी भयावह हो गई थी। मेरा शरीर पसीने से तर बतर था और मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरा दम घुट रहा हो। मैं अपनी ही माँ के इस पतन को देखकर अंदर से मर रहा था, लेकिन मेरी आँखें उस दृश्य से चिपक गई थीं। मैं उस नर्क का हिस्सा बन चुका था जिसे मैं देख रहा था। जैसे ही प्रदीप ने अंतिम प्रहार किया और मम्मी ने एक लंबी, दर्दभरी और कामुक चीख के साथ अपना सब कुछ त्याग दिया, कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा उस शोर से भी ज़्यादा भयानक था जो अभी तक वहाँ था।
कमरे का वह भारी सन्नाटा अब एक भयावह शांति में बदल चुका था, लेकिन प्रदीप की आँखों में जो चमक थी, वह बता रही थी कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। उसने मम्मी के पसीने से तर शरीर पर अपना हाथ फेरा और फिर उनके चेहरे को झटके से ऊपर उठाया। उनकी आँखें अभी भी शून्य में ताक रही थीं, जैसे उनकी आत्मा कहीं दूर भटक गई हो। प्रदीप के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान उभरी। उसने धीरे से उनके कान के पास झुककर कहा, "अभी तो तुमने केवल स्वाद चखा है, असली दावत तो अब शुरू होगी। अब से तुम मेरी मर्जी के बिना अपनी पलकें भी नहीं झपका सकतीं।"
उसने मम्मी को बिस्तर से खींचकर फर्श पर घुटनों के बल बैठा दिया। यह एक अत्यंत अपमानजनक स्थिति थी। मम्मी, जो कुछ क्षण पहले तक एक गरिमामयी माँ थीं, अब एक बेबस और अपमानित स्त्री की तरह फर्श पर बैठी थीं। प्रदीप ने उन्हें आदेश दिया कि वे अपनी मर्यादा को पूरी तरह त्याग दें और उनके सामने एक वस्तु की तरह पेश आएँ। उसने उन्हें ऐसे काम करने पर मजबूर करना शुरू किया जो उनकी आत्मा को झकझोर देने वाले थे ऐसे काम जो केवल वासना की संतुष्टि के लिए थे और जिनमें उनकी गरिमा का कोई स्थान नहीं था। वे अब केवल प्रदीप के इशारों पर नाचने वाली एक कठपुतली बन चुकी थीं।
मैं खिड़की के पीछे से यह सब देख रहा था और मेरा दम घुटने लगा था। मेरी मानसिक स्थिति अब पूरी तरह से बिखर चुकी थी। मैं देख रहा था कि कैसे एक इंसान को धीरे धीरे एक निर्जीव वस्तु में बदला जा रहा है। मेरे भीतर का द्वंद्व अब समाप्त हो चुका था; अब वहाँ केवल एक गहरा कालापन था। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं उस अंधेरे का हिस्सा बनता जा रहा हूँ। मैं अपनी माँ के उस क्रमिक पतन को देख रहा था कैसे वे हर अपमान के साथ और भी अधिक टूट रही थीं, लेकिन साथ ही उस अपमानजनक सुख के प्रति और भी अधिक झुकती जा रही थीं। मेरा मन चीखना चाहता था, लेकिन मेरी आवाज़ गले में ही फंस गई थी। मैं उस नर्क का साक्षी था जहाँ नैतिकता की बलि दी जा रही थी।
कमरे की हवा अब और भी भारी और घुटन भरी हो गई थी। प्रदीप का व्यवहार अब केवल वासना तक सीमित नहीं रहा था; वह अब एक क्रूर शासक की तरह व्यवहार कर रहा था। उसने मम्मी को फर्श पर घुटनों के बल ही रहने का आदेश दिया और उन्हें अपनी आँखों के सामने अपनी गरिमा को पूरी तरह से मिटाने के लिए मजबूर किया। उसने उन्हें ऐसे आदेश देने शुरू किए जो किसी भी सभ्य समाज की सीमाओं को लांघ चुके थे। मम्मी का चेहरा शर्म और अपमान से लाल हो रहा था, लेकिन उनके शरीर की वह अनियंत्रित वासना उन्हें प्रदीप के हर अपमानजनक आदेश को मानने पर मजबूर कर रही थी। वे अब एक माँ नहीं, बल्कि एक ऐसी दासी की तरह लग रही थीं जो अपने स्वामी के हर क्रूर इशारे पर नाचने को तैयार थी।
प्रदीप ने उन्हें और भी अधिक अपमानित करने के लिए उन्हें अपनी सेवा में लगा दिया। उसने उन्हें ऐसे काम करने पर मजबूर किया जो उनकी आत्मा को छलनी कर रहे थे। वह उन्हें बार बार यह एहसास दिला रहा था कि अब वे किसी की माँ या कोई सम्मानित महिला नहीं हैं, बल्कि केवल उसकी एक 'चीज़' हैं। मम्मी की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे आँसू पछतावे के नहीं, बल्कि उस चरम मानसिक और शारीरिक गुलामी के थे जिसे वे अब स्वीकार कर चुकी थीं। वे उस अपमान को भी एक तरह के नशीले सुख की तरह महसूस करने लगी थीं।
मैं खिड़की के उस अंधेरे कोने में अब एक पत्थर की मूर्ति की तरह जम चुका था। मेरा दिमाग अब काम करना बंद कर चुका था। मैंने देखा कि कैसे एक इंसान का अस्तित्व धीरे धीरे मिटाया जा रहा है। मेरी आँखों के सामने मेरी माँ का वह पवित्र रूप पूरी तरह से नष्ट हो चुका था। मैं उस नर्क का हिस्सा बन चुका था जहाँ अब केवल शक्ति और समर्पण का खेल चल रहा था। मेरा मन अब चीखना चाहता था, लेकिन मेरे भीतर का वह लड़का मर चुका था। अब मैं केवल एक ऐसा साया था जो उस पतन को देख रहा था, और मुझे डर लग रहा था कि क्या अगला नंबर मेरा है? क्या प्रदीप अब मेरी ओर मुड़ेगा?
प्रदीप की आँखों में एक जंगली चमक थी। उसने अंजलि के शरीर को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया था। उसने अंजलि की आँखों में देखते हुए बहुत ही गंदी और अश्लील भाषा में बोलना शुरू किया, जिससे अंजलि का शर्म से चेहरा लाल हो गया, लेकिन उसके शरीर में एक अनचाही उत्तेजना भी दौड़ रही थी।
उसने अंजलि की जाँघों को ज़ोर से फैलाया और अपनी गंदी बातों के साथ उसे और भी उकसाने लगा। "तुम्हें क्या लगा था? कि मैं बस थोड़ा सा करके रुक जाऊँगा?" उसने अंजलि के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "अभी तो मुझे तुम्हारी इस गहराई में पूरी तरह डूबना है।"
उसने बिना किसी देरी के अपनी सारी वासना अंजलि की योनि (choot) के भीतर उतार दी। वह पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। वह गंदी बातें करना बंद नहीं कर रहा था, बल्कि हर झटके के साथ अंजलि को और भी अपमानित और उत्तेजित महसूस करा रहा था। वह चाहता था कि अंजलि अपनी सारी मर्यादा भूलकर केवल उसके शरीर की भूख मिटाने का एक जरिया बनकर रह जाए
प्रदीप ने जैसे ही अंजलि के भीतर अपना सारा वेग उतारा, कमरे का माहौल पूरी तरह बदल गया। वह शारीरिक चरम पर था, लेकिन उसके दिमाग में अब भी वही गंदी और अपमानजनक बातें चल रही थीं। वह अंजलि को केवल एक स्त्री की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी चीज़ की तरह देख रहा था जिसे उसने पूरी तरह जीत लिया है।
उसने अंजलि के पसीने से तर शरीर पर झुकते हुए, बहुत ही अश्लील लहजे में कहा, "देखा? तुम्हारी ये सारी मर्यादाएं, ये संस्कार... सब मेरे एक झटके के सामने घुटने टेक देते हैं। तुम कितनी पवित्र बनने का ढोंग करती थी, लेकिन तुम्हारी योनि तो मेरी गंदी बातों और मेरे वेग के लिए ही बनी है।"
अंजलि की आँखों में आँसू थे, लेकिन वे आँसू केवल शर्म के नहीं थे, बल्कि उस मानसिक हार के भी थे जो वह महसूस कर रही थी। प्रदीप ने उसके चेहरे पर थूकते हुए या उसे नीचा दिखाते हुए अपनी गंदी बातों का सिलसिला जारी रखा। वह उसे बार बार याद दिला रहा था कि वह अब एक 'पवित्र माँ' नहीं रही, बल्कि उसकी वासना का एक साधन बन चुकी है।
वह अंजलि के कानों में गंदे शब्द फुसफुसा रहा था, जिससे अंजलि का आत्मसम्मान पूरी तरह कुचल रहा था। वह उसे यह अहसास दिलाना चाहता था कि उसका पतन अब स्थायी है। प्रदीप का जुनून अब केवल शरीर तक सीमित नहीं था; वह अंजलि की आत्मा को गंदी बातों के जरिए मैला करना चाहता था।
प्रदीप ने अंजलि को अपनी गिरफ्त में ऐसे जकड़ा था जैसे वह कोई इंसान नहीं, बल्कि मांस का एक लोथड़ा हो। अंजलि की आँखों में जो बेबसी थी, वह प्रदीप के लिए ईंधन का काम कर रही थी। वह अंजलि के शरीर के साथ जो भी कर रहा था, उसके साथ उसकी जुबान से निकलने वाले शब्द और भी ज्यादा गंदे और अपमानजनक होते जा रहे थे।
उसने अंजलि के शरीर को उलट पुलट कर उसे अपनी वासना का केंद्र बना लिया था। वह अंजलि के अंगों को छूते हुए बार बार चिल्लाकर गंदी बातें कर रहा था, "देख रही हो न तुम? तुम्हारी ये जो मर्यादा की दीवार थी, वो अब ढह चुकी है। अब तुम सिर्फ मेरी हो, मेरी वासना की गुलाम।"
उसने अंजलि के शरीर के उन हिस्सों पर अपनी गंदी टिप्पणियाँ करना शुरू किया जिन्हें वह अब तक पवित्र मानती थी। वह अंजलि को यह महसूस करा रहा था कि उसका शरीर अब केवल उपभोग की वस्तु है। वह अंजलि के शरीर को चखते हुए और उसे गंदे शब्दों से कोसते हुए अपनी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था। वह रुकने का नाम नहीं ले रहा था; वह अंजलि को मानसिक रूप से इतना मैला करना चाहता था कि अंजलि खुद को कभी माफ न कर पाए। वह अंजलि के पतन का आनंद ले रहा था और अपनी गंदी बातों से।
उसने अंजलि के शरीर के उन हिस्सों पर अपनी जीभ और हाथों का इस्तेमाल करना शुरू किया जिन्हें वह अब तक 'मर्यादा' के नाम पर छुपाती आई थी। वह जानबूझकर बहुत ही गंदे और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर रहा था ताकि अंजलि का मानसिक संतुलन बिगड़ जाए। वह उसे बार बार यह अहसास दिला रहा था कि उसकी हर एक सांस, उसका हर एक अंग अब केवल प्रदीप के उपभोग के लिए है।
प्रदीप का हाथ अंजलि के शरीर पर रेंग रहा था और उसकी जुबान से निकलने वाले शब्द अंजलि के कानों में ज़हर की तरह घुल रहे थे। वह उसे मानसिक रूप से इतना मैला कर देना चाहता था कि अंजलि को अपनी पवित्रता का अहसास ही न रहे। वह अंजलि के पतन के हर पल का स्वाद ले रहा था, और उसकी गंदी बातें उस माहौल को और भी अधिक भारी और घृणित बना रही थी।
प्रदीप की वासना अब एक उन्माद का रूप ले चुकी थी। अंजलि का शरीर पसीने और थकावट से भीगा हुआ था, लेकिन प्रदीप के लिए यह सब अभी बहुत कम था। उसने अंजलि को बिस्तर पर पूरी तरह बेबस कर दिया था और अब वह उसके शरीर के साथ एक जानवर की तरह खेल रहा था।
उसने अंजलि के शरीर को अपनी मर्ज़ी से मोड़ना शुरू किया। वह उसके अंगों को छूते हुए और उन्हें अपनी गंदी नज़रों से देखते हुए लगातार अश्लील टिप्पणियाँ कर रहा था। "तुम्हारी ये देह... ये सब कितना गंदा और कामुक है," उसने अंजलि के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "तुम जितना खुद को पवित्र दिखाने की कोशिश करती हो, तुम उतनी ही ज़्यादा मेरी वासना की भूखी हो।
"प्रदीप के उस अंतिम और प्रचंड वेग के साथ, उसके शरीर का सारा रस अंजलि के भीतर समा गया। उस तीव्र मिलन और चरम सुख के बाद, जब सब कुछ शांत हुआ, तो अंजलि के शरीर से वह गर्म और चिपचिपा तरल धीरे धीरे बाहर बहने लगा, जो उस पूरी घटना की गवा
ही दे रहा था।"
पसीने और उस गर्म तरल की वजह से बेडशीट पूरी तरह से भीग चुकी थी। उस गीली और दागदार बेडशीट को देखकर मुझे अचानक उस रात वाले तौलिये के गीले और चिपचिपे होने का पूरा रहस्य समझ आ गया था। वह सब अब मेरे दिमाग में एक फिल्म की तरह चल रहा था वह चिपचिपाहट और वह गीलापन, जो अब तक एक रहस्य था, अब मेरे सामने पूरी तरह स्पष्ट हो चुका था।
प्रदीप अपने कमरे में जाकर लेट गया और आराम करने लगा। अंजलि के शरीर से उसका वीर्य अब धीरे धीरे बाहर बह रहा था। अंजलि उठकर बैठी और उसने बेडशीट उठाई ताकि वह अपनी योनि को साफ कर सके। उसने देखा कि बेडशीट उस सफेद तरल से पूरी तरह गीली हो चुकी थी। उसने तुरंत दूसरी साफ बेडशीट बिछाई और खुद को ढककर बाथरूम की ओर चली गई।
मेरा सिर चकराने लगा और मेरा मानसिक संतुलन डगमगा गया। मैं उस भयावह दृश्य से खुद को बाहर निकालने के लिए घर से थोड़ा दूर भागा और हैंडपंप से अपने चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारे ताकि होश में आ सकूँ।
जब मैं वापस घर आया, तो देखा कि मम्मी शायद दोबारा नहाकर अपने कमरे में आराम कर रही थीं। मैं उनसे नज़रें चुराते हुए बाहर निकल आया और अपनी दुकान खोलकर बैठ गया, लेकिन मेरे दिमाग में वही सब चल रहा था।
जैसे ही अंकल ने अपना वस्त्र पूरी तरह नीचे किया, मेरी नज़रें उनके उस अंग पर जाकर जम गईं। वह दृश्य इतना विकराल और डरावना था कि मेरे रोंगटे खड़े हो गए। वह अंग अत्यंत विशाल, शिराओं से भरा हुआ और गहरे रंग का था, जो अपनी कठोरता से एक अनिष्ट का संकेत दे रहा था। उसे देखकर मेरे मन में एक अनजाना सा डर बैठ गया। मैं सोचने लगा कि मम्मी की कोमल और छोटी सी वो जगह इस विशाल और कठोर वस्तु को कैसे बर्दाश्त करेगी? वह दर्द और वह दबाव उनके शरीर को किस तरह झकझोर देगा, यह सोचकर ही मैं भीतर तक सहम गया।
फिर ये सोचकर मन को तसल्ली मिली कि अभी 6-7 घंटे पहले यानी रात के 11बजे ही तो मम्मी इस को अपने भीतर आराम से ले रही थी ,जब अंधेरे कमरे में उस चारपाई पर जो मेरे बेड के पास ही लगाई गई थी दोनों के शरीर टकरा रहे थे और सिसकिया और गंदी बातें सुनाई दे रही थी ।मन में उस दृश्य की याद आते ही वो अंकल के इस भयानक स्वरूप को अपनी मम्मी के अंदर जाता देखने को व्याकुल हो उठा।
अंकल के उस विशाल और शिराओं से भरे विकराल अंग के दर्शन होते ही कमरे का वातावरण पूरी तरह बदल गया
मम्मी का चेहरा भय, शर्म और एक अनचाही उत्तेजना के बीच झूल रहा था। उनकी आँखें पथराई हुई थीं और उनके होंठ कांप रहे थे। उनके चेहरे पर उस विशाल अंग को देखकर एक गहरा संकोच और डर था कि वह उनके शरीर को कैसे छिन्न भिन्न कर देगा। लेकिन उस डर के नीचे एक ऐसी दबी हुई प्रतिक्रिया भी थी जिसे वे चाहकर भी छिपा नहीं पा रही थीं एक ऐसी प्रतिक्रिया जो रात के उन अनुभवों से उपजी थी। उनका पूरा शरीर एक अनचाहे समर्पण की स्थिति में था।
अंकल के चेहरे पर एक क्रूर और अदम्य विजय का भाव था। उनकी आँखों में वासना की एक ऐसी चमक थी जो किसी भी मर्यादा को कुचल देने के लिए काफी थी। उनके चेहरे पर एक प्रकार का अहंकार था, जैसे वे उस अंग के माध्यम से अपनी मर्दानगी और अधिकार को पूरी तरह से सिद्ध कर रहे हों। वे अपनी इस शक्ति को देखकर और मम्मी की विवशता को देखकर एक अघोषित उत्तेजना में डूबे हुए थे।
उस पल की भयावहता मेरे लिए केवल एक दृश्य नहीं थी, बल्कि मेरे बचपन के अंत की शुरुआत थी। ऐसी उम्र जहाँ दुनिया अभी भी सुरक्षित और मर्यादित लगती थी। लेकिन उस दरवाजे की दरार से जो मैंने देखा, उसने मेरी मासूमियत को एक ही झटके में राख कर दिया।
खिड़की में से मैं जो देख रहा था, वह मेरी कल्पना से परे था। प्रदीप अंकल का व्यवहार अचानक बदल गया था। उन्होंने अपनी नज़रें मम्मी के शरीर से हटाकर एक पल के लिए उस दिशा में घुमाईं जहाँ मैं छिपा हुआ था, लेकिन उनकी आँखों में कोई डर नहीं था वहाँ केवल एक शिकारी की जीत थी। पर मुझे लगा कि शायद वे बस यूँ ही देख रहे थे। मुझे अंदाज़ा भी नहीं था कि वे मुझे देख चुके हैं।
तभी, प्रदीप ने एक ऐसा काम किया जिसने मेरे दिमाग के सारे संस्कार और धार्मिकता की नींव हिला दी। उन्होंने मम्मी को एक तरफ थोड़ा सा हटाकर, जानबूझकर अपने उस विशाल और उत्तेजित अंग को खिड़की की दिशा में और भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया। उन्होंने उसे अपने हाथ से पकड़कर ऊपर की ओर खींचा और एक अजीब सी मुस्कान के साथ उसे हिलाने लगे। यह कोई सामान्य क्रिया नहीं थी; यह एक प्रदर्शन था।
वे मुझे यह दिखाना चाह रहे थे कि जिस माँ को मैं अब तक केवल पूजा और मर्यादा की प्रतिमूर्ति मानता था, वह इस समय इस 'पाप' के सामने कितनी बेबस और समर्पित है। प्रदीप की आँखों में एक क्रूर चमक थी, जैसे वे कह रहे हों *"देखो रवि, देखो अपनी इस धार्मिक माँ का असली रूप।"* मैं वहीं खड़ा काँप रहा था। मुझे लगा कि मैं शायद कुछ गलत देख रहा हूँ, लेकिन वह दृश्य इतना जीवंत और इतना भयावह था कि मैं अपनी आँखें नहीं हटा सका। वह अंग, वह वासना और मम्मी की वह बेबसी सब कुछ मेरे भीतर के उस बच्चे को मार रहा था जो अब तक केवल ईश्वर और धर्म को जानता था।
जैसे ही प्रदीप ने वह प्रदर्शन किया, कमरे के भीतर का तापमान और भी बढ़ गया। मम्मी, जो अब तक केवल अपनी उत्तेजना में खोई हुई थीं, प्रदीप के उस अचानक और आक्रामक बदलाव से थोड़ा सकपका गईं। उन्होंने अपनी धुंधली आँखों से प्रदीप की ओर देखा और धीरे से फुसफुसायीं, "प्रदीप... क्या कर रहे हो? कोई देख लेगा..." उनकी आवाज़ में डर नहीं था, बल्कि एक ऐसी समर्पण भरी घबराहट थी जो प्रदीप को और भी ज़्यादा उकसा रही थी।
प्रदीप ने उनकी बात अनसुनी कर दी। उन्होंने मम्मी के शरीर को और भी ज़ोर से पीछे की ओर धकेला, जिससे उनका शरीर खिड़की की उस दिशा में और भी स्पष्ट हो गया जहाँ मैं खड़ा था। उन्होंने एक हाथ से मम्मी की कमर को ज़ोर से जकड़ा और दूसरे हाथ से अपने उस उत्तेजित अंग को मम्मी के अंगों के साथ रगड़ना शुरू कर दिया। उनकी रगड़ की आवाज़ और मम्मी की दबी हुई आहें उस सन्नाटे में गूँज रही थीं।
मैं खिड़की के पीछे खड़ा अपनी साँसें रोककर यह सब देख रहा था। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे डर था कहीं वह आवाज़ मम्मी तक न पहुँच जाए। प्रदीप का वह अंग, जो अब पूरी तरह से उभर कर सामने था, मम्मी की कोमल त्वचा से टकरा रहा था। वह दृश्य इतना कच्चा और इतना अनैतिक था कि मेरी धार्मिक परवरिश मुझे वहाँ से भाग जाने को कह रही थी, लेकिन मेरा शरीर जैसे जम गया था।
तभी प्रदीप ने अचानक मम्मी के कान के पास झुककर कुछ कहा और फिर उन्होंने अपनी क्रिया की गति को और तेज़ कर दिया। वे अब केवल संभोग नहीं कर रहे थे, वे एक तमाशा पेश कर रहे थे एक ऐसा तमाशा जिसका दर्शक मैं था, और जिसका उद्देश्य मेरे भीतर के उस मासूम को हमेशा के लिए खत्म करना था।
प्रदीप का वह प्रदर्शन अब केवल एक प्रदर्शन नहीं रह गया था, वह एक पूर्ण समर्पण की ओर बढ़ रहा था। मम्मी की आँखों में जो पहले थोड़ी सी हिचकिचाहट या डर था, वह अब पूरी तरह से गायब हो चुका था। उनकी जगह एक ऐसी गहरी, आदिम भूख ने ले ली थी जिसे देखकर मेरा कलेजा मुँह को आ रहा था।
तभी प्रदीप ने मम्मी को और भी बेपरवाह तरीके से झकझोर दिया। उन्होंने मम्मी की कमर को इतनी ज़ोर से अपने हाथों में जकड़ा कि उनके शरीर पर उनकी उंगलियों के निशान पड़ गए। और फिर, अचानक से उन्होंने मम्मी के शरीर को नीचे की ओर एक ज़ोरदार झटका दिया। वह झटका इतना गहरा और इतना तीव्र था कि मम्मी का पूरा शरीर हवा में थोड़ा सा उछला और फिर वापस प्रदीप के उस कठोर अंग के संपर्क में आ गया।
मम्मी ने उस झटके के साथ एक ऐसी आवाज़ निकाली जो किसी पवित्र स्त्री की नहीं हो सकती थी वह एक ऐसी दबी हुई चीख थी जिसमें शर्म नहीं, बल्कि एक अदम्य तृप्ति थी। उन्होंने अपने कूल्हों को प्रदीप की ओर और भी आक्रामक तरीके से धकेला, जैसे वे खुद उस 'झटके' की मांग कर रही हों। उनके शरीर की वह हरकत साफ़ कह रही थी कि वह अब किसी मर्यादा या धार्मिकता की परवाह नहीं करतीं; वह अब पूरी तरह से उस वासना के वश में थीं।
मैं खिड़की के पीछे खड़ा काँप रहा था। मेरी आँखों के सामने मेरी 'धार्मिक' माँ का वह रूप था जो किसी 'रंडी' की तरह उस वासना के खेल में पूरी तरह डूब चुकी थी। वह झटका और मम्मी का उस पर प्रतिक्रिया देना यह सब देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वे दोनों मिलकर उस पवित्र घर की हर मर्यादा को पैरों तले कुचल रहे हों। प्रदीप की आँखों में अब एक क्रूर मुस्कान थी, क्योंकि वह देख पा रहा था कि उसने न केवल मम्मी को जीता है, बल्कि मेरे मन में बसी उनकी पवित्रता की छवि को भी हमेशा के लिए नष्ट कर दिया है।
कमरे के भीतर का माहौल अब पूरी तरह से बदल चुका था। वह पवित्रता का ढोंग अब पूरी तरह से ढह गया था और उसकी जगह एक ऐसी अश्लील और कच्ची वासना ने ले ली थी जो रूह कंपा देने वाली थी। प्रदीप ने मम्मी को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में ले लिया था। उन्होंने मम्मी के शरीर को एक अजीब और अपमानजनक मुद्रा में झुकाया और फिर उनके उस हिस्से पर प्रहार करना शुरू किया जहाँ से उनका सारा नियंत्रण खो रहा था।
संभोग की गति अब धीमी नहीं थी; वह एक क्रूर और लयबद्ध प्रहार बन चुका था। हर झटके के साथ मम्मी का शरीर आगे पीछे झूल रहा था और कमरे में केवल उनके शरीर के टकराने की आवाज़ और उनकी भारी साँसों का शोर था। प्रदीप ने एक हाथ से मम्मी के बालों को ज़ोर से पीछे खींचा ताकि उनका चेहरा ऊपर की ओर हो जाए और उनकी आँखें सीधे खिड़की की उस दिशा में हों जहाँ मैं छिपा था।
प्रदीप ने उनके कान के पास झुककर एक ज़हरीली मुस्कान के साथ फुसफुसाया, "कहाँ गई तुम्हारी वो धार्मिकता? कहाँ गई तुम्हारी वो मर्यादा जिसकी तुम बातें करती थी? कहाँ है तुम्हारी वो पवित्रता जो इस घर की दीवारों में बसी है?" उनकी आवाज़ में एक तरह का उपहास था, जैसे वे मम्मी की आत्मा को नोच रहे हों।
मम्मी की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे दुख के नहीं, बल्कि उस चरम सुख और आत्मसमर्पण के थे जो उन्हें इस पाप में मिल रहा था। उन्होंने एक गहरी और काँपती हुई आवाज़ में, जो पूरी तरह से टूट चुकी थी, जवाब दिया, "धार्मिकता... सब खत्म हो गई प्रदीप। मैं कोई धार्मिक माँ या पत्नी नहीं हूँ... मैं तो बस एक रंडी हूँ... तुम्हारी रंडी! मुझे बस और ज़ोर से मारो, मुझे और ज़ोर से चाहिए!"
यह सुनते ही मेरा दिल जैसे धड़कना भूल गया। मेरी माँ के मुँह से निकले उन शब्दों ने मेरे अस्तित्व को ही झकझोर दिया। जिस स्त्री को मैं भगवान की तरह पूजता था, वह आज खुद को एक 'रंडी' घोषित कर चुकी थी। प्रदीप ने उनकी इस बात को सुनकर एक क्रूर हँसी हँसी और उनके शरीर पर और भी अधिक आक्रामकता के साथ प्रहार करना शुरू कर दिया। वह संभोग अब केवल शारीरिक नहीं रह गया था; वह एक मानसिक विनाश था, जहाँ मम्मी अपनी गरिमा को त्यागकर पूरी तरह से उस वासना के गर्त में डूब चुकी थीं।
प्रदीप ने अब मम्मी के साथ केवल संभोग नहीं करना था, उन्हें पूरी तरह से एक खिलौने की तरह इस्तेमाल करना था। उन्होंने मम्मी को बिस्तर के किनारे पर इस तरह झुकाया कि उनका शरीर पूरी तरह से खुला और असुरक्षित हो गया। प्रदीप ने उनके अंगों के साथ खेलना शुरू किया, लेकिन यह कोई कोमल स्पर्श नहीं था। यह एक शिकारी का अपने शिकार के साथ खेलने जैसा था।
उन्होंने अपने हाथों और उंगलियों का इस्तेमाल करके मम्मी के शरीर के उन हिस्सों को टटोलना शुरू किया जिन्हें उन्होंने अब तक छुपा कर रखा था। प्रदीप ने उनके अंगों को इतनी बेरहमी और कुशलता से छुआ कि मम्मी के शरीर में बिजली की लहरें दौड़ गईं। उन्होंने मम्मी के अंगों को खींचकर, दबाकर और उनके साथ अजीबोगरीब तरीके से छेड़छाड़ करके उन्हें यह अहसास दिलाया कि अब उनके शरीर पर उनका नहीं, बल्कि केवल प्रदीप का अधिकार है।
प्रदीप ने मम्मी के संवेदनशील हिस्सों को अपनी उंगलियों से इस तरह रगड़ना शुरू किया कि मम्मी की चीखें अब नियंत्रण से बाहर होने लगीं। "देख रही हो?" प्रदीप ने उनके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "तुम्हारे ये अंग किसी मंदिर की मूर्ति की तरह नहीं हैं, ये तो बस वासना की प्यास बुझाने के लिए बने हैं।" उन्होंने एक हाथ से मम्मी के अंगों को पूरी तरह फैला दिया और दूसरे हाथ से उन पर अपनी उंगलियों का क्रूर खेल जारी रखा।
मम्मी का शरीर अब केवल प्रतिक्रिया दे रहा था। वे अपनी आँखें मूँदकर और अपने कूल्हों को प्रदीप के हाथों की दिशा में झटककर उस 'खिलवाड़' का आनंद ले रही थीं। उनके शरीर से निकलने वाली आवाज़ें अब और भी अधिक कामुक और अपमानजनक होती जा रही थीं। मैं खिड़की के पीछे खड़ा यह सब देख रहा था कैसे मेरी माँ का शरीर एक निर्जीव वस्तु की तरह प्रदीप के हाथों में आकार बदल रहा था। वह उनके अंगों के साथ ऐसे खेल रहे थे जैसे कोई बच्चा मिट्टी से खेलता है, लेकिन यह खेल बहुत ही गहरा और विनाशकारी था। मम्मी की वह 'धार्मिक' छवि अब पूरी तरह से ढह चुकी थी; अब वहाँ केवल एक ऐसी स्त्री थी जो अपने अंगों के साथ किए जा रहे उस क्रूर खिलवाड़ में अपनी आत्मा को खो रही थी।
कमरे के भीतर का वातावरण अब पूरी तरह से वासना और पसीने की गंध से भर चुका था। मम्मी और प्रदीप के बीच का वह खेल अब एक उन्माद का रूप ले चुका था। मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से बेकाबू था; उनकी त्वचा लाल पड़ चुकी थी और वे बार बार अपने शरीर को प्रदीप की ओर झटक रही थीं। उनकी आँखें पूरी तरह से पथरा गई थीं, जैसे वे किसी दूसरी ही दुनिया में हों जहाँ केवल स्पर्श और संवेदना का राज था। वे बार बार 'और' की पुकार कर रही थीं, जैसे वे उस असीम सुख के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हों। प्रदीप भी अब पूरी तरह से उत्तेजना के चरम पर थे, उनकी साँसें भारी और उग्र थीं और उनके चेहरे पर एक ऐसी क्रूर संतुष्टि थी जो किसी को भी डरा दे।
लेकिन इस दृश्य का सबसे भयानक हिस्सा मैं था। मैं खिड़की के उस अंधेरे कोने में खड़ा था, मेरा शरीर काँप रहा था और मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे लगा वह सीने से बाहर निकल आएगा। मेरी स्थिति उस समय किसी जीते जागते मुर्दे जैसी थी। मेरी आँखों में एक अजीब सी जलन थी शर्म की नहीं, बल्कि उस दृश्य को न देख पाने की छटपटाहट और साथ ही उसे न छोड़ पाने की मजबूरी की। मेरे हाथ ठंडे पड़ चुके थे और मेरे पैर जैसे ज़मीन में धँस गए थे। मैं अपनी ही माँ को एक वस्तु की तरह इस्तेमाल होते देख रहा था, और मेरा दिमाग इस सच को स्वीकार करने से इनकार कर रहा था। मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे मेरी आँखों को गीला करने के बजाय मेरे गालों पर एक ठंडी लकीर छोड़ रहे थे। मैं उस समय एक ऐसे मानसिक द्वंद्व में था जहाँ मेरी नैतिकता और मेरी वासना के बीच एक भीषण युद्ध चल रहा था। मैं न तो वहाँ से भाग पा रहा था और न ही अपनी नज़रें हटा पा रहा था। मैं बस एक मूक दर्शक बनकर अपनी ही दुनिया के विनाश को देख रहा था।
दृश्य अब उस मोड़ पर आ गया था जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। प्रदीप ने मम्मी के साथ जो खिलवाड़ किया था, उसने उन्हें पूरी तरह से मानसिक रूप से तोड़ दिया था। मम्मी अब केवल एक शरीर नहीं रह गई थीं; वे वासना की एक ऐसी आग बन चुकी थीं जो सब कुछ भस्म करने को तैयार थी। प्रदीप ने उन्हें बिस्तर पर पूरी तरह से लिटा दिया और उनके ऊपर हावी हो गए। उनकी गति अब पहले से कहीं अधिक हिंसक और अनियंत्रित हो गई थी। हर प्रहार के साथ मम्मी का शरीर बिस्तर से टकरा रहा था और उनके गले से निकलने वाली आवाज़ें अब चीख और कराह के बीच का एक अजीब मिश्रण बन चुकी थीं।
प्रदीप ने उनके चेहरे को अपने हाथों में जकड़ लिया और उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा, "अब बताओ, क्या तुम अब भी उस देवी की तरह महसूस करती हो जिसे तुम दुनिया को दिखाती थी? या अब तुम सिर्फ मेरी भूख मिटाने का एक साधन हो?" मम्मी ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी आँखें मूँद लीं और उनके शरीर ने एक ज़ोरदार झटका लिया। वे उस चरम सुख के बिल्कुल करीब थीं। उनकी उंगलियाँ बिस्तर की चादर को इतनी ज़ोर से जकड़ रही थीं कि उनके नाखून सफेद पड़ गए थे।
मैं खिड़की के पीछे से यह सब देख रहा था और मेरी स्थिति अब और भी भयावह हो गई थी। मेरा शरीर पसीने से तर बतर था और मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरा दम घुट रहा हो। मैं अपनी ही माँ के इस पतन को देखकर अंदर से मर रहा था, लेकिन मेरी आँखें उस दृश्य से चिपक गई थीं। मैं उस नर्क का हिस्सा बन चुका था जिसे मैं देख रहा था। जैसे ही प्रदीप ने अंतिम प्रहार किया और मम्मी ने एक लंबी, दर्दभरी और कामुक चीख के साथ अपना सब कुछ त्याग दिया, कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा उस शोर से भी ज़्यादा भयानक था जो अभी तक वहाँ था।
कमरे का वह भारी सन्नाटा अब एक भयावह शांति में बदल चुका था, लेकिन प्रदीप की आँखों में जो चमक थी, वह बता रही थी कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। उसने मम्मी के पसीने से तर शरीर पर अपना हाथ फेरा और फिर उनके चेहरे को झटके से ऊपर उठाया। उनकी आँखें अभी भी शून्य में ताक रही थीं, जैसे उनकी आत्मा कहीं दूर भटक गई हो। प्रदीप के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान उभरी। उसने धीरे से उनके कान के पास झुककर कहा, "अभी तो तुमने केवल स्वाद चखा है, असली दावत तो अब शुरू होगी। अब से तुम मेरी मर्जी के बिना अपनी पलकें भी नहीं झपका सकतीं।"
उसने मम्मी को बिस्तर से खींचकर फर्श पर घुटनों के बल बैठा दिया। यह एक अत्यंत अपमानजनक स्थिति थी। मम्मी, जो कुछ क्षण पहले तक एक गरिमामयी माँ थीं, अब एक बेबस और अपमानित स्त्री की तरह फर्श पर बैठी थीं। प्रदीप ने उन्हें आदेश दिया कि वे अपनी मर्यादा को पूरी तरह त्याग दें और उनके सामने एक वस्तु की तरह पेश आएँ। उसने उन्हें ऐसे काम करने पर मजबूर करना शुरू किया जो उनकी आत्मा को झकझोर देने वाले थे ऐसे काम जो केवल वासना की संतुष्टि के लिए थे और जिनमें उनकी गरिमा का कोई स्थान नहीं था। वे अब केवल प्रदीप के इशारों पर नाचने वाली एक कठपुतली बन चुकी थीं।
मैं खिड़की के पीछे से यह सब देख रहा था और मेरा दम घुटने लगा था। मेरी मानसिक स्थिति अब पूरी तरह से बिखर चुकी थी। मैं देख रहा था कि कैसे एक इंसान को धीरे धीरे एक निर्जीव वस्तु में बदला जा रहा है। मेरे भीतर का द्वंद्व अब समाप्त हो चुका था; अब वहाँ केवल एक गहरा कालापन था। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं उस अंधेरे का हिस्सा बनता जा रहा हूँ। मैं अपनी माँ के उस क्रमिक पतन को देख रहा था कैसे वे हर अपमान के साथ और भी अधिक टूट रही थीं, लेकिन साथ ही उस अपमानजनक सुख के प्रति और भी अधिक झुकती जा रही थीं। मेरा मन चीखना चाहता था, लेकिन मेरी आवाज़ गले में ही फंस गई थी। मैं उस नर्क का साक्षी था जहाँ नैतिकता की बलि दी जा रही थी।
कमरे की हवा अब और भी भारी और घुटन भरी हो गई थी। प्रदीप का व्यवहार अब केवल वासना तक सीमित नहीं रहा था; वह अब एक क्रूर शासक की तरह व्यवहार कर रहा था। उसने मम्मी को फर्श पर घुटनों के बल ही रहने का आदेश दिया और उन्हें अपनी आँखों के सामने अपनी गरिमा को पूरी तरह से मिटाने के लिए मजबूर किया। उसने उन्हें ऐसे आदेश देने शुरू किए जो किसी भी सभ्य समाज की सीमाओं को लांघ चुके थे। मम्मी का चेहरा शर्म और अपमान से लाल हो रहा था, लेकिन उनके शरीर की वह अनियंत्रित वासना उन्हें प्रदीप के हर अपमानजनक आदेश को मानने पर मजबूर कर रही थी। वे अब एक माँ नहीं, बल्कि एक ऐसी दासी की तरह लग रही थीं जो अपने स्वामी के हर क्रूर इशारे पर नाचने को तैयार थी।
प्रदीप ने उन्हें और भी अधिक अपमानित करने के लिए उन्हें अपनी सेवा में लगा दिया। उसने उन्हें ऐसे काम करने पर मजबूर किया जो उनकी आत्मा को छलनी कर रहे थे। वह उन्हें बार बार यह एहसास दिला रहा था कि अब वे किसी की माँ या कोई सम्मानित महिला नहीं हैं, बल्कि केवल उसकी एक 'चीज़' हैं। मम्मी की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वे आँसू पछतावे के नहीं, बल्कि उस चरम मानसिक और शारीरिक गुलामी के थे जिसे वे अब स्वीकार कर चुकी थीं। वे उस अपमान को भी एक तरह के नशीले सुख की तरह महसूस करने लगी थीं।
मैं खिड़की के उस अंधेरे कोने में अब एक पत्थर की मूर्ति की तरह जम चुका था। मेरा दिमाग अब काम करना बंद कर चुका था। मैंने देखा कि कैसे एक इंसान का अस्तित्व धीरे धीरे मिटाया जा रहा है। मेरी आँखों के सामने मेरी माँ का वह पवित्र रूप पूरी तरह से नष्ट हो चुका था। मैं उस नर्क का हिस्सा बन चुका था जहाँ अब केवल शक्ति और समर्पण का खेल चल रहा था। मेरा मन अब चीखना चाहता था, लेकिन मेरे भीतर का वह लड़का मर चुका था। अब मैं केवल एक ऐसा साया था जो उस पतन को देख रहा था, और मुझे डर लग रहा था कि क्या अगला नंबर मेरा है? क्या प्रदीप अब मेरी ओर मुड़ेगा?
प्रदीप की आँखों में एक जंगली चमक थी। उसने अंजलि के शरीर को पूरी तरह से अपने वश में कर लिया था। उसने अंजलि की आँखों में देखते हुए बहुत ही गंदी और अश्लील भाषा में बोलना शुरू किया, जिससे अंजलि का शर्म से चेहरा लाल हो गया, लेकिन उसके शरीर में एक अनचाही उत्तेजना भी दौड़ रही थी।
उसने अंजलि की जाँघों को ज़ोर से फैलाया और अपनी गंदी बातों के साथ उसे और भी उकसाने लगा। "तुम्हें क्या लगा था? कि मैं बस थोड़ा सा करके रुक जाऊँगा?" उसने अंजलि के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "अभी तो मुझे तुम्हारी इस गहराई में पूरी तरह डूबना है।"
उसने बिना किसी देरी के अपनी सारी वासना अंजलि की योनि (choot) के भीतर उतार दी। वह पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। वह गंदी बातें करना बंद नहीं कर रहा था, बल्कि हर झटके के साथ अंजलि को और भी अपमानित और उत्तेजित महसूस करा रहा था। वह चाहता था कि अंजलि अपनी सारी मर्यादा भूलकर केवल उसके शरीर की भूख मिटाने का एक जरिया बनकर रह जाए
प्रदीप ने जैसे ही अंजलि के भीतर अपना सारा वेग उतारा, कमरे का माहौल पूरी तरह बदल गया। वह शारीरिक चरम पर था, लेकिन उसके दिमाग में अब भी वही गंदी और अपमानजनक बातें चल रही थीं। वह अंजलि को केवल एक स्त्री की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसी चीज़ की तरह देख रहा था जिसे उसने पूरी तरह जीत लिया है।
उसने अंजलि के पसीने से तर शरीर पर झुकते हुए, बहुत ही अश्लील लहजे में कहा, "देखा? तुम्हारी ये सारी मर्यादाएं, ये संस्कार... सब मेरे एक झटके के सामने घुटने टेक देते हैं। तुम कितनी पवित्र बनने का ढोंग करती थी, लेकिन तुम्हारी योनि तो मेरी गंदी बातों और मेरे वेग के लिए ही बनी है।"
अंजलि की आँखों में आँसू थे, लेकिन वे आँसू केवल शर्म के नहीं थे, बल्कि उस मानसिक हार के भी थे जो वह महसूस कर रही थी। प्रदीप ने उसके चेहरे पर थूकते हुए या उसे नीचा दिखाते हुए अपनी गंदी बातों का सिलसिला जारी रखा। वह उसे बार बार याद दिला रहा था कि वह अब एक 'पवित्र माँ' नहीं रही, बल्कि उसकी वासना का एक साधन बन चुकी है।
वह अंजलि के कानों में गंदे शब्द फुसफुसा रहा था, जिससे अंजलि का आत्मसम्मान पूरी तरह कुचल रहा था। वह उसे यह अहसास दिलाना चाहता था कि उसका पतन अब स्थायी है। प्रदीप का जुनून अब केवल शरीर तक सीमित नहीं था; वह अंजलि की आत्मा को गंदी बातों के जरिए मैला करना चाहता था।
प्रदीप ने अंजलि को अपनी गिरफ्त में ऐसे जकड़ा था जैसे वह कोई इंसान नहीं, बल्कि मांस का एक लोथड़ा हो। अंजलि की आँखों में जो बेबसी थी, वह प्रदीप के लिए ईंधन का काम कर रही थी। वह अंजलि के शरीर के साथ जो भी कर रहा था, उसके साथ उसकी जुबान से निकलने वाले शब्द और भी ज्यादा गंदे और अपमानजनक होते जा रहे थे।
उसने अंजलि के शरीर को उलट पुलट कर उसे अपनी वासना का केंद्र बना लिया था। वह अंजलि के अंगों को छूते हुए बार बार चिल्लाकर गंदी बातें कर रहा था, "देख रही हो न तुम? तुम्हारी ये जो मर्यादा की दीवार थी, वो अब ढह चुकी है। अब तुम सिर्फ मेरी हो, मेरी वासना की गुलाम।"
उसने अंजलि के शरीर के उन हिस्सों पर अपनी गंदी टिप्पणियाँ करना शुरू किया जिन्हें वह अब तक पवित्र मानती थी। वह अंजलि को यह महसूस करा रहा था कि उसका शरीर अब केवल उपभोग की वस्तु है। वह अंजलि के शरीर को चखते हुए और उसे गंदे शब्दों से कोसते हुए अपनी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था। वह रुकने का नाम नहीं ले रहा था; वह अंजलि को मानसिक रूप से इतना मैला करना चाहता था कि अंजलि खुद को कभी माफ न कर पाए। वह अंजलि के पतन का आनंद ले रहा था और अपनी गंदी बातों से।
उसने अंजलि के शरीर के उन हिस्सों पर अपनी जीभ और हाथों का इस्तेमाल करना शुरू किया जिन्हें वह अब तक 'मर्यादा' के नाम पर छुपाती आई थी। वह जानबूझकर बहुत ही गंदे और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर रहा था ताकि अंजलि का मानसिक संतुलन बिगड़ जाए। वह उसे बार बार यह अहसास दिला रहा था कि उसकी हर एक सांस, उसका हर एक अंग अब केवल प्रदीप के उपभोग के लिए है।
प्रदीप का हाथ अंजलि के शरीर पर रेंग रहा था और उसकी जुबान से निकलने वाले शब्द अंजलि के कानों में ज़हर की तरह घुल रहे थे। वह उसे मानसिक रूप से इतना मैला कर देना चाहता था कि अंजलि को अपनी पवित्रता का अहसास ही न रहे। वह अंजलि के पतन के हर पल का स्वाद ले रहा था, और उसकी गंदी बातें उस माहौल को और भी अधिक भारी और घृणित बना रही थी।
प्रदीप की वासना अब एक उन्माद का रूप ले चुकी थी। अंजलि का शरीर पसीने और थकावट से भीगा हुआ था, लेकिन प्रदीप के लिए यह सब अभी बहुत कम था। उसने अंजलि को बिस्तर पर पूरी तरह बेबस कर दिया था और अब वह उसके शरीर के साथ एक जानवर की तरह खेल रहा था।
उसने अंजलि के शरीर को अपनी मर्ज़ी से मोड़ना शुरू किया। वह उसके अंगों को छूते हुए और उन्हें अपनी गंदी नज़रों से देखते हुए लगातार अश्लील टिप्पणियाँ कर रहा था। "तुम्हारी ये देह... ये सब कितना गंदा और कामुक है," उसने अंजलि के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "तुम जितना खुद को पवित्र दिखाने की कोशिश करती हो, तुम उतनी ही ज़्यादा मेरी वासना की भूखी हो।
"प्रदीप के उस अंतिम और प्रचंड वेग के साथ, उसके शरीर का सारा रस अंजलि के भीतर समा गया। उस तीव्र मिलन और चरम सुख के बाद, जब सब कुछ शांत हुआ, तो अंजलि के शरीर से वह गर्म और चिपचिपा तरल धीरे धीरे बाहर बहने लगा, जो उस पूरी घटना की गवा
ही दे रहा था।"
पसीने और उस गर्म तरल की वजह से बेडशीट पूरी तरह से भीग चुकी थी। उस गीली और दागदार बेडशीट को देखकर मुझे अचानक उस रात वाले तौलिये के गीले और चिपचिपे होने का पूरा रहस्य समझ आ गया था। वह सब अब मेरे दिमाग में एक फिल्म की तरह चल रहा था वह चिपचिपाहट और वह गीलापन, जो अब तक एक रहस्य था, अब मेरे सामने पूरी तरह स्पष्ट हो चुका था।
प्रदीप अपने कमरे में जाकर लेट गया और आराम करने लगा। अंजलि के शरीर से उसका वीर्य अब धीरे धीरे बाहर बह रहा था। अंजलि उठकर बैठी और उसने बेडशीट उठाई ताकि वह अपनी योनि को साफ कर सके। उसने देखा कि बेडशीट उस सफेद तरल से पूरी तरह गीली हो चुकी थी। उसने तुरंत दूसरी साफ बेडशीट बिछाई और खुद को ढककर बाथरूम की ओर चली गई।
मेरा सिर चकराने लगा और मेरा मानसिक संतुलन डगमगा गया। मैं उस भयावह दृश्य से खुद को बाहर निकालने के लिए घर से थोड़ा दूर भागा और हैंडपंप से अपने चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारे ताकि होश में आ सकूँ।
जब मैं वापस घर आया, तो देखा कि मम्मी शायद दोबारा नहाकर अपने कमरे में आराम कर रही थीं। मैं उनसे नज़रें चुराते हुए बाहर निकल आया और अपनी दुकान खोलकर बैठ गया, लेकिन मेरे दिमाग में वही सब चल रहा था।


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